Friday, October 30, 2026
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छपरा की बेटी, साइकिल से भारत घूमीं:173 दिनों में 12,500 किमी चली

बेटी बचाने का दिया संदेश, अब एवरेस्ट फतह करना चाहती है

छपरा : सविता महतो ने साइकिल से पूरे देश की यात्रा करके कीर्तिमान बनाया है। छपरा की इस बेटी ने एक 173 दिनों में 29 राज्यों का साइकिल से भ्रमण कर उन्होंने बेटी बचाने का संदेश दिया है। यह यात्रा उन्होंने पिछले वर्ष की है। अब वह माउंट एवरेस्ट को 2022 में फतह करना चाहती है, लेकिन इसमें उन्हें आर्थिक परेशानी हो रही है। सविता ने कला संस्कृति मंत्री आलोक रंजन से मदद मांगी है। मंत्री ने मदद का भरोसा दिया है। पानापुर के चौहान महतो की पुत्री सविता ने जम्मू कश्मीर से यात्रा की शुरुआत की। इसके बाद दक्षिण केरल, तमिलनाडु पहुंची। फिर उत्तर पूर्वी राज्यों में गई। अंत में सिक्किम होते हुए 18 जुलाई 2017 को पटना पहुंची। रास्ते में सभी जगहों पर एक-एक दिन बिताया। इस अवधि में उसने 12 हजार 500 किलोमीटर से अधिक का सफर साइकिल पर तय किया। सविता ने बताया, ‘जिस रास्ते से गुजरती, वहां लोगों को बेटी बचाने और बेटी पढ़ाने का संदेश देती रहीं। हमारे कामों को देखकर लोग काफी कायल हुए और हमारा स्वागत भी किया। अभियान में ग्रुप कमांडर ब्रिग्रेडियर रणविजय सिंह से बड़ी सहायता मिली। उन्होंने आगे बढ़ने को प्रेरित किया।’

तत्कालीन मंत्री कर चुके हैं सम्मानित
सविता ने बताया, साइकिल यात्रा के दौरान लोग यह जानकर आश्चर्य चकित हो जाते थे कि मैं बिहार से हूं। मुझे इस बात का गर्व है कि बिहार की हूं।’ बदा दें, उनकी इस उपलब्धि के लिए बिहार के कला संस्कृति एवं युवा विभाग से सम्मानित हो चुकी है।

सविता के पिता मछली बेच कर चलाते हैं परिवार
चौहान महतो और क्रांति देवी की पुत्री सविता अपने परिवार के साथ कोलकाता में रहती है। पिता तारकेश्वर में मछली बेच कर परिवार चलाते हैं, लेकिन सविता ने गरीबी के बीच रहकर भी बड़ा सपना देखा और उसे पूरा करने का साहस भी दिखाया। साइकिल यात्रा के दौरान स्कूल प्रबंधन भी उसकी मदद करता है। सविता हिमालय के संतोपथ पर्वत पर जमीन से साढ़े सात हजार मीटर ऊंचाई पर तिरंगा फहरा चुकी है।

महिला प्रधान बनी वैक्सीनेशन दूत, टीकाकरण अभियान को दी रफ्तार

मेरठ : महिला प्रधान सेबी के मजबूत इरादों की वजह से मेरठ से सटे दौराला ब्लॉक के बंशीपुरा गांव का हर नागरिक आज कोरोना से चिंतामुक्त हो गया है। हिंदू, मुस्लिम मिश्रित आबादी वाले इस गांव में हर आदमी वैक्सीन की पहली खुराक ले चुका है। गांव में दूसरे डोज की तैयारी चल रही है। यह सब गांव की प्रधान सेबी की मेहनत की वजह से मुमकिन हो पाया है। उन्होंने वैक्सीन के खिलाफ लोगों के मन में चल रही भ्रांतियों को तोड़ा। इसके लिए लोगों से काफी ताने भी सहे। लेकिन अंत तक हार नहीं मानीं। सेबी कहती हैं कि गांव वालों को समझाना बहुत मुश्किल है। पहले मैंने औरतों और युवाओं को वैक्सीन के लिए मनाया। गांव के हर घर की कुंडी पता नहीं कितनी दफा खटखटाई है।वह कहती हैं कि कई लोगों ने तो छत से मुझे आता देखकर दरवाजे खोलना ही बंद कर दिया था। लेकिन, मैंने भी ठान लिया था कि गांव के हर आदमी को वैक्सीन लगवाऊंगी। इसलिए सुबह जल्दी उठकर, कभी देर रात, कभी मिठाई के बहाने घरों में जाकर लोगों को मनाया। लोग कहते अगर हमने वैक्सीन लगवाई तो हमारी नसबंदी हो जाएगी। कुछ कहते हम मर जाएंगे, औरतें कहती हमारे बच्चे नहीं होंगे। गांव में डॉक्टर को बुलाकर ऐलान कराया कि वैक्सीन से ऐसा कुछ नहीं होगा। मिन्नतें कर लोगों को मनाया। आज गांव में हर आदमी टीके की पहली डोज लगवा चुका है, दूसरी डोज की तैयारी है। प्रधान को कोसने वाले लोग आज अपनी बहू, महिला प्रधान का शुक्रिया अदा करते हैं।

