Thursday, July 2, 2026
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 ‘रसिकबिहारी’ प्यारो प्रतीम, सिर बिधनां लिख दौनौ’

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आप को एक और मध्ययुगीन भक्त कवयित्री की कथा सुनाऊंगी जो “राजस्थान की मोनालिसा” के नाम से भी चर्चित हैं। सौन्दर्य, भक्ति, प्रेम और काव्यमयता का अद्भुत संयोजन मिलता है, उनके व्यक्तित्व और कवित्त में, जिनका एक नाम “बनी -ठनी” या “बणी- ठणी” भी है। यह बात और है कि उसके वास्तविक नाम का पता नहीं चलता। वह किशनगढ़ के महाराजा सावंत सिंह (18 वीं शताब्दी) की दासी थीं जो महाराज से अगाध प्रेम भी करती थीं। महाराजा जो स्वयं एक कवि और कला पारखी थे, भी अपनी इस दासी से बहुत प्रेम करते थे। एक और मत के अनुसार वह कलाप्रेमी महाराज की शिष्या भी थीं। सावंत सिंह स्वयं एक कुशल चित्रकार भी थे। उन्होंने एक बार अपनी इस प्रिय दासी को रानियों जैसी पोशाक और आभूषण पहनाकर उनका एक चित्र बनाया। वह चित्र उन्होंने तत्कालीन राज चित्रकार निहालचंद को दिखाकर उनकी राय मांगी। निहालचंद ने उन्हें कुछ सुझाव दिए जिनके अनुसार राजा ने पुनः चित्र में संशोधन करके, उसे अपने व्यक्तिगत संग्रहालय में शामिल कर लिया। बाद में निहालचंद ने अपने सामने, वह चित्र दोबारा बनवाकर, उसे सार्वजनिक रूप से दरबार में प्रर्दशित किया। इस चित्र की बहुत प्रशंसा हुई और चित्र में चित्रित स्त्री अर्थात दासी को नाम दिया गया “बणी -ठणी” जो राजस्थानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है, सजी संवरी। इस चित्र की ख्याति के उपरांत उस दासी को सब “बणी ठणी” कह कर ही संबोधित करने लगे। निहालचंद ने बणी ठणी को आदर्श बनाकर और भी कई चित्र बनाएँ जो इतने चर्चित हुए कि किशनगढ़ चित्रकला की शैली को बणी ठणी के नाम से जाना जाने लगा। बणी ठणी का पहला चित्र सन 1700 के आस- पास बना था। इन चित्रों की आज भी विदेशों में अच्छी मांग है। 

एक ओर बणी ठणी के चित्रों की ख्याति आसमान छूने लगी तो दूसरी ओर  राजा सावंत सिंह और बनी- ठनी का प्रेम उत्तरोत्तर प्रगाढ़ होता गया और उनकी जोड़ी में प्रजा को राधा कृष्ण की छवि दिखाई देने लगी। राजा को नागरीदास, चितेरे, अनुरागी, मतवाले आदि कई नामों से नवाजा गया तो उनकी प्रिय दासी को भी कलावंती, किर्तनिन, लवलीज, नागर रमणी, राजस्थान की मोनालिसा, राजस्थान की राधा आदि नामों से पुकारा गया। निहालचंद ने राजाज्ञा से राजा और सभी कमी, जो बाद में उनकी उपपत्नी बन गईं, को राधा कृष्ण के रूप में अपने चित्रों में अमरत्व प्रदान किया। इन चित्रों में कला, सौन्दर्य और प्रेम -भावना का अद्भुत संयोजन दिखाई देता है।

