Thursday, July 2, 2026
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भारतीय मुक्केबाजी के सुपरनोवा थे डिंको सिंह

नयी दिल्ली : डिंको सिंह ने कभी ओलंपिक पदक नहीं जीता लेकिन इसके बावजूद उन्होंने भारतीय मुक्केबाजी में अमिट छाप छोड़ी जो भावी पी​ढ़ी को भी प्रेरित करती रहेगी। डिंको सिंह केवल 42 साल के थे लेकिन चार साल तक यकृत के कैंसर से जूझने के बाद उन्होंने इम्फाल स्थि​त अपने आवास पर अंतिम सांस ली जिससे भारतीय मुक्केबाजी में एक बड़ा शून्य पैदा हो गया।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बैकाक एशियाई खेल 1998 में स्वर्ण पदक जीतना था। यह भारत का मुक्केबाजी में इन खेलों में 16 वर्षों में पहला स्वर्ण पदक था। उनके प्रदर्शन का हालांकि भारतीय मुक्केबाजी पर बड़ा प्रभाव पड़ा​ जिससे प्रेरित होकर कई युवाओं ने इस खेल को अपनाया और इनमें ओलंपिक पदक विजेता भी शामिल हैं। इनमें एम सी मैरीकोम भी शामिल हैं जिन्हें मुक्केबाजी में अपना सपना पूरा करने के लिये घर के पास ही प्रेरणादायी नायक मिल गया था। मैरीकोम के अलावा उत्तर पूर्व के कई मुक्केबाजों पर डिंको का प्रभाव पड़ा जिनमें एम सुरंजय सिंह, एल देवेंद्रो सिंह और एल सरिता देवी भी शामिल हैं। डिंको ने एक बार कहा था ‘मुझे विश्वास नहीं था कि मेरा इतना व्यापक प्रभाव पड़ेगा। मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था। ‘
डिंको का जन्म इम्फाल के सेकता गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके लिये दो जून की रोटी का प्रबंध करना भी मुश्किल था जिसके कारण उनके माता​ पिता को उन्हें स्थानीय अनाथालय में छोड़ने के लिये मजबूर होना पड़ा।यहीं पर भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) द्वारा शुरू किये गये विशेष क्षेत्र खेल कार्यक्रम (सैग) के लोगों की नजर डिंको पर पड़ी थी।
डिंको प्रतिभाशाली तो थे ही वह मजबूत शा​रीरिक क्षमता के भी धनी थी। वह अपने प्रतिद्वंद्वी से कभी नहीं घबराते थे। राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मुक्केबाज अखिल कुमार ने कहा, ‘उन पर किसी का नियंत्रण नहीं था। उन्हें वश में नहीं किया जा सकता था।’ भारतीय मुक्केबाजी में डिंको की पहली झलक 1989 में अंबाला में राष्ट्रीय सब जूनियर में देखने को मिली थी जब वह 10 साल की उम्र में राष्ट्रीय चैंपियन बने थे। यहां से शुरू हुई उनकी यात्रा सतत चलती रही और वह बैंथमवेट वर्ग में विश्वस्तरीय मुक्केबाज बन गये जो बड़ी प्रतियोगिताओं में अपना कारनामा दिखाने के लिये तैयार था।


