कोलकाता : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (नैक द्वारा ए ग्रेड प्राप्त) में विभिन्न विषयों में पी-एच.डी. के लिए अधिसूचना जारी हो चुकी है। विश्वविद्यालय के कोलकाता केंद्र प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया हिंदी भाषाविज्ञान/भाषा शिक्षण/भाषा प्रौद्योगिकी, हिंदी साहित्य, नाट्य कला, फिल्म अध्ययन, संस्कृत, गांधी एवं शांति अध्ययन, स्त्री अध्ययन, बौद्ध अध्ययन, दलित एवं जनजातीय अध्ययन, स्पैनिश, चीनी, फ्रांसीसी, दर्शनशास्त्र, जनसंचार, मानवविज्ञान, अनुवाद, प्रवासन एवं डायस्पोरा अध्ययन, शिक्षाशास्त्र तथा प्रबंधन जैसे विषयों में पी-एच.डी. की सीट विज्ञापित की गई है। प्रवेश से संबंधित विस्तृत जानकारी एवं ऑनलाइन आवेदन करने के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.hindivishwa.org का अवलोकन किया जा सकता है। अन्य सूचना के लिए फोन नंबर- 07152-251661 पर संपर्क किया जा सकता है। डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि आवेदन करने की अंतिम तिथि 24 सितंबर 2021 है जबकि प्रवेश के लिए लिखित परीक्षा की तिथि 10, 11 एवं 12 अक्टूबर 2021 है। कोलकाता केंद्र के फेसबुक प्रोफाइल Mgahv Kolkata Centre से भी आवश्यक सूचनाएँ जारी की जाती हैं। जिन विद्यार्थियों का एमए का फाइनल रिजल्ट अभी नहीं आ सका है, वे भी आवेदन पत्र भर सकते हैं।
शरण मत दीजिए, समर्थ बनाइए, ऐसे ही सम्भव है आतंक का दमन
त्योहारों का मौसम दस्तक दे चुका है और माँ दुर्गा के आगमन की तैयारियाँ भी शुरू हो चुकी हैं। कोरोना काल की दुश्वारियों के बीच भी उत्सव का उत्साह है और इस बीच नजर है कि तालिबान के आतंक राज में त्रस्त महिलाओं से हटती नहीं। स्थिति चाहे जैसी भी हो लेकिन हर हाल में खामियाजा औरतों को ही भुगतना पड़ता है। आतंक अपना नियन्त्रण स्थापित करने के लिए औरतों और बच्चों को ही हथियार बनाता है। बहुत से लोग कह सकते हैं कि आखिर तालिबान की स्थिति का भारत पर क्या असर होगा..सच तो यह है कि यह वह स्थिति है जिसे गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। हम बेपरवाह नहीं हो सकते बल्कि अफगानिस्तान की जनता और खासकर महिलाओं के साथ खड़ा होना जरूरी है। आतंक को जड़ से समाप्त करना जरूरी है और जो इसे बढ़ावा दे रहा हो, उसका समूल विनाश आवश्यक है। हम भारतीय सौभाग्यशाली हैं कि हमने इस पावन माटी में जन्म लिया है, यह भारत माता वन्दनीय है जिसने सनातन काल से ही विश्व को समता और मानवता का पाठ पढ़ाया है परन्तु अब वह समय है जब भारत को बताना होगा कि अहंकार और आतंक का दमन कैसे किया जा सकता है। माँ महिषासुर मर्दिनी से यही प्रार्थना है कि वह अफगानिस्तान ही नहीं, विश्व के हर व्यक्ति का बल बनें जो आतंक और उत्पीड़न से जूझ रहा है। विश्व की तमाम स्त्रियों को ही नहीं, हर मनुष्य को अन्याय, अनाचार, अधर्म से लड़ने की शक्ति दें….समस्त दमनकारी शक्तियों का दमन करें…और विश्वास है कि यह होगा…अवश्य होगा..भारत ने विश्व बन्धुत्व की बात की है..यह समय है कि जब शरणागत की जगह समर्थ बनाने का अभियान चले। शरण देना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं, समर्थ बनाइए जिससे उत्पीड़न के विरुद्ध शस्त्र पीड़ित ही उठाए और विजयी बने…ऐसा होगा…माँ आश्छेन…।
निरमा : ब्रांड जो पिता -पुत्री के खूबसूरत सम्बन्धों की मिसाल है
कहते हैं न यदि किसी ने कुछ करने की ठान ली तो कड़ी मेहनत से वह उसे पा ही लेता है। आज हम बताने जा रहे हैं एक ऐसे पिता की जिन्होंने अपने मृत बेटी को पूरी दुनिया में मशहूर कर दिया। हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसे शख्स की जो अपने सपने को सच करने के लिए सरकारी नौकरी छोड़कर साइकिल में घर-घर जाकर अपना उत्पाद बेचना शुरू किया। आज इनका नाम देश के अरबपतियों में शुमार है। जमशेदपुर में भी इस ग्रुप की कंपनी संचालित है और यह समूह देश भर में 18 हजार लोगों को रोजगार दे रही है। कंपनी का टर्नओवर भी 70,000 करोड़ टन हो गया है।हम निरमा कंपनी के मालिक करसन भाई पटेल। गुजरात के मेहसाणा गांव में जन्मे करसन भाई के पिता खोड़ी दास पटेल बेहद साधारण इंसान थे। लेकिन उन्होंने अपने बेटे करसन को रसायन शास्त्र में स्नातक करवाया। पढ़ाई के बाद गुजरात के अन्य लोगों की तरह करसन भाई भी अपना खुद का व्यापार करना चाहते थे लेकिन परिवार की माली हालत इतनी नहीं थी कि खुद का व्यवसाय शुरू करें। ऐसे में उन्होंने एक लैब में असिस्टेंट की नौकरी कर ली। बाद में गुजरात सरकार के खनन एवं भूविज्ञान विभाग में इन्हें सरकारी नौकरी मिल गई।
सरकारी नौकरी मिलने के बाद करसन भाई अपने परिवार के साथ खुश जरूर थे लेकिन संतुष्ट नहीं थे। कुछ अलग करने की ख्वाहिश उनके मन में दबी हुई थी। तभी एक घटना घटी, उनकी बेटी की एक हादसे में मौत हो गई। इस घटना ने करसन भाई पटेल को अंदर से तोड़ दिया। वे चाहते थे कि उनकी बेटी बड़ी होकर अपना नाम रोशन करे। लेकिन बेटी के इस काम को उसके पिता ने पूरा किया।