अपने गांव को कोरोना से बचाने के लिए सेबी ने लंबी लड़ाई लड़ी है। सेबी कहती हैं कि पहले मैंने औरतों और युवाओं को वैक्सीन के लिए मनाया। गांव के हर घर की कुंडी पता नहीं कितनी दफा खटखटाई है। लोगों की गलत बातें, ताने भी सुने, सहे हैं। औरतें कहतीं तुम क्यों हमारे पीछे पड़ी हो, हमें नही लगवाना जे टीका, तुम ही लगवा लो। सेबी कहती है औरतों को तो मैं खुद समझा लेती, कई आदमियों को भी समझाया कि वैक्सीन लगवाएं, बीमारी से बचाएगी। पूरा गांव सुरक्षित रहेगा। लेकिन, कई ऐसे लोग भी हैं जो बात नहीं मानते थे। मैं गांव की बहू हूँ, पद में बड़े आदमियों से पर्दा भी रखना पड़ता है। जहां ऐसा था वहां पति, भाई, देवर को भेजा। घर के आदमी उन पुरुषों के बीच बार-बार गए। सुबह 6 बजे से जाकर उन्हें उठाया और वैक्सीन के लिए लाए। कुछ लोगों से मनमुटाव भी हुआ मगर अपने गांव को बचाने के लिए मैं भी डटी रही। सेबी की रिश्ते की सास जाहिदा कहती हैं हमारे घर मा आज तक कोई औरत घर से बाहर न निकली। मैं भी सादी होकर आई थी तो घर में भीतर रहती, गांव की सारी औरतें पर्दे में रहे हैं। लेकिन जब से म्हारी बहू सेबी पिरधान बनी है वो ही बाहर जाती है। बीमारी में म्हारी बहू ने मुझे भी सुई लगवाई, औरतों को हाथ पकड़-पकड़ कर ले गई सुई लगवाने। जे मे सब सही रहें। जे ई बहू है जो बाहर निकले है। गाँव में अब तक 5 से 6 टीकाकरण शिविर लग चुके हैं। सेबी कहती हैं पहली डोज के वक्त शुरू के 2 शिविर बिल्कुल खाली रहे। डॉक्टर आते सारा दिन लोगों का इंतजार करते हम भी बैठे रहते मगर कोई वैक्सीन लगवाने नहीं आया। डॉक्टर और एएनएम ने घरों, पंचायत में जाकर लोगों को समझाया कि वैक्सीन लगवाएं। आज दूसरी डोज के लिए जो कैंप लग रहा है उसमें लोग खुद आकर वैक्सीन लगवा रहे हैं। सेबी मुस्लिम आबादी के उस गांव को वैक्सीन लगवाने में सफल रहीं जिसके सामने स्वास्थ्य विभाग ने भी हथियार डाल दिए। मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में शुरू से वैक्सीनेशन कम रहा। अफवाहों से घिरे लोगों ने वैक्सीन लगवाने से इंकार कर दिया। प्रशासन ने मुनादी कराई, धर्मगुरुओं की मदद से जागरुकता फैलाई, मस्जिदों से ऐलान कराए कि लोग वैक्सीन लगवाएं। पुलिस, प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी खुद ई रिक्शे में बैठकर गलियों में घूमे, लोगों को वैक्सीन लगवाने को कहा। डीएम, सीएमओ, एसएसपी ने मुस्लिम इलाकों में जाकर लोगों से कहा वैक्सीन लगवाएं। लेकिन सेबी ने अपने गांव की पूरी हिंदू और मुस्लिम आबादी को वैक्सीन लगवा दी। वंशीपुरा के बाद सहरसा में वैक्सीनेशन करा रही हैं। वंशीपुरा गांव को कोरोना की पहली और दूसरी लहर छू भी नहीं सकी। ग्राम प्रधान के प्रयासों से गांव कोरोना से दूर रहा। सेबी कहती हैं दूसरी लहर में जब गांवों में कोरोना खूब फैला तो मैंने अपने गांव में रोजाना सैनिटाइज कराया, सफाई कराई, गांव की सीमा को बैरिकेड कर दिया ताकि न कोई बाहर जा सके, न बाहरी आदमी अंदर आए इसलिए हमारे गांव में न किसी को कोरोना हुआ न किसी की कोरोना से मौत हुई। वंशीपुरा गांव मेरठ जिले का पहला 100% वैक्सीन लगाने वाला गांव बन चुका है। डीएम के. बालाजी और सीएमओ ने ग्राम प्रधान और चिकित्सकों की टीम को सम्मानित किया। गांव में 18 से 93 साल के हर व्यक्ति को वैक्सीन की पहली डोज लग चुकी है। टीके की दूसरी डोज भी रोजाना कैंप लगाकर लगवाई जा रही है। 517 लोगों ने यहां वैक्सीनेशन कराया है। एएनएम अलका और आंगनबाड़ी में काम करने वाली कविता, बबली ने भी इसमें मदद की है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

