मुम्बई : टाइम्स ग्रुप की अध्यक्ष इंदु जैन का बृहस्पतिवार को 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया। समूह के समाचार चैनल ‘टाइम्स नाउ’ ने एक ट्वीट में जैन को आजीवन आध्यात्मिक साधक, अग्रणी परोपकारी, कला की प्रतिष्ठित संरक्षक और महिला अधिकारों का जबदस्त समर्थक बताया।
टाइम्स ग्रुप के सूत्रों ने बताया कि कोरोना वायरस संक्रमण से उत्पन्न जटिलताओं के कारण उनका निधन हो गया। उन्होंने बताया कि उन्होंने दिल्ली में अंतिम सांस ली।
जैन कल्याणकारी गतिविधियों के लिए स्थापित टाइम्स फाउंडेशन की संस्थापक भी थीं और उन्होंने उद्योग लॉबी फिक्की की महिला विंग की भी स्थापना की। उन्हें 2016 में देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।
टाइम्स ग्रुप की अध्यक्ष इंदु जैन का निधन
मैक्सिको की एंड्रिया मेज़ा बनी 69वीं मिस यूनिवर्स
हॉलीवुड : मैक्सिको की एंड्रिया मेज़ा ने मिस यूनिवर्स का 69वां खिताब अपने नाम किया है। मेज़ा ने मिस ब्राजील को शिकस्त देकर यह ताज जीता है। गत विजेता जोजिबिनी तुंज़ी ने मेज़ा के सिर पर मिस यूनिवर्स का ताज सजाया। मेज़ा के पास सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की डिग्री है। तुंज़ी एक जनसंपर्क पेशेवर हैं। दक्षिण अफ्रीकी की रहने वाली तुंज़ी मिस यूनिवर्स का खिताब जीतने वाली पहली अश्वेत महिला हैं और उनके पास यह ताज दिसंबर 2019 से था, क्योंकि पिछले साल महामारी के कारण इस प्रतियोगिता को रद्द कर दिया गया था। इस समारोह की मेज़बानी ‘एक्सेस हॉलीवुड्स’ की मारियो लोपेज और अभिनेत्री, मॉडल तथा 2012 में मिस यूनिवर्स रह चुकी ओलिवियो कुल्पो ने की है। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण अमेरिका के फ्लोरिडा में हॉलीवुड के सेमिनोल हार्ड रॉक होटल एवं कैसिनो हॉलीवुड से किया गया। समारोह से पहले ‘मिस यूनिवर्स ऑर्गनाइजेशन’ की अध्यक्ष पाउला एम शुगार्ट ने कहा कि उन्होंने इस प्रतियोगिता को सुरक्षित बनाने के लिए महीनों तक योजनाएं बनाई हैं और इस समारोह में वही दिशा-निर्देशों का अनुसरण किया गया है जो मेमफिस में नवंबर 2020 में मिस यूएसए के लिए आयोजित कार्यक्रम में लागू किए गए थे।
टेलीविजन पत्रकार अंजन बंदोपाध्याय का निधन
कोलकाता : वरिष्ठ पत्रकार एवं लोकप्रिय टीवी प्रस्तोता अंजन बंद्योपाध्याय का रविवार रात को कोलकाता के एक निजी अस्पाल में निधन हो गया। वह करीब एक महीने पहले कोरोना वायरस से संक्रमित पाये गए थे। स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। बंदोपाध्याय 56 साल के थे और वह बांग्ला समाचार चैनल जी-24 घंटा के संपादक थे। अधिकारी ने बताया कि बंदोपाध्याय का निधन रात करीब नौ बजकर 25 मिनट पर हुआ। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंदोपाध्याय के निधन पर शोक व्यक्त किया है। अंजन बंदोपाध्याय पश्चिम बंगाल के मौजूदा मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय के भाई थे।
अनोखा है धनंजय चक्रवर्ती का ‘सबुज रथ’
कोलकाता : ऊपर हरी घास से भरा एक छोटा-सा लॉन है. पीछे की तरफ 6 गमलों में आकर्षक पौधे व सामने की तरफ सजावटी पौधों के भरे दो गमले रखे हुए हैं। 42 वर्षीय धनंजय चक्रवर्ती इस छोटे से बाग के बागवान हैं. बड़े जतन से वह रोज इन पौधों व लॉन में पानी डालते हैं और फिर इसे लेकर सड़क पर उतरते हैं.
