Friday, July 3, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 354

एमएसएन डीआरडीई के साथ कोविड रोगियों के लिए ला रही है नयी दवा

कोलकाता : एमएसएन लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड (एमएसएन) ने मेडिकल क्षेत्र में एक और कदम आगे बढ़ाया है। कम्पनी ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की इकाई रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (डीआरडीई), इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (आईएनएमएएस) के साथ भारत में 2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-डीजी) के निर्माण, वितरण और विपणनके लिए एक लाइसेंस करार किया है। डीआरडीओ द्वारा विकसित, 2-डीजीको ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) द्वारा गंभीर कोविड-19रोगियों के लिए सहायक चिकित्सा के रूप में इस दवा के आपातकालीन उपयोग की अनुमति दी गयी है।
एमएसएन लैब्स2 डीजी को दिन में दो बार उपयोग वाले उत्पाद के रूप में सैशे के रूप में एमएसएन 2डी ब्रांड नाम के तहत 2.34 ग्राम क्षमता में लॉन्च करेंगी। कोविड उपचार रेंज के हिस्से के रूप में, एमएसएन ने पहले ही ‘ओसेलो’ ब्रांड नाम के तहत ओसेलटामिविर कैप्सूल एंटी-वायरल दवा, ब्रांड नाम ”फेविलो” के तहत फेविपीरिवर जैसी एंटी कोविड दवा; ”बारीडोज ” ब्रांड नाम के तहत बारीसिटिनब और ”पोसावन” ब्रांड नाम के तहत पोसाकोनाजोल जैसी एंटिफंगल दवाएं लॉन्च कर दी हैं। इसके अलावा एमएसएन अस्पताल में भर्ती कोविड के गंभीर मरीजों पर अविप्टाडिल और हल्के और मध्यम कोविडरोगियों पर मोलनुपिरवीर जैसी दवाओं के साथ के साथ क्लिनिकल परीक्षण का संचालन भी कर रहा है।

भवानीपुर कॉलेज में ‘एक्चुरियल साइंस में कॅरियर’ पर वेबिनार

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में एक्चुरियल साइंस पर वेबिनार आयोजित किया गया। वेबिनार में मुख्य वक्ता बतौर ऋषभ लड्ढा एसोसिएट एक्यूटी नॉलेज पार्टनर्स और रौनक घोरावत वरिष्ठ एनालिस्ट एकसेन्चर रहे। यह वेबिनार आईक्यू ए सी के साथ मिलकर किया गया।
एक्चुरियल साइंस क्या है तथा किस तरह एक सफल एक्चुरिज बना जा सकता है? इस फील्ड में कॅरियर विकास की क्या संभावना है ? इस क्षेत्र में हाई सैलरी पैकेज तथा सुरक्षा की भावना आदि कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से ज्यादातर छात्र इस क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाना चाहते हैं। इसकी माँग भी अधिक है क्योंकि विभिन्न उद्योगों में आने वाले जोखिमों की कमी नहीं होती है। एक्चुरिज की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी भी उद्योग में कार्य कर सकते हैं। एक फ्रेशर को भी 3-5 लाख रूपये की सालाना तनख्वाह मिलती है। आगे चलकर 3-5 वर्ष के अनुभव के बाद सालाना लगभग 10-15 लाख रुपये तक कमा सकते हैं। भारत के किसी एक्चुरिज इंस्टीट्यूट के फेलो मेंबर बनने पर लगभग 20 से 30 लाख रूपये सालाना कमा सकते हैं। रौनक घोरावत ने स्क्रीन शेयर कर अपनी बात रखी।
ऋषभ लढ्ढा ने एक्चुरिज के  इंस्टीट्यूटशन के विषय में जानकारी दी। एक्चुरिज को रिक्रूट करने वाले कुछ लोकप्रिय इंस्टीट्यूट्स के विषय में बताया जैसे डब्ल्यू एन एस ग्लोबल सर्विसेज, पी डब्ल्यू सी एक्चुरियल सर्विसेज इंडिया, मिलीमैन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, फ्यूचर जेनराली इंश्योरेंस, आईडीबीआई बैंक, मैकिंसे एडवांस्ड हेल्थकेयर एनालिटिक्स, विलिज टावर्स वाटसन, डाइरेक्टोरेट ऑफ पोस्टल लाइफ इंश्योरेंस, अर्नेस्ट एंड यंग इंडियाआदि।
एक्चुरियल साइंस के अंतर्गत पाठ्यक्रम और परीक्षा की जानकारी दी। इस कार्यक्रम का संचालन श्रेयसी घोष ने किया। दुष्यंत चतुर्वेदी ने प्रश्नोत्तर सेशन में अपना योगदान दिया। प्रो. दिलीप शाह ने सभी विद्यार्थियों को नये कोर्स के विषय के प्रति जागरूक किया। आज डेटाबेस और स्टेटिकस के आधार पर सभी बिजनस हो रहे हैं। गणित और सांख्यिकी वाले विद्यार्थियों के लिए तो अच्छे मौके है ही, दूसरे विषय के विद्यार्थी भी अपने कॅरियर को अच्छा बना सकते हैं। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उडीसी, और डॉ वसुंधरा मिश्र की उपस्थिति रही।