डिंको के साथ राष्ट्रीय शिविरों में भाग ले चुके अखिल ने कहा, ‘उनके बायें हाथ का मुक्का, आक्रामकता, वह बेहद प्रेरणादायी थी। मैंने राष्ट्रीय चैंपियनशिप के दौरान उन्हें गौर से देखा था। वह क्या दमदार व्यक्तित्व के धनी थे। मैं जानता था कि वह रिंग पर कितने आक्रामक थे क्योंकि राष्ट्रीय शिविरों में मैंने भी उनके कुछ मुक्के झेले थे। ‘ डिंको की आक्रामकता के उनके व्यक्तित्व में भी झलकती थी। उन्होंने 1998 में एशियाई खेलों की टीम में नहीं चुने जाने पर आत्महत्या करने की धमकी तक दे डाली थी। उन्हें आखिर में टीम में चुना गया और उन्होंने इसे सही साबित करके स्वर्ण पदक जीता जिसके लिये उन्हें अर्जुन पुरस्कार और पदम श्री से नवाजा गया।
बैकाक एशियाई खेलों के दौरान राष्ट्रीय कोच रहे गुरबख्श सिंह संधू ने कहा, ‘वह नाटकीय हो सकते थे लेकिन आप उस जैसी प्रतिभा के धनी मुक्केबाज से नहीं लड़ सकते थे।’ लेकिन यह प्रतिभाशाली मुक्केबाज शराब का आदी हो गया जो उनकी बर्बादी का कारण बनी। इससे उन्हें कई तरह की बीमारियों से जूझना पड़ा। ओलंपिक 2000 और राष्ट्रमंडल खेल 2002 में जल्दी बाहर होने के बाद डिंको का करियर लगभग समाप्त हो गया और इसके कुछ समय बाद उन्होंने मुक्केबाजी से संन्यास लेकर इम्फाल में साइ केंद्र में कोचिंग का जिम्मा संभाल दिया।
उन्हें 2014 में कथित तौर पर एक महिला भारोत्तोलक को पीटने के कारण निलंबित कर दिया गया था। ऐसे कई अन्य किस्से हैं जबकि डिंको ने अपना आपा खोया। अखिल के अनुसार, ‘उन्होंने कभी निजी लाभ के लिये किसी की मिन्नत नहीं की फिर चाहे वह कोच हों, महासंघ या अधिकारी। उन्हें अपनी प्रतिभा पर इतना भरोसा था। इसलिए वह नायक थे। ‘ इस स्टार मुक्केबाज को 2017 में पता चला कि वह कैंसर से पीड़ित हैं। पिछले साल वह पीलिया और फिर कोविड—19 से संक्रमित हो गये थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। बीमारी से उबरने के बाद उन्होंने कहा था, ‘यह आसान नहीं था लेकिन मैंने स्वयं से कहा, लड़ना है तो लड़ना है। मैं हार मानने के लिये तैयार नहीं था। किसी को भी हार नहीं माननी चाहिए। ‘ उन्हें उम्मीद थी कि वह कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर वापसी करेंगे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

(साभार – पीटीआई)

देश में 132 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन बुआई का अनुमान : प्रसंस्करणकर्ता

इंदौर : देश में मॉनसून की बारिश की शुरुआत के बीच प्रसंस्करणकर्ताओं के एक संगठन ने अनुमान जताया कि मौजूदा खरीफ सत्र के दौरान सोयाबीन का राष्ट्रीय रकबा 10 फीसद बढ़कर 132 लाख हेक्टेयर के आस-पास रह सकता है। इंदौर स्थित सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के चेयरमैन डेविश जैन ने “पीटीआई-भाषा” को बताया, “हमें लगता है कि इस बार देश में सोयाबीन के रकबे में करीब 10 फीसद का इजाफा होगा।”
उन्होंने बताया कि वर्ष 2020 के खरीफ सत्र के दौरान देश में करीब 120 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन बोया गया था, जबकि इसकी पैदावार 105 लाख टन के आस-पास रही थी। जैन ने कहा, “हमें लगता है कि खासकर मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में किसान उपज के बेहतर दाम की उम्मीद में खरीफ की अन्य फसलों के मुकाबले सोयाबीन उगाने को तरजीह देंगे।” केंद्र सरकार ने वर्ष 2021-22 के खरीफ विपणन सत्र के लिये सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 3,950 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। एमएसपी की यह दर पिछले सत्र के मुकाबले 70 रुपये प्रति क्विंटल अधिक है।

सरलता, निश्छलता तथा प्रेम सिक्त भक्ति के माधुर्य से भरी हैं प्रताप बाला की कविताएँ