यह छोटा-सा बाग उनकी पीली टैक्सी में गुलजार है जिसे धनंजय चक्रवर्ती टैक्सी नहीं ‘सबुज रथ’ यानी हरा रथ कहते हैं। धनंजय ने टैक्सी को ही बाग बना दिया है, ताकि अपने स्तर पर वह प्रदूषण को कुछ कम कर सकें। दक्षिण कोलकाता (पश्चिम बंगाल) के टालीगंज के करुणामयी निवासी धनंजय चक्रवर्ती कहते हैं, ‘बचपन से ही पेड़-पौधों से मुझे बेइंतहां लगाव था. बच्चे खिलौनों से खेलना पसंद करते हैं, लेकिन मुझे पौधों से खेलना पसंद था।’
ठिगने कदकाठी के धनंजय ने महज आठवीं तक ही पढ़ाई की है। वह शुरुआती दिनों में एक फैक्टरी में काम करते थे लेकिन फैकटरी में लॉक आउट होने के बाद बेकार हो गये। इसी बीच एक टैक्सी मालिक से टैक्सी मिल गयी।12-13 साल से टैक्सी चला रहे चक्रवर्ती बताते हैं-
‘मुझे हमेशा यह लगता रहा कि पेड़-पौधे भी कुछ बोलते हैं, लेकिन हम समझ नहीं पाते। मैं देखता था कि शहर में पेड़-पौधे काटे जा रहे हैं और इससे मैं बहुत परेशान रहा करता था। मैं चाहता था कि लोगों को हरियाली का संदेश दूं, लेकिन मुझे कोई माध्यम नहीं दिख रहा था।’
जब टैक्सी मिली, तो उन्हें हरियाली का संदेश देने की एक वजह भी मिल गयी। इसकी कहानी भी रोचक है। हुआ यों कि एक दिन टैक्सी में एक यात्री चढ़ा, जिसके पास शराब की बोतल थी। इस बोतल से ही टैक्सी को सबुज रथ में तब्दील कर देने का खयाल उनके जेहन में आया। वह कहते हैं, ‘तीन-चार साल पहले का वाकया है। यह रात को मैंने अपनी टैक्सी में एक पैसेंजर को चढ़ाया। वह शराब के नशे में था। उसे उसके गंतव्य पर उतार कर मैंने टैक्सी गैरेज में लगा दी। सुबह जब मैं टैक्सी लेकर निकला तो देखा कि पीछे की सीट के नीचे शराब की एक खाली बोतल रखी हुई थी। बोतल की बनावट आकर्षक थी। मैं उस बोतल को फेंकना नहीं चाहता था, इसलिए सोचने लगा कि इसका वैकल्पिक उपयोग क्या हो सकता है। उसी वक्त मुझे खयाल आया कि क्यों न इसमें कोई पौधा लगा कर टैक्सी में रख दिया जाए।’
वह आगे बताते हैं, ‘मैंने बोतल को साफ किया और उसमें मनी प्लांट लगा कर उसे टैक्सी की पिछली सीट के पीछे की खाली जगह में रख दिया। यह देख कर मेरे कुछ दोस्तों ने कहा कि टैक्सी में पौधा जिंदा नहीं रहेगा लेकिन मैं यह मानने को तैयार नहीं था, सो पौधे की देखभाल करने लगा। कुछ ही दिनों में मनी प्लांट में नयी कोंपले फूंट आयीं और मैं रोमांचित हो गया।’
काफी दिनों तक टैक्सी में ही मनी प्लांट पलता रहा. एक दिन चक्रवर्ती के दोस्तों ने तंज कसा, जिसके बाद ही टैक्सी को एक चलते-फिरते बाग में तब्दील कर दिया गया. धनंजय चक्रवर्ती ने कहा, ‘मनी प्लांट को देख कर मेरे कुछ दोस्तों ने मुझ पर तंज कसा कि अब मुझे अपने सिर पर ही पौधा लगा लेना चाहिए। यह सुन कर मुझे खयाल आया कि अपने सिर पर तो नहीं, लेकिन टैक्सी की छत पर घास लगायी जा सकती है. लेकिन, इसमें दिक्कत थी कि टैक्सी की छत में ढलाना थी। मैंने टैक्सी की छत में तब्दीली कर लॉन लगाने की इजाजत टैक्सी मालिक से ले ली और एक पुरानी टैक्सी की छत खरीद ली। उक्त छत को उल्टी कर अपनी टैक्सी की छत में लगवा दिया व उसकी चारों तरफ लोहे का पत्तर लगवा दिया। फिर उसमें घास लगा दी. इस तरह टैक्सी की छत पर लॉन सज गयी। इसके बाद टैक्सी की पिछली सीट के पीछे की खाली जगह में छह पौधे और सामने की तरफ दो पौधे लगाये।’
टैक्सी के पौधों की देखभाल वह खुद करते हैं। लॉन में फिल्टर लगा हुआ जिससे उसमें पानी डालने पर पानी साफ होकर बाहर निकल जाता है। टैक्सी की चारों तरफ हरियाली बचाने से संबंधित नारे लिखे हुए हैं। टैक्सी 10 से 12 घंटे महानगर कोलकाता की सड़कों पर घूम-घूम कर हरियाली बचाने का संदेश रही है।
