कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘काबुल:तब और अब’ विषय पर एक ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अफगानिस्तान और भारत के बीच प्राचीन काल से बने ऐतिहासिक संबंध को याद किया गया। इस वेबिनार में सभी धर्मों के लेखकों ने अफगानिस्तान में जारी हिंसा, आतंक और भय पर चिंता व्यक्त करते हुए इस देश में भारत द्वारा किए गए विकास कार्यों को याद किया। सभी ने सुरक्षा, शांति तथा लोकतंत्र की पुनःप्रतिष्ठा की कामना की। परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने साहित्यकारों का स्वागत करते हुए कहा कि हमें कभी ऐसा लगा नहीं कि अफगानिस्तान भारत में नहीं है। वहां के इतने खूबसूरत लोग, इतने बढ़िया मेवा, वहां के बर्फ़ से ढके पहाड़ मुझे हर क्षण बद्रीनाथ, केदारनाथ और कश्मीर की वादियों में पहुँचाते रहे हैं। युवा आलोचक आशीष मिश्र ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दे को साहित्यिक दृष्टि से देखते हुए कहा कि राजनीति का देश और कलाओं का देश हमेशा एक नहीं हो सकता। वह अलग-अलग होता है। राजनीति का देश बहुत सीमित होता है और कलाओं का देश बहुत सुविस्तृत होता है और सामान्यतः पूरी मनुष्यता तक फैला हुआ होता है। वरिष्ठ कवि शहंशाह आलम ने भारत-अफ़ग़ान की मैत्रीपूर्ण रिश्तों की गर्माहट को महसूसते हुए कहा कि अफ़ग़ान और भारत का जो मानवीय रिश्ता है, वह बना रहना चाहिए और वहां की मौजूदा स्थिति पर नजरें टिकाएं रखने की जरूरत है। इस अवसर पर उन्होंने ‘काबुलीचना’ कविता का पाठ किया। कहानीकार तबस्सुम निहां ने मुख्यतः वहां की महिलाओं की वर्तमान स्थिति पर कहा कि जिस तरह तालिबानी वहां की महिलाओं के अधिकारों का हनन कर रहे हैं, ऐसे हालात में वहां की महिलाओं पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है। भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ शम्भुनाथ ने कहा कि “एशिया में गौतम बुद्ध हुए थे और उन्होंने शांति, अहिंसा और मैत्री की बात की थी। एशियाई देशों के खिलाफ साजिश से निपटने के लिए सारे बुद्धिजीवियों, मानवताप्रेमियों और सभी धर्मों के लोगों को एक स्वर में प्रतिरोध करना होगा।” कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य में सृजन एक गहरी बेचैनी का मामला है और आज हमारे पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं, वह पूरी तरह मानवजाति और लोकतंत्र पर एक हमले की तरह है। इस अवसर पर देशभर से साहित्य और संस्कृति प्रेमियों ने हिस्सा लिया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ केयूर मजूमदार ने दिया।
माधव ही उद्धार करें

त्रेता युग से कलयुग तक,
हर भारतवासी याद करें,
जब संकट आए भारत पर,
माधव ही उद्धार करें।
द्रौपदी की लाज बचाई,
शांतिदूत भूमिका निभाई,
विराट रूप दिखा दुर्योधन को,
अपनी सही पहचान बताई।
हे नंदनंदन भारत को अब,
तुम्हारी बहुत जरूरत है,
युद्ध चाहने वालों को,
समझाने की जरूरत है।
भारत रथ के सारथी बनकर,
अर्जुन की तरह संभालो केशव,
हो तम का नाश उजाला फैले,
यही अर्चना करते माधव।