‘पत्रकारिता का स्वराज’ विषय पर एक राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद को ओर से ‘पत्रकारिता का स्वराज’ विषय पर एक राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने कहा कि आज अघोषित पाबंदियों ने पत्रकारिता के स्वराज को छीन लिया है। ऐसे में स्वराज को बचाने के लिए सोशल मीडिया पर सिटीजन जनर्लिज्म मुखर हुआ है। नयी दुनिया के पूर्व संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि पत्रकारिता का स्वराज निडरता और विवेकपरकता से ही बच सकता है। हमें पत्रकारिता के स्वराज को नागरिकता के स्वराज से जोड़ने की जरूरत है। पत्रकार-लेखक अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता के स्वराज का अर्थ सत्य के प्रकटीकरण और अनुसंधान से जुड़ा है। हमें भय और लोभ से बचकर स्वराज को बचाना चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शंभुनाथ ने कहा कि आज समाचार पत्रों में संपादक की जगह प्रबंधक ने ले लिया है। ऐसे में पत्रकारिता के स्वराज का प्रश्न हाशिये पर चला गया है। पत्रकारों को निडरता के साथ पत्रकारिता के स्वराज को बचाने की जरूरत है। संस्था की अध्यक्ष प्रख्यात लेखिका कुसुम खेमानी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि पत्रकारिता का लक्ष्य बहुत व्यापक है। हर दौर में पत्रकारिता के स्वराज पर आक्रमण हुआ परंतु कुछ समर्पित पत्रकारों ने घुटने टेकने के बजाय एक सशक्त प्रतिरोध खड़ा किया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि सत्ता का निरंकुश और फासीवादी चेहरा पत्रकारिता के स्वराज का सबसे बड़ा शत्रु है। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में साहित्य और संस्कृति प्रेमी वेब संगोष्ठी में उपस्थित थे।धन्यवाद ज्ञापन संस्था के मंत्री केयूर मजमूदार ने दिया। तकनीकी संचालन सौमित्र आनंद और मधु सिंह ने किया।

 

