Thursday, July 2, 2026
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3 महीने में बनाए जाएंगे देश में 50 मॉड्यूलर अस्पताल

 इनमें आईसीयू और ऑक्सीजन का इंतजाम होगा
नयी दिल्ली : कोरोना की तीसरी लहर से लड़ने के लिए केंद्र ने हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर को तुरंत मजबूती देना वाला प्लान बनाया है। केंद्र की योजना है कि अगले 3 महीने में देशभर में 50 मॉड्यूलर हॉस्पिटल बनाए जाएं, जिनमें आईसीयू बेड्स के साथ ऑक्सीजन आपूर्ति की व्यवस्था हो। दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की सप्लाई की सबसे बड़ी समस्या थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मॉड्यूलर हॉस्पिटल मौजूदा अस्पतालों के करीब ही बनाए जाएंगे। इसके जरिए हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया जाएगा। खास बात है कि 3 करोड़ की लागत से बनने वाले इस तरह के अस्पताल 3 हफ्तों के कम समय में तैयार किए जा सकेंगे। इनमें ICU, ऑक्सीजन सपोर्ट और दूसरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम की सुविधा होगी। इन मॉड्यूलर हॉस्पिटलों की उम्र कम से कम 25 साल तक होती है। आपदा के समय इन अस्पतालों को एक हफ्ते में शिफ्ट किया जा सकता है।

मॉड्यूलर अस्पताल  की खासियत –

100 बेड वाला अस्पताल होगा।
आईसीयू के लिए समर्पित जोन होगा।
ऐसे सरकारी अस्पताल जहां इलेक्ट्रिसिटी, ऑक्सीजन और पानी की व्यवस्था होगी, वहां इन्हें बनाया जाएगा।
एक अस्पताल में 3 करोड़ का खर्च होगा और 3 हफ्तों में ये काम करने लगेंगे।
छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों पर फोकस
रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्रोजेक्ट प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन ने शुरू किया है। अभी इसे सरकारी अस्पतालों में ही लागू किया जाएगा। ये अस्पताल खासतौर पर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को पूरा करेंगे।
प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार दफ्तर की अदिति लेले ने बताया कि हम राज्यों से लगातार संपर्क में हैं, जहां ऐसे अस्पतालों की जरूरत है। खासतौर पर वो राज्य जहां कोविड के केस लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं। इसमें हमने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी के तहत अन्य पार्टनर्स से भी संपर्क किया है, जो इस प्रोजेक्ट में हमारी मदद कर सकते हैं।

इन शहरों में अस्पताल बनेंगे
इस योजना के तहत छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, महाराष्ट्र के पुणे, जालना, पंजाब के मोहाली में ये अस्पताल बनाए जाएंगे। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के रायपुर में ऐसा 20 बिस्तरों वाला अस्पताल बनेगा। कर्नाटक के बेंगलुरु में पहले चरण में 20, 50 और 100 बिस्तर वाले ऐसे बेड बनाए जाएंगे।

महिला सरपंच की पहल से भरे 7 नाड़ी तालाब, मानसून में विकसित होंगे चारागाह

ओसियां : निकटवर्ती पंचायत जाटीपुरा मुकाम सिमरथ नगर पंचायत की युवा एवं पढ़ी लिखी प्रथम महिला सरपंच सुमन चौधरी की सोच ने गांव के नाडी, तालाब, गोचर, ओरण एवं चारागाह की तस्वीर बदल दी। सरपंच के प्रस्ताव पर उनके ससुर व ओसियां के पूर्व सरपंच चौधरी देवीलाल ने इस काम में समस्त महाजन ट्रस्ट से सम्पर्क कर जेसीबी मशीन उपलब्ध करवाने की अपील की। ट्रस्ट द्वारा जेसीबी मशीन निःशुल्क उपलब्ध करवाने पर चौधरी ने डीजल व अन्य खर्चे खुद वहन करके गोचर व ओरण से अंग्रेजी बबूल की सफाई करवाई। इसी प्रकार से पंचायत क्षेत्र की सात नाडियों से कंटीली झाड़ियां कटा कर साफ सफाई करवाई। तीन महीने तक 750 घण्टे काम कराया गया। रोजाना 5 हजार रुपये का खर्च चौधरी ने खुद वहन किया। जाटीपुरा सहित आसपास की ग्राम पंचायतों के लोगों ने भी स्वागत किया।
उन्होंने चौधरियों की नाडी, रेवाणी नाडी, तिण्डिया नाडा, रातड़ा नाडा, सोनेलाई नाडी, दादोलाई नाडी, कानानाडा तथा बांदेलाव तालाब के आगोर व गोचर की 750 बीघा जमीन को अंग्रेजी बबूल व अन्य कंटीली झाड़ियों से मुक्त कर सभी नाडियों को गहरा करवा दिया है। इन सभी परम्परागत जल स्रोत में पानी की आवक के रास्ते खोलने एवं अतिरिक्त मिट्टी निकालने का कार्य लगभग पूर्ण होने के स्तर पर है। देवीलाल चौधरी ने बताया कि वर्षों से उनका यह सपना था कि उनके आसपास के क्षेत्र में अंग्रेजी बबूल हट जाए तथा उसकी जगह पर पशुओं के लिए चारागाह एवं हरे-भरे छायादार पौधे लगे। सातों नाड़ी में अब वर्षभर पानी रहेगा, जिससे पशुओं के साथ साथ क्षेत्र के समस्त पशु-पक्षी, वन्य जीवों को वर्ष पर्यंत पीने का पानी मिलेगा।