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, इन दिनों मैं आप लोगों से मध्ययुगीन कवयित्रियों के बारे बातचीत कर रही हूँ। इन में से कुछ के बारे में हम सब लोगों ने इतिहास की किताबों में पढ़ रखा था तो कुछ के सिर्फ नाम भर सुन रखे थे, जैसा कि मुझे मेरी पाठिकाओं ने बताया कि, “इन लोगों के तो नाम भर सुन रखें थे जो पता नहीं कैसे स्मृति में अंकित रह गये।” सखियों, कुछ कवयित्रियों को तो इतिहास के पन्नों पर‌ जगह मिली‌ और उनके नाम पाठकों को याद‌ रह गये लेकिन कुछ ऐसी भी हैं जिनके नामों का उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं समझा गया। सवाल‌ यह नहीं है कि किसका अवदान ज्यादा है, किस का कम, किसने ज्यादा अच्छा लिखा और किस ने कम,  जब एक युग की प्रवृत्तियों और रचनाकारों की बात की जाती है तो उस युग विशेष में सक्रिय सभी रचनाकारों के अवदान पर संक्षेप ही सही चर्चा अवश्य होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं होता। इतिहास किसी देश का हो या साहित्य का या फिर समाज का, यह तो लिखनेवाले अपनी पसंद, नापसंद, विचारधारा या अन्यान्य कारणों या सुविधाओं के मद्देनजर तय करते हैं कि उन्हें अपनी किताब में किसे शामिल करना है, किसे नहीं। और शायद इसके पीछे एक वजह वह भी है जिसे “लिंगभेद की राजनीति” के नाम से चिह्नित किया जा सकता है। जिन महान लेखकों के हाथों में इतिहास को कलमबद्ध करने की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी रही उन्होंने तय कर लिया कि कौन से नाम स्वर्णाक्षरों में चमकेंगे और किन्हें एक ऐसी दराज में दफन कर दिया जाएगा जो शायद ही कभी खोली जाए। लेकिन दराजें तो खोली जाती ही हैं और उनमें कैद नामों को भी विस्मृति के अंधेरे से बाहर निकाल कर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाता है ताकि उनका सही मूल्यांकन हो सके। इस श्रमसाध्य महत्वपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी कुछ रचनाकार सायास अपने कंधों पर ले लेते हैं। जैसे विस्मृति की खोह में गुम बहुत सी स्त्री रचनाकारों को सामने लाने का  काम  सफलतापूर्वक संपन्न किया, डा. सावित्री सिन्हा, डा. सुमन राजे सक्सेना जैसी गंभीर लेखिकाओं ने। उनके परिश्रम पूर्ण किए गए शोधकार्य के लिए उन्हें नमन करती हुई आज मैं आप सबका परिचय एक ऐसी ही विस्मृत कवयित्री से करवाने जा रही हूँ जिनका नाम शायद बहुत कम लोगों ने सुन रखा हो। वह हैं, प्रताप बाला।

प्रताप बाला का जन्म संंवत् 1891 में गुजरात के जामनगर राज्य में हुआ था। इनका विवाह जोधपुर के महाराज तख़्त सिंह के साथ हुआ और वह महारानी के आसन पर विराजमान हुईं। कहा जाता है कि स्वजन- परिजनों की असामयिक मृत्यु के कारण सांसारिकता से उनका मोहभंग हो गया। सांसारिक विरक्ति ने इनके मन में कृष्ण के प्रति अनुरक्ति जागृत की और मीराबाई की तरह इन्होंने भी कृष्ण की भक्ति में स्वयं को समर्पित कर दिया। कृष्ण की अराधना करते हुए उन्होंने भक्ति रस में डूबे पदों की रचना की। उनके पदों में भक्ति की गहराई भी है और प्रेम की शक्ति पर अगाध विश्वास भी। उनका काव्य मध्ययुगीन भक्त कवियों की भांति ही पूरे समर्पण और साधना से सृजित है जिसमें कभी वह कृष्ण के मनोहारी स्वरूप का वर्णन करती हैं तो कभी उनके चरणों में स्वयं को समर्पित करती हुई मुक्ति की कामना करती हैं। भक्तिरस में डूबा हुआ एक पद देखिए जिसमें विनय का भाव भी व्यक्त हुआ है-

