Thursday, October 29, 2026
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बंगाल में 31 अगस्त तक बढ़ीं पाबंदियां, 50 प्रतिशत क्षमता के साथ खुलेंगे सिनेमाघर

कोलकाता : बंगाल में कोविड -19 को लेकर प्रतिबन्ध 31 अगस्त तक बढ़ा दिये गये हैं। इस निर्णय की जानकारी देते हुए सीएम ममता बनर्जी ने कहा कि तीसरी लहर का खतरा अब भी है। कुछ ढील रहेंगी जैसे कि रात में पूर्ण लॉकडाउन की अवधि पहले रात 9 बजे से सुबह 5 बजे तक थी जिसे अब रात 11 बजे से सुबह 5 बजे तक कर दिया गया है।
50 प्रतिशत क्षमता के साथ खुलेंगे थिएटर
वहीं सिनेमा हॉल,थिएटर, ऑडिटोरियम, स्टेडियम और स्वीमिंग पूल 50 फीसदी क्षमता के साथ खोले जा सकते हैं। पहले इन चीजों के खोलने पर पूरी तरह से पाबंदी लगाई गई थी। जिसे अब सरकार ने हटा लिया है।
रात 10:30 तक खुले रह सकते हैं रेस्तरां और बार
नये निर्देशों के मुताबिक रेस्तरां और बार रात 10:30 तक खुले रह सकते हैं. पश्चिम बंगाल में पहले बार और रेस्टोरेंट को सिर्फ तीन घंटे खोलने की इजाजत थी, जिसे अब बढ़ा दिया गया है।
एक घंटे ज्यादा चलेगी मेट्रो
पश्चिम बंगाल में मेट्रो रेल ने शहर में अपने उत्तर-दक्षिण गलियारे पर सोमवार से शाम को सेवा के समय में एक घंटे बढ़ाने का फैसला किया है। अब आखिरी ट्रेन रात नौ बजे टर्मिनल स्टेशनों से रवाना होगी।
बढ़ाई गयी ट्रेनों की संख्या
कोलकाता मेट्रो के अधिकारियों ने यात्रियों की संख्या में वृद्धि को देखते हुए ट्रेनों की दैनिक संख्या 220 से बढ़ाकर 228 कर दी है और व्यस्तम समय में हर पांच मिनट के अंतराल पर ट्रेन मिलेगी।
नाइट कर्फ्यू में दी गयी छूट
पश्चिम बंगाल सरकार ने घोषणा की है कि राज्य में कोविड-19 महामारी के कारण रात के समय आवाजाही पर लगाई रोक 16 अगस्त से रात्रि 11 बजे से सुबह पांच बजे तक रहेगी, न कि रात नौ बजे से लागू होगी।

 

स्वतंत्रता सेनानी की विधवा बेटी पेंशन की हकदार : दिल्ली हाई कोर्ट

नयी दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट ने स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना को लेकर एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें कहा गया था कि दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी की विधवा या तलाकशुदा बेटी स्वतंत्रता सैनिक सम्मान पेंशन योजना के तहत आश्रित पेंशन के लिए पात्र नहीं है। न्यायमूर्ति वी कामेश्वर राव ने केंद्र से आठ सप्ताह के भीतर आश्रित पेंशन देने के मामले पर विचार करने के लिए कहा, बशर्ते वह योजना के तहत अन्य शर्तों को पूरा करती हो।
न्यायालय दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी की विधवा बेटी की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें आदेश को चुनौती दी गयी थी। न्यायाधीश ने कहा कि वह देश के अन्य उच्च न्यायालयों के विचार से सहमत हैं, जिन्होंने इस योजना के तहत उन तलाकशुदा और विधवा बेटियों को पेंशन का लाभ दिया है जो आश्रित हैं। अदालत ने आदेश दिया, ‘वर्तमान रिट याचिका स्वीकार की जाती है। 12 फरवरी 2020 का आदेश रद्द किया जाता है। प्रतिवादी याचिकाकर्ता को पेंशन योजना के तहत आश्रित पेंशन देने के याचिकाकर्ता के मामले पर विचार करेंगे, अगर वह योजना के तहत अन्य शर्तों को पूरा करती है।’ पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पारित एक फैसले का जिक्र करते हुए, अदालत ने कहा कि बेटियों को योजना के दायरे से पूरी तरह से बाहर नहीं रखा गया है क्योंकि एक अविवाहित बेटी का उल्लेख पात्र आश्रितों की सूची में किया गया था और इस प्रकार एक तलाकशुदा बेटी को बाहर करना एक उपहास होगा जो एक आश्रित है। वर्तमान मामले में योजना का लाभ प्राप्त कर रहे स्वतंत्रता सेनानी का नवंबर 2019 में निधन हो गया। वह अपने पीछे अपनी विधवा बेटी को छोड़ गए जो शारीरिक रूप से दिव्यांग, मानसिक रूप से विक्षिप्त और बेरोजगार है। केंद्र ने फरवरी 2020 में उसे यह कहते हुए एक संदेश भेजा कि आश्रित के लिए उसका अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया है क्योंकि संशोधित नीति दिशानिर्देशों में विधवा / तलाकशुदा बेटी को पात्र नहीं माना गया है।

‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ पर कवि गोष्ठी

कोलकाता : “विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस” का आयोजन प्रान्तीय अध्यक्ष डॉ. गिरिधर राय की अध्यक्षता में “राष्ट्रीय कवि संगम” की सेंट्रल कोलकाता इकाई द्वारा किया गया। जिलाध्यक्ष रमाकांत सिन्हा के मधुर सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस मौके पर स्वतंत्रता संग्राम में बलिदान देने वाले वीरों के शौर्य और पराक्रम पर प्रबुद्ध रचनाकारों ने एक से बढ़कर एक स्वरचित कविताओं का काव्य पाठ कर के श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया। डॉ. गिरिधर राय ने अपनी कविता – “यह देश है हमारा इसके हम सिपाही / रक्षा में इस ज़मी की होगीं नहीं कोताही।” से राष्ट्र भक्ति का साफ संदेश दिये। इसी के साथ युवा कवियों को प्रोत्साहित करने तथा आजादी और उसके महत्व को समझाते हुए प्रांतीय महामंत्री राम पुकार सिंह, सेन्ट्रल कोलकाता जिलाध्यक्ष रमाकान्त सिन्हा, हुगली जिलाध्यक्ष रीमा पान्डेय, दक्षिण कोलकाता जिलाध्यक्ष सीमा सिंह, सेंट्रल कोलकाता जिला महामंत्री स्वागता बसु, नार्थ 24 परगना जिला मंत्री सुषमा राय पटेल, सुदामी यादव, आलोक चौधरी आदि ने अपनी राष्ट्रवादी कविताओं से युवा रचनाकारों का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम में सम्मिलित होने वाले युवा रचनाकारों मे मोनू यादव, निशा राजभर, सपना कुमारी, विश्वरूप शाह परीक्षित, निखिता पाण्डेय, उत्तीर्णा धर, सौमि मजूमदार, बद्रीनाथ साव और अभिषेक पाण्डेय प्रमुख थे, जिन्होंने अपनी-अपनी कविताओं द्वारा सबका मन मोह लिया। कार्यक्रम का कुशल संचालन अभिषेक पांडे ने किया। प्रांतीय मंत्री बलवंत सिंह गौतम, प्रान्तीय संयोजक देवेश मिश्रा की उपस्थिति ने सबका उत्साह वर्धन किया। कार्यक्रम में रामकाव्य राष्ट्रीय प्रतियोगिता सेंट्रल कोलकाता जिले की संयोजिका मुस्कान साव तथा सह-संयोजिका ज्योति साव भी उपस्थित थी। प्रान्तीय सह संयोजक स्वागता बसु ने कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद ज्ञापन किया।