जल स्रोतों की दुर्दशा को देखकर उठाया बीड़ा
सरपंच सुमन चौधरी ने बताया कि ग्राम पंचायत क्षेत्र के परम्परागत जल स्रोतों की दुर्दशा को देखकर इनकी सुध लेने की बात मैंने मेरे ससुर पूर्व सरपंच चौधरी देवीलाल के सामने रखी तो उन्होंने सरकारी पैसे का इंतज़ार किए बिना अपनी निजी आय से कार्य करवाने की हां कर दी। पूर्व सरपंच चौधरी देवीलाल ने बताया कि इस कार्य के लिए बजट बहुत ज्यादा होने के कारण यह कार्य काफी समय तक सपना ही बना रहा लेकिन समस्त महाजन संस्था के आगे आने से उनके द्वारा बिना किराए जेसीबी मशीन उपलब्ध कराने से यह काम आसान हो गया। डीजल का खर्चा मैंने स्वयं वहन किया, इस वजह से यह कार्य संभव हो सका। आने वाली बरसात के सीजन में मेरी तरफ से सभी ग्रामीणों को मुफ्त में पौधे उपलब्ध करवाए जाएंगे तथा उसके बदले में उन पौधों को पानी पिलाने की जिम्मेदारी ग्रामवासियों को दी जाएगी। सेवण घास के बीज लगाकर चारागाह का विकास भी किया जाएगा।

(साभार – दैनिक भास्कर)

लॉकडाउन में 6 गुना बढ़े पुरुष प्रताड़ना के मामले

पत्नियों पर मारपीट और मानसिक उत्पीड़न के आरोप
पुणे : महाराष्ट्र में कोरोना के चलते बीते डेढ़ साल से ज्यादातर लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। इस दौरान सामने आया है कि घर पर 24 घंटे साथ रहने के दौरान पति-पत्नी के बीच झगड़े बढ़ रहे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पति ज्यादा प्रताड़ित हुए हैं। पुणे पुलिस की ट्रस्ट सेल (भरोसा सेल) ने यह दावा किया है कि लॉकडाउन के दौरान घरों में रहने वाले पति लॉकडाउन से पहले की तुलना में पत्नियों से ज्यादा प्रताड़ित हुए हैं।
लॉकडाउन में पति प्रताड़ना के केस 6 गुना बढ़े
भरोसा सेल की प्रमुख सुजाता शानमे ने बताया कि लॉकडाउन से पहले के एक साल के दौरान 1283 लोगों ने पुणे पुलिस की ट्रस्ट सेल में पारिवारिक झगड़े की शिकायत दर्ज कराई थी। इनमें पत्नियों की संख्या 791 थी, जबकि पति सिर्फ 252 थे लेकिन लॉकडाउन के दौरान, यानी बीते 15 महीने में यह आंकड़ा बढ़कर 3,075 तक पहुंच गया है। इसमें से पतियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने वाली महिलाओं की संख्या 1540 है, जबकि पुरुषों की संख्या 1535 है। यानी शिकायत करने वाले पुरुषों की संख्या लॉकडाउन से पहले के एक साल की तुलना में 6 गुना बढ़ गई है।
सुजाता के मुताबिक पिछले डेढ़ साल के दौरान घरेलू कलह के तीन हजार से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं। इनमें ज्यादातर केस मारपीट, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के हैं। कुछ शिकायतों में यह भी दावा किया गया है कि उनकी पत्नियां झगड़ा कर उनके बच्चों के साथ मायके चली गईं हैं और अब वे लौट नहीं रही हैं।
घर में रहने के कारण लोगों में बढ़ रहा मानसिक तनाव
सुजाता ने बताया कि 24 घंटे बंद कमरे में रहने के चलते लोगों में मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। पति-पत्नी, छोटी-छोटी बातों पर झगड़ रहे हैं। हम ऐसे लोगों को अपने यहां बुलाकर या फिर ऑनलाइन माध्यम से उनकी काउंसिलिंग कर समझाने की कोशिश करते हैं।
पुणे में 2 साल पहले बना भरोसा सेल
पुणे पुलिस के भरोसा सेल का गठन 9 जनवरी 2019 को हुआ था। इसका मकसद बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की हरसंभव मदद करना है। सेल से जुड़े पुलिसकर्मी घरेलू हिंसा, कलह से जुड़े मामलों में महिलाओं या पुरुषों की काउंसिलिंग भी करते हैं।

