ऋग्वेद की वाणी पर वैज्ञानिकों के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे की मुहर
प्रयागराज : अपने पूर्वजों से सुनते आए पवित्र सरस्वती नदी की कहानियाँ सिर्फ कहानी ही नहीं, बल्कि अखंड सच्चाई है। इस बात की पुष्टि समय-समय पर विज्ञान शोधों में मिलने वाले सबूत करते रहते हैं। अब तक मान्यता यही रही है कि हिंदुओं की धर्मनगरी प्रयागराज में तीन प्राचीन एवं पवित्र नदियों- गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। अब भारतीय वैज्ञानिकों को संगम के नीचे लगभग 12,000 साल पुरानी नदी मिली है। माना जा रहा है कि यह ऋग्वैदिक काल की पूज्य और अब विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी हो सकती है।
वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे में इस बात के ठोस प्रमाण मिले हैं कि संगम के नीचे 45 किलोमीटर लंबी यह प्राचीन नदी मौजूद है। वर्तमान में इस संगम तट पर गंगा और यमुना नदियों का मिलन होता है। ऐसे में इन दोनों की तलहटी में मौजूद सरस्वती नदी में जल का विशाल भंडार होने का अनुमान है। सीएसआईआर – एनजीआईआर के वैज्ञानिकों के इस संयुक्त अध्ययन को अडवांस्टड अर्थ एंड स्पेस साइंस में प्रकाशित किया गया है।
दरअसल, वैज्ञानिक इस बात का पता कर रहे थे कि पानी की बढ़ती खपत के कारण गंगा और यमुना नदी पर कितना प्रभाव पड़ रहा है। नदियों पर पड़ने वाले प्रभाव का सीधा असर पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर पड़ता है। नदियों को रीचार्ज करने वाली जमीन के नीचे मौजूद पुरातन नदियों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी हासिल करना चाह रहे थे, क्योंकि नदियों को सिर्फ हिमालय जैसे ग्लेशियरों से ही नहीं, बल्कि भूतल में मौजूद नदियों से भी जल मिलता है। इस का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक इस क्षेत्र का थ्री डी मैपिंग करने के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे कर रहे थे।
वैज्ञानिकों ने पाया कि विंध्य फॉर्मेशन के अंतर्गत आने वाली एक अति प्राचीन नदी गंगा और यमुना की तलहटी में मौजूद है। इस प्राचीन नदी (पैलियोरीवर) का एक्वीफर सिस्टम और पुरातन नहरें आपस में जुड़ी हुई हैं और एक-दूसरे की पानी की जरूरतों को पूरा कर रही हैं। इस प्राचीन नदी की लंबाई 45 किलोमीटर, चौड़ाई 4 किलोमीटर और गहराई 15 मीटर है। इसमें 2700 एमसीएम रेत है और जब यह पानी से पूरी तरह भरी रहती है तो यह जमीन के ऊपर 1300 से 2000 वर्ग किलोमीटर के इलाके को सिंचित करने योग्य भूजल देती है। 1000 एमसीएम जल क्षमता वाली यह नदी गंगा और यमुना में जल के स्तर को संतुलित करने का भी काम करती है।
हिंदू धर्मग्रंथों में कहा गया है कि गंगा, यमुना और सरस्वती का उद्गम स्थल हिमालय है। अध्ययन में इस बात को माना गया है कि खोज में मिली यह नदी संभवत: हिमालय तक जाती है। नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजेआरआई) के निदेशक ने बताया कि यह नदी धरती की 10 मीटर नीचे गहराई में स्थित है और 10,000 से 12,000 साल पुरानी है। उन्होंने कहा कि समुचित अध्ययन के बाद ही नदी के सही उम्र के बारे में जानकारी दी जा सकती है। उन्होंने बताया कि सर्वे का काम जारी है और अभी तक पता चला है यह नदी कानपुर की ओर बह रही है।
गौरतलब है कि प्राचीन नदियों की खोज के लिए जल संसाधन मंत्रालय द्वारा गठित 7 सदस्यीय आयोग ने 2016 में अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भूतल में प्राचीन नदी सरस्वती के बहने के साक्ष्य मौजूद हैं। साल 2018 में मंत्रालय ने राजस्थान और हरियाणा में सरस्वती नदी की खोज को लेकर काम शुरू किया गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय से निकलने वाली प्राचीन नदी अरब सागर में जाकर मिलती थी। (साभार – ऑप इंडिया)
कोलकाता : होम्योपैथिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (होमाई ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रामजी सिंह ने आयुष नेशनल टास्क फोर्स, एसोचैम के अध्यक्ष डॉ सुदीप्त नारायण रॉय को सम्मानित किया। सम्मान समारोह का आयोजन राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ साहिदुल इस्लाम द्वारा किया गया था, जिसमें अन्य राष्ट्रीय पदाधिकारी जैसे डॉ अरुण भस्मे, डॉ सुरेश नडाल भी उपस्थित थे।
डॉ रॉय ने समारोह में मौजूद होम्योपैथी बिरादरी से 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का हिस्सा बनने की अपील की, क्योंकि महामारी संकट समाज के लिए एक आंख खोलने वाला था कि होम्योपैथी कैसे सुरक्षित और प्रभावी है। महामारी के पहले नौ महीनों में आयुष खंड में 44 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। डॉ रॉय ने यह भी उल्लेख किया कि विश्व स्तर पर 2027 तक होम्योपैथी उत्पाद बाजार 18.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर होने जा रहा है। भारतीय होम्योपैथी की महत्वपूर्ण भूमिका है। आयुष मंत्रालय आयुष के वैश्वीकरण के बारे में सक्रिय है, होम्योपैथी सबसे आगे चल सकती है क्योंकि यह विश्व स्तर पर चिकित्सा की दूसरी सबसे बड़ी प्रणाली है।