“भजु मन नंदनंदन गिरिधारी। 

 

सुख-सागर करुणा को आगर भक्तवछल बनवारी॥ 

 

मीरा करमा कुबरी सबरी तारी गौतमनारी। 

 

वेद पुरानन में जस गायो ध्याये होवत प्यारी॥ 

 

जामसुता को स्याम चतुरभुज लेजा ख़बरि हमारी॥”

इनकी भक्ति में माधुर्य भाव की अभिव्यक्ति भी हुई है जिसमें वह कृष्ण को अपना प्रियतम मानती हुई उन्हें पति रूप में पूजती हैं-

 “प्रीतम हमारो प्यारो श्याम गिरिधारी है। 

 

मोहन अनाथनाथ संतन के डोलै साथ, 

 

वेद गुन गावैं गाथ गोकुल बिहारी हैं। 

 

कमल विशाल नैन निपट रसीले बैन, 

 

दीनन को सुख दैन चारिभुजा धारी हैं। 

 

केशव कृपानिधान वाही सो हमारो ध्यान, 

 

तन मन बारूँ प्रान जीवन मुरारी हैं। 

 

सुमिरूँ मैं साँझ-भोर बार-बार हाथ जोर।”

कृष्ण का स्वरूप वर्णन करते हुए कवयित्री भावविभोर हो जाती हैं और उनकी छवि पर करोड़ों कामदेवों को वार देना चाहती हैं-

“चतुरभुज झुलत श्याम हिंडोरे। 

 

कंचन खंभ लगे मणिमानिक रेसम की रंग डोरें॥ 

 

उमड़ि घुमड़ि घन बरसत चहुँदिसि नदियाँ लेत हिलोरें। 

 

हरी-हरी भूमि लता लपटाई बोलत कोकिल मोरें॥ 

 

बाजत बीन पखावज बंशी गान होते चहुँ ओरें। 

 

जामसुता छबि निरखि अनोखी वारूँ काम किरोरें॥”

चतुर्भुज कृष्ण के सौन्दर्य का वर्णन करती हुई वह अपनी एकनिष्ठ भक्ति का संकेत भी देती हुई कहती हैं कि उनका मन कृष्ण के चरणों के अतिरिक्त और कहीं नहीं ठहरता-

मो मन परी है यह बान। 

 

चतुरभुज को चरण पठिहरि ना चाहूँ कछु आन। 

 

कमल नैन विसाल सुंदर मंद मुख मुसकान॥ 

 

सुभग मुकुट सुहावनो सिर लसे कुंडल कान। 

 

प्रगट भाल विशाल राजत भौंह मनहुँ कमान॥ 

 

अंग-अंग अनंग को छबि पीत पट पहिरान। 

 

कृष्णरूप अनूप को मैं धरूँ निसि दिन ध्यान॥ 

 

सदा सुमिरूँ रूप पल-पल कला कोटि निधान। 

 

जामसुता परताप के भुज चार जीवन-प्रान॥”

सहज सरल ब्रजभाषा में सृजित भक्तिरस में सराबोर, कवयित्री प्रताप बाला के पदों मेंं सिर्फ उनके समर्पित ह्रदय के गहन भावों की ही अभिव्यक्ति नहीं हुई है बल्कि उनकी  कवि क्षमता का भी यथेष्ठ परिचय मिलता है। कवयित्री के ह्रदय की सरलता और निश्छलता तथा प्रेम सिक्त भक्ति का माधुर्य  उनकी कविताओं को बरबस ही सरसता के गुण से संपन्न कर देता है। आप से आग्रह है कि आप भी इनके पदों को पढ़िए और स्वयं इनका मूल्यांकन करिए।

