Thursday, July 2, 2026
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भारतीय सांस्कृतिक एकता के प्रतीक : आदि गुरु शंकराचार्य

शुभांगी उपाध्याय

                                                                                                 

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः

ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या और जीव ही ब्रह्म है, उससे भिन्न नहीं वेदांत की इस वाणी को सिद्ध करने वाले महान मनीषी परमपूज्य आदि गुरु शंकराचार्य के नाम से विश्व विख्यात हैं। इस महान योगी की जन्मभूमि भारत का शाब्दिक अर्थ है

भातेज (ज्ञान का तेज), रतउसमें जो रत है, वही भारत है।

स्वयं को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करने वाला भारतवर्ष उस दौर से गुज़र रहा था जब ज्ञान की इस भूमि पर अज्ञानता रूपी अंधकार ने घेर रखा था। समूचे ब्रह्मांड में इस राष्ट्र की पहचान एक आध्यात्मिक राष्ट्र के रूप में है। किन्तु तत्कालीन समाज में धर्म और आध्यात्म के नाम पर अराजकता फैल रही थी। जिस प्रकार माँ गंगा के पवित्र प्रवाह में कहींकहीं मार्ग में नाले जैसे भी मिल जाते हैं वैसे पीढ़ियों से परंपराओं का पालन करते हुए भी समाज में विकृतियां जन्म ले लेती हैं।

चार्वाक, लोकायत, कापालिक, शाक्त, सांख्य, बौद्ध, माध्यमिक तथा अन्य बहुत से सम्प्रदाय और शाखाएं बन गई थी। इस प्रकार के सम्प्रदायों की संख्या लगभग 72 हो गई थी। सब आपस में एक दूसरे के विरोधी थे। कहीं कोई शान्ति नहीं। अनाचार, अन्धविश्वास, द्वन्द और संघर्ष का बोलबाला था। लगता था हर तीसरे व्यक्ति का अपना दर्शन, अपना सिद्धान्त और अपना अनुगामी दल है। आध्यात्मिक क्षेत्र में हुए ऐसे पतन के समय आचार्य शंकर का अवतरण हुआ। आध्यात्म की नींव दर्शन शास्त्र है। आचार्य शंकर ने अद्वैत सिद्धांत को स्थापित किया, अपने अकाट्य प्रमाण, धारदार तर्क से नास्तिकों को परास्त किया। भाष्य लिखकर समाज को ज्ञान के भंडार से भर दिया।

वर्तमान के दक्षिण भारत के केरल राज्य में अवस्थित निम्बूदरीपाद ब्राह्मणों के ‘कालडी़ ग्राम’ में सन् 788 ईसा पूर्व श्री शिव गुरु तथा भगवती आर्यम्बा के घर इस महान बालक का जन्म हुआ। यद्यपि भगवान कृष्ण इनके कुल देवता थे तथापि इनके मातापिता परम शिव भक्त थे। धार्मिक मान्यतानुसार आचार्य शंकर को भगवान शिव का ही अवतार माना जाता है। केवल 3 वर्ष की अल्पायु में ही परम प्रतापी बालक ने अपनी मातृभाषा मलयालम के अनेकों ग्रंथ कंठस्थ कर लिए थे। दुर्भाग्य से इतनी कम आयु में ही शंकर के सर से पिता का साया उठ गया। माता ने कर्त्तव्यपालन करते हुए पुत्र को ज्ञान अर्जित करने गुरुकुल भेजा। कुशाग्र बुद्धि वाले शंकर मात्र 8 वर्ष की आयु में चारों वेदों के ज्ञाता हो गए।

भगवती आर्यम्बा घर से दूर गाँव में बहने वाली पूर्णा नदी में स्नान हेतु नित्य जाया करती थी। एक दिन मार्ग में उन्हें चोट लगी और वे अचेत हो गयी। माँ की ऐसी अवस्था देखकर बालक शंकर ने पूरी निष्ठा और भक्ति से श्री कृष्ण की आराधना की और उनकी कृपा से नदी ने अपना मार्ग बदल लिया। आज भी केरल में हमें आचार्य शंकर के घर के पास ही बहती पूर्णा नदी और श्रीकृष्ण के भव्य मंदिर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त है।

आचार्य शंकर का जन्म ही मानव कल्याण और सनातन धर्म की रक्षा के लिए हुआ था। उन्होंने गृह त्याग कर सन्यासी बनने का संकल्प ले लिया था। किंतु माता की आज्ञा के बिना यह कार्य संभव नहीं था। पूर्णा नदी से जुड़ी एक और घटना बालक शंकर को सन्यासी बना देती है। अपनी माता के साथ वे भी नित्य नदी स्नान को जाते हैं और तभी एक दिन उनका पैर फिसल जाता है। एक मगरमच्छ उनके पैरों को दबोच लेता है और वे पीड़ा से कराहते हुए अपनी माता से कहते हैं किमृत्यु से पूर्व मुझे सन्यासी बनने की प्रबल इच्छा थी, माँ कृपा करके मुझे आज्ञा दे दो रोतीबिलखती माता उन्हें जैसे ही अनुमति प्रदान करती हैं, वैसे ही मगरमच्छ उन्हें छोड़ देता है। गृह त्याग करने से पूर्व माता उनसे वचन लेती हैं कि मृत्यु पश्चात वे ही उनका अंतिम संस्कार करेंगे (शास्त्रों में सन्यासी के लिए यह वर्जित माना जाता है)