डॉ रॉय ने कहा कि महामारी संकट में एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उन्हें विश्वास है कि अगर ओमिक्रॉन के कारण कोई संकट होता है, तो आयुष मंत्रालय निश्चित रूप से एक समाधान के साथ आएगा जैसा कि उन्होंने आर्सेनिक एल्बम 30 के साथ संकट की पहली लहर के दौरान किया था।
डॉ रॉय ने कहा, अगर पश्चिम बंगाल सरकार और आयुष मंत्रालय, भारत सरकार एसोचैम द्वारा प्रस्तावित होम्योपैथी हब के लिए सहयोग कर सकते हैं, आयुष के वैश्वीकरण की दिशा में भारतीय होम्योपैथी उद्योग द्वारा महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, प्रसिद्ध पुरुष के पीछे खड़ी स्त्री के योगदान को तो समाज स्वीकार करता है लेकिन उस स्त्री की अलहदा पहचान को अक्सर नज़रंदाज़ किया जाता है। स्त्री का महत्व इसी में माना जाता है कि वह पुरुष के पीछे खड़ी होकर उसे संभालती रही, घर-परिवार के सारे दायित्व निभाती रहे और पति तथा उसकी उपलब्धियों को देखकर गदगद होती रहे। इस त्याग के महिमा मंडित इतिहास में स्त्री का अपना अस्तित्व धीरे- धीरे धूमिल होता जाता है। समाज हो या साहित्य लोक प्रसिद्ध पति की महिमा के समक्ष पत्नी को अनायास भुला दिया जाता है। जगत प्रसिद्ध तुलसीदास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से कौन परिचित नहीं हैं। लेकिन रत्नावली का नाम कितनों को याद है ? अगर याद हो भी तो तुलसीदास की पत्नी के रूप में भले याद हो जिनसे तुलसीदास अंधप्रेम करते थे और जिनके फटकारने पर तुलसीदास प्रात:स्मरणीय तुलसीदास बने। उसके बाद तुलसी तो प्रसिद्ध हो गये लेकिन रत्नावली उपेक्षा के अंधकार में गुम हो गईं। तुलसीदास की रचनाओं को जन- जन ने सराहा लेकिन रत्नावली की रचनात्मकता को किसी ने याद नहीं रखा। जी हाँ, रत्नावली भी साहित्य-सृजन करती थीं। उनके दोहों का साहित्यिक महत्त्व तो अवश्य है लेकिन उनका उल्लेख ना के बराबर मिलता है। तुलसीदास के आभामंडल के आलोक में रत्नावली के दोहों की आभा मंद पड़ गई लेकिन इससे उनका योगदान कम नहीं होता।
श्री मुरलीधर चतुर्वेदी ने “रत्नावली-चरित” के नाम से रत्नावली देवी की जीवनी लिखी है जिसे उनका प्रामाणिक जीवन वृत्तांत माना जाता है। उस पुस्तक के अनुसार रत्नावली का जन्म उत्तर प्रदेश के एटा जिले के बदरिया नामक गाँव में संवत् 1577 में हुआ था। एक और मत के अनुसार उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का एक गाँव उनका जन्म स्थान है। उनके पिता का नाम पंडित दीनबंधु पाठक और माता का नाम दयावती था। तुलसीदास से उनका विवाह 12 वर्ष की आयु में 1589 में और गौना 1593 में हुआ। उस घटना को सभी जानते हैं जब तुलसीदास की पत्नी अपने मायके में थीं और उनके वियोग को न सह पाने के कारण अंधेरी रात में मूसलाधार बरसात की परवाह न करते हुए, नाव और नाविक के अभाव में शव के सहारे नदी पारकर, दरवाजा बंद पाकर ऊपर की मंजिल पर चढ़ने के लिए साँप को रस्सी की तरह पकड़कर, तुलसीदास उनसे मिलने पहुँचे थे लेकिन पत्नी ने उनकी अधीरता देखकर क्षोभ से भरकर उन्हें फटकारते हुए कहा था-
“लाज न लागत आपको दौरे आयहु साथ।
धिक धिक ऐसे प्रेम को कहा कहौं मैं नाथ॥”
साथ ही उन्होंने यह भी कहा जिससे तुलसीदास के ज्ञान-चक्षु खुल गए-
“अस्थि-चर्म-मय देह मम तामै जैसी प्रीति।
तैसी जौ श्रीराम महँ होति न तौ भवभीति॥”
इस बात से तुलसीदास जी इस कदर आहत हुए कि उन्होंने रत्नावली को त्याग दिया, गृहस्थ जीवन से वैराग्य ले लिया और काशी चले गए। रत्नावली की उम्र उस समय 27 वर्ष थी। पति द्वारा त्याग दिए जाने के बाद वह भी जीवन से विरक्त होकर साध्वी बन गईं। रत्नावली अगर तुलसीदास को फटकारती नहीं तो संभवतः वह एक साधारण गृहस्थ ही बने रहते लेकिन इस घटना के बाद रामबोला तुलसीदास के रूप में प्रसिद्ध हुए और रत्नावली का जीवन दुख और अवसाद से घिर गया। भारतीय समाज में जहाँ विवाहिता स्त्री को पति की छाया माना जाता है वहाँ रत्नावली की स्थिति का अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। उन्होंने पूरी उम्र पति के स्मृतियों को सहेजते हुए में गुजार दी और 74 वर्ष की आयु में संवत् 1651 में इस निष्ठुर संसार को त्याग कर चली गईं।
साहित्य और लोकस्मृति दोनों ने रत्नावली की रचनात्मक प्रतिभा का मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने बहुत से दोहों की रचना की है। इन दोहों में उनकी पीड़ा का मर्मस्पर्शी अंकन हुआ है। संभवतः जीवन भर उनको तुलसीदास के चले जाने का मलाल रहा और उस पीड़ा को उन्होंने बड़े दर्द के साथ अपने दोहों में पिरोया है। तुलसीदास से की गई उनकी क्षमायाचना ह्रदय को व्यथित कर देती है-
