नयी दिल्ली : केंद्र सरकार के वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण में इंदौर को लगातार पांचवीं बार सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया जबकि छत्तीसगढ़ ने सबसे स्वच्छ राज्य का स्थान बरकरार रखा । वार्षिक स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार 2021 के परिणामों की घोषणा शनिवार को की गई । स्वच्छ सर्वेक्षण पुरस्कार 2021 में सबसे स्वच्छ शहरों में दूसरा स्थान सूरत को और तीसरा स्थान विजयवाड़ा को प्राप्त हुआ।
आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा घोषित सर्वेक्षण में छत्तीसगढ़ को भारत का सबसे स्वच्छ राज्य घोषित किया गया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को सर्वेक्षण में ‘‘स्वच्छ गंगा शहर’’ की श्रेणी में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। इस श्रेणी में बिहार के मुंगेर को दूसरा और पटना को तीसरा स्थान प्राप्त हुआ।
स्वच्छ सर्वेक्षण 2021 में इंदौर और सूरत ने अपना स्थान बरकरार रखा हालांकि नवी मुम्बई स्वच्छ शहर की श्रेणी में तीसरे स्थान से चौथे स्थान पर आ गई । राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गत शनिवार को विजेताओं को पुरस्कार प्रदान किये । इस अवसर पर आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी एवं अन्य उपस्थित थे । इस अवसर पर राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि उन्हें बताया गया है कि 35 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों तथा शहरी क्षेत्र खुले में शौच से मुक्त हुए हैं।
कोविंद ने कहा कि स्वच्छ भारत मिशन की सबसे बड़ी सफलता देश की सोच में बदलाव आना है जहां अब घर के छोटे बच्चे भी बड़ों को गंदगी फैलाने से रोकते और टोकते हैं ।
आवास शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छ सर्वेक्षण में 28 दिनों में 4,320 शहरों में 4.2 करोड़ लोगों की राय ली गई ।
सर्वेक्षण में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश को देश में स्वच्छ राज्यों में दूसरा और तीसरा स्थान प्राप्त हुआ जहां 100 से अधिक शहरी स्थानीय निकाय हैं । 100 से कम शहरी स्थानीय निकाय वाले राज्यों की श्रेणी में झारखंड को पहला स्थान मिला और इसके बाद हरियाणा और गोवा को स्थान प्राप्त हुआ । एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में शीर्ष 10 स्वच्छ शहरों में इंदौर, सूरत, विजयवाड़ा, नवी मुम्बई, नयी दिल्ली, अंबिकापुर, तिरूपति, पुणे, नोएडा और उज्जैन शामिल हैं । इस श्रेणी में 25 शहरों की सूची में लखनऊ को निचला स्थान प्राप्त हुआ ।
मंत्रालय के अनुसार, एक लाख से कम आबादी वाले शहरों में महाराष्ट्र का विटा शहर को प्रथम स्थान मिला और इसके बाद लोनावाला और ससवाड शहर को स्थान प्राप्त हुआ । इसी प्रकार से, 1-3 लाख आबादी वाले छोटे स्वच्छ शहरों की श्रेणी में नयी दिल्ली नगरपालिका परिषद को प्रथम स्थान मिला । नागरिकों की राय के आधार पर होसंगाबाद तेजी से उभरते छोटे शहर और तिरूपति को श्रेष्ठ छोटे शहर के रूप में सामने आया ।
वहीं, 3-10 लाख आबादी की श्रेणी में नोएड देश में ‘स्वच्छ मध्यम शहर’ के रूप सामने आया जबकि नवी मुम्बई ने ‘सफाई मित्र सुरक्षा चैलेंज’ पुरस्कार प्राप्त किया । छावनी बोर्ड की श्रेणी में अहमदाबाद को सबसे स्वच्छ शहर का पुरस्कार मिला । इस श्रेणी में अहमदाबाद के बाद मेरठ और दिल्ली को स्थान प्राप्त हुआ ।
स्वच्छ सर्वेक्षण : इंदौर लगातार पांचवी बार सबसे स्वच्छ शहर घोषित छत्तीसगढ़ सबसे स्वच्छ राज्य
करतारपुर कॉरिडोर खुलने से 73 साल बाद मिले दो दोस्त
1947 के बंटवारे ने किया था अलग