टैक्सी में लॉन और पौधे लगाने से एक फायदा यह हुआ है कि उसमें सफर करनेवाले लोगों को चिलचिलाती धूप में भी काफी आराम मिलता है। चक्रवर्ती की मानें तो टैक्सी में बाहर की तुलना में तापमान कम रहता है। गर्मी में ज्यादातर टैक्सियां पेड़ की छांव में आराम फरमाती हैं लेकिन धनंजय चक्रवर्ती का सबुज रथ शहर के चक्कर लगाता है क्योंकि लॉन व पौधों के कारण टैक्सी के भीतर का तापमान बाहर की तुलना में कम होता है। कोलकाता के पर्यावरणविद सौमेंद्र मोहन घोष कहते हैं, टैक्सी की छत पर लॉन व भीतर पौधे होने के कारण बाहर की तुलना में टैक्सी के भीतर तापमान कम से कम 5 डिग्री सेल्सियस कम रहता है।
वैसे, टैक्सी में लगे लॉन व पौधों की देखभाल के लिए धनंजय चक्रवर्ती को अतिरिक्त रुपये खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन पैसेंजरों से वह अतिरिक्त भाड़ा नहीं लेते। वह कहते हैं, ‘टैक्सी में सवार होनेवाले यात्री टैक्सी में फूल-पौधे देख कर खुश हो जाते हैं। टैक्सी में यात्री सवार होते हैं, तो उन्हें महूसस होता है कि वे टैक्सी में नहीं किसी बाग में बैठे हुए हैं। टैक्सी के भीतर की सजावट याभियों को खूब भाती है और उतरते वक्त वे अतिरिक्त रुपये भी दे देते हैं।
ग्रीन टैक्सी की लोग जब तारीफ करते हैं, तो धनंजय उन लोगों से भी अपने घरों में पौधे लगाने की अपील करते हैं, ताकि पर्यावरण प्रदूषण से बचा रहे।
चक्रवर्ती ने कहा, ‘कई लोग कहते हैं, कि उनके पास जगह नहीं है पौधे लगाने के लिए, तो मैं अपनी टैक्सी का हवाला देता हूं। मैं उन्हें कहता हूं कि अगर मैं टैक्सी में पौधे लगा सकता हूं, तो कहीं भी पौधे लगाये जा सकते हैं, बस इच्छाशक्ति की जरूरत है।’
उनकी टैक्सी की कोलकाता में खूब चर्चा होती है। जिन सड़कों से टैक्सी गुजरती है, लोग तसवीरें खींचते हैं। महानगर के इक्का-दुक्का ऑटोरिक्शा में भी पेड़-पौधे लगाये गये हैं। चक्रवर्ती ने कहा कि टैक्सी को चलते-फिरते बाग में तब्दील कर देने का एक फायदा यह भी हुआ है कि उन्हें 10-15 फिक्स्ड पैसेंजर मिल गये हैं।
धनंजय चक्रवर्ती अपनी अंबेसडर को भी सबुज रथ में बदलने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरी भावी योजना है कि मैं अपने अंबेसडर को भी चलता-फिरता बाग बनाऊं और अंबेसडर लेकर देशभर में घूम-घूम कर हरियाली बचाने के लिए लोगों को जागरूक करूं।’
नहीं रहे कोरोना योद्धा डॉ. के. के. अग्रवाल
नयी दिल्ली: पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ( आईएमए) के पूर्व अध्यक्ष डॉ के.के. अग्रवाल का कोरोना संक्रमण की वजह से निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के एम्स अस्पताल में आखिरी सांस ली. कोरोना से लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार वो जिंदगी की जंग हार गए. डॉक्टर अग्रवाल 62 साल के थे जो पिछले कई दिनों से भर्ती थे। डॉक्टर अग्रवाल पिछले सालभर से, वह कोविड महामारी पर वीडियो पोस्ट कर रहे थे और बीमारी के विभिन्न पहलुओं और इसके प्रबंधन के बारे में बात कर रहे थे। उनके ट्विटर प्रोफाइल पर पोस्ट किए गए एक बयान में कहा गया है कि उन्होंने सोमवार को रात 11.30 बजे इस महामारी के कारण दम तोड़ दिया। उन्हें एक सप्ताह से वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था.