‘चंद्रयान-2’ ने पता की चांद पर पानी के अणुओं की मौजूदगी

नयी दिल्ली : भारत के दूसरे चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-2’ ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की मौजूदगी का पता लगाया है। मिशन के दौरान हासिल हुए आंकड़ों से यह खुलासा हुआ है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष ए एस किरण कुमार के सहयोग से लिखे गए एक रिसर्च पेपर में कहा गया है कि ‘चंद्रयान-2’ में लगे उपकरणों में ‘इमेजिंग इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर’ (आईआईआरएस) नाम का एक उपकरण भी है जो वैश्विक वैज्ञानिक आंकड़ा प्राप्त करने के लिए 100 किलोमीटर की एक ध्रुवीय कक्षा से जुड़ा काम कर रहा है। ‘करंट साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित रिसर्च पेपर में कहा गया है, ‘आईआईआरएस से मिले शुरुआती डेटा से चंद्रमा पर 29 डिग्री उत्तरी और 62 डिग्री उत्तरी अक्षांश के बीच व्यापक जलयोजन और अमिश्रित हाइड्रोक्सिल (ओएच) और पानी (एच2ओ) के अणुओं की मौजूदगी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।’

स्वतंत्रता दिवस पर तुलसी जयंती समारोह का आयोजन

कोलकाता : स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर बंगीय हिंदी परिषद के तत्वावधान में 15 अगस्त,2021 को संध्या 6:30 बजे गूगल मीट के माध्यम से डॉ. ललित कुमार झा की अध्यक्षता में ‘तुलसी जयंती समारोह’ का सफल आयोजन किया गया| इस कार्यक्रम का मुख्य विषय तुलसी के व्यक्तित्व के विभिन्न आयामों को स्पष्ट करना था | कार्यक्रम का शुभारंभ परिषद के मंत्री डाॅ. राजेन्द्रनाथ त्रिपाठी के स्वागत वक्तव्य से हुआ | इसके अतिरिक्त इस कार्यक्रम में वक्ता के रूप में डाॅ. विनय मिश्रा, डाॅ. बीरेंद्र सिंह एवं तान्या चतुर्वेदी उपस्थित रहे। डाॅ. विनय मिश्रा ने तुलसी के साहित्य में सामंजस्य के महत्व को दर्शाया | डाॅ. बीरेंद्र सिंह ने आचार्य शुक्ल के उद्धरण को स्पष्ट किया, जो उन्होंने तुलसी के व्यक्तित्व के संदर्भ में लिखा था तथा सहकारवाद शब्द के ज़रिए भी अपनी बातों को रखा | तान्या चतुर्वेदी ने तुलसी के व्यक्तित्व और उनकी समन्वय दृष्टि पर प्रकाश डाला | अध्यक्षीय वक्तव्य में लालबाबा काॅलेज के विभागाध्यक्ष डाॅ. ललित कुमार झा ने तुलसी की महत्ता और उनके रचना-कर्म के विविध आयामों पर अपना एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और इस विमर्श से संबंधित श्रोताओं की शंका का निवारण अपने वक्तव्य के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया । कार्यक्रम का उत्कृष्ट संचालन साहित्यमंत्री श्री भानु प्रताप पांडे ने किया | कुशल श्रोताओं में सुषमा राय पटेल, रीमा पाण्डेय, जिउतलाल प्रजापति, निखिता पाण्डेय, अनूप यादव, उमेश पांडेय, रमाकांत सिन्हा, ज़ोया अहमद आदि उपस्थित थे। अंत में डाॅ. रंजीत संकल्प ने सभी वक्ताओं एवं श्रोताओं को धन्यवाद ज्ञापित किया | इस वेब-गोष्ठी में परिषद के पदाधिकारियों एवं विद्यार्थियों ने धैर्य एवं संयम के साथ कार्यक्रम को सफल बनाने में अपना पूरा सहयोग दिया।

