Saturday, July 4, 2026
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मथुरा : वह भूमि जहाँ, श्रीकृष्ण ने लिया था जन्म

मथुरा उत्तर प्रदेश जिले में यमुना नदी के तट पर बसा एक सुंदर शहर है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में हुआ था। जानते हैं जन्मभूमि मंदिर की अनसुनी 10 बातें –

1. कथाओं के अनुसार श्रीकृष्‍ण प्रपौत्र व्रजनाभ ने ही सर्वप्रथम उनकी स्मृति में केशवदेव मंदिर की स्थापना की थी।

2. इसके बाद यह मंदिर 80-57 ईसा पूर्व बनाया गया था। इस संबंध में महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी ‘वसु’ नामक व्यक्ति ने यह मंदिर बनाया था।

3. काल के थपेड़ों ने मंदिर की स्थिति खराब कर दी। करीब 400 साल बाद गुप्त सम्राट विक्रमादित्य ने उसी स्थान पर भव्य मंदिर बनवाया। इसका वर्णन भारत यात्रा पर आए चीनी यात्रियों फाह्यान और ह्वेनसांग ने भी किया है।

4. ईस्वी सन् 1017-18 में महमूद गजनवी ने मथुरा के समस्त मंदिर तुड़वा दिए थे, लेकिन उसके लौटते ही मंदिर बन गए।

5. बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया।

6. यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था, जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला।

7. ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जू देव बुन्देला ने पुन: इस खंडहर पड़े स्थान पर एक भव्य और पहले की अपेक्षा विशाल मंदिर बनवाया। इसके संबंध में कहा जाता है कि यह इतना ऊंचा और विशाल था कि यह आगरा से दिखाई देता था।

8. इसके बाद मुस्लिम शासकों ने सन् 1669 ईस्वी में इस मंदिर को नष्ट कर इसकी भवन सामग्री से जन्मभूमि के आधे हिस्से पर एक भव्य ईदगाह बनवा दी गई, जो कि आज भी विद्यमान है।

9. इस ईदगाह के पीछे ही महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी की प्रेरणा से पुन: एक मंदिर स्थापित किया गया है।

10. कहते हैं कि अब जन्मभूमि के आधे हिस्से पर ईदगाह है और आधे पर मंदिर है।

(साभार – वेबदुनिया)

कान्हा को लगाएँ मिष्ठान व प्रसाद का भोग

मावा मिश्री की मिठाई

सामग्री : 2 लीटर दूध, 350 ग्राम शक्कर, बादाम, काजू, पिस्ता कतरन पाव कटोरी, आधा चम्मच इलायची पाउडर।

विधि : दूध को एक मोटे तले वाले बर्तन में गाढ़ा होने तक उबालें। तत्पश्चात उसमें शक्कर डालकर अच्छी तरह मिलाएं और पूरी तरह गाढ़ा होने दें। ऊपर से इलायची व मेवा की कतरन डाल दें। अब दूध को ठंडा करके ट्रे में भर दें। इस दूध में जितने अधिक रेशे पड़े वह उतना ही जायकेदार होता है। अब दूध से नि‍र्मित मिठाई मावा-मिश्री से भगवान को भोग लगाएं और घर आए मेहमानों को सर्व करें। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये बिना फ्रीज के भी दो दिन तक सुरक्षित रखी जा सकती है।

 

बेसन पंजीरी

सामग्री : 100 ग्राम बेसन (चना आटा), शक्कर बूरा 150 ग्राम, मेवा कतरन 100 ग्राम, पाव कटोरी खसखस, चारोली 50 ग्राम, गोंद 25 ग्राम, घी 200 ग्राम, पिसी इलायची पाव चम्मच।

विधि : घी को गरम कर गोंद तलकर रख लें। गरम घी में बेसन डालकर मध्यम आंच पर हल्का लाल होने तक सेंके। उसे थोड़ी देर ठंडा होने के लिए रख दें। अब उसमें शक्कर बूरा, खसखस, चारोली, तली गोंद व इलायची पावडर डालकर मिश्रण को एकसार कर लें। तैयार पंजीरी में मेवों की कतरन बुरक दें और सर्व करें।