भारतवासी करें यह वंदन,
अत्याचारों का कर दो खंडन,
स्वीकार करो प्रभु यह अभिनंदन,
करें हाथ जोड़ यही आराधन।
11वें तुरिया टॉक्स की अतिथि बनीं गायिका अनुराधा पौडवाल
कोलकाता : तुरिया टॉक्स के 11वे प्रकरण में अतिथि के रूप में अनुराधा पौडवाल मौजूद रहीं। जहाँ वे अपने जीवन के बारे में एक गायिका और एक जनहितैषी के रूप में बात करती हैं। जानी – मानी पार्श्वगायिका यानी प्लेबैक सिंगर के रूप में अनुराधा पौंडवाल एक प्रख्यात नाम हैं। उनको पद्मश्री, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्म फेयर जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं। वे कई कल्याणकारी संगठनों की संस्थापक भी हैं जो पूरे भारत में चिकित्सा केंद्रों और वंचित समुदायों को दान देती हैं। इस संवाद सत्र में उन्होंने अपनी गायकी के दिनों की यादें ताजा कीं और अपने परिश्रम तथा इस क्षेत्र की चुनौतियों पर बात की। बातचीत में संगीत उद्योग, राजनीति समेत कई अन्य मुद्दों पप चर्चा करते हुए आज के गायकों और गीतों पर अपने विचार साझा किये। पौंडवाल ने विद्यालयों के लिए मुम्बई में आयोजित अपने मौजूदा धन संचय अभियान के बारे में तूरिया टॉक्स के इस संवाद सत्र में जानकारी दी। यह विद्यालय हाल ही मे राज्य मे आए चक्रवात और चल रही कोविड महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। उन्होंने साझा किया की लोग कैसे उनकी इस कार्य में सहायता कर सकते हैं और दान कैसे दे सकते हैं। वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं पर उन्होंने अपनी बात रखी। अनुराधा पौंडवाल ने तूरिया टॉक्स की सराहना करते हुए शुभकामनाएँ दीं।
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम
अध्यात्म जगत में 14 विद्याएं और 64 कलाएं होती हैं जिसमें श्रीकृण पारंगत हैं। विद्या दो प्रकार की होती है परा और अपरा विद्या। इसी तरह कलाएं भी दो प्रकार की होती है। पहली सांसारिक कलाएं और दूसरी आध्यात्मिक कलाएं। भगवान श्रीकृष्ण सांसारिक और अध्यात्मिक दोनों ही तरह की विद्या और कलाओं में पारंगत थे।
1. श्रीकृष्ण के गुरु मानते थे उन्हें अपना गुरु : भगवान श्रीकृष्ण के सबसे पहले गुरु सांदीपनी थे। उनका आश्रम अवंतिका (उज्जैन) में था। देवताओं के ऋषि को सांदीपनि कहा जाता है। वे भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा के गुरु थे। उन्हीं के आश्रम में श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा के साथ ही 64 कलाओं की शिक्षा ली थी। गुरु ने श्रीकृष्ण से दक्षिणा के रूप में अपने पुत्र को मांगा, जो शंखासुर राक्षस के कब्जे में था। भगवान ने उसे मुक्त कराकर गुरु को दक्षिणा भेंट की। इसके अलावा श्रीकृष्ण के गुरु नेमिनाथ, वेदव्यास, घोर अंगिरस, गर्ग मुनि और परशुराम भी थे। परंतु ये सभी श्रीकृष्ण को ही अपना गुरु मानते थे। भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य भी उनकी पूजा करते थे।