ब्रिटिशों को टक्कर देने वाली लोकमाता रानी रासमणि
जब भी रानी शब्द हम कहते हैं…एक ऐसी छवि बनती है जिसमें एक महिला शासक अस्त्र – शस्त्र के साथ दिखती है या उसमें एक राजसी तेज होता है…नहीं…वह रानी ऐसी नहीं थी…उसके पास शस्त्र नहीं थे और वह किसी राजसी परिवार से भी नहीं थी…बल्कि वह तो माता थी और जनता ने उनको सम्मान देकर रानी बनाया…बंगाल में ऐसी बहुत सी महिलाएं हैं जो प्रेरणा देती हैं किसी न किसी रूप में…और ऐसी ही महिला हैं रानी रासमणि…जिनकी गाथा आज 300 साल बाद भी बंगाल ने याद रखी है मगर बात जब इस देश के इतिहास की होती है…तो लगता है कि उनकी गाथा को बार – बार दोहराने की जरूरत है। यहीं…ठाकुर रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद…और यह मंदिर जिन्होंने बनवाया …वह थीं रानी रासमणि….जिन्होंने ठाकुर को इस मंदिर का पुरोहित बनाया…मगर रानी का योगदान यहीं तक तो सीमित नहीं है…आप सुवर्णरेखा नदी से पुरी की ओर जो सड़क जाती है…श्रद्धालुओं की दिक्कतों को दूर करने के लिए उसे रानी रासमणि ने ही बनवाया था। कोलकाता के सुन्दर घाटों की स्थापना के पीछे भी रानी माँ की प्रेरणा रही। बाबूघाट के नाम से प्रसिद्ध बाबू राजचन्द्र दास घाट की स्थापना रानी रासमणि ने की थी और इसके लिए खुद लॉर्ड बेंटिक ने उनकी सराहना की थी। वहीं यह भी कहा जाता है कि रानी माँ के कहने पर राजचन्द्र दास ने यह घाट बनवाया था…जो भी हो, दोनों ही रूपों में रानी रासमणि का योगदान स्पष्ट है। अहिरीटोला घाट और नीमतला घाट भी रानी रासमणि के स्मृति चिह्न हैं। रानी रासमणि ने इम्पीरियल लाइब्रेरी (आज की नेशनल लाइब्रेरी या राष्ट्रीय पुस्तकालय) और हिन्दू कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) की स्थापना के लिए भी आर्थिक सहयोग दिया।

रानी रासमणि का जन्म 28 सितम्बर 1793 को उत्तर 24 परगना के कोना (हालीशहर) में हरेकृष्ण दास के घर में हुआ था। जब रासमणि 7 साल की थीं तभी उनकी माता रामप्रिया देवी चल बसीं। रासमणि का विवाह महज 11 साल की उम्र में जानबाजार के समृद्ध जमींदार परिवार के बाबू राजचन्द्र दास से हुआ। 1836 में पति की मृत्यु के बाद रासमणि ने जमींदारी और आर्थिक जिम्मेदारियाँ सम्भालीं।
रानी सिर्फ दयालु ही नहीं बल्कि साहसी भी थीं। यहाँ तक कि ब्रिटिशों को चुनौती देने से भी वह पीछे नहीं हटती थीं। ब्रिटिश अधिकारियों ने जब गंगा में मछली पकड़ने के लिए मछुआरों पर कर लगाया और मछुआरों ने रानी की शरण ली। रानी ने लीज पर बड़ी रकम खर्च कर घुसुड़ी से लेकर मटियाब्रुज तक लिया और पूरी नदी में सींकल लगवा दी। इसका असर अंग्रेजों के व्यवसाय पर पड़ा क्योंकि बड़े जहाज उस हिस्से में जा ही नहीं पाते थे। आखिर अंग्रेजों ने मजबूर होकर कर वापस लिया और तब जाकर रानी ने वह जंजीरें नदी से हटवायीं।
इसके बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों शोर का बहाना देकर रानी की शोभायात्रा पर रोक लगानी चाही और कहा कि इससे शांति भग्न होती है। रानी को भय हुआ कि इससे धार्मिक आयोजनों पर अंग्रेजों का हस्तक्षेप बढ़ जायेगा और रानी ने शोभायात्रा जारी रखने का आदेश दिया। अंग्रेजों ने उन पर 40 रुपये का जुर्माना लगाया जो उस जमाने में बड़ी रकम थी। जनता को जब पता चला तो खूब विरोध हुआ और अंग्रेजों को जनता के आगे झुकना पड़ा। एक बार रानी को खबर मिली कि नील की खेती करने वाले श्रमिकों के घर की महिलाओं को कुछ अंग्रेज सैनिक