पुरुष प्रधान घाटों की दबंग दुनिया में 6 नावों की मालकिन हैं धनावती देवी

वाराणसी : बनारस के क्षमेश्वर घाट पर बाकी घाटों से ज्यादा चहल पहल है। यहां आंवला नवमी की पूजा चल रही है। महिलाओं का एक छोटा सा समूह है जो पूजा के बाद प्रसाद लेने-देने में व्यस्त है। इसी पूजा स्थान पर लाल साड़ी, हरी चूड़ियां और बड़ी सी लाल बिंदी लगाए धनावती देवी प्रमुख पुजारिन की भूमिका में हैं। आने जाने वालों को बुला-बुलाकर प्रसाद दे रही हैं। पानी पिला रही हैं। जो दुल्हन उनके पास हैं उन्हें प्रसाद घर ले जाने की सलाह दे रही हैं। धनावती की ये अगुआई सिर्फ पूजा में ही नहीं बल्कि क्षमेश्वर घाट पर शायद पहली ऐसी महिला है जिसके पास 6 नाव हैं और वे उनकी मालकिन हैं। बड़ी ही चंचलता और दबंगई से धनावती घाट पर अपनी पैठ बनाने की कहानी भास्कर वुमन से साझा करती हैं।
पुरुषों के घाट में पैठ बनाना मुश्किल था
नाविक समुदाय से आने वाली धनावती बताती हैं, ‘घाट दबंगों की जगह है। अगर आप छीना-झपटी और अपनी बात को पुरजोर तरीके से रखना नहीं जानतीं तो यहां ठहरना मुश्किल है। नाव का व्यवसाय पूरी तरह से पुरुषों की सत्ता है और उनकी सत्ता में कोई सेंध लगाए उन्हें मंजूर नहीं, लेकिन मैंने भी हार नहीं मानी और घाट पर अपनी जगह बनाई। शादी के एक साल के भीतर-भीतर मैं घाट पर आकर बैठ गई। अभी तक तो मैंने ससुराल का रस लेना शुरू ही किया था। हाथों की मेहंदी छूटी ही थी कि मुझसे मेरे पति की परेशानी देखी नहीं गई। वे घर में कमाने वाले अकेले पुरुष थे।
पति को मुझे देखकर दया आती। घर में ससुर, पति और मैं… बस हमारी इतनी ही दुनिया थी। मेरी सास नहीं थीं। उनकी मेहनत देखकर मुझे खुद में मलाल होता कि मैं घर में बैठी हूं और पति इतनी मेहनत कर रहे हैं। मैं यह भी देख रही थी कि घाट पर इनके (पति) साथ बहुत राजनीति होती क्योंकि ये नाव चलाने वाले अकेले होते तो इनकी सवारियां दूसरे नाविक ले लेते। फिर पति स्वभाव में भोले रहे। ज्यादा चालूपंती नहीं है। इसलिए उनके इस स्वभाव का सभी लोग फायदा उठाते। ये सारी स्थितियां देखकर मैंने घाट पर आने की सोची। घाट का पहला दिन मुझे अच्छे से याद है। यहां मेरा स्वागत फूलों से नहीं गालियों से और थप्पड़ों से हुआ।
घाट पर आने पर मुझे झापड़ और गालियां दी गईं
दूर के रिश्ते में लगने वाले जेठ ने मुझे घाट पर आने पर बहुत गालियां दीं। मैं भी तब 18 साल की थी और नई-नई शादी हुई थी तब उन्हें ज्यादा कुछ कह नहीं सकती थी, लेकिन एक दिन हद हो गई। उन्होंने अपनी पत्नी से जाकर मेरी शिकायत की और उनकी पत्नी ने आकर मुझ पर हाथ उठा दिया। मुझे बेशर्म कहा जाने लगा। बस तभी से मैंने भी शर्म-लिहाज का घूंघट उतारकर रख दिया और बराबर की मारपीट की। पहली बार घाट के सभी पुरुषों ने मेरी ‘मुंह दिखाई’ की। मेरे एक कंधे पर मेरा एक साल का बेटा था, लेकिन उस महिला से मार नहीं खाई। उस दिन आरपार की लड़ाई हुई। घाट पर या तो मैं रहती या वे लोग, ये तय कर लिया। पुलिस आई, मामला सलट गया। एक वो दिन था और एक आज का दिन तब से लेकर आज तक किसी ने मुझसे उल्टे मुंह बात नहीं की। अब हम पति-पत्नी आराम से अपना काम करने लगे। पति एक नाव लेकर जाते तब तक मैं दूसरी नाव में दूसरे मल्लाह को बुलाकर बाकी सवारियां बैठा देती। इस तरह हमारी आमदनी बढ़ी।