करसन की बेटी का नाम निरुपमा था जिसे सभी प्यार से निरमा बुलाते थे। करसन ने अपनी इसी मृत बेटी के नाम को जीवित रखने के लिए एक कंपनी की शुरूआत की। वर्ष 1969 में करसन ने अपने घर के पीछे ही वाशिंग पाउडर बनाना शुरू किया। साइंस में स्नातक पास करसन के लिए यह इतना कठिन नहीं था। उन्होंने सोडा ऐश के साथ कुछ रसायन मिलाया और पीले रंग के पाउडर के साथ उनका फार्मूला बन गया। अपने उत्पाद को बेचने के लिए उन्होंने साइकिल से घर-घर जाकर अपने उत्पाद को बेचने लगे। लेकिन जब डिमांड बढ़ने लगे तो सरकारी नौकरी और खुद का व्यापार एक साथ होना संभव नहीं था। ऐसे में करसन भाई ने सरकारी नौकरी छोड़ने का जोखिम उठाया, जो उस दौर में आसान नहीं था लेकिन करसन भाई को अपने फार्मूले पर पूरा भरोसा था।
उस दौर में देश में तब हिंदुस्तान लीवर या विदेशी कंपनियों के ही सर्फ बाजार में बिकते थे जो उस समय 13 रुपये प्रति किलोग्राम हुआ करते थे। जो मध्यमवर्गीय परिवार के बजट में नहीं था। ऐसे में लोग साधारण साबुनों से अपने कपड़े धोते थे लेकिन इससे हाथ खराब होने का डर रहता था। तब करसन भाई ने मात्र तीन रुपये किलो में अपना निरमा सर्फ बेचना शुरू किया। जो विदेशी कंपनियों के सर्फ से चार गुणा से भी ज्यादा कम था। इसके साथ ही करसन भाई लोगों को गारंटी दी कि यदि कपड़े साफ नहीं हुए तो वे पैसे भी वापस कर देंगे। ऐसे में लोगों ने इसे हाथो-हाथ लिया।
करसन भाई का व्यापार जब चल पड़ा तो वे इसे केवल मेहसाणा तक ही नहीं सीमित रखना चाहते थे। वे अपनी बेटी का नाम पुरी दुनिया में फैलाना चाहते थे। ऐसे में उन्होंने निरमा का विज्ञापन टीवी पर दिया और वह हिट हो गया। देखते ही देखते यह मध्यमवर्गीय परिवार की पहली पसंद बन गया।
करसन भाई का उत्पाद जब टीवी के माध्यम से जिंगल, सबकी पसंद निरमा, पूरे देश में छाया तो स्थानीय बाजारों में निरमा सर्फ खरीदने के लिए ग्राहकों की भीड़ लग गई। तब मार्केट कैप्चर करने के लिए करसन भाई ने नया तरीका अपनाया। बाजार में मांग के हिसाब से करसन भाई को अपने उत्पाद की सप्लाई बढ़ानी चाहिए थी लेकिन उन्होंने अपनी मार्केट स्ट्रेटर्जी से 90 प्रतिशत स्टॉक वापस ले लिए।
एक माह तक ग्राहक केवल निरमा के विज्ञापन देखते और बाजार में सर्फ की डिमांड करते, जो उन्हें नहीं मिलता। ऐसे में देश भर के थोक और खुदरा व्यापारी करसन भाई से निरमा की आपूर्ति करने का आग्रह किया। तब जाकर उन्होंने मार्केट में आई मांग का फायदा उठाते हुए सप्लाई शुरू की। नतीजन निरमा देश का सबसे बड़ा ब्रांड बना और अपने सभी प्रतिद्वंदियों को पछाड़ दिया।
साथ ही अपनी बेटी का नाम पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया। फोर्ब्स पत्रिका के अनुसार करसन भाई पटेल की कुल संपत्ति 4.1 बिलियन डॉलर है। बता दें कि निरमा ग्रुप ऑफ कंपनीज की एक कंपनी विस्टार्स कॉर्प लिमिटेड के नाम से एक सीमेंट कंपनी है। क्योंकि निरमा उद्योग के बाद कंपनी ने दूसरे व्यापार में भी हाथ आजमाए। आज निरमा ग्रुप ऑफ कंपनीज रेडी टू यूज वाले क्रांकिट सीमेंट का भी उत्पादन करती है।
(स्त्रोत साभार – दैनिक जागरण तथा न्यूज ट्रैक)
कांथा : सदियों पुरानी कढ़ाई, जो आज बंगाल की पहचान है
कांथा शब्द का कोई विशेष व्युत्पत्ति संबंधी अर्थ नहीं है, फिर भी यह संस्कृत से आया माना जाता है। संस्कृत में एक समान शब्द का अर्थ है “लत्ता का एक टुकड़ा”। कांथा के बारे में सबसे पुराना दस्तावेज 500 साल पहले कवि कृष्णदास कबीरराज द्वारा लिखित “श्री श्री चैतन्य चरितामृत” पुस्तक में मिलता है। इसमें उल्लेख है कि कैसे चैतन्य की मां ने उन्हें पुरी तीर्थयात्रियों की मदद से घर का बना कांथा भेजा था। वह कांथा अभी भी पुरी की भव्यता में प्रदर्शित किया जा रहा है। कांथा टूटी हुई चीज को फिर से जोड़ने की एक विधि है।
कांथा सिलाई कपड़े के पुराने, छोटे टुकड़ों को पैच करने की एक सदियों पुरानी परंपरा है जो उपमहाद्वीप के बंगाली बहुल क्षेत्र (अब पश्चिम बंगाल और भारत और बांग्लादेश में उड़ीसा) में ग्रामीण महिलाओं की मितव्ययी आदतों से विकसित हुई है। सिलाई की इस पद्धति का भारत में पूर्व-वैदिक काल (1500 ईसा पूर्व से पहले) से अभ्यास चला आ रहा है और यह दुनिया की सबसे पुरानी सिलाई प्रणालियों में से एक है। कांथा कढ़ाई भाषा के सबसे सरल कांटे के आधार पर बनाई जाती है – चलने वाला कांटा। कांथा की जटिल शब्दावली रनिंग फोम के विविध उपयोग के परिणामस्वरूप बनाई गई है।
कांथा सिलाई भारत में सबसे पुरानी कढ़ाई प्रक्रिया है, जिसका पालन अभी भी दक्षिण एशिया में लाखों महिलाएं करती हैं। इस उद्योग की उत्पत्ति बहुत ही सरल और सीधे तरीके से हुई है। ग्रामीण बंगाल में जन्मे, उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में उद्योग लगभग खो गया था, और 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद, कांथा उद्योग का एक मूल्यवान और मांग वाले उद्योग के रूप में पुनर्जन्म हुआ था।
अन्य सभी पारंपरिक बुनाई सामग्री की तरह, कांथा विभिन्न बाहरी कारकों से प्रभावित था, जैसे कच्चे माल की उपलब्धता, दैनिक मांग की मात्रा, जलवायु परिस्थितियों और भौगोलिक और आर्थिक नियामक। ऐतिहासिक रूप से, कपड़ा उत्पादन सबसे अधिक श्रम प्रधान उद्योगों की सूची में सबसे ऊपर था, और इस वजह से, तैयार कपड़ों का मूल्य बहुत अधिक था। तो उच्च गुणवत्ता, लेकिन व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले फटे कपड़े का पुन: उपयोग करके कांथा सिलना एक बहुत ही स्वाभाविक बात है। मूल रूप से महिलाएं यह काम घर बैठे ही कर रही हैं।