परेशान कर रहे हैं। रानी ने तुरन्त अपने सुरक्षाकर्मियों को भेजा और उन सैनिकों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रानी के घर पर हमला कर उसे कब्जे में ले लिया। जब अंग्रेजों ने रानी के पूजा गृह में रघुनाथ जी के मंदिर में घुसने की तैयारी की तो रानी ने माँ काली का रूप धारण कर तलवार उठा ली और कमरे की सुरक्षा की। रानी का साहस देखकर अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा और फिर रानी से उन्होंने टक्कर नहीं ली।
रानी ने दक्षिणेश्वर काली मंदिर के अतिरिक्त बेलियाघाटा नहर, मधुमती नहर के लिए जमीन दी। बंगाल के अकाल राहत कोष में दान दिया और ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के विधवा विवाह आन्दोलन में भी आर्थिक सहयोग दिया।आज भी रानी के वंशज जानबाजार के उस जमींदार घर में रहते हैं
कोलकाता के धर्मतल्ला में रानी रासमणि के नाम पर सड़क है और लोकमाता रानी रासमणि की प्रतिमा भी है। दक्षिणेश्वर में भी रानी रासमणि रोड है। बैरकपुर में एक फेरी घाट का नाम रानी के नाम पर है। भारतीय तटरक्षक के 5 फास्ट पेट्रोल वेजल रानी के नाम पर 2018 में रखे गये और इस समय ये विशाखापट्टनम में हैं।
इतने पर भी जब बात सशक्त महिलाओं की होती है तो रानी रासमणि का नाम बहुत कम लोगों को याद आता है…रानी का नाम अग्रिम पंक्ति में होना चाहिए। अपनी सूझ – बूझ, साहस, दानशीलता और परोपकार से उन्होंने जनता के दिल में जो जगह बनायी हैं…वह आज भी उनको लोकमाता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। रानी हमेशा दिल में रही हैं, रहेंगी।
भवानीपुर कॉलेज का ‘रीच आउट’ प्रोजेक्ट बना कोविड मरीजों का सहारा
कोलकाता : कोरोना से जूझ रहे असहाय और अकेले पड़ गए लोगों तक पहुंच कर भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज की एनसीसी की टीम ने रीच आउट प्रोजेक्ट के तहत मदद देने का कार्य किया। 120 विद्यार्थियों की इस टीम ने कोविड-19 से जूझ रहे मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना, बेड, खून, प्लाजमा, अॉकसीजन सिलिंडर, इंजेक्शन और दवाइयों का इंतजाम किया जो आज की प्रतिकूल और भयावह परिस्थितियों में साहस का कार्य है। कैडट गौरव शशि शर्मा को पता चला कि उनकी स्कूल की अध्यापिका मिर्टल किट अकेली हैं और कोरोना से जूझ रही थी उनका अॉकसीजन लेवल गिर रहा था । उनको देखने वाला कोई नहीं था। ऐसी स्थिति में जब कोई महामारी कोरोना के भय से कोई जाना नहीं चाहता है रीच आउट प्रोजेक्ट के तहत उनको ऑक्सीजन सिलिंडर मुहैया करवाया गया जो बहुत ही मुश्किल था। कैडट शुभदीप साहा चौधरी ने ऑकसीजन सिलंडर की व्यवस्था की। केडेट स्नेहा सेठिया अप्रैल में कोरोना से ग्रस्त होने के बाद बहुत दुर्बलता का अनुभव कर रहीं थीं लेकिन उस अवस्था में भी मदद करने से पीछे नहीं हटी। कोरोना के मरीजों को बेड, ऑक्सीजन और इंजेक्शन की मदद की। अंकित कुमार सिंह ने अपने स्थानीय मित्र के साथ सिलीगुड़ी में कोरोना के दुष्प्रचार के प्रति लोगों का ध्यान आकर्षित किया और सोशल मीडिया द्वारा जागृत किया।
कैडट बिपुल नारायण ने दिल्ली के ऐसे दो बच्चों को जो क्रमशः तीन दिन और छह महीने के थे जिन्होंने कोरोना में अपने माता-पिता को खो दिया था। इनके लिए प्रचार कार्य किया जिसके परिणामस्वरूप झारखंड के एक परिवार ने सेक्टर 4-बी एस सीटी झारखंड ने उन्हें गोद लिया। रांची के मनीष कुमार से संपर्क किया गया जिनको अपने पिता के लिए कोविड ट्रीटमेंट के लिए आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी, सोश्यल मीडिया के द्वारा आर्थिक मदद दी गई।