बचपन से बिंदास और निडर थी
ऐसा नहीं है कि ससुराल में आकर अचानक से मुझमें दबंगई आ गई। मैं बचपन से बिंदास और निडर थी। मेरा जन्म सोनभद्र में हुआ। घर में एक भाई और तीन बहनों में मैं दूसरे नंबर पर, लेकिन सबसे ज्यादा समझदार और जिम्मेदार में ही थी। मुझे लड़कियों की तरह नखरे दिखाना या कमसिन कली बनना बिल्कुल पसंद नहीं रहा। पिता जी मिठाई का काम करते थे और मां घाट पर नाव का ठेका लेतीं। पिता जी गुजर गए और मां बूढ़ी हो गईं। घर की आर्थिक हालत और बिगड़ने लगी। मैं पांचवीं तक ही पढ़ पाई। मेरे ही सिर पर घर की सारी जिम्मेदारी आ गई। मां की जगह मैंने घाट पर जाना शुरू कर दिया। कभी-कभी कम पैसे मिलते तो कभी कमाई होती ही नहीं। ऐसे में बड़ी मुश्किलों से पेट पालना पड़ा। घाट पर भी पुरुषों की दबंगई रहती। एक बार ठाकुर-बामन से मैं झगड़ गई क्योंकि मेरी मजदूरी नहीं दे रहे थे। जब मुझे मेरे पैसे नहीं मिले तो मैं भी उन पुरुषों से डरी या घबराई नहीं। जितनी तेज आवाज में वो बोल रहे थे उतनी तेजी से मैं भी बोली। वो घबरा गए और मेरे पैसे मुझे दे दिए। इसके बाद से मुझे जैसे आदमी मिले मैंने उनके साथ वैसी ही बात की।
अब हूँ 6 नावों की मालकिन
मायके में बेशक कष्ट झेले लेकिन ससुराल में पति ने मेरी सारी ख्वाहिशें पूरी कीं। पहले थोड़ा मिला बाद में भगवान ने जरूरत से ज्यादा दिया। चार लड़के हुए। चारों को पढ़ाया। पति आज भी नाव का ही कारोबार करते हैं। नाविक हैं। पति बहुत अच्छे हैं। 18 साल की उम्र से नाव संभाल रही हूं। आज उम्र 60 है। आज 6 नावों की मालकिन हूं। इनमें से कुछ मोटर वाली हैं और कुछ चप्पू से चलने वाली। बहुएं हैं, पोतियां हैं, पोते हैं। सभी अपने काम में बेहतर तरीके से कर रहे हैं। चार बेटों में से दो बेटे अब इस दुनिया में नहीं रहे। बच्चे पढ़ाई लिखाई में व्यस्त हो गए। एक बेटे ने एमए तक की पढ़ाई की। बेटों के बाद भी नाव का काम मैंने ही संभाला।
खुद की कमाई से बनाया घर
नाव के कारोबार में आमदनी का कोई हिसाब नहीं है। कभी अच्छी कमाई तो कभी कुछ भी नहीं। आज सात पोतियां हैं और आगे उन्हें पढ़ाना है। दो मंजिला घर नाव के काम से और गंगा माई की कृपा से बना पाई हूं। मेरी आदत नहीं है हाथ फैलाने की। मैं दूसरों को देना पसंद करती हूं।
पुरुषों से घबराएं नहीं
पुरुषों से भरे घाटों पर अपनी स्थायी पैठ बना इतना आसान नहीं था। अब लगता है कि महिलाओं को अपने पुरुष की तरह कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहिए। किसी पुरुष से उन्हें घबराना नहीं चाहिए। घाट को हरा-भरा और साफ रखना मुझे पसंद है। यही वजह है कि स्वच्छता प्रहरी से सम्मानित किया गया। क्षमेश्वर घाट की अध्यक्ष भी हूं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