2. पूर्णावतार : भगवान श्रीकृष्ण का भगवान होना ही उनकी शक्ति का स्रोत है। वे विष्णु के 10 अवतारों में से एक आठवें अवतार थे, जबकि 24 अवतारों में उनका नंबर 22वां था। उन्हें अपने अगले पिछले सभी जन्मों की याद थी। सभी अवतारों में उन्हें पूर्णावतार माना जाता है।
3. श्रीकृष्ण के शिष्य : अर्जुन सहित पांचों पांडवों को श्रीकृष्ण ने समय- समय पर शिक्षा दी है। उन्होंने अर्जुन और उद्धव को गीता का ज्ञान दिया था। महाभारत में श्रीमद्भगवद गीता, अनु गीता और उद्धव गीता नाम से प्रसिद्ध गीताएं श्रीकृष्ण के ही प्रवचन हैं।
4. माना जाता है पूर्णावतार : 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्वरतुल्य होता है या कहें कि स्वयं ईश्वर ही होता है। पत्थर और पेड़ 1 से 2 कला के प्राणी हैं। पशु और पक्षी में 2 से 4 कलाएं होती हैं। साधारण मानव में 5 कला और स्कृति युक्त समाज वाले मानव में 6 कला होती है। इसी प्रकार विशिष्ठ पुरुष में 7 और ऋषियों या महापुरुषों में 8 कला होती है। 9 कलाओं से युक्त सप्तर्षिगण, मनु, देवता, प्रजापति, लोकपाल आदि होते हैं। इसके बाद 10 और 10 से अधिक कलाओं की अभिव्यक्ति केवल भगवान के अवतारों में ही अभिव्यक्त होती है। जैसे वराह, नृसिंह, कूर्म, मत्स्य और वामन अवतार। उनको आवेशावतार भी कहते हैं। उनमें प्राय: 10 से 11 कलाओं का आविर्भाव होता है। परशुराम को भी भगवान का आवेशावतार कहा गया है। भगवान राम 12 कलाओं से तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं से युक्त हैं। यह चेतना का सर्वोच्च स्तर होता है। इसीलिए प्रभु श्रीकृष्ण जग के नाथ जगन्नाथ और जग के गुरु जगदगुरु कहलाते हैं।
5. गोपियों को दिया ज्ञान : कहते हैं कि श्रीकृष्ण के माध्मम से हजारों गोपियों ने ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष की प्राप्ती की। वृंदावन में ऐसी भी गोपियां थीं जो पिछले जन्म में ऋषि थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से भक्तियोग सीखने के लिए ही गोपी रूप में जन्म लिया था।
6. सभी तरह का दिया ज्ञान : श्रीकृष्ण ने संसार को सभी तरह का ज्ञान दिया। उन्होंने कर्मयोग, ज्ञानयोग, तंत्रयोग के साथ ही भक्ति योग की शिक्षा भी दी। उन्होंने संसार में जीवन और संन्यास में धर्म की शिक्षा भी दी।
7. सखा भी और गुरु भी : श्रीकृष्ण अपने भक्तों के सखा भी और गुरु भी हैं। वे सखा बनकर गुर ज्ञान देते हैं। उनके हजारों सखाओं की कहानियों को जानने से यह भेद खुल जाता है।
(साभार – वेबदुनिया)
मथुरा : वह भूमि जहाँ, श्रीकृष्ण ने लिया था जन्म
मथुरा उत्तर प्रदेश जिले में यमुना नदी के तट पर बसा एक सुंदर शहर है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था। जानते हैं जन्मभूमि मंदिर की अनसुनी 10 बातें –
1. कथाओं के अनुसार श्रीकृष्ण प्रपौत्र व्रजनाभ ने ही सर्वप्रथम उनकी स्मृति में केशवदेव मंदिर की स्थापना की थी।
2. इसके बाद यह मंदिर 80-57 ईसा पूर्व बनाया गया था। इस संबंध में महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी ‘वसु’ नामक व्यक्ति ने यह मंदिर बनाया था।