इस्लामाबाद : करतारपुर कॉरिडोर के खुलने से बंटवारे से अलग हुए दो दोस्तों की मुलाकात हो गई। भारत के सरदार गोपाल सिंह अपने बचपन के दोस्त अब 91 साल के मोहम्मद बशीर से 1947 में अलग हो गए थे। इतने लंबे अरसे बाद एक दूसरे को देख दोनों की आंखें भर आई और उन्होंने एक दूसरे को गले लगा लिया। इस समय सरदार गोपाल सिंह की उम्र 94 साल जबकि मोहम्मद बशीर 91 साल के हो चुके हैं।
भारत से दर्शन करने गए थे सरदार गोपाल सिंह
पाकिस्तानी अखबार डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, करतारपुर कॉरिडोर खुलने से सरदार गोपाल सिंह गुरुद्वारा दरबार साहिब के दर्शन के लिए पाकिस्तान आए हुए थे। पाकिस्तान के नरोवाल के रहने वाले मोहम्मद बशीर भी गुरुद्वारा पहुचे हुए थे। इस दौरान दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उन्हें चेहरा जाना पहचाना लगा। थोड़ी बहुत पूछताछ के बाद दोनों एक दूसरे को पहचान गए।
मौजूद लोगों की आँखें भर आई
यह मौका इतना भावुक था कि वहां मौके पर मौजूद भारतीय तीर्थयात्री और पाकिस्तानी नागरिकों के आंखें भर आई। सभी लोगों ने विभाजन के दौरान अलग हुए इन दो दोस्तों की मुलाकात पर खुशी भी जताई। भारत, पाकिस्तान और दुनिया के दूसरे देशों से पहुंचे तीर्थयात्रियों ने इन दोनों दोस्तों को बधाईयां दी। दोनों पुराने दोस्तों ने अपने बचपन और जवानी के किस्से भी सुनाए।
बंटवारे से पहले साथ में गुरुद्वारा जाते थे दोनों दोस्त
गोपाल सिंह ने कहा कि पाकिस्तान बनने के दौरान दोनों नौजवान थे। बशीर ने कहा कि बंटवारे से पहले भी दोनों दोस्त बाबा गुरु नानक के गुरुद्वारे में जाया करते थे। इन दोनों दोस्तों ने दोपहर का भोजन एक साथ ही किया और चाय पी। गोपाल सिंह ने करतारपुर कॉरिडोर के प्रोजेक्ट पर खुशी जाहिर की और इसके लिए दोनों देशों की सरकारों को धन्यवाद दिया।
माया सभ्यता में 4000 साल पहले कहां से आता था नमक? पानी के नीच मिली ‘रसोई’
बर्तनों से खुलेगा रहस्य
लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी में माया पुरातत्वविद हीथर मैककिलोप और उनकी टीम ने खुदाई में ‘सॉल्ट किचन’ की खोज की है, जहां मिट्टी के बर्तनों में नमकीन पानी को उबाला जाता था। पानी के नीचे इस खोज से पता चला है कि माया सभ्यता के ‘सॉल्ट वर्कर्स’ ने उस दौर में शहरों के भीतर नमक की आपूर्ति कैसे की। खोज में उन्हें सैकड़ों लकड़ी के नमूने, मिट्टी के बर्तनों के ढेर और छप्पर के घर मिले हैं।
ढेर सारे बर्तनों से भरी पुरातत्वविद लैब
एलएसयू डिपार्टमेंट ऑफ जियोग्राफी एंड एंथ्रोपोलॉजी में थॉमस एंड लिलियन लैंड्रम एलुमनी प्रोफेसर मैककिलोप ने कहा कि पुरातत्वविद लैब ढेर सारे बर्तनों से भरी हुई है। लेकिन वे लकड़ियों को गीला रख रहे हैं ताकि वे सूखकर खराब न हों। उन्होंने कहा कि मैंने Ek Way Nal की प्रत्येक इमारत से प्राप्त लकड़ी के नमूनों को रेडियोकार्बन डेटिंग के लिए भेजने का फैसला किया है। ताकि यह पता किया जा सके कि क्या लकड़ियां और समुद्र तल पर पाई गईं कलाकृतियां और इमारतें एक ही समय की हैं।
900 ईस्वी में ही खाली कर दिए गए थे शहर
मैककिलोप ने एक भवन निर्माण की भी खोज की है जो माया सभ्यता के चरम पर लेट क्लासिक में शुरू हुआ और मध्य टर्मिनल क्लासिक तक चलता रहा, जब माया शाही नेताओं की शक्ति घट रही थी। इन शहरों को 900 ईस्वी में खाली छोड़ दिया गया था। खोजकर्ताओं ने सॉल्ट किचन और कम से कम एक निवास के साथ तीन भाग के भवन निर्माण की सूचना दी है।
पहली बार घर की दूरी क्या होती है ये समझ आ गई
प्रशस्ति प्रख्यात नृत्यांगना हैं और कबीर एवं बुद्ध की रचनाओं के अतिरिक्त साहित्य की धरोहरों का सम्बन्ध नृत्य से जोड़कर उनको लोकप्रिय बना रही हैं।
( आज ये बात बता रही हूँ उन तमाम लड़कियों को जो थोड़ा जूझती है जब स्कूल से कॉलेज का सफ़र तय करती है)