सद्गुरु की खोज में निकले शंकराचार्य मध्य प्रदेश के नर्मदा तट पर स्थित परमपूज्य स्वामी श्री गोविंदपाद जी महाराज की शरण में जा पहुंचते हैं। उन्हें साक्षात महर्षि पतंजलि का अवतार माना जाता है, जिन्होंने विश्व को योग सूत्र रूपी अमूल्य निधि प्रदान किया था। गुरु के सान्निध्य में आचार्य शंकर और अधिक तेजस्वी हो गए। गुरु कृपा से ही उन्हें अद्वैत वेदांत का ज्ञान प्राप्त हुआ, योग में भी निपुण हो गए। उन्होंने अनेकों ग्रंथों पर भाष्य लिखे, किताबें लिखी।

तत्पश्चात गुरु की आज्ञा से उन्होंने ज्ञान की नगरी काशी की ओर प्रस्थान किया। भारतवर्ष में सदा से ही वैचारिक स्वतंत्रता रही है। जगहजगह शास्त्रार्थ हुआ करते थे, हर तरफ ज्ञान की गंगा बहती थी। अन्यान्य मतावलंबियों, कट्टरपंथियों को शास्त्रार्थ में परास्त कर किशोर सन्यासी ने धीरेधीरे प्रसिद्धि प्राप्त कर ली। बड़े-बड़े विद्वानों से शास्त्रार्थ किए और उन सबको अपने दृष्टिकोण की ओर मोड़ा। उन्होंने भास्कर भट्ट, दण्डी, मयूरा हर्ष, अभिनव गुप्ता, मुरारी मिश्रा, उदयनाचार्य, धर्मगुप्त, कुमारिल, प्रभाकर आदि मूर्धन्य विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। सभी ने उन्हें अपना गुरु स्वीकारा।

काशी प्रवास शंकराचार्य जी के लिए वरदान सिद्ध हुआ। मणिकर्णिका घाट पर स्नान हेतु जाते हुए उनके मार्ग में एक चांडाल चार कुत्तों के साथ खड़ा हुआ। शिष्यों ने उसे मार्ग से हटने का आदेश दिया तिसपर वह चांडाल पूछ बैठा – “गंगा के तट पर बैठकर आप बड़ा उपदेश देते हैं कि सभी में वही एक तत्व विराजमान है, तो स्पर्श हो जाने से आप कैसे अशुद्ध हो सकते हैं ? स्पर्श से आत्मा अशुद्ध हो जाएगी या देह ? आप किसके स्पर्श से बचना चाहते हैं ?” आचार्य शंकर को यह ज्ञात हो जाता है कि यह गूढ़ ज्ञान की बात करने वाला कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं हो सकता और वे तुरंत नतमस्तक होकर उस चांडाल को गुरु मान लेते हैं। मान्यता है कि चांडाल के रूप में स्वयं काशी विश्वनाथ जी ने उन्हें दर्शन दिया था।

भगवान विश्वनाथ ने इन्हें आशीर्वाद दिया और आज्ञा दी कि वेदान्त शास्त्रों पर भाष्य की रचना कर सनातन धर्म की रक्षा करो। प्रभु की इस आज्ञा को शिरोधार्य कर शंकर ने प्रस्थानत्रयी भाष्यों की रचना हेतु हिमालय की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में हरिद्वार प्रवास भी हुआ। वहाँ उन्होंने देखा कि मंदिर तो है किंतु वहाँ मूर्ति नहीं है। आश्चर्यचकित होकर उन्होंने स्थानिक निवासियों से पूछा तो पता चला कि चीन के डकैतों के भय से श्रीहरि विष्णु जी की मूर्ति को गंगा में छुपाया गया था, जो अब नहीं मिल रही। आचार्य शंकर ने पूरी आस्था से गंगा में डुबकी लगाई और स्वयं मूर्ति उनके सामने प्रकट हो गयी, जिसे मंदिर में प्रस्थापित किया गया।

श्री बद्रीनाथ में भी ऐसा ही डर था। चीन के दस्युओं के आतंक से नारद कुंड जो कि अलकनंदा नदी से जा मिलता है, में मूर्ति छुपाई गयी थी। एक बार पुनः शंकराचार्य जी के प्रयास से प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा मंदिर में की गई। उन्होंने स्वयं मंदिरों की पूजापद्धति को लिखित स्वरूप प्रदान किया। नए नियम बनाये, जिनका आज भी पूरी निष्ठा से पालन किया जाता है।

आचार्य ने ब्रह्मसूत्र, गीता और उपनिषदों की व्याख्याएं लिखी। अनेक स्त्रोतों की रचना की जिनमें शिवभुजयं, शिवानन्द लहरी, शिवपादादिके शान्तस्तोत्र, वेदसार शिवस्तोत्र, शिवपराधक्षमापनस्तोत्र, दक्षिणामूर्ति अष्टक, मृत्युंजयमानसिकपूजा, शिव पंचाक्षरस्तोत्र, द्वादशलिंगस्तोत्र, दशशलोकी स्तुति आदि उल्लेखनीय हैं। उन्होंने विष्णु सहस्रनाम पर भी भाष्य लिखा, जो अपने आप में अलौकिक है।

