Friday, October 30, 2026
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भूली -बिसरी यादें – 3

डॉ. एस. आनन्द

समय के पन्ने उड़ते गये और सन्मार्ग की धमक बढ़ती गई। उसके कुछ कालम तो इतने मशहूर हो गये कि लोग अखबार खोलकर पहले उसे ही पढ़ते यथा -लस्टम पस्टम, चकल्लस, भोजपुरी लस्टम पस्टम, लाल बुझक्कड़, और सारे साप्ताहिक पृष्ठ। रविवारीय परिशिष्ट का तो कोई जवाब ही नहीं था। रुक्म जी ने बैताल कथा और तेनालीराम की कथा, बाल मंडल में खुद लिखते थे जो बच्चों के साथ हर उम्र के लोग बड़े चाव से पढ़ते थे। सन्मार्ग की बेबाक संपादकीय जिसे उस समय आदरणीय रमाकांत उपाध्याय लिखते थे, काफी चर्चित थी।
उस समय सन्मार्ग में कर्मचारियों के बीच जो एका भाव था वह काबिले तारीफ था। सभी एक दूसरे के सुख-दुख के सहभागी थे। रात में ड्यूटी करने वाले संपादकीय विभाग के सारे सदस्य मिल बांटकर खाना खाते थे। इस मामले में भाई हरिराम पांडेय बेजोड़ थे। एक वाकया याद आ रहा है। पांडेय जी चार डब्बों वाला अपना टिफिन बॉक्स लाते थे और आधा किलो दूध यादव टी स्टॉल से मंगाते थे। एक दिन जब उन्होंने अपना सारा टिफिन खाली कर दिया और दूध भी लिए तो रमाकांत उपाध्याय जी ने कहा-आज मैं तुम्हारे लिए 2 किलो दूध मंगवाता हूं, उसे पीकर और बिना लैट्रिन गये, पचाकर दिखाओ तो जानूं कि तुम खाने और पचाने में अव्वल हो। पांडेय जी ने उनकी चुनौती स्वीकार कर ली और 2 किलो दूध गटक कर सो गए। रमाकांत जी रात भर निगरानी करते रहे मगर पांडेय जी उठे तो सुबह 6 बजे ही। उसके बाद किसी ने भी उनसे खाने पीने की कोई शर्त नहीं लगाई।
रमाकांत जी और पांडेय जी में अक्सर हंसी मजाक होता था। कभी कभी तो यह उग्र भी हो जाता और बोलचाल भी कुछ लमहों के लिए बंद हो जाती मगर यह उपाध्याय जी को बहुत देर तक नहीं रोक पाती। वह कुछ ऐसा व्यंग्य तीर चलाते कि पांडेय जी के साथ हम सभी हंस पड़ते और फिर माहौल खुशनुमा हो जाता।
पांडेय जी सिर्फ खाते ही नहीं थे, उनके हाथों में काफी ताकत भी थी। नवरात्र की अष्टमी तिथि को मैंने कुछ फलों के साथ एक समूचा नारियल प्रसाद के रूप में घर से आफिस ले गया था। फल तो यारों में बंट गया मगर नारियल टूटे कैसे? सभी उधेड़बुन में थे। कोई कहता छत पर रखकर हथौड़े से तोड़ दिया जाये तो कोई कहता जमीन पर पटक कर फोड़ दिया जाये। इसी दौरान पांडेय जी आए और सबकी बातें सुनकर उन्होंने एकबारगी नारियल को अपने हाथ में लिया, टेबल पर रखे और दाहिने हाथ से उस पर ऐसा मारा कि वह तीन टुकड़े हो गया। हम सभी हतप्रभ रह यह देखते रह गए। ऐसा विंदास जीवन जीने वाले थे हरिराम पाण्डेय जी। आज हमारे बीच वे नहीं हैं। काल ने उन्हें छीन लिया हमसे मगर उनकी बहुत सारी स्मृतियां आज भी हमारे मन-मस्तिष्क में यों ही दबी पड़ी हैं। रुक्म जी के बाद पांडेय जी ही रविवार के परिशिष्ट का संपादन करते थे। मैं तो बस इतना ही कहूंगा-
आप तो चले गए दुनिया को छोड़कर
पर आपकी यादें तसव्वुर में बसी हैं।