कैडट आशुतोष कुमार झा, यश बर्मन सिद्धार्थ ठाकुर शशांक शेखर तिवारी, ओजस्विता मुखर्जी और सभी कैडट ने पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों दिल्ली पूणे राजस्थान आदि में भी रीच आउट प्रोजेक्ट द्वारा मदद के लिए जुड़े हुए हैं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी दी।
जीवन खगोल की एक आकस्मिक घटना है : वैज्ञानिक डॉ देबी प्रसाद दुआरी
कोलकाता : भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज में बिरला तारामंडल के डायरेक्टर वैज्ञानिक डॉ देबी प्रसाद दुआरी ने अॉन-लाइन विद्यार्थियों को सौरमंडल के रहस्यों के विषय में जानकारी दी। एस्ट्रॉनमी, फिजिक्स और एस्ट्रोलॉजी, जीटीआर आदि विज्ञान के विविध विषयों पर विद्यार्थियों को अपने वक्तव्य से समृद्ध किया। सप्तर्षि मंडल, सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी,सूर्य ग्रहण, ज्वार भाटा, अंतरिक्ष और काल आदि की विस्तृत चर्चा की। विभिन्न स्लाइड्स के द्वारा डॉ दुआरी ने बताया कि इस ब्रह्मांड में जीवन भी एक आकस्मिक घटना है। सूर्य ग्रहण ब्रह्मांड की एक घटना है जब चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी की स्थिति बनती है। ग्रहण पूर्ण रूप से खगोलिय प्रक्रिया है। इसे अंधविश्वास का रूप देना ठीक नहीं है। जैसे नदी का जल प्रवाहित होता है हवा चलती है वैसे ही ग्रहण की स्थिति भी है। ज्वारभाटा की वजह से भी जीवन है। सूर्य भी जल को आकर्षित करता है जैसे चंद्रमा। गैस आदि विविध पदार्थों से सूर्य बना है। ऐसे ही सौरमंडल में नौ ग्रहों की स्थिति की डॉ दुआरी ने विस्तार से जानकारी दी। मंगल ग्रह पर भी जीवन होने की संभावना पर शोध चल रहा है।शनि ग्रह से पृथ्वी एक बिंदु की तरह दिखाई देती है। रंगों से भरपूर सौरमंडल के विभिन्न रंगों से भरे नासा से लिए प्राकृतिक चित्रों को डॉ देबी प्रसाद ने स्लाइड्स पर दिखाए। सबसे बड़ा 30 मीटर व्यास का टेलीस्कोप का निर्माण भी भारतीयों ने किया जिसमें यूएस ए, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत आदि देशों का सहयोग रहा। भारतीयों ने मंगल ग्रह की 200 फोटो ली है जो इस क्षेत्र में शुभ संकेत है।सूर्य जीवन को क्रियाशील और ऊर्जावान बनाए रखता है।डॉ. दुआरी ने बताया कि आने वाले पचास वर्षों में किसी अन्य ग्रह पर भी जीवन जन्म ले सकता है, शोध हो रहे हैं।
भवानीपुर कॉलेज के” मीट टू साइंटिस्ट ” में वरिष्ठ वैज्ञानिक तारामंडल के डायरेक्टर डॉ देबी प्रसाद दुआरी के इस कार्यक्रम में 75 विद्यार्थियों ने भाग लिया। अंत में, विद्यार्थियों के बहुत सी जिज्ञासाओं से भरे प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर दिया। प्रो. दिलीप शाह ने धन्यवाद दिया। इस कार्यक्रम में शिक्षक गणों की भी उपस्थिति रही। डॉ. वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की जानकारी दी ।
कोरोना और हम

हवा शुद्ध है
लेकिन मास्क आवश्यक है
सड़कें खाली हैं
लेकिन लंबे सफर पर कोई नहीं है
लोगों ने हाथ साफ किए हैं
लेकिन कोई हाथ मिल नहीं रहे हैं
मित्रों के पास बैठने का समय ही समय है
लेकिन एक साथ नहीं मिल- बैठ सकते
खाना बन रहा है भीतर
लेकिन किसी को खाने पर नहीं बुलाया जा सकता
जिनके पास पैसे हैं
लेकिन खर्च करने का कोई रास्ता नहीं