पूर्वांचल की संस्कृति का अंग है भखरा सिन्दूर…

हिन्दू धर्म में सिंदूर लगाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। रामायण और महाभारत में भी इसका जिक्र किया गया है। सिंदूर कई रंग के होते हैं। लाल, नारंगी, गुलाबी व कत्थई, जिनमें नारंगी और गुलाबी रंग के सिंदूर को सबसे शुभ माना जाता है। क्या है इसके पीछे की वजह, बता रही हैं जानी-मानी ज्योतिषाचार्य आरती दहिया…
क्यों अहम है भखरा सिंदूर?
जहां ज्यादातर भारतीय शादियों में सिंदूर लाल रंग का होता है, वहीं बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में सिंदूरदान के लिए नारंगी और गुलाबी रंग के सिंदूर (भखरा सिंदूर) का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा कुछ खास मौकों पर और शुभ कार्यों में भी इस रंग के सिंदूर को विशेष महत्व दिया जाता है। महिलाएं न केवल खुद के लिए भखरा सिंदूर का इस्तेमाल करती हैं, बल्कि देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है।
पौराणिक कथाओं में भी है नारंगी सिंदूर का जिक्र
कथाओं के अनुसार जब हनुमान जी को पता चला कि श्री राम सीता द्वारा सिंदूर लगाए जाने से खुश होते हैं, तो उन्होंने अपना सारा शरीर ही नारंगी सिंदूर से रंग लिया। इसी तरह सिंदूर से रंगकर वे श्री राम की सभा में उनके प्रति अपना समर्पण दिखाने के लिए पहुंचे थे। सिंदूरदान के समय इस रंग के सिंदूर का प्रयोग पति-पत्नी में एक-दूसरे के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
कैसे बनता है ये सिंदूर?
सुहाग के लिहाज से लाल सिंदूर का भी उतना ही महत्व है जितना नारंगी और गुलाबी सिंदूर का। बड़ा अंतर ये है कि नारंगी सिंदूर प्राकृतिक व शुद्ध होता है जबकि लाल सिंदूर में केमिकल युक्त रंगों के मिलावट की गुंजाइश ज्यादा होती है। नारंगी और गुलाबी रंग का सिंदूर प्राकृतिक तरीके से बनाया जाता है। जब इसके फल सूख जाते हैं, तो उसके बीज को पीसकर यह सिंदूर तैयार किया जाता है। इसीलिए यह बिल्कुल सुरक्षित है, इससे बाल या त्वचा को किसी प्रकार का कोई भी नुकसान नहीं होता है।
इस रंग के सिंदूर से क्यों होती हैं शादियां?
डॉ. दहिया बताती हैं कि इसके पीछे का तर्क बेहद अनूठा है। दरअसल शादियां देर रात शुरू होती हैं और खत्म होते-होते पौ फटने को होता है। सिंदूरदान का समय आते-आते सुबह होने वाली होती है, इसलिए इस सिंदूर की तुलना सूर्योदय के समय होने वाली उस लालिमा से की जाती है जो हल्के नारंगी रंग की दिखाई पड़ती है। उम्मीद की जाती है कि जिस तरह सूरज की किरणें हर दिन लोगों के जीवन में एक नई सुबह, दिव्य ऊर्जा और खुशहाली लेकर आती है, उसी तरह ये सिंदूर दुल्हन की जिंदगी में नया सवेरा लेकर आए। रात से लेकर सुबह तक होने वाली रस्मों के पीछे यही मान्यता होती है कि परिवार के कुटुंब के साथ ही चांद, तारे और सूर्य सभी विवाह के साक्षी बन सकें।
(साभार – दैनिक भास्कर)

शादी में वर-वधू को दीजिए ये 5 वित्तीय उपहार

शादी-विवाह के अवसर पर अमूमन नगद या वस्तु उपहार स्वरूप दूल्हे या दुल्हन को दिया जाता है। पर बदलती ज़रूरतों के चलते इन्हें संभालना दोनों के लिए मुश्किल हो सकता है ख़ासतौर पर तब जब जोड़े को किसी एक शहर या राज्य से दूसरे राज्य या शहर जाना पड़े। उपहार ऐसा होना चाहिए जो नए जीवन की शुरुआत में सहायक तो हो ही साथ ही भविष्य को सुरक्षित रखने में भी उनकी मदद कर सके।

गिफ्ट कार्ड

सभी बैंक विभिन्न मूल्यों के गिफ्ट कार्ड जारी करते हैं। उपहार में नगद राशि के बजाए इन कार्ड को दिया जा सकता है, ताकि उससे मनपसंद और ज़रूरत का सामान ख़रीद सकें। इसके अलावा प्री पेड कार्ड भी उपहार में दे सकते हैं।

इंश्योरेंस प्लान

विवाह के साथ एक नए पारिवारिक जीवन की शुरुआत होती है और इस अवसर पर बीमा भविष्य सुरक्षा की दृष्टि से एक बेहतर उपहार हो सकता है। अपनी सुविधा के अनुसार सिंगल प्रीमियम पॉलिसी, लाइफ इंश्योरेंस प्लान या कोई अन्य प्लान उनकी ज़रूरत के हिसाब से दे सकते हैं। सिंगल प्रीमियम प्लान में पूरी प्रीमियम की राशि एक मुश्त दे सकते हैं। वहीं अन्य किसी इंश्योरेंस प्लान जैसे मेडिकल या लाइफ इंश्योरेंस आदि में एक साल का प्रीमियम स्वयं भर सकते हैं। मेडिकल इंश्योरेंस में मैटरनिटी बेनिफिट वाला प्लान उनके काफ़ी काम का हो सकता है। हालांकि इन प्लान के बारे में एक बार दूल्हा-दुल्हन से चर्चा कर सकते हैं। इंश्योरेंस पॉलिसी ख़रीदने के लिए आधारकार्ड और फोटो की आवश्यकता होगी।

बैंक एफ डी

बैंक में वर वधू के साथ चर्चा और सहयोग से एकमुश्त राशि का तीन वर्ष या जैसे चाहें फिक्स डिपॉज़िट कर उपहार के तौर पर दे सकते हैं। उनके भविष्य में पड़ने वाली ज़रूरत के लिए यह सबसे अच्छा उपहार माना जा सकता है।