औरतें जो तौलिया इस्तेमाल नहीं करतीं

डॉ. विजया सिंह

क्या तौलिये का भी होता है जनाना मरदाना इस्तेमाल?
तो क्यों नहीं करतीं इस्तेमाल तौलिया??
आयी होगी हँसी बहुतों को
कइयों ने देखा होगा कनखियों से चेहरा बिचकाए
मुझे भी लगा था समय विश्वास करने में
की थी मैंने गहरी खोजबीन और
इंतजार कि शायद ये उटपटांग-सा शीर्षक बदल ले खुद को।

घर के तमाम कपड़े धोती
परिवेश बनाती निभाती
औरतों के जीवन में नहीं है एक अदद तौलिया।
कर रखा हैं उन्होंने स्वयं को बहिष्कृत
तौलियों की जरूरी रंगीन दुनिया से
लेकिन क्यों
क्या हम-आप पहचानते हैं ऐसी औरतों को
जो मुँह अंधेरे उठती हैं, पीती हैं गरमा-गरम लेकिन
थोड़ी-सी चाय और लग जाती हैं
गुछाने अपना संसार
जो कई बार कुछ बर्तनों को मांजने की बजाय
बस खंगलाकर चला लेती हैं अपना काम जैसे तैसे
कपड़े धोती तो हैं लेकिन निचोड़ने की बजाय
टांग देती हैं उन्हें खूटियों पर यों ही घंटों
खा लेती हैं थाली की बजाय कटोरियों
में खाना खड़े-खड़े यहां-वहां
हड़बड़ी इतनी कि पता ही नही चलता कि
बनाने और खाने के बाद भी खाना क्या था और बना कैसा था
उन्हें जैसे नहीं आता तौलिये का इस्तेमाल वैसे ही नहीं आता थाली को बरतना
जबकि बरतती हैं वे दुनिया जब तब।
पहनती हैं ऊँची साड़ियाँ और आकार विहीन ब्लाउज़
इस आकारहीनता में बचा लेती हैं आज़ादी
और रफ़्तार की सुविधा
यानी उनका पूरा तंत्र दौड़ता है
और समय नही है उनके पास कि
गुछा लें खुद को एक पल ठहर कर।

ऐसे ही यकबयक दिख जाते हैं उन्हें गालों पर पड़ते
सुफ़ैद चक्कत्ते, जो जब चाहे चले आते हैं घूम फिर कर
बना देते हैं उन्हें बेहद बदसूरत।
ऐसे ही पिछली बार भी आ पड़े थे मरे
और मलीं गयीं थी वही दो दवाइयां जो दी
थी बूढ़े कमजोर डॉक्टर ने।
इन धब्बों को देख वो हर समय खुद को कोसती हैं
कि पहले क्यों नहीं दिख गये उन्हें ये दाग
हर बार देखने में देर कैसे हो जाती है
तो क्या वे कभी ठीक से अपना चेहरा भी नहीं देखती
इतनी बेकद्री खुद की…क्यों
इतने सारे क्यों और क्या उन्हें बेचैन कर देते हैं।
जैसे खाने के कौर में फंसे किरकिराते पत्थर को हम बाहर फेंकने की बजाय निगल लेते हैं उसी तरह वे भी निगल जातीं हैं सारे सही सवालों और उनके गलत जवाबों को
और फिर से वे उन्हीं दो पुरानी दवाइयों की खोज में गाफ़िल हो जाती हैं
लाख खोजबीन के बाद मिली दवाइयों में एक दो हज़ार बीस में ही मर चुकी है
फिर खरीदनी पड़ेगी और ये फिर न जाने कब आएगा।
जरूरी चीजों की लिस्ट में शामिल हो जाती है ये दवा जो जब आएगी तब आएगी और तब ही लगेगी।