केले के बेकार तनों से बनाया हस्तशिल्प, आज 9 लाख का टर्नओवर

मजदूर पिता का बेटे दे रहा है 450 लोगों को रोजगार
नयी दिल्ली : उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के रहने वाले रवि प्रसाद का बचपन तंगहाली में गुजरा। सड़क हादसे में पिता की मौत हो गयी। रवि की पढ़ाई बीच में छूट गई और उनके कंधे पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने मजदूरी की, प्राइवेट कंपनी में काम किया। आज वे केले के कचरे से हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करते हैं, ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से देश भर में बेच रहे हैं। 450 से ज्यादा महिलाओं को उन्होंने रोजगार से जोड़ा है। अभी हर साल वे 8 से 9 लाख रुपये का कारोबार कर रहे हैं।
36 साल के रवि बताते हैं कि पिता जी मजदूरी करते थे। मैं उनके काम में मदद के साथ पढ़ाई भी करता था। मास्टर्स में दाखिला लिया था, लेकिन एक हादसे में पिता की मौत हो गई। उसके बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी और धंधे की तलाश में लग गया। कई साल तक इधर-उधर काम करता रहा और घर परिवार का खर्च चलाता रहा।
रवि बताते हैं कि साल 2016 में अपने दोस्तों के साथ काम के लिए दिल्ली गया। उसी दौरान एक दिन प्रगति मैदान में जाने का मौका मिला। वहां दक्षिण के कुछ कारीगर आए थे। उन लोगों ने केले के वर्ज्य पदार्थों से बने हस्तशिल्प उत्पादों का स्टॉल लगाया था। उनसे बातचीत के बाद मुझे लगा कि ये काम किया जा सकता है। हमारे यहां तो केले की खूब खेती होती है और लोग केले से निकला वर्ज्य यूं ही फेंक देते हैं।
उन्होंने मेले में ही एक कारीगर से दोस्ती की और काम सिखाने का आग्रह किया। इसके बाद वे दिल्ली से ही कोयंबटूर चले गए। वहां करीब एक महीने वे उस कारीगर के गांव में ठहरे। वहां के किसानों से मिले, उनके काम को समझा। बनाना फाइबर वेस्ट से हस्तशिल्प उत्पाद बनाना सीखा। जब वे काम सीख गए तो वापस अपने गांव लौट आए।
रवि बताते हैं कि मुझे काम की जानकारी तो मिल गई थी, लेकिन प्रोसेसिंग मशीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। मैंने कोशिश जारी रखी। लोन के लिए भी कुछ जगह कोशिश की। इसी बीच मुझे एक परिचित के जरिए जिला उद्योग केंद्र के बारे में पता चला। वहां जाकर मैंने जनरल मैनेजर से मुलाकात की। उन्हें अपने काम और प्रशिक्षण के बारे में जानकारी दी। वे मेरे आइडिया से काफी प्रभावित हुए और लोन के लिए प्रपोजल बनाने में मदद की।

5 लाख रुपये बैंक से कर्ज लिये
साल 2018 में रवि को बैंक से 5 लाख रुपये का कर्ज मिल गया। इससे उन्होंने प्रोसेसिंग मशीन खरीदी, कुछ महिलाओं को काम पर रखा और अपने काम की शुरुआत की। वे धीरे-धीरे एक के बाद एक नए-नए सामान तैयार करने लगे और स्थानीय बाजार में उसे सप्लाई करने लगे। इसके बाद यूपी सरकार से भी प्रोत्साहन मिला। राज्य सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट स्कीम के लिए मेरा चयन हुआ। उसके जरिए कई महिलाएं मुझसे जुड़ीं। मार्केटिंग के लिए मुझे प्लेटफॉर्म मिला। रवि फिलहाल केले के कचरे , रेशा, सैनिटरी नैपकिन, ग्रो बैग सहित दर्जनभर उत्पाद तैयार कर रहे हैं। वे अपने प्रोडक्ट सीधे बड़ी-बड़ी टेक्स्टाइल कंपनियों को भेजते हैं।
इसके बाद रवि दिल्ली, लखनऊ सहित कई शहरों में लगने वाले मेलों में जाने लगे। स्टॉल लगाकर अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करने लगे। कुछ मीडिया कवरेज में उनको जगह मिली तो लोग ऑनलाइन भी उनसे उत्पाद खरीदने लगे। वे अभी सोशल मीडिया के साथ ही अमेजन और फ्लिपकार्ट के जरिए अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग कर रहे हैं। देशभर से उन्हें ऑर्डर आ रहे हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

बिहार के तेलहारा से निकला इतिहास का एक लुप्त पन्ना

पहली शताब्दी का एक विशाल विद्या केंद्र सामने आया है

प्राचीन भारत के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा जुड़ा है बिहार से। मगध परिक्षेत्र यानी पटना, नालंदा, गया जैसी जगहों पर सैकड़ों टीलों के भीतर छोटी-बड़ी कई सभ्यताएं इतिहास का कोई महत्वपूर्ण अध्याय होने का संकेत देती रहती हैं। जब-तब इनमें दफ़्न जानकारी बाहर आती है तो उस कालखंड से एक पर्दा हटता है, जैसा कि अभी हो रहा है। विश्वप्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय से महज 33 किमी दूर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के क्षेत्र एकंगरसराय प्रखंड में पड़ता है एक गांव, तेलहारा। यहां पहली शताब्दी का एक विशाल विद्या केंद्र सामने आया है। माना जा रहा है कि यह विश्वविद्यालय नालंदा और विक्रमशिला से भी पुराना है। अब तक मिले साक्ष्य रोशनी डालते हैं कुषाण काल से लेकर पाल काल के क्रमबद्ध इतिहास पर।