तुलसी को पढ़ना समूची भारतीय वांग्मय परम्परा को पढ़ना है : डॉ. ऋषिकेश राय

सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय में मनायी गयी तुलसी जयन्ती
कोलकाता : कोविड -19 का पालन करते हुए सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय में इस वर्ष तुलसी जयन्ती मनायी गयी। इस अवसर पर पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित तुलसी साहित्य के अध्येता तथा टी बोर्ड के सचिव डॉ. ऋषिकेश राय ने तुलसी साहित्य की समन्वय भावना, लोकभावना तथा संवादधर्मिता पर विशेष रूप से अपनी बात रखी। उन्होंने वरिष्ठ आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा के कथन का उल्लेख करते हुए तुलसीदास को विश्व का सर्वश्रेष्ठ कवि बताया। डॉ. ऋषिकेश राय ने कहा कि तुलसी भारतीय साहित्य के सबसे बड़े संवादधर्मी कवि हैं। अपनी परम्परा से उन्होंने बहुत सुन्दरता से पढ़ा है। तुलसी को पढ़ने का मतलब समूची भारतीय वांग्मय परम्परा को पढ़ना है। बहुत से लोग कहते हैं, कि तुलसी ने शास्त्रों की नकल की है पर तुलसी ने पूर्ण प्रवेश रचना यानी उसका पुनर्पाठ किया है। शास्त्रों में जो दूषण है, उसे भूषण कैसे बनाना है, यह तुलसी जानते हैं। तुलसीदास नीति और साहित्य के साथ राजनीतिशास्त्र के भी ज्ञाता हैं। तुलसी का राम राज्य एक यूटोपिया है जहाँ सब सुखी हैं। तुलसी के राम वाल्मिकी के राम से अलग हैं। तुलसी के राम परात्पर ब्रह्म हैं। तुलसी पर अध्यात्म रामायण का प्रभाव है। तुलसी ने सांस्कृतिक समन्यवय से अपना साम्राज्य स्थापित किया। वे संस्कृत के भी बड़े कवि हैं जो पूरी संस्कृत परम्परा को समझते हैं। रामविलास शर्मा ने तुलसीदास को विश्व का सर्वश्रेष्ठ कवि मानते हैं पर प्रगतिवादियों ने उनकी इस बात को खारिज कर दिया। तुलसी को अवहेलित किया गया है। समारोह की अध्यक्षता कर रहे पश्चिम बंगाल के डी.जी. होमगार्ड मृत्युंजय कुमार सिंह ने कहा तुलसी लोक के हृदय पर राज करते हैं। उन्होंने तुलसीदास के काव्य कला कौशल पर भी चर्चा की। तुलसी जयन्ती समारोह का आरम्भ वरिष्ठ गायक ओमप्रकाश मिश्र द्वारा श्रीराम वन्दना की समधुर प्रस्तुति से हुआ। पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने पुस्तकालय की गतिविधियों का ब्योरा दिया। इस अवसर पर विद्यालय की सेवानिवृत शिक्षिका प्रेम शर्मा के मार्गदर्शन में रामलला नहछू की प्रस्तुति विद्यालय की पूर्व छात्रा सुषमा त्रिपाठी ने की। कार्यक्रम में स्वागत भाषण तथा संचालन डॉ.प्रेमशंकर त्रिपाठी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालय के अध्यक्ष भरत कुमार जालान ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष श्रीमोहन तिवारी, विजय तिवारी समेत अन्य कर्मचारियों की विशेष भूमिका रही। समारोह का आनन्द आभासी माध्यम से जुड़े लोगों ने भी उठाया।

पहेलियों की रोचक दुनिया को बूझने वाली खगनियाँ

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आपसे पहेलियों की बात करूंगी। घबराइए मत, पहेलियाँ नहीं बुझाऊंगी। बस पहेलियों की रोचक दुनिया की सैर कराऊंगी। भले ही साधारण औरतें बात- बात में मुहावरों और कहावतों का इस्तेमाल ही नहीं करतीं बल्कि पहेलियां बूझने और बुझाने में भी पीछे नहीं रहतीं लेकिन जब साहित्य के परिसर में पहेलियों की बात चलती है तो वहाँ औरतों की उपस्थिति नजर नहीं आती। वहाँ एक ही कवि का प्रभुत्व नजर आता है और वह हैं, अमीर खुसरो जो अपनी पहेलियों, मुकरियों आदि के लिए जाने जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी कलम का हुनर नहीं दिखाया है। आदिकालीन साहित्य में अगर अमीर खुसरों की पहेलियों का सरस शब्दजाल दिखाई देता है तो रीतिकाल में खगनियाँ ने अपनी कलम के जादू से सबको मुग्ध कर दिया। उन्हें विशेषतः पहेलियों के लिए ही याद किया जाता है। यह बात और है कि बहुत सी स्त्री रचनाकारों की तरह इन्हें भी इतिहास के कृष्ण पक्ष ने ढँक लिया और कम लोग ही इनके और इनकी रचनाओं के बारे में जानते हैं।