महिष्मति (वर्तमान बिहार) के एक प्रकाण्ड पंडित श्री मण्डन मिश्र कर्म मीमांसा के विद्वान थे और सन्यासियों के प्रति उनके मन में कोई आदर नहीं था। उनके यहां का तोता भी संस्कृत श्लोक बोलता था। आचार्य शंकर ने उन्हें शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी। इसमें निर्णायक की भूमिका का निर्वहन प्रकाण्ड विदुषी उदया भारती (मण्डन मिश्र की अर्धांगिनी) ने किया। निश्चित हुआ कि यदि शंकर हार गए तो वे गृहस्थ हो जाएंगे और यदि मण्डन मिश्र हार गए तो वे सन्यासी हो जाएंगे। शास्त्रार्थ 17 दिन तक चला। मण्डन मिश्र की पत्नी ने निर्णायक की भूमिका में दोनों विद्वानों के गले में एक-एक माला डाल दी और कहा, ‘‘जिस किसी की माला के फूल पहले मुरझाने लगे तो वह स्वयं को पराजित मान लें।’’ सत्रहवें दिन मण्डन मिश्र की माला के फूल मुरझाने लगे। उन्होंने पराजय स्वीकार कर ली। लेकिन, ‘‘नहीं – अभी नहीं।’’ उदया भारती ने यह पराजय स्वीकार नहीं की। उन्होंने शंकर से कहा, ‘‘मैं मण्डन मिश्र की अर्धांगिनी हूँ। आपने अभी मण्डन के अर्धभाग को पराजित किया है, अभी आपको मुझसे शास्त्रार्थ करना है।’’ शंकर अनिच्छा से भारती से शास्त्रार्थ के लिए सहमत हुए। इस बार फिर शास्त्रार्थ की प्रक्रिया 17 दिन तक चली। अन्त में जब भारती को लगा कि शंकर को पराजित करना कठिन है, तब उन्होंने कामशास्त्र का सहारा लिया। उन्होंने शंकर से कामशास्त्र सम्बंधी प्रश्न पूछने शुरू किये। अन्ततः शंकर ने एक महीने का समय मांगा क्योंकि वे इस ज्ञान से अनभिज्ञ थे। 

आचार्य शंकर काशी गए। वहाँ योग विद्या से अपने शरीर को छोड़ा। अपने शिष्यों से अपने शरीर की रक्षा करने को कहा और स्वयं एक सद्यमृत राजा अमरूक के शरीर में प्रवेश कर गए। राजा जीवित हो गया। यद्यपि राजा के रूप में जीवित व्यक्ति के कर्म, गुण, व्यवहार वास्तविक राजा से भिन्न थे। फिर भी वे राजा के रूप में राजगृह में रहे। गृहस्थ जीवन, पारिवारिक व्यवहार और दाम्पत्य रहस्यों को समझा। वे एक महीने बाद पुनः अपने चोले में आ गए और लौटकर उन्होंने मण्डन मिश्र की पत्नी से फिर शास्त्रार्थ करने के लिए कहा। अब वे उनके कामशास्त्र सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तैयार हो गए, मण्डन मिश्र और भारती ने पराजय मान कर शंकर को नमन किया। शंकर ने मण्डन मिश्र का नामकरण सुरेश्वराचार्य किया और बाद में उन्हें श्रृंगेरी मठ का कार्यभार सौंप दिया।

शंकराचार्य को हिन्दू, बौद्ध तथा जैन मत के लगभग 80 प्रधान सम्प्रदायों के साथ शास्त्रार्थ में प्रवृत्त होना पड़ा था। हिन्दू धर्मावलम्बी लोग यथार्थ वैदिक धर्म से विच्युत होकर अनेक संकीर्ण मतवादों में विभक्त हो गए थे। आचार्य शंकर ने वेद की प्रामाणिकता की प्रतिष्ठा की और हिन्दु धर्म के ‘‘सभी मतवादों का संस्कार कर जनसाधारण को वेदानुगामी बनाया। वेद का प्रचार उनका अन्यत्र प्रधान अवदान है। शंकर को वेदान्त के अद्वैतवाद सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। इन्होंने अनेक शास्त्रों का भाष्य लिखा। इनके अद्वैतवाद के अनुसार संसार का अन्तिम सत्य ‘दो नहीं’ एक होता है। इसी का नाम ब्रह्म है। ‘एकमेव हि परमार्थसत्यं ब्रह्म।’ अर्थात् ब्रह्म ही सर्वोच्च सत्य है। यही एक सत्य है शेष सभी असत्य है। शंकर ने हिन्दुत्व को पौराणिक धर्म से मोड़कर उपनिषदों की ओर उन्मुख कर दिया।

इनका एक अत्यंत महत्वपूर्ण परन्तु सबसे छोटा ग्रंथ है ‘भज गोविन्दम्’। इसमें वेदान्त के मूल आधार की शिक्षा अत्यंत सरल शब्दों में दी गई है। इसके श्लोकों की लय अत्यधिक मधुर है और इन्हें सरलता से याद किया जा सकता है। इसमें मात्र 31 श्लोक हैं। इसकी गणना भक्तिगीतों में की जाती है। इनमें पहले बारह श्लोक ‘‘द्वादष मंजरिका स्तोत्रम’’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इसका अर्थ है बारह श्लोक रूपी फूलों का गुच्छा। चौदह श्लोक ‘‘चतुर्दश मंजरिका स्तोत्रम्’ के नाम से विख्यात हैं। आचार्य के प्रत्येक शिष्य ने एक-एक श्लोक को गुरु प्रेरणा के रूप में कहा। इसके बाद आचार्य शंकर ने पुनः चार श्लोकों के माध्यम से सभी सच्चे साधकों को आशीर्वाद दिया। पहला श्लोक टेक रूप में है

भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् गोविन्दम भज मूढ़मते।

सम्प्राप्ते सान्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृकरणें।

सभी ग्रंथों की रचना के पीछे उनका एक ही भाव था कि मनुष्य को ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त करने का मार्ग स्पष्ट दिखायी देना चाहिए। अद्वैत को प्रमुखता देते हुए भी शंकर ने शिव, विष्णु, शक्ति और सूर्य पर स्तोत्र लिखे। इनका आग्रह समाज में समन्वय लाने का था। इन्हें आध्यात्मिक सुधारक भी माना जाता है क्योंकि शाक्त मन्दिरों में बलि देने की प्रथा का इन्होंने विरोध किया।