“छमा करहु अपराध सब, अपराधिन के आय।
बुरी भली हौं आप की, तजौं न लेहु निभाय।।”
लेकिन स्त्री को समाज सहजता से क्षमादान नहीं देता। रत्नावली भी जीवन भर परिताप की अग्नि में झुलसती रहीं। अपने जीवन के सूनेपन को उन्होंने पति की स्मृतियो से भरा और उनकी प्रतीक्षा में जीवन व्यतीत करती रहीं। यह दोहा देखिए जिसमें एक साधारण स्त्री की तरह वह अपने भाग्य को कोसती हुई दिखाई देती हैं-
“कहाँ हमारे भाग अस, जो पिय दरसन देयँ।
वाहि पाछिली दीठि सों, एक बार लषि लेयँ।।”
उनकी तड़प और प्रतीक्षा का एक और उदाहरण देखिए-
“कबहुँ कि ऊगै भाग रवि, कबहुँ कि होइ बिहान।
कबहुँ कि बिकसै उर कमल, रतनावलि सकुचान।।”
भारतीय समाज में पति विहीन स्त्री की पीड़ा को रत्नावली ने अपने दोहों में गहराई से उभारा है। नारी किस तरह पति विहीन होकर समाज में हीन या पानी बिन मीन की तरह हो जाती है, इसके अनेक उदाहरण उनके दोहों में सहज ही मिल जाते हैं-
“रतनावलि भवसिंधु मधि, तिय जीवन की नाव।
पिय केवट बिन कौन जग, षेय किनारे लाव।।”
वह उस नारी को ही सौभाग्यशाली मानती हैं जो अपने अपने पति के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती हैं-
“नारि सोइ बड़भागिनी, जाके पीतम पास।
लषि लषि चष सीतल करै, हीतल लहै हुलास।।”
पति की उपेक्षा के बावजूद वह पति का नाम उसी तरह अपने ह्रदय में बसाकर रखती हैं जैसे भक्तगण अपने ह्रदय में अपने आराध्य का नाम अंकित करके संतोष और प्रसन्नता से भरे रहते हैं। अपने रामभक्त पति को अपने ह्रदय में बसाकर वह एक साथ दोनों लोकों को साधकर अपने जीवन को सफल समझकर संतोष पा लेती हैं-
“राम जासु हिरदे बसत, सो पिय मम उर धाम।
एक बसत दोउ बसैं, रतन भाग अभिराम।।”
रत्नवली देवी ने अपने दोहों के माध्यम से समाज को नैतिकता की शिक्षा देने का प्रयास भी किया है। उनके छोटे -छोटे दोहों में जीवन का सार भरा दिखाई देता है। जीवन में विवेक के महत्त्व को स्वीकारते और समझाते हुए वह कहती हैं-
“तरुनाई धन देह बल, बहु दोषुन आगार।
बिनु बिबेक रतनावली, पसु सम करत विचार॥”
इसी तरह शील के समान बहुमूल्य भूषण कोई दूसरा नहीं है, इसकी ओर भी वह गंभीरता पूर्वक संकेत करती हैं। उनका कहना है कि शील के बिना ढेरों आभूषण व्यर्थ हैं-
“भूषन रतन अनेक नग, पै न सील सम कोइ।
सील जासु नैनन बसत, सो जग भूषण होइ॥”
आज हम बहुत सी दुकानों पर लिखा हुआ पढ़ते हैं कि “उधार प्रेम की कैंची है” या यह कहते हैं कि पैसों और कर्ज से रिश्ते खराब होते हैं। इसी बात को रत्नावली जी अपने दोहों में सहजता से पिरो देती हैं कि उधार प्रेम को नष्ट कर देता है –
”स्वजन सषी सों जनि करहु, कबहूँ ऋन ब्यौहार।
ऋन सों प्रीति प्रतीत तिय, रतन होति सब छार॥”
हम सभी जब किसी के.लिए कुछ करते हैं तो मन में प्रतिदान की सहज आकांक्षा होती है लेकिन कवयित्री इसकी मनाही करती हुई उपकार के बदले कुछ भी प्रतिदान न मांगने की हिदायत देती हैं-
“रतन करहु उपकार पर, चहहु न प्रति उपकार।
लहहिं न बदलो साधुजन, बदलो लघु ब्यौहार॥”
संतान अगर अच्छी न हो तो निसंतान रहना भला, इस बात को सब स्वीकारते हैं। रत्नावली भी बड़ी गंभीरता से यह बात कहती हैं
“रतन बाँझ रहिबो भलौ, भले न सौउ कपूत।
बाँझ रहे तिय एक दुष, पाइ कपूत अकूत॥ ”
और सपूत किस तरह कुल और परिवार की मान बढ़ाता है, इस ओर भी वह संकेत करती हैं-
“कुल के एक सपूत सों, सकल सपूती नारि।
रतन एक ही चँद जिमि, करत जगत उजियारि॥”
सच्चे स्नेही अर्थात मित्र या प्रियजनों पहचान बताते हुए वह मुश्किल समय में साथ देनेवालों की ही सच्चा संबंधी मानती हैं
“सोइ सनेही जो रतन, करहिं विपति में नेह।
सुष संपति लषि जन बहुरि, वनें नेह के गेह॥
जीवन में संगति के महत्व पर तकरीबन सभी भक्त कवियों ने प्रकाश डाला है। रत्नावली के दोहों को पढ़ते हुए कबीर, तुलसी, रहीम के दोहों की याद हो आती है। वह दुर्जन व्यक्ति की संगति से बचने को कहती हैं, भले ही वह कितना भी गुणवान क्यों न हो-
“भलें होइ दुरजन गुनी भली न तासौ प्रीति।
विषधर मनिधर हू रतन, डसत करत जिमि भीति॥”
ब्रजभाषा में रचित रत्नावली के दोहों में जीवन का गूढ़ सत्य तो है ही मित्रवत सलाह भी है जिसे अपनाकर जीवन सहज और सफल हो सकता है। दुख इस बात का है कि रत्नावली के साहित्यिक अवदान के विषय में कम ही लोग जानते हैं। इनके दोहों में जीवन का मर्म छिपा हुआ है। साथ ही परित्यक्त स्त्री की पीड़ा को गहराई से महसूस किया जा सकता है। प्रिय वियोग की व्याकुलता का तीव्र आर्तनाद उनके दोहों का मुख्य स्वर है-
“असन बसन भूषन भवन, पिय बिन कछु न सुहाय।
भार रूप जीवन भयो, छिन छिन जिय अकुलाय॥”