जिनके पास पैसे नहीं है
उनके पास कमाई का कोई जरिया नहीं है
आज हाथों में बहुत समय है
लेकिन अपने सपनों को पूरा करने का कोई रास्ता नहीं है
संसार अपनी संपूर्णता में कुछ भी नहीं है
अपराधी हमारे चारों ओर है
लेकिन उसे देख नहीं पाते
है भी और नहीं भी
प्रश्न बस यही है
– – – या क्या इसका यही उत्तर है
सकारात्मक रहें लेकिन रिपोर्ट नकारात्मक रहें
मन का भय भगाएंगे, कोरोना को हरायेंगे हम

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, उम्मीद है कि महामारी के कारण उत्पन्न भय और संत्रास के माहौल में बिना घबड़ाए या डरे आप परिस्थितियों का सामना पूरी सकारात्मकता के साथ कर रही होंगी। सखियों, वर्तमान समय में जिस तरह का माहौल है, उसमें डर सबको लगता है। अगर कोई कहे कि वह निर्लिप्त और भयमुक्त है तो यह पूरी तरह से सच नहीं होगा। मनुष्य अपने और अपने अपनों के लिए निरंतर आशंकित, भयभीत और चिंतित रहता है और किसी ना किसी अदृश्य शक्ति से उनकी कुशलता की कामना या प्रार्थना भी करता रहता है।
सखियों, माना जाता है कि मनुष्य जन्म के बाद मुख्यत: चार मनोभावों से घिरा होता है, वे हैं- क्रोध, दुख, आश्चर्य और भय। लेकिन कभी -कभी यह भय तमाम मनोभावों पर हावी हो जाता है। भय के कई कारण होते हैं। बहुत से सामान्य कारणों के अलावा हर आदमी के लिए भय का अपना निजी कारण भी होता है जो उसके अवचेतन में छिपकर बैठा रहता है और आजीवन दुस्वप्न की तरह उसका पीछा करता रहता है। कभी -कभी यही भय या डर फोबिया में भी बदल जाता है, मसलन किसी को ऊँचाई का फोबिया होता है तो किसी को बंद लिफ्ट में फंस जाने का तो किसी को नदी या समुद्र का और उसका कोई ना कोई कारण अवश्य होता है। संक्षेप में कहें तो भय से कोई नहीं बचा है। संसार के अधिकांश कार्यों या घटनाओं के पीछे कोई ना कोई भय काम करता है। और बहुत बार आदमी किसी और से नहीं अपने अंदर बैठे इस डर रूपी राक्षस से डरता है, तभी तो आबिद सिद्दीक कहते हैं-
“उस के डर ही से मैं मोहज़्ज़ब हूँ
मेरे अंदर जो एक वहशी है।”
भय का मनोविज्ञान कहता है कि बहुधा किसी भी खतरनाक या खौफनाक स्थिति, वस्तु या जानवर से उसका भय अधिक डरावना होता है, जैसे मौत से ज्यादा मौत का भय खौफनाक होता है। मौत तो जब आनी होगी तब आएगी ही लेकिन उस मौत के खौफ या भय से आदमी बहुत बार मौत के पहले ही दम तोड़ देता है। ऐसे ही हमारे बहुत से वहम या मानसिक भय ही हमारी जान के दुश्मन बन जाते हैं, वह चाहे साँप- बिच्छू का डर हो या भूत और जिन का। जैसे हम सब जानते हैं कि हमारे देश के ज्यादातर साँप जहरीले नहीं होते लेकिन आदमी साँप के जहर से नहीं मरता बल्कि उसके भय से जान से जाता है। इस विषय में बहुत सी कहानियां कहीं -सुनी जाती हैं। एक छोटी सी कहानी मैं भी सुनाऊंगी।
“एक गांव में एक आदमी बरसात के पहले अपनी झोपड़ी के छप्पर की मरम्मत कर रहा था। शाम होनेवाली थी और आसमान बादलों से घिरा हुआ था इसीलिए ऊपर थोड़ा अंधेरा सा था। वह जल्दी -जल्दी फूस और बाँस की खप्पचियों को रस्सी से बाँध कर छप्पर को दुरुस्त कर रहा था ताकि रात होने से पहले अपना काम समाप्त कर ले। इसी क्रम में एक बार उसने जैसे ही पास ही छप्पर में खोंसी हुई रस्सी अपने हाथ में ली तो उसे लगा कि उसके हाथ में किसी कीड़े ने काटा है। काम समाप्त करने की हड़बड़ी में उसने ध्यान नहीं दिया और अपना काम पूरा करके ही नीचे उतरा। एक साल बीत गया और एक बार फिर वह उसी छप्पर