3. काल के थपेड़ों ने मंदिर की स्थिति खराब कर दी। करीब 400 साल बाद गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उसी स्थान पर भव्य मंदिर बनवाया। इसका वर्णन भारत यात्रा पर आए चीनी यात्रियों फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी किया है।
4. ईस्वी सन् 1017-18 में महमूद गजनवी ने मथुरा के समस्त मंदिर तुड़वा दिए थे, लेकिन उसके लौटते ही मंदिर बन गए।

5. बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया।
6. यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था, जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला।
7. ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जू देव बुन्देला ने पुन: इस खंडहर पड़े स्थान पर एक भव्य और पहले की अपेक्षा विशाल मंदिर बनवाया। इसके संबंध में कहा जाता है कि यह इतना ऊंचा और विशाल था कि यह आगरा से दिखाई देता था।
8. इसके बाद मुस्लिम शासकों ने सन् 1669 ईस्वी में इस मंदिर को नष्ट कर इसकी भवन सामग्री से जन्मभूमि के आधे हिस्से पर एक भव्य ईदगाह बनवा दी गई, जो कि आज भी विद्यमान है।
9. इस ईदगाह के पीछे ही महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी की प्रेरणा से पुन: एक मंदिर स्थापित किया गया है।
10. कहते हैं कि अब जन्मभूमि के आधे हिस्से पर ईदगाह है और आधे पर मंदिर है।
(साभार – वेबदुनिया)
कान्हा को लगाएँ मिष्ठान व प्रसाद का भोग
मावा मिश्री की मिठाई
सामग्री : 2 लीटर दूध, 350 ग्राम शक्कर, बादाम, काजू, पिस्ता कतरन पाव कटोरी, आधा चम्मच इलायची पाउडर।

विधि : दूध को एक मोटे तले वाले बर्तन में गाढ़ा होने तक उबालें। तत्पश्चात उसमें शक्कर डालकर अच्छी तरह मिलाएं और पूरी तरह गाढ़ा होने दें। ऊपर से इलायची व मेवा की कतरन डाल दें। अब दूध को ठंडा करके ट्रे में भर दें। इस दूध में जितने अधिक रेशे पड़े वह उतना ही जायकेदार होता है। अब दूध से निर्मित मिठाई मावा-मिश्री से भगवान को भोग लगाएं और घर आए मेहमानों को सर्व करें। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये बिना फ्रीज के भी दो दिन तक सुरक्षित रखी जा सकती है।
बेसन पंजीरी
सामग्री : 100 ग्राम बेसन (चना आटा), शक्कर बूरा 150 ग्राम, मेवा कतरन 100 ग्राम, पाव कटोरी खसखस, चारोली 50 ग्राम, गोंद 25 ग्राम, घी 200 ग्राम, पिसी इलायची पाव चम्मच।

विधि : घी को गरम कर गोंद तलकर रख लें। गरम घी में बेसन डालकर मध्यम आंच पर हल्का लाल होने तक सेंके। उसे थोड़ी देर ठंडा होने के लिए रख दें। अब उसमें शक्कर बूरा, खसखस, चारोली, तली गोंद व इलायची पावडर डालकर मिश्रण को एकसार कर लें। तैयार पंजीरी में मेवों की कतरन बुरक दें और सर्व करें।
औरतें जो तौलिया इस्तेमाल नहीं करतीं

क्या तौलिये का भी होता है जनाना मरदाना इस्तेमाल?
तो क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल तौलिया??
आयी होगी हँसी बहुतों को
कइयों ने देखा होगा कनखियों से चेहरा बिचकाए
मुझे भी लगा था समय विश्वास करने में
की थी मैंने गहरी खोजबीन और
इंतजार कि शायद ये उटपटांग-सा शीर्षक बदल ले खुद को।
घर के तमाम कपड़े धोती
परिवेश बनाती निभाती
औरतों के जीवन में नहीं है एक अदद तौलिया।