दिसम्बर का महीना देश को बड़ा सदमा दे गया। एक दुर्भाग्यजनक हादसे में देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत को हमने खो दिया। जनरल पत्नी मधुलिका समेत हमसे विदा हो गए। दोनों विवाह की वेदी से चिता तक साथ रहे। 36 साल पहले दोनों ने अग्नि के सात फेरे लेकर साथ निभाने का वचन दिया था, जिसे मुखाग्नि तक निभाया। दिल्ली के आर्मी कैंट में जनरल रावत और उनकी पत्नी की पार्थिव देह को एक ही चिता पर अंतिम विदाई दी गई। दोनों बेटियों कृतिका और तारिणी ने एकसाथ उन्हें मुखाग्नि दी।
जनरल रावत की अंतिम यात्रा भावुक कर देने वाली रही। सेना के किसी सर्वोच्च अफसर की अंतिम यात्रा के लिए शायद ही दिल्ली में कभी ऐसी भीड़ उमड़ी हो। पूरे रास्ते पर लोगों ने फूल बरसाए और शव वाहन के साथ-साथ तिरंगा लेकर दौड़े। नारे लगाते रहे- जनरल बिपिन रावत अमर रहें। अंतिम संस्कार के दौरान पूरा आर्मी कैंट भारत माता की जय के नारों से गूंजता रहा। तीनों सेनाध्यक्षों और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने जनरल रावत को अंतिम श्रद्धांजलि दी। उन्हें 17 तोपों की सलामी दी गई और इस दौरान 800 सैन्य कर्मी मौजूद थे। जनरल रावत और उनकी पत्नी की तमिलनाडु के कुन्नूर में 8 दिसंबर को हुए हेलिकॉप्टर हादसे में मौत हो गई थी। इस हादसे में कुल 13 लोगों की मौत हुई है।
उनका जीवन साहस और शौर्य से भरा रहा है. इसके दम पर वह सेना के उस सर्वोच्च पद तक पहुंचे, जहां अब तक कोई नहीं गया था. आइए नजर डालें, उनके जीवन के अहम पड़ावों और उपलब्धियों पर।
जनरल रावत का जन्म उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में 16 मार्च 1958 को एक सैन्य परिवार में हुआ था। उनके पिता लक्ष्मण सिंह रावत लेफ्टिनेंट जनरल के पद से 1988 में सेवानिवृत्त हुए थे। बिपिन का बचपन सैन्य वातावरण में ही बीता और यह उनके भविष्य की दिशा निर्धारित करने में निर्णायक साबित हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई कैंब्रिज हाईस्कूल, देहरादून और सेंट एडवर्ड स्कूल, शिमला में हुई.जनरल बिपिन रावत में एक योद्धा का जुनून ही नहीं था, उनमें पढ़ने की ललक भी कूट-कूटकर भरी थी। सैन्य जीवन के दौरान भी वह कोई न कोई कोर्स और डिग्री हासिल करते रहे थे। उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी से स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
आई.एम.ए देहरादून में उन्हें ‘सोर्ड ऑफ ऑनर’ से सम्मानित किया गया था। बाद में देवी अहिल्या विश्वविद्यालय से रक्षा एवं प्रबन्ध अध्ययन में एम फिल की डिग्री भी ली। फिर मद्रास विश्वविद्यालय से स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस स्टडीज में एमफिल किया और आखिरकार 2011 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से सैन्य मीडिया अध्ययन। उन्होंने अपनी पीएचडी भी पूरी कर ली। सेना में रहते हुए उच्च शिक्षा के लिए वह अमेरिका भी गए। वहाँ उन्होंने डिफेंस सर्विस स्टाफ कॉलेज से डिग्री ली और फोर्ट लिवरवर्थ में हायर कमांड कोर्स भी किया।
बिपिन रावत को 16 दिसंबर1978 को सेना की 11वीं गोरखा राइफल्स की पांचवीं बटालियन में कमीशन मिला। उनकी पहली पोस्टिंग मिजोरम में हुई और वहीं उन्होंने इस बटालियन का नेतृत्व भी किया। वह सेना में शुरू से अपने जोश, बुद्धि और सैन्य कौशल के लिए अधिकारियों की नजरों में रहे और उन्हें जो भी काम सौंपा गया उसे पूरी निष्ठा और सफलता से अंजाम दिया। बिपिन रावत ने सेना में रहते हुए शुरू से ही बड़े और अहम ऑपरेशन्स में भाग लिया। युद्धों के अलावा देश और विदेश में अशांत क्षेत्रों के सैन्य अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। इससे उन्हें शीर्ष पदों पर आने के बाद युद्ध की रक्षात्मक और आक्रमक नीतियां बनाने में मदद मिली। रावत ने दक्षिणी कमान के कमांडर और सह-सेनाध्यक्ष का पदभार भी संभाला था। उन्हें कांगो में मल्टीनेशनल ब्रिगेड की कमान के साथ-साथ यूएन मिशन में सेक्रेटरी जनरल और फोर्स कमांडर जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं। रावत को लिखने का भी शौक था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर लिखे गए उनके अनेक लेख दुनिया भर के सैन्य जर्नल्स में प्रकाशित हुए।
रावत के पास पूर्वी सेक्टर में वास्तविक नियंत्रण रेखा, कश्मीर घाटी, पाकिस्तान के साथ लगी नियंत्रण रेखा और पूर्वोत्तर में काम करने का अच्छा खासा अनुभव था। उन्होंने 1999 में करगिल युद्ध में भी भाग लिया और अहम मोर्चों पर फतह हासिल करने में सेना की मदद की। इसी युद्ध में सरकार को सैन्य ऑपरेशंस की कई खामियों का अंदाजा लगा और बाद में पता चला कि सेना के तीनों अंगों के बीच सामंजस्य की कमी है। तभी से तीनों सेनाओं के लिए एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त करने की कवायद तेज हो गई। रावत ने एलओसी के पार और पूर्वोत्तर में कई आतंकी ठिकानों पर हमले वाले सैन्य अभियानों की देखरेख की थी।