पुलित्जर अवॉर्ड्स: जॉर्ज फ्लॉयड को न्याय दिलाने वाला वीडियो पुरस्कृत

पुलिस के हाथों हत्या का वीडियो बनाने वाली डेरनेला फ्रेजियर को विशेष पुरस्कार 

न्यूयॉर्क : इस साल के पुलित्जर अवॉर्ड्स का ऐलान कर दिया गया है। इस बार ज्यूरी ने एक विशेष पुरस्कार भी देने की घोषणा की है और यह नाम अब मशहूर हो चुका है। अमेरिका के मिनेपोलिस में पिछले साल 25 मई को अश्वेत व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड को एक पुलिस अफसर ने गला घोंटकर मार डाला था। पुलिस अफसर की इस वहशियाना हरकत को 17 साल की अश्वेत लड़की डेरनेला फ्रेजियर ने अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया था। बाद में यह वायरल हुआ और अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया गया। अब फ्रेजियर को उनकी इस बहादुरी के लिए स्पेशल पुलित्जर अवॉर्ड देने का ऐलान किया गया है। पुलित्जर अवॉर्ड्स आमतौर पर जर्नलिज्म के लिए दिए जाते हैं।

फ्रेजियर ने साहस दिखाया
जॉर्ज फ्लायड पर मामूली धोखाधड़ी का आरोप था। 25 मई 2020 को पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची। वो घर पर नहीं मिले। लौटते वक्त एक कार के किनारे दिखे तो पुलिस ने उन्हें घेरकर गिरा दिया। डेरेक चौविन नाम के पुलिस ने जॉर्ज की गर्दन पर अपना घुटना रख दिया और उन्हें दबाने लगा। यह सिलसिला 8 मिनट चला। आखिरकार जॉर्ज की मौत हो गई। कुछ दूरी पर मौजूद फ्रेजियर ने पुलिस की इस हरकत का वीडियो बनाया। ये कुछ ही घंटे में वायरल हो गया। चौविन का मामला जब अदालत पहुंचा तो यही वीडियो पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने सबूत के तौर पर पेश किया। फोरेंसिक जांच में साबित हो गया कि वीडियो असली और उसी दिन का है, जब जॉर्ज की हत्या हुई। इसके बाद अमेरिका में काफी हिंसा हुई। दुनियाभर में ब्लैक लाइव्स मैटर के बैनर तले आंदोलन चला।
नस्लभेद का जिक्र
पुलित्जर बोर्ड ने कहा- फ्रेजियर ने जॉर्ज की हत्या का वीडियो बनाकर साहस की मिसाल पेश की है। हम ये जान पाए हैं कि पुलिस किस हद तक वहशियाना तरीके अपनाती है। फ्रेजियर की इस कोशिश के चलते ही दुनिया का ध्यान इस मुद्दे पर गया। वैसे, इस बार अवॉर्ड्स पर महामारी का मुद्दा ही छाया रहा। पहले यह पुरस्कार 19 अप्रैल को दिए जाने थे। बाद में इन्हें री-शेड्यूल करके 11 जून किया गया। ये पुरस्कार 1917 से दिए जा रहे हैं।

महत्वपूर्ण पुरस्कार किसे मिले
पब्लिक सर्विस : द न्यूयॉर्क टाइम्स
ब्रेकिंग न्यूज रिर्पोटिंग : स्टार ट्रिब्यून
इन्वेस्टिगेटिव रिर्पोटिंग : बोस्टन ग्लोब के पांच पत्रकारों को
एक्सप्लेनरी रिर्पोटिंग : द अटलांटिक के एड यंग और रॉयटर्स के पांच जर्नलिस्टस को
लोकल रिर्पोटिंग : टाम्पा बे टाइम्स के दो पत्रकारों को