वे हर बार पहनती हैं स्वेटर उल्टा , ब्लाउज उल्टा।
इतनी बार, बार-बार उल्टा कि आप अगर ध्यान दें तो खीझ उठें कि कभी तो उलट कर पहना गया उल्टा स्वेटर , उल्टा ब्लाउज भूल से सीधा भी हो जाता होगा..
फिर सीधा क्यों नहीं दिखता कभी तन पर
क्या जब स्वेटर या ब्लाउज की तह सीधी होती है तो
बस आदतन ये औरतें उन्हें उलटकर पहन लेती हैं
सीधा और चलन का निभा नहीं कभी इनसे
इसलिए अनजाने ही जानी बूझी उल्टी राह पकड़ ली बस।
ये वही हैं जो सीखा ही नहीं पायी बच्चों को खाने का सऊर।
उन्हें बखूबी मालूम है भोजन की सियासत, अपनी रामकहानी में सीता की त्रासदी और राम का जयकार ।
इसलिए बेटों को पहाड़ भर ऊचां देती हैं भात, भर-भर कटोरियाँ दाल, सब्जी, अंडे
यह जानते हुए कि आदमजात इतनी खा तो नहीं पाएंगे लेकिन उन्होंने पलटकर न माँगा तो भूखे रह जायेंगे,
बेटों को मांगने की आदत नहीं और
मर्दों का भूखा रहना अच्छी बात नहीं।
बची जूठन, जो बच ही जाती है हमेशा, तो बेटियाँ बहुएँ हैं ना..
जिन्हें देती हैं खाना बेटों की छोड़ी जूठी थाली में छितराकर बेहद भद्दे तरीके से
पंछोछर सब्जी सबसे पहले देती हैं और उसके बाद पानी मारी हुई मरी हुई दाल
बाकि सब्जियां बेटे के बाद खुद को परोसती नहीं बल्कि सबके सामने, सबको ललचाते हुए छिपाकर खाती हैं
इससे तृप्त होती है उनकी आत्मा।
उन्होंने देखा है अपनी पुरनिया गिहथिनों को ऐसे ही घर बनाते, सत्ता संजोते
उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता जब उसके दिए पनियाले दूध से चाय बनाते हुए बहु-बेटियों के लिए चाय ही नहीं बचती
उनके अंदाजे का लोहा सारे कुल-खानदान के लोग ऐसे ही थोड़ी ना मानते हैं
उन्हें मालूम है कि कुल की डोर लड़के खींचते हैं और लड़कियां तो गांठ हैं जितनी कम पड़े उतना ही अच्छा
न पड़े तो धन्नभाग
इसीलिए उनके कुल में बेटे लड़कियाँ बियाते नहीं बियाह करके लाते है
उन्हें पसंद नहीं ये नामाकूल बहुएँ-बेटियाँ-अलाय बलाय
वैसे ही जैसे नहीं भाते उन्हें चेहरे के वो सुफ़ैद चकत्ते जो आ ही जाते है जब तब
जैसे वो भूल जाती है बार-बार देखना अपना ही चेहरा
और जैसे उन्हें कभी नहीं आया थाली को बरतना।

वर्धा हिंदी विश्वविद्यालय, कोलकाता केंद्र में प्रवेश प्रक्रिया आरंभ 

कोलकाता : केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले शिक्षण संस्थान महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के साल्ट लेक, सेक्टर-3 स्थित क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में नए सत्र 2021 के लिए प्रवेश प्रक्रिया आरंभ हो गई है। केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि पिछले वर्ष आवेदनों की संख्या को देखते हुए इस बार एम.ए. हिंदी साहित्य में रिक्त सीटों की संख्या बढ़ाकर 30 (अनारक्षित-12, ईडब्ल्यूएस-03, ओबीसी-08, एससी-05, एसटी-02) कर दी गई है। इसके अतिरिक्त एम.ए. हिंदी (तुलनात्मक भारतीय साहित्य)-10, एम.ए. हिंदी अनुवाद-15 एवं अनुवाद में पीजी डिप्लोमा-15 के लिए भी आवेदन पत्र भरे जा रहे हैं। ऑनलाइन आवेदन पत्र भरने की अंतिम तिथि 31 अगस्त 2021 है। विवरणिका एवं अन्य जानकारी के लिए विश्वविद्यालय की वेबसाईट www.hindivishwa.org का अवलोकन किया जा सकता है। कोलकाता केंद्र के फेसबुक प्रोफाइल Mgahv Kolkata Centre से भी आवश्यक सूचनाएँ जारी की जाती हैं।