दिसंबर 2016 में जनरल रावत देश के 27 वें थलसेना प्रमुख बने। भारत सरकार ने उन्हें दो वरिष्ठ अफसरों लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीन बक्शी और लेफ्टिनेंट जनरल पीएम हारिज को दरकिनार कर भारतीय सेना की कमान सौंपी थी। इसके पीछे उनके अदम्य सैन्य कौशल, शौर्य और उपलब्धियों को आधार बताया गया। जनरल बिपिन रावत की रक्षा नीति में आक्रमण और तकनीक के प्रयोग को अहम बताया जाता है। उरी हमले के बाद हुए सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर बालाकोट एयर-स्ट्राइक की रणनीति के पीछे भी उनकी अहम भूमिका रही है। जनरल रावत की रणनीतियों को मौजूदा सरकार का काफी भरोसा हासिल रहा और निधन से ऐन पहले तक वह कई बड़ी योजनाओं पर काम कर रहे थे।
31 दिसंबर 2019 को भारत सरकार ने जनरल बिपिन रावत को देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाने की घोषणा की। यह नियुक्ति उनके सेनाध्यक्ष पद से रिटायर होने के एक दिन पहले ही हुई। 1 जनवरी 2020 को उन्होंने तीनों सेनाओं के रक्षा प्रमुख के तौर पर पद ग्रहण कर लिया। इस पद पर नियुक्ति के लिए पहले भी सरकारें कोशिश करती रही थीं लेकिन कई रणनीतिक और राजनीतिक वजहों से यह टलता रहा।
जनरल बिपिन रावत सैन्य सुधार की दिशा में अपने कामों के लिए भी जाने जाएंगे. सेना प्रमुख से लेकर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ तक वह लगातार भारतीय सेना को आधुनिक और नई जरूरतों के अनुरूप तैयार करने पर जोर देते रहे। हथियारों के आधुनिकीकरण के साथ ही डिजिटल टेक्नॉलजी पर निवेश और निर्भरता के लिए वह सरकार को लगातार योजनाएं सुझाते रहे। पाकिस्तान से लगी सीमा, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर में सैन्य चुनौतियों से निपटने के लिए उन्होंने कई थियेटर कमान बनाने की सिफारिश की थी। वह सेनाओं को भविष्य में स्पेस वॉर के लिए भी सक्षम बनाने की बात करते रहे थे।
सेना में रहते जनरल बिपिन रावत को मिले पदक और सम्मान उनके उत्कृष्ट करियर और उपलब्धियों की गवाही देते हैं। उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक, उत्तम युद्ध सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक, युद्ध सेवा पदक, सेना पदक और विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया था। (साभार – लल्लनटॉप)
कोलकाता : छात्रों को वरिष्ठ विद्यार्थियों द्वारा आयोजित तीन घंटे का मॉक संसद सत्र बिताने और विशेषज्ञों के साथ-साथ नए लोगों के लिए एओएन प्लेटफॉर्म पर सुनहरा अवसर मिला। प्रतिनिधियों ने संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील, इटली, जर्मनी, भारत, फ्रांस, जापान, चीन, यूके, यूक्रेन और केएसए (सऊदी अरब साम्राज्य) सहित नकली संसद में विद्यार्थियों ने अपने-अपने देशों का प्रतिनिधित्व किया। सत्र की शुरुआत छात्रों की सभा से हुई, जिन्हें वरिष्ठ म्यूनर्स द्वारा संबोधित किया जा रहा था। कॉलेज के डीन
प्रो. दिलीप शाह सभा में शामिल हुए और एमयूएन के आयोजन के बारे में महत्वपूर्ण विचार रखे। विभिन्न औपचारिकताओं का पालन किया गया जैसे कि एक एमयूएन चल रहा हो। सौमिली भट्टाचार्य ने इस कार्यक्रम की रिपोर्ट भी प्रस्तुत की।
अंत में, प्रतिनिधियों ने एक दूसरे को बधाई दी और एमयूएन समाप्त हो गया। एक अन्य कार्यक्रम में इन एक्ट के विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी अभिनय प्रतिभा का प्रदर्शन किया। एक कमरे की भावनाओं को नियंत्रित करना, दर्शकों को रुलाना, हंसाना, अपनी बनाई किसी चीज से प्यार हो जाना किसी कला से कम नहीं है।
पटकथा लेखन, अभिनय, नृत्य, गायन सब उसी का हिस्सा हैं। 4 और 6 दिसंबर 2021 को, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के इन एक्ट कलेक्टिव ने अपने ऑडिशन की मेजबानी की। कॉलेज के सामूहिक प्रतिनिधियों के साथ प्रेरणा मुखर्जी, सरफराज हुसैन खान और वरिष्ठ सदस्य प्रत्यूष प्रकाश, साहिल लखमनी और हुजैफा बिन मिस्बाह द्वारा निर्णायक की भूमिका निभाने का कार्य किया। इस अवसर पर प्रो. दिलीप शाह और कुछ संकाय सदस्य भी सोलो एक्टिव की प्रक्रिया के हिस्सा बने और छात्रों को उनका समर्थन करके और अधिक उत्साहित किया।
पहले दिन में 50 प्रतिभागियों के लिए स्लॉट था, जिन्होंने अपने अभिनय का प्रदर्शन किया और उसके बाद एक खेल की भी योजना बनाई गई जहाँ प्रतिभागियों को जजों द्वारा प्रस्तुत एक सहज भूमिका निभाने के लिए तैयार किया गया था।दूसरे दिन भी 50 छात्रों के स्लॉट के साथ समान पैटर्न का पालन किया। दो राउंड के इस एक्टिंग कार्यक्रम में पहले एक एकल अभिनय किया गया जिसमें प्रत्येक प्रतिभागी ने मोनोलॉग के साथ 4-5 मिनट का एकल अभिनय तैयार किया, उसके बाद राउंड 2 जो इम्प्रोव एक्टिंग (अनियोजित) था। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
