Thursday, October 29, 2026
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शुभजिता पर कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव का आरम्भ बहुरंगी रेखाचित्र संसार के साथ

पलक गुप्ता

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी में जब कि कुछ ही दिन रह गये हैं…शुभजिता पर हम उत्सव आरम्भ कर रहे हैं 13 साल की पलक गुप्ता की चित्रकला प्रतिभा के साथ। पलक नैहाटी में रहती हैं। जन्माष्टमी उत्सव की जानकारी तो आपको हम शीघ्र ही देंगे मगर इस समय तो आप देखिए और सराहिए कि इतनी कम उम्र में इस बच्ची ने कितनी खूबसूरती से श्रीकृष्ण और उनके संसार को अपनी कला में सहेजा है।

 

बाल गोपाल
राधा
एक सुन्दर रेखाचित्र
सुन्दर परिकल्पना
राधा
राधा -कृष्ण
श्रीकृष्ण

17 साल की शैली सिंह ने अंडर-20 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप जीता रजत

नैरोबी : लंबी कूद की प्रतिभाशाली खिलाड़ी शैली सिंह गत रविवार को यहां अंडर-20 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक के साथ इतिहास रचने से एक सेंटीमीटर से चूक गयीं लेकिन उन्होंने रजत पदक हासिल किया। सत्रह साल की इस भारतीय खिलाड़ी ने 6.59 मीटर की कूद के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया।
स्वीडन की मौजूदा यूरोपीय जूनियर चैम्पियन माजा अस्काग ने 6.60 मीटर के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। दिग्गज लंबी कूद खिलाड़ी अंजू बॉबी जॉर्ज की शिष्या शैली प्रतियोगिता के आखिरी दिन तीसरे दौर के बाद तालिका में शीर्ष पर थी लेकिन स्वीडन की 18 साल की खिलाड़ी ने चौथे दौर में उनसे एक सेंटीमीटर का बेहतर प्रदर्शन किया, जो निर्णायक साबित हुआ। यूक्रेन की मारिया होरिएलोवा ने 6.50 मीटर की छलांग के साथ कांस्य पदक जीता। शैली स्पर्धा के बाद अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकीं और उन्होंने नम आंखों के साथ कहा, ‘ मैं 6.59 मीटर से भी बेहतर कूद सकती थी और स्वर्ण जीत सकती थी। मेरी मां ने मुझे स्वर्ण पदक के बाद स्टेडियम में गाए जाने वाले राष्ट्रगान के बारे में बताया था (लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी)।’
उन्होंने कहा, ‘मैं 17 साल की हूं, मैं अगली अंडर 20 विश्व चैम्पियनशिप (काली, कोलंबिया) में स्वर्ण पदक जीतना चाहती हूँ। अगले साल एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होना है और मैं उन प्रतियोगिताओं में अच्छा करना चाहती हूं।’
उनके कोच बॉबी जॉर्ज कहा कि छलांग लगाने के बाद नीचे आते समय उससे मामूली तकनीकी चूक हो गयीं , नहीं तो वह स्वर्ण जीत सकती थीं। उन्होंने कहा, ‘वह स्पर्धा के बाद रो रही थी, उसे पता था कि वह स्वर्ण जीत सकती थी। छलांग से नीचे आते समय कुछ तकनीकी समस्या हो गई नहीं तो वह 6.65 से 6.70 मीटर की दूरी तय कर सकती थी।’ उन्होंने कहा, ‘यह किसी प्रतियोगिता में पहली बार है जब उसने स्वर्ण नहीं जीता है। वह रजत पदक को पसंद नहीं करती है और नीरज चोपड़ा के बाद एथलेटिक्स में वह देश की अगली बड़ी खिलाड़ी बन सकती है।’पदकों की संख्या के मामले में इन खेलों में यह भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है जहां उसने दो रजत और एक कांस्य पदक जीता। इससे पहले हालांकि ओलंपिक चैंपियन भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा (2016) और फर्राटा धाविका हिमा दास (2018) ने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता था। मौजूदा सत्र में इससे पहले मिश्रित चार गुणा 400 मीटर रिले टीम ने बुधवार को कांस्य पदक जीता जबकि पैदल चाल खिलाड़ी अमित खत्री ने 10,000 मीटर स्पर्धा में रजत पदक जीता था। शैली ने रविवार को अपने पहले प्रयास में 6.34 मीटर की छलांग लगाई। उन्होंने दूसरे प्रयास में भी इसी प्रदर्शन को दोहराया लेकिन उनका तीसरा प्रयास सर्वश्रेष्ठ रहा। उनके अगले दोनों प्रयास अवैध रहे। शैली को भारतीय एथलेटिक्स में उभरते सितारों में से एक माना जाता है। उन्होंने शुक्रवार को क्वॉलिफिकेशन दौर में 6.40 मीटर की सर्वश्रेष्ठ छलांग लगाकर शीर्ष स्थान हासिल किया था।झांसी में जन्मीं इस एथलीट की मां दर्जी का काम करती है। शैली फिलहाल बेंगलुरु में अंजू बॉबी जॉर्ज की अकादमी में प्रशिक्षण ले रही है। जहां अंजू के पति बॉबी जॉर्ज उनके कोच है। उन्होंने जून में राष्ट्रीय (सीनियर) अंतर-राज्य चैंपियनशिप में महिलाओं की लंबी कूद स्पर्धा में 6.48 मीटर के प्रयास से जीत हासिल की थी, जो उनका पिछला व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। वह वर्तमान अंडर-18 विश्व रैंकिंग में दूसरे स्थान पर है, जबकि अंडर 20 का राष्ट्रीय रिकॉर्ड उनके नाम है।