रवीन्द्रनाथ के साहित्य में अशोक के फूलों की छटा

– डॉ. वसुंधरा मिश्र

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर के गीतों में मनुष्य के सुख- दुःख, व्यथा- वेदना, आशा – निराशा, आनंद- विषाद, अनुभूति- उपलब्धि आदि नाना प्रकार के भाव मिलते हैं। रवीन्द्र संगीत में भाषा, भाव, स्वर और छंद का मनोरम सम्मिलन कला, रूप और रस की आनंद धारा है।
कवि गुरु के गीत मनुष्य को एक अतिन्द्रिय उपलब्धि की ओर ले जाते हैं। उनकी यह असाधारण प्रतिभा केवल बंगाल के संगीत को ही एक नया युग प्रदान नहीं करती है अपितु इन गीतों के शब्द, स्वर माधुर्य भाव गांभीर्य और भाषा का प्रयोग समग्र भारतीय भाषा भाषी लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

आइए अशोक या बंजुल फूल के विषय में जानते हैं – – –
कामदेव के पंचशरों में से एक अशोक का फूल है। वसंत के आगमन के साथ ही इसमें नए किसलयों का आगमन होता है। ताम्र वर्णीय होने के कारण इसे ताम्रवर्णी भी कहते हैं। वसंतागमन के साथ ही फूल खिलते हैं और ग्रीष्मकाल तक रहते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में संतरी आभा से युक्त लाल या पीले रंग के अशोक के फूल धीरे-धीरे सिंदूरी या गाढ़े रक्त वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं। अशोक के फूलों के रंग में एक उन्माद एवं उच्छलता भरे भाव होते हैं जिसका वर्णन अनेक गीतों में हुआ है।
फूलों में स्थित पुंककेशरों में पतले धागों की तरह कई पुंदंड होते हैं। उनके शीर्ष भाग में परागधानी या पराग रेणु का कक्ष होता है। इन केशरों का जड़ भाग नारंगी और शीर्ष भाग लाल रंग का होता है। फूलों के रंग में परिवर्तन का यही छंद चलता रहता है। परागधानी से लाल परागरेणु खिलकर धरती पर फैल जाते हैं। रवीन्द्र नाथ ने प्रकृति पर्याय के एक गीत 230 में इसका वर्णन आया है। मंजरीबद्ध यह फूल प्रचुर परिमाण में प्रस्फुटित होते हैं, साथ ही पंक्तियाँ भी असंख्य मात्रा में रहती हैं। कई बार सुंदर अशोक मंजूरियाँ खिलकर वलय शोभित भुजाओं के समान शाखाओं को घेर लेती हैं। जिसका उल्लेख कवि ने इस पंक्ति में किया है – –
‘अशोकेर शाखा घेरि वल्लरी बंधन’ अर्थात् अशोक की शाखाओं को घेरकर प्रस्फुटित मंजरियाँ लताओं सी उसे अपने बंधन में बाँधे हुए हैं। यह चित्रांगदा के षष्ठ दृश्य में आया है। सूर्य के प्रकाश में फूलों का रंग अधिक स्पष्ट हो जाता है और दिन के ढलने के साथ ही पत्तियों की छाया में फूलों की स्पष्टता विलीन होती चली जाती है। तभी तो कवि अशोक के फूल को लक्ष्य कर उसे ‘आलोकपियासी ‘(गीत प्रेम 215) अर्थात् आलोक पिपासु कहता है। इसकी शाखाओं की प्रकृति हल्की, पत्तियाँ बड़ी बड़ी शाखाएँ फूल पत्तियाँ हवा के स्पर्शमात्र से ही आंदोलित हो उठती हैं। क्षणभंगुर इसके फूल दिन ढलने के पश्चात परागरेणु के साथ पेड़ से झड़़कर धरती पर बिखर जाते हैं।
अशोक के फूलों से बने सुंदर आभूषण युवतियों के सिर , कानों एवं गले में सुशोभित होते हैं। गीत – प्रेम 224 में आया है। चंडालिका में फूल बेचने वाली मालिन अशोक के फूलों के अलंकार बेचती हुई दिखाई देती हैं।
प्रकृति जिस प्रकार वसंत में पत्र पुष्प गंध से परिपूर्ण अशोक वृक्ष पर बार बार गर्वित होती है, उसी प्रकार मानव जीवन के वसंत से भी अशोक वृक्ष का युगों से अटूट संबंध जुड़ा हुआ है।
अशोक वृक्ष प्रेमोद्दीपक और कामोद्दीपक भी है। इसकी मृदु गंध मनमोहक रूप एवं मादक स्पर्श के असंख्य वर्णन रवींद्र संगीत में मिलते हैं। रावण ने सीता को अशोक वाटिका में ही क्यों रखा?
राजनर्तकी श्यामा वज्रसेन के प्रेम को प्राप्त करने के लिए राजमहल का त्याग करती है। उस समय कोटाल (कोतवाल) चिल्लाते हुए कहता है – –
‘वन हते केन गेल अशोक मंजरी फाल्गुनेर अंगन शून्य करि’
राजनर्तकी श्यामा अशोक फूल के ही समान एक रूपायित कामना है जो राजमहल रूपी उद्यान से चली गई है। उसका चले जाना फागुन में अशोक मंजरी का वन से लुप्त होने का अर्थ है कि वातावरण में शून्यता छा गई है।
रवीन्द्र संगीत में अशोक का बहुत प्रयोग हुआ है – – -रांगा हासि राशि राशि अशोके पलाशे, विगत वसंतेर अशोक रक्तरागे, आन माधवी मालती अशोकमंजरी आदि बहुत से गीतों में रवीन्द्रनाथ ने अशोक का प्रयोग किया है। (रवीन्द्र संगीत में प्रयुक्त उद्भिद और फूल, पृष्ठ-2-5)