दावा : 15 हजार साल पहले थी बिलासपुर में थी इंसानों की बस्ती

अरपा नदी के किनारे हजारों साल पुराने पत्थर के औजार मिलने का दावा
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में अरपा नदी किनारे पाषाण काल के अवशेष मिले हैं। इनमें पत्थर के औजार हैंडेक्स, क्लिवर, प्वाइंट्स और अन्य चीजें शामिल हैं। इन्हें जशपुर में एंथ्रोपोलॉजी (मानव शास्त्र) के प्रोफेसर डॉ. विनय तिवारी ने इकट्ठा किया है। उनका दावा है कि यह औजार 15 हजार साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इसका काम खुदाई, छिलाई, कटाई सहित अन्य काम में होता था। इससे पता चलता है कि अरपा के किनारे पाषाण काल दौरान मानव संस्कृति बसा करती थी।
दावे के पीछे तीन कारण
अरपा नदी का इतिहास समृद्ध रहा है। काफी साल पहले जब यह इलाका जंगल था, तब निश्चित रूप से नदी बहा करती थी। इसके पानी का उपयोग यहां रहने वाले जंगली जानवर के अलावा पाषाण काल के मनुष्य किया करते थे। नदी में मछलियाँ, जंगल में कंद-मूल सहित खाने और शिकार की दूसरी चीजें आसानी से उपलब्ध थीं। जिसके चलते ही यहां इंसानों के बसने के तथ्य में दम लगता है।उपकरण और रॉ मटेरियल का उपलब्ध होना। इन्हीं के जरिए वे शिकार और रोजमर्रा के जीवन की दूसरी चीजें करते होंगे।


भू-गर्भ शास्त्रियों से की चर्चा, जांचेंगे कितना पुराना है औजार
प्रोफसर तिवारी का कहना है कि उन्होंने इसके संदर्भ में रायपुर के जियोलॉजी डिपार्टमेंट के अधिकारियों से बात की है। आने वाले दिनों में यह शोध का विषय होगा कि यह पत्थर और औजार कितने पुराने हैं। उन्होंने बताया कि जो पत्थर मिले हैं, उनमें क्वाडजाइट, सैंडस्टोन है और जेसफर है। कहा कि यह पत्थर पाषाण काल के सबसे प्राचीन समय का है। जिसकी जांच के लिए वे जल्द ही रायपुर के अधिकारियों से मिलकर उन्हें जांच करने की बात कहेंगे।
बिलासपुर के तोरवा निवासी डॉ. विनय तिवारी जशपुर के एक शासकीय कॉलेज में प्रोफेसर हैं। वे साल 2012 से पढ़ा रहे हैं। इससे पहले रायपुर की रविशंकर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे। उनकी खास रुचि भी इतिहास को जानने में रही है। बिलासपुर आने के दौरान जब भी सुबह टहलने निकलते तो उनकी नजर ऐसे पत्थरों पर पड़ जाती। वे इसे इकट्ठा करते। कहते हैं जिस तरह के पत्थरों के औजार को उन्होंने संग्रहित किया है उसे प्रकृति नहीं बनाती, बल्कि जरूरतमंद लोग बनाते हैं। छत्तीसगढ़ के पुरातत्व विभाग के पुरात्वविद आरके भगत का कहना है कि पत्थर अरपा के किनारे मिले पत्थर इस बात के प्रमाण हैं कि पाषाण काल में मानव संस्कृति यहां रहती थी। ये बेहतरीन उपकरण हैं। यह कितने पुराने हैं, इसकी जाँच करेंगे।