नहीं रहे यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह

लखनऊ : लंबे समय से बीमार चल रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल रहे कल्याण सिंह का गत शनिवार 21 अगस्त को निधन हो गया। बीते दो दिनों से कल्याण सिंह की तबीयत काफी नाजुक बनी हुई थी। अलग-अलग विभागों के विभागाध्यक्ष लगातार उनकी निगरानी रख रहे थे। अस्पताल में पूर्व मुख्यमंत्री के परिवारजन भी मौजूद थे। कल्याण सिंह के इलाज में दिल, गुर्दा, डायबिटीज, न्यूरो, यूरो, गैस्ट्रो और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग समेत 12 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम लगातार निगरानी में लगी हुई थी। कल्याण सिंह को 21 जून को लखनऊ के लोहिया संस्थान में भर्ती किया गया था। 4 जुलाई को जब सबसे पहले उनकी तबीयत ज्यादा खराब हुई थी तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनसे मिलने पहुंचे थे। कल्याण सिंह का जन्म 6 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम तेजपाल लोधी और माता का नाम सीता देवी था। कल्याण सिंह 2 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और कई बार अतरौली के विधानसभा सदश्य के रूप में चुने गए। साथ ही साथ ये उत्तर प्रदेश में लोक सभा सांसद और राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। कल्याण सिंह वर्ष 1991 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और दूसरी बार 1997 में मुख्यमंत्री बने थे। ये प्रदेश के प्रमुख राजनैतिक चेहरों में एक इसलिए माने जाते हैं, क्‍योंक‍ि इनके पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ही बाबरी मस्जिद की घटना घटी थी।

सिर्फ खेत में ही नहीं आपके मकान की छत पर भी हो सकती है लाभकारी खेती

नयी दिल्ली : खेती-बारी की बात होती है तो हम गांव देहात के बारे में सोचने लगते हैं। खुले-खुले खेत, वन प्रांतर और ढोर-डांगर। लेकिन, आप शहर में रहते हैं। आपके पास खेत खलिहान तो दूर, बागवानी के लिए भी फालतू जमीन नहीं है। ऐसे में कैसे खेती होगी? पर, आपको जान कर हैरानी होगी कि आप अपने मकान की छत पर भी खेती कर सकते हैं। सिर्फ खेती ही नहीं, बल्कि लाभकारी खेती। अपने छत पर आप सब्जी उगा सकते हैं। फल उगा सकते हैं। फूल उगा सकते हैं। और, उसे बेच भी सकते हैं। सहकारी क्षेत्र के संगठन इफको किसान की इकाई माई अर्बन ग्रीन्स के हेड ऑफ डिपार्टमेंट कर्नल कबीर दुबे हमें बता रहे हैं विस्तार से..