उड़िया लेखिका यशोधरा मिश्रा को साहित्य अकादमी पुरस्कार – 2020

भुवनेश्वर: लेखिका,कवियित्री और शिक्षाविद यशोधरा मिश्रा को उनकी पुस्तक ‘समुद्रकुल घर’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार – 2020 से सम्मानित किया जाएगा। अकादमी ने मंगलवार को उड़िया और मलयालम भाषाओं के लिए पुरस्कारों की अधिसूचना जारी की। मिश्रा की पुस्तक का चयन तीन सदस्यीय उड़िया भाषा जूरी द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर किया गया था, जिसमें लेखक डॉ. बीनापानी मोहंती, डॉ. प्रतिभा सत्पथी और रमाकांत रथ शामिल थे। अकादमी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि मिश्रा को बाद में एक पट्टिका और एक लाख रुपये के नकद पुरस्कार के रूप में पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। मिश्रा, जिनके पास लघु कथाओं, उपन्यासों, कविताओं और अनुवादित कार्यों के लगभग 15 संग्रह हैं, ओडिशा साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हैं। वह साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘भारतीय साहित्य, भारत की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका’ की संपादक बनने वाली पहली महिला हैं। अमेरिकी साहित्य में पीएचडी, वह मध्य प्रदेश सरकार के तहत अंग्रेजी की प्रोफेसर रही हैं; मेसन डी साइंस, पेरिस में विजिटिंग फेलो, यूजीसी के सीनियर रिसर्च फेलो और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज, शिमला में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो के रूप में कार्यरत रही हैं।

शुभजिता पर कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव का आरम्भ बहुरंगी रेखाचित्र संसार के साथ