सखियों, खगनियाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में हुआ था। माना जाता है कि ये उत्तर मध्यकाल अर्थात रीतिकाल में सृजनरत थीं। इनके जीवन के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी ‌तो नहीं मिलती लेकिन इनकी पहेलियों को शोधकर्ताओं और लेखकों ने संकलित अवश्य किया है। ज्योतिप्रसाद मिश्र ‘निर्मल’ द्वारा संपादित पुस्तक “स्त्री कवि संग्रह” में खगनियां की कई पहेलियां संकलित हैं। देखिए, एक उदाहरण और बूझिये तो सही इसका सही जवाब-

“नारी देखी एक अनोखी।

बंद न होती चलती चोखी।

मरना जीना तुरंत बतलाती।

कभी नहीं कुछ खाना खाती।

सदा हाथ में मेरे रहै, बासू केर खगनियां कहै।” 

तो बताइए तो सखियों, क्या है इसका जवाब ? चलिए मैं ही बता देती हूं-“नाड़ी”। नाड़ी भी तो स्त्री अर्थात स्त्रीलिंग ही है जिसके चलते रहने पर जिंदगी चलती रहती है। एक और खूबसूरत पहेली बूझिए-

“दोनों बहनें बड़ी अनोखी।

लखने में यह सबसे हैं चोखी।

जिससे ये दोनों लग जातीं।

बिना न देखे उसे अघातीं।

बिना न इनके जीवन रहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”

अब भला कौन हैं, ये दोनों अनोखी बहनें। अरे वही तो हैं, जिनके बिना जग सूना हो जाता है। हाँ भाई हाँ, आँखें। 

अब जरा दो पंक्तियों वाली पहेलियाँ भी देखिए-

“लंबी चौड़ी आँगुर चारि, दुहूँ ओर से डारिन फार।

जीव न होय, जीव को गहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”

इसका उत्तर है “कंघा” जो निर्जीव होकर भी सजीव लोगों अर्थात मनुष्यों के बहुत काम आता है। एक और उदाहरण दृष्टव्य है-

“पेट फटा रहता है सदा, बड़े जोर से बजता कहाँ।

पूजा अरचा में वह रहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”

यह है “शंख” जिसके बिना पूजा पाठ पूरा नहीं होता। 

खड़ी बोली और अवधी में रचित ये पहेलियाँ तकरीबन हर विषय को समेटती हैं। ये रोचक भी हैं और सरस भी। कभी थोड़ी कठिन लगती हैं और चुनौती भी देती हैं कि बूझो तो सही। और वह पहेली ही क्या जो सुनने वाले को बूझ लेने की चुनौती न दे। तो कभी- कभी आसान भी लगती हैं और‌ आप झट से उसका अर्थ खोल लेते हैं। इस तरह के कुछ और उदाहरण देखिए-

“रहती अंगरेज़न के साथ।

उसे नवाते हैं सब माथ।

बड़ी लड़ाई में वह जावै।

धड़ाधड़ाका शब्द सुनावै।

सदा निशाना अपना गहै, बासू केर खगनियाँ कहै।” 

इसका अर्थ तो आपने समझ ही लिया होगा। जी, बिल्कुल सही समझा। यह है “बंदूक” जिसके धड़ाके के बिना युद्ध नहीं लड़ा जा सकता। एक और आसान सी पहेली का उदाहरण प्रस्तुत है-

“बाँध गले में उसकी डोरी।

देते लड़के हैं झकझोरी।

आसमान में उड़ता रहता।

खाकर झोके बहता रहता।

सूरत सदा तिकोनी रहै, बासू केर खगनियाँ कहै।”

सही समझा आपने, यह तिकोनी चीज है, पतंग जिसे लड़के बच्चों के साथ बड़े भी बड़े चाव से आसमान में उड़ाते हैं।

सखियों, इन पहेलियों को पढ़कर लगता है कि खगनियाँ बासू नामक गाँव की रहने वाली थीं। संभवतः इसीलिए वह हर पहेली के अंत में अपना नाम अपने गाँव के नाम के साथ जोड़ देती हैं। इन पहेलियों से गुजरते हुए हम खगनियाँ की कवित्त शक्ति और बुद्धि कौशल का अंदाज़ा सहजता से लगा सकते हैं। सखियों, आप स्वयं भी इन्हें पढ़कर आनंद उठाएं और दूसरों को भी पढ़वाएं। इस पढ़ने -पढ़ाने के द्वारा ही हम इस विदुषी कवयित्री को जन मानस के बीच जीवित रख सकते हैं।