अपने समय की विदुषी कवयित्री थीं रत्नकुँवरि बीबी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों आज मैं आपको रत्नकुँवरि बीबी की कथा सुनाऊंगी। इनका जन्म मुर्शिदाबाद के प्रसिद्ध जगत सेठ घराने में हुआ था। वह अत्यंत विदुषी स्त्री थीं और कविताएँ लिखती थीं। राजा शिवप्रसाद “सितारे हिंद” उनके पोते थे। उनका परिचय स्वयं उनके पोते की जुबानी जानिए जो अपनी दादी को सम्मानपूर्वक याद करते हुए लिखते हैं- “वह संस्कृत की बड़ी पंडिता थीं। छहों शास्त्रों की वेत्ता। फारसी भाषा भी इतनी जानती थीं कि मौलाना रूमी की मसनवी और दीवान शम्स तबरेज जब कभी भी हमारे पिता पढ़कर सुनाते तो उसका संपूर्ण आशय समझ लेती थीं। गाने- बजाने में अत्यंत निपुण थीं। चिकित्सा यूनानी और हिन्दुस्तानी दोनों प्रकार की जानती थीं। योगाभ्यास में परिपक्व थीं। यम -नियम और वृत्ति ऋषियों और मुनियों की सी थी। सत्तर वर्ष की अवस्था में भी बाल काले थे तथा आँखो की ज्योति बालकों सी थी। वह हमारी दादी थीं। इससे हमको अब उनकी अधिक‌ प्रशंसा लिखने में लाज आती है। परंतु जो साधु संत और पंडित लोग उस समय के उनको जानने वाले काशी में वर्तमान हैं वे सब उनके गुणों को अद्यावधि स्मरण करते हैं।” इस उद्धरण से यह स्पष्ट होता है कि वह अत्यंत ज्ञानी और गुणवती महिला थीं। स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन करते हुए स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीती थीं। बेटों और पोतों के सानिध्य में उन्होंने खुशहाल और लंबा जीवन जीया एवं वृद्धावस्था में साधु-संतों की संगति में, भगवद्भक्ति में जीवन बिताया।
काव्य रचना में इनकी रूचि थी। इनके जीवनकाल में तो इनका कोई ग्रंथ प्रकाशित नहीं हुआ लेकिन इनके पोते राजा शिवप्रसाद “सितारे हिंद” ने संवत 1945 में इनका एक ग्रंथ “प्रेम- रत्न” प्रकाशित करवाया। कुल 76 पृष्ठों की इस पुस्तक में दोहा और चौपाई छंदों में श्रीकृष्ण की लीलाओं का सरस वर्णन किया गया है। इसमे कृष्ण के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का जीवंत वर्णन हुआ है। इन छंदों को पढ़ते हुए इनकी विद्वता और काव्य कौशल का आभास सहजता से हो जाता है। दोहा छंद में ब्रज की प्राकृतिक सुषमा के वर्णन के साथ ही कृष्ण के मथुरा गमन के पश्चात ब्रज वासियों की स्थिति, उनकी विरह-व्यथा का मार्मिक वर्णन प्रस्तुत उद्धरण में हुआ है-
“वरन वरन वन तंबुवन दीनो तान वितान।
अति फूले फूले फिरत, डेरा परत न जान।।
जबते मथुरा तन चितै, तजि ब्रज-जन यदुनाथ।
विरह- विथा बृज में बढ़ी, तहँ सब भये अनाथ।
प्रिय तीरथ कुरुखेत सब, आए ग्रहण नहान।
यदुपति राधा गोप गण, नन्दादिक वृषभान।।
गोप एक नटभेष सजि आयो बीच बजार,
तहँ खरभर लशकर परयो, सो अति रह्यो निहार।।
इक यादव हँसिके कह्यो, कहाँ तुम्हारो बास।
अति सुन्दर तन छबि बनी, नाम कहहूँ परकास।।
तब उनहू कहि तुम कहहू, काके सँग कित ठाऊँ।
द्वारावति -पति कटक यह, कह्यो यदुव निज नाउँ।।
सुनत द्वारका नाम तिहि, लियो बिरह उर छाय।
हा नँद- नंदन कंत कहि, गयो ग्वाल मुयझाय।।
अब एक उदाहरण चौपाई छंद में रचित कविता का भी देखिए जिसमें कृष्ण के प्रताप और महात्म्य का वर्णन है। भक्तवत्सल कृष्ण अपने भक्तों की सभी कामनाएँ पूरी करते हैं और विपत्ति के समय उनकी रक्षा के लिए तत्पर रहते हैं। ऐसे भगवान कृष्ण की महिमा का बखान रत्नकुँवरि बीबी ने पूरे भक्ति भाव से किया है-
“भक्ताधीन विरद प्रभु केरे, गावत वाणी वेद घनेरे।
संतत रहत भक्त के पासा। पुरवत हैं प्रभु तिनकी आसा।।
जे सप्रेम प्रभु सों मन लावै। तिनको कबहूँ नहिं बिसरावै।।
ग्राह- ग्रसित गजराज छुड़ाए। गरुड़ छाँड़ि तहँ आतुर धाए।।
पुनि प्रभु पाण्डव जरत बचायो। द्रुपद- सुता को बसन बढायो।
अजामील यम ते रखि लीन्हों। भजन प्रताप ध्रुवहिं वर दीन्हों।।
जन प्रहलाद अभय करि थाप्यो। ताही बार न बारहु व्यापो।।
जे जन मन ते ध्यावहिं जैसे। ताकहुँ प्रभु फल देते तैसे।।
बीबी रत्नकुँवरि के पदों में कृष्ण भक्ति में डूबे उद्गार अत्यंत सरस और सहज भाव से अभिव्यक्त हुए हैं। कुछ आलोचकों का यह मानना है कि अवधी भाषा में सिर्फ रामकाव्य की रचना ही हुई है लेकिन अवधी भाषा में विरचित “प्रेम-रत्न” के पद इस बात के प्रमाण हैं कि अवधी भाषा में सरस और सशक्त कृष्ण काव्य भी रचा गया। कृष्ण की भक्ति और उनके प्रेम में आपाद मस्तक डूबे ब्रजवासियों के प्रेम विह्वल ह्दय के भावों -अनुभावों का वर्णन बीबी रत्नकुँवरि ने सफलतापूर्वक किया है। दोहा छंद में वर्णित एक प्रसंग देखिए जिसमें कृष्ण के आने की सूचना पाकर सब लोग आनंद में भरकर अपनी सुधबुध खो बैठे हैं-
“भये मगन सब प्रेम रस, भूलि गये निज देह।
लघु दीरघ बै नारि नर, सुमिरत श्याम-सनेह।।
कहत परस्पर युवति मिलि, लै लै कर अँकवार।
प्रीतम आये का सखि, तन साजहुँ शृंगार।।
जब गोपियाँ इतनी मगन हैं तो राधा की दशा तो सबसे अलग होगी ही, राधा की मार्मिक अवस्था का वर्णन कवयित्री ने अत्यंत निपुणता से किया है-
“तहँ राधा की कछु दशा, वर्णत आवै नाहि।
मलिन वेश भूषण रहित, विवस रहित मन माहिं।।
कबहुँ मुरझावत बिरह-वश, पीत वरण ह्व जाय।
कबहुँ व्यापत अरुणता, प्रेम मगन मुंद छाय।।
कान्ह-कान्ह कबहूँ कहत, कबहूँ रटत निज नाम।
मौन साधि रहि जात जब, श्रमित होत निज बाम।।
चख चितवत जित तित हरि, श्रवण मुरलि धुनि-लीन।
श्याम बास बसि नाक मणि, रूप -पयोनिधि मीन।।
तन मध धन गृह जनन की, नेकहु सुधि तिहि नाहिं।
चितवत काहू नहिं दृगन, लगन लगी उर माहिं।।”
रत्नकुँवरि बीबी ने सफल एवं आनंदमय पारिवारिक जीवन जीते हुए कृष्ण भक्ति से परिपूरित सुंदर और भावप्रवण काव्य की रचना की। ये पद पाठकों के ह्दय और मस्तिष्क दोनों पर सहजता से अपनी छाप छोड़ते हैं। चूंकि उस समय की स्त्रियों में अपनी कविता के प्रति सजगता का अभाव था , संभवतः इसीलिए लंबी आयु प्राप्त करने और सुखी जीवन जीनेवाली बीबी रत्नकुँवरि की रचनाएँ उनके जीवन काल में प्रकाशित नहीं हो पाईं होंगी। साहित्यिक अभिरुचि संपन्न पारिवारिक परिवेश ने जहाँ उन्हें काव्य रचना के लिए प्रेरित किया वहीं साहित्य प्रेमी पौत्र ने उनकी रचनाओं को दुनिया के सामने लाकर अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व का निर्वाह किया अन्यथा कालांतर में उनकी रचनात्मक प्रतिभा से साहित्यिक जगत अनिभिज्ञ ही रहता। अब भी गहन शोधकर्ताओं को छोड़ दें तो बहुत से लोग इनके नाम और साहित्यिक अवदान से अपरिचित ही हैं। रत्नकुँवरि बीबी जैसी न जाने कितनी स्त्री रचनाकारों की रचनाएँ काल के गाल में समा गई होंगी क्योंकि उन्हें प्रकाशन का सौभाग्य नहीं मिला।

 

 

 

 