पलक गुप्ता

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी में जब कि कुछ ही दिन रह गये हैं…शुभजिता पर हम उत्सव आरम्भ कर रहे हैं 13 साल की पलक गुप्ता की चित्रकला प्रतिभा के साथ। पलक नैहाटी में रहती हैं। जन्माष्टमी उत्सव की जानकारी तो आपको हम शीघ्र ही देंगे मगर इस समय तो आप देखिए और सराहिए कि इतनी कम उम्र में इस बच्ची ने कितनी खूबसूरती से श्रीकृष्ण और उनके संसार को अपनी कला में सहेजा है।

 

बाल गोपाल
राधा
एक सुन्दर रेखाचित्र
सुन्दर परिकल्पना
राधा
राधा -कृष्ण
श्रीकृष्ण

17 साल की शैली सिंह ने अंडर-20 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप जीता रजत

नैरोबी : लंबी कूद की प्रतिभाशाली खिलाड़ी शैली सिंह गत रविवार को यहां अंडर-20 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक के साथ इतिहास रचने से एक सेंटीमीटर से चूक गयीं लेकिन उन्होंने रजत पदक हासिल किया। सत्रह साल की इस भारतीय खिलाड़ी ने 6.59 मीटर की कूद के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया।
स्वीडन की मौजूदा यूरोपीय जूनियर चैम्पियन माजा अस्काग ने 6.60 मीटर के साथ स्वर्ण पदक अपने नाम किया। दिग्गज लंबी कूद खिलाड़ी अंजू बॉबी जॉर्ज की शिष्या शैली प्रतियोगिता के आखिरी दिन तीसरे दौर के बाद तालिका में शीर्ष पर थी लेकिन स्वीडन की 18 साल की खिलाड़ी ने चौथे दौर में उनसे एक सेंटीमीटर का बेहतर प्रदर्शन किया, जो निर्णायक साबित हुआ। यूक्रेन की मारिया होरिएलोवा ने 6.50 मीटर की छलांग के साथ कांस्य पदक जीता। शैली स्पर्धा के बाद अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकीं और उन्होंने नम आंखों के साथ कहा, ‘ मैं 6.59 मीटर से भी बेहतर कूद सकती थी और स्वर्ण जीत सकती थी। मेरी मां ने मुझे स्वर्ण पदक के बाद स्टेडियम में गाए जाने वाले राष्ट्रगान के बारे में बताया था (लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी)।’
उन्होंने कहा, ‘मैं 17 साल की हूं, मैं अगली अंडर 20 विश्व चैम्पियनशिप (काली, कोलंबिया) में स्वर्ण पदक जीतना चाहती हूँ। अगले साल एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होना है और मैं उन प्रतियोगिताओं में अच्छा करना चाहती हूं।’
उनके कोच बॉबी जॉर्ज कहा कि छलांग लगाने के बाद नीचे आते समय उससे मामूली तकनीकी चूक हो गयीं , नहीं तो वह स्वर्ण जीत सकती थीं। उन्होंने कहा, ‘वह स्पर्धा के बाद रो रही थी, उसे पता था कि वह स्वर्ण जीत सकती थी। छलांग से नीचे आते समय कुछ तकनीकी समस्या हो गई नहीं तो वह 6.65 से 6.70 मीटर की दूरी तय कर सकती थी।’ उन्होंने कहा, ‘यह किसी प्रतियोगिता में पहली बार है जब उसने स्वर्ण नहीं जीता है। वह रजत पदक को पसंद नहीं करती है और नीरज चोपड़ा के बाद एथलेटिक्स में वह देश की अगली बड़ी खिलाड़ी बन सकती है।’पदकों की संख्या के मामले में इन खेलों में यह भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है जहां उसने दो रजत और एक कांस्य पदक जीता। इससे पहले हालांकि ओलंपिक चैंपियन भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा (2016) और फर्राटा धाविका हिमा दास (2018) ने 400 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीता था। मौजूदा सत्र में इससे पहले मिश्रित चार गुणा 400 मीटर रिले टीम ने बुधवार को कांस्य पदक जीता जबकि पैदल चाल खिलाड़ी अमित खत्री ने 10,000 मीटर स्पर्धा में रजत पदक जीता था। शैली ने रविवार को अपने पहले प्रयास में 6.34 मीटर की छलांग लगाई। उन्होंने दूसरे प्रयास में भी इसी प्रदर्शन को दोहराया लेकिन उनका तीसरा प्रयास सर्वश्रेष्ठ रहा। उनके अगले दोनों प्रयास अवैध रहे। शैली को भारतीय एथलेटिक्स में उभरते सितारों में से एक माना जाता है। उन्होंने शुक्रवार को क्वॉलिफिकेशन दौर में 6.40 मीटर की सर्वश्रेष्ठ छलांग लगाकर शीर्ष स्थान हासिल किया था।झांसी में जन्मीं इस एथलीट की मां दर्जी का काम करती है। शैली फिलहाल बेंगलुरु में अंजू बॉबी जॉर्ज की अकादमी में प्रशिक्षण ले रही है। जहां अंजू के पति बॉबी जॉर्ज उनके कोच है। उन्होंने जून में राष्ट्रीय (सीनियर) अंतर-राज्य चैंपियनशिप में महिलाओं की लंबी कूद स्पर्धा में 6.48 मीटर के प्रयास से जीत हासिल की थी, जो उनका पिछला व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। वह वर्तमान अंडर-18 विश्व रैंकिंग में दूसरे स्थान पर है, जबकि अंडर 20 का राष्ट्रीय रिकॉर्ड उनके नाम है।