शेयर का उपहार

किसी ऐसी कंपनी के शेयर ले सकते हैं, जो लंबे समय में बेहतर मुनाफ़ा दें। इसके लिए शेयर ख़रीदकर उसे उनके डीमैट अकाउंट में ट्रांसफर कर सकते हैं। इसके लिए डिलीवरी इंस्ट्रक्शन स्लिप भरना होगा। चाहें तो गिफ्ट डीड रजिस्टर करा सकते हैं। ऑनलाइन शेयर ट्रांसफर करने की प्रक्रिया बहुत आसान है। गिफ्ट भेजने वाले को गिफ्ट प्राप्त करने वाले का मोबाइल नंबर देना होगा और डीमैट खाते की जानकारी भरनी होगी।

ब्लू चिप स्टॉक…

ब्लू चिप स्टॉक कई बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के शेयर होते हैं। यह लंबे समय के निवेश के लिए बेहतर है। शेयर की क़ीमत ज़्यादा होने के कारण शेयर की क़ीमत बढ़ती है, तो फ़ायदा भी ज़्यादा होता है, जो लगाई गई रकम का कई गुना होता है।

सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड

अगर किसी को सोना गिफ्ट कर रहे हैं, तो वह सिर्फ़ लॉकर में रखा रहेगा या कम ही पहना जाएगा। ऐसे में यदि सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड देंगें, तो ये 2.5 फीसदी की दर से वार्षिक ब्याज भी देगा। इन्हें बैंक, स्टॉक होल्डिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, पोस्ट ऑफिस और मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज से भी ख़रीद सकते हैं। ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन कर सकते हैं या आरबीआई की वेबसाइट से केवायसी फॉर्म डाउनलोड कर सकते हैं या इसे अधिकृत शाखाओं से ख़रीद सकते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

नौकरी बदलने पर खुद ही ट्रांसफर हो जाएगा पीएफ खाता, सेंट्रलाइज आई टी सिस्टम को मंजूरी

नयी दिल्ली : नौकरी बदलने के बाद आपका पीएफ खाता खुद ब खुद नए अकाउंट में ट्रांसफर या मर्ज हो जाएगा। दिल्ली में गत शनिवार को ईपीएफओ बोर्ड की बैठक में पीएफ अकाउंट के सेंट्रलाइज आईटी सिस्टम को मंजूरी दी गई। अभी तक अकाउंट ट्रांसफर कराने का यह काम खुद करना होता है। इसके लिए पुरानी और नई कंपनी में कुछ कागजी औपचारिकताएं होती हैं जिन्हें पूरा करना होता है। इन कागजी कार्यवाही के चलते कई लोग पुरानी कंपनी में PF का पैसा छोड़ देते हैं।

पीएफ पर ब्याज को लेकर कोई निर्णय नहीं
लोगों को उम्मीद थी कि इसमें एम्प्लॉई पेंशन स्कीम (ईपीएस) के तहत मिलने वाली न्यूनतम पेंशन और पीएफ पर मिलने वाले ब्याज पर फैसला हो सकता है। लेकिन इस मीटिंग में इसको लेकर कोई निर्णय नहीं लिया गया। अभी पीएफ पर 8.5% सालाना ब्याज दिया जा रहा है।
ईपीएफओ की बोर्ड मीटिंग में कर्मचारियों के कुल सालाना जमा के 5% तक को बुनियादी ढांचा निवेश ट्रस्टों (इनविट्स) सहित वैकल्पिक निवेशों में डालने को मंजूरी दे दी है। सरकार कर्मचारियों के जमा पर ज्यादा रिटर्न कमाना चाहती है ताकि उन्हें ज्यादा ब्याज दिया जा सके।
पीएफ पर ब्याज के कम होने की उम्मीद नहीं
पर्सनल फाइनेंस एक्सपर्ट और ऑप्टिमा मनी मैनेजर्स के संस्थापक व सीईओ पंकज मठपाल कहते हैं कि सरकार इस समय कर्मचारियों के पैसों को ऐसी जगह निवेश करने के साधन ढूंढ रही है जहां से ज्यादा रिटर्न मिल सके। इसके अलावा 2022 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी है। इसके चलते 2021-22 के लिए PF ब्याज दर में कटौती करके सरकार 6 करोड़ पीएफ खाताधारक को नाराज नहीं करना चाहेगी।