“माँ लंच बॉक्स तैयार है ? हाँ बेटा नया बैग, नया सूट, और एक बोतल पानी, मैं निकली घर से माँ के दिए हुए 185 रूपये बड़े पापा ने जैसे जैसे रास्ते को बताया था, बी. एच. यू तक जाने के लिए वैसे ही जा रही थी बिल्कुल शांत क्योंकि मैं बोलती ही नहीं थी। तक़रीबन कंधे पर 300 घुघरूँ बैग में लिए पहले दिन लंका जाना तो ऑटो वाले ने गलत सुना और मुझे लहरतारा छोड़ दिया। 11:30 बजे क्लास शुरु होनी थी मैं दुपट्टा नही सँभाल पा रही थी लेकिन हमें सूट में ही कॉलेज जाना होता था। माँ अपना फ़ोन दे देती थी ताकि उनको पता लगता रहे की मैं कहाँ पहुँची ? बीच में माँ ने फ़ोन किया :कहाँ पहुँची? “मैंने उनको बोला : “माँ सुनो डरना मत। मैं लंका की बजाय लहरतारा आ गई फिर एक लहरतारा से कैंट जाने वाली बस को पकड़ा और उतर गई कैंट पर। वहाँ से ऑटो लिया लंका का फिर रास्ते का खौफ़ ख़त्म हो गया कही भी निकलूंगी पहुँच ही जाऊँगी मंजिल पर। जो एकदम नये सूट में तैयार थी वो लगभग डर से पसीने से भीग चुका था, फिर वहाँ से 4 बजे निकलती तो वैसे ही घर जाती ये सिलसिला चलता रहा। एक दिन एक ऑटो चालक ने मेरे बगल में एक प्लास्टर लगे आदमी को बैठाया। फिर क्या था आधे रास्ते अपने सीने से लगाये अपने बैग को मैं खिड़की पर दुबक कर बैठी थी लेकिन शायद उसके गिरेपन की दाद देनी पड़ेगी। उस प्लास्टर लगे हाथ से मेरे बैग नहीं बोलूँगी, सीने पर मारने की कोशिश नाक़ाम रही। फिर क्या था मैंने उसको घूरा और ज़ोर से चिल्लाकर बोला – ‘जरा तमीज़ से जो हाथ टूटा है ना पूरा तोड़ दूँगी’ और ऑटो को रोक कर बीच रास्ते में उतर गई। शायद पापा और बुआ के सानिध्य में कराटे सीखने का रौब भी था। ये बात किसी को पता नहीं फिर क्या उस समय के बाद कभी नहीं डरी। ना ही ऐसे पुरुषों से ना उनके स्वभाव से ।आज जब कुछ आँखे घूरती है तो मैं उससे ज्यादा ही घूर देती हूँ, पहली बार घर की दूरी क्या होती है ये समझ आ गई।
जिसे समझा ‘चार पैरों वाला सांप’, वह निकली 11 करोड़ साल पुरानी समुद्री छिपकली
ओटावा : आज से छह साल पहले 2015 में ‘चार पैरों वाले सांप’ की खोज की गई थी। अब एक स्टडी में खुलासा हुआ है कि वह सांप नहीं बल्कि लंबे शरीर वाली समुद्री छिपकली थी। ब्राजील में पाए गए जीवाश्म जीव को शुरुआत में सांप और छिपकली के बीच का जीव समझा जा रहा था। यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा के जीवाश्म विज्ञानियों के मुताबिक 11 करोड़ साल पुराना सरीसृप, टेट्रापोडोफिस एम्प्लेक्टस, एक छिपकली से ज्यादा कुछ नहीं है।
शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा सांप जैसा
कैल्डवेल ने कहा कि हमारी टीम का प्रमुख निष्कर्ष यह है कि टेट्रापोडोफिस एम्प्लेक्टस वास्तव में एक सांप नहीं है और इसे गलत वर्गीकृत किया गया था। बल्कि इसकी शारीरिक बनावट के सभी पहलू क्रिटेशियस काल से विलुप्त समुद्री छिपकलियों के एक समूह से मेल खाते हैं, जिन्हें डोलिचोसॉर कहा जाता है। शुरुआत में वैज्ञानिकों ने सोचा था कि टेट्रापोडोफिस एम्प्लेक्टस के लक्षण सांपों से मिलते-जुलते हैं लेकिन अब स्पष्ट हो चुका है कि वह एक गलत वर्गीकरण था।
करीब 20 सेमी लंबी थी छिपकली
जब कई साल पहले नमूनों की खोज की गई थी तो विशेषज्ञों ने पाया कि इसकी लंबाई सिर से पैर तक 20 सेमी थी। लेकिन इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसकी लंबाई और ज्यादा बढ़ सकती थी। इसका सिर एक वयस्क मानव नाखून के आकार का होता है और इसकी सबसे छोटी पूंछ की हड्डी की लंबाई एक मिलीमीटर के सिर्फ एक चौथाई होती है। इसके अगले पैर सिर्फ 1 सेमी लंबे होते हैं लेकिन पिछले पैर थोड़े लंबे होते हैं जिनका इस्तेमाल यह शिकार पकड़ने के लिए करता था।
मशहूर उद्घोषक एवं खेल पत्रकार नोवी कपाड़िया का निधन