तेलहारा में जारी उत्खनन से ये तथ्य सामने आने लगे हैं कि ऊंचे-ऊंचे टीलों में कई राजवंशों की कहानियां समाई हैं। खुदाई में मिली हैं 42×32×6 सेंटीमीटर की ईंटें। यह अपने आप में इस बात की गवाही है कि निर्माण पहली शताब्दी का है। नालंदा विश्वविद्यालय पांचवीं और विक्रमशिला सातवीं शताब्दी के हैं। सातवीं सदी में चीनी यात्री हृवेनसांग और इत्सिंग भी आए थे तेलहारा में। दोनों ने अपने यात्रा वृत्तांत में यहां का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि बौद्ध धर्म के एक पंथ महायान का यह केंद्र नालंदा विश्वविद्यालय से भी उच्च स्थान रखता है। प्राचीन इतिहास की बिहार पर केंद्रित डीआर पाटिल लिखित दुर्लभ क़िताब ‘द एन्टिक्वेरियन रिमेन्स इन बिहार’ में इस बात की रोमांचक चर्चा है कि खोजी अंग्रेज़ इतिहासकार बुकानन की आंखों से तेलहारा ओझल हो गया। 1873 में अंग्रेज़ इतिहासकार बगलर की रिपोर्ट से इसे थोड़ा विस्तार ज़रूर मिला। लेकिन, 1875-78 में ब्रिटिश आर्मी इंजीनियर कनिंघम ने अपनी खोज से सभी को चकित कर दिया। उनकी रिपोर्ट इशारा करती रही कि टीले के अंदर कोई बड़ा साम्राज्य समाया हुआ है। इसी उत्सुकता से बिहार पुरातत्व विभाग ने तेलहारा में गहरी रुचि दिखाई और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया से यहां खुदाई का आग्रह करता रहा।

वैसे यहां के इतिहास को जानने का एक प्रयास पहले भी हुआ था। ब्रिटिश काल में ही 1915 में यहां खुदाई शुरू की गई, लेकिन महज एक साल ही काम चला। उस समय कुछ हाथ नहीं लगा। दरअसल माना गया कि कनिंघम के सम्मान में सरकार ने काम तो शुरू करा दिया, लेकिन उसे यहां कोई दिलचस्पी थी नहीं। लंबे समय बाद 2009 में एएसआई और बिहार पुरातत्व विभाग का ध्यान इस ओर गया। हालांकि इस बार भी भारतीय सर्वेक्षण इंस्टिट्यूट ने यहां खुदाई पर रोक लगा दी। हालांकि सीएम नीतीश कुमार के दखल और अनुरोध के बाद काम शुरू हो गया।

बिहार पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर अतुल कुमार वर्मा उत्खनन के साइट इंचार्ज भी हैं। वह कहते हैं, ‘उत्खनन से स्पष्ट हो गया कि तेलहारा को पहली सदी में स्थापित किया गया था। नालंदा और विक्रमशिला की स्थापना इसके बाद हुई। हालांकि पाकिस्तान में पड़ने वाले तक्षशिला विश्वविद्यालय को सबसे प्राचीन ज्ञान केंद्र होने का गौरव प्राप्त है।’

यह भी कम दिलचस्प नहीं कि जिस जगह सरकार की नज़र अब गई, वह पीढ़ियों से स्थानीय लोगों के बीच पूज्य है। स्थानीय पत्रकार लक्ष्मी नारायण सुधांशु बताते हैं कि पूर्वज उस भूरी मिट्टी वाले टीले पर उग आए पेड़ों के नीचे बैठकर आराम करते। कहीं आते-जाते समय उन पेड़ों की छांव उनका ठिकाना होती। स्थानीय लोगों ने उस टीले को कभी मिट्टी का अंबार भर नहीं समझा। वहां उगे पेड़ों की पूजा की जाती थी। कई कहानियां प्रचलित हैं इसके बारे में। किसी क़िस्से में बताया गया कि इस ज़मीन में एक राजवंश दबा पड़ा है तो किसी में इस जगह को बताया गया नगर रक्षिका देवी का आश्रयस्थल। अब साफ़ हो चला है कि नालंदा के बगल में ज्ञान की एक और जगह थी। यहां भी देश-विदेश से छात्र उसी लालसा में आते, जैसे अब ऑक्सफर्ड और कैंब्रिज में जाते हैं।