गुरु की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली कालीबाई

ऐतिहासिक पटल पर गांव रास्तापाल, जिला डूंगरपुर, राजस्थान की पहचान अमर शहीद वीर बाला कालीबाई के नाम से की जाती है। आदिवासी समुदाय भील के सोमा भाई के घर में वीर काली बाई का जन्म जून 1935 में माता नवली की कोख से हुआ। मात्र 12 वर्ष की उम्र में इस क्रांतिकारी बाला ने 19 जून 1947 को जागीरदारों व अंग्रेजों के शोषण के विरूद्ध बहादुरी की एक जोरदार मिसाल कायम कर आदिवासी समाज में शिक्षा की अलख जगाई।

बलिदान की इस महान घटना के समय डूंगरपुर रियासत के शासक महारावल लक्ष्मण सिंह थे और वे अंग्रेजों की हुकूमत की सहायता से अपना राज्य चलाते थे। उस समय के महान समाजसेवी श्री भोगीलाल पंड्या के तत्वाधान में एक जन आंदोलन चलाया गया जो समाज में फैली कुरीतियों को मिटाने तथा शिक्षा को बढ़ावा देने का कार्य करने लगा। डूंगरपुर रियासत के गांव गांव में क्षेत्रीय स्तर पर स्कूल खोले गये उनमें भील, मीणा, डामोर और किसान वर्ग के बालकों को शिक्षा दी जाती थी तथा शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाता था। पाठशाला में आसपास के बालक अध्ययन करने के लिए आने लगे। जब महारावल लक्ष्मण सिंह को इन गतिविधियों का पता चला तो उन्होंने एवं उनके सलाहकारों ने सोचा कि यदि भील और मीणों के बच्चे पढ़ गए, इनको ज्ञान हो गया, शिक्षित हो गए तो मेरे लिए भयंकर परेशानी पैदा हो जाएगी क्योंकि पढ़ने के बाद ये सब अपना अधिकार मांगने लग जायेंगे और इनमें जागृति पैदा हो जाएगी। इस सोच के चलते लक्ष्मण सिंह ने पाठशाला संचालन को रोकने के लिए सन् 1942 में कानून बनाकर पाठशालाओं को बंद करने की योजना बनाई। उन्होंने मजिस्ट्रेट नियुक्त किया और मजिस्ट्रेट ने जगह जगह जहां जहां भील मीणाओं के गांवों में स्कूल खुले हुए थे उनको अभियान चलाकर बंद करवाने लगे । अभियान को सफल बनाने के लिए पुलिस और सेना की भी मदद ली गई। इसी के तहत रास्तापाल की पाठशाला बंद करवाने हेतु एक मजिस्ट्रेट, एक पुलिस अधीक्षक और एक ट्रक भरकर पुलिस व सैनिकों को उस गांव में भेजा गया।

रास्तापाल में नानाभाई खांट गाँव के बालक बालिकाओं को अपने घर बुलाकर विद्या अध्ययन कराते थे। इस पाठशाला में उनका सहयोग देने के लिए अध्यापक के रूप में गांव बेड़ा मारगिया के सेंगा भाई भी अपनी सेवा देते थे। पाठशाला के सभी खर्चे नानाभाई खांट वहन करते थे। राजकीय आदेशों के बाबजूद भी इन्होनें पाठशाला में पढ़ाना जारी रखा। 19 जून 1947 को जब पुलिस नानाभाई खाट की पाठशाला पर पहुंची तब वहां नानाभाई खांट और अध्यापक सेंगा भाई दोनों उपस्थित थे। पुलिस ने दोनों को कमरे में बंद कर बंदूकों के कुंदों से मारना पीटना शुरू कर दिया तथा मजिस्ट्रेट ने नानाभाई को स्कूल में ताला लगाने के लिए कहा। नाना भाई ने ताला लगाने से मना कर दिया तथा चाबी नहीं देने पर सैनिक उन दोनों को ट्रक के पीछे रस्सी से बांधकर घसीटने की तैयारी करने लगे।

अध्यापक सेंगाभाई को पुलिस के द्वारा घसीटा जा रहा था, मजिस्ट्रेट ने पुलिस को सख्त आदेश दे दिए कि जबरदस्ती स्कूल के ताला लगा दिया जाये। नानाभाई और सेंगाभाई ने उनका पुरजोर विरोध भी किया एवं बदले में पुलिस ने उन दोनों पर लाठियां बरसाना शुरू कर दिया। इस घटना से रास्तापाल में वारी सांगी ढोल बजे उठे। यही नहीं, ये वारी ढोल पाल गंदवा, झौथरी, भींडा और अनेक गांवों में बजे और वहां से लोग आने लगे। आसपास के भील मीणाओं ने अपने गुरु जी सेंगाभाई और नानाभाई खांट को छुड़ाने के लिए अपने तरह-तरह के विधान अपनाये। अपने लोगों को बुलाना शुरू कर दिया। क्षेत्र के आसपास के सभी आदिवासियों ने जगह-जगह रास्तों को बंद कर नाकेबंदी कर दी। हजारों की संख्या में नर और नारी अस्त्र शस्त्रों सहित रास्तापाल में प्रवेश करने लगे। आदिवासियों ने जब अपने गुरु जी को पुलिस के द्वारा बंदूकों के बट द्वारा पिटते हुए, कोड़े खाते हुए देखा, तो वे भी दर्द से छटपटा रहे थे। पुलिस उनको बेरहमी से पीट रही थी। असहनीय पीड़ा से नाना भाई ने अपने प्राण त्याग दिए तथा उनके साथी सेगांभाई बेहोश हो गए थे परंतु फिर भी पुलिस के द्वारा उन पर बेतहाशा ज़ुल्म ढाए जा रहे थे। ट्रक के पीछे पुलिस के द्वारा एक रस्सी बांधी गई थी और उस रस्सी के एक सिरे पर सेंगाभाई को कमर से बांध रखा था तथा दूसरा सिरा ट्रक से बांध रखा था। जब यह दृश्य लोगों ने देखा तो वे बहुत अचंभित हुए और उन्हें बहुत दुख भी हुआ लेकिन किसी की भी हिम्मत नहीं हुई जो पुलिस के खिलाफ आवाज उठा सके। सभी लोग एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे और देख रहे थे कि कौन आगे आए, कौन आगे आए, उपस्थित जनसमूह को देखकर वहां के राज अधिकारी घबरा भी रहे थे कि यह भीड़ हमारे ऊपर टूट पड़ी तो हमारी बोटी बोटी को नोच लेगी।