दस हजार रुपये में शुरू की मोतियों की खेती, आज कमाते हैं लाखों

नयी दिल्ली : महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के रहने वाले संजय गंडाते एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता पारंपरिक खेती करते थे। संजय ने कुछ साल सरकारी नौकरी की तैयारी की। सफलता नहीं मिली तो मोतियों की खेती करना शुरू किया। पिछले 7 साल से वे मोतियों की फार्मिंग (Pearl Farming) और मार्केटिंग का काम कर रहे हैं। भारत के साथ ही इटली, अमेरिका जैसे देशों में भी उनके मोतियों की डिमांड है। अभी इससे वे सालाना 10 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। 38 साल के संजय बताते हैं कि मेरा लगाव बचपन से मोतियों से रहा है। गांव के पास ही नदी होने से अक्सर हम अपने दोस्तों के साथ सीपियां चुनने जाते थे। हालांकि कभी इसके बिजनेस के बारे में नहीं सोचा था और कोई खास जानकारी भी नहीं थी। कुछ साल सरकारी टीचर बनने की तैयारी की, लेकिन जब सिलेक्शन नहीं हुआ तो प्लान किया कि कहीं कंपनी में काम करने से अच्छा है खेती बाड़ी की जाए।
नौकरी नहीं मिली तो मोतियों की खेती शुरू की
संजय पारंपरिक खेती नहीं करना चाहते थे। वे कुछ नया करने का प्लान कर रहे थे। तभी उन्हें ख्याल आया कि जो सीपें उनके गांव की नदी में भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं, उनसे वे कुछ तैयार कर सकते हैं क्या? इसके बाद वे पास के कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचे। वहां से संजय को पता चला कि इन सीपियों की मदद से मोती तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि इसकी प्रोसेस के बारे में उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं मिली।
संजय कहते हैं कि सीपियों से मेरा लगाव था ही इसलिए तय किया कि अब जो भी नफा-नुकसान हो अपने पैशन को ही प्रोफेशन में बदलेंगे। इसके बाद उन्होंने इस संबंध में गांव के कुछ लोगों से और कुछ पत्र-पत्रिकाओं के जरिए जानकारी जुटाई। फिर नदी से वे कुछ सीपी लेकर आए और किराए पर तालाब लेकर काम शुरू कर दिया। तब उन्होंने ज्यादातर संसाधन खुद ही डेवलप किया था। इसलिए उनकी लगात 10 हजार रुपए से भी कम लगी थी।
शुरुआत में घाटा हुआ, लेकिन हार नहीं मानी
संजय चूंकि नए-नए थे। उन्हें इसका कोई खास तौर तरीका पता नहीं था। इसके चलते उन्हें शुरुआत में नुकसान उठाना पड़ा। ज्यादातर सीपियां मर गईं। इसके बाद भी उन्होंने इरादा नहीं बदला। उन्होंने इसकी प्रोसेस को समझने के लिए थोड़ा और वक्त लिया। इंटरनेट के माध्यम से जानकारी जुटाई। कुछ रिसर्च किया। और फिर से मोतियों की खेती शुरू की। इस बार उनका काम चल गया और काफी अच्छी संख्या में मोती तैयार हुए। इसके बाद संजय ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे वे अपने काम का दायरा बढ़ाते गए। आज उन्होंने घर पर ही एक तालाब बना लिया है। जिसमें अभी पांच हजार सीपियां हैं। इनसे वे एक दर्जन से ज्यादा डिजाइन की अलग-अलग वैराइटी की मोतियां तैयार कर रहे हैं।
संजय कहते हैं कि मैं अपने उत्पाद किसी कंपनी के जरिए नहीं बेचता हूं। मिडिलमैन का रोल खत्म कर दिया है। क्योंकि इससे सही कीमत नहीं मिलती और वे लोग औने-पौने दाम पर खरीद लेते हैं। इससे बचने के लिए मैं खुद ही मार्केटिंग करता हूँ। वे कहते हैं कि हमने सोशल मीडिया से मार्केटिंग की शुरुआत की थी। आज भी हम उस प्लेटफॉर्म का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। साथ ही हमने खुद की वेबसाइट भी शुरू की है। जहां से लोग ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं। कई लोग फोन के जरिए भी ऑर्डर करते हैं। उसके बाद हम कूरियर के जरिए उन तक मोती भेज देते हैं। वे 1200 रुपए प्रति कैरेट के हिसाब से मोती बेचते हैं।
फार्मिंग के साथ प्रशिक्षण भी देते हैं
संजय ने अपने घर पर ही मोतियों की खेती का एक ट्रेनिंग सेंटर खोल रखा है। जहां वे लोगों को इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हैं। उन्होंने इसके लिए अभी 6 हजार रुपए फीस रखी है। लॉकडाउन से पहले महाराष्ट्र के साथ ही बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों से लोग उनके पास ट्रेनिंग के लिए आते थे। उन्होंने एक हजार से ज्यादा लोगों को अब तक ट्रेंड किया है। वे पूरी तरह से व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं।