बद्रिकाश्रम, द्वारका, जगन्नाथपुरी और श्रृंगेरी देश की चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। इस तरह से देश की भौगोलिक एकता को प्रत्यक्ष करने का गम्भीर कार्य शंकराचार्य ही कर सकते थे। इन मठों के अध्यक्ष आचार्य श्री शंकराचार्य के नाम से ही जाने जाते हैं। उन्होंने देश के साधु सन्तों को एकत्र कर दस प्रमुख समूहों में एकत्रित किया। प्रत्येक मठ को इन्होंने एक-एक वेद का उत्तरदायित्व सौंपा – बदरिकाश्रम के ज्योतिर्मठ को अथर्ववेद दिया, श्रृंगेरी के शारदापीठ को यजुर्वेद, जगन्नाथपुरी के गोवर्धनमठ को ऋग्वेद और द्वारका के कलिका मठ को सामवेद सौंपा। ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्य के मुताबिक, कांची कामकोटि मठ की स्थापना भी आदिगुरू शंकराचार्य ने ही की थी। स्वामी शंकराचार्य जी का जन्म भले ही दक्षिण भारत में हुआ था किंतु उनका कार्यक्षेत्र समस्त भारतवर्ष रहा है। उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण कर वेद का प्रचारप्रसार किया और दिग्विजयी हुए। आज यह पूरा विश्व वेदांत की ओर उन्मुख हो रहा है, इसका पूरा श्रेय जगद्गुरु शंकराचार्य को ही जाता है। उन्होंने मठों की स्थापना कर समूचे राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरो दिया, समाज में समन्वय स्थापित किया। जीवन भर वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने जो प्रयत्न किए, उसे भविष्य में क्रियाशील रखने का प्रबन्ध करके मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में महाप्रस्थान करने का निश्चय किया। शिष्यों के साथ केदारनाथ पहुंचे और वहीं उन्होंने निर्विकल्प समाधि लगा ली। ऐसे अपूर्व विचारक, ब्रह्मज्योति से देदीप्यमान, दर्शनाचार्य, दैवीय प्रतिभा युक्त, युगद्रष्टा विरले ही पैदा होते हैं।

 

सहायक ग्रन्थ :

) संस्कृति के चार अध्याय : रामधारी सिंहदिनकर‘, लोकभारती प्रकाशन

(लेखिका विवेकानंद केंद्र के पश्चिम बंग प्रान्त में विभाग युवा प्रमुख हैं तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय की शोधार्थी भी।)

मॉस्को ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता हॉकी खिलाड़ी रविंदर पाल सिंह का निधन

मॉस्को ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता हॉकी खिलाड़ी रविंदर पाल सिंह का कोरोना से निधन नयी दिल्ली, आठ मई (भाषा) भारतीय हॉकी टीम के पूर्व सदस्य और मॉस्को ओलंपिक 1980 के स्वर्ण पदक विजेता रविंदर पाल सिंह ने करीब दो सप्ताह कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद गत शनिवार की सुबह लखनऊ में अंतिम सांस ली । वह 60 वर्ष के थे ।
सिंह को 24 अप्रैल को विवेकानंद अस्पताल में भर्ती कराया गया था । पारिवारिक सूत्रों के अनुसार वह कोरोना संक्रमण से उबर चुके थे और टेस्ट नेगेटिव आने के बाद कोरोना वॉर्ड से बाहर थे । शुक्रवार को उनकी हालत अचानक बिगड़ी और उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा । लॉस एंजिलिस ओलंपिक 1984 खेल चुके सिंह ने विवाह नहीं किया था । उनकी एक भतीजी प्रज्ञा यादव है । वह 1979 जूनियर विश्व कप भी खेले थे और हॉकी छोड़ने के बाद स्टेट बैंक से स्वैच्छिक सेवानिवृति ले ली थी । सीतापुर में जन्में सेंटर हाफ सिंह ने 1979 से 1984 के बीच शानदार प्रदर्शन किया । दो ओलंपिक के अलावा वह 1980 और 1983 में चैम्पियंस ट्रॉफी , 1982 विश्व कप और 1982 एशिया कप भी खेले ।

निजी बैंकों द्वारा सरकारों का कारोबार शुरू करने के दिशानिर्देश जारी

मुम्बई : भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने निजी बैंकों द्वारा सरकारी व्यवसाय को शुरू करने संबंधी संशोधित दिशानिर्देश जारी किए। इसमें राज्य और केंद्रीय दोनों के काम शामिल है। संशोधित दिशानिर्देश के अनुसार अनुसूचित निजी बैंक आरबीआई के साथ समझौते के बाद सरकारी कारोबार कर सकते हैं। आरबीआई के प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के तहत चल रहे बैंकों को यह छूट नहीं होगी। आरबीआई ने एक बयान में कहा, ‘‘आरबीआई के साथ एजेंसी बैंकिंग समझौता में नहीं शामिल और सरकारी एजेंसी के कारोबार को संभालने का इरादा रखने वाले बैंक उसके साथ यह समझौता कर सकते है।’’
आरबीआई ने कहा, ‘‘समझौते के समय आवेदन करने वाला कोई भी निजी बैंक पीसीए में शामिल नहीं होना चाहिए। तभी यह समझौता हो सकेगा।’’ उल्लेखनीय है कि वित्त मंत्रालय ने निजी क्षेत्र के बैंकों को सरकारी व्यवसाय के आवंटन पर सितंबर 2012 में लगाए गए प्रतिबंध को फरवरी 2021 में हटा दिया था। इसके बाद आरबीआई ने सरकारी व्यवसाय के संचालन के लिए अनुसूचित निजी क्षेत्र के बैंकों को आरबीआई के एजेंसी बैंकों के रूप में अधिकृत करने के लिए रूपरेखा को संशोधित करने का निर्णय लिया था।