परंपरागत रूप से, पुरानी सूती साड़ी और लुंगी का उपयोग कांथा बनाने के लिए किया जाता था। पुराने कपड़ों से कपड़े के टुकड़ों को अलग करके कांथा को सिल दिया जाता है, जिससे उनका पुन: उपयोग सुनिश्चित होता है।

परतों में पांच से सात अलग-अलग तरह के कपड़े एक साथ सिल दिए जाएंगे। हल्के रंग के कपड़े बाहर की तरफ थे, ताकि टांके और सांचे को अलग-अलग समझा जा सके। डिजाइन पूरे कपड़े में फैला दी जाती है ताकि कांथा सिलाई मजबूत हो जाए। उन्नीसवीं सदी में, हर गांव में लगभग हर घर में एक महिला कांथा का हुनर रखती थी। घर का काम खत्म करने के बाद, वे अपना बाकी समय और बरसात के दिनों के लंबे और लम्बे दिनों को अपने दम पर कांथा सिलने में बिताती थीं। एक कांथा सिलने में महीनों, साल भी लग जाते हैं। कई बार ऐसा हुआ है जब एक ही कांथा, तीन पीढ़ियों का प्रतिनिधि बना यानी दादी, माँ और बेटी ने मिलकर सिलाई की। एक कांथा कई यादों का स्रोत है। शामिल वे हैं जिन्होंने सिलाई की, जिन्हें उपहार दिए गए, जिन्हें प्राप्त किया गया, और अंत में, शब्द के स्वामी की कई यादें।

पुराने और शुरुआती चरण का कांथा सरल, सीधा, एक ही बार में बनाया गया होता। समय के चक्र में कांथा की सिलाई या सिलाई में कई तरह के बदलाव किए गए हैं। साधारण कांथा में ग्रामीण नारी ने अपने मन की मधुरता को मिलाकर उसे एक कला में बदल दिया है। उसका घर, उसके बाहर की दुनिया, विचार फूल, पक्षी, जड़ी-बूटी को कांथा के डिजाइन में जगह मिली है, जिसे नक्शी कांथा नाम दिया गया है। कुछ के अनुसार, नक्शी कांथा नाम नक्ष से लिया गया है। नक्शी कांथा सिर्फ एक सचित्र कांथा नहीं है, नक्शी कांथा का डिजाइन एक ही समय में एक कांथा कलाकार के जीवन में धर्म, संस्कृति और विभिन्न घटनाओं का एक किस्सा है।
कांथा में, महिलाओं ने अपनी परियों की कहानियों, धार्मिक उपाख्यानों, मिथकों या अपने सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन के आख्यान सुने हैं; उनके सपने, उम्मीदें और दैनिक ग्रामीण जीवन एक सिलाई के छेद में सन्निहित था। वर्तमान में कांथा को छिद्र के प्रकार के अनुसार वर्गीकृत किया जा सकता है।
कांथा एक चल रहे सुई के माध्यम से सीना। इस तरीके से पहला कांथा बनाया गया था। रनिंग कांथा को नक्शी और पर कांथा के रूप में भी पहचाना जा सकता है।
फिर अनारसी कांथा है, जो बांग्लादेश के उत्तर में चपैनवाबगंज और जेस्सोर जिलों से आता है। इस कांथा के कई प्रकार हैं।
फिर तरंग तरंग कांथा या “लहर” कांथा। यह बांग्लादेश के राजशाही में लोकप्रिय है।
सुजनी कांथा केवल बांग्लादेश के राजशाही में पाई जाती है। इस कांथा में एक लोकप्रिय सामग्री लहरें, फूल और पत्ती का साँचा है। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि सुजनी कांथा भी बिहार, भारत में बनाई जाती है। कांताफोर या कालीन कांथा भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान अंग्रेजों द्वारा पेश किया गया था।
कांथा कपड़ा बनाने के लिए, पहले कपड़े के टुकड़ों को आकार में काटा जाता है और वांछित आकार और घनत्व प्राप्त करने के लिए परतों में व्यवस्थित किया जाता है। कपड़े की परतें जमीन पर फैली हुई हैं और अच्छी तरह से इस्त्री की गई हैं। फिर कांथा उद्योग पहले कपड़े की परतों को एक साथ रखने के उद्देश्य से कुछ बड़े, ढीले प्रकार के टांके के साथ कपड़े के कोनों को सिलता है। हालाँकि, यह विधि हर जगह स्वीकार नहीं की जाती है। कुछ पुराने कपड़े फैलाकर भी कांथा सिल दिया जाता है।
परंपरागत रूप से, कांथा एक बहुत ही व्यक्तिगत और रोजमर्रा की चीज थी, जिसे लंबे समय तक बनाया गया था और कई मामलों में परिवार में सभी का एक अलग कांथा था। ज्यादातर मामलों में कांथा का उपयोग हल्की ठंडी सर्दियों और हल्की हवा वाले मानसून में किया जाता है।

प्राचीन काल में छोटे बच्चों की सलामती के लिए भी कांथा का प्रयोग किया जाता था। जो महिलाएं जल्द ही मां बनने वाली थीं, वे अपनी गर्भावस्था के आखिरी कुछ महीनों के लिए कपड़े सिलती थीं, यह विश्वास करते हुए कि इससे उनके परिवारों में अच्छी किस्मत आएगी, और अजन्मे बच्चे को हर तरह की बीमारियों से बचाया जाएगा। कांथा को बोरी या पैसे की थैली के रूप में भी बनाया जाता था, और कभी-कभी मेहमानों के आने के अवसर पर फर्श को कांथा से ढक दिया जाता था। कांथा का इस्तेमाल निजी सामान छिपाने, पवित्र कुरान को ढंकने या प्रार्थना और तकिए के लिए एक आवरण के रूप में भी किया जाता था।

कांथा में, अंतापुर की महिलाओं ने अपनी परियों की कहानियां, या अपने निजी जीवन की कहानियां सुनाई हैं। पारंपरिक सूती कपड़े से कांथा बनाना आधुनिक कलाकारों द्वारा बनाए गए शानदार रेशमी कांथे की तुलना में बहुत आसान था। कपास की परतें आसानी से एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं, लेकिन रेशमी कपड़ों के मामले में वे अक्सर फिसल जाती हैं या विस्थापित हो जाती हैं, जिससे सिलाई अधिक लंबी हो जाती है।