पुलिस की गाड़ी सेंगाभाई को घसीटती चली जा रही थी और उसे बहरहमी से पीट रहे थे। सेंगाभाई हिम्मत करते हुए अपने लोगों को आवाज लगा कर उन्हें उलाहना दे रहे थे कि अरे तुम्हारी वीरता कहां गई? तुम्हारा जोश कहां गया? परंतु उन्हें बचाने की किसी की भी हिम्मत नहीं हुई। तभी अचानक सिर पर घास की गठरी और हाथ में दांतली लिये बिजली की तरह प्रवेश करते हुए एक 12 वर्षीय बालिका ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया तथा उस भीड़ को चीरते हुए सभी लोगों को जोश भरी आवाज से डांटते हुए आगे बढ़ी और पुलिस अधिकारियों से पूछा कि इन दोनों को किस कारण पकड़ा गया है? पुलिस अधिकारी पहले तो चुप रहे पर जब काली बाई ने बार-बार पूछा तो उसने बता दिया कि महारावल के आदेश के विरुद्ध विद्यालय चलाने के कारण इन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। काली बाई ने कहा कि विद्यालय चलाना अपराध नहीं है, गोविंद गुरु जी के आव्हान पर गांवों में विद्यालय खोले जा रहे हैं। वो कहते हैं कि शिक्षा ही हमारी विकास की कुंजी है, पुलिस अधिकारी ने उस आदिवासी बालिका को इस प्रकार बोलते देखा तो वह बौखला गया। पुलिस अधिकारी ने कहा कि विद्यालय चलाने वालों को गोली मार दी जाएगी तब काली बाई ने कहा तो सबसे पहले मुझे गोली मारो। इस वार्तालाप से गांव वाले भी उत्साहित होकर महारावल के विरुद्ध नारे लगाने लगे। इस पर पुलिस अधिकारी ने ट्रक चलाने का आदेश दिया। रस्से से बंधे सेंगाबाई को घसीटते देखकर कालीबाई क्रोध में आ गई, जो गुरुजी उनको प्रतिदिन विद्या अध्ययन कराते थे, उनको पढ़ाते थे, अपने मास्टर जी की यह दुर्दशा देख कर कालीबाई पुलिस की गाड़ी के पीछे दौड़ी तथा जोर-जोर से चिल्लाने लगी कि मेरे मास्टर जी को छोड़ दो, इन्हें क्यों घसीट रहे हो ? इनको कहां ले जा रहे हो? इनको क्यों मार रहे हो ? ऐसे कहते कहते वह अपनी तेज गति से आगे बढ़ती है और गाड़ी के पीछे दौड़ते हुए उसके पास पहुंच जाती है तथा अपने हाथ की दांतली से उस रस्सी को काटना चाहती है। परंतु उस बाला को क्या पता था कि जागीरदारों और अंग्रेजो की पुलिस इतनी निर्दय थी कि वह एक बालिका पर भी गोली चला सकती थी। जब वह गाड़ी के नजदीक पहुंची तो पुलिस ने उनकी गाड़ी को रोक दिया तथा उस वीर बाला कालीबाई को डराया धमकाया और वापस लौट जाने के लिए कहा। परंतु वह कालीबाई एक वीरबाला थी जिसके मन में जोश था और अपने गुरु जी को पुलिस के द्वारा पीटते हुए देखकर उसका खून खौल उठा था, उसने पुलिस की एक नहीं सुनी और अपने मास्टरजी को बचाना चाहती थी और उस रस्सी को जोश भरे हाथों से एक ही झटके में काट दिया, उधर पुलिस वाले बंदूकों को ताने खड़े थे। परंतु कालीबाई ने उनकी बंदूकों और गोलियों की कोई परवाह नहीं की।

छोटी सी बालिका के हौसले को कई महिलाओं ने देखा, सभी ने जोश भरी आवाज में चिल्लाई और जब रस्सी कट गई तो अन्य लोग भी सेंगा भाई के पास आकर खड़े हो गए। सेंगाभाई बेहोश थे। बालिका ने एक महिला से जोश भरी आवाज में कहा कि देखते क्या हो, मेरे गुरुजी के प्राण खतरे में हैं दौड़कर पानी लेकर आओ। जब बालिका का यह तेज और हट पुलिस ने देखा तो पुलिस को बहुत ही गुस्सा आ गया तथा सैनिकों ने उस नन्ही बालिका के ऊपर गोलियों की बौछार कर दी। गोलियां लगने से कालीबाई ने अपने गुरूजी के लिए बलिदान कर दिया तथा अपने नाम को अजर अमर कर दिया। काली बाई के साहस ने भील आदिवासियों की आंखें खोल दी और उन्होंने मारू ढोला बजा दिया भील आदिवासी पुलिस पर आक्रमण करने को तैयार हो गए। पुलिस को मालूम था कि मारू ढोल की आवाज मारने मरने का संकेत है इसलिए वे सब वहां से तुरंत गाड़ी में सवार होकर भाग लिए। इस प्रकार वीर बाला कालीबाई ने अपने बलिदान से सेंगा भाई को बचा लिया और उसने अपने गुरु को बचाकर गुरु शिष्य की इस दुनिया में एक पहचान कायम की और आज कालीबाई के नाम को लोग बहुत ही श्रद्धा के साथ याद करते हैं कि वीर बाला कालीबाई ने अपने प्राण गंवाकर अपने गुरु जी के प्राण बचाए। गुरु शिष्य के ऐसे अनूठे उदाहरण इतिहास में बहुत ही कम मिलेंगे। इसके उपरांत, नानाभाई का शव व घायल कालीबाई और अन्य गांव वालों को चारपाई पर रखकर डूंगरपुर लाया गया। वहां उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। परंतु कालीबाई लगभग 40 घंटे तक इलाज कराने के उपरांत भी नहीं बच पाई।

आधुनिक युग में काली बाई ने जो किया वह बहादुरी की एक अनूठी मिसाल थी। 19 जून 1947 को वीर बाला कालीबाई ने जो साहस और बलिदान की मिशाल कायम की वह हमेशा याद रहेगी। उसके बलिदान से आदिवासीयों में नई चेतना जागी तथा काली बाई के नाम पर डूंगरपुर जिले में एक पार्क बनाया गया। पार्क में कालीबाई की प्रतिमा स्थापित की गई। 19 जून को रास्तापाल गांव में मेले का आयोजन भी किया जाता है। इस दिन हजारों की संख्या में लोग एकत्रित होते हैं, रास्तापाल व आसपास के गांवों के लोग आते हैं, बच्चे बुजुर्ग सभी शहीदों की प्रतिमा के सम्मुख खड़े होकर उनको श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अपने शहीदों को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते है।

(साभार – अरावली विचार मंच)