छत पर खेती करने की तकनीक क्या है?
आप सोच रहे होंगे कि छत पर खेती करने के लिए ढेर सारी मिट्टी की जरूरत होगी। वहां क्यारी बनाना होगा। फिर उसमें पौधों की रोपाई होगी। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। खेती की एक नई तकनीक आई है, हाइड्रोपॉनिक्स। इस तकनीक से खेती करने के लिए मिट्टी की जरूरत नहीं होती है। इसमें फल, सब्जी और फूल को पानी के माध्यम से उगाया जाता है। मिट्टी में उगाए गए फसलों के मुकाबले में इनमें अधिक पोषक तत्व होते हैं। साथ ही पैदावार तेजी से बढ़ती भी है और चार से पांच गुना अधिक उपज होती है।
छत पर क्या-क्या उगा सकते हैं?
कर्नल कबीर दुबे का कहना है कि छत पर आप फल, फूल और सब्जी आसानी से उगा सकते हैं। अगर आप नई तकनीक के सहारे खेती कर रहे हैं तो आपको पैदावार अच्छी होगी, जिसे आप बाजार में बेच सकते हैं। इसके साथ ही आप तरह-तरह के पौधों को उगाकर बेच सकते हैं। उनका कहना है कि छत पर खेती कर आप अपने लिए न सिर्फ पोषक और शुद्ध खाद्य पदार्थ ही उगा सकते है, बल्कि आप मोटी कमाई भी कर सकते हैं। छत पर खेती आमतौर पर जैविक तरीके से होती है। इस कारण इनके दाम भी बाजार में अच्छे मिलते हैं।
क्यों तेजी से बढ़ रहा है छत पर खेती का प्रचलन?
गांवों में तेजी से खेती की जमीन कम हो रही है। परिवार बढ़ रहा है और बंटवारे की वजह से जोत छोटी हो रही है। शहर में तो खेती के लिए जमीन तो नहीं के बराबर बची है। लेकिन, फल और सब्जियों की मांग में कोई कमी नहीं हुई है बल्कि यह बढ़ती ही जा रही है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए आम लोग से लेकर खेती के कारोबार से जुड़े लोग भी छत पर खेती करना शुरू कर रहे हैं। हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक से फसल जल्द तैयार हो जाती है, जिससे आप कमाई तो ज्यादा करते ही हैं, साथ ही आप बाजार की मांग को भी पूरा करने में सक्षम होते हैं।
हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक में क्या मिट्टी की जरूरत बिल्कुल नहीं होगी?
इस तकनीक में मिट्टी की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती। एक छोटी सी टोकड़ी में नारियल के छिलके का चूरा (कोको पीट) मुख्य तौर पर डाला जाता है। इसी टोकड़ी में पानी नियमित रूप से डाला जाता है। साथ ही इसमें कुछ पोषक तत्व भी डाले जाते हैं, ताकि पौधों को पोषण मिलता रहे। मिट्टी का प्रदूषण फसल में पहुंच जाता है। लेकिन इस विधि में तो मिट्टी का उपयोग ही नहीं होता, इसलिए प्रोडक्ट तक प्रदूषण पहुंचने की बात ही नहीं है। इस तरीके से छत पर 4 फीट गुना 4 फीट की चार क्यारियों में फसल उगाने पर ही एक परिवार अपने महीने भर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है।
इस तरीके से खेती करने के लिए कहां से मिलेगी मदद?
हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक से खेती करने के लिए आज बाजार में सब कुछ उपलब्ध है। इस काम में कई कंपनियां आगे आई हैं, जिनमें इफको किसान भी एक है। इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों से आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद मिल सकती है।