कालांतर में पारिवारिक विवादों के चलते महाराज सावंत सिंह का घर परिवार से मोहभंग हो गया और वह राजपाट त्याग कर, अपने पुत्र सरदार सिंह को राजगद्दी सौंपकर, वृंदावन आ गए तथा वल्लभाचार्य के पंथ में दीक्षित हुए। वह नागरीदास नाम से कृष्ण काव्य की रचना करने लगे। बणी ठणी भी उनके साथ ही वृंदावन आ गईं और रसिक बिहारी मंदिर के महंत रसिक देव से दीक्षा ग्रहण की तथा “रसिक बिहारी” के नाम से कविता लिखने लगीं। इन कविताओं में श्रीकृष्ण और राधिका के जन्म के विवरणों के साथ उनके बीच प्रेम के स्फुरण और उसकी प्रगाढता के जीवंत चित्रण के साथ ही कुंज विहार, रास-क्रीड़ा, होली, साँझ, हिंडोला, पनघट आदि विविध लीला-प्रसंगों का वर्णन अत्यंत सरसता से हुआ है। राधा- कृष्ण के प्रेम में पगे अत्यंत मनोहारी पदों की रचना रसिक बिहारी ने की है और उनकी विविध लीलाओं का अत्यंत सरस और मार्मिक वर्णन भी किया है। राधा के उपवन में झूला झूलने और कृष्ण द्वारा छिपकर इस मनोहर दृश्य को निहारने का एक सुंदर प्रसंग निम्नलिखित पद में बड़ी स्वाभाविक रूप में चित्रित किया गया है-

“धीरे झूलो री राधा प्यारी जी । 

 

नवल रंगीली सबै झुलावत गावत सखियाँ सारी जी । 

 

फरहरात अंचल चल चचल लाज न जात सँभारी जी । 

 

कुंजन ओट दुरे लखि देखत प्रीतम रसिक बिहारी जी ।”

बणी ठणी  अर्थात रसिक बिहारी के काव्य में नायिका भेद का वर्णन भी अत्यंत कुशलतापूर्वक हुआ है और वह इसके लिए भी जानी जाती हैं।  प्राय: यह माना जाता है कि रीतिकालीन कवियों ने ही नख -शिख वर्णन के कवित्त और पदों की रचना की है लेकिन कुछ कवयित्रियों ने भी इस क्षेत्र में अपनी काव्य क्षमता का प्रदर्शन किया है जिनमें रसिक बिहारी का नाम भी लिया जा सकता है। राधिका की रसभरी रतनारी आँखों के सौन्दर्य को इस पद में बहुत ही खूबसूरती से उकेरा गया है-

“रतनारी हो थारी आंखड़ियाँ।

प्रेम छकी रस-बस अलंसाणी जाणि कमल की पांखड़ियाँ॥

सुन्दर रूप लुभाई गति मति हौं गई ज्यूं मधु मांखड़ियाँ।

रसिकबिहारी वारी प्यारी कौन बसी निसि कांखड़ियाँ॥”

भक्त नागरीदास ने ब्रह्म कुंड पर सांझी अर्थात ब्रज की लोक कला पर केंद्रित मेले का आयोजन भी किया और भक्तिन रसिक बिहारी ने सांझी पर कई मार्मिक पदों की रचना की। सांझी का एक पद आपके अवलोकनार्थ उद्धृत है जिसमें गोपियों के सज धजकर सांझी खेलने का मनोरम वर्णन किया गया है और प्रियतम कृष्ण की मनोदशा का भी यथार्थ चित्रण हुआ है जो गोपियों का रूप निहार कर ठगे से रह जाते हैं – 

“खेले सांझी साँझ प्यारी|

गोप कुंवरि साथणी लियां सांचे चाव सों चतुर सिंगारी||

फूल भरी फिरें फूल लेण ज्यौ भूल री फुलवारी|

रहया ठग्या लखि रूप लालची प्रियतम रसिक बिहारी||”

रसिक बिहारी का ब्रज, राजस्थानी और पंजाबी भाषा पर समान अधिकार था। पंजाबी में रचित एक वियोग का पद देखिए जिसमें बिछड़े जोड़ों को आपस में मिला देने को उन्होंने सबाब का काम अर्थात पुण्य कार्य कहा है-

“बहि सौंहना मोहन यार फूल है गुलाब दा| 

रंग रंगीला अरु चटकीला गुल होय न कोई जबाब दा|

उस बिन भंवरे ज्यों भव दाहें यह दिल मुज बेताब| 

कोई मिलावै रसिक बिहारी नू है यह काम सबाब दा || “

रसिक बिहारी की कविताओं में ब्रज की लोक संस्कृति का भी जीवंत चित्रण मिलता है। रसखान की ही भांति वह उस स्थान विशेष से भी प्रेम करती थीं जो उनके आराध्य राधा कृष्ण की क्रीड़ा स्थली रही थी इसीलिए उन्होंने ब्रज के लोक समारोहों और उत्सवों को भी अपनी कविताओं में कुशलता से उतारा है। ब्रज की होली का एक मनभावन दृश्य उनके पद में साकार हो उठा है-

” होरी होरी कहि बोले सब ब्रज की नारि । 

 

नन्द गाँव बरसानो हिलि मिलि गावत इत उत रस की गारि । 

 

उड़त गुलाल अरूण भयो अम्बर चलत रंग पिचकारि कि धारि। 

 

रसिक विहारी भानु-दुलारी नायक संग खेलें खेलवारि ।”

रसिक बिहारी एक उच्च कोटि की कवयित्री थी। उनकी कविताओं में प्रेम, शृंगार, भक्ति और लोक-संस्कृति, इन सभी का सुंदर निदर्शन मिलता है। कवयित्री होने के साथ ही वह अत्यंत रूपवती और गुणवंत नारी भी थीं जिनका कला और कविता के इतिहास में अक्षुण्ण स्थान है। वह एक समर्पित प्रेमिका और एकनिष्ठ भक्त भी थीं। उनके द्वारा रचित भक्ति का एक पद आपके साथ साझा करते हुए मैं आज की बात समाप्त करूंगी। उद्धृत पद में भक्त के ह्रदय की बेबाकी को अभिव्यक्ति मिली है जो प्रेम और भक्ति के लिए दुनिया वालों की परवाह नहीं करता और भक्ति के अथाह सागर में डूबकर ही आनंद की प्राप्ति करता है-

“मैं अपनो मन-भावन लीनौं, इन लोगन को कहा न कीनौं।

मन दै मोल लयौ री सजनी, रतन अमोलक नन्ददुलारे॥

नवल लाल रंग भीनो।

कहा भयो सब के मुख मोरे, मैं पायो पीव प्रबीनौं।

 ‘रसिकबिहारी’ प्यारो प्रतीम, सिर बिधनां लिख दौनौ॥”

 

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया पर्यावरण दिवस

कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में गत 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया गया। इस अवसर पर स्कूल की पाँचवीं कक्षा की छात्राओं ने पर्यावरण संरक्षण का सन्देश विभिन्न सृजनात्मक माध्यमों से दिया। छात्राओं ने अपने आहार से जुड़ी आदतों को बदलने, शहरों को हरा – भरा बनाने और अधिक पेड़ लगाने का प्रण लिया। सभी गतिविधियाँ यूएन के स्थायी विकास से जुड़े उद्देश्य से नजदीकी से जुड़े थे जिनमें कार्बन उत्सर्जन कम करने का लक्ष्य भी शामिल है।

सुरधारा – लोकगीत संध्या

विश्व संगीत दिवस के अवसर पर गत 21 जून 2021 को आयोजित संगीत संध्या की झलक

प्रकृति

पर्यावरण दिवस पर आयोजित कार्यक्रम. 5 से 10 जून तक चला, उत्सव की झांकी

शुभजिता – उल्लास

साहित्य, कला और हस्तशिल्प के रंगों से सजा उल्लास खूब सराहा गया…यह आयोजन 5 से 15 अप्रैल तक चला

 

 

वेबिनार में हुई ऑनलाइन रोजगार की चुनौतियों और समाधान पर चर्चा

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में प्रो उर्वी शुक्ला ने विद्यार्थियों को ऑनलाइन माध्यमों रोजगार हेतु साक्षात्कार और इससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की। इस विषय पर आयोजित एक वेबिनार में उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि एक ओर जहाँ कोरोना महामारी के दौरान कई लोगों के रोजगार चले गए वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन रोजगार पाने के लिए की कई रास्ते खुल गए हैं। अब ऑनलाइन बहुत से रोजगार और नौकरियों के विज्ञापन ई – पेपर में प्राप्त हो जाते हैं। कॉर्पोरेट कपनियों, सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही संस्थानों में, शिक्षण स्वास्थ्य और अन्य सभी जगह रिक्त पदों के विषय में जानकारी दी जाती है।
प्रो उर्वी शुक्ला ने वर्तमान स्थितियों में विद्यार्थियों को ऑनलाइन साक्षात्कार की तैयारियों से जुड़ी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन होने पर आमने सामने जब इंटरव्यू हो तो विद्यार्थियों को आत्मविश्वास, अपना व्यवहार, मानसिक, शारीरिक और तकनीकी रूप से पूरी तैयारी करनी आवश्यक है। 60 सेकेंड में ऑनलाइन पर अपना पूरा परिचय देने के तरीके बताये और कहा कि उम्मीदवारों की प्रतिभा और कमजोरियों को आंकने की आवश्यकता है। प्रश्नों के उत्तर पारदर्शिता से देने की सलाह दी। वर्तमान में यदि कोई विद्यार्थी कम्प्यूटर का पूरा ज्ञान रखता है उसके लिए ऑनलाइन रोजगार पाना मुश्किल नहीं है। 100 से अधिक विद्यार्थियों ने इस वेबिनार में भाग लिया ।कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने विद्यार्थियों को बताया कि आने वाले समय में ऑनलाइन मिलने वाले रोजगारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उडीसी,प्रो श्रद्धा अग्रवाल और अन्य शिक्षक उपस्थित रहे । कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

‘अर्चना’ की मासिक गोष्ठी में कविताओं की गूँज

कोलकाता : साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था ‘अर्चना’ की मासिक गोष्ठी जूम पर संपन्न हुई। सभी सदस्यों ने विभिन्न भाव लिए रंग बिरंगी रचनाएं सुनाई । प्रसन्ना चोपड़ा ने ने जिंदगी है उनकी साहित्य आराधना, हिम्मत चौरडिया ने हौसलों में बसी सफलता की कामना, शशि कंकानी ने नदी की मनोदशा का मार्मिक भावपूर्ण वर्णन, उषा श्राफ ने वर्षा में प्रकृति के मनोरम दृश्यों का वर्णन, मृदुला कोठारी ने प्रश्नोत्तर शैली में व्यक्त मनभावन रचना, वसुंधरा मिश्र ने प्राकृतिक भावभरे उद्वेगों को सहेजने, बनेचंद मालू ने बालस्मृति की रेलगाड़ी में सफर करवाना, समृद्धि मंत्री ने खूंटी पर टंगी कॉलेज की यादों से अपने वो दिन तरोताजा किए, सुशीला चनानी ने कहीं चांद, कहीं वन, नवरतन भंडारी ने महकती,मचलती मानवीय संवेदना अतीत के चक्रव्यूह में घूमती यादों का अनमोल खजाना,
विद्या भंडारी ने ससुराल में अपनापन दिखाना / पति- पत्नी को टेनिस बॉल की उपमा से सजाना, भारती मेहता ने सूने कक्ष में पड़े घड़े का अनोखा अंदाज बयां किया और इंदु चांडक ने बरसात में भीगी भीगी रचना से आनंदित किया। कविता की प्रमुख पंक्तियां – हौंसला मन में अगर तो जीत कितनी दूर तुमसे-हिम्मत चौरडिया, हाइकु ,क्षणिका ,वर्षा के गीत चांद की अदा,कितना मनमौजी है सूरज ,भीगा भीगा मौसम है- सुशीला चनानी, शर्मोहया के परदे में झुकी झुकी सी नज़र झरोखे से झांकती..मीना दूगड़ ।क्षणिकाएँ…रिक्त कक्ष हो, कोने में रखा हो जलपूरित गीला घड़ा…तो लगता है शीतलता अभी बाकी है-भारती मेहता, बारिश का मौसम आया-उषा श्राफ।यादों का सिलसिला-बनेचन्द मालू, कजरारे बदरा अम्बर पे छाये-इंदू चांडक। नदी की पुकार, मेरी महिमा को जान मुझसे करले तू प्यार -शशि कंकानी, उमस के पावस बरस गए/तरस गए हां बरस गए-मृदुला कोठारी, साहित्य की साधना आराधना करती साहित्य मेरी जिंदगी मेरी कलम चलती-प्रसन्ना चोपड़ा, जरा सा अपनापन दिखा कर तो देखो,वह खिंची चली आएगी, जरा सा अपनापन दिखा कर तो देखो,वह खिंची चली आएगी – विद्या भंडारी, प्रकृति के उद्वेग – वसुंधरा मिश्र आदि सभी कविताएं एक से बढ़कर एक रहीं। यह कार्यक्रम सात जुलाई बुधवार शाम अर्चना की मासिक कवि गोष्ठी के अंतर्गत आयोजित की गयीं जिसमें हमेशा की तरह स्वरचित कविताएँ पढ़ी जाती हैं जिससे मौलिक और सृजनात्मक रचनाओं को बढ़ावा मिलता है और लिखने के अभ्यास के साथ मस्तिष्क उर्वर बना रहता है। गोष्ठी में हाइकु ,क्षणिकाएं,मुक्त छन्द कवितायें ,गीत आदि विभिन्न विधाओं की रचनाएँ पढी गयीं। सामाजिक विषय भी कविताओं के माध्यम से उठाए गए पर वर्षा ऋतु की रचनाएँ हर दिल पर छाई रहीं। गोष्ठी का संचालन किया इन्दु चाण्डक ने।

भवानीपुर कॉलेज में सेल्फ ग्रूमिंग और एटीकेट्स पर वेबिनार

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में ‘स्वयं को संवारना और शिष्टाचार’ विषय पर तीन दिन के वेबिनार का आयोजन किया गया। जूम पर आयोजित इस वेबिनार में विद्यार्थियों को सेल्फ ग्रूमिंग और एटीकेट्स के तरीके पता चले। वेबिनार में गेराल्डीन रसल रे प्रमुख वक्ता रहीं। उन्होंने फैशन पर चर्चा की और तीन दिनों तक चलने वाले इस सत्र में विषय पर आधारित कई बातें समझायीं। प्रथम दिन २१वीं सदी में होने वाले फैशन उद्योग और उससे जुड़े इतिहास पर केंद्रित रहा। बदलती जीवनशैली के अनुरूप परिधानों. डिजाइन, मेकअप, और फैशन के बारे में भी विद्यार्थियों को पता चला। दूसरे दिन गेराल्डीन ने शिष्टाचार के इतिहास और तीसरे दिन टेबल मैनर्स यानी मेज पर खाते समय किस तरह व्यवहार, होना चाहिए, यह बताया। गेराल्डीन रसल रे मॉडलिंग प्रशिक्षक हैं और बॉलीवुड हस्तियों के साथ काम कर चुकी हैं। तीन दिनों के इस सत्र का तकनीकी सहयोग बिनोद जोसेफ पॉल और गौरव किल्ला द्वारा किया गया । प्रश्नोत्तर सेशन में ‘कॉलेज में यूनीफॉर्म होना चाहिए कि नहीं ‘ विषय पर विद्यार्थियों ने वाद – संवाद किया। इस वेबिनार में 100 से अधिक विद्यार्थियों की उपस्थिति रही ।प्रो दिलीप शाह ने गैराल्डीन रसल रे को धन्यवाद दिया। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उडीसी आयोजन में रहे। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

 

 

 

 

 