कर रखा हैं उन्होंने स्वयं को बहिष्कृत
तौलियों की जरूरी रंगीन दुनिया से
लेकिन क्यों
क्या हम-आप पहचानते हैं ऐसी औरतों को
जो मुँह अंधेरे उठती हैं, पीती हैं गरमा-गरम लेकिन
थोड़ी-सी चाय और लग जाती हैं
गुछाने अपना संसार
जो कई बार कुछ बर्तनों को मांजने की बजाय
बस खंगलाकर चला लेती हैं अपना काम जैसे तैसे
कपड़े धोती तो हैं लेकिन निचोड़ने की बजाय
टांग देती हैं उन्हें खूटियों पर यों ही घंटों
खा लेती हैं थाली की बजाय कटोरियों
में खाना खड़े-खड़े यहां-वहां
हड़बड़ी इतनी कि पता ही नही चलता कि
बनाने और खाने के बाद भी खाना क्या था और बना कैसा था
उन्हें जैसे नहीं आता तौलिये का इस्तेमाल वैसे ही नहीं आता थाली को बरतना
जबकि बरतती हैं वे दुनिया जब तब।
पहनती हैं ऊँची साड़ियाँ और आकार विहीन ब्लाउज़
इस आकारहीनता में बचा लेती हैं आज़ादी
और रफ़्तार की सुविधा
यानी उनका पूरा तंत्र दौड़ता है
और समय नही है उनके पास कि
गुछा लें खुद को एक पल ठहर कर।
ऐसे ही यकबयक दिख जाते हैं उन्हें गालों पर पड़ते
सुफ़ैद चक्कत्ते, जो जब चाहे चले आते हैं घूम फिर कर
बना देते हैं उन्हें बेहद बदसूरत।
ऐसे ही पिछली बार भी आ पड़े थे मरे
और मलीं गयीं थी वही दो दवाइयां जो दी
थी बूढ़े कमजोर डॉक्टर ने।
इन धब्बों को देख वो हर समय खुद को कोसती हैं
कि पहले क्यों नहीं दिख गये उन्हें ये दाग
हर बार देखने में देर कैसे हो जाती है
तो क्या वे कभी ठीक से अपना चेहरा भी नहीं देखती
इतनी बेकद्री खुद की…क्यों
इतने सारे क्यों और क्या उन्हें बेचैन कर देते हैं।
जैसे खाने के कौर में फंसे किरकिराते पत्थर को हम बाहर फेंकने की बजाय निगल लेते हैं उसी तरह वे भी निगल जातीं हैं सारे सही सवालों और उनके गलत जवाबों को
और फिर से वे उन्हीं दो पुरानी दवाइयों की खोज में गाफ़िल हो जाती हैं
लाख खोजबीन के बाद मिली दवाइयों में एक दो हज़ार बीस में ही मर चुकी है
फिर खरीदनी पड़ेगी और ये फिर न जाने कब आएगा।
जरूरी चीजों की लिस्ट में शामिल हो जाती है ये दवा जो जब आएगी तब आएगी और तब ही लगेगी।
वे हर बार पहनती हैं स्वेटर उल्टा , ब्लाउज उल्टा।
इतनी बार, बार-बार उल्टा कि आप अगर ध्यान दें तो खीझ उठें कि कभी तो उलट कर पहना गया उल्टा स्वेटर , उल्टा ब्लाउज भूल से सीधा भी हो जाता होगा..
फिर सीधा क्यों नहीं दिखता कभी तन पर
क्या जब स्वेटर या ब्लाउज की तह सीधी होती है तो
बस आदतन ये औरतें उन्हें उलटकर पहन लेती हैं
सीधा और चलन का निभा नहीं कभी इनसे
इसलिए अनजाने ही जानी बूझी उल्टी राह पकड़ ली बस।
ये वही हैं जो सीखा ही नहीं पायी बच्चों को खाने का सऊर।
उन्हें बखूबी मालूम है भोजन की सियासत, अपनी रामकहानी में सीता की त्रासदी और राम का जयकार ।
इसलिए बेटों को पहाड़ भर ऊचां देती हैं भात, भर-भर कटोरियाँ दाल, सब्जी, अंडे
यह जानते हुए कि आदमजात इतनी खा तो नहीं पाएंगे लेकिन उन्होंने पलटकर न माँगा तो भूखे रह जायेंगे,
बेटों को मांगने की आदत नहीं और
मर्दों का भूखा रहना अच्छी बात नहीं।
बची जूठन, जो बच ही जाती है हमेशा, तो बेटियाँ बहुएँ हैं ना..