नहीं रहे हिन्दी सिनेमा के वयोवृद्ध अभिनेता चंद्रशेखर वैद्य

मुम्बई : हिन्दी सिनेमा के जानें-मानें अभिनेता चंद्रशेखर वैद्य अब इस दुनिया में नहीं रहे। 98 साल के चंद्रशेखर का मुम्बई के अंधेरी स्थित घर में निधन हो गया। चंद्रशेखर ने बॉलीवुड में अपनी मेहनत और संघर्ष के दम पर अलग पहचान बनाई। बता दें कि, चंद्रशेखर ने बॉलीवुड की कई हिट फिल्मों में काम किया लेकिन उनको पहचान मिली ‘रामायण’ में आर्य सुमंत का किरदार निभाने की वजह से। खबरों के मुताबिक, चंद्रशेखर को कोई गंभीर बीमारी नहीं थी। चंद्रशेखर का जन्म 1923 में हैदराबाद में हुआ था।

फिल्म इंडस्ट्री में काम करने की वजह से उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। चंद्रशेखर अपने संघर्ष के दिनों में चौकीदार का काम करते थे। चंद्रशेखर ने भारत छोड़ो आंदोलन में भी हिस्सा लिया।  इसके बाद उन्होंने अभिनय में भाग्य आजमाया और सफल हुए। चंद्रशेखर ने सीआईएनटीएए (CINTAA) एसोसिएशन का गठन किया। चंद्रशेखर ने अपने कॅरियर में 110 से ज्यादा फिल्में कीं। चंद्रशेखर ने 1964 में आई फिल्म ‘चा चा चा’ और 1966 में आई फिल्म ‘स्ट्रीट सिंगर’ का निर्देशन किया।  चंद्रशेखर ने रामानंद सागर की रामायण में राजा दशरथ के महामंत्री सुमंत का किरदार निभाया था। इस भूमिका से उन्हें खूब लोकप्रियता हासिल हुई। चंद्रशेखर, रामानंद सागर के करीबी दोस्त थे। रामायण की उस स्टारकास्ट में वो सबसे उम्रदराज कलाकार थे।

कोरोना संक्रमण से लड़ने में 90.4 प्रतिशत कारगर है नोवावैक्स की वैक्सीन

तीसरे चरण के ट्रायल के नतीजे आए

वॉशिंगटन : नोवावैक्स वैक्सीन के ट्रायल ब्रिटेन में किए गए हैं। यह अलग-अलग वैरिएंट्स से बचाव करने में भी कारगर रही है। अमेरिका की कंपनी नोवावैक्स की बनाई वैक्सीन के तीसरे फेज के ट्रायल के नतीजे आ गए हैं।कंपनी ने सोमवार को बताया कि कोरोना वायरस के खिलाफ यह काफी असरदार साबित हुई है। वैक्सीन ने माइल्ड, मॉडरेट और सीवर डिजीज में 90.4% अंतिम क्षमता दिखाई है। ये ट्रायल ब्रिटेन में किए गए हैं। बेहतर परिणामों की वजह से जल्द ही इस वैक्सीन को आपातकालीन स्थितियों की मंजूरी मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। ये वैक्सीन अलग-अलग वैरिएंट्स से बचाव करने में भी कारगर रही है। दुनिया भर में वैक्सीन की कमी की बीच कंपनी ने ये नतीजे जारी किए हैं।
भारत के लिए कितने काम की खबर
नोवावैक्स और भारत की कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने साल में कोरोना वैक्सीन के 200 करोड़ खुराक तैयार करने का करार किया है। अगस्त में यह सौदा हुआ था। समझौते के मुताबिक, कम और मध्यम आय वाले देशों और भारत के लिए कम के कम 100 करोड़ खुराक का उत्पादन किया जाएगा। अब ट्रायल के नतीजे आने के बाद कंपनी 2021 की तीसरी तिमाही में अमेरिका, यूके और यूरोप में इमरजेंसी यूज का अप्रूवल मांगेगी। इस वजह से सितंबर से पहले वैक्सीन मिल पाना मुश्किल है।
बच्चों पर भी टीके का ट्रायल कर रही कंपनी
नोवावैक्स अपनी वैक्सीन के बच्चों पर ट्रायल की शुरुआत कर चुकी हैं। कंपनी ने 12-17 साल उम्र के 3,000 बच्चों पर ट्रायल्स शुरू किए हैं। हालांकि, इसे अब तक किसी भी देश में मंजूरी नहीं मिली है। इसमें शामिल हो रहे बच्चों की दो साल तक निगरानी की जाएगी।
अमेरिका पहले ही कर चुका 12 हजार करोड़ की डील
नोवावैक्स ने अमेरिका को 10 करोड़ डोज देने के लिए करार किया है। यह सौदा 1.6 बिलियन डॉलर (करीब 12 हजार करोड़ रु.) का है। इसके साथ ही ब्रिटेन, कनाडा और जापान के साथ भी टीके की सप्लाई के लिए समझौते किए गए हैं।