आज विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी, एक नयी कहानी के साथ।

   

विस्मृत सेनानी : पत्रकार मौलवी मुहम्मद बाकिर, जिनको 1857 में अंग्रेजों ने तोप से उड़ा दिया

1857 की क्रांति की बुनियाद सिपाहियों ने ही डाली थी. वे क्रांति की शुरुआत से लेकर अंत तक रीढ़ की हड्डी भी बने रहे। इन्हीं सिपाहियों के साथ राजा-महाराजाओं का भी नाम हमारी जुबां पर आ ही जाता है। किन्तु, इनके साथ-साथ मजदूर, किसान, ज़मीदार, पूर्व सैनिक, लेखक और पत्रकार के भी भूमिका कम नहीं रही. वह बात और है कि इनमें से कई नाम ऐसे रहे, जो गुमनामी के अँधेरे में खो गए ! मौलवी मोहम्मद बाकिर एक ऐसा ही नाम हैं.
विद्रोह कर
1857 की क्रांति में सक्रिय एक ऐसे क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने अपनी पत्रकारिता से अंग्रेजों के खिलाफ दिया था। कहते हैं उन्होंने बिना तलवार उठाए अपनी कलम की ताकत से अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।
सरकारी नौकरी छोड़ निकाला अपना उर्दू अख़बार!
1790 में दिल्ली के एक रसूखदार घराने में पैदा हुए। मौलवी मोहम्मद ने प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता से हासिल की। बाद में वह आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए ‘दिल्ली कालेज’ गए। वहाँ से पढ़ाई पूरी करने के बाद वह फारसी भाषा के अध्यापक हो गए। इन नौकरी के बाद वह आयकर विभाग में तहसीलदार के पद पर नियुक्त किए गए।
इस तरह करीब 16 साल तक वह सरकारी महकमे में आला पदों पर रहे। चूंकि, सरकारी नौकरी में उनका मन लगता नहीं था, इसलिए एक दिन अचानक इन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी।
आगे 1836 में प्रेस अधिनियम में संशोधन किया गया और समाचार पत्रों को निकालने की अनुमति दे दी गयी, तब इन्होंने भी पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया. 1837 में उन्होंने साप्ताहिक ‘देहली उर्दू अख़बार’ के नाम से अपना समाचार पत्र निकालना शुरू कर दिया। यह देश का दूसरा उर्दू अख़बार था, इससे पहले उर्दू भाषा में ‘जामे जहाँ नुमा’ अख़बार कलकत्ता से निकलता था।
मौलवी मोहम्मद बाकिर का ‘देहली उर्दू अख़बार’ लगभग 21 वर्षों तक जीवित रहा, जो उर्दू पत्रकारिता के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ। इस अख़बार की मदद से मौलवी बाकिर सामाजिक मुद्दों के साथ ही लोगों को जागरूक करने का काम बखूबी अंजाम देने लगे। कहते हैं इस अख़बार का मकसद व्यवसाय करना नहीं, बल्कि यह एक मिशन के तहत काम करता था। इसकी प्रतियों के बिकने पर जो भी पैसे आते, उन्हें मौलवी मोहम्मद बाकिर गरीबों में बाँट दिया करते थे।
इस अख़बार की कीमत मात्र 2 रूपये थी। मौलवी मोहम्मद बाकिर ने अपने अख़बार का आकार भी बड़ा ही रखा था। इसके साथ ही इन्होंने ख़बरों में रूचि पैदा करने और उसको आसानी से पढ़ने योग्य बनाने के लिए अलग-अलग भागों में बाँट रखा था। इस अख़बार में न्यायालय खबर के लिए ‘हुजूर-ए-वाला जबकि, कंपनी की खबर को ‘साहिब-ए-कलान बहादुर’ के तहत और भी भागों में वर्गीकृत किया गया था। इसी के साथ मौलवी मोहम्मद बाकिर उस ज़माने में भी नवीनतम समाचार प्राप्त करने के लिए भरोसेमंद नामा निगार (रिपोर्टर) से भी संपर्क बनाये रखते थे। खास उनसे, जिनकी पहुँच उच्च अधिकारियों तक थी। दिल्ली उर्दू अख़बार राष्ट्र की भावनाओं का प्रचारक था। इसने राजनितिक चेतना को जागृत करने के साथ ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक जुट होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक तरफ मौलवी मोहम्मद बाकिर अपने अख़बार के माध्यम से भारतीयों के अंदर आज़ादी का प्यार जगाने का काम कर थे. दूसरी तरफ सिपाहियों ने 1857 की क्रांति छेड़ दी। यह देखकर मौलवी साहब ज्यादा सक्रिय हो गए।
कहा जाता है कि उन्होंने कई बागी सिपाहियों को मेरठ से दिल्ली बहादुर शाह जफर तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसकी जानकारी अंग्रेजों को हुई तो उनकी नज़रों में वह चढ़ गये। उनका अखबार और उनका जीवन दांव पर लग चुका था। बहरहाल वह डरे नहीं और डटे रहे।