जिन्हें देती हैं खाना बेटों की छोड़ी जूठी थाली में छितराकर बेहद भद्दे तरीके से
पंछोछर सब्जी सबसे पहले देती हैं और उसके बाद पानी मारी हुई मरी हुई दाल
बाकि सब्जियां बेटे के बाद खुद को परोसती नहीं बल्कि सबके सामने, सबको ललचाते हुए छिपाकर खाती हैं
इससे तृप्त होती है उनकी आत्मा।
उन्होंने देखा है अपनी पुरनिया गिहथिनों को ऐसे ही घर बनाते, सत्ता संजोते
उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता जब उसके दिए पनियाले दूध से चाय बनाते हुए बहु-बेटियों के लिए चाय ही नहीं बचती
उनके अंदाजे का लोहा सारे कुल-खानदान के लोग ऐसे ही थोड़ी ना मानते हैं
उन्हें मालूम है कि कुल की डोर लड़के खींचते हैं और लड़कियां तो गांठ हैं जितनी कम पड़े उतना ही अच्छा
न पड़े तो धन्नभाग
इसीलिए उनके कुल में बेटे लड़कियाँ बियाते नहीं बियाह करके लाते है
उन्हें पसंद नहीं ये नामाकूल बहुएँ-बेटियाँ-अलाय बलाय
वैसे ही जैसे नहीं भाते उन्हें चेहरे के वो सुफ़ैद चकत्ते जो आ ही जाते है जब तब
जैसे वो भूल जाती है बार-बार देखना अपना ही चेहरा
और जैसे उन्हें कभी नहीं आया थाली को बरतना।
वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय, कोलकाता केंद्र में प्रवेश प्रक्रिया आरंभ
कोलकाता : केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले शिक्षण संस्थान महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के साल्ट लेक, सेक्टर-3 स्थित क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में नए सत्र 2021 के लिए प्रवेश प्रक्रिया आरंभ हो गई है। केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि पिछले वर्ष आवेदनों की संख्या को देखते हुए इस बार एम.ए. हिंदी साहित्य में रिक्त सीटों की संख्या बढ़ाकर 30 (अनारक्षित-12, ईडब्ल्यूएस-03, ओबीसी-08, एससी-05, एसटी-02) कर दी गई है। इसके अतिरिक्त एम.ए. हिंदी (तुलनात्मक भारतीय साहित्य)-10, एम.ए. हिंदी अनुवाद-15 एवं अनुवाद में पीजी डिप्लोमा-15 के लिए भी आवेदन पत्र भरे जा रहे हैं। ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2021 है। विवरणिका एवं अन्य जानकारी के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.hindivishwa.org का अवलोकन किया जा सकता है। कोलकाता केंद्र के फेसबुक प्रोफाइल Mgahv Kolkata Centre से भी आवश्यक सूचनाएँ जारी की जाती हैं।
रवीन्द्रनाथ के साहित्य में अशोक के फूलों की छटा

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा – निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा है।
कवि गुरु के गीत मनुष्य को एक अतिन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाते हैं। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करती है अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर माधुर्य भाव गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
आइए अशोक या बंजुल फूल के विषय में जानते हैं – – –
कामदेव के पंचशरों में से एक अशोक का फूल है। वसंत के आगमन के साथ ही इसमें नए किसलयों का आगमन होता है। ताम्र वर्णीय होने के कारण इसे ताम्रवर्णी भी कहते हैं। वसंतागमन के साथ ही फूल खिलते हैं और ग्रीष्मकाल तक रहते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में संतरी आभा से युक्त लाल या पीले रंग के अशोक के फूल धीरे-धीरे सिंदूरी या गाढ़े रक्त वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं। अशोक के फूलों के रंग में एक उन्माद एवं उच्छलता भरे भाव होते हैं जिसका वर्णन अनेक गीतों में हुआ है।
फूलों में स्थित पुंककेशरों में पतले धागों की तरह कई पुंदंड होते हैं। उनके शीर्ष भाग में परागधानी या पराग रेणु का कक्ष होता है। इन केशरों का जड़ भाग नारंगी और शीर्ष भाग लाल रंग का होता है। फूलों के रंग में परिवर्तन का यही छंद चलता रहता है। परागधानी से लाल परागरेणु खिलकर धरती पर फैल जाते हैं। रवीन्द्र नाथ ने प्रकृति पर्याय के एक गीत 230 में इसका वर्णन आया है। मंजरीबद्ध यह फूल प्रचुर परिमाण में प्रस्फुटित होते हैं, साथ ही पंक्तियाँ भी असंख्य मात्रा में रहती हैं। कई बार सुंदर अशोक मंजूरियाँ खिलकर वलय शोभित भुजाओं के समान शाखाओं को घेर लेती हैं। जिसका उल्लेख कवि ने इस पंक्ति में किया है – –