कोलकाता : एसोचैम ईस्ट और आईसीआरए ने आज एक कार्यक्रम में ‘टी इंडस्ट्री एट द क्रॉस रोड्स’ शीर्षक से एक संयुक्त रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट खरीद, प्रसंस्करण से लेकर मार्केटिंग और अन्य वैल्यू एडिशन्स तक क्षेत्र की ताकत और चुनौतियों को बताती है। रिपोर्ट में क्षेत्र के विकास रणनीतिया और संभावनाएं भी बताई गई है। रिपोर्ट जारी करते हुए, एसोचैम टी सेक्टर काउंसिल पूर्व के चेयरमैन मनीष डालमिया ने कहा की, “ चाय उद्योग में परिवर्तन करने और इसे अधिक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए, क्षेत्र में बदलाव और विभिन्न हितधारकों के बीच अधिक सहयोग की मांग करती है। एसोचैम एक मजबूत आर्थिक एजेंडा के लिए संवाद और साझेदारी को सुविधाजनक बनाने का प्रयास करता है। हम क्रॉस इंडस्ट्री एंगेजमेंट को सुविधाजनक बनाने के लिए प्लेटफॉर्म बनाना जारी रखेंगे। मुझे विश्वास है कि आज जारी की गई रिपोर्ट से चाय उद्योग को लाभ होगा, जो देश में सबसे प्रमुख राजस्व और मजदूरी देने वाले क्षेत्रो में से एक है।”
हाल के सालो में वित्त वर्ष 2021 थोक चाय उद्योग के लिए सबसे अच्छे वर्षों में से एक है, लेकिन इसकी स्थिरता की संभावना कम ही दिखती है। फरवरी 2021 के अंत तक मजदूरी में प्रभावी वृद्धि की गई है, उत्पादन बड़े पैमाने पर सामान्य स्तर पर लौटने से कीमतों पर दबाव पड़ा है। नतीजतन, उद्योग को वित्त वर्ष 2022 में एक और चुनौतीपूर्ण साल का सामना करने की संभावना है। इसलिए, उद्योग की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए, चाय की कीमतें उत्पादन की लागत की तुलना में लगातार अधिक बनी रहनी चाहिए।
कार्यक्रम के दौरान, आईसीआरए के उपाध्यक्ष कौशिक दास ने कहा की, यह रिपोर्ट विशेष रूप से उत्तर भारत से बाहर भारतीय थोक चाय उद्योग की रिलेटिव पोजीशन का विश्लेषण प्रदान करती है। ये रिपोर्ट वैश्विक चाय उद्योग में कुछ प्रमुख सफलता कारणों को सामने करती है, जो स्थायी आधार पर उद्योग के बेहतर वित्तीय प्रदर्शन की ओर ले जा सकते हैं।
एसोचैम पूर्व के अध्यक्ष रवि अग्रवाल ने कहा कि , “चाय क्षेत्र का इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है और ये अभी भी लाखों लोगों की आजीविका के लिए प्रमुख भूमिका निभाता है। इस क्षेत्र में सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए, हमें बदलती डायनमिक्स , भविष्य के वैश्विक रुझानों और उत्पादकता बढ़ाने के लिए स्थानीय समर्थन हासिल करने पर ध्यान देना चाहिए। मुझे विश्वास है कि आईसीआरए के साथ जानकारी भागीदार के रूप में तैयार की गई यह रिपोर्ट इस महत्वपूर्ण क्षेत्र के लिए संतुलित सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में एक लंबा रास्ता तय करेगी।
एसोचैम निदेशक पूर्व परमिंदर जीत कौर ने कहा कि रिपोर्ट इस क्षेत्र के सतत विकास के लिए आवश्यक कारकों की पहचान करने में मदद करेगा। विश्व स्तर पर चाय क्षेत्र बदलाव के दौर से गुजर रहा है। जलवायु भारतीय चाय को प्रभावित करने एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में तेजी से सामने आया है। गुणवत्ता पूर्ण उत्पादन के लिए आधुनिकीकरण और प्रौद्योगिकी अनुकूलन के साथ अन्य मानवीय पक्ष को भी संतुलित करना है।
थोक चाय उद्योग को एक दशक में मजदूरी लागत में लगातार बढ़ोतरी का सामना करना पड़ा है, जबकि चाय की कीमतें काफी हद तक स्थिर रही हैं। छोटे चाय उत्पादकों के उत्पादन में वृद्धि ने चाय की कीमतों पर दबाव डाला है, क्योंकि निर्यात रेंज में रहा है। इससे वित्त वर्ष 2020 में बड़े चाय उत्पादकों के ऑपरेटिंग प्रॉफिटेबिलिटी में दो प्रतिशत की गिरावट आई है।
कोलकाता : कोरोना काल के लगभग पौने 2 दो साल बाद भारतीय भाषा परिषद ने अपने सभागार में ऑफ लाइन कार्यक्रम ‘पुनर्मिलन’ और ‘काव्य संध्या’ के रूप में आयोजित किया। सभा के आरंभ में कोलकाता के वरिष्ठ लेखक श्रीनिवास शर्मा के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त की गई। इसके बाद डॉ. कुसुम खेमानी के रचना संसार पर निर्मित एक वीडियो लॉन्च किया गया। मंत्री डॉ. केयूर मजमुदार ने जानकारी दी कि डॉ. कुसुम खेमानी की रचनाओं को जल्द ही ऑडियो-वीडियो फॉर्मेट में उपलब्ध कराया जाएगा। कार्यक्रम का उद्बोधन वक्तव्य देते हुए परिषद अध्यक्ष डॉ. कुसुम खेमानी ने कहा कि हम आज परिषद के सभागार में लंबे समय बाद मिल रहे हैं। आशा है, लेखक, साहित्य-प्रेमी पाठक और विद्यार्थी परिषद का पूरा लाभ उठाएंगे और साहित्य का यह आंगन पहले की तरह जगमग करेगा। उन्होंने कहा कि इस बीच परिषद पुस्तकालय वातानुकूलित और नई सुविधाओं से युक्त हुआ है। परिषद जल्दी ही नीचे बुक कैफे खोलने जा रही है जहां विभिन्न प्रकाशनों की किताबें उपलब्ध होंगी। हमारी नई कार्यकारिणी इसके लिए बधाई के पात्र