नहीं रहे यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह

लखनऊ : लंबे समय से बीमार चल रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल रहे कल्याण सिंह का गत शनिवार 21 अगस्त को निधन हो गया। बीते दो दिनों से कल्याण सिंह की तबीयत काफी नाजुक बनी हुई थी। अलग-अलग विभागों के विभागाध्यक्ष लगातार उनकी निगरानी रख रहे थे। अस्पताल में पूर्व मुख्यमंत्री के परिवारजन भी मौजूद थे। कल्याण सिंह के इलाज में दिल, गुर्दा, डायबिटीज, न्यूरो, यूरो, गैस्ट्रो और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग समेत 12 विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम लगातार निगरानी में लगी हुई थी। कल्याण सिंह को 21 जून को लखनऊ के लोहिया संस्थान में भर्ती किया गया था। 4 जुलाई को जब सबसे पहले उनकी तबीयत ज्यादा खराब हुई थी तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनसे मिलने पहुंचे थे। कल्याण सिंह का जन्म 6 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम तेजपाल लोधी और माता का नाम सीता देवी था। कल्याण सिंह 2 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और कई बार अतरौली के विधानसभा सदश्य के रूप में चुने गए। साथ ही साथ ये उत्तर प्रदेश में लोक सभा सांसद और राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। कल्याण सिंह वर्ष 1991 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और दूसरी बार 1997 में मुख्यमंत्री बने थे। ये प्रदेश के प्रमुख राजनैतिक चेहरों में एक इसलिए माने जाते हैं, क्‍योंक‍ि इनके पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ही बाबरी मस्जिद की घटना घटी थी।

सिर्फ खेत में ही नहीं आपके मकान की छत पर भी हो सकती है लाभकारी खेती

नयी दिल्ली : खेती-बारी की बात होती है तो हम गांव देहात के बारे में सोचने लगते हैं। खुले-खुले खेत, वन प्रांतर और ढोर-डांगर। लेकिन, आप शहर में रहते हैं। आपके पास खेत खलिहान तो दूर, बागवानी के लिए भी फालतू जमीन नहीं है। ऐसे में कैसे खेती होगी? पर, आपको जान कर हैरानी होगी कि आप अपने मकान की छत पर भी खेती कर सकते हैं। सिर्फ खेती ही नहीं, बल्कि लाभकारी खेती। अपने छत पर आप सब्जी उगा सकते हैं। फल उगा सकते हैं। फूल उगा सकते हैं। और, उसे बेच भी सकते हैं। सहकारी क्षेत्र के संगठन इफको किसान की इकाई माई अर्बन ग्रीन्स के हेड ऑफ डिपार्टमेंट कर्नल कबीर दुबे हमें बता रहे हैं विस्तार से..