की मरम्मत के लिए ऊपर चढ़ा। संयोग से उस दिन दोपहर का समय था और चटख धूप खिली हुई थी। काम करते- करते उसने एक स्थान पर पुरानी बंधी रस्सी को जांचने के लिए जैसे ही हाथ बढ़ाया तो देखा कि खपची से एक साँप का सूखा पंजर बंधा हुआ है। उसके दिमाग में तड़ाक से पिछले वर्ष की घटना कौंध गई कि उसके हाथ में रस्सी बांधते हुए एक कीड़े ने काटा था। उसे एकदम से समझ में आ गया कि उसने रस्सी की जगह साँप से खप्पचियों को बाँधा था और उसी ने उसे डंसा था। इस स्मृति ने उसे इतना भयभीत कर दिया कि वह गश खाकर ऊपर से नीचे गिर पड़ा और तत्काल हदस के कारण उसकी मृत्यु हो गई। सखियों, कल्पना कीजिए कि साँप ने उसे साल भर पहले काटा था लेकिन उसके भय ने साल भर बाद उसकी जान ले ली। इसीलिए साँप से ज्यादा जहरीला या खतरनाक है, उसका भय।
सखियों, भयभीत होने और उस भय से मर -मर कर जीने के बजाय उस पर काबू करना जरूरी होता है और जो आदमी इस भय को काबू में कर लेता है, वही बहादुर कहा जाता है। अरस्तू भी कुछ ऐसा ही कहते हैं
“मुझे लगता है कि वह बहादुर है जो अपने दुश्मनों से हारने वाले की तुलना में अपने डर पर काबू पाता है, क्योंकि सबसे बड़ी जीत खुद पर है।”
सखियों, हर हाल में हमें अपने इस भय पर काबू पाने की जरूरत है। बहुत बार ऐसा होता है का माँएं अपने बच्चों को भूत, चुड़ैल, शेर आदि का डर दिखाकर अपने काबू में करने की जुगत निकालती है ताकि बच्चा उनकी बात मान लें। खाना खा ले, दूध पी ले या समय पर सो जाए लेकिन बहुत बार बचपन के ये डर ताउम्र बच्चों का जीना हराम किए रहते हैं इसीलिए बच्चों की परवरिश डराकर करने की बजाय उन्हें निर्भय होकर जीना सिखाने की आवश्यकता है। जब वे निर्भय होंगे तो विषम से विषम परिस्थिति में डर कर बैठने की जगह साहस के साथ उसका मुकाबला करते नजर आएंगे। जलील मानकपुरी जैसे शायर इसी डर को चुनौती देते हुए कहते हैं-
“क़यामत का मुझे डर क्या जो कल आनी है आज आए
तुम्हारे साथ की खेली है मेरी देखी-भाली है।।”
पहली बात यह है कि इस भय से भागना नहीं है। इसका डट कर मुकाबला करने की आवश्यकता है। और मुकाबले से भी पहले जरूरत है, इसे स्वीकारने की। शत्रु के अस्तित्व को हम स्वीकार करेंगे तभी उससे लड़ेंगे भी और जीत भी हासिल करेंगे। सलमान अख्तर बहुत खूब फरमाते हैं-
“जब ये माना कि दिल में डर है बहुत
तब कहीं जा के दिल से डर निकला।”
तो सखियों, इस डर पर काबू पाना भले ही मुश्किल है लेकिन नामुमकिन नहीं है। डर तूफान का हो या मौत का या फिर इम्तिहान का, बिना काबू किए वह हमें ताउम्र दौड़ाता रहेगा। इसीलिए इसका सामना करके, इसे हराकर ही हम खुशी हासिल कर सकते हैं। सरदार अंजुम की बातों से प्रेरणा ग्रहण करते हुए आइए हम हर किस्म के डर से मुकाबले की हिम्मत जुटा लें और कह उठें-
“ज़िंदगी इक इम्तिहाँ है इम्तिहाँ का डर नहीं
हम अँधेरों से गुज़र कर रौशनी कहलाएँगे।।”
इसी संदर्भ में सोहनलाल द्विवेदी की पंक्तियों को भी फिर से पढ़ने और उससे शिक्षा ग्रहण करने की जरूरत है जिनमें वे डर को जीत कर फिर फिर कोशिश करने की प्रेरणा देते हैं-
“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।”
मौजूदा हालात की बात करें तो बीमारी के कारण भय का जो माहौल बना है वह हमें बीमारी से ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है इसीलिए हमें सावधान होने की आवश्यकता है। भय की इस संक्रामक बीमारी से मुक्त होकर ही हम इस बीमारी या महा




