कोलकाता : भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के जुबली सभागार में आर जे प्रवीण (सेठिया) रेडियो जॉकी ने एंकरिंग के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर विचार प्रस्तुत किए। रेड एफ एम 93.5 पर उनका कार्यक्रम सोमवार से शनिवार सात से ग्यारह बजे सुबह तो आता ही है साथ ही, आर जे प्रवीण का रेड मुर्गा कार्यक्रम भी बहुत लोकप्रिय है। कोलकाता के जयपुरिया कॉलेज से शिक्षा प्राप्त कर अपने प्रारंभिक जीवन में शॉपर स्टाप और कॉल सेंटर में भी काम किया बाद में रेडियो जