Thursday, July 2, 2026
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खिचड़ी….देश को एक सूत्र में बाँधने वाला व्यंजन

खिचड़ी के चार यार ,दही ,पापड़ ,घी और अचार’ और कही कही गुड़ भी। गुजरात की राम खिचड़ी बोलिए, महाराष्ट्र की वलाची खिचड़ी, आंध्रप्रदेश की कीमा खिचड़ी, कर्नाटक-तमिलनाडु की बेसीभिली भात या राजस्थान का खिचड़ा। सब कुछ मिलजुल कर खिचड़ी ही बनती है। राजस्थान में चावल कम और बाजरा ज्यादा का खिचड़ा तो सर्दियों का पकवान है।
खिचड़ी का इतिहास
माना जाता है कि खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के खिच्चा शब्द से हुई है. खिच्चा चावल और विभिन्न प्रकार की दाल से बनने वाला खाद्य पदार्थ होता है. खिचड़ी का इतिहास करीब ढाई हजार साल पुराना है. इंडिया करेंट्स नामक वेबसाइट के एक लेख के अनुसार ग्रीक राजदूत सेलुकस ने लिखा है कि इंडिया में चावल और दाल से बना खाद्य पदार्थ काफी लोकप्रिय है. पाकशास्त्री मानते हैं कि ये डिश खिचड़ी या उसका पूर्व रूप रही होगी. मोरक्को के सैलानी इब्न बतूता ने भी भारत में चावल और मूंग की दाल से बनने वाली खिचड़ी का उल्लेख किया है. इब्न बतूता सन् 1350 में भारत आया था. 15वीं सदी में भारत आने वाले रूसी यात्री अफानसी निकितीन ने भी भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय खिचड़ी का जिक्र किया है
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के एक सर्वे में प्रमाण मिले हैं कि 1200 ईस्वी से पहले भारतीय लोग दाल-चावल को मिला कर खाया करते थे। इसके अलावा मगध के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री और कूटनीति के लिए विख्यात चाणक्य ने भी खिचड़ी को संतुलित आहार बताया है। चाणक्य के अनुसार एक भाग चावल, एक चौथाई भाग दाल, हल्का नमक और घी के साथ खिचड़ी खाना फायदेमंद होता है। खिचड़ी का सबसे पहला जिक्र आयुर्वेद में मिलता है। चरक संहिता में भी खिचड़ी का उल्लेख आता है। इसमें किशर शब्द से खिचड़ी निकला है। जिसको खाने के समय के बारे में कहा गया है कि, इसका उत्तम समय मकर संक्रांति के बाद शुरू होता है। इस समय देवयोग शुरू हो जाता है और खिचड़ी देवताओं को पसंद है। सूर्य का उत्तरायण होना उत्साह और ऊर्जा के संचारित होने का समय माना जाता है और खिचड़ी इंसानों के अंदर इसी उर्जा को प्रवाहित करती है। तमिलनाडु में इसे ‘पोंगल’ कहा जाता है। यहां ये चावल, मूंगदाल और दूध के साथ गुड़ डाल कर पकाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल सूर्य, इन्द्र देव, नई फ़सल और पशुओं को समर्पित एक त्योहार होता है।
पौराणिक इतिहास की बात करें तो इसमें जिक्र आता है कि, सबसे पहले भगवान शिव ने खिचड़ी बनाई थी और भगवान विष्णु ने इसे खाया था और इस भोजन को स्वादिष्ट के साथ ही सुपाच्य बताया था। लेकिन अगर इतिहास की बात करें तो आयुर्वेद के बाद खिचड़ी का जिक्र अच्छे तौर पर यूनान के शासक सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस ने भी किया है। वहीं इब्नबतूता ने भी अपने यात्रा संस्मरणों में खिचड़ी का जिक्र किया है जिसमें उसने उस समय भारत में खिचड़ी को एक लोकप्रिय खाना बताया है। बतूता को मूंग की दाल वाली खिचड़ी खाने को मिली थी, जिसे उन्होंने स्वादिष्ट बताया था। वहीं पंद्रहवीं शताब्दी में भारत आए रूसी यात्री अफानसीनि निकेतिन ने भी खिचड़ी का जिक्र किया है। वहीं ‘आइने—ए—अकबरी’ में भी अबुल फजल ने खिचड़ी का जिक्र किया है और उसने सात तरह से खिचड़ी बनाने के तरीके भी बताएं हैं।
कहा जाता है कि, अकबर के बेटे जहांगीर को खिचड़ी बहुत पसंद थी। उसी समय से शाहजहांनी खिचड़ी का भी चलन चलता आ रहा है। उसने इसे लाजवाब कहा था। उसके मुगल दस्तरख्वान में खिचड़ी को अहम स्थान हासिल था। हालांकि उसकी खिचड़ी में सूखे फल, सूखे मेवे, केसर, तेजपत्ता, जावित्री लौंग का भी इस्तेमाल होता था। इस दौर में यह व्यंजन मांसाहारी हो गया जिसे हलीम नाम दे दिया गया।
नाथ परंपरा से जुड़ा है खिचड़ी का इतिहास
खिचड़ी को लेकर मकरसक्रांति का पर्व भी मनाया जाता है। इस पर्व का सबसे ज्यादा महत्व नाथ संप्रदाय के बीच देखने को मिलता है। कहा जाता है कि खिचड़ी को सबसे ज्यादा लोकप्रिय नाथों ने ही बनाया है। लोकमान्यता के मुताबिक खिलजी ने जब भारत पर आक्रमण किया था उस समय नाथ योगियों ने उसका डटकर मुकाबला किया। इस दौरान उन्हें भोजन पकाने का समय नहीं मिलता था और भूखे रहना पड़ता था। नतीजतन, नाथ संप्रदाय के बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने का यह नुस्खा निकाला। इसीलिए इस संप्रदाय के मठों और मंदिरों पर खिचड़ी का पर्व बहुत उल्लास से मनाया जाता है।
खिचड़ी चावल और विभिन्न प्रकार की दाल से बनने वाला भोजन होता है। कई जगहों पर बाजरा और मूंगदाल के साथ भी इसे पकाया जाता है। खिचड़ी कई मायनों में खास है। यह वह डिश है जिसे हर बच्चे को आसानी से यानी बिना किसी दिक्कत के खिलाया जा सकता है और इसी वजह से इसे फर्स्ट सॉलिड बेबी फूड भी कहा जाता है। व्रत के दौरान साबूदाने से बनाई गयी खिचड़ी भी खाई जाती है।
फायदे
खिचड़ी एक आयुर्वेदिक आहार है। इसे नियमित खाने से वात्त, पित्त और कफ की समस्या नहीं होती। वहीं ये शरीर को डिटॉक्स करने के साथ-साथ एनर्जी लेवल बढ़ाने और इम्युनिटी को सुधारने में भी मदद करता है। ये जितनी स्वादिष्ट होती है उतनी ही पोषण से भरपूर भी। यह शरीर को पोषक उर्जा और पोषण देने का काम करती है। खिचड़ी में आमतौर पर ज्यादा मसालों का प्रयोग नहीं किया जाता, यही कारण है कि, खिचड़ी हमेशा से एक सेहत के लिए उत्तम आहार मानी जाती रही है। आयुर्वेद बताता है कि यह फूड हमारी आंत और पेट के लिए बहुत फायदेमंद चीज है। गर्भावस्था के दौरान अक्सर महिलाओं को कब्ज या अपच की दिक्कत होती है। वहीं बाहर का खाना ज्यादा खाने से भी लोगों के पेट में यह समस्या हो जाती है। लेकिन इस सब का इलाज खिचड़ी है। खिचड़ी मूड सही करने के लिए भी सबसे सही भोजन माना जाता है।
उत्तराखंड की पहाड़ी खिचड़ी ज्यादातर सादी होती है। यह खिचड़ी प्रसाद के रूप में जानी जाती है. यहां के ब्रदीनाथ मंदिर समेत कई जगह प्रसाद के रूप में खिचड़ी दी जाती है। इसे सीधे पानी में उबाल कर बनाया जाता है और प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
वही हिमाचल प्रदेश में दाल चावल के साथ कुछ राजमा और सफ़ेद छोले डालकर खिचड़ी बनायीं जाती है. इसका स्वाद राजमा और सफ़ेद छोले, के साथ कुछ स्थानीय मसाले के मिश्रण के साथ अलग ही लगता है।

उत्तर प्रदेश के व्यंजनों में आवला का प्रयोग किया जाता है तो यहाँ की खिचड़ी में काली दाल, चावल के साथ आवला का प्रयोग कर विशेष खिचड़ी बनायीं जाती है और ये मकर संक्रांति के त्यौहार पर दान में भी दी जाती है।
राजस्थान राज्य अपने शाही खाने के लिए काफी जाना जाता है, तो ऐसा कैसे हो सकता है की आपको राजस्थान में खिचड़ी का स्वाद न मिले. यही की खिचड़ी दाल, गेहू और बाजरा की बनती है और इसकी विशेषता ये है इससे बहुत अच्छे से पकाया जाता है और ये काफी गरम तासीर की होती है और ये सर्दियों में राजस्थानी सब घरो में मिलती है।
अब आते है गुजरात की खिचड़ी पर, इसमें खासतौर से हल्दी और हींग का प्रयोग किया जाता है। गुजरात की खिचड़ी आमतौर पर पतली बनायीं जाती है और ज्यादातर कढ़ी और सुराती उंधनिया आदि के साथ परोसी जाती है।
महाराष्ट्र में साबूदाने की खिचड़ी प्रसिद्ध हैं। मुंबई महानगरी में खिचड़ी बहुत ही मसालेदार बनती है और लोग उससे काफी उत्साह से कहते है और इससे भी लजीज खाने में गिनते है. यहां के लोग तीखी खिचड़ी खाते हैं। यही साबूदाने की खिचड़ी उत्तर भारत में ज्यादातर व्रत के दौरान भी बनाई और खायी जाती है।
तमिलनाडु में मीठी खिचड़ी बनाई जाती है और इससे पोंगल कहा जाता है। इस खिचड़ी का बहुत महत्व है, और इसकी खासियत है कि इसे नमकीन भी बनाया जा सकता है। मीठी खिचड़ी यहां के मंदिरों में प्रसाद के रूप में बांटी जाती है।
आंध्र प्रदेश में कीमा खिचड़ी खाई जाती हैं। जिसमें ग्राउंड बीफ, चावल, दाल, सॉस के साथ इमली और तिल का मिश्रण होता है। और कई जगह लोग इसमें दाल का प्रयोग नहीं करते हैं।
कर्ऩाटक में खिचड़ी सब्जियों से भरपूर होती है। यहां की खिचड़ी में इमली, गुड़, मौसमी सब्जियां, कढ़ी पत्ता, सूखे नारियल का बुरादा और सेमल की रुई का इस्तेमाल किया जाता है। और ये काफी मज़ेदार होती है।
बंगाल में खिचड़ी का विशेष स्थान रूप है. और ये दुर्गा पूजा में भोग के रूप में प्रसाद में दी जाती है, जो तैयार होती है दाल, चावल और विभिन्न सब्जियों से. यहां की खिचड़ी मीठी होती हैं। बिहार की खिचड़ी सब्जियों और मसालों से भरपूर होती है। आमतौर पर शनिवार को इसे बनाया जाता है।
(स्त्रोत साभार – आउटलुक हिन्दी, द इंडियननेस डॉट कॉम, रिलीजन वर्ल्ड डॉट इन, द्वारका एक्सप्रेस)

जानिए अपने जरूरी कानूनी अधिकार

अधिकार प्राप्त करने के लिए सबसे पहले उनकी जानकारी जरूरी है। अधिकतर महिलाएं अपने अधिकार जानती ही नहीं और इसी कारण से वे ज्यादती सहती हैं। उत्पीड़न का बड़ा कारण अधिकारों की जानकारी न होना है तो कुछ अधिकारों की जानकारी हम आपको दे रहे हैं  –

प्रसूति सुविधा अधिनियम 1961 के तहत वे मेटरनिटी लीव ले सकती हैं, महिला गवाह को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी न होने से वे शिकायत नहीं कर पाती हैं। अगर उन्हें जानकारी हो तो वे हर परिस्थिति का सामना कर सकती हैं। इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट रूल-5, शेड्यूल-5 के तहत शारीरिक संबंध बनाने के प्रस्ताव को न मानने के कारण कर्मचारी को काम से निकालने व लाभों से वंचित करने पर कार्रवाई का प्रावधान है। समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन पाने का अधिकार है।

धारा 66 के मुताबिक महिलाओं को सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बाद काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। भले ही उन्हें ओवरटाइम दिया जाए। यदि वह शाम 7 बजे के बाद ऑफिस में न रुकना चाहे तो उसे रुकने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऑफिस में होने वाले उत्पीड़न के खिलाफ महिला कार्यस्थल प्रताड़ना के लिए सेक्सुअल हैरेसमेंट एक्ट 2013 के तहत प्रकरण दर्ज करा सकती हैं। प्रसूति सुविधा अधिनियम 1961 के तहत महिला मेटरनिटी लीव ले सकती हैं।

पुलिस थाने से जुड़े अधिकार

महिला द्वारा की जाने वाली शिकायत गंभीर प्रकृति की है, तो पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। पुलिस को एफआईआर की कॉपी देना जरूरी है। सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद किसी भी तरह की पूछताछ के लिए किसी भी महिला को पुलिस स्टेशन में नहीं रोका जा सकता। पुलिस स्टेशन में किसी भी महिला से पूछताछ करने या उसकी तलाशी के दौरान महिला आरक्षक का होना जरुरी है। महिला अपराधी की मेडिकल जांच महिला डॉक्टर करेगी या महिला डॉक्टर की उपस्थिति में कोई पुरुष डॉक्टर भी जांच कर सकता है। किसी भी महिला गवाह को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जरुरत पड़ने पर उससे पूछताछ के लिए पुलिस को ही उसके घर जाना होगा।

तो यहाँ करें शिकायत

यदि महिलाओं की पुलिस एफआईआर नहीं करती तो वह इसकी शिकायत एसपी के पास सीआरपीसी धारा 154 के सेक्शन 3 के तहत कर सकती है। इसके अलावा वह कोर्ट में सीआरपीसी धारा 200 के तहत परिवाद दायर कर सकती है। हाईकोर्ट में धारा 482 के तहत परिवाद दायर कर सकती है। साथ ही महिलाओं को निशुल्क कानूनी सहायता पाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में शिकायत कर सकती हैं। साथ ही महिलाएं राज्य महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग में भी प्रकरण रजिस्टर करा सकती हैं।

बच्चों से संबंधित अधिकार

बच्चों से संबंधित अधिकार हिन्दू मैरेज एक्ट 1955 के सेक्शन 26 के मुताबिक पत्नी अपने बच्चे की सुरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के लिए आवेदन कर सकती है। हिन्दू एडॉप्शन एंड सेक्शन एक्ट के तहत कोई भी वयस्क विवाहित या अविवाहित महिला बच्चे को गोद ले सकती है। दाखिले के लिए स्कूल के फॉर्म में पिता का नाम लिखना अब अनिवार्य नहीं है। बच्चे की मां या पिता में से किसी भी एक अभिभावक का नाम लिखना ही पर्याप्त है।

पिता की संपत्ति का अधिकार

भारत का कानून किसी महिला को अपने पिता की पुश्तैनी संपति में पूरा अधिकार देता है। अगर पिता ने खुद बनाई हुई संपति की कोई वसीयत नहीं की है, तब उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति में लड़की को भी उसके भाईयों और मां जितना ही हिस्सा मिलेगा। यहंा तक कि शादी के बाद भी यह अधिकार बरकरार रहेगा।  जमीन जायदाद से जुड़े अधिकार विवाहित या अविवाहित, महिलाओं को अपने पिता की सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा पाने का हक है। इसके अलावा विधवा बहू अपने ससुर से गुजरा भत्ता व संपत्ति में हिस्सा पाने की भी हकदार है।

हिन्दू मैरेज एक्ट

1955 के सेक्शन 26 के मुताबिक पत्नी अपने बच्चे की सुरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के लिए आवेदन कर सकती है। हिन्दू एडॉप्शन एंड सेक्शन एक्ट के तहत कोई भी वयस्क विवाहित या अविवाहित महिला बच्चे को गोद ले सकती है। दाखिले के लिए स्कूल के फॉर्म में पिता का नाम लिखना अब अनिवार्य नहीं है। बच्चे की मां या पिता में से किसी भी एक अभिभावक का नाम लिखना ही पर्याप्त है। जमीन जायदाद से जुड़े अधिकार विवाहित या अविवाहित, महिलाओं को अपने पिता की सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा पाने का हक है। इसके अलावा विधवा बहू अपने ससुर से गुजरा भत्ता व संपत्ति में हिस्सा पाने की भी हकदार है। हिन्दू मैरिज एक्ट 1954 के सेक्शन 27 के तहत पति और पत्नी दोनों की जितनी भी संपत्ति है, उसके बंटवारे की भी मांग पत्नी कर सकती है। पत्नी के अपने ‘स्त्री-धन’ पर भी उसका पूरा अधिकार रहता है। साथ ही कोपार्सेनरी राइट के तहत उन्हें अपने दादाजी या अपने पुरखों द्वारा अर्जित संपत्ति में से भी अपना हिस्सा पाने का पूरा अधिकार है। यह कानून सभी राज्यों में लागू हो चुका है।

अपनी संपत्ति से जुड़े निर्णय

कोई भी महिला अपने हिस्से में आई पैतृक संपत्ति और खुद अॢजत की गई संपत्ति का जो चाहे कर सकती है। अगर महिला उसे बेचना चाहे या उसे किसी और के नाम करना चाहे तो इसमें कोई और दखल नहीं दे सकता। महिला चाहे तो उस संपत्ति से अपने बच्चों को बेदखल भी कर सकती है।

घरेलू हिंसा से सुरक्षा

महिलाओं को अपने पिता या फिर पति के घर सुरक्षित रखने के लिए घरेलू हिंसा कानून है। आम तौर पर केवल पति के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस कानून के दायरे में महिला का कोई भी घरेलू संबंधी आ सकता है। घरेलू हिंसा का मतलब है महिला के साथ किसी भी तरह की हिंसा या प्रताडऩा। ये भी जान लीजिये कि केवल मारपीट ही नहीं फिर मानसिक या आॢथक प्रताडऩा भी घरेलू हिंसा के बराबर है। ताने मारना, गाली-गलौज करना या फिर किसी और तरह से महिला को भावनात्मक ठेस पहुंचाना अपराध है। किसी महिला को घर से निकाला जाना, उसका वेतन छीन लेना या फिर नौकरी से संबंधित दस्तावेज अपने कब्जे में ले लेना भी प्रताडऩा है, जिसके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला बनता है। बिना शादी साथ रहने यानी ‘लिव इन’ संबंधों में भी यह लागू होता है।

मुफ्त कानूनी मदद लेने का हक

अगर कोई महिला किसी केस में अभियुक्त है तो महिलाओं के लिए कानूनी मदद नि:शुल्क है। वह अदालत से सरकारी खर्चे पर वकील करने का अनुरोध कर सकती है। यह केवल गरीब ही नहीं बल्कि किसी भी आॢथक स्थिति की महिला के लिए है। पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता समिति से संपर्क करती है, जो कि महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देने की व्यवस्था करती है।

(साभार – दैनिक भास्कर और न्यूज ट्रैक)

1 लाख 20 हजार में बिक गये तुलसी के 12 आम

जमशेदपुर : जमशेदपुर में एक व्यक्ति ने सड़क किनारे बिक रहे 12 आम के लिए एक लाख 20 हजार (1.20 लाख) रुपये कीमत चुकायी है। सड़क किनारे 1.20 लाख रुपये में आम बेचने वाली लड़की जमशेदपुर निवासी 12 वर्षीय तुलसी कुमारी है। उसके 12 आम के लिए 1.20 लाख रुपये चुकाए हैं मुम्बई की कंपनी वैल्युएबल एडुटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड ने। कंपनी ने तुलसी कुमारी से मात्र एक दर्जन आम 1.20 लाख रुपये में खरीदे हैं। ताकि सड़क किनारे आम बेचने वाली वो गरीब लड़की फिर अपनी पढ़ाई शुरू कर सके। कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई करने के लिए तुलसी को एक स्मार्ट मोबाइल फोन की आवश्यकता थी।
जमशेदपुर के स्ट्रैट माइल रोड के आउट हाउस में अपने माता-पिता के साथ रहने वाली और 5वीं कक्षा की छात्रा तुलसी विगत दिनों कीनन स्टेडियम के पास लॉकडाउन के दौरान आम बेच रही थी। तुलसी ने बताया कि वह 5000 रुपये कमाना चाहती थी, ताकि वह एक मोबाइल फोन खरीद सके और अपनी ऑनलाइन पढ़ाई फिर से शुरू कर सके। स्मार्ट फोन के अभाव में वह अपनी ऑनलाइन पढ़ाई शुरू नहीं कर पा रही थी। कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी। तुलसी के प्रति लाखों लोग सहानुभूति व्यक्त करने लगे।

सोशल मीडिया से मिली जानकारी
मुम्बई स्थित वैल्यूएबल एडुटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अमेया हेटे को सोशल मीडिया के जरिये इसकी जानकारी मिली तो वो सिर्फ सहानुभूति व्यक्त करने तक नहीं रुके। उन्होंने 10,000 रुपये प्रति आम के हिसाब से लड़की से 12 आम 1,20,000 रुपये में खरीद लिये। उन्होंने पूरी राशि तुलसी के पिता के बैंक खाते में स्थानांतरित कर दी। साथ ही उन्होंने तुलसी को पत्र लिखा “आपकी दृढ़ता और संघर्ष की कहानी को मीडिया द्वारा आगे लाया गया था और वर्षा जहांगीरदार द्वारा मेरे संज्ञान में लाया गया था। आप जैसे कई छात्र हैं जो आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी के कारण ऑनलाइन सीखने के नये युग का सामना करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मैं वास्तव में इस तथ्य से प्रभावित हूं कि आपने हार नहीं मानी और इससे निपटने के लिए संघर्ष किया। आपने साबित कर दिया है कि ‘जहां चाह है, वहां राह है’। आपने ‘इच्छा’ दिखाई है, हम ‘रास्ता’ खोजने में आपकी मदद कर रहे हैं।”
शिक्षिका बन गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहती है तुलसी
तुलसी बताती हैं कि लॉकडाउन के कारण उसके पिता की नौकरी छूटने के बाद परिवार आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। तुलसी पढ़ना चाहती थी, लेकिन मोबाइल फोन न खरीद पाने की वजह से पढ़ाई नहीं कर पा रही थी। तुलसी ने बताया कि अब वह स्वयं पढाई करेगी और साथ में दो बहनें रोशनी तथा दीपिका को भी पढ़ाएगी। उसका सपना है कि तीनों बहनें शिक्षिकाएं बनकर गरीब बच्चों के बीच शिक्षा का प्रसार करेंगी, जिससे कोई भी गरीब शिक्षा से वंचित न रह सके।

लघु बचत वाली योजनाओं की ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं

नयी दिल्ली : फिक्स इनकम वाले निवेश विकल्पों में पैसे लगाने वाले लोगों के लिए खुशखबरी है। केंद्र सरकार ने लघु बचत यानी स्मॉल सेविंग की ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया है। 30 सितंबर 2021 को समाप्त होने वाली तिमाही के लिए छोटी बचत पर ब्याज दरें अपरिवर्तित रखी गयी है। 30 जून 2021 को केंद्र सरकार द्वारा जारी एक सर्कुलर में कहा गया है कि पीपीएफ पर 7.1 फ़ीसदी, एनएससी पर 6.8 फीसदी और पोस्ट ऑफिस मासिक आय योजना अकाउंट पर 6.6 फ़ीसदी ब्याज मिलता रहेगा।
छोटी बचत में पब्लिक प्रोविडेंट फंड ( पीपीएफ), नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (एनएससी), सुकन्या समृद्धि योजना और अन्य योजनाएं आती हैं। इसका मतलब यह है कि पीपीएफ और सुकन्या योजना में निवेश करने वाले निवेशक को वही ब्याज मिलता रहेगा जो उन्हें 30 जून को समाप्त तिमाही में मिल रहा था। निवेश के इन विकल्पों में पैसे लगाने वाले लोगों को भी वही ब्याज मिलेगा जो पिछली तिमाही में मिल रहा था।
इससे पहले अप्रैल में सरकार ने छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दरों में कमी करने का फैसला वापस ले लिया था। सरकार ने कुछ दिन पहले ही यह फैसला लिया था, लेकिन अगले दिन इस बारे में वित्त मंत्रालय की तरफ से ट्वीट के जरिए फैसला वापस लेने की जानकारी दी गयी। सवा साल पहले हुआ था बदलाव
सरकार ने करीब सवा साल पहले छोटी ब्याज योजनाओं की ब्याज दर में कमी की थी। तब वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में ब्याज दरों में 1.4 फीसदी तक की कमी की गई थी। अब सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (एससीएसएस) पर ब्याज की दर 7.4 फीसदी होगी। अगर सरकार ने कटौती का फैसला वापस नहीं लिया होता तो यह दर 6.5 फीसदी रह जाती। पांच साल के रेकरिंग डिपॉजिट पर ब्याज की दर 5.8 फीसदी होगी। अगर सरकार ने कटौती का फैसला वापस नहीं लिया होता तो यह 5.3 फीसदी होती।

कनाडा में जानलेवा हीट डोम का कहर, गर्मी ने तोड़ा 10 हजार साल का रिकॉर्ड

एक दिन में 230 मरे
कनाडा के आसामान में बने हीट डोम के कारण गर्मी ने 10000 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में तो पारा 49.44 डिग्री सेल्सियस तक रिकॉर्ड किया गया है। अत्याधिक गर्मी के कारण एक दिन में ही 230 लोगों की मौत हो गई है। ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर जॉन होर्गन ने मौत की पुष्टि करते हुए कहा कि उनके राज्य में तापमान के चरम तक पहुंचने के कारण 230 लोगों की मौत हुई है।
गत रविवार से पहले कनाडा में कभी भी तापमान 113 डिग्री फारेनहाइट यानी 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं गया था। तापमान का यह रिकॉर्ड साल 1937 में बना था। लेकिन इस बार 10 हजार साल में एक बार बनने वाले हीट डोम के कारण तापमान 49 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर गया। अधिकारियों का कहना है कि अकेले वैंकूवर में गर्मी के कारण 65 लोगों की मौत हुई है।
कनाडा की मौसम सेवा ने कहा कि इस अत्यधिक गर्मी को शब्दों का वर्णन नहीं कर सकता है। मौसम विभाग ने बताया कि ब्रिटिश कोलंबिया का रिकॉर्ड अब लास वेगास में दर्ज किए गए अबतक के सबसे उच्चतम तापमान से भी अधिक है। यह हीटवेव कनाडा से लेकर अमेरिका तक फैली हुई है। अमेरिका के वाशिंगटन और ओरेगन में भी रिकॉर्ड तापमान का अनुभव किया जा रहा है।

क्या है हीट डोम, जिसने मचाई तबाही
कनाडा में पिछले 10 हजार साल में पहला मौका है, जब हीट डोम ने गर्मी बढ़ाकर तबाही मचाई है। इसके कारण गर्मी वायुमंडल में अधिक फैलती है और दबाव और हवा के पैटर्न को प्रभावित करती है। गर्म हवा का यह ढेर उच्च दबाव वाले क्षेत्र में फंस जाता है। इससे आसपास की हवा और भी ज्यादा गर्म होती है। यह बाहरी हवा को अंदर नहीं आने देता है और अंदर की हवा को गर्म बनाए रखता है।
10 हजार साल में पहली बार ऐसा हुआ
अमेरिकी मीडिया सीबीएस के मौसम वैज्ञानिक जेफ बेरार्डेली ने कहा कि अगर आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो 10000 साल में हीट डोम जैसी घटनाएं केवल एक बार होती हैं। अगर आप किसी स्थान पर पिछले 10 हजार साल से रह रहे हों तो आप केवल एक बार हीट डोम की गर्मी का अनुभव कर पाएंगे। बर्नाबी रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस के कैप्टन माइक कलांज ने कहा कि उन्हें पिछले 24 घंटे के अंदर लोगों के मौत के 25 फोन आए।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

‘छत्रकुंवरी मम नाम है कहिबै को जग मांहि’

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों राजघराने की स्त्रियों का साहित्य सृजन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, वह चाहे राजकुल की स्त्रियाँ हों या राज‌दरबार की नर्तकियाँ। किसी- किसी का नाम और योगदान चर्चित हुआ तो कुछ अचर्चित ही रह गया। राजस्थान के राजकुल से संबंधित छत्र कुंवरी बाई जो छत्र कुंवरी राठौड़ के नाम से भी जानी जाती हैं, ने भी साहित्य रचना की थी। वह किशनगढ़ के महाराजा सावंतसिंह की पोती और रूपनगढ़ के महाराज सरदारसिंह की पुत्री थीं। कवयित्री सुंदरी कुंवरी बाई इनकी बुआ थीं। इन का विवाह राघोगढ़ के खींची महाराजा बहादुर सिंह के साथ हुआ था| इनका संबंध निम्बार्क सम्प्रदाय से था। इनके द्वारा रचित एक ग्रंथ मिलता है, “प्रेम विनोद” जिसकी रचना तिथि पर विचार करने पर पता चलता है कि इसका सृजन सन 1800 के अंतिम दशक  के आस- पास हुआ है। अपने ग्रंथ में अपना और अपने वंशवृक्ष का परिचय देते हुए भक्त कवयित्री ने लिखा है-

“रूपनगर नृप राजसी, जिन सुत नागरिदास| 

तिन पुत्र जु सरदारसी, हों तनया तै मास||

छत्रकुंवरी मम नाम है कहिबै को जग मांहि| 

प्रिया सरन दासत्व तै, हौं हित चूर सदांहि ||

सरन सलेमाबाद की, पाई तासु प्रताप| 

आश्रम है जिन रहसि के, बरन्यो ध्यान सजाय||”

“प्रेम विनोद” कृष्ण भक्ति धारा से संबंधित काव्य- ग्रंथ है जिसे आलोचक उत्कृष्ट कोटि का कृष्ण काव्य मानते हैं। कृष्ण भक्ति में डूबकर कवयित्री ने लिखा-

“जुरन धुरन पुनि दुरन मुरन लोचन अनियारे।

बरनागति उर मैं, बानलगि फूट दुसारे।।

कवयित्री की भक्ति माधुर्य भाव की भक्ति है जिसमें डूबकर कृष्ण और गोपियों की लीला का वर्णन उन्होंने अत्यंत सरस ढंग से किया है। कृष्ण वियोग के पश्चात गोपियों की मनःस्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने कृष्ण के प्रति उनके प्रेम और समर्पण का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।  श्रीकृष्ण के द्वारिका प्रस्थान के बाद गोपियाँ अपने प्रिय कृष्ण की पूजा के लिए फूल  चुनने जाती है। वे कदम्ब वृक्ष की डालियों से पुष्प चुनती हुए प्रियतम कृष्ण को याद करते हुए उनकी मधुर स्मृतियों में डूबकर  भाव-विभोर हो जाती है| गोपियों द्वारा फूल लोढ़ने के इस अवसर का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन कवयित्री छत्र कुंवरी बाई ने किया है-

“स्याम सखी हंसि कुंवरिदिस, बोली मधुरे बैन| 

सुमन लेन चलिए अबै, यह बिरिया देन||

यह बिरिया सुख देन, जान मुसकाय चली जब| 

नवत सखी करि कुंवरि, संग सहचरि विथुरी सब|| 

प्रेम भरी सब सुमन चुनत जित तिच सांझी हित|

ये दुहुं बेबीस अंग फिरत निज गति मति मिश्रित||”

फूल लोढ़ने का एक और रसमय प्रसंग निम्नलिखित पंक्तियों  में चित्रित है। श्लेष अलंकार के प्रयोग ने इन पंक्तियों के  काव्य सौन्दर्य के साथ ही अर्थ गांभीर्य को भी कई गुणा बढ़ा दिया है-

“गरवांही दीने कहूं, इकटक लखन लुभाहिं|

पग वग द्वे द्वे पेड़ पे, थकित खरी रहि जाहिं||

थकित खरी रहि जाहिं, दृगन दृग छूटे ते छूटे| 

तन मन फूल अपार, दहुं फल ताह सु लूदे||”

परिमार्जित ब्रजभाषा में रचित छत्र कुंवरी बाई की कविताओं में प्रेम और भक्ति का अद्भुत निदर्शन मिलता है। मध्यकाल की अधिकांश भक्त कवयित्रियों ने कृष्ण भक्ति का आश्रय लेकर अपने ह्रदय में संचित प्रेम और शृंगार के भावों को भी अनायास अभिव्यक्ति दी है इसीलिए कृष्ण भक्त कवयित्रियों के काव्य में माधुर्य भक्ति की माधुरी सहज ही प्रस्फुटित होती है।

 

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया वार्षिक समारोह

कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल के प्राथमिक विभाग का वार्षिक समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने वाली छात्राओं को पुरस्कृत तिया गया। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल गीत से हुई। इसके बाद स्कूल की प्रिंसिपल कोईली दे ने कार्यक्रम को संबोधित किया। उसने बताया कि पिछला साल उथल-पुथल, मिली-जुली भावनाओं और चुनौतियों का साल रहा। लेकिन एक टीम के रूप में हमने सभी बाधाओं का मुकाबला किया और एक फलदायी शैक्षणिक वर्ष के लिए अपनी पूरी कोशिश की। हेडमिस्ट्रेस ने वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने ऑनलाइन कक्षाओं की सफलता, सत्र के दौरान आयोजित शैक्षिक और सह-शैक्षिक गतिविधियों के साथ-साथ स्कूल के भीतर और बाहर छात्रों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किये। इसके बाद पुरस्कारों की घोषणा हुई। शैक्षणिक समन्वयकों ने नर्सरी से कक्षा पांच तक के पुरस्कार विजेताओं की घोषणा की। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

 

बिड़ला हाई स्कूल में इन्टरहाउस वाद – विवाद 2021 -22

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल में हाल ही में वर्चुअल इन्टरहाउस वाद – विवाद प्रतियोगिता जूम पर आयोजित की गयी। प्रतियोगिता का विषय “चिकित्सा विज्ञान ने कोविड -19 महामारी में मानवता को विफल कर दिया है” था। इस अवसर पर अतिथि के रूप में वक्ता राजू रमण उपस्थित थे जो वाद – विवाद में अपनी महारत रखते हैं। प्रतियोगिता के निर्णायकों में बिड़ला हाई स्कूल की प्रिंसिपल लवलीन सैगल, जूनियर सेक्शन की वरिष्ठ शिक्षिका जयन्ती श्रीकान्त, सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की शिक्षिका रूमा चक्रवर्ती शामिल थीं। प्रतियोगिता का संचालन 12वीं (ह्यूमैनिटिज) के विद्यार्थी ईशान बनर्जी ने किया। 6 टीमें थीं और प्रत्येक वक्ता को 5 मिनट में अपना पक्ष समझाना था। कोविड, चिकित्सा सेवा और डॉक्टरों को लेकर चर्चा हुई. चिकित्सकों की भूमिका पर खूब बहस हुई। 54 प्रतिशत मतों के साथ प्रतियोगिता का मोशन गिर गया। सर्वश्रेष्ठ क्यू पैनलिस्ट का पुरस्कार उदिता अरुण नाथ को, सर्वश्रेष्ठ टीम पुष्कर और नक्षत पांडेय को सर्वश्रेष्ठ टीम. को मिला। शिवाजी हाउस के नक्षत को सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुस्कार मिला।
रिपोर्ट – उदित अरुण नाथ औऱ जयेश भिमानी,

 

‘निहायत जरूरी मनुष्य विमर्श है स्त्री विमर्श’

डॉ. विजया सिंह आलोचना के क्षेत्र में अपनी जमीन मजबूत कर रही हैं। पुस्तक समीक्षा में रुचि। फिलहाल रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज में अध्यापन कर रही हैं। वे शुभ सृजन युवा मार्गदर्शक समूह की मेंटर भी हैं। डॉ. विजया सिंह से साहित्य, साहित्यिक विमर्श समेत विभिन्न विषयों पर बात हुई, प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश – 

स्त्री-विमर्श को आप किस रूप में देखती हैं?
मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श निहायत जरूरी मनुष्य विमर्श है जो समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए वैचारिक और व्यवहारिक स्तर पर क्रियाशील है। इसकी दरकार स्त्री और पुरुष दोनों को है ताकि वे तयशुदा भूमिकाओं के परम्परागत सामान्यीकरण से आगे बढ़ सके। नए विकल्पों को अपना सकें। तभी स्वतंत्रता और वास्तविक समानता का सौंदर्य दिखेगा।

साहित्य में स्त्री रचनाकारों की स्थिति पर आप क्या कहेंगी?
साहित्य के क्षेत्र में स्त्री रचनाकारों की बढ़ती संख्या ने स्त्री की पक्षधरता मजबूत की है। उन्होंने स्त्री
के बेहद निजी किन्तु राजनीतिक अनुभवों को व्यक्त कर साहित्य को निश्चित रूप से संपन्न किया है। स्त्री रचनाकारों ने न केवल स्त्री बल्कि समस्त मानवता के हित में अपनी लेखनी चलायी है। स्त्री रचनाकारों ने उन सभी अनुभवों से समाज को परिचित कराया है जो अब तक प्रतिबंधित थे।

आपके समय में जो वातावरण स्त्रियों को लेकर था और आज जो परिवेश है, उसे लेकर आप क्या सोचती हैं?

‌समय के साथ निश्चित रूप से स्त्रियां आगे बढ़ रही हैं। शिक्षा और आधुनिक जनसंचार माध्यमों ने उसकी गतिशीलता और जागरूकता बढ़ाई है। आज के परिवेश में उनके आगे चुनौतियाँ पहले से भी अधिक हैं। सबसे बड़ी समस्या उपभोक्तावाद से जुड़ी है। उसे सजग होकर वस्तुवादी नजरिये का विरोध करना होगा जो उसे मात्र देह में बदल देना चाहती है। आज की स्त्री जानती है कि उसकी अस्मिता का सम्बन्ध उसकी भूमिका से है, चेहरे और रूप की प्रशंसा उसे अंततः छोटा बनाती है। परंपरागत पितृसत्ताक व्यवहारों और तयशुदा भूमिकाओं से इतर उसे नए सम्बन्ध और व्यवहार तलाशने होगें। ये कुछ भी आसान नहीं होगा लेकिन इससे निजी और सामाजिक विकास के नए रास्ते खुलेंगे।

कविता आज एक आसान अवसर बन गयी है मशहूर होने का, और इससे गुणवत्ता प्रभावित हो रही है , क्या आप यह मानती हैं?
सभी ने नहीं तो भी अधिकांश रचनाकारों ने अपने रचनात्मक जीवन का आरंभ कविता लेखन से किया। यह भी कहना उचित है कि कविता लिखने का चलन बढ़ा है। इसी क्रम में ऐसा लिखा जा रहा है जिसका उद्देश्य हो सकता है कि रचना करने के अलावा कुछ और हो। फिर भी कविता लेखन को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। यह केवल अभिव्यक्ति ही नहीं संवाद और संप्रेषण का भी माध्यम है। इससे नयी प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर मिलता है।

क्या गद्य साहित्य उपेक्षित है, विशेष रूप से आलोचना?
बिलकुल नहीं। हाँ, रफ़्तार कम हो सकती है किंतु आलोचना उपेक्षित नहीं है।

पुस्तक समीक्षा और अनुवाद को प्रोत्साहित करने के लिए क्या किया जा सकता है?
‌ इन दोनों को गंभीरता से लिया जाना जरूरी हैं। इन दोनों का अलग-अलग महत्व है। एक ओर अच्छी, प्रभावी पुस्तक समीक्षा पढ़ने के लिए प्रेरित करती है वहीं दूसरी ओर अनुवाद भाषा और संस्कृति की फिसलनों से होते हुए विराट पाठक वर्ग को सम्मोहित किये रहते है। यानी दोनों जरूरी हैं। नयी भाषा नीति अनुवाद के महत्व को समझते हुए एक अलग और विशेष साहित्य के रूप में इसके विकास के कई प्रावधान करती है। आगे इसकी जमीनी हकीकत सामने आएगी। पुस्तक समीक्षा भी गंभीरता के साथ की जानी चाहिए ताकी पुस्तकों का सजग पाठक वर्ग तैयार हो सके।

आप युवाओं को क्या सन्देश देना चाहेंगी?
किताबों से दोस्ती करें और खुद से प्यार करें।