गीत – समय कविता संग्रह को पढ़ते हुए

– डॉ. वसुंधरा मिश्र

प्रसिद्ध गीतकार और रचनाकार किशन दाधीच के सद्य प्रकाशित कविता संग्रह गीत समय को पढ़ते हुए भारत की काव्यात्मक यात्रा को समझने का मौका मिला। गत छह दशकों से लिख रहे किशन दाधीच ने वर्तमान समय की सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों की संवेदनशीलता को गहराई से महसूस किया है। यही कारण है कि गीत – समय में कविताओं की श्रृंखला पूरे चित्रों को पाठक के मन मस्तिष्क में अंकित कर देती हैं।
लोककलाविद् साहित्यकार एवं उदयपुर लोककला मंडल के पूर्व निदेशक डॉ महेंद्र भानावत का कहना है कि किशन दाधीच ने अपना गेज नहीं बदला है। डॉ संगम मिश्र सेंट्रल अकादमी संस्थान उदयपुर में चेयरमैन हैं, उनका कहना है कि स्वान्तः सुखाय जीने वाले किशन दाधीच उनके प्रिय कवि हैं। उनको सुनना अच्छा लगता है।
महाकवि सूर्य मल्ल मिश्रण के प्रति उनकी कविता ‘तुम सती के आचमन’ की ये पंक्तियाँ – – –
आँधियों को स्वर दिया
अभियान गीतों का तुम्हीं ने
बिजलियों के पाँव बाँधे
सृजन के घुंघुरुँ तुम्हीं ने।
— – – – – –
तुम प्रणय के चिर क्षणों में
अर्चना की इक घड़ी हो (पृष्ठ 95-96)
कवि धरती पर निःसहाय लोगों के लिए गीत गाता है। उसका गीत जनयुद्ध है वह इसका स्वयं साक्षी है – – –
मनुष्य के संघर्ष को
काटने वाले सत्य का
साक्षी रहूँगा मैं
क्योंकि इस जनयुद्ध में
संजय की भूमिका
तुम्हारी नहीं मेरी है।( पृष्ठ 100)
कवि भारत की धरती पर होने वाले मनुष्य और मानवता के संबंधों और उनके संघर्षों के साक्षी हैं। इतने लंबे समय को कवि ने स्वयं से साझा किया है।
‘गीत – समय’ का प्रकाशन कोरोना काल में आने के पीछे भी कवि की सकारात्मक सोच और भाव हैं। यह सच है कि नवगीत जिस पीढ़ी के हाथों निर्मित होने के उपक्रम में था, वह थी आजादी के बाद की पहली नौजवान पीढ़ी जो गाँव के नैसर्गिक और अर्जित संस्कारों से हिम्मत और हौसला ही नहीं, मानवीयता की अटूट पहचान लेकर छोटे- बड़े शहरों में आई और आजाद देश की नयी संभावनाओं से अपनी परिवर्तनकारी महत्वाकांक्षाओं को जोड़कर संघर्ष की धूप- धूल से लड़ती हुई जीने लगी। स्वभावतः और रहन- सहन के बदलाव की अनवरत लड़ाई में, कभी उस पीढ़ी का सदस्य शहरी एकांत में ग्रामीण नागर मानस का साक्षात्कार करता रहा।
किशन दाधीच की काव्य यात्रा आत्मविश्वास से पूर्ण और अटूट हौसला देने वाली है। उनकी रचनाधर्मिता परंपरागत लीक से हटकर रचना कर्म करने की प्रक्रिया है। वीरेंद्र मिश्र, रामदरश मिश्र, रामनरेश पाठक, रवींद्र भ्रमर आदि गीतकार की लंबी श्रृंखला रही है। किशन दाधीच उसी श्रृंखला के फूल हैं जिनकी खुशबू समाज की दकियानूसी परंपराओं को नकारते हुए आती है।
जनसंघर्ष की अनिवार्य परिस्थितियों और राजनीति की रणनीतियों के साक्षी रहे किशन जी ने अपने विचारों को कविता और गीतों के माध्यम से समाज के प्रति अपने दायित्व को सक्रिय रुप से शब्दों में पिरोया है। नवगीत का स्वभाव जनबोध से ही जुड़ा हुआ है।उनका मानना है कि गीत ही वह विधा है जो कवि और जन मानस के भाव, लय के आधार पर खड़ी होती है, विचारधाराओं के उत्साह मात्र के आधार पर नहीं। आम आदमी की मानसिकता को आंदोलन या नारे से भरे गीत नहीं बल्कि व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामूहिक व्यवहार के गीत ही बदल सकते हैं। कवि ने कविता मजदूरों के गीत कविता में
, दर्द फिर जुलूस हो गया कविता में कवि का कहना है कि
– – लोग फिर मारे गए हैं प्रार्थना करते हुए
जो खबर के न हुए
बहरे वातायन। प्रश्न वाचक हो गए
चर्खियों की चाल पर आदि आदि कविताएँ आम आदमी के संत्रास की कथा ही कहती हैं। गा सकूँ मैं जिन्दगी को, मैंने बुना गीत का बाना, भोर की तलाश में आदि कविताएँ आशावादी हैं।
बाहर भीतर का आदमी, सूर्य नगर का मौन, अध कतरा दिन आदि कविताओं में द्वंद्वात्मक चित्रों को उकेरनी वाली हैं। दबे पाँव चलता है सूरज, सूर्य मुखी का भोर पत्र कविता में आशा की किरणें हैं।
डॉ लोहिया के प्रति कवि ने लिखा है – – –
आहत है, कोई नायक जो
समाज के उत्थान के लिए
निरंतर कार्य करता रहा
जो अधूरा रहा।
अज्ञेय ने मानवीय व्यक्तित्व की व्याख्या में भाषा को अनिवार्य तत्व माना है। वे भाषा को माध्यम नहीं, अनुभूति मानते हैं। अच्छी भाषा वे उसे ही मानते हैं जो भाषा और अनुभूति के अद्वैत को स्थापित करे। कवि किशन की भाषा में अनुभूति का जबर्दस्त बंधन है जो आम आदमी से जुड़ा हुआ है।
कवि उस दौर से भी गुजरे हैं जब नयी कविता और वामपंथी धारा की कविताएँ भी परिवर्तन की प्रक्रिया में थीं और जनवादी कविताओं में जनजीवन की विभिन्न परिस्थितियों और विषयों को शब्दबद्ध किया जा रहा था। वर्ग संघर्ष, वर्ग हितों की पड़ताल, चरित्रालोचन, व्यवस्था का पर्दाफाश और व्यापक तौर पर समाजवादी यथार्थवादी दृष्टि से जनसंघर्ष की वास्तविक अवस्थाओं और प्रक्रियाओं से जुड़ी संरचनाएँ आ रही थीं। कवि मानते हैं कि गीत मनुष्य की संवेदना से जुड़ा उसके नैसर्गिक स्वभाव का एक महत्वपूर्ण अंग है जो हर युग में मनुष्य को सींचता रहता है। कवि किशन के गीत की भाषा नव आधुनिक और स्वयं विकसित शैली शिल्प की विविध लहरें हैं जिसमें उतार- चढा़व और सभ्यता, संस्कृति, परंपराओं के सुदृढ़ तट भी हैं। वे स्वयं ‘आत्मकथ्य ‘में लिखते हैं – – गीत भारतीय काव्य की प्रमुख पहचान है। कवि की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह समाज में संस्कारों की प्रतिष्ठा करे और निर्माण की प्रक्रिया को तेज करे। पृष्ठ 18
कविता उसके लिए ‘महज एक शौक नहीं, अस्मिता की रक्षा करने के लिए वह वचनबद्ध है। इक्कीसवीं सदी में यंत्रवत होती जा रही जिन्दगी में रस को बचाए रखने की शक्ति केवल गीत में है। (पृष्ठ 20) ।
रचना के प्रति प्रतिबद्ध कवि अपनी चालीस कविताओं के संग्रह’ गीत- समय’ में सभी युवागीतकारों और कवियों को संदेश भी देते हैं क्योंकि उनका मानना है कि आज भी हमारी लडा़ई जारी है।
गीत – समय में तीन लंबी गीतात्मक स्वभाव की लंबी कविताएँ हैं जिसमें लड़ते हुए आदमी की छवि है जो लगातार लड़कर बुराई और अन्याय, अत्याचार का प्रतिकार करता आया है। यहीं से पाठक अंधकार और उजाले के साथ परिचय करता है और वर्तमान समय की सच्चाई को उजागर करता है।
गीत- समय का कवि मूलतः प्रगतिशील विचारों से अनुप्रेरित रहा है। समाज के वर्ग, जाति और धर्मगत भेदों से ऊपर उठकर समानता का दम भरते रहे हैं। उनके गीत सामाजिक त्रास और विषमताओं के विरुध्द चेतावनी के गीत हैं, उन सारी शक्तियों के विरुध्द है जो लोकतंत्र का मुखौटा पहनकर ‘फासीवाद ‘का प्रचार करती हैं। (पृष्ठ 9) पहली कविता का शीर्षक ‘प्रश्न – मयी दोपहरी’ जीवन की इस लंबी यात्रा पर ही प्रश्न उठाती है –
टंके हुए कितने भ्रम
जिन्दगी मिली हमको
यातना शिविर जैसी
गूंगों का मुक्ति बोध शाही ख्ययाम नहीं। (पृष्ठ 26)
कवि स्वयं नीलकंठ है, वह चुनौतियों का सामना करता है –
हम नीलकंठ हैं
गरल हमी से हारा है
हमने छूकर पाषाणों को स्वप्न दिए हैं
हम सागर की गहराई का राज लिए हैं
फिर क्यों गुदले पानी में नावें छोड़ रहे हैं
नई राह पर
स्वर्ण पुरातन
गवां दिया हमने।।( पृष्ठ 73)
कवि के विषय में वरिष्ठ साहित्यकार जीवन सिंह ने स्पष्ट लिखा है कि किशन दाधीच अपनी प्रतिबद्धता को नहीं छिपाते। उनका एक गीत ‘गीत की गाँव तक पद यात्रा’ यह पद यात्रा ही उनके साहित्यकार की प्रतिबद्धता है। – – जिस बूंदी से किशन दाधीच का रिश्ता पिछली सदी के आठवें दशक तक रहा जो उनकी पैतृक नगरी है और बूंदी एक कस्बा जैसा ही था। बूंदी साहित्यक ऊर्जा की धरती रही है जहांँ साहित्यकारों, कवियों, पत्रकारों का तीर्थ स्थल है। पत्रकार लज्जा राम मेहता,ऋषि दत्त मेहता, भाषाविद् डॉ भोलाशंकर व्यास,शहीद रामकल्याण आदि की कीर्ति गाथा अंकित है। उनकी संवेदनशीलता से भरे गीत बूंदी से होकर ही आते हैं ।कवि किशन दाधीच शहरी सदी को आंकड़े की सदी कहते हैं। – – – गीत के माध्यम से इस समाज के उबड़ खाबड़ यथार्थ को व्यक्त करना बहुत कठिन है लेकिन कवि ने गीत के माध्यम से यह काम बहुत सलीके से किया है।( पृष्ठ 15) मानवता के विकास और उन्नति के लिए कवि के लिए जो गीत रचनाएँ की हैं उसे मनुष्य का मन मस्तिष्क सहज ही अपना लेता है।
गीत – समय काव्य संग्रह कवि का पहला काव्य संग्रह है। नई दिल्ली और हैदराबाद के प्रसिद्ध प्रकाशन नीलकमल पब्लिकेशन के सुरेशचंद्र शर्मा द्वारा प्रकाशित किया गया है । कीमत 300 रुपये हैं। प्रथम संस्करण है जो 2021 में आया है। पुस्तक का आवरण डॉ श्रीनिवास अय्यर द्वारा अंकित किया गया है जो कलम की कहानी में निहित रस- रंग और संगीत की स्वर लहरी का आह्वान करते हैं।
अभी भी हम भरोसा कर सकते हैं कविताओं पर, साहित्य पर जो समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आशा की किरणें जगाती हैं।