नयी दिल्ली : भारतीय फुटबॉल का ‘एनसाइक्लोपीडिया’ कहे जाने वाले मशहूर कमेंटेटर और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर नोवी कपाड़िया का लंबी बीमारी के बाद गत 18 नवम्बर को निधन हो गया। वह 67 वर्ष के थे। कपाड़िया अविवाहित थे और उनकी बहन की मृत्यु के बाद उनके परिवार में कोई नहीं था। नौ फीफा विश्व कप कवर कर चुके कपाड़िया पिछले एक महीने से वेंटिलेटर पर थे, उन्हें ‘मोटर न्यूरोन ’ बीमारी थी, जिसमें रीढ की नसें और दिमाग धीरे-धीरे काम करना बंद कर देता है, इसकी वजह से वह पिछले दो साल से अपने घर में ही बंद थे।
लंबे समय से बिस्तर पर ही रहने को मजबूर कपाड़िया हाल ही में पेंशन संबंधी मसले के कारण चर्चा में आए थे जब पूर्व खेल मंत्री किरेन रिजीजू ने मामले में दखल देकर उन्हें चार लाख रूपये की आर्थिक सहायता दिलाई थी। कपाड़िया पिछले कई दशक से ओलंपिक, एशियाई खेल,राष्ट्रमंडल खेल की कमेंट्री करते आए हैं। अशोक क्लब के संस्थापक कपाड़िया ने स्थानीय लीग में फुटबॉल खेला। उन्होंने ‘बेयरफुट टू बूट्स: द मेनी लाइव्स आफ इंडियन फुटबॉल’ किताब भी लिखी। इसके अलावा फुटबॉल प्रेमियों के लिए गाइड भी 2014 में लिखी। वह एसजीटीबी खालसा कॉलेज में पूर्व प्रोफेसर भी थे।
लद्दाख में बनी सड़क दुनिया में सबसे ऊंची, गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज
लेह : लद्दाख में बीआरओ की ओर से बनाई गई सड़क को अब दुनिया की सबसे ऊंची सड़क मान लिया गया है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने इसको मान्यता दे दी है। रिकॉर्ड बुक में सड़क का नाम दर्ज कर लिया गया है। लद्दाख में बनायी गयी सड़क को दुनिया की सबसे ऊंची सड़क की मान्यता दे दी गयी है। उच्च पर्वतीय क्षेत्र लद्दाख में बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ) की ओर इस सड़क का निर्माण कराया गया है। इस सड़क को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल कर लिया गया है।
लद्दाख के उमलिंग्ला दर्रे पर समुंद्रतल से 19,024 फीट की ऊंचाई पर सड़क का निर्माण किया गया है। बीआरओ को इस सड़क के गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स की ओर से प्रमाण पत्र भी मिल गया है। गिनीज बुक के पांच सदस्यों की टीम ने करीब चार महीने तक इस सड़क का सर्वेक्षण किया। इसके बाद अपनी रिपोर्ट दी।
बोलिविया की सड़क को पीछे छोड़ा
उलमिंग्ला दर्रे की यह 15 किलोमीटर लंबी सड़क रिकॉर्ड बनाने में कामयाब रही। इससे पहले सबसे ऊंची सड़क का रिकॉर्ड बोलिविया की उतरुंकू ज्वालामुखी से जोड़ने वाली सड़क के नाम था। यह सड़क समुंद्र तल से 18,953 किलोमीटर की ऊंचाई पर अवस्थित है।
गडकरी ने ट्वीट कर दी जानकारी
केंद्रीय पथ परिवहन और हाइवे मंत्री नितिन गडकरी ने ट्वीट कर पूरे उमलिंग्ला दर्रे की सड़क के गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल होने की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बीआरओ आने वाले समय में इस प्रकार के अन्य रिकॉर्ड बनाएगा, ऐसी उम्मीद हम करते हैं। वहीं, केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी ट्वीट कर इस संबंध में कहा कि विश्व की सबसे ऊंची सड़क अब उमलिंग्ला सड़क हो गई है।
एवरेस्ट के आधार शिविर से भी है अधिक ऊंची
उमलिंग्ला सड़क की ऊंचाई एवरेस्ट चोटी के उत्तरी व दक्षिणी आधार शिविरों से भी ऊंची है। अधिकारियों का कहना है कि उमलिंग्ला में सड़क निर्माण मानव व मशीन दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा। यहां तापमान मानस 40 डिग्री तक गिर जाता है। ऑक्सीजन का स्तर भी सामान्य से 50 फीसदी कम हो जाता है। बीआरओ ने इसके बाद भी सड़क पर तारकोल बिछाकर पूर्वी लद्दाख में एलएसी के अग्रिम गांव डेमचोक को सड़क नेटवर्क से जोड़ दिया है। सामरिक दृष्टि से भी इस सड़क को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है।
त्वचा से त्वचा के स्पर्श का मामला : बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला सुप्रीम कोर्ट से खारिज
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग के अंदरूनी अंग को बिना कपड़े हटाए छूना यौन उत्पीड़न नहीं है
नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने त्वचा से त्वचा के स्पर्श को लेकर दिए गए बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया है। अदालत ने 30 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से फैसला रद्द करने की गुहार लगाई थी। राष्ट्रीय महिला आयोग की तरफ से भी खास याचिका दायर कर हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘कानून का उद्देश्य अपराधी को कानून के जाल से बचने की अनुमति देना नहीं हो सकता।’ कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो की धारा 7 के तहत ‘स्पर्श’ और ‘शारीरिक संपर्क’ अभिव्यक्ति के अर्थ को “त्वचा से त्वचा संपर्क” तक सीमित करना न केवल संकीर्ण और कागजी व्याख्या होगी, बल्कि प्रावधान की बेतुकी व्याख्या भी होगी।
क्या था बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला?
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग के अंदरूनी अंग को बिना कपड़े हटाए छूना यौन उत्पीड़न नहीं है। उसने अपने फैसले में कहा कि जब तक त्वचा से त्वचा का स्पर्श न हो, तब तक यौन दुराचार नहीं माना जा सकता है। हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने 19 जनवरी को पारित एक आदेश में कहा कि किसी हरकत को यौन हमला माने जाने के लिए ‘गंदी मंशा से त्वचा से त्वचा का संपर्क होना’ जरूरी है। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है। न्यायमूर्ति गनेडीवाला ने एक सेशन्स कोर्ट के फैसले में संशोधन किया जिसने 12 वर्षीय लड़की का यौन उत्पीड़न करने के लिए 39 वर्षीय व्यक्ति को तीन वर्ष कारावास की सजा सुनाई थी।’ इस फैसले के खिलाफ दाखिल अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने 27 जनवरी को हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।
फैसले के खिलाफ क्या तर्क दिए?
अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने मामले को सुप्रीम कोर्ट के सामने उठाया था। हाई कोर्ट कोर्ट के आदेश का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि मामले में गलत नजीर बनेगी और ऐसे में हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाया जाए। राष्ट्रीय महिला आयोग की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि जो व्याख्या की गई है, उसका महिला के मूल अधिकारों के खिलाफ असर होगा। याचिका में कहा गया था कि पोक्सो की धारा-7 के तहत कहा गया है कि अगर कोई शख्स किसी नाबालिग के शरीर के निजी अंगों और सीने को स्पर्श करता है तो वह यौन उत्पीड़न माना जाएगा। इस परिभाषा में कहीं भी त्वचा से त्वचा के स्पर्श की बात नहीं है। शारीरिक स्पर्श बिना कपड़ों के होना चाहिए ऐसा कानून में नहीं लिखा है। साथ ही इसके दूसरे भाग में कहा गया है कि यौन प्रकृति का शारीरिक स्पर्श अगर है तो वह यौन उत्पीड़न का अपराध है। लेकिन हाई कोर्ट ने धारा-7 के तहत यौन उत्पीड़न की गलत व्याख्या की है और वह खतरनाक नजीर बनेगा।
चट्टान में धंसी मिली 700 साल पुरानी रहस्यमय तलवार, किंग आर्थर से हो सकता है सम्बन्ध
लंदन : किंग आर्थर वाकई में थे या नहीं? साल की शुरुआत में मिले कुछ दस्तावेजों ने इतिहास में उनकी मौजूदगी को लेकर नए सिरे से दावे किए थे। लेकिन दस्तावेजों से ज्यादा पुख्ता सबूत अब एक बोस्नियाई नदी की गहराई में मिले हैं। नदी के भीतर चट्टान में धंसी एक तलवार की खोज की गई है जिसे ‘शाही एक्सेलिबुर’ माना जा रहा है जो किंग आर्थर की तलवार थी। पुरातत्वविदों को पत्थर में चौदहवीं शताब्दी की यह तलवार बोस्निया और हर्जेगोविना के पश्चिम में व्रबास नदी की गहराई में मिली है।