स्कूल बंद, शिक्षक ने शिक्षा का माध्यम बनाया मंदिर का लाउडस्पीकर

गाँव में जगह-जगह वर्णमाला लगाई
​​​​​​​तेलो (बोकारो) : लॉकडाउन की वजह से इन दिनों स्कूल बंद है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र में बच्चों की पढ़ाई जारी रखने के लिए एक टीचर ने गांव में जगह-जगह दीवारों पर हिंदी-इंग्लिश की वर्णमाला लगा दी। साथ ही गांव के मंदिर में लगे लाउड स्पीकर को जरिया बनाया और बच्चों की पढ़ाई शुरू करवाई। शिक्षक लाउड स्पीकर से बोलते हैं तो दूर तक बैठे बच्चे उनके साथ ही इसे दोहराते हैं। हम बात कर रहे हैं चंद्रपुरा प्रखंड की पपलो पंचायत के तहत आने वाले जुनौरी गांव की। यहां सरकारी शिक्षक भीम महतो ने यह पहल की है।
पढ़ाई रुकने पर आया विचार
स्कूल बंद होने से बच्चों की पढ़ाई रुक गई थी। कई स्कूल छात्र-छात्राओं की ऑनलाइन पढ़ाई करवा रहे हैं, लेकिन गरीब बच्चों के पास स्मार्ट फोन न होने से उन्हें परेशानी हो रही थी। देश में लॉकडाउन लगने के बाद से ही राजकीय मध्य विद्यालय, जुनौरी के शिक्षक भीम महतो लगातार क्षेत्र में बच्चों को फ्री में पढ़ा रहे हैं। वे अपने खर्च पर बच्चों को कॉपी, पेन, मास्क, सैनिटाइजर और बिस्कुट भी देते हैं। उन्होंने घटियारी पंचायत के मंगलडाडी गांव में बसे बच्चों को सबसे पहले पढ़ाने की शुरुआत की थी। भीम महतो लाउड स्पीकर से बोलते हैं तो दीवारों पर बनी वर्णमाला के पास बैठे बच्चे उनके साथ दोहराते हैं। गांव के गोपाल गिरी और चंद्रिका गिरी ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान सभी बच्चे पढ़ाई से दूर होते जा रहे थे। भीम महतो ने कोरोना संक्रमण को देखते हुए मंदिर परिसर में लगे लाउड स्पीकर से बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। इससे बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकी।

कई बच्चों के पास स्मार्ट फोन नहीं, लाउड स्पीकर को जरिया बनाया
भीम महतो का कहना है कि कोरोना काल में बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे थे। इसे देखते हुए मैंने गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। लॉकडाउन के वक्त स्मार्टफोन से ऑनलाइन पढ़ाई की बात कही गई। गांव में ऐसे कई बच्चे हैं, जिनके पास स्मार्ट फोन नहीं है। ऐसे में मैंने सोचा कि इन्हें पढ़ाने के लिए मंदिर के लाउड स्पीकर की मदद ली जाए। इससे पहले मैंने गांव में कई जगह हिंदी-इंग्लिश वर्णमाला, फ्रूट नेम, वेजिटेबल नेम जैसे चार्ट लगाए। लाउड स्पीकर से पढ़ाने के बाद मैं कुछ बच्चों से फोन पर बात कर चेक करता हूं कि जो पढ़ाया वह उन्होंने लिखा है या नहीं। मेरी क्लास में पहली, दूसरी और तीसरी के 30-35 बच्चे होते हैं। मंदिर से करीब आधा किलोमीटर के अंदर बच्चों को ठीक से मेरी आवाज सुनाई देती है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