जागृति

प्रो. प्रेम शर्मा

अपराधी दंडित हों-ठीक है,
भ्रष्टाचारी प्रताड़ित हों-मान्य है,
दुराचारी अपमानित हों-स्वीकार है,
पापी का संहार हो-प्रशंसनीय है।

निरपराधी को अलग-थलग करना
पाप है,
सच को सच न स्वीकार करना
दुराचार है,
विध्वंशक लोकतंत्र का विरोध न करना-अनाचार है,
पापियों को दंडित न करना
अधर्म है।

सच्चा कोई मरे नहीं
शर्मिंदगी से,
निरपराधी घुट घुट कर जिए नहीं
आत्मग्लानि से
सदाचारी चरित्र बदले नहीं
विद्रोह में,
धर्मनिष्ठ तिल तिल मरे नहीं
अराजकता में।

जागृति का एक तांडव होना चाहिए
युग परिवर्तन का संकल्प होना चाहिए
आडंबर रहित समाज होना चाहिए
नव आशा उपहार सबको मिलना चाहिए।।

पद्मश्री : लावारिस लाशों के ‘मसीहा’ हैं अयोध्या के शरीफ चाचा

अयोध्या: हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके समाजसेवी मोहम्मद शरीफ को निस्वार्थ सेवा के लिए राष्ट्रपति भवन में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। बुजुर्ग समाजसेवी मोहम्मद शरीफ को लावारिस लाशों के मसीहा के तौर पर जाना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने पिछले 25 वर्षों में 25,000 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है। 30 वर्ष पूर्व युवा पुत्र की मार्ग दुर्घटना से मौत और लावारिस के तौर पर उसके अंतिम संस्कार ने शरीफ पर ऐसा असर डाला कि वो किसी भी लावारिस शव के वारिस बन कर सामने आए।
गौरतलब है कि मोहम्मद शरीफ को पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयनित होने के लिए साल 2020 में पत्र मिला था लेकिन कोरोना महामारी के कारण नहीं मिल सका। उनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है. साथ ही स्वास्थ्य खराब होने की वजह से परिवार परेशान रहता है। बीते कुछ महीनों पहले उनकी हालात बेहद खराब हो गई थी, परिजनों के पास उनके इलाज कराने तक के पैसे हीं बचे थे. घरवालों पर अलग अलग तरह के कर्जें हैं। उनका बेटा गाड़ी चलाकर परिवार को पालता है.
छोटे बेटे को खोने के बाद लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने वाले मोहम्मद शरीफ चाचा ऐसे खोए की साइकिल मरम्मत की स्थापित दुकान हाशिये पर आ गयी। सेवा संवेदना के जोश में गृहस्थी की गाड़ी पटरी से उतर गयी। शरीफ के तीन बेटों में एक ने साइकिल मरम्मत की दुकान खोली। दूसरे ने मोटरसाइकिल की मरम्मत का काम शुरू किया और तीसरे ड्राइवर का पेशा अपनाया। तन ढंकने के लिए कपड़े दो जून की रोटी और सिर पर छत की जुगत में सुनिश्चित होती रही। मोहम्मद शरीफ भी घरेलू जिम्मेदारी से ऊपर उठकर अपना मिशन आगे बढ़ाते गए।