तस्वीर साभार – पीएनएन24

अख़बार के माध्यम से मौलवी कंपनी की लूटमार और गलत नीतियों के खिलाफ खुल कर लिखने लगे। कहते है कि इस अख़बार के तीखे तेवर ने बाकी अख़बारों के संपादकों और लेखकों के अंदर आज़ादी का जोश भर दिया था। वहीं अख़बार में आज़ादी के दीवानों की घोषणा पत्रों और धर्म गुरुओं के फतवे को भी जगह दी जाती। इसके साथ ही लोगों को इसके समर्थन के लिए अपील भी की जाती थी.
इनका अख़बार जहां एक तरफ हिन्दू सिपाहियों को अर्जुन और भीम बनने की नसीहत देता, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम सिपाहियों को रुस्तम, चंगेज़ और हलाकू की तरह अंग्रेजों पर कहर बरपाने की बात करता था।
इसी के साथ बागी सिपाहियों को सिपाही-ए-हिंदुस्तान की संज्ञा भी देता।
अखबार का नाम बदलने से भी पीछे नहीं हटे
मौलवी मोहम्मद बाकिर हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पैरोकार थे। इन्होंने अपने अख़बार की मदद से कई बार अंग्रेजों के सांप्रदायिक तनाव को फ़ैलाने की चालों और उनके मंसूबों को जनता के सामने उजागर किया। यही नहीं सभी धर्मों के लोगों को ऐसी बातों में न उलझकर देश की आज़ादी में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की पुरज़ोर अपील की। इस अख़बार ने 5 जुलाई 1857 के अंक में जामा मस्जिद पर चिपके एक साम्प्रदायिकता फ़ैलाने वाले पोस्टर की छानबीन करके अंग्रेजों के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया था इसी के साथ ही मौलवी मोहम्मद बाकिर ने बहादुर शाह जफ़र को समर्पित करते हुए अपने अख़बार ‘देहली उर्दू अख़बार’ का नाम बदलकर अख़बार-अल-जफ़र कर दिया था।
नाम बदलने के बाद इस अख़बार से अंतिम दस प्रतियाँ और छपी। गौरतलब हो कि मौलवी मोहम्मद बाकिर के अख़बार को अंग्रेजों से लगातार चेतावनी मिलती रही लेकिन इन्होंने इसके बावजूद स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
1857 की क्रांति में कई माओं की गोद सूनी हो गयी। न जाने कितनी औरतों ने अपना पति खो दिया. बावजूद इसके क्रांति की आग जलती रही, जिसको दबाने के लिए अंग्रेजों का दमन लगातार चलता रहा।
उन्होंने बादशाह बहादुर शाह ज़फर को बंदी बनाकर दिल्ली पर अपना दोबारा कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद ब्रिटिश ताकतों ने एक-एक भारतीय सिपाहियों को ढूंढ-ढूंढ कर कालापानी, फांसी और तोपों से उड़ाने का काम करने लगी।
इसी के साथ अंग्रेजों ने 14 सितम्बर 1857 को मौलवी मोहम्मद बाकिर को भी गिरफ्तार कर लिया और इन्हें 16 सितम्बर को कैप्टन हडसन के सामने पेश किया गया। उसने मौलवी मोहम्मद बाकिर को मौत की सजा का फरमान सुनाया।