ज्यामितीय कांथा की सिलाई के मामले में, कांथा कलाकारों को टांके की संख्या याद रहती है; इन डिजाइनों को कहीं भी चित्रित नहीं किया गया है। नक्शी कांथा के मामले में, सांचे को पारंपरिक रूप से सुई और धागे के किनारों से बनाया जाता है। आजकल, सांचों को पहले पेंसिल में खींचा जाता है, और फिर ट्रेसिंग पेपर के साथ कपड़े पर कॉपी किया जाता है। कुछ कांठों में (जैसे कालीन, चाटना और सुजनी, आदि) लकड़ी के ब्लॉकों का उपयोग रूपरेखा तैयार करने के लिए किया जाता है।
(स्त्रोत साभार – द बिजनेस स्टैंडर्ड, बांग्ला)
टोबा टेकसिंह

बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय।
मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और दिन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी ) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये।
उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चीमेगोइयां होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी के साथ जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा-
– मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?
तो उसने बड़े गौरो फिक्र के बाद जवाब दिया-
– हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।
ये जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया।
इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा–
– सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है – हमें तो वहां की बोली नहीं आती।
दूसरा मुस्कराया-
– मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है – हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ -आकड़ फिरते हैं।
एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया।
बाज पागल ऐसे थे जो पागल नहीं थे। उनमें अकसरियत ऐसे कातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे- दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्या तकसीम हुआ और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाकेआत से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उनकी गुफ्तगू (बातचीत) से भी वो कोई नतीजा बरआमद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे आजम कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलाहेदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है ?इसका महल-ए-वकू (स्थल) क्या है इसके मुतअल्लिक वह कुछ नहीं जानते थे। यही वजह है कि पागल खाने में वो सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह माउफ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ्तार थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है। अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ्तार हुआ कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे मुस्तकिल तकरीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मसअले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया, धमकाया गया तो उसने कहा-
– मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में। मैं इस दरख्त पर ही रहूंगा।
एक एम. एससी. पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास रविश (क्यारी) पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नमूदार हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफादार के हवाले कर दिये और नंगधंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।
यन्यूट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सरगर्म कारकुन था और दिन में पन्द्रह-सोलह मरतबा नहाता था, यकलख्त (एकदम) यह आदत तर्क (छोड़)कर दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उसने एक दिन अपने जिंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखादेखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जिंगले में खून-खराबा हो जाय, मगर दोनों को खतरनाग पागल करार देकर अलहदा-अलहदा बन्द कर दिया गया।
लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था जो मुहब्बत में मुब्तिला होकर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। इसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे मुहब्बत हो गयी थी। गो उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको नहीं भूला था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये– उसकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे,उसको हिन्दुस्तान वापस भेज दिया जायेगा। उस हिन्दुस्तान में जहां उसकी महबूबा रहती है। मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था– इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।
यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बहुत रंज हुआ। वह छुप-छुप कर इस मसअले पर गुफ्तगू करते रहते कि पागलखने में उनकी हैसियत क्या होगी। यूरापियन वार्ड रहेगा या उड़ जायगा। ब्रेकफास्ट मिलेगा या नहीं। क्या उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो जहरमार नहीं करनी पड़ेगी?
एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज सुनने में आते थे, ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।’ वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से में एक एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। अलबना किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।
हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुतअिल्लक जब कभी पागलखाने में गुफ्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी संजीदगी से जवाब देता, ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।’
लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो यह बताने की कोशिश करते थे वो खुद इस उलझाव में गिरफ्तार हो जाते थे कि स्याल कोटा पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है कल हिन्दुस्तान में चला जायगा या सारा हिन्दुस्तान हीं पाकिस्तान बन जायेगा। और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब नहीं हो जायेंगे।
उस सिख पागल के केस छिदरे होके बहुत मुख्तसर रह गये थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे जिनके बाइस (कारण) उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। मगर आदमी बेजरर (अहानिकारक) था। पन्द्रह बरसों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने मुलाजिम थे वो उसके मुतअलिक इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।
महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी खैर-खैरियत दरयाफ्त करके चले जाते थे। एक मुप्त तक ये सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।
उसका नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने दिन बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके अजीज व अकारिब (सम्बन्धी) उससे मिलने के लिए आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वो दफादार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवा के पहनता और यूं सज-बन कर मिलने वालों के पास आता। वो उससे कुछ पूछते तो वह खामोश रहता या कभी-कभार ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी वेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी लालटेन ‘ कह देता। उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी आपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे।पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब इत्मीनान बख्श (सन्तोषजनक) जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब- दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनकी आमद की खबर दे दिया करती थी।
उसकी बड़ी ख्वाहिश थी कि वो लोग आयें जो उससे हमदर्दी का इजहार करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वो उनसे अगर पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो यकीनन वो उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका ख्याल था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं जहां उसकी जमीनें हैं।
पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में तो उसने हस्बेआदत (आदत के अनुसार) कहकहा लगाया और कहा–
– वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं लगाया।
बिशन सिंह ने इस खुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत मसरूफ था, इसलिए कि उसे ओर बेशुमार हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ वाहे गुरूजी दा खलसा एन्ड वाहे गुरूजी की फतह। जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल।’ उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमान के खुदा हो, सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते। तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान दोस्त मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हट गया और वापस आने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका– — ये तुमसे मिलने आया है – तुम्हारा दोस्त फजलदीन है।
बिशन सिंह ने फजलदीन को देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।
– मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी खैरियत से चले गये थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर…। वह कुछ कहते कहते रूक गया । बिशन सिंह कुछ याद करने लगा —
– बेटी रूप कौर ।
फजलदीन ने रूक कर कहा-
– हां वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।
बिशन सिंह खामोश रहा। फजलदीन ने कहना शुरू किया-
– उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी खैर-खैरियत पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से सलाम कहना– और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना फजलदीन राजी-खुशी है। वो भूरी भैंसे जो वो छोड़ गये थे उनमें से एक ने कट्टा दिया है दूसरी के कट्टी हुई थी पर वो छ: दिन की हो के मर गयी और और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना, मै। हर वक्त तैयार हूं और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरून्डे लाया हूं।
बिशन सिंह ने मरून्डे की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलदीन से पूछा- — टोबा टेकसिंह कहां है?
-टोबा टेकसिंह… उसने कद्रे हैरत से कहा– कहां है! वहीं है, जहां था।
बिशन सिंह ने पूछा– पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में?
-हिन्दुस्तान में…। नहीं-नहीं पाकिस्तान में…।
फजलदीन बौखला-सा गया। बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया– ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हए फिटे मुंह।
तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फेहरिस्तें (सूचियां) पहुंच गयी थीं, तबादले का दिन भी मुकरर्र हो गया था। सख्त सर्दियां थीं। जब लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफिज दस्ते के साथ् रवाना हुई तो मुतअल्लिका (संबंधित ) अफसर भी हमराह थे। वाहगा के बार्डर पर तरफैन के (दोनों तरफ से) सुपरिटेंडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तेदाई कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रजामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते क़ोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी– पागल औरतों का शेरोगोगा अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत बज रहे थे।
पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। चन्द जो कुछ सोच रहे थे– ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। दो-तीन मरतबा फसाद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमान और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया।
जब बिशन सिंह की बारी आयी ओर वाहगा के उस पार मुतअल्लका अफसर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा– टोबा टेकसिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में? -मुतअल्लका अफसर हंसा–पाकिस्तान में।
यह सुनकर विशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी मांदा साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा–टोबा टेकसिंह कहां है ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एन्ड पाकिस्तान।
उसे बहुत समझाया गया कि देखों अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जायगा। मगर वो न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गयी तो वह दरम्यान में एक जगह इस अन्दाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी।
आदमी चूंकि बेजरर था इसलिए उससे मजीद जबरदस्ती न की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले साकित व साकिन (शान्त) बिशनसिंह हलक से एक फलक शगाफ (आसमान को फाड़ देने वाली ) चीख निकली — इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये और देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर खारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था– इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरमियान में जमीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।
डिंगल काव्य धारा की सशक्त मगर उपेक्षित कवयित्री झीमा चारिणी

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, हिंदी के आदिकालीन साहित्य में प्रचुर परिमाण में चारण काव्य लिखा गया था। साहित्य के सुधी पाठक जानते हैं कि चारण कवि प्राय: राजा के दरबार या उनके संरक्षण में रहते थे, बहुधा उनके साथ युद्ध में भी भाग लेते थे और अपने आश्रयदाता की प्रशंसा में काव्य रचना किया करते थे। इन्हें बंदी या भाट कहकर भी संबोधित किया जाता था। कालांतर में चारणों की पहचान एक विशेष जाति या वर्ग के रूप में भी बनी। उन्होंने आश्रयदाताओं के प्रशस्ति गायन के अतिरिक्त अन्य कार्य भी किए। चारण काव्य के रचनाकारों के रूप में प्राय: पुरुष रचनाकारों के नाम ही मिलते हैं लेकिन अपवादस्वरूप कुछ स्त्रियों ने भी चारण काव्य लिखा जैसे- झीमा चारिणी, पद्मा चारिणी आदि। इनकी चुनिंदा कविताओं अथवा पदों को संपादित पुस्तकों में संकलित किया गया है और कुछ रचनाएँ इन्टरनेट पर भी उपलब्ध हैं। जगदीश्वर चतुर्वेदी और सुधा सिंह द्वारा संपादित “स्त्री काव्य धारा” में भी आदिकालीन एवं मध्यकालीन विस्मृत लेकिन महत्वपूर्ण कवयित्रियों की रचनाओं को सहेजा गया है जिन्हें साहित्य के इतिहास ग्रंथों में अमूमन जगह नहीं मिली है। सखियों, आज मैं आपको झीमा चारिणी से मिलवाऊंगी, जिनका नाम भी बहुत से लोगों ने नहीं सुना होगा।
झीमा कच्छ देश के अंजार नगर के निवासी मालव जी चारण, जिनका संबंध बरसड़ा शाखा से था, की कनिष्ठ पुत्री थीं। पिता तो व्यापारी थे लेकिन पुत्री ने अपनी जाति की वास्तविक पहचान या गुणों के अनुरूप काव्य रचना की। कहा जाता है कि एक चारण युवक ने इनका अपमान किया था और उन्होंने शपथ ली थी कि वह किसी चारण युवक से विवाह नहीं करेंगी। अत: इनका विवाह जैसलमेर के तणोट निवासी भाटी बुध के साथ हुआ था। इनके जन्म वर्ष या मृत्यु काल के बारे में तो ठीक से जानकारी नहीं मिलती लेकिन इतना पता अवश्य मिलता है कि इनका रचनाकाल संवत १४८० के आस -पास था। आलोचकों के अनुसार इनकी लेखनी बहुत सशक्त और प्रेरक थी। जिस तरह महाकवि बिहारी ने अन्योक्तिपरक दोहा, “नहिं पराग नहिं मधुर मधु…” लिखकर नवोढ़ा पत्नी के प्रेम में आपादमस्तक डूबे राजा जयसिंह को चेताया था, ठीक उसी तरह झीमा ने भी अपनी प्रेरक कविता द्वारा गागरोण गढ़ के राजा अचलदास खींची जो लालादे के प्रति अनुरक्त थे, को समझाइश दी और वे हमेशा के लिए अपनी पत्नी उमा दे सांखली के प्रति समर्पित हो गये। वह पद आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-
“धिन ऊमादे साँखली, तें पिव लियो भुलाय ।
सात बरसरो बीछड्या, ता किम रैन विहाय ।।
किरती माथे ढल गई, हिरनी लूँवा खाय ।
हार सटे पिय आणियो, हँसे न सामो थाय ।।
चनण काठरो टालिया, किस्तूरियाँ अवास ।
धण जागे पिय पौढयो, बालू औधर बास ।।
लालाँ लाल मेवाड़ियॉ, उमा तीज बल भार ।
अचल ऐराक्यॉ ना चढ़ै, रोढ़ाँ रो असवार ।।
काले अचल मोलावियो, गज घोडाँ रे मोल ।
देखत ही पीतल हुओ, सो कडल्याँ रे बोल ।।
धिन्य दिहाडो धिन घड़ी, मैं जाण्यो थो आज ।
हार गयो पिव सो रह्यो, कोइ न सिरियो काज ।।
निसि दिन गर्ई पुकारताँ, कोइ न पूगी दाँव ।
सदा बिलखती धण रही, तोहि न चेत्यो राव ।।