 

 

 

 

 

 

 

स्वाधीनता दिवस पर पढ़ें शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की प्रेरक कविता

युग-युग की शांति अहिंसा की, लेकर प्रयोग गरिमा समस्त,

इतिहास नया लिखने आया, यह पुण्य पर्व पन्द्रह अगस्त।

पन्द्रह अगस्त त्योहार, राष्ट्र के चिरसंचित अरमानों का,
पन्द्रह अगस्त त्योहार, अनगिनत मूक-मुग्ध बलिदानों का।
जो पैगम्बर पददलित देश का, शीश उठाने आया था,
आजन्म फकीरी ले जिसने, घर-घर में अलख जगाया था।
भूमंडल में जिसकी सानी का, मनुज नहीं जन्मा दूजा,
मेरे कृतघ्न भारत तुमने, गोली से जिसकी की पूजा।
लज्जित हो तो उसके सपनों, संकल्पों को आबाद करो,
यह दिन जो लाया, अपने उस नंगे फकीर को याद करो।
हमने जो सपने देखे, यह उस आजादी का वेष नहीं,
देखो इस उजली खादी में, कोई कालिख तो शेष नहीं।
जो चले गए अनरोए, अनगाए स्वतंत्रता पर बलि हो,
आंसू से अपनी अंजुलि भर, आओ उनको श्रद्धांजलि दो।
रण है, दरिद्रता, दैन्य, निपीड़न, बेकारी, बेहाली से,
रण है, अकाल, भुखमरी, विवशता, तन-मन की कंगाली से।
रण, जाति धर्म के नाम, विषवमन करने वाले नारों से,
रण, शांति प्रेम के विद्वेषी, मानवता के हत्यारों से।
जब तक जन-गण-मन जीवन में, शोषण तंत्रों का लेष रहे,
जब तक भारत मां के आंचल में, एक दाग भी शेष रहे।
हम विरत न हों संकल्पों से, पलभर भी पथ पर नहीं थमें,
पन्द्रह अगस्त की शपथ यही, तब तक आराम हराम हमें।
(स्वतंत्रता दिवस की प्रथम वर्षगांठ 1948 पर रचीं पंक्तियां)
(स्त्रोत साभार – वेबदुनिया)

स्वाधीनता दिवस पर लें तिरंगा व्यंजनों का आनन्द

मसालेदार तिरंगा पनीर
सामग्री : 250 ग्राम ताजा पनीर, 75 ग्राम दही, बेसन पाव कटोरी, 1 बड़ा चम्मच लहसुन-अदरक पेस्ट, 2 टमाटर, 1/2 छोटा चम्मच अचार मसाला, 1 चम्मच पुदीना चटनी, 3/4 चम्मच चिली सॉस, 3/4 चम्मच टोमॅटो सॉस, लालमिर्च व गरम मसाला, नमक स्वादानुसार, कटा हरा धनिया।
विधि : सर्वप्रथम पनीर को 3 भागों में काट लें। हर परत के ऊपर पुदीना चटनी, अचार मसाला, चिली सॉस व टोमॅटो सॉस लगा लें और उसे एक के ऊपर एक रखें। तत्पश्चात बेसन, तेल, नमक, लालमिर्च व गरम मसाला मिलाएं तथा घोल को 5 मिनट तक हिलाएं। अब इसमें पनीर को डुबोकर डीप फ्राई कर लें। उसके बाद उनको 2 भागों में काट लें। अब एक कड़ाही में तेल गरम करके राई-जीरा तड़काएं। उसमें लहसुन-अदरक पेस्ट डालें तथा टोमॅटो प्यूरी डालकर तेल छोड़ने तक पकाएं। अब दही को फेंटकर उसमें डालें और ऊपर से तले हुए रंग-बिरंगे पनीर को डालकर 1-2 उबाली ले लें। अगर पानी की आवश्यकता हो तो डालें अन्यथा नहीं। अब ऊपर से कटे हरे धनिए से सजाकर रोटी या परांठे के साथ चटपटा और मसालेदार तिरंगा पनीर पेश करें।
तिरंगी बर्फी
सामग्री :  500 ग्राम ताजा मावा, 450 ग्राम शक्कर, 150 ग्राम ताजा पनीर, आधा चम्मच इलायची पावडर, मीठा पीला रंग, हरा रंग, चांदी का वरक और वेनिला एसेंस।
विधि : सर्वप्रथम खोया और पनीर को एक थाली में कद्दूकस करके रख लें। अब इसमें शकर मिलाएं, तत्पश्चात कड़ाही में मध्यम आंच पर पकने दें। मिश्रण गाढ़ा होने पर वेनिला एसेंस और इलायची पावडर डालकर मिलाएं तथा आंच बंद कर दें।
अब तैयार मिश्रण को 3 भागों में बराबर बांट लें। पहले वाले भाग को सफेद रखें। दूसरे भाग में मीठा पीला व तीसरे भाग में हरा रंग मिला लें। हल्के हाथ से मोटा बेल लें और सबसे नीचे हरा, फिर सफेद और ऊपर पीले रंग को जमा दें और हल्के से हाथ से दबाकर वरक चिपका दें। अब इसको चौकोर शेप या छोटे-छोटे साइज में काटकर नए फ्लेवर में तैयार तिरंगी बर्फी पेश करें।