किंग आर्थर को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। उन्होंने जिनेवा से शादी की, ‘नाइट्स ऑफ द राउंड टेबल’ का निर्देशन किया, एक्सेलिबुर तलवार को अपने पास रखा और गद्दार मोर्ड्रेड के साथ अपनी अंतिम लड़ाई के बाद उन्हें एवलॉन में दफना कर दिया गया। लेकिन क्या राजा आर्थर वास्तव एक राजा थे या सिर्फ सेल्टिक पौराणिक कथाओं के नायक? यह बहस सदियों से जारी है और इतिहासकार आर्थर के अस्तित्व को लेकर कोई पुष्टि नहीं कर पाए हैं।
दस्तावेजों के पुख्ता हुए अस्तित्व के दावे
हालांकि इस साल की शुरुआत के बाद राजा आर्थर को लेकर कई चीजें बदल गईं। इतिहासकारों को ब्रिटेन के ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में एक पुस्तकालय में मर्लिन, किंग आर्थर और होली ग्रेल के बारे में हस्तलिखित और पांडुलिपियों के सात टुकड़े मिले हैं। ये टुकड़े मूल रूप से फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में 1,494 और 1,502 के बीच प्रकाशित हुए थे। इस आश्चर्यजनक खोज ने किंग आर्थर के अस्तित्व को लेकर दावों को और पुख्ता कर दिया है। कुछ लोगों का कहना है कि यह स्पष्ट प्रमाण है कि राजा आर्थर मौजूद थे।
10 मीटर की गहराई में मिली 700 साल पुरानी तलवार
व्रबास बोस्निया के केंद्र में 240 किलोमीटर लंबी एक नदी है, जो बंजा लुका शहर के पास है। खोजी गई प्राचीन तलवार को किंग आर्थर की माना जा रहा है। रिपब्लिका सर्पस्का म्यूजियम के पुरातत्वविद इवाना पांडज़िक के अनुसार 700 साल पुरानी तलवार नदी की सतह से लगभग 10 मीटर नीचे एक ठोस चट्टान में जड़ी हुई पाई गई। इसे बेहद संभालकर निकाला गया। पुरातत्वविदों ने ज़्वेलाज में स्थित एक मध्ययुगीन महल के खंडहरों के पास खुदाई करते हुए खोज की।
(साभार – नवभारत टाइम्स)
क्या होता है पकड़ुआ बियाह, जानिए
जो लोग बिहार या पूर्वांचल के हैं वे पकड़ुआ बियाह से भली-भांति अवगत हैं, लेकिन विवाह की यह प्रक्रिया देश के बाकी हिस्सों में रहने वाले लोगों की उत्सुकता बढ़ाने वाली है। इन्हीं लोगों की उत्सुकता को शांत करने के लिए आइए समझने की कोशिश करते हैं कि पकड़ुआ बियाह क्या होता है, क्यों होता है, कैसे होता है, कब से शुरू हुआ।
पकड़ुआ बियाह क्या होता है
पकड़ुआ बियाह में शादी योग्य लड़के का अपहरण करके उसकी जबरन शादी करवाई जाती है। इस विषय पर बॉलीवुड में अगस्त 2019 में ‘जबरिया जोड़ी’ नाम से एक फिल्म रिलीज हो चुकी है। इसके अलावा कलर्स चैनल पर ‘भाग्यविधाता’ नाम से एक टीवी सीरियल भी प्रसारित हो चुका है। इन दोनों में ही काफी हद तक पकड़ुआ बियाह की सच्चाई को दिखाने की कोशिश की गई है।
पकड़ुआ बियाह की शुरुआत कहां से हुई इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं है, लेकिन माना जाता है कि दूल्हे को अगवा कर उसकी शादी रचाने का चलन बेगूसराय जिले से शुरू हुआ है। बेगूसराय से सटे पटना जिले के हिस्से मोकामा, पंडारख, बाढ़, बख्तियारपुर जैसे इलाके में एक समय इसका खूब चलन था। पकड़ुआ बियाह में गांव या परिवार के दबंग लोग इलाके के किसी पढ़े-लिखे और धन-संपदा से संपन्न शादी योग्य युवक का अपहरण कर लेते हैं। इसके बाद जबरन उसकी शादी किसी लड़की से करा दी जाती है। विरोध करने पर युवक की पिटाई भी की जाती है। कई बार हथियार वगैरह दिखाकर युवक को डराया धमकाया भी जाता है।
इतना ही नहीं, शादी कराने वाले दबंग दूल्हे और उसके परिजनों को इतना डरा धमका देते हैं कि वह मजबूरी वश जबरिया विवाह को स्वीकार कर लेते हैं। आमतौर पर दबंग पहला बच्चा होने तक दूल्हा और उसके परिजनों पर नजर रखते हैं। 1970 से 1990 के दशक में किसी युवक की अगर अच्छी नौकरी लगती तो घर वाले सबसे पहले उसका घर से निकलना बंद कर देते। नौकरी लगने वाली बात काफी गुप्त रखा जाता। नौकरीपेशा लड़के को अकेले घर से निकलने नहीं दिया जाता, डर होता कि कहीं उसका पकड़ुआ बियाह ना करा दिया जाए। 1970 के दशक में बेगूसराय के मटिहानी एरिया में सबसे ज्यादा इस प्रकार की शादी का रिवाज था।
क्यों होता है पकड़ुआ बियाह?
पकड़ुआ बियाह की शुरुआत की मुख्य वजह दहेज प्रथा को माना जाता है। लेकिन इसे बारीकी से समझेंगे तो पता चलता है कि पकड़ुआ बियाह की शुरुआत के पीछे कई और वजहें हैं। दरअसल, 70-80 के दशक में बिहार में शिक्षा और जागरुकता के अभाव में जन्मदर काफी अधिक रही। इससे उन परिवारों ने भी ज्यादा बच्चे कर लिए जिनकी आर्थिक स्थिति उतनी बेहतर नहीं थी। इसके साथ ही बिहार के समाज में उच्च जाति के लोगों में स्टेटस दिखाने का चलन शुरू से ही रहा है। इस स्थिति अगर किसी परिवार में चार बेटियां हैं, लेकिन उसके पिता की इतनी हैसियत नहीं है वह मोटा दहेज देकर अच्छे परिवार में उनकी शादी करा पाए। ऐसे में वह अपनी बेटी की शादी पढ़े-लिखे और धन-संपदा से योग्य दूल्हे से कराने के लिए पकड़ुआ बियाह जैसे विकल्प को तलाशते हैं।
दबंगों ने पकड़ुआ बियाह को बनाया धंधा
पकड़ुआ बियाह का चलन शुरू होने पर इलाके के दबंगों ने इसे धंधा बना लिया। अगर किसी पिता को पकड़ुआ बियाह के जरिए अपनी बेटी की शादी करानी है तो वह इन दबंगों के पास जाते हैं। यहां लड़की के पिता और दबंग के बीच में सौदा होता है। सौदे के मुताबिक पकड़ुआ बियाह कराने और दुल्हन को उसके ससुराल में मान-सम्मान के साथ स्थापित करने के एवज में दबंग को फीस के तौर पर कुछ रकम दी जाती है। साथ ही दूल्हा डॉक्टर, इंजीनियर, बैंककर्मी, रेलवे आदि जिस भी विभाग में नौकरी कर रहा होगा उसके हिसाब से दबंग दुल्हन के पिता से रकम की माँग करते हैं। ऐसे में अगर कोई इंजीनियर दूल्हा 20 लाख रुपये नकद दहेज मांग रहा है तो दबंग दो लाख-दो लाख लेकर पकड़ुआ बियाह करा देते हैं। ऊपर से शादी के तामझाम का भी खर्च बचता है। इस तरह लड़की का पिता महज दो से ढाई लाख रुपये में अपने लिए इंजीनियर दूल्हा पा लेता है। शुरुआत में 5 से 10 हजार रुपये में लड़का उठाया जाता बाद में यह लाख-दो लाख रुपये तक पहुंच गया।
किसी करीबी या परिवार के लोग ही करवाते हैं पकड़ुआ बियाह
पकड़ुआ बियाह में दूल्हे को अगवा कराने में उसके किसी परिवार या रिश्तेदार का ही रोल होता है। करीबी या रिश्तेदार दूल्हे के शहर से गांव आने की पूरी विस्तृत जानकारी देता है। उसके बाद ही दबंग समय और परिस्थिति देखकर युवक का अपहरण करते हैं। शादी होने के बाद दुल्हन को ससुराल में स्थापित कराने में भी उसी रिश्तेदार या करीबी का रोल होता है। क्योंकि जबरन शादी के बाद दुल्हन के साथ उसके ससुराल में क्या व्यवहार हो रहा है इसकी जानकारी वही दबंग तक पहुंचाता है।?
पकड़ुआ बियाह पर पुलिस क्यों नहीं करती कार्रवाई?