छत पर खेती करने की तकनीक क्या है?
आप सोच रहे होंगे कि छत पर खेती करने के लिए ढेर सारी मिट्टी की जरूरत होगी। वहां क्यारी बनाना होगा। फिर उसमें पौधों की रोपाई होगी। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। खेती की एक नई तकनीक आई है, हाइड्रोपॉनिक्स। इस तकनीक से खेती करने के लिए मिट्टी की जरूरत नहीं होती है। इसमें फल, सब्जी और फूल को पानी के माध्यम से उगाया जाता है। मिट्टी में उगाए गए फसलों के मुकाबले में इनमें अधिक पोषक तत्व होते हैं। साथ ही पैदावार तेजी से बढ़ती भी है और चार से पांच गुना अधिक उपज होती है।
छत पर क्या-क्या उगा सकते हैं?
कर्नल कबीर दुबे का कहना है कि छत पर आप फल, फूल और सब्जी आसानी से उगा सकते हैं। अगर आप नई तकनीक के सहारे खेती कर रहे हैं तो आपको पैदावार अच्छी होगी, जिसे आप बाजार में बेच सकते हैं। इसके साथ ही आप तरह-तरह के पौधों को उगाकर बेच सकते हैं। उनका कहना है कि छत पर खेती कर आप अपने लिए न सिर्फ पोषक और शुद्ध खाद्य पदार्थ ही उगा सकते है, बल्कि आप मोटी कमाई भी कर सकते हैं। छत पर खेती आमतौर पर जैविक तरीके से होती है। इस कारण इनके दाम भी बाजार में अच्छे मिलते हैं।
क्यों तेजी से बढ़ रहा है छत पर खेती का प्रचलन?
गांवों में तेजी से खेती की जमीन कम हो रही है। परिवार बढ़ रहा है और बंटवारे की वजह से जोत छोटी हो रही है। शहर में तो खेती के लिए जमीन तो नहीं के बराबर बची है। लेकिन, फल और सब्जियों की मांग में कोई कमी नहीं हुई है बल्कि यह बढ़ती ही जा रही है। इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए आम लोग से लेकर खेती के कारोबार से जुड़े लोग भी छत पर खेती करना शुरू कर रहे हैं। हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक से फसल जल्द तैयार हो जाती है, जिससे आप कमाई तो ज्यादा करते ही हैं, साथ ही आप बाजार की मांग को भी पूरा करने में सक्षम होते हैं।
हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक में क्या मिट्टी की जरूरत बिल्कुल नहीं होगी?
इस तकनीक में मिट्टी की बिल्कुल आवश्यकता नहीं होती। एक छोटी सी टोकड़ी में नारियल के छिलके का चूरा (कोको पीट) मुख्य तौर पर डाला जाता है। इसी टोकड़ी में पानी नियमित रूप से डाला जाता है। साथ ही इसमें कुछ पोषक तत्व भी डाले जाते हैं, ताकि पौधों को पोषण मिलता रहे। मिट्टी का प्रदूषण फसल में पहुंच जाता है। लेकिन इस विधि में तो मिट्टी का उपयोग ही नहीं होता, इसलिए प्रोडक्ट तक प्रदूषण पहुंचने की बात ही नहीं है। इस तरीके से छत पर 4 फीट गुना 4 फीट की चार क्यारियों में फसल उगाने पर ही एक परिवार अपने महीने भर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है।
इस तरीके से खेती करने के लिए कहां से मिलेगी मदद?
हाइड्रोपॉनिक्स तकनीक से खेती करने के लिए आज बाजार में सब कुछ उपलब्ध है। इस काम में कई कंपनियां आगे आई हैं, जिनमें इफको किसान भी एक है। इस क्षेत्र में काम कर रही कंपनियों से आपको शौकिया गार्डन से लेकर कमर्शियल फार्म तक स्थापित करने में मदद मिल सकती है।