पद्मा सचदेव : चीड़ों का आशीष, अंधेरे की रोशनी

वह जितनी डोगरी की लेखिका थीं, उतनी ही हिंदी की भी थीं। अलबत्ता, हिंदी वाले उन्हें अपनी ही भाषा की लेखिका मानते थे। इसका कारण शायद यह था कि वे हिंदी लेखकों से अधिक घुली-मिली थीं। चाहे महादेवी हों या अज्ञेय या धर्मवीर भारती सबके साथ उनके मधुर आत्मीय संबंध थे। धर्मवीर भारती को वे राखी बांधती थीं। सातवें दशक में जो लोग धर्मयुग के पाठक रहे उन्हें पद्मा सचदेव का लिखा याद होगा। उनकी तस्वीरें भी।

साहित्य अकादेमी की सीढ़ियों पर उनकी खिलखिलाती हंसी की आवाज सुनाई पड़ती थी, तो लोग जान जाते थे पद्मा जी आ रही हैं। वे युवा लेखकों के रचना पाठ में न सिर्फ उपस्थित रहती थीं बल्कि उनसे मिलतीं और हौसला अाफजाई करती थीं।

उनकी रचनात्मक ताकत लोकगीत थे। उनमें लोक और नागर का अद्भुत संगम था। बरसों वे दिल्ली में रहीं लेकिन उन पर अभिजात्य रंग नहीं चढ़ा। एक खुलापन उनके व्यक्तित्व और लेखन में रहा। 17 अप्रैल 1940 में जम्मू से 40 किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक गांव पुरमंडल के प्रतिष्ठित राजपुरोहित परिवार में जन्मीं पद्मा सचदेव ने बारह-तेरह वर्ष की उम्र में लिखना शुरू किया था।

उन्होंने डोगरी लोकगीतों से प्रभावित होकर डोगरी में कविता लिखना शुरू की थी। उन्हें डोगरी की पहली आधुनिक कवयित्री भी कहा जाता है। उनके पास लोकगीतों का दर्द तो था ही, निजी दुख भी थे। उनके पिता भारत-पाक विभाजान के दौरान मारे गए थे। वे यह जख्म जीवनभर नहीं भूल सकीं। उनकी रचनाओं में शायद इसलिए एक कशिश रहती थी।

साहित्य अकादेमी की ओर से जब उन्हें 2019 में फेलो बनाया गया तो उन्होंने कहा था, “बचपन में लोकगीतों से मिली प्रेरणा से लिखना सीखा पर हिंदी में लिखने के लिए मुझे धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने प्रेरित किया था। जब मुझे साहित्य अकादेमी मिला तो विश्वास ही नहीं हुआ कि मुझे यह सम्मान मुल्कराज आनंद, नामवर सिंह और रशीद अहमद सिद्दीकी के साथ मिल रहा है। बचपन में डोगरी लोकगीत सुनकर मैं चमत्कृत हो जाती थी कि कौन है जो इन्हें लिखता है? तब मैं दस-बारह साल से ही छंद जोड़ने लगी। गांव में रहकर मैंने लोक गीतों को करीब से जाना।”