इसके तहत दिल्ली गेट के सामने मौलवी को तोप से उड़ा दिया गया। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि इनको तोप से नहीं बल्कि फांसी दी गयी थी।

(साभार – रोर मीडिया)

भवानीपुर कॉलेज में दो दिवसीय चित्रकला कार्यशाला

कोलकाता : भवानीपुर कॉलेज में वाटर कलर के द्वारा चित्रकला एवं रंगों के संयोजन को वेपर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया , सुप्रसिद्ध कलाकार और वाटर कलर की कला में निपुण डॉ अमेय पारेख के लिए लगभग 80 विद्यार्थियों को ऑनलाइन स्केच और उसमें रंग भरना सिखाया। किसी ने खूब कहा है कि वाटर कलर एक ऐसी भौतिकी जीवन की धारा है जो स्वयं के चरित्र का दर्पण है उसे अप्रत्याशित और रंगीन होने दें। पैंटिग एक कला है जो कलाकार की भावनाओं का चित्रण करती है वास्तविकता से बचने और उसमें गोते लगाने के माध्यम से संदेश को चित्रित करने का एक तरीका है। यदि मैं नहीं तो वह है जो लोगों की कल्पना का अंकन करता है जो उन्होंने कभी नहीं सोचा। रंगों के स्केच और पैंटिग जैसे रंगों का जादू है द्रव्य रंगों से अद्भुत कृति बन जाती है। डॉ. अमेय पारेख के निर्देशन में विद्यार्थियों ने जलीय रंगों के द्वारा ब्रश को चलाने के विभिन्न तरीकों को सीखा। धैर्य और संयम से भरे विद्यार्थियों ने पैंटिग को जूम पर बनाना सीखा जो एक अलग अनुभव है।
प्रकृति में पहाड़ी क्षेत्र और समतल धरती का सामंजस्यपूर्ण बंटवारा करने में वाटर कलर के रंग बहुत ही माहिर होते हैं बशर्ते अच्छी तरह से किया जाय अन्यथा पैंटिग के बिगड़ने का डर रहता है। यह बहुत ही बारीकी का काम है जिसे डॉ पारेख ने बहुत ही गंभीरता और सरलता से समझाया। दो दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में विद्यार्थियों ने पैंटिग भी बनाई।
वाटर कलर वर्कशॉप का उद्घाटन किया भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने किया जिनके प्रयास से इस कार्यशाला को आयोजित किया। सार्थक बाधवा, जलक शाह, गौरव किल्ला का सक्रिय सहयोग रहा। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो. दिव्या ऊडीसी, डॉ. वसुंधरा मिश्र की उपस्थिति रही। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