हिमंत बिस्वा सरमा बने असम के 15वें मुख्यमंत्री

गुवाहाटी : भाजपा नेता और पूर्वोत्तर प्रजातांत्रिक गठबंधन के संयोजक हिमंत बिस्वा सरमा ने असम के 15वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्यपाल जगदीश मुखी ने उन्हें यहां श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र में पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई । सरमा ने पारंपरिक ‘पट रेशम’ की धोती और कुर्ता धारण किया हुआ था तथा अपने गले में मुगा ‘गमोसा’ डाला हुआ था। उन्होंने असमिया भाषा में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। कोविड-19 के सख्त प्रोटोकॉल के बीच उनके साथ 13 और विधायकों ने शपथ ली। शपथ लेने वाले विधायकों में से, 10 भाजपा के हैं जिनमें पार्टी के प्रदेश प्रमुख रंजीत कुमार दास, पिछली सरकार के मंत्री चंद्र मोहन पटोवारी, परिमल सुक्लाबैद्य, जोगेश मोहन और संजय किशन शामिल हैं। मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए चेहरों में रनोज पेगू, बिमल बोहरा और एकमात्र महिला अंजता नेओग शामिल हैं। गठबंधन साझेदार एजीपी से अतुल बोरा और केशब महंत और यूपीपीएल से पूर्व राज्यसभा सदस्य यूजी ब्रह्मा ने शपथ ली है। बोरा और महंत भूतपूर्व सरकार में मंत्री थे। असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन को 75 सीटें मिली हैं। भाजपा को 60 सीटें मिली हैं जबकि उसके गठबंधन साझेदार असम गण परिषद (एजीपी) व यूनाइटेड पीपल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) को क्रमश: नौ और छह सीटें मिली हैं। भाजपा नीत गठबंधन राज्य में पहली गैर कांग्रेसी सरकार है जिसने लगातार दूसरी बार चुनाव जीता है।

गिरिजा देवी : समाज के खिलाफ जाकर सीखा संगीत, बनीं ठुमरी की रानी

‘ठुमरी की रानी’ के नाम से प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी का जन्म आज ही के दिन वर्ष 1929 में वाराणसी (तत्कालीन बनारस) के निकट एक गांव में हुआ था। यह वह दौर था, जब समाज महिलाओं को गायन व मंच पर प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं देता था। यही कारण था कि गिरिजा देवी की मां और दादी को कभी भी उनका संगीत पर समय गंवाना पसंद नहीं था। लेकिन उनके संगीत प्रेमी पिता रामदेव राय ने समाज की परवाह किए बगैर हमेशा गिरिजा देवी का साथ दिया। अप्पा जी के नाम से मशहूर, गिरिजा देवी ने पांच वर्ष की आयु में ही संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया। उन्होंने ठुमरी, टप्पा, ख्याल सहित बनारस के आस-पास के क्षेत्रीय गायन जैसे चैती, होरी, बारामासा आदि का अभ्यास करने के बाद उन्हें अलग रंग दिया।
15 साल की उम्र में हुई शादी
वर्ष 1944 में गिरिजा की शादी व्यवसायी मधुसूदन जैन से होई। मधुसूदन की पहले भी एक बार शादी हो चुकी थी और वे गिरिजा से उम्र में बड़े भी थे। किंतु उन्होंने गिरिजा के पिता से वादा किया था कि वे शादी के बाद भी गिरिजा को गायन से नहीं रोकेंगे। सिर्फ इस शर्त की वजह से पिता ने गिरिजा के लिए मधुसूदन को चुना। एक साक्षात्कार में गिरिजा देवी बताती हैं कि शादी के बाद उन्होंने (मधुसूदन जैन) ने मुझे किसी भी बड़े घर या निजी महफिल में गाने नहीं दिया। हालांकि अपने वादे के मुताबिक घर पर ही मुझे संगीत सीखने और गाने की अनुमति दे दी। मेरे पहले गुरु का निधन हो गया था इसलिए उन्होंने एक दुसरे गुरु श्रीचंद मिश्रा से मुझे संगीत की शिक्षा दिलवाई।
1951 में पहली बार मंच पर गाया गाना
शादी के पांच साल बाद, वर्ष 1949 में गिरिजा देवी ने रेडियो पर गाना शुरू किया। 1951 में गिरिजा, बिहार राज्य में आयोजित आरा कॉन्फ्रेंस में मशहूर गायक पंडित ओंकारनाथ का गायन सुनने गई। किंतु कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही यह खबर आई की पंडित ओंकारनाथ की गाड़ी खराब होने की वजह से वह तय समय पर कार्यक्रम स्थल पर नहीं पहुंच पाएंगे। जब आयोजकों ने गिरिजा देवी को उनके स्थान पर गाने के लिए मंच पर आमंत्रित किया।
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के सामने पेश किया ठुमरी गायन
इसके बाद गिरिजा देवी ने बनारस कांफ्रेंस में भी अपने गायन की प्रस्तुति दी। यहां उन्हें रविशंकर, अली अकबर भैया और विलायत खान साहब जैसे गायक ने सुना। रविशंकर को गिरिजा देवी का गायन इस कदर पसंद आया कि उन्होंने गिरिजा देवी को गाने के लिए दिल्ली बुला लिया। 1952 में गिरिजा देवी ने दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों के सामने ठुमरी गायन पेश किया।
पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण की मिली उपाधि
इसके बाद गिरिजा ने रेडियाे कार्यक्रम, स्टेज शो आदि किए। संगीत में गिरिजा के योगदान के लिए उन्हें 1972 में पद्मश्री और 1989 में पद्म भूषण की उपाधि मिली। गिरिजा अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अपना ज्यादातर समय कोलकाता में स्थित संगीत रिसर्च अकादमी में बिताती थी। वर्ष 2016 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। दिल का दौरा पड़ने से 24 अक्टूबर, 2017 को उनका निधन हो गया।

(साभार – अमर उजाला)