नहीं रहे दिग्गज फिल्मकार बुद्धदेब दासगुप्ता का निधन

कोलकाता : प्रख्यात फिल्म निर्देशक बुद्धदेब दासगुप्ता का काफी दिनों तक गुर्दे की बीमारी से जूझने के बाद बृहस्पतिवार सुबह को दिल का दौरा पड़ने से यहां स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह 77 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी और उनकी पहली शादी से दो बेटियां हैं।
बेहतरीन निर्देशक के परिवार एवं मित्रों के प्रति संवेदनाएं व्यक्त करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ट्वीट किया, “प्रख्यात फिल्मकार बुद्धदेव दासगुप्ता के निधन से दुखी हूं। अपने काम के जरिए उन्होंने सिनेमा की भाषा को अनूठा बना दिया। उनका निधन फिल्म समुदाय के लिए बड़ा नुकसान है।” परिवार के सदस्यों ने बताया कि दासगुप्ता की पत्नी सोहिनी ने शहर में कलिकापुर इलाके में स्थित उनके आवास में सुबह छह बजे देखा कि दासगुप्ता के शरीर में कोई हरकत नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि उन्हें नींद में ही दिल का दौरा पड़ा था।
उनके निधन पर दुख जाहिर करते हुए फिल्मकार गौतम घोष ने कहा, “बुद्ध दा खराब सेहत के बावजूद फिल्म बना रहे थे, लेख लिख रहे थे और सक्रिय थे। उन्होंने स्वस्थ न होते हुए भी टोपे और उरोजहाज का निर्देशन किया। उनका जाना हम सबके लिए बहुत बड़ा नुकसान है।” अभिनेत्री-निर्देशक अर्पणा सेन ने कहा कि दासगुप्ता की फिल्में ‘‘यथार्थवाद में डूबी’’ रहती थीं।
सेन ने कहा, “मुझे दुख है कि मैं बुद्धदेब दा को श्मशान घाट जाकर अंतिम विदाई नहीं दे पाउंगी जैसा मैंने मृणाल दा को दी थी। यह दुखी करने वाला है कि हम इस कोविड वैश्विक महामारी और लॉकडाउन के कारण उनके जैसे क्षमतावान निर्देशक को उचित सम्मान नहीं दे सकते हैं।”
अभिनेता एवं रंगमंच की हस्ती कौशिक सेन ने कहा कि दासगुप्ता सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन जैसे फिल्मकारों के स्तर के थे “जिन्होंने बांग्ला सिनेमा को वैश्विक मंचों तक पहुंचाया।” सेन ने कहा, “उनपर अकसर आरोप लगता था कि वह ऐसा सिनेमा बनाते हैं जो बड़े जमसमूह को आसानी से समझ में नहीं आता है। लेकिन वह उस शैली पर टिके रहे, वह कभी अपने यकीन से भटके नहीं।”
1944 में पुरुलिया में जन्मे, दासगुप्ता ने अपने कॅरियर की शुरुआत एक कॉलेज में लेक्चरर के तौर पर की थी। बाद में कलकत्ता फिल्म सोसाइटी में सदस्य के तौर पर नामांकन के बाद वह 1970 के दशक में फिल्म निर्माण में उतर गए। उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म ‘‘दूरात्वा” 1978 में बनाई थी और एक कवि-संगीतकार-निर्देशक के तौर पर अपनी छाप छोड़ी थी।
उससे पहले, उन्होंने लघु फिल्म ‘समायर काचे’ बनाई थी। उनके निर्देशन में बनीं कुछ प्रसिद्ध फिल्मों में ‘नीम अन्नपूर्णा’, ‘गृहजुद्ध’, ‘बाग बहादुर’, ‘तहादेर कथा’,‘चाराचर’, ‘लाल दर्जा’, ‘उत्तरा’, ‘स्वपनेर दिन’, ‘कालपुरुष’ और ‘जनाला’ शामिल है। उन्होंने ‘अंधी गली’ और ‘अनवर का अजब किस्सा’ जैसी हिंदी फिल्मों का भी निर्देशन किया।
दासगुप्ता ने अपने जीवनकाल में 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। वह उदारवादी विचारधारा के थे और हाल के वर्षों में उन्होंने कई राजनीतिक गतिविधियों की आलोचना की थी। वह युवा फिल्मकार अनिक दत्ता के साथ उस वक्त खड़े रहे जब सरकार विरोधी ‘भोबिष्योतेर भूत’ फिल्म को रिलीज के एक हफ्ते बाद शहर के सिनेमाघरों से हटा लिया गया था।
वेनिस फिल्म उत्सव सिल्वर लायन, लोकार्नो क्रिटिक्स पुरस्कार और लोकार्नो स्पेशल जूरी पुरस्कार के विजेता ने कुछ साल पहले अपनी एक फिल्म को व्यावसायिक रिलीज न मिलने पर पीटीआई-भाषा से कहा था, “मुझे दुख होता है कि मेरी फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलती है लेकिन कोलकाता और बंगाल के अन्य हिस्सों में वे सिनेमाघरों में नहीं पहुंच पाती हैं। कार्यस्थल पर वितरण के स्तर पर एक मजबूत लॉबी काम करती है।”