काशी के युवा ने बड़ा पैकेज छोड़ शुरू किया ‘चाय बार’, यहां मिलती है 150 किस्‍म की चाय

अभिषेक कुमार झा
वाराणसी : बनारस की किसी गली, नुक्कड़-चौराहे की चाय दुकान पर हाथों में चाय लेकर बतकही करना बनारसियों का एक पसंदीदा शगल है, लेकिन बनारसी चाय की दुकानों का रूप अब बदलने लगा है। काशी के युवाओं और विदेशियों को अब नए फैशनेबल चाय की दुकान या बनारसी भाषा में कहा जाए तो चाय की अड़ी (अड्डा) का स्वरूप अब बदलने लगा है। वाराणसी के कौस्तुभ ने बड़े पैकेज वाली नौकरी को छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू किया। 26 साल के इस युवा ने ये मन बनाया कि अब काशी की इस पारम्परिक जीवनशैली में वो अपने नए आइडिया के साथ काम करेगा और स्वरोजगार को अपनाएगा।
अमित शाह का सुना भाषण और खोल दिया चाय बार
कौस्तुभ ने एनबीटी ऑनलाइन से बातचीत में बताया कि 2018 में वर्तमान गृह मंत्री मंत्री अमित शाह ने रोजगार पर भाषण दे रहे थे। उस दौरान उन्होंने कहा था कि युवा स्वरोजगार अपनाकर भी बड़े एंटरप्रेन्योर बन सकते हैं। पकोड़ा तलना या चाय बेचने पर विपक्षी पार्टियों द्वारा लगातार तंज कसे जाते थे, लेकिन अमित शाह ने भाषण में चाय पकोड़ा बेचने को स्वरोजगार और स्वभिमान से जोड़ दिया था। इसका कौस्तुभ पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसने बढ़िया सैलेरी और इंसेंटिव की नौकरी छोड़ चाय बार खोलने का मन बना लिया। अपनी सेविंग्स और पिता से थोड़ी मदद लेकर कौस्तुभ ने नगवां चौराहे के पास चाय बार खोल दिया। यूनिक कांसेप्ट पर खोले जाने की वजह से कौस्तुभ अब अच्छा खासा मुनाफा भी कमा रहे हैं।
150 से ज्यादा किस्म की चाय बनाते हैं कौस्तुभ
अपने चाय बार को डिज़ाइनर लुक देते हुए कौस्तुभ ने इसमें दुनिया भर में मिलने वाली 150 से ज्यादा किस्म की चाय का ऑप्शन ग्राहकों के लिए रखा। चाय बार में 15 रुपये से लेकर 600 रुपये की चाय इस चाय बार में मिलती है। बढ़िया साफ सुथरे हाईजीनिक तरीके से बनाने की वजह से और शानदार ओपन कैफ़े की लुक की वजह से ये चाय बार लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कौस्तुभ बताते हैं कि चाय बार के नाम से ब्रांड का रजिस्ट्रेशन भी करवाया है और भविष्य में इसकी फ्रेंचाइजी चेन को भी विकसित करेंगे।