पद्मश्री : डायन प्रथा की शिकार बनीं और अब इसके खिलाफ मशाल बनीं ‘छुटनी देवी

सरायकेला : झारखंड की छुटनी देवी को पद्मश्री सम्‍मान से नवाजा गया है। इस महिला को कभी डायन कह कर घर-गांव से निकाल दिया गया था। 62 साल की छुटनी महतो के नाम के आगे अब भारत का श्रेष्ठ सम्मान पद्मश्री जुड़ गया है। एक समय ऐसा भी था कि घर वालों ने डायन के नाम पर न सिर्फ उसे प्रताडि़त किया, बल्कि घर से बेदखल भी कर दिया था। आठ माह के बच्चे के साथ पेड़ के नीचे रहीं। तब पति ने भी साथ छोड़ दिया था। आज वह अपनी जैसी असंख्य महिलाओं की ताकत बन गई है। छुटनी महतो सरायकेला खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड की बिरबांस पंचायत के भोलाडीह गांव में रहती हैं। गांव में ही एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) के सौजन्य से संचालित पुनर्वास केंद्र चलाती है। वह बतौर आशा की निदेशक (सरायकेला इकाई) यहां कार्यरत है।
छुटनी कहती हैं कि शादी के 16 साल बाद 1995 में एक तांत्रिक के कहने पर उसे गांव ने डायन मान लिया था। इसके बाद उसे मल खिलाने की कोशिश की थी। पेड़ से बांधकर पिटाई की गई। जब लोग उसकी हत्या की योजना बना रहे थे, पति को छोड़कर चारों बच्चों के साथ गांव छोड़कर चली गई। इसके बाद आठ महीने तक जंगल में रहीं। गांव वालों के खिलाफ केस करने गईं, पर पुलिस ने भी मदद नहीं की। लेकिन अब कोई किसी महिला को डायन बताकर प्रताडि़त नहीं कर सकता। उन्होंने अपनी जैसी पीडि़त 70 महिलाओं का एक संगठन बनाया है, जो इस कलंक के खिलाफ लड़ रहा है।
छुटनी कहती हैं कि जैसे ही ऐसे मामले की सूचना मिलती है, उनकी टीम मौके पर पहुंच जाती है। आरोपितों और अंधविश्वास फैलाने वाले तांत्रिकों पर प्राथमिकी दर्ज कराती है। वह पीडि़ता को अपने साथ ले आती हैं। कानूनी कार्रवाई के बाद सशर्त घर वापसी कराती हैं। अबतक 100 से अधिक महिलाओं की घर वापसी करा चुकी हंै। उनका संगठन आरोपितों के खिलाफ कोर्ट में भी लड़ाई लड़ता है। वह कहती हैं कि मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान प्रताडि़त महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाना रहा है। आज गांव वाले किसी महिला को डायन कहने से पहले 10 बार सोचते हैं।
ऐसे डायन घोषित कर दी गईं छुटनी

छुटनी की शादी धनंजय महतो के साथ हुई थी। जब उनकी भाभी गर्भवती हुईं तब छुटनी ने कहा कि बेटा होगा, लेकिन बेटी हुई। एक दिन वह बीमार हो गई। स्वजन ने डायन का आरोप लगाकर छुटनी को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। अशिक्षित छुटनी महतो को गांव वालों ने प्रताडि़त करते हुए मल-मूत्र पिलाया। पेड़ से बांधकर पीटा और अर्धनग्न कर गांव की गलियों में घसीटा। छुटनी भागकर मायके चली गई। अब वह दूसरी कमजोर व बेसहारा महिलाओं का सहारा बन गई हैं। किसी भी महिला के प्रताडि़त होने की खबर मिलते ही अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ वहां पर पहुंच जाती हैं। लोगों को पहले समझाती हैं। नहीं मानने पर जेल भिजवाती हैं।
छुटनी ने बताया कि पद्मश्री क्या होता है, मुझे नहीं मालूम, लेकिन कोई बड़ा चीज तो जरूर है, तभी मुझे लगातार फोन आ रहा है। छुटनी ने बताया कि उन्हें सुबह 11 बजे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से फोन आया। बोला कि आपको पद्मश्री मिलेगा। छुटनी ने कहा कि अभी टाइम नहीं है, एक घंटे बाद फोन करना। छुटनी ने बताया कि दोबारा दोपहर 12.15 बजे फोन आया। फोन करने वाले ने बताया कि आपका नाम और फोटो सभी अखबार और टीवी में आएगा। तभी से गांव के लोग काफी खुश हैं। बाहर से भी लगातार फोन आ रहा है, इसलिए लग रहा है कि यह जरूर कोई बड़ी चीज है।
मरते दम तक मेरा संघर्ष जारी रहेगा
छुटनी कहती हैं कि डायन के नाम पर मैंने गहरा जख्म झेला है। चार बच्चों को लेकर घर छोडऩा पड़ा। यदि मैं डायन होती तो उन अत्याचारियों को खत्म कर देती, पर ऐसा कुछ होता नहीं है। ओझा के कहने पर ग्रामीणों ने ऐसा जुल्म किया, जिसकी कल्पना सभ्य समाज नहीं कर सकता है। पुलिस-प्रशासन भी ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करता है। मैं उस असभ्य समाज से लोहा ले रही हूं, जहां नारी को सम्मान नहीं मिलता। मरते दम तक मेरा संघर्ष जारी रहेगा।