सभी उच्च शिक्षा संस्थान बनाएं कोविड टास्क फोर्स : यूजीसी

नयी दिल्ली : विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने शिक्षकों और छात्रों की मदद के लिए सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को कोविड टास्क फोर्स को गठित करने और हेल्पलाइन शुरू करने की सलाह दी है। आयोग ने इस संबंध में आधिकारिक वेबसाइट पर अधिसूचना भी जारी की है।
अधिसूचना के मुताबिक आयोग ने कहा है कि, “हम सब इस बात से वाकिफ हैं कि बढ़ते कोरोना संक्रमण की वजह से लोगों की नीजि और प्रोफेशनल कामों पर असर पड़ रहा है। इन परिस्थितियों से उभरने के लिए छात्रों, शिक्षकों, अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों सहित अन्य लोगों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षा और समग्र कल्याण के मामले में आने वाली चुनौतियों का सामना करते हुए साथ मिलकर काम करना होगा।
काउंसलर और मैंटर्स की भी व्यवस्था करने का आग्रह किया
यूजीसी ने अधिसूचना के जरिए अभी उच्च शिक्षा संस्थानों से मानसिक स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक समर्थन और सभी हितधारकों की भलाई के लिए काउंसलर और मैंटर्स की व्यवस्था करने का आग्रह किया है। सभी को शारीरिक और मानसिक फिटनेस के लिए विभिन्न तरह की गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कहा है। खुदको, दोस्तों को और परिवार को सुरक्षित करने के लिए सभी हितधारकों को टीका लगवाने की सलाह दी है। इसके साथ ही एनसीसी और एनएसएस सहित जीवन कौशल में सूचित प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक टीम गठित करने को कहा है। अधिक जानकारी के लिए अभ्यर्थी यूजीसी की आधिकारिक वेबसाइट www.ugc.ac.in पर जाकर अधिसूचना पढ़ सकते हैं।

गूगल मैप्स में मिलेगी बिस्तरों और ऑक्सीजन की उपलब्धता की जानकारी

दिग्गज टेक कंपनी गूगल ने कहा कि वह चुनिंदा जगहों पर बिस्तरों, और चिकित्सीय ऑक्सीजन की उपलब्धता से जुड़ी जानकारी देने के लिए गूगल मैप्स में एक नई सुविधा का परीक्षण कर रही है। इस सुविधा के माध्यम से लोग इन चीजों से जुड़ी जानकारी मांग सकते हैं और दूसरों के साथ साझा कर सकते हैं।
गूगल ने कहा, ‘हम मैप्स में सवाल-जवाब का इस्तेमाल कर एक नई सुविधा का परीक्षण कर रहे हैं। यह सुविधा लोगों को चुनिंदा जगहों पर बिस्तरों और चिकित्सीय ऑक्सीजन की उपलब्धता के बारे में पूछने और स्थानीय जानकारी साझा करने में सक्षम बनाएगी। चूंकि इसमें उपयोगकर्ताओं द्वारा डाली गई सामग्री होगी न कि अधिकृत स्रोतों से मिली सामग्री, ऐसे में सूचना का इस्तेमाल करने से पहले उसकी सटीकता और नएपन का सत्यापन करना जरूरी होगा।’
टेक दिग्गज ने कहा कि उसकी टीमें प्राथमिकता के साथ तीन क्षेत्रों में काम कर रही हैं- यह सुनिश्चित करना कि लोग सबसे नई और अधिकृत सूचना पाएं, सुरक्षा एवं टीकाकरण से जुड़े महत्वपूर्ण संदेश को बढ़ावा मिले और प्रभावित समुदायों, स्वास्थ्य अधिकारियों और दूसरे संगठनों के लिए वित्तीय मदद उपलब्ध हो सके।

 