एयरटेल के प्रीपेड प्लान हुए महँगे, कीमतें 20-25 प्रतिशत बढ़ीं

नयी दिल्ली : दूरसंचार परिचालक भारती एयरटेल ने विभिन्न प्रीपेड पेशकश के लिए टैरिफ में 20-25 प्रतिशत बढ़ोतरी की घोषणा की, जिसमें टैरिफ वॉयस प्लान, असीमित वॉयस बंडल और डेटा टॉप अप शामिल हैं।
शुरुआती स्तर के वॉयस प्लान में लगभग 25 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है, जबकि अनलिमिटेड वॉयस बंडल के ज्यादातर मामलों में बढ़ोतरी लगभग 20 फीसदी है।
कंपनी ने कहा कि उसने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि मोबाइल प्रति उपयोगकर्ता औसत राजस्व (एआरपीयू) 200 रुपये और आखिरकार 300 रुपये होना चाहिए, ताकि पूंजी पर उचित प्रतिफल मिल सके। एयरटेल ने एक बयान में कहा, ‘‘हम यह भी मानते हैं कि एआरपीयू के इस स्तर से नेटवर्क और स्पेक्ट्रम में जरूरी पर्याप्त निवेश किया जा सकेगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे एयरटेल को भारत में 5जी लागू करने के लिए मदद मिलेगी।’’
नए टैरिफ 26 नवंबर 2021 से लागू होंगे। शुरुआती वायस प्लान का टैरिफ 28 दिनों की वैधता के साथ मौजूदा 79 रुपये की जगह अब 99 रुपये होगा। इसमें 50 प्रतिशत अधिक टॉकटाइम (99 रुपये), 200 एमबी डेटा और एक पैसा प्रति सेंकेंड का वॉयस टैरिफ जैसे लाभ शामिल हैं।

ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वीर चक्र से सम्मानित

नयी दिल्ली : वायुसेना के ग्रुप कैप्टन अभिनंदन वर्धमान को उनके अदम्य शौर्य और साहस के लिए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने वीर चक्र से सम्मानित किया। अभिनंदन ने 2019 में पाकिस्तान के साथ हवाई संघर्ष के दौरान दुश्मन के एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया था और उन्हें उस देश में तीन दिन तक बंधक बनाकर रखा गया था।
पुरस्कार के साथ दिए गए प्रशस्ति पत्र में कहा गया है कि वायुसेना के लड़ाकू पायलट को हवाई संघर्ष के दौरान “कर्तव्य की असाधारण भावना” प्रदर्शित करने के लिए भारत के तीसरे सबसे बड़े युद्धकालीन वीरता पदक से सम्मानित किया गया है।


राष्ट्रपति भवन में आयोजित पुरस्कार समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और कई अन्य गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए। इस अवसर पर कई अन्य सैन्य अधिकारियों को भी सम्मानित किया गया। इस महीने की शुरुआत में, वायुसेना ने वर्धमान की पदोन्नति ग्रुप कैप्टन के रूप में की थी। पाकिस्तान के साथ हुए हवाई संघर्ष के दौरान उनकी रैंक विंग कमांडर की थी।
राष्ट्रपति भवन ने ट्वीट किया, “राष्ट्रपति कोविंद ने विंग कमांडर (अब ग्रुप कैप्टन) वर्धमान अभिनंदन को वीर चक्र प्रदान किया। उन्होंने अदम्य शौर्य और साहस दिखाया, व्यक्तिगत सुरक्षा की परवाह न करते हुए शत्रु के सामने वीरता प्रदर्शित की और कर्तव्य की असाधारण भावना का प्रदर्शन किया।”अभिनंदन ने अपने मिग-21 बाइसन लड़ाकू विमान के गिरने से पहले 27 फरवरी, 2019 को पाकिस्तान के एक एफ-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया था। भारत द्वारा बालाकोट में आतंकी ठिकाने पर किए गए हवाई हमले के एक दिन बाद पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की कोशिश की थी। सरकार ने वर्धमान को वीर चक्र प्रदान करने के निर्णय की घोषणा 2019 में की थी।

रिजर्व बैंक की सिफारिशों से डिजिटल ऋण क्षेत्र की वृद्धि को मिलेगा प्रोत्साहन : विशेषज्ञ