1970-80 के दशक में बिहार में आमतौर पर माना जाता था कि अगर लड़का इंटरमीडिएट की परीक्षा दे रहा है तो उसे सरकारी नौकरी हो ही जाएगी। इसलिए इंटरमीडिएट की परीक्षा देने के दौरान युवकों का सबसे ज्यादा अपहरण किया जाता और उसका पकड़ुआ बियाह करा दिया जाता। जानकारों का दावा है कि करीब-करीब पकड़ुआ बियाह सफल ही होते हैं। क्योंकि पकड़ुआ बियाह में आमतौर पर कच्ची उम्र के लड़कों को अगवा किया जाता है। शादी के बाद जबरन ही सही, कुछ दिन दुल्हन के साथ रहने से उन दोनों के बीच मानसिक रूप से भी पति-पत्नी का रिश्ता स्थापित हो जाता है। परिवार वालों को सामाजिक दबाव में समझाबुझा दिया जाता है। एकाध ही पकड़ुआ बियाह के मामले होते हैं जो थाने तक पहुंचते हैं। क्योंकि पकड़ुआ बियाह में लड़के को कुछ घंटों के लिए ही अगवा किया जाता है उसके बाद उसे ससम्मान दुल्हन के साथ उसके घर भेज दिया जाता है। समाज की सहभागिता के चलते पुलिस भी ऐसे मामलों में स्वेच्छा से खास दिलचस्पी नहीं लेती है।

पकड़ुआ बियाह के चर्चित मामले
1. पेशे से इंजीनियर विनोद कुमार की जबरन शादी का वीडियो साल 2017 के दिसंबर महीने में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। समाज और दबंगों के लाख डराने धमकाने के बाद भी विनोद ने इस शादी को मानने से इनकार कर दिया। विनोद ने पटना के परिवार न्यायालय में शादी की वैधता को चुनौती दी, जिस पर मई 2019 में प्रिंसिपल जज कृष्ण बिहारी पाण्डेय ने फ़ैसला देते हुए शादी को अमान्य ठहरा दिया।
2. साल 2013 में शेखपुरा जिले के रवीन्द्र कुमार झा के 15 साल के बेटे की शादी जबरन 11 साल की बच्ची से करा दी गई थी। रवीन्द्र कुमार झा ने इस शादी को मानने से इनकार किया तो लड़की वालों ने उनके परिवार के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस कर दिया था। हालांकि कोर्ट ने रवीन्द्र झा के परिवार को अग्रिम जमानत दे दी, लेकिन तकनीकी दिक्कतों के चलते शादी को अमान्य करार देने से इनकार कर दिया।
3. दरभंगा जिले की रहने वाली कमला के पिता ने उसकी पकड़ुआ बियाह कराया था। सामाजिक दबाव में ससुराल वालों ने कमला को अपना तो लिया लेकिन वह आज भी डरी सहमी रहती है। ससुराल की महिलाएं आए दिन ताने मार देती हैं। कमला मजबूरी में ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर है।
4. सहरसा जिले के रहने वाले आलोक को मई 2012 में उसके दोस्त पार्टी का लालच देकर अपने साथ ले गए फिर बंदूक के बल पर मंडप पर बैठाया और पकड़ुआ बियाह करा दिया था।
5. इसी साल जून में बेगूसराय के तेघड़ा थाना क्षेत्र में शिवम कुमार को बिहट खेमकरणपुर पूर्वी टोला के रहने वाले यदुनंदन सिंह ने गांव के लोगों के साथ मिलकर अगवा कर लिया था। इसके बाद युदुनंदन अपनी बेटी प्रिया भारती से शिवम की जबरन शादी करवा रहे थे। मौके पर पहुंची पुलिस ने कार्रवाई करने के बजाय दोनों पक्षों को समझा बुझाकर दोनों की शादी करवा दी।
पकड़ुआ बियाह का सबसे ज्यादा नुकसान किसे?
पकड़ुआ बियाह जैसे सामाजिक बुराई से सबसे ज्यादा लड़का लड़की को नुकसान उठाना पड़ता है। लड़की के पिता तो कम पैसे खर्च को बेटी की शादी अच्छी नौकरी या धन-संपदा से संपन्न युवक से करा देते हैं। सामाजिक दबाव में लड़के के परिवार वाले लड़की को अपना भी लेते हैं, लेकिन जीवनचर्या में उन्हें कितने ताने मारे जाते हैं इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, कई बार तो लड़की को पूरे जीवन काल में पति का ठीक से प्यार नसीब नहीं हो पाता है। वहीं लड़का भी ऐसी शादी के बाद मानसिक रूप से परेशान हो जाता है। कई बार वह दिल से पत्नी को कभी स्वीकार ही नहीं पाता है। ऐसी स्थिति में प्यार की डोर से बनने वाला पति-पत्नी का रिश्ते नफरत और डर पर स्थापित हो जाता है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)