पद्मश्री : तस्वीरों से इतिहास रचतीं हैं मधुबनी कलाकार दुलारी देवी

मधुबनी: 2 साल की उम्र में शादी, गरीबी की मार अलग… घरों में काम करने वाली दुलारी ने खुद नहीं सोचा था कि उनका संघर्ष उन्हें पद्मश्री दिलाएगा। देश का वो सम्मान जिसे पाने की चाह हर किसी में होती है। लेकिन दुलारी को पद्मश्री पुरस्कार मिलने के पीछे छिपा है उनका अनवरत संघर्ष… 54 साल की दुलारी ने नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया।
सात हजार मिथिला पेंटिंग बना चुकी हैं पद्मश्री दुलारी देवी
बिहार के मधुबनी जिले के रांटी गांव की रहने वाली दुलारी देवी का जन्म ही अभावों और गरीबी के बीच हुआ। राजनगर प्रखंड की दुलारी देवी बेहद ही गरीब मल्लाह परिवार में जन्मीं थीं। माता-पिता ने 12 साल की उम्र में ही इनका विवाह कर दिया। सात जन्मों के बजाए दुलारी सात साल में ही ससुराल से मायके वापस आ गईं और वो भी 6 महीने की बेटी की मौत के गम के साथ। पढ़ी लिखीं भी नहीं थीं, क्या करतीं। लेकिन कहते हैं कि अगर औरत हिम्मत न छोड़े तो बहुत कुछ कर दिखाती है। मायके से ही दुलारी ने फिर से संघर्ष शुरू किया। घरों में झाड़ू-पोंछा लगा कर कुछ आमदनी हो जाती थी, दुलारी का जीवन चल रहा था लेकिन नसीब में कुछ और था। हाथों में पोंछे की जगह कूची ने ले ली। इसके बाद मधुबनी पेंटिंग बनाने का जो सिलसिला दुलारी ने शुरू किया वो आज तक नहीं रुका। हाथों में जादू ऐसा कि एक वक्त पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी दुलारी की तारीफ की।
किस्मत कब किसे किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दे, कौन जाने। यही दुलारी के साथ हुआ। अपने ही गांव में मिथिला पेंटिंग की मशहूर चित्रकार कर्पूरी देवी के घर दुलारी को झाड़ू-पोंछा करने का काम मिल गया। संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात… ये कहावत यहीं से सच होनी शुरू हो गई, खाली समय में दुलारी अपने घर-आंगन को ही माटी से पोतकर और लकड़ी की ब्रश बना मधुबनी पेंटिंग करने लगीं। कर्पूरी देवी का साथ मिलते ही मानों दुलारी के हाथों का जादू बाहर आ गया।

किताबों तक में दुलारी की गाथा दर्ज
गीता वुल्फ की पुस्तक ‘फॉलोइंग माइ पेंट ब्रश’ और मार्टिन लि कॉज की फ्रेंच में लिखी पुस्तक मिथिला में दुलारी की जीवन गाथा व कलाकृतियां सुसज्जित हैं। सतरंगी नामक पुस्तक में भी इनकी पेंटिग ने जगह पाई है। इग्नू के लिए मैथिली में तैयार किए गए आधार पाठ्यक्रम के मुखपृष्ठ के लिए भी इनकी पेंटिग चुनी गई। पटना में बिहार संग्रहालय के उद्घाटन के मौके पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दुलारी देवी को विशेष तौर पर आमंत्रित किया। वहां कमला नदी की पूजा पर इनकी बनाई एक पेंटिग को जगह दी गई है। 2012-13 में दुलारी राज्य पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी हैं।

पद्मश्री : ठुकरायी गयी बच्चियों का सहारा बनती हैं पंजाब की प्रकाश कौर

पंजाब के जालंधर सिटी की सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश कौर को 72वें गणतंत्र दिवस पर पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। यह अवॉर्ड पंजाब में परिवार द्वारा ठुकराई गई बालिकाओं के प्रति उनकी सामाजिक सेवा को मान्यता देता है। 63 साल की प्रकाश कौर को उनके माता-पिता ने त्याग दिया था। उन्होंने कहा, ‘पुरस्कार ने समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी को कई गुना बढ़ा दिया है। उनका सबसे बड़ा पुरस्कार तब होगा जब सभी बच्चों को उनके माता-पिता द्वारा पाला जाएगा।’

उन्होंने कहा, ‘मैं सभी से एक निवेदन करना चाहूंगी कि वे अपनी नवजात लड़कियों को कचरे या झाड़ियों में न छोड़ें। अगर किसी के लिए किसी भी कारण से एक बालिका को पालना मुश्किल है, तो हम उसका स्वागत खुली बांहों के साथ करेंगे। ऐसे कई उदाहरण हैं जहां आवारा कुत्तों ने रास्ते में छोड़े हुए शिशुओं को काट लिया और कुछ मामलों में उनकी मृत्यु हो गई। यह बहुत परेशान करने वाला है।’

लाड़-प्यार से पाली जाती हैं बच्चियां

कौर ‘यूनिक होम’ नाम की संस्था चला रही हैं, जिसमें 9 दिन से लेकर 20 साल तक की 80 बच्चियां हैं। अब तक 15 बच्चियों की शादी भी की जा चुकी है। यहां हर बच्चे को लाड़ प्यार से पाला जाता है। वे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों जैसे कि मसूरी में सेंट मैरीज, जालंधर में सेंट जोसेफ आदि में पढ़ सकते हैं और शहर के किसी भी बड़े मॉल से खरीदारी कर सकते हैं। बच्चे हर साल गर्मियों के दौरान किसी भी हिल स्टेशन पर 15 दिनों की छुट्टी पर जा सकते हैं। हर साल 24 अप्रैल को सभी बच्चों का जन्मदिन मनाता है।एक विशाल केक काटा जाता है।

पद्म विभूषण : पत्थरों और रेत पर कहानियाँ कह जाते हैं सुदर्शन

भुवनेश्वर : सुदर्शन साहू को बेजान पत्थरों को उकेरकर पौराणिक कथाओं को सजीव सी दिखने वाली मूर्तियां गढ़ने में महारत हासिल है। अपनी कला के लिए 1988 में पद्मश्री से नवाजे जा चुके सुदर्शन ने 1977 में पुरी में क्राफ्ट म्यूजियम स्थापित किया था। इस बार सुदर्शन साहू को पद्म विभूषण सम्मान दिया गया है।
इसके बाद उन्होंने 1991 में भुवनेश्वर में ओडिशा सरकार के साथ मिलकर एक आर्ट्स एंड क्राफ्ट कॉलेज स्थापित किया था, जहां वे पत्थरों, लकड़ियों और फाइबर ग्लास को जानदार लगने वाली मूर्तियों में बदलने की कला सिखाते हैं। सुदर्शन साहू का जन्म 11 मार्च 1939 को ओडिशा के पुरी में हुआ था। सुदर्शन साहू प्रसिद्ध मूर्तिकार हैं। उनकी बनाई कलाकृतियों की प्रदर्शनी देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं।

‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ से हो चुके हैं सम्मानित
सुदर्शन को 1981 में पत्थर पर नक्काशी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। उन्होंने शिल्प गुरु पुरस्कार 2003 प्राप्त किया। उन्हें वर्ष 2012 में ओडिशा ललित कला अकादमी द्वारा धर्मपद पुरस्कार मिला।