53 की उम्र और 103 बार किया इस कोविड योद्धा ने रक्तदान

राजकुमार सिंह
मुम्बई : मुम्बई में कांदिवली निवासी 53 वर्षीय मनमोहन रणजीतसिंह मेहता की कोविड योद्धाओं के बीच एक खास पहचान है। वे आम आदमी और कोरोना योद्धाओं को नाश्ता खाना वगैरह के अलावा कोरोना से लड़ी जा रही लड़ाई में लगने वाले जरूरी सामान तक मुहैया कराते हैं। यहां तक कि किसी को भी ब्लड या प्लाज्मा चाहिए, तो वह भी सहजता से उपलब्ध कराते हैं। मनमोहन ने देश-विदेश में 103 बार रक्तदान किया है। उन्होंने देश में ही नहीं, विदेशों में भी रक्तदान किया है। इनका एक टेंपो पूरे दिन शहर भर में जरूरी व उपयोगी सामान लेकर घूमता रहता है। जहां से भी कॉल आया, टेंपो उस ओर मुड़ जाता है।
हर जगह पहुंचाते हैं मदद
राजस्थान में अजमेर जिले के किशनगढ़ तहसील स्थित फतेहगढ़ गांव के निवासी मनमोहन मेहता रियल इस्टेट कारोबार से जुड़े हैं, लेकिन समाजसेवा इनका नशा है। लायंस क्लब इंटरनैशनल में बांद्रा से तलासरी तक के डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन भी हैं। कोविड काल के कितने पीपीई किट, सैनिटाइजर, ग्लब्स, मास्क इत्यादि बांटे, कितनों को नाश्ता-खाना भेजा उसका आंकड़ा नहीं रखते। वे कहते हैं कि इसका हिसाब क्या रखना, सेवा का हिसाब-किताब को ऊपर वाला रखता है। आम आदमी और कोरोना योद्धाओं के जरूरत का सामान पहुंचाने के लिए उन्होंने एक विशेष टेंपो रखा है, जो पूरे शहर में घूमता रहता है। मनमोहन से शायद ही ऐसा कोई सरकारी या बीएमसी का अस्पताल, दवाखाना, कोविड सेंटर बचा हो, जहां इन्होंने सामान नहीं पहुंचाया हो।
अस्पतालों में प्लाज्मा की काफी माँग
कोविड काल के दौरान 150 से ज्यादा लोगों को मनमोहन ने प्लाज्मा और 30 से ज्यादा लोगों को प्लेटलेट मुहैया कराया है, लेकिन प्लाज्मा का जिक्र करते ही वे दुखी हो जाते हैं। कहते हैं प्लाज्मा की मांग बीएमसी व राज्य सरकार के अस्पताल या फिर बड़े निजी अस्पताल शायद ही करते हो, लेकिन कुछ चुनिंदा अस्पताल बहुत ज्यादा प्लाज्मा की मांग मरीजों के रिश्तेदार से करते हैं। प्लाज्मा मुहैया करने का उनका मन नहीं करता, क्योंकि यह बहुत ज्यादा उपयोगी नहीं है।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए मनमोहन कहते हैं कि प्लाज्मा से ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अस्पताल वाले जब मांगते हैं, तो परिजन को व्यवस्था करनी पड़ती है। वे कहते हैं कि प्लाज्मा के बाबत एसओपी होना चाहिए, ताकि आम आदमी को अस्पतालों की लूट से बचाया जा सके। वे कहते हैं हमारे पास जो लोग प्लाज्मा के लिए आते हैं उनके लिए व्यवस्था करनी पड़ती है।
विदेश में भी किया है रक्तदान
मनमोहन ने देश में ही नहीं, विदेश में भी रक्तदान किया है। खाड़ी देश कुवैत और दुबई में 4 बार रक्तदान किया है। पेरिस में रक्तदान करने लिए गए थे, लेकिन समय के अभाव के कारण नहीं कर सके।
स्विट्जरलैंड में रक्तदान करने गए लेकिन उस देश ने यह कहते हुए रक्तदान स्वीकार नहीं किया कि वे पर्यटकों का रक्तदान स्वीकार नहीं करते। मनमोहन हर 3 महीने में ब्लड डोनेशन करते हैं। हर साल 125 से 150 रक्तदान कैंप का आयोजन भी कराते हैं, जिसमें छात्रों को रक्तदान के लिए प्रोत्साहित
(साभार – नवभारत टाइम्स)

धर्म से ऊपर उठकर अयोध्या के गाँव ने चुना अपना प्रधान

अयोध्या : देश में हिंदू और मुसलमान को लेकर सियासत करने वाले राजनेताओं के सामने अयोध्या के आम मतदाताओं ने लोकतंत्र की अनोखी मिसाल पेश की है। अयोध्या के एक हिंदू बहुल गांव ने अपने क्षेत्र में एक मुस्लिम प्रत्याशी को गांव का प्रधान बनाया है। अयोध्या के राजापुर गांव के लोगों ने अपने गांव के इकलौते मुस्लिम परिवार के हाफिज अजीमुद्दीन को अपना प्रधान बनाया है। हाफिज इस गांव से करीब 200 वोट हासिल कर प्रधान चुने गए हैं और उनके चयन के बाद क्षेत्र के लोगों को उनसे काफी उम्मीदें हैं। 600 वोटों वाले राजापुर गांव में कुल 27 मुस्लिम मतदाता हैं। ये सभी लोग हाफिज के परिवार या रिश्तेदारी के ही लोग हैं। हाफिज कहते हैं कि गांव की प्रधानी जीतना, उनके लिए ईद के तोहफे जैसा है। वो कहते हैं कि गांव के हिंदू मतदाताओं के समर्थन ने ही उन्हें प्रधान बनाया है और अब लोगों की उम्मीद को पूरा करना उनका फर्ज है। पेशे से किसान हाफिज अजीमुद्दीन ने मदरसे से आलिम और हाफिज की डिग्री ली है। वो 10 वर्ष तक एक मदरसे के अध्यापक भी रह चुके हैं और अब अपने परिवार के साथ गांव में ही खेती करते हैं।
600 वोटों वाले राजापुर गांव में हिंदू वोटरों के समर्थन ने ही हाफिज अजीमुद्दीन को यहां का प्रधान बनाया है। अजीमुद्दीन कहते हैं कि गांव के लोगों ने उनपर जो विश्वास जताया है, वो उसके लिए आभारी हैं। गांव के किसान शेखर साहू कहते हैं कि इस बार लोगों ने धर्म को नहीं, इंसान को देखकर अपना वोट डाला है। ये बात सही है कि हम सभी हिंदू धर्म को मानते हैं, लेकिन हमने मुस्लिम प्रधान को चुनकर ये साफ संदेश की कोशिश की है कि हम सभी धर्मों को समान रूप से सम्मान देते हैं।
अयोध्या मस्जिद ट्रस्ट के सचिव अतहर हुसैन ने अजीमुद्दीन को सांप्रदायिक भाईचारे की मिसाल बताया है। हुसैन कहते हैं, अजीमुद्दीन का जीतना ये बताता है कि हिंदुस्तान में तमाम चुनौतियों के बावजूद सभी धर्मों में आपसी प्रेम बरकरार है और यही हमारे देश की असल ताकत है।