कोविड -19 के खिलाफ टीकाकरण को गति प्रदान करेगी नयी नीति: एसोचैम

कोलकाता : एसोचेम का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित कोविड वैक्सीन टीकाकरण की लागत का 75 प्रतिशत केंद्र के साथ टीके की खरीद का निर्णय कारगर साबित होगा। यह भारत के टीकाकरण कार्यक्रम को गति प्रदान करेगा। यह राज्यों को लड़ने के लिए अधिक संसाधनों के साथ छोड़ देगा। एसोचेम का मानना है कि “प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संबोधन ने भारत के टीकाकरण कार्यक्रम को एक स्पष्ट दिशा प्रदान की है, जिसका उद्देश्य सभी वयस्कों को मुफ्त टीकाकरण सुविधा प्रदान करना है, जबकि निजी क्षेत्र के अस्पतालों के माध्यम से भुगतान करने के इच्छुक लोगों के लिए एक खिड़की प्रदान करना है। संशोधित नीति सभी प्रक्रियात्मक बाधाओं को दूर करेगी। एसोचैम के महासचिव दीपक सूद ने कहा कि प्रधानमंत्री अन्न कल्याण योजना के विस्तार, 80 करोड़ लोगों को दिवाली तक मुफ्त राशन उपलब्ध कराने से समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में खाद्य सुरक्षा की भावना पैदा होगी। “निर्णय से प्रवासी कामगारों को शहरों में वापस लौटने में भी मदद मिलनी चाहिए क्योंकि कोरोनोवायरस के मामले में काफी कमी आई है और कई राज्यों में अनलॉक करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है”। सूद ने कहा कि “व्यवसायों को फिर से शुरू करने में सक्षम बनाने के लिए विंडो कॉरपोरेट्स को अपने कार्य बल का टीकाकरण कराने में मदद करने वाली साबित हुई है”। उन्होंने कहा, एसोचैम यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार के साथ काम करना जारी रखेगा कि लोगों की पूरी सुरक्षा के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था को जल्द से जल्द फिर से शुरू किया जाए।

बीएचएस में शिक्षकों के लिए ऑनलाइन अंताक्षरी

कोलकाता : महामारी की बोरियत के बीच आशा की कुछ नई धुन लाने के लिए, बिड़ला हाई स्कूल ने 4 जून, 2021 की शाम को शिक्षकों के लिए एक ऑनलाइन अंताक्षरी ‘ए म्यूजिकल पाठशाला’ का आयोजन किया था। अंताक्षरी की मेजबानी पूर्व छात्र, मि. रजत बैद ने की। वे शहर में अंताक्षरी के क्षेत्र में पहचान बना चुके हैं।
इस ऑनलाइन कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए शिक्षक रोमांचित और उत्साहित थे। उन्होंने श्री बैद द्वारा आयोजित हर दौर को गाया और आनंद लिया। हालांकि सभी आठ टीमों ने एक मजबूत मधुर लड़ाई लड़ी थी, पहला स्थान टीम ‘ई-नोट’ ने हासिल किया था जिसमें रोहन सेनगुप्ता, रिया खेतान और स्पंदन बनर्जी शामिल थे।
इस कार्यक्रम में प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया और कार्यक्रम तब जीवंत हो गया जब मेजर जनरल वीएन चतुर्वेदी, कर्नल बेरा, मुक्ता नैन, फरीदा सिंह और लवलीन सैगल द्वारा कुछ पंक्तियों को गाया गया।

बीएचएस के पूर्व छात्रों ने की यास पीड़ितों की सहायता

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल के पूर्व छात्र 09 जून 2021 को यास चक्रवात के कारण प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए सुंदरबन गए थे। उपाध्यक्ष सचिन सराफ के नेतृत्व में टीम नीरज चौधरी, शैलेश गनेरीवाला और अमित चिरावाला के साथ गयी थी। गोसाबा-सुंदरबन में स्थित धुल्की और सोनागांव में राशन, दवाइयां, पानी, शुद्धिकरण द्रव, कपड़े और अन्य आवश्यक सामान। इन 2 गांवों के 250-300 परिवारों को सहायता प्रदान की गयी। यह विजयनगर हाई स्कूल के प्राचार्य श्री सुकुमार पैरा और गोसाबा के एक स्थानीय निवासी की मदद के बिना संभव नहीं होता। पूर्व छात्रों ने 2 पानी पंप भी प्रदान किए हैं जिनका उपयोग ताजे पानी के तालाबों से खारा निकालने के लिए किया जाना है
पूर्व छात्र उन सभी के लिए आभारी हैं जिन्होंने इस नेक काम में योगदान दिया है।