‘ल’ नहीं बोल पाते थे सिंधु घाटी सभ्यता के लोग, भाषा को लेकर हुए बड़े खुलासे

इस्लामाबाद : भाषा सिर्फ संचार का माध्यम ही नहीं है। इतिहासकारों के लिए यह हमेशा प्राचीन सभ्यताओं और समाज के ढांचे को समझने का एक अहम साधन रही है। हाल ही में हुए एक भाषाई अध्ययन से जो परिणाम सामने आए हैं वह प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता और द्रविड़ों के बीच के संबंधों को गहरा करते हैं। सिंधु घाटी सभ्यता भारतीय उपमहाद्वीप में फैली सबसे पुरानी शहरी सभ्यता है। नेचर जर्नल में प्रकाशित एक रिसर्च से पता चलता है कि इस सभ्यता की आबादी का एक बड़ा हिस्सा पैतृक द्रविड़ भाषाएं बोलता था।
भाषा अभी तक बनी हुई है रहस्य
सिंधु घाटी सभ्यता अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के दस लाख किलोमीटर में फैली हुई थी। यह ताम्रपाषाण सभ्यताओं में सबसे ज्यादा फैली हुई सभ्यता थी। 1926 में इसकी खोज के बाद से ही सभ्यता के पुरातत्व स्थल हमेशा से ही शोधकर्ताओं के लिए एक दिलचस्प विषय रहा है। हालांकि इस सभ्यता में लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा को अभी तक समझा नहीं जा सका है।
एक जैसे पाए गए कुछ अक्षर
एक सॉफ्टवेयर डेवलपर और शोधकर्ता बहता अंशुमाली मुखोपाध्याय ने भाषाई और ऐतिहासिक सबूतों का विश्लेषण किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि प्राचीन पर्सिन अभिलेखों के कुछ शब्द प्रोटो-द्रविड़ भाषा से कैसे मेल खाते हैं। उदाहरण के लिए फारसी अभिलेखों में हाथी के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द pri, pru, मूल रूप से ‘प्लू’ से लिए गए हैं, जो स्तनपायी के लिए एक प्रोटो-द्रविड़ शब्द है।
कई भाषाएं बोले जाने का दावा
बहाता ने वायर को बताया कि प्राचीन ईरानी भाषाओं ने इस शब्द को अपनाया और इसे संशोधित किया क्योंकि वे ‘L’ अक्षर का उच्चारण ‘R’ के रूप में करते थे। वर्तमान समय में, सिंधु घाटी महाद्वीप के एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई है और विभिन्न प्रकार की भाषाओं का समर्थन करती है, जिसमें ये हिंदी, पंजाबी, सिंधी, मारवाड़ी, गुजराती, शिना, खोवर, कोहिस्तान, बलूची, पश्तो, दारी और वाखी शामिल हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि खेती के प्रसार सेपहले करीब 12,000 से 20,000 भाषाएं बोली जाती थीं।

14 साल की उम्र में दीक्षा शिंदे को फेलोशिप देना चाहता है नासा

औरंगाबाद : महाराष्ट्र के औरंगाबाद की रहने वाली दीक्षा शिंदे ने भारत का नाम दुनियाभर में रोशन कर दिया है। महज 14 साल उम्र में दीक्षा शिंदे का सेलेक्शन नासा ने अपने यहाँ फेलोशिप के लिए किया है। दीक्षा शिंदे को नासा के एमएसआई फैलोशिप वर्चुअल पैनल पर पैनलिस्ट के रूप में चुना गया था। न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए बताया कि उनको नासा की यह फेलोशिप कैसे मिली। दीक्षा शिंदे ने बताया उन्होंने ब्लैक होल और गॉड पर एक थ्योरी लिखी थी।
दीक्षा को कैसे मिली फेलोशिप?
दीक्षा ने बताया कि उसके आर्टिकल को तीन प्रयासों के बाद नासा ने स्वीकार किया था। दीक्षा ने कहा कि उन्होंने मुझे अपनी वेबसाइट के लिए एक आर्टिकल लिखने के लिए कहा था। नासा में सेलेक्शन होने के बाद सोशल मीडिया पर दीक्षा की जमकर तारीफ हो रही है।