अतुल कुमार वर्मा बताते हैं कि यह साइट ढाई किलोमीटर एरिया में है। अभी तक केवल 20 फ़ीसदी ही खुदाई हो पाई है। सात टीले हैं। इनमें से तीन के राज़ सामने आ चुके हैं। बाकी के नीचे दबी विरासत का बाहर आना बाकी है। खुदाई में तीन कालखंड के अवशेष मिले हैं। पहली शताब्दी से लेकर तीसरी शताब्दी तक के कुषाण काल, चौथी से पांचवीं सदी के गुप्त काल और आठवीं से 12वीं सदी के पाल काल। खोज के क्रम में पता चला कि यहां 10 हज़ार विद्यार्थी पढ़ते थे। उन्हें पढ़ाने के लिए नियुक्त थे तीन हज़ार शिक्षक।

बौद्ध मूर्तियां मिली हैं तो साथ में हिंदू देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी। विद्वानों का मानना है कि बौद्ध ज्ञान का केंद्र था तेलहारा, लेकिन यहां हिंदू धर्म और दर्शन की तुलनात्मक पढ़ाई भी होती थी। पटना संग्रहालय के पूर्व निदेशक डॉ. सीपी सिन्हा कहते हैं, ‘इसकी खुदाई और पहले होनी चाहिए थी। नालंदा विश्वविद्यालय के आभामंडल में यह जगह दब गई। खुदाई में अब तक कांस्य और टेराकोटा की मूर्तियां मिली हैं, जो कुषाण काल से पाल काल तक की हैं। तीन मंजिला इमारत मिली है, जिसे बौद्व भिक्षुओं का प्रार्थना और मेडिटेशन सेंटर माना गया। इसका किसी प्रचीन विद्वान ने तिलकाडीह नाम से उल्लेख किया तो किसी ने तिल-कस्य के नाम से।’

आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व निदेशक बीएस वर्मा ने 1971 से 81 के बीच तेलहारा का सर्वेक्षण किया था। उन्होंने पाया कि विक्रमशिला से कहीं अधिक विश्वसनीय उत्कीर्ण लेख, प्रमाण, मठ, लिपि यहां दबे हैं। बिहार विरासत समिति के निदेशक विजय कुमार चौधरी कहते हैं कि बहुत हद तक संभव है मगध शासक बिंबिसार ने ही इसकी स्थापना की होगी। बौद्ध धर्म में उसकी गहरी रुचि थी। उसी ने राजगिर को मगध की राजधानी बनाया। वह गौतम बुद्ध का रक्षक और परम मित्र भी था। उसे ज्ञान और संस्कृति से गहरा लगाव था। खुदाई जारी है और इसकी परतों से कई अबूझ पहेली सामने आने वाली है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

स्विजरलैंड, स्वीडन को लुभा रही चंद्रपुर झुग्गी की बांबू राखियाँ

मुम्बई: चंद्रपुर के बंगाली कैंप झोपडपट्टी में रहनेवाली बांबू डिजाइनर और महिला सक्षमीकरण कार्यकर्ता मीनाक्षी मुकेश वालके की बांबू राखियां देशभर में लोकप्रिय हो चुकी है
बांबू की पूर्णतया इको फ्रेंडली ऐसी बांबू राखियों में प्लास्टिक का तनिक भी अंश न होना यह मीनाक्षी वालके की विशेषता है और राखियों को सजाने वे खादी धागे के साथ तुलसी मणी एवम् रुद्राक्ष का प्रयोग करती है। मुख्य रूप से प्लास्टिक का प्रयोग न्यूनतम हो इस दिशा में चलता है।
मीनाक्षी ने बताया कि इस वर्ष उन्होंने 50 हजार राखियों का लक्ष्य रखा है. विदेशों से मांग बढ़ने के बाद अब स्थानीय स्तर से भी पूछ परख बरबस ही बढ़ गयी है। लॉक डाउन से मीनाक्षी व उनकी सहयोगी महिलाओं पर भुखमरी ही नहीं, कर्ज की नौबत आई है. ऐसे में अब राखी ने उन्हें नव संजीवनी देकर उम्मीदें काफी बढ़ा दी है.
इको फ्रेंडली फ्रेंडशिप बैंड वैसे उपलब्ध या प्रचलित नहीं था। मुख्य रूप से धातू, प्लास्टिक के ही स्वरूप में वह अधिकांश उपलब्ध है. मीनाक्षी ने इसी वर्ष जून माह में बांबू के फ्रेंडशिप बैंड बनाने का आविष्कार किया. इसके माध्यम से भी स्वदेशी, पर्यावरण से मित्रता ऐसा संदेश दिया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि आज तक बांबू के फ्रेंडशिप बैंड उपलब्ध व लोकप्रिय नहीं थे।