है। प्रो. संजय जायसवाल ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि परिषद अब अपने आधुनिक स्वरूप के साथ एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। हम मानते हैं कि समाज में मानवता की भावनाओं को मजबूत करने में साहित्य की बड़ी भूमिका है और नई पीढ़ी में साहित्य और हिंदी से प्रेम पैदा करना होगा। काव्य संध्या में दिल्ली से आए वरिष्ठ गज़लकार विनोद शलभ उपस्थित थे। इनके अलावा प्रियंकर पालीवाल, आशुतोष, सेराज खान बातिश, मंजू श्रीवास्ताव, अभिज्ञात, शुभ्रा उपाध्याय, राज्यवर्द्धन, सुशील कान्ति, आनंद गुप्ता, रचना सरण, पूनम सोनछात्रा, मनीषा गुप्ता, मधु सिंह, सूर्यदेव राय और राजेश सिंह ने अपनी कविताओं का पाठ किया और श्रोताओं को काव्यमय कर दिया।
काव्य संध्या की अध्यक्षता कर रहे परिषद के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने कहा कि कवि समाज की सांस्कृतिक आंख होते हैं और जो समाज कवियों और साहित्यकारों की उपेक्षा करता है, उसे अंधा होने में देर नहीं लगती। कवि कृत्रिम तौर पर जो दिखाया और प्रचारित किया जाता है, उससे भिन्न वास्तविक सत्य की अभिव्यक्ति करते हैं। उन्होंने कहा कि सजग कवियों ने समाज में भेदभाव और विद्वेष का हमेशा विरोध किया है और धर्म-जाति से ऊपर उठकर मानवता का गान किया है।परिषद के मंत्री केयुर मजमूदार ने धन्यवाद देते हुए कहा कि परिषद सभागार में पुनर्मिलन और काव्य संध्या में जो उत्साह देखने को मिला है, वह एक यादगार बन कर रहेगा।
सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, आज मैं आपका परिचय मध्यकालीन कवयित्री जुगलप्रिया से करवाऊंगी। जुगलप्रिया का संबंध बुंदेलखंड के जगत प्रसिद्ध ओरक्षा राज्य से है। कालांतर में वहाँ के राजा ने अपनी राजधानी टीकमगढ़ में स्थापित कर दी। यहीं राजा महेन्द्र प्रताप सिंह जू देव बहादुर एवं रानी वृषभानु कुंवरि के घर 1871 में कमल कुमारी देवी का जन्म हुआ था जो जुगलप्रिया नाम से जानी गईं। माता वृषभानु कुंवरि देवी राम की अनन्य भक्त थीं। स्वप्न में श्रीराम का आदेश पाकर अयोध्या का कनक भवन इन्हीं ने बनवाया था। माता से भक्ति का संस्कार सहजता से पुत्री में गया। वह भी माता के साथ पूजा- पाठ, व्रत- उपवास आदि नियमपूर्वक किया करती थीं। इनका विवाह छतरपुर राज्य के राजा श्रीमान विश्वनाथ सिंह जू देव के साथ हुआ। संसार धर्म ने इनकी भक्तिधारा को बाधित नहीं किया बल्कि उत्तरोत्तर वह और प्रगाढ़ होती गई। पहले उन्होंने अयोध्या के वैष्णव संप्रदाय में दीक्षा ली और बाद में वह वृंदावन में श्रीकृष्ण भक्ति में डूब गईं। शंकर सम्प्रदाय का भी इनपर प्रभाव था। उदार ह्रदय जुगलप्रिया सभी भक्ति संप्रदायों के प्रति श्रद्धा भाव रखती थीं। कहा जाता है कि उन्होंने इन संप्रदायों के सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया था। बड़े- बड़े विद्वान भी उनके ज्ञान और भक्ति के समक्ष सिर झुकाते थे। उन्हें “चार संप्रदाय का महंत” कहा जाता था।
जुगलप्रिया के जीवन का अधिकांश समय भगवद्भजन, साधु सेवा और तीर्थाटन में बीता। बेहद सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए तमाम सांसारिक मोह को तिलांजलि देकर उन्होंने अपना जीवन ईश- सेवा को समर्पित कर दिया था और भक्तिभाव में डूबकर उन्होंने काव्य रचना की। रीतिकाल के अंतिम चरण में सक्रिय कवयित्री जुगलप्रिया ने ईश्वरीय प्रेम डूबकर जिन पदों का सृजन किया उनमें भक्ति और नीति के साथ शृंगार का चित्रण भी हुआ है। आलोचकों का मानना है कि उनका शृंगार चित्रण अत्यंत संयत और मर्यादित था। वह अपने पदों में जुगलप्रिया उपनाम लिखा करती थीं और इसी नाम से वह साहित्य जगत में परिचित हुईं। श्री वियोगी हरि जो उनके शिष्य थे, ने उनके पदों का संग्रह “जुगलप्रिया-पदावली” नाम से प्रकाशित करवाया। उनके पदों में प्रेमविह्वलता के साथ ईश्वरीय स्वरूप का मनोहर वर्णन हुआ है। प्रस्तुत पद में कृष्ण के मनोहर रूप का सरस वर्णन है-
“जुगल छवि कब नैनन में आवै
मोर मुकुट की लटक चन्द्रिका सटकारो लट भावै
नर गुंजा गजरा फूलन के फूल से बैन सुनावै
नील दुकूल पीत पट भूषण मन भावन दरसावै
कटि किंकिनि कंकण कर कमलनि वचनित मधुर छवि छाबै
‘जुगलप्रिया’ पद-पदुम परसि कै अनल नहीं सचुपावैं ”
कृष्ण के प्रति उनकी प्रगाढ़ भक्ति उनके पदों में एक प्रेयसी की प्रतीक्षा, याचना और मिलन की आकांक्षा के रूप में मार्मिकता के साथ व्यंजित हुई है। साथ ही माधुर्य भाव की भक्ति का वह उपालंभ भाव भी सहजता से लक्षित किया जा सकता है जिसके तहत भक्त कवयित्री अपने आराध्य पर व्यंग या दोषारोपण करने से भी नहीं चूकती। प्रस्तुत पद में कवयित्री कृष्ण को झूठा तक कह जाती हैं क्योंकि वह जुगलप्रिया की मनोवांछा की पूर्ति नहीं कर रहे हैं। शिकवा- शिकायत की नोंक-झोंक ने पद को सरसता से भर दिया है-