सेना की 5 महिला अधिकारियों को मिला कर्नल रैंक में प्रमोशन

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद खुला था रास्ता
नयी दिल्ली : भारतीय सेना के चयन बोर्ड ने पांच महिला अधिकारियों को टाइम स्केल के हिसाब से कर्नल रैंक में प्रमोशन देने का रास्ता साफ किया है। 26 साल की सेवा पूरी होने के बाद यह टाइम स्केल प्रमोशन दिया गया। पहली बार सेवा में सिग्नल कोर, इलेक्ट्रॉनिक और मेकेनिकल इंजीनियर्स कोर और इंजीनियर्स कोर में महिला अधिकारियों को कर्नल के रैंक में प्रमोशन दिया गया है। कर्नल टाइम स्केल रैंक के लिए चयनित पांच महिला अधिकारियों में कोर ऑफ सिग्नल से लेफ्टिनेंट कर्नल संगीता सरदाना, ईएमई कोर से लेफ्टिनेंट कर्नल सोनिया आनंद और लेफ्टिनेंट कर्नल नवनीत दुग्गल और कोर ऑफ इंजीनियर्स से लेफ्टिनेंट कर्नल रीनू खन्ना और लेफ्टिनेंट कर्नल रिचा सागर हैं। पहले सिर्फ मेडिकल कोर, लीगल और एजुकेशन कोर में ही महिला अधिकारियों को यह प्रमोशन दिया जाता था। क्योंकि इन्हीं ब्रांच में महिला अधिकारियों के लिए परमानेंट कमिशन था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद महिला अधिकारी अब उन सभी ब्रांच में परमानेंट कमिशन पा सकती हैं जिनमें वह शॉर्ट सर्विस कमिशन के तहत आई हैं। पहली बार आर्मी एयर डिफेंस, सिगनल्स, इंजीनियर्स, आर्मी एविएशन, इलैक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स, आर्मी सर्विस कोर, आर्मी ऑर्डिनेंस कोर और इंटेलिजेंस कोर में महिला अधिकारियों को परमानेंट कमिशन मिला और वह कर्नल बनने के लिए रेस में शामिल हुई।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इंडियन आर्मी ने 615 महिला अधिकारियों के लिए परमानेंट कमिशन का स्पेशल बोर्ड बैठाया था। जिसमें करीब 50 महिला अधिकारियों ने स्वेच्छा से आगे सर्विस करने से मना कर दिया। 277 महिला अधिकारियों को परमानेंट कमिशन दिया गया। कुछ महिला अधिकारी जो इस स्क्रीनिंग में बाहर हो गई थी, कोर्ट ने उनके मामले को फिर से देखने के निर्देश दिए। जिसके बाद अब 147 और महिला अधिकारियों को परमानेंट कमिशन दिया गया। इस तरह कुल 615 महिला अधिकारियों को कंसीडर किया गया जिनमें से 424 को परमानेंट कमिशन दे दिया गया।

17 साल की उम्र में छोड़नी पड़ी थी पढ़ाई, अब 75 साल की दादी सूफिज्म में कर रहीं पीएचडी