बांग्लादेश में दो फ़ीट की गाय देखने पहुँचे 15 हज़ार लोग

सिर्फ़ 51 सेंटीमीटर है भुट्टी नस्ल की गाय रानी की ऊंचाई
ढाका : बांग्लादेश में इन दिनों गाय चर्चा में है और उसे देखने अब तक हजारों लोग आ चुके हैं। कारण कुछ और नहीं बल्कि उसका छोटा आकार है। दरअसल, रानी एक ‘भुट्टी गाय’ यानी भूटानी नस्ल की गाय है जिसकी उम्र क़रीब दो वर्ष है। रानी की ऊंचाई महज़ 51 सेंटीमीटर है और उसका वज़न सिर्फ़ 28 किलोग्राम है।
रानी को बांग्लादेश की राजधानी ढाका के क़रीब स्थित चारीग्राम के एक फ़ार्म-हाउस में रखा गया है। स्थानीय मीडिया के अनुसार, बांग्लादेश में कोरोना महामारी से संबंधित प्रतिबंध लागू होने के बावजूद, 15 हज़ार से ज़्यादा लोग रानी से मिलने यहाँ पहुँचे हैं। इस फ़ार्म के मैनेजर हसन होलादार ने रानी का नाम गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स के लिए भेजा है। उनका कहना है कि रानी दुनिया की सबसे छोटी गाय है।
हसन होलादार रानी को पिछले साल बांग्लादेश के ही नौगाँव ज़िले के एक फ़ार्म से लेकर आये थे। वे कहते हैं कि “रानी को चलने में थोड़ी परेशानी होती है, इसलिए फ़ार्म में उसे बाकी गायों से अलग रखा जाता है। हमें डर रहता है कि बड़ी गायें कहीं उसे चोट ना पहुँचा दें।”
“वो ज़्यादा खाती भी नहीं है। वो थोड़ा बहुत भूसा खाती है और मामूली चारे में उसका काम हो जाता है। उसे जब घुमाने ले जाते हैं, तो वो खुश होती है और कोई अगर उसे बाहों में उठा ले, तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता।”
अभी तक ‘दुनिया की सबसे छोटी गाय’ का टाइटल मनिकयम नामक एक भारतीय गाय के पास है जिसकी ऊंचाई 61.1 सेंटीमीटर बताई जाती है। रानी अब ‘दुनिया की सबसे छोटी गाय’ का खिताब पाने की दौड़ में हैं।
हसन होलादार के मुताबिक गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की एक टीम इसी साल रानी को देखने पहुँचेगी को दिया जा सकता है या नहीं।

मालवा की धरती से मिले औरंगजेब के जमाने के सिक्के

363 साल पहले ढाले गये हैं सिक्के
एक साल बाद बेचने निकले तो पकड़ाए
शाजापुर : ऐतिहासिक धरोहरों को अपने अंदर छुपाए बैठी मालवा की धरती से अब राजा-महाराजाओं का खजाना भी निकलने लगा है। 163 से ज्यादा सोने-चांदी के सिक्के शाजापुर के ग्राम पचोला के मजदूरों को नींव खोदते समय एक साल पहले मिले थे। इस खजाने का तीनों ने बंटवारा कर अपने-अपने घरों में गड्ढा कर छिपा दिए, ताकि किसी को भनक न लगे लेकिन गत बुधवार को जब वे इसे बाजार में बेचने के इरादे से निकले तो पुलिस ने उन्हें दबोच लिया। मजदूरों के पास मिले सिक्के देख हर कोई दंग रह गया।
यह साधारण सिक्के नहीं, बल्कि औरंगजेब के जमाने के बताए जा रहे हैं। इन सिक्कों की पड़ताल अश्विनी शोध संस्था महिदपुर के मुद्रा विशेषज्ञ डॉ.आर.सी. ठाकुर से कराई गयी तो उन्होंने बताया कि मालवा की धरती से यह सिक्के मिलना अपने आप में दुर्लभ है।
पुलिस ने मौके से जितेंद्र के पास से 60 चांदी के सिक्के व 7 सोने तथा किशन के पास से 60 चांदी और 6 सोने के सिक्के जब्त किये जबकि संतोष के पास से 30 चांदी के सिक्के मिले। संतोष, किशन और जितेंद्र को मिला खजाना, पुलिस की कहानी में एक साल पहले मिलना बताया जा रहा है। पुलिस के अनुसार संतोष के पास से सिर्फ 30 सिक्के मिले, संतोष के अनुसार उसके खुद के मकान की नींव खुदाई में यह सिक्के एक मिट्टी के बर्तन में मिले थे। पुलिस द्वारा पकड़े जाने के डर से तीनों ने अपने अपने घरों में ही गड्ढा कर सिक्के गाड़ दिए थे।
शाजापुर जिला ऐतिहासिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। पुराविद् डॉ रमण सोलंकी के अनुसार इसे बौद्ध पथ माना जाता है। यानी इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का काफी वर्चस्व रहा है। इसके प्रमाण कुरावर में बौद्ध स्तूप के अवशेष मिलने और सारंगपुर व मक्सी में भी इस तरह के प्रमाण मिलते हैं। शाजापुर को मुगल शासक शाहजहां से जोड़ा जाता है। औरंगाबाद टकसाल की मुद्राएं शाजापुर पहुंचने का कारण उज्जैन से अरबसागर तक व्यापारी आते-जाते थे। व्यापारियों का मार्ग शाजापुर होकर ही था। उज्जैन से शाजापुर होकर विदिशा होते हुए भरूच से अरब सागर की ओर व्यापारियों का आना-जाना था। उज्जैन रत्नों और मसालों की मंडी था। खासकर मोतियों का कारोबार उज्जैन से होता था। इसलिए उज्जयिनी के सिक्कों पर क्रास वाला व्यापारिक चिह्न था चारों दिशाओं के प्रतीक क्रास के चारों कोनों पर गोलाकार चिह्न हैं। उज्जैन के अरब सागर वाले पश्चिमी मार्ग में शाजापुर आता था।
363 साल पहले औरंगाबाद टकसाल में ढले
यह सिक्के 1658 से 1707 (हिजरी सन् 1068 से 1158) के हैं। इस पर 12 अंक लिखा है, जो महीने का प्रतीक है। इस तरह के सिक्के उज्जैन जिले के रूनीजा में सालों पहले स्व. डॉ. श्रीधर वाकणकर ने भी खोजे थे। यह सिक्के औरंगाबाद टकसाल के होने से खास है। एक सिक्के की कीमत लगभग 50 हजार रुपए हो सकती है। सोने के सिक्कों का वजन 142.3 ग्राम तक है, वहीं चांदी के 150 कुल सिक्कों का वजन एक किलो 710 ग्राम है। चांदी के सिक्कों की कीमत 1 लाख 12 हजार रुपए के लगभग तो सोने के एक सिक्के की कीमत 50 हजार यानी कुल 13 सिक्कों की कीमत 6 लाख 50 हजार रुपये कीमत है।

जय…जय…जय…जगन्नाथ

भगवान जगन्नाथ की विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा प्रतिवर्ष आषाढ शुक्ल द्वितीया को प्रारंभ होती है। इस बार 2021 की जगन्नाथ रथयात्रा 12 जुलाई को है। पद्मपुराण के अनुसार आषाढ माह के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि सभी कार्यों को करने के लिए सिद्धि प्रदान करने वाली होती है। चार पवित्र धामों में से एक श्रीजगन्नाथ धाम में भगवान विष्णु जगन्नाथ रूप में विराजते हैं। मान्यता है कि यहां बाकी के तीनों धाम जाने के बाद अंत में यहां आना चाहिए। उड़ीसा राज्य में स्थित पुरी में श्रीजगन्नाथ मंदिर वैष्णव सम्प्रदाय का एक प्रसिद्द हिन्दू मंदिर है जो जग के स्वामी भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। जगन्नाथ पुरी को धरती का वैकुंठ कहा गया है, इस स्थान को शाकक्षेत्र, नीलांचल और नीलगिरि भी कहते हैं। अनेकों पुराणों के अनुसार जगन्नाथ पुरी में भगवान कृष्ण ने अनेकों लीलाएं की थीं और नीलमाधव के रूप में यहां अवतरित हुए।
वेद स्वरूप हैं यहां भगवान
जगत के नाथ यहां अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। तीनों ही देव प्रतिमाएं काष्ठ की बनी हुई हैं। हर बारह वर्ष बाद इन मूर्तियों को बदले जाने का विधान है। पवित्र वृक्ष की लकड़ियों से पुनः मूर्तियों की प्रतिकृति बना कर फिर से उन्हें एक बड़े आयोजन के साथ प्रतिष्ठित किया जाता है। वेदों के अनुसार भगवान हलधर ऋग्वेद स्वरूप, श्री हरि (नारायण) सामदेव स्वरूप, सुभद्रा देवी यजुर्वेद की मूर्ति हैं और सुदर्शन चक्र अथर्ववेद का स्वरूप माना गया है। श्री जगन्नाथ का मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है इसके शिखर पर अष्टधातु से निर्मित विष्णु जी का सुदर्शन चक्र लगा हुआ है जिसे नीलचक्र भी कहते हैं। यहां चारों प्रवेश द्वारों पर हनुमान जी विराजमान हैं जो कि श्री जगन्नाथ जी के मंदिर की सदैव रक्षा करते हैं।

श्रीकृष्ण का हृदय है यहां
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब श्री कृष्ण की लीला अवधि पूर्ण हुई तो वे देह त्यागकर वैकुंठ चले गए। उनके पार्थिव शरीर का पांडवों ने दाह संस्कार किया। लेकिन इस दौरान उनका दिल जलता ही रहा। पांडवों ने उनके जलते हुए दिल को जल में प्रवाहित कर दिया, तब यह दिल लट्ठे के रूप में परिवर्तित हो गया। यह लट्ठा राजा इंद्रदयुम्न को मिल गया और उन्होंने भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के अंदर इसे स्थापित कर दिया,तब से वह यहीं है। हालांकि बारह वर्ष बाद मूर्ति बदली जाती है पर लट्ठा अपरिवर्तित रहता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि मंदिर के पुजारियों ने भी इसे कभी नहीं देखा है। लट्ठा परिवर्तन के समय पुजारी की आँखों पर पट्टी बांध दी जाती है और हाथ कपड़े से ढके हुए होते है। बगैर देखे और बिना स्पर्श किए इस लट्ठे को पुरानी मूर्ति में से निकल कर नई मूर्ति में स्थापित कर दिया जाता है। उनके एहसास के मुताबिक यह लट्ठा बहुत कोमल है। मान्यता है कि कोई यदि इसको देख लेगा तो उसके प्राणों को खतरा हो सकता है।
(साभार – अमर उजाला)

975 आइसक्रीम स्टिक से बनाया भगवान जगन्नाथ का रथ

भुवनेश्वर : ओडिशा में रहने वाले एक कलाकार ने भगवान जगन्नाथ का रथ आइसक्रीम स्टिक की मदद से बनाया है। इसके लिए कलाकार ने 975 आइसक्रीम स्टिक इस्तेमाल की हैं।
ओडिशा में हर साल निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा का विशेष होता है। इस बार पुरी के एक कलाकार विश्वजीत नायक ने 975 आइसक्रीम स्टिक की मदद से भगवान जगन्नाथ का रथ बनाया है। ये रथ बेहद प्यारा लग रहा है. वहीं कुछ दिन पहले कलाकार ने आइसक्रीम स्टिक की मदद से भगवान जगन्नाथ की मूर्ति भी बनाई थी। एक इंटरव्यू में विश्वजीत ने बताया कि उन्होंने 975 आइसक्रीम स्टिक के साथ भगवान जगन्नाथ का छोटा सा रथ तैयार किया है। साथ ही बताया कि इस रथ में 16 पहिए और चार घोड़े बनाए गए हैं। वहीं विश्वजीत ने रथ को पांच दिन में तैयार किया है।