“नाथ अनाथन की सब जानै
ठाढ़ी द्वार पुकार करति हौं श्रवन सुनत नहिं कहा रिसानै
की बहु खोट जानि जिय मेरी की कछु स्वारथ हित अरगानै
दीन बन्धु मनसा के दाता गुन औगुन कैधो मन आनै
आप एक हम पतित अनेकन यही देखि का मन सकुचानै
झूँठो अपनो नाम धरायो समझ रहे हैं हमहि सयानै
तजो टेक मनमोहन मेरो ‘जुगलप्रिया’ दीजै रस दानै।”
भक्ति की माधुरी में आपाद मस्तक आप्लावित कवयित्री प्रिय के विरह में वियोगिनी नायिका की भांति व्याकुल हो उठती है और अपने ह्रदय की छटपटाहट या तड़प को कविता में इस तरह उड़ेल देती है-
“सखी मेरी नैनन नींद दुरी
पिय सो नहि मेरो बस कछु री
तलफि तलफि यों ही निसि बीतति नीर बिना मछुरी
उड़ि उड़ि जात प्रान पंछी तहँ बजत जहाँ बसुरी
‘जुगलप्रिया’ पिया कैसे पाऊँ प्रगट सुप्रीति जुरी।”
कृष्ण प्रेम में डूबी जुगलप्रिया ब्रजमंडल में कृष्ण जन्म के अवसर पर होनेवाले उत्सव और ब्रजवासियों के आनंदोल्लास का अत्यंत प्राणवंत वर्णन करती है। काव्य- कला का उत्कृष्ट प्रमाण भी इनके पदों में मिलता है। अलंकारों का कुशल प्रयोग और भाषा का प्रवाह पदों को सहज ग्राह्य बना देता है। प्रस्तुत पद को पढ़ते हुए पाठकों का मन आनंद- सागर में अवगाहन करता है। ब्रजमंडल में होनेवाली अमृत वर्षा पाठकों के ह्रदय को भी रससिक्त कर देती है-
“ब्रजमंडल अमरत बरसै री।
जसुदानंदन गोप-गोपिन को सुख सोहाग उपजै सरसै री॥
बाढ़ी लहर अंग-अंगन में जमुना तीर नीर उछरै री।
बरसत कुसुम देव अंबरतें सुरतिय दरसन हित तरसै री॥
कदलौ बंदनवार बंधाये तोरन धुज सौथिया दरसै री।
हरद दूब दधि रोचन साजै मंगल कलस देख हरसै री॥
नाचै गावै रंग बढ़ावै जो जाके मन में भावै री।
शुभ सहनाई बजत रात-दिन चहुँदिसि आनंदघन छावै री॥
ढाढ़ी ढाढ़िन नाचि रिझावै जो चाहे जो, सो पावै री।
पलना ललना झूल रही है जसुदा मंगल गुन गावै री॥
करै निछाबर तन मन सरबस जो ब्रजनंदन को जावै री।
जुगल प्रिया यह नंद महोत्सव दिन प्रति वा ब्रज में होवै री॥”
भक्ति मार्ग पर चलने के लिए मन की स्थिरता और ह्रदय की एकाग्रता आवश्यक है। कवयित्री अपने मन को एकाग्र भाव से भक्ति भाव में लीन करने हेतु अपने नेत्रों से चंचलता का त्याग करने का आग्रह करती हैं। चातक और चकोर के एकनिष्ठ प्रेम का दृष्टांत देती हुई वह उन्हीं के आदर्श को अपने जीवन में उतारना चाहती हैं-
“दृग तुम चपलता तजि देहु।
गुंजरहु चरनार विंदनि होय मधुप सनेहु॥
दसहुँ दिसि जित तित फिरहु किन सकल जग रस लेहु।
पै न मिलि है अमित सुख कहुं जो मिलै या गेहु॥
गहौ प्रीति प्रतीत दृढ़ ज्यों रटत चातक मेहु।
बनो चारु चकोर पिय मुख-चंद छवि रस एहु॥”
मन की शुद्धि भी भक्ति भाव के लिए अति आवश्यक है। पूरे भक्तिकाव्य में बार- बार मन और ह्रदय की शुद्धि पर बल दिया गया है। जुगलप्रिया भी मन को मांजने पर बल देती हुई उसे मलिनता से दूर ले जाकर कृष्ण की भक्ति में डुबो देना चाहती हैं-
“मन तुम मलिनता तजि देहु।
सरन गहु गोविंद की अब करत कासो नेहु॥
कौन अपने आप काके परे माया सेहु।
आज दिन लौं कहा पायो कहा पैहौ खेहु॥
विपिन वृंदा वास करु जो सब सुखनि को गेहु।
नाम मुख मे ध्यान हिय मे नैन दरसन लेहु॥
छाँड़ि कपट कलंक जग में सार साँचो एहु।
‘जुगल प्रिया’ बन चित्त चातक स्याम स्वाँती मेहु॥”
भक्ति के पावन और कठिन राह को बहुत से पाखंडी अपने दुष्कर्मों से दूषित करने से नहीं चूकते। कवयित्री इन छद्मवेशी बगुला भगतों से सावधान रहने की सलाह भी देती हैं-
“बगुला भक्तन सों डरिये री।
इक पग ठाढ़े ध्यान धरत है दीन मीन लौं किमि बचिए री।
ऊपरते उज्जल रंग दीखत हिये कपट हिंसक लखिये री॥
इतने दूर ही रहे भलाई निकट गये फंदनि फँसिये री।
जुगल प्रिया मायावी पूरे भूलि न इन संग पल बसिए री॥”
सांसारिक माया मोह से बचकर ईश्वर के चरणों की भक्ति में समर्पण की बात सभी कवियों ने बार- बार की है। कवयित्री जुगलप्रिया भी इस नश्वर संसार की असारता की ओर संकेत करती हुई कृष्ण की भक्ति में लीन हो जाना चाहती हैं-
“यह तन इक दिन होय जु छारा।
नाम, निशान न रहि है रंचहु भूलि जायगो सब संसारा।
काल घरी पूजी जब हू है लगै न छोड़त भ्रम जारा॥
या माया नरिन के बस में भूलि गयौ सुखसिंधु अपारा।
जुगल प्रिया अजहूँ किन चेतत मिलि हैं प्रीतम प्यारा॥”
जुगलप्रिया ने एक आदर्श भक्त की तरह राजसी सुख और वैभव का त्याग कर बहुत ही सादगीपूर्ण जीवन जीते हुए भक्त जनों के बीच अपना अन्यतम स्थान बनाया। उनकी जीवनयात्रा बहुत लंबी नहीं रही। तकरीबन पचास वर्ष की उम्र में 1921 में इनका निधन हुआ। उनकी रचनाओं में भक्ति, नीति और शृंगार की अद्भुत त्रिवेणी प्रवाहित होती है। भक्तिकाव्य के प्रमुख पूर्ववर्ती कवियों से प्रभाव ग्रहण करने के बावजूद भावाभिव्यक्ति की उनकी अपनी शैली है। उनके पदों में एक सहज -स्वाभाविक सौंदर्य है जो अपनी कलात्मकता, मार्मिकता और सरसता के कारण अपनी अलग छाप छोड़ने में सफल होते हैं।