ओढ़न झीणा अंवरा, सूतो खूँटी ताण ।
ना तो जाग्या बालमो, ना धन मूक्यो माँण ।।
तिलकन भागो तरुणि को, मुखे न बोल्यो बैण ।
माण कलड़ छूटी नहीं, आजेस काजल नैण ।।
खीची से चाँहे सखी, कोई खीची लेहु ।
काल पचासाँ में लियो, आज पचीसाँ देहु ।।
हार दियाँ छेदो कियो, मूक्यो माण मरम्म ।
ऊँमाँ पीवन चक्णियो, आडो लेख करम्म ।।”
झीमा के पदों में ह्रदय के सघन भावों की मार्मिक अभिव्यक्ति मिलती है जो पाठकों को सहजता से बाँध लेती है। इनकी कविता का भावपक्ष और कलापक्ष दोनों अंत्यंत समृद्ध है। डिंगल काव्य धारा में उनका अवदान महत्वपूर्ण है लेकिन इसके बावजूद इनका उल्लेख बहुत कम पुस्तकों में मिलता है। झीमा की कविता का एक उदाहरण देखिए जिसमें एक बार पुनः उमा का प्रसंग उपस्थित हैं।
“लाला मेवाड़ी करे बीजो करे न काय ।
गायो झीमा चारिणी, ऊमा लियो गुलाय ।।
पगे बजाऊँ गूधरा, हाथ बजाऊँ तुंब ।
ऊमा अचल मुलावियो, ज्यूँ सावन की लुंब ।।
आसावरी अलापियो, धिनु झीमा धण जाण ।
धिण आजूणे दीहने, मनावणे महिराण ।।”
विरहिणी नायिका का दुख वर्णित करते हुए झीमा ने अपनी कलम को मानो दर्द की स्याही में डुबो दिया है। भारतीय दांपत्य जीवन की परंपरा में पत्नी का पति के अलावा और कोई अवलंबन नहीं होता था। अगर पति रूठ जाए या किसी अन्य स्त्री के प्रति अनुरक्त हो जाए तो पत्नी का सारा संसार ही सूना हो जाता है, भले ही वह रानी हो या साधारण स्त्री। विरहिणी स्त्री की पीड़ा का अत्यंत मर्मस्पर्शी वर्णन प्रस्तुत पद में हुआ है-
” माँग्या लाभे जब चरण, मौजी लभे जुवार ।
माँग्या साजन किमि मिल, गहली मूढ गँवार ।।
पहो फाटी पगडो हुओ, विछरण री है बार ।
ले सकि थारो बालमो, उरदे म्हारो हार ।।”
सावित्री सिन्हा ने अपनी पुस्तक “मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ” में झीमा चारिणी के साहित्यिक अवदान को रेखांकित करते हुए लिखा है-
“झीमा की कहानी उस अंधकारमय नारी के इतिहास में जुगनू की चमक की भाँति दिखाई देती है. कई युद्धों के अवसर पर उसने चारिणी का कार्य किया। कला और सौन्दर्य की कोमलता में राजनीति और युद्ध की कटुता मिलाकर उसने एक नई भावना को जन्म दिया।”
सखियों, इसके बावजूद हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने झीमा चारिणी की बहुत उपेक्षा की है। उनके प्रति साहित्यकारों की यह उपेक्षा वस्तुतः हमारे समाज की या उस युग विशेष की मानसिकता को स्पष्ट करती है जिसके तहत स्त्री का कार्यक्षेत्र अत्यंत सीमित होता है और इसका अतिक्रमण करके किये गये हर कार्य की, वह कितना भी महत्वपूर्ण क्यों ना हो, अवमानना या उपेक्षा ही की जाती है। आइए, इस उपेक्षा के घाव को समादर के मलहम से भरने का प्रयास करें। झीमा चारिणी जैसी विस्मृत कवयित्रियों की कविताओं को जन- जन तक पहुँचाकर ही हम इनके प्रति हुए अन्याय का प्रतिरोध कर सकते हैं।
अफगानिस्तान मुद्दे पर मुखर हुए सभी धर्मों के लेखक
कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद द्वारा ‘काबुल:तब और अब’ विषय पर एक ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अफगानिस्तान और भारत के बीच प्राचीन काल से बने ऐतिहासिक संबंध को याद किया गया। इस वेबिनार में सभी धर्मों के लेखकों ने अफगानिस्तान में जारी हिंसा, आतंक और भय पर चिंता व्यक्त करते हुए इस देश में भारत द्वारा किए गए विकास कार्यों को याद किया। सभी ने सुरक्षा, शांति तथा लोकतंत्र की पुनःप्रतिष्ठा की कामना की। परिषद की अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने साहित्यकारों का स्वागत करते हुए कहा कि हमें कभी ऐसा लगा नहीं कि अफगानिस्तान भारत में नहीं है। वहां के इतने खूबसूरत लोग, इतने बढ़िया मेवा, वहां के बर्फ़ से ढके पहाड़ मुझे हर क्षण बद्रीनाथ, केदारनाथ और कश्मीर की वादियों में पहुँचाते रहे हैं। युवा आलोचक आशीष मिश्र ने अंतरराष्ट्रीय मुद्दे को साहित्यिक दृष्टि से देखते हुए कहा कि राजनीति का देश और कलाओं का देश हमेशा एक नहीं हो सकता। वह अलग-अलग होता है। राजनीति का देश बहुत सीमित होता है और कलाओं का देश बहुत सुविस्तृत होता है और सामान्यतः पूरी मनुष्यता तक फैला हुआ होता है। वरिष्ठ कवि शहंशाह आलम ने भारत-अफ़ग़ान की मैत्रीपूर्ण रिश्तों की गर्माहट को महसूसते हुए कहा कि अफ़ग़ान और भारत का जो मानवीय रिश्ता है, वह बना रहना चाहिए और वहां की मौजूदा स्थिति पर नजरें टिकाएं रखने की जरूरत है। इस अवसर पर उन्होंने ‘काबुलीचना’ कविता का पाठ किया। कहानीकार तबस्सुम निहां ने मुख्यतः वहां की महिलाओं की वर्तमान स्थिति पर कहा कि जिस तरह तालिबानी वहां की महिलाओं के अधिकारों का हनन कर रहे हैं, ऐसे हालात में वहां की महिलाओं पर सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत है। भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ शम्भुनाथ ने कहा कि “एशिया में गौतम बुद्ध हुए थे और उन्होंने शांति, अहिंसा और मैत्री की बात की थी। एशियाई देशों के खिलाफ साजिश से निपटने के लिए सारे बुद्धिजीवियों, मानवताप्रेमियों और सभी धर्मों के लोगों को एक स्वर में प्रतिरोध करना होगा।” कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि साहित्य में सृजन एक गहरी बेचैनी का मामला है और आज हमारे पड़ोसी मुल्क अफगानिस्तान में जिस तरह की घटनाएं घट रही हैं, वह पूरी तरह मानवजाति और लोकतंत्र पर एक हमले की तरह है। इस अवसर पर देशभर से साहित्य और संस्कृति प्रेमियों ने हिस्सा लिया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ केयूर मजूमदार ने दिया।
माधव ही उद्धार करें

त्रेता युग से कलयुग तक,
हर भारतवासी याद करें,
जब संकट आए भारत पर,
माधव ही उद्धार करें।
द्रौपदी की लाज बचाई,