60 की उम्र में हुनर को कारोबार बनाने वाली तारा जयप्रकाश

60-65 की उम्र पार करते ही लोगों को लगने लगता है कि अब उनके आराम करने का समय आ चुका है। बहुत से लोग समझने लगते हैं कि अब वह कुछ नहीं कर सकते तथा अपने छोटे से छोटे काम के लिए भी, दूसरों पर निर्भर रहने लगते हैं। लेकिन, आज हम आपको एक ऐसी महिला की कहानी बताने जा रहे हैं, जिन्होंने 60 की उम्र के बाद अपने हुनर को अपना बिज़नेस बनाया। हम बात कर रहे हैं, तमिल नाडु के कुन्नूर की रहने वाली 68 वर्षीया तारा जयप्रकाश की। तारा पिछले पाँच दशकों से बुनाई और क्रोशिया  का काम कर रही हैं।
द बेटर इंडिया से बात करते हुए तारा ने कहा, “मैं कुन्नूर के बडगा समुदाय से हूँ। इस इलाके में 12 महीने ठंड ही रहती है। इसलिए, लोग सालभर गर्म कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं। यहाँ के लोग घर में ही अपने हाथ से स्वेटर बनाते हैं। मैंने अपनी माँ और दादी से यह हुनर सीखा था। बचपन से ही मैंने उनके साथ, बुनाई और क्रोशिया से स्वेटर आदि बनाना शुरू कर दिया था। हालांकि, पहले यह काम सिर्फ घर-परिवार और दोस्तों तक सीमित था।”तारा के पति वायु सेना में कार्यरत थे, जिस वजह से उन्हें देश के अलग-अलग शहरों में रहने का मौका मिला। पति के रिटायरमेंट के बाद, तारा ने कुन्नूर में ही रहने का फैसला किया। वह कहती हैं कि वह जहां-जहां रहीं, लोगों के लिए कई तरह की चीजें बनाती रहीं। वह अपने घर के लिए बहुत सी चीजें जैसे- बेडशीट, कुशन कवर, तोरण, बच्चों के लिए गर्म कपड़े आदि, सभी कुछ खुद बनाती रही हैं। उनके बनाए कपड़ों और अन्य चीजों को देखकर, उनके जानने वाले भी उनसे अपने लिए ये चीजें बनवाने लगे। लेकिन, उन्होंने कभी भी अपने इस हुनर को बिज़नेस की तरह नहीं लिया।

तारा भले ही इतने सालों से यह काम कर रही थीं, लेकिन उन्हें कभी भी अपने बनाए गर्म कपड़ों और अन्य उत्पादों को बेचने का ख्याल नहीं आया। वह कहती हैं, “लगभग छह साल पहले मेरी बेटी ने मुझसे कहा कि मुझे इस हुनर को बिज़नेस की तरह लेना चाहिए। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो घरेलू कार्यों और अपने बच्चों के लिए हाथ से बनी चीजें तलाशते हैं। मैंने सोचा कि एक कोशिश करने में क्या बुराई है।” लेकिन, फिर भी उन्होंने इसे बड़े स्तर पर शुरू नहीं किया।
इसके बाद, वह लगभग दो-तीन महीने तक अलग-अलग तरह की चीजें बनाकर रखने लगीं। जैसे- कुशन कवर, स्वेटर, जुराब, तोरण, टेबल कवर, शॉल, टिश्यू पेपर बॉक्स, बैग आदि। साथ ही, वह शहर में आयोजित होने वाले मेले और प्रदर्शनियों में स्टॉल भी लगाने लगीं। वह कहती हैं, “कुन्नूर के अलावा, बेंगलुरु में भी हमारा एक फ्लैट है। हम साल में एक बार वहाँ जरूर जाते हैं। मैं जब भी बेंगलुरु जाती हूँ, तो अपने हाथों से बनाए कुछ सामान भी ले जाती हूँ। बेंगलुरु में होने वाले कई आयोजनों में, मैं अपने स्टॉल लगाती हूँ। जहाँ इन चीजों की काफी अच्छी बिक्री हो जाती है और ग्राहकों से सीधा संपर्क करने का मौका मिलता है। अब तक मैं लगभग 150 प्रदर्शनियों में हिस्सा ले चुकी हूँ। इस तरह, अब मुझे बहुत सारे लोग सामान का ऑर्डर देते हैं।”
बेंगलुरु में रहने वाली अमिता श्रीनिवासन ने एक ‘प्रदर्शनी’ में तारा के स्टॉल से अपने बच्चों के लिए गर्म कपडे और घर के लिए कुशन कवर खरीदे थे। वह कहती हैं, “ऐसा हाथ का काम आजकल कहीं आसानी से नहीं मिलता है। बाजार में भी आपको इस तरह की चीजें नहीं मिलेंगी। तारा जी की बनाई हर एक चीज खूबसूरत होने के साथ-साथ सालों-साल चलने वाली है।”
तारा कहती हैं कि उनके हाथ से बने सामानों की आज तक जो भी मार्केटिंग हुई है, वह उनके ग्राहकों ने ही की है। वह सोशल मीडिया या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मार्केटिंग नहीं करती हैं। उन्होंने आगे बताया कि उनके उत्पादों की कीमत 100 रुपये से शुरू होकर 10-12 हजार रुपये तक है। जैसे कोस्टर की कीमत 100 रुपये से शुरू होती है, तो वहीं उनकी बनाई बेडशीट की कीमत 12 हजार रुपये तक है। तारा कहती हैं कि वह हमेशा नए-नए डिज़ाइन बनाने की कोशिश करती हैं। इसके अलावा, किसी चीज को बनाने में कितनी मेहनत और समय लगा है, इस आधार पर उसकी कीमत तय की जाती है।

उन्होंने कहा, “कुशन कवर को बनाने में दो-तीन दिन लगते हैं, तो स्वेटर बनाने में एक हफ्ते का समय लगता है। वहीं, बेडशीट बनाने में भी काफी समय लगता है।” कमाई के बारे में बात करते हुए वह कहती हैं कि महीने में उनकी औसतन 10 हजार रुपये की कमाई हो जाती है। वहीं, जब वह किसी प्रदर्शनी में हिस्सा लेती हैं, तो उन्हें 40 हजार रुपये तक की भी कमाई हो जाती है।
(साभार – द बेटर इंडिया)