मुम्बई : सफेद सलवार कुर्ता और मैचिंग के कलर वाला हिजाब पहले वह सोफे पर बैठी हुई हैं। सामने दीवार पर अरबी में कुछ सजावट के रूप में एक अभिलेख है जिस पर अल्लाह के 99 नाम लिखे हुए हैं। उनमें से एक नाम है रहमान। 75 साल की जुबैदा याकूब खंडवानी कहती है कि यह अल्लाह की मेहर है, जो उन्हें बाधाओं का सामना किए बिना ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।सूफीवाद पर पीएचडी के लिए रिसर्च
यह सकारात्मक उर्जा है जो उन्हें सबसे अलग बनाती है। जिस उम्र में लोग आराम को तरजीह देते हैं या अपने अतीत को कागजों में उतार रहे होते हैं, उस उम्र में इस दादी का जज्बा ऐसा है कि वह सूफीवाद पर डॉक्टरेट के लिए रिसर्च कर रही हैं। जुबैदा कहती है कि मैंने इसे एक दशक पहले खत्म कर लिया होता लेकिन कुछ दिक्कतें पेश आ गईं। उन्होंने बताया कि मेरे गाइड, प्रसिद्ध उर्दू, फ़ारसी और इस्लामी अध्ययन के विद्वान प्रो निज़ामुद्दीन गोरेकर (उन्होंने दक्षिण मुंबई में सेंट जेवियर्स कॉलेज सहित कई संस्थानों में पढ़ाया) का निधन हो गया।
उन्होंने कहा कि उसके बाद मेरे शौहर का भी इंतकाल हो गया। जुबैदा के पति याकूब खंडवानी बिजनसमैन थे। वह पूर्व विधायक और हज कमेटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष अमीन खंडवानी के छोटे भाई थे। उन्होंने कहा कि इसके बाद मैं गिर गई और मेरे हाथ में फ्रैक्चर हो गया। जुबैदा के बेटे साहिल खंडवानी कहते हैं कि कोई और होता तो इतना सब होने के बाद हिम्मत हार गया होता लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सोहेल माहिम दरगाह के मैनेजिंग ट्रस्टी और हाजी अली दरगाह के ट्रस्टी है। 200 से अधिक वर्षों की विरासत वाला एक परिवार, यह एक ही घर खंडवानी हाउस में रहने वाले खंडवानी की पांचवीं पीढ़ी है। 17 साल की उम्र में छोड़नी पड़ी पढ़ाई
जुबैदा बमुश्किल से 17 साल की थीं जब उनकी मां की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी शादी हो गई। उन्हें अपनी कॉलेज की पढ़ाई छोड़नी पड़ी।। बाद में उन्होंने पत्राचार पाठ्यक्रम के माध्यम से आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया। बाद में एलएलबी भी पूरी की। सोहेल याद करते हैं कि एक समय था जब मेरी मां, मेरी बड़ी बहन और मैं बांद्रा में सिंधियों द्वारा संचालित एक ही एजुकेशन कॉम्पलेक्स में पढ़ते थे। उन्होंने कहा कि मुझे तब थोड़ी शर्मिंदगी होती थी कि मैं और मेरी मां अलग-अलग क्लास में जाते थे। सोहेल याद करते हैं कि असली आश्चर्य तब हुआ जब उनके पिता ने अर्थशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन करने का फैसला लिया। उस समय उनकी मां ने इस्लामिक अध्ययन में एमए कोर्स में दाखिला लिया था।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

 

कोविड-19 : रक्षा प्रदान करने वाले एंटीबॉडी का पता चला

वाशिंगटन : अनुसंधानकर्ताओं ने एक ऐसे एंटीबॉडी का पता लगाया है जो सार्स-सीओवी-2 वायरस के व्यापक स्वरूपों के खिलाफ अत्यधिक सुरक्षा प्रदान करता है। ‘इम्यूनिटी’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के निष्कर्षों से एंटीबॉडी आधारित नई उपचार पद्धतियां विकसित करने में मदद मिल सकती हैं, जिनकी क्षमता वायरस के विभिन्न स्वरूपों के सामने आने के बाद भी कम नहीं होती।
अमेरिका स्थित ‘वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसन इन सेंट लुइस’ के प्रोफेसर और मुख्य अनुसंधानकर्ता माइकल एस डायमंड ने कहा, ‘‘मौजूदा एंटीबॉडी कुछ स्वरूपों के खिलाफ कारगर हैं, लेकिन ये सभी स्वरूपों पर कारगर नहीं हैं।’’ डायमंड ने कहा, ‘‘यह वायरस समय और स्थान के साथ स्वरूप बदलना जारी रखेगा।’’ उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत रूप से काम करने वाले प्रभावी एंटीबॉडी को मिलाकर नए संयोजन बनाने से व्यापक स्वरूपों से लड़ने में मदद मिल सकती है। व्यापक स्वरूपों पर काम करने वाले एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने ‘रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन’ (आरबीडी) के रूप में जाने जाने वाले स्पाइक प्रोटीन के एक महत्वपूर्ण हिस्से के साथ चूहों को प्रतिरक्षित किया। फिर उन्होंने एंटीबॉडी-बनाने वाली कोशिकाओं को निकाला और उनसे आरबीडी को पहचानने वाली 43 एंटीबॉडी प्राप्त कीं। उन्होंने दो ऐसे एंटीबॉडी का चयन किया जो चूहों को संक्रमण से बचाने में सबसे प्रभावी थे और संक्रमण के स्वरूपों के एक पैनल के खिलाफ उनकी जांच की। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि एक एंटीबॉडी, सार्स2-38 ने सभी स्वरूपों को आसानी से निष्प्रभावी कर दिया।