मुम्बई : डिजिटल ऋण (ऑनलाइन मंचों और मोबाइल ऐप सहित) पर भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यसमूह की सिफारिशों से इस क्षेत्र की क्रमिक वृद्धि को प्रोत्साहन मिलेगा। उद्योग विशेषज्ञों ने यह राय जताई है।
रिजर्व बैंक के बनाए गए कार्यसमूह ने अपनी एक व्यापक रिपोर्ट में कई सिफारिशें की हैं। इसमें गैरकानूनी डिजिटल ऋण गतिविधियों पर अंकुश के लिए एक अलग कानून, डिजिटल ऋण देने वाले ऐप का नोडल एजेंसी से सत्यापन और एक स्व-नियामक संगठन (एसआरओ) की स्थापना का सुझाव शामिल है।
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज ने कहा है कि यह प्रस्ताव काफी हद तक रचनात्मक और अपेक्षा के अनुरूप है। उसके बयान में कहा गया है कि नियमनों की शुरुआत डिजी-ऋण की वृद्धि दर को कम कर सकती है। चीन और भारत (पी2पी) जैसे देशों में छोटे से समय में इसमें काफी तेज वृद्धि देखी गई है।
इस नोट में कहा गया है कि इन नियमों से हालांकि दीर्घावधि में सुचारू तरीक से वृद्धि देखने को मिलेगी। एंड्रोमेडा और अपनापैसा के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) वी स्वामीनाथन ने कहा कि डिजिटल ऋण के विस्तार की गति को देखते हुए उपभोक्ताओं के हितों का संरक्षण अब अधिकारियों के साथ उद्योग के खिलाड़ियों के लिए भी सबसे महत्वपूर्ण हो गया है।
उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक के कार्यसमूह ने गैरकानूनी डिजिटल ऋण गतिविधियों को रोकने के लिए अलग कानून और डिजिटल ऋण देने वाले पारिस्थितिकी तंत्र में प्रतिभागियों के लिए स्व नियामक संगठन का जो सुझाव दिया है, वह पूरी तरह से उचित प्रतीत होता है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उपभोक्ताओं का डिजिटल ऋण देने वाली कंपनियों पर भरोसा कायम रहे। कार्यसमूह ने इस क्षेत्र की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।’’ इन सिफारिशों का स्वागत करते हुए फिनटेक एसोसिएशन फॉर कंज्यूमर एम्पावरमेंट (फेस) ने कहा कि उद्योग की संरचना और फिनटेक सदस्यों और ग्राहकों के लिए नियम निर्धारित करने के लिए एसआरओ समय की मांग है।
फेस ने बयान में कहा, ‘‘हम डिजिटल ऋण देने वाले मंचों के लिए नैतिक व्यवहार और आचार-संहिता के उच्च मानकों को लाने के लिए रिजर्व बैंक के कदम का स्वागत करते हैं।’’इंडिया लेंड्स के संस्थापक और सीईओ और डिजिटल लेंडिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (डीएलएआई) के संस्थापक सदस्य गौरव चोपड़ा का मानना ​​है कि ऐप पर उपयोगकर्ता द्वारा की गई प्रत्येक कार्रवाई के लिए ‘ऑडिटेबल लॉग’ जैसी सिफारिशें भारत के डिजिटल ऋण उद्योग के लिए पासा पलटने वाली साबित होगी।
रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए साइंजी के सह-संस्थापक और सीईओ अंकित राता ने कहा कि यदि सिफारिशें स्वीकार हो जाती हैं, तो ये न केवल उपभोक्ताओं के संरक्षण में मददगार होंगी, बल्कि धोखाधड़ी वाले लेनदेन पर अंकुश लगाते हुए डेटा गोपनीयता के उल्लंघन को भी रोकेंगी।

 

एसबीआई ने अब तक नहीं लौटाए जन-धन खाताधारकों से वसूले गए 164 करोड़ रुपये : रिपोर्ट

नयी दिल्ली : भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने अप्रैल, 2017 से लेकर दिसंबर, 2019 के दौरान प्रधानमंत्री जन-धन योजना के खाताधारकों से डिजिटल भुगतान के एवज में वसूले गए 164 करोड़ रुपये के अनुचित शुल्क को अभी तक लौटाया नहीं है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-मुंबई की तरफ से जन-धन खाता योजना पर तैयार एक रिपोर्ट के मुताबिक इस शुल्क राशि को वापस लौटाने का सरकार से निर्देश मिलने के बाद भी अभी तक सिर्फ 90 करोड़ रुपये ही खाताधारकों को लौटाए गए हैं। अभी 164 करोड़ रुपये की राशि लौटाई जानी बाकी है।
इस रिपोर्ट के मुताबिक, एसबीआई ने अप्रैल, 2017 से लेकर सितंबर, 2020 के दौरान जन-धन योजना के तहत खोले गए साधारण बचत खातों से यूपीआई एवं रुपे लेनदेन के एवज में कुल 254 करोड़ रुपये से अधिक शुल्क वसूला था। इसमें प्रति लेनदेन बैंक ने खाताधारकों से 17.70 रुपये का शुल्क लिया था। इस बारे में स्पष्टीकरण के लिए भेजे गए सवालों का देश के सबसे बड़े बैंक ने कोई जवाब नहीं दिया। हालांकि, यह तथ्य है कि किसी भी दूसरे बैंक के उलट एसबीआई ने जन-धन खाताधारकों द्वारा डिजिटल लेनदेन करने पर शुल्क वसूलना शुरू कर दिया था। एक महीने में चार से अधिक निकासी करने पर बैंक 17.70 रुपये प्रति लेनदेन का शुल्क ले रहा था। एसबीआई के इस कदम ने सरकार के आह्वान पर डिजिटल लेनदेन करने वाले जन-धन खाताधारकों पर प्रतिकूल असर डाला। इस रिपोर्ट के मुताबिक, एसबीआई के इस रवैये की अगस्त, 2020 में वित्त मंत्रालय से शिकायत की गई थी जिसने फौरन कदम उठाया।
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने 30 अगस्त, 2020 को बैंकों के लिए यह परामर्श जारी किया कि एक जनवरी, 2020 से खाताधारकों से लिए गए शुल्क को वापस कर दिया जाए। इसके अलावा भविष्य में इस तरह का कोई शुल्क नहीं वसूलने को भी कहा गया।
इस निर्देश के बाद एसबीआई ने 17 फरवरी, 2021 को जन-धन खाताधारकों से डिजिटल लेनदेन के एवज में लिए गए शुल्क को लौटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। रिपोर्ट तैयार करने वाले सांख्यिकी प्रोफेसर आशीष दास कहते हैं कि अब भी इन खाताधारकों के 164 करोड़ रुपये लौटाए जाने बाकी हैं।