‘अशोकेर शाखा घेरि वल्लरी बंधन’ अर्थात् अशोक की शाखाओं को घेरकर प्रस्फुटित मंजरियाँ लताओं सी उसे अपने बंधन में बाँधे हुए हैं। यह चित्रांगदा के षष्ठ दृश्य में आया है। सूर्य के प्रकाश में फूलों का रंग अधिक स्पष्ट हो जाता है और दिन के ढलने के साथ ही पत्तियों की छाया में फूलों की स्पष्टता विलीन होती चली जाती है। तभी तो कवि अशोक के फूल को लक्ष्य कर उसे ‘आलोकपियासी ‘(गीत प्रेम 215) अर्थात् आलोक पिपासु कहता है। इसकी शाखाओं की प्रकृति हल्की, पत्तियाँ बड़ी बड़ी शाखाएँ फूल पत्तियाँ हवा के स्पर्शमात्र से ही आंदोलित हो उठती हैं। क्षणभंगुर इसके फूल दिन ढलने के पश्चात परागरेणु के साथ पेड़ से झड़़कर धरती पर बिखर जाते हैं।
अशोक के फूलों से बने सुंदर आभूषण युवतियों के सिर , कानों एवं गले में सुशोभित होते हैं। गीत – प्रेम 224 में आया है। चंडालिका में फूल बेचने वाली मालिन अशोक के फूलों के अलंकार बेचती हुई दिखाई देती हैं।
प्रकृति जिस प्रकार वसंत में पत्र पुष्प गंध से परिपूर्ण अशोक वृक्ष पर बार बार गर्वित होती है, उसी प्रकार मानव जीवन के वसंत से भी अशोक वृक्ष का युगों से अटूट संबंध जुड़ा हुआ है।
अशोक वृक्ष प्रेमोद्दीपक और कामोद्दीपक भी है। इसकी मृदु गंध मनमोहक रूप एवं मादक स्पर्श के असंख्य वर्णन रवींद्र संगीत में मिलते हैं। रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा?
राजनर्तकी श्यामा वज्रसेन के प्रेम को प्राप्त करने के लिए राजमहल का त्याग करती है। उस समय कोटाल (कोतवाल) चिल्लाते हुए कहता है – –
‘वन हते केन गेल अशोक मंजरी फाल्गुनेर अंगन शून्य करि’
राजनर्तकी श्यामा अशोक फूल के ही समान एक रूपायित कामना है जो राजमहल रूपी उद्यान से चली गई है। उसका चले जाना फागुन में अशोक मंजरी का वन से लुप्त होने का अर्थ है कि वातावरण में शून्यता छा गई है।
रवीन्द्र संगीत में अशोक का बहुत प्रयोग हुआ है – – -रांगा हासि राशि राशि अशोके पलाशे, विगत वसंतेर अशोक रक्तरागे, आन माधवी मालती अशोकमंजरी आदि बहुत से गीतों में रवीन्द्रनाथ ने अशोक का प्रयोग किया है। (रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल, पृष्ठ-2-5)
उड़िया लेखिका यशोधरा मिश्रा को साहित्य अकादमी पुरस्कार – 2020
भुवनेश्वर: लेखिका,कवियित्री और शिक्षाविद यशोधरा मिश्रा को उनकी पुस्तक ‘समुद्रकुल घर’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार – 2020 से सम्मानित किया जाएगा। अकादमी ने मंगलवार को उड़िया और मलयालम भाषाओं के लिए पुरस्कारों की अधिसूचना जारी की। मिश्रा की पुस्तक का चयन तीन सदस्यीय उड़िया भाषा जूरी द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर किया गया था, जिसमें लेखक डॉ. बीनापानी मोहंती, डॉ. प्रतिभा सत्पथी और रमाकांत रथ शामिल थे। अकादमी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि मिश्रा को बाद में एक पट्टिका और एक लाख रुपये के नकद पुरस्कार के रूप में पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। मिश्रा, जिनके पास लघु कथाओं, उपन्यासों, कविताओं और अनुवादित कार्यों के लगभग 15 संग्रह हैं, ओडिशा साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हैं। वह साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘भारतीय साहित्य, भारत की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका’ की संपादक बनने वाली पहली महिला हैं। अमेरिकी साहित्य में पीएचडी, वह मध्य प्रदेश सरकार के तहत अंग्रेजी की प्रोफेसर रही हैं; मेसन डी साइंस, पेरिस में विजिटिंग फेलो, यूजीसी के सीनियर रिसर्च फेलो और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, शिमला में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो के रूप में कार्यरत रही हैं।