कम महिला लेखिकाएं हैं, जिन्हें अकादेमी में फैलो होने का सम्मान प्राप्त हुआ है। वे इस पंक्ति में महादेवी वर्मा, बाल अम्मा, कुर्तुल-एन-हैदर, अमृता प्रीतम, अनीता देसाई और कृष्णा सोबती के साथ शामिल हैं। पद्मा जी अपने गद्य के लिए भी जानी जाती थीं। ऐसा गद्य जो बहुत सरस, आत्मीय, अंतरंग तथा पारदर्शी है, जिसमें प्रवाह देखा जा सकता है। अज्ञेय के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने शब्दों में अज्ञेय के व्यक्तित्व और अपनी यादों को साकार कर दिया था। लिखने के अलावा उन्होंने रेडियों के लिए भी काम किया। कुछ बरस जम्मू रेडियो के अलावा उन्होंने दिल्ली में डोगरी समाचार विभाग में भी काम किया। उन्हें कई सम्मान मिले। शायद ही कोई सम्मान हो, जो उन्हें न मिला हो। उन्हें पद्मश्री, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, सोवियत लैंड पुरस्कार, सरस्वती सम्मान और साहित्य अकादेमी की महत्तर सदस्यता से नवाजा गया था। साहित्य अकादेमी पुरस्कार तो उन्हें 1971 में ही मिल गया था। उन्हें यह पुरस्कार ‘मेरी कविता मेरे गीत’ के लिए मिला था। 2016 में पुस्तक ‘चित्त चेते’ के लिए उन्हें 25वां सरस्वती सम्मान मिला था। यह उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक थी।

पद्मा जी कहती थीं, “विचार में कविता अपने आप आती है। गद्य को लाना पड़ता है।” उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे जिनमें ‘जम्मू एक शहर था’ काफी चर्चित हुआ था। उनकी एक कविता है जो भूले नहीं भूलती।

शिलुका*

देह जलाकर मैं अपनी

लौ दूं अंधेरे को

जलती-जलती हंस पडूं

जलती ही जीती हूं मैं

जैसे बटोत के जंगल में

जल रही शिलुका कोई

देवदारों की धिया (बेटी)

चीड़ों का मुझे आशीष

अंधेरे की मैं रोशनी…

जंगल का हूं मोह मैं

जो तू है वही हूं मैं

अपनी मृत्यु पर रोई

यह बस्ती टोह ली

चक्की में डालकर

बांह पीसती हूं मैं

लोक पागल हो गया

तुझे कहां ढूंढता रहा

तू तो मेरे पास था

तभी तो जीती हूं मैं

मैं एक कितबा हूं

लिखा हुआ हिसाब हूं

मैं पर्णकुटिया तेरी

लाज तुम रखना मेरी

रमिया रहीमन हूं मैं

कुछ तो यकीनन हूं मैं!

(*चीड़ की लकड़ी, पहाड़ी घरों में मोमबत्ती की तरह जलाई जाती है)

शिलुका*

देह जलाकर मैं अपनी

लौ दूं अंधेरे को

जलती-जलती हंस पडूं

जलती ही जीती हूं मैं

जैसे बटोत के जंगल में

जल रही शिलुका कोई

देवदारों की धिया (बेटी)

चीड़ों का मुझे आशीष

अंधेरे की मैं रोशनी…

जंगल का हूं मोह मैं

जो तू है वही हूं मैं

अपनी मृत्यु पर रोई

यह बस्ती टोह ली

चक्की में डालकर

बांह पीसती हूं मैं

लोक पागल हो गया

तुझे कहां ढूंढता रहा

तू तो मेरे पास था

तभी तो जीती हूं मैं

मैं एक कितबा हूं

लिखा हुआ हिसाब हूं

मैं पर्णकुटिया तेरी

लाज तुम रखना मेरी

रमिया रहीमन हूं मैं

कुछ तो यकीनन हूं मैं!

(साभार – आउटलुक)