कवि केदारनाथ सिंह की स्मृति में युवा कविता उत्सव का आयोजन

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से हिंदी के लोकप्रिय दिवंगत कवि केदारनाथ सिंह के जन्मदिन के अवसर पर युवा कविता उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार के निधन पर शोक ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ ने कहा कि मिशन की ओर से कवि केदारनाथ के जन्म दिवस को युवा कविता उत्सव के रूप मनाया जाना एक सराहनीय प्रयास है। केदारनाथ सिंह की कविताओं में भविष्य के लिए गहरी बेचैनी दिखती है। संस्कृतिकर्मी संजय जायसवाल ने कहा कि केदारनाथ जी मानव-विरोधी शक्तियों के बरक्स मनुष्यता की पहल करते हैं। वे साधारण को भी असाधारणत्व प्रदान करते हैं। इस अवसर पर डॉ राजेश मिश्र,प्रकाश त्रिपाठी, मधु सिंह,पंकज सिंह, अन्नू तिवारी, रूपेश कुमार यादव,गायत्री बाल्मीकि, सुशील कुमार,मधु साह,विक्रम साव ने स्वरचित कविता पाठ और सूर्यदेव राय,राहुल गौड़, पार्वती शॉ,निखिता पांडे, प्रीति साव,साक्षी झा, नलिनी साहा,राधा कुमारी ठाकुर और संजना जायसवाल ने केदारनाथ सिंह की कविताओं पर आवृत्ति की।कार्यक्रम का संचालन पंकज सिंह और धन्यवाद ज्ञापन श्री रामनिवास द्विवेदी ने दिया।

श्री शिक्षायतन कॉलेज में राष्ट्रीय ई- संगोष्ठी का आयोजन

कोलकाता : श्री शिक्षायतन कॉलेज (कोलकता) के हिन्दी विभाग द्वारा ‘लैंगिक विमर्शः साहित्य, समाज और सिनेमा’ पर राष्ट्रीय ई- संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन विभाग की अध्यापिका प्रो. अल्पना नायक ने किया। संचालन के दौरान उन्होंने कहा कि एलजीबीटी समुदाय लैंगिक भेदभाव के कारण उत्पीड़न का शिकार है। हमें यही देखना है कि साहित्य और सिनेमा उनके साथ कितना न्यायकर पा रहे हैं। बीज वक्ता के रूप में असम विश्वविद्यालय के प्रो. जय कौशल ने सिनेमा और साहित्य के माध्यम से कई महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर अपनी बात रखी। उन्होनें कहा कि यह प्रश्न उठाना चाहिए कि समाज में हम जेंडर को लेकर कितने जागरूक हैं? एलजीबीटी समुदाय के लोगों को देख कर हमारी प्रतिक्रिया कैसी होती है? समाज में स्त्री, एलजीबीटी , बाईसेक्सुअल,गे आदि अधिक उत्पीड़ित होते हैं। एलजीबीटी समुदाय के प्रति सकारात्मक सोच में पश्चिम की तुलना में भारतीय समाज बहुत पीछे है। सिनेमा में प्रसिद्ध कलाकारों के द्वारा इस विषय पर रोल अदा कराने का प्रचलन बढ़ा है। साहित्य में भी इन विषयों पर सहजता से लिखा जा रहा है ताकि समाज इस समुदाय को सहज रूप में स्वीकार कर सके। दूसरी वक्ता के रूप में पाती पुरोहित ने नारीवाद की नजर से पुरुषत्व विषय पर अपनी बात रखी। उन्होनें कहा कि लैंगिक विमर्श इंटर सेक्सुअलीटी सब एक दूसरे से संबंधित हैं पर लोग इस विषय पर बात करने से कतराते हैं। इस विषय में भाषा बड़ा रोल अदा करती है। श्यामलाल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापिका डॉ. सुजाता ने कहा कि कि जैविक अंतर ही स्त्री-पुरुष के अंतर का नींव है। एक सेक्स है जो जन्म से मिलता है और जेंडर समाज तय करता है। समाज में बचपन के खिलौने से स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव शुरु हो जाता है। । कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखक प्रदीप सौरभ ने की । उन्होंने कहा समाज स्त्री और पुरुष के तालमेल के बिना नहीं चल सकता है। प्रश्नोत्तर सत्र का संचालन डॉ रचना पाण्डेय ने किया। विभाग की अध्यापिका डॉ. प्रीति सिंघी ने धन्यवाद ज्ञापित किया एवं इस संगोष्ठी की रिपोर्टिंग डॉ. रेणु चौधरी ने किया।