शांतिदूत भूमिका निभाई,
विराट रूप दिखा दुर्योधन को,
अपनी सही पहचान बताई।
हे नंदनंदन भारत को अब,
तुम्हारी बहुत जरूरत है,
युद्ध चाहने वालों को,
समझाने की जरूरत है।
भारत रथ के सारथी बनकर,
अर्जुन की तरह संभालो केशव,
हो तम का नाश उजाला फैले,
यही अर्चना करते माधव।
भारतवासी करें यह वंदन,
अत्याचारों का कर दो खंडन,
स्वीकार करो प्रभु यह अभिनंदन,
करें हाथ जोड़ यही आराधन।
11वें तुरिया टॉक्स की अतिथि बनीं गायिका अनुराधा पौडवाल
कोलकाता : तुरिया टॉक्स के 11वे प्रकरण में अतिथि के रूप में अनुराधा पौडवाल मौजूद रहीं। जहाँ वे अपने जीवन के बारे में एक गायिका और एक जनहितैषी के रूप में बात करती हैं। जानी – मानी पार्श्वगायिका यानी प्लेबैक सिंगर के रूप में अनुराधा पौंडवाल एक प्रख्यात नाम हैं। उनको पद्मश्री, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्म फेयर जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले हैं। वे कई कल्याणकारी संगठनों की संस्थापक भी हैं जो पूरे भारत में चिकित्सा केंद्रों और वंचित समुदायों को दान देती हैं। इस संवाद सत्र में उन्होंने अपनी गायकी के दिनों की यादें ताजा कीं और अपने परिश्रम तथा इस क्षेत्र की चुनौतियों पर बात की। बातचीत में संगीत उद्योग, राजनीति समेत कई अन्य मुद्दों पप चर्चा करते हुए आज के गायकों और गीतों पर अपने विचार साझा किये। पौंडवाल ने विद्यालयों के लिए मुम्बई में आयोजित अपने मौजूदा धन संचय अभियान के बारे में तूरिया टॉक्स के इस संवाद सत्र में जानकारी दी। यह विद्यालय हाल ही मे राज्य मे आए चक्रवात और चल रही कोविड महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। उन्होंने साझा किया की लोग कैसे उनकी इस कार्य में सहायता कर सकते हैं और दान कैसे दे सकते हैं। वर्तमान स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं पर उन्होंने अपनी बात रखी। अनुराधा पौंडवाल ने तूरिया टॉक्स की सराहना करते हुए शुभकामनाएँ दीं।
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम
अध्यात्म जगत में 14 विद्याएं और 64 कलाएं होती हैं जिसमें श्रीकृण पारंगत हैं। विद्या दो प्रकार की होती है परा और अपरा विद्या। इसी तरह कलाएं भी दो प्रकार की होती है। पहली सांसारिक कलाएं और दूसरी आध्यात्मिक कलाएं। भगवान श्रीकृष्ण सांसारिक और अध्यात्मिक दोनों ही तरह की विद्या और कलाओं में पारंगत थे।
1. श्रीकृष्ण के गुरु मानते थे उन्हें अपना गुरु : भगवान श्रीकृष्ण के सबसे पहले गुरु सांदीपनी थे। उनका आश्रम अवंतिका (उज्जैन) में था। देवताओं के ऋषि को सांदीपनि कहा जाता है। वे भगवान कृष्ण, बलराम और सुदामा के गुरु थे। उन्हीं के आश्रम में श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा के साथ ही 64 कलाओं की शिक्षा ली थी। गुरु ने श्रीकृष्ण से दक्षिणा के रूप में अपने पुत्र को मांगा, जो शंखासुर राक्षस के कब्जे में था। भगवान ने उसे मुक्त कराकर गुरु को दक्षिणा भेंट की। इसके अलावा श्रीकृष्ण के गुरु नेमिनाथ, वेदव्यास, घोर अंगिरस, गर्ग मुनि और परशुराम भी थे। परंतु ये सभी श्रीकृष्ण को ही अपना गुरु मानते थे। भीष्म पितामह और गुरु द्रोणाचार्य भी उनकी पूजा करते थे।
2. पूर्णावतार : भगवान श्रीकृष्ण का भगवान होना ही उनकी शक्ति का स्रोत है। वे विष्णु के 10 अवतारों में से एक आठवें अवतार थे, जबकि 24 अवतारों में उनका नंबर 22वां था। उन्हें अपने अगले पिछले सभी जन्मों की याद थी। सभी अवतारों में उन्हें पूर्णावतार माना जाता है।
3. श्रीकृष्ण के शिष्य : अर्जुन सहित पांचों पांडवों को श्रीकृष्ण ने समय- समय पर शिक्षा दी है। उन्होंने अर्जुन और उद्धव को गीता का ज्ञान दिया था। महाभारत में श्रीमद्भगवद गीता, अनु गीता और उद्धव गीता नाम से प्रसिद्ध गीताएं श्रीकृष्ण के ही प्रवचन हैं।
4. माना जाता है पूर्णावतार : 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति ईश्वरतुल्य होता है या कहें कि स्वयं ईश्वर ही होता है। पत्थर और पेड़ 1 से 2 कला के प्राणी हैं। पशु और पक्षी में 2 से 4 कलाएं होती हैं। साधारण मानव में 5 कला और स्कृति युक्त समाज वाले मानव में 6 कला होती है। इसी प्रकार विशिष्ठ पुरुष में 7 और ऋषियों या महापुरुषों में 8 कला होती है। 9 कलाओं से युक्त सप्तर्षिगण, मनु, देवता, प्रजापति, लोकपाल आदि होते हैं। इसके बाद 10 और 10 से अधिक कलाओं की अभिव्यक्ति केवल भगवान के अवतारों में ही अभिव्यक्त होती है। जैसे वराह, नृसिंह, कूर्म, मत्स्य और वामन अवतार। उनको आवेशावतार भी कहते हैं। उनमें प्राय: 10 से 11 कलाओं का आविर्भाव होता है। परशुराम को भी भगवान का आवेशावतार कहा गया है। भगवान राम 12 कलाओं से तो भगवान श्रीकृष्ण सभी 16 कलाओं से युक्त हैं। यह चेतना का सर्वोच्च स्तर होता है। इसीलिए प्रभु श्रीकृष्ण जग के नाथ जगन्नाथ और जग के गुरु जगदगुरु कहलाते हैं।
5. गोपियों को दिया ज्ञान : कहते हैं कि श्रीकृष्ण के माध्मम से हजारों गोपियों ने ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष की प्राप्ती की। वृंदावन में ऐसी भी गोपियां थीं जो पिछले जन्म में ऋषि थे। उन्होंने श्रीकृष्ण से भक्तियोग सीखने के लिए ही गोपी रूप में जन्म लिया था।
6. सभी तरह का दिया ज्ञान : श्रीकृष्ण ने संसार को सभी तरह का ज्ञान दिया। उन्होंने कर्मयोग, ज्ञानयोग, तंत्रयोग के साथ ही भक्ति योग की शिक्षा भी दी। उन्होंने संसार में जीवन और संन्यास में धर्म की शिक्षा भी दी।
7. सखा भी और गुरु भी : श्रीकृष्ण अपने भक्तों के सखा भी और गुरु भी हैं। वे सखा बनकर गुर ज्ञान देते हैं। उनके हजारों सखाओं की कहानियों को जानने से यह भेद खुल जाता है।
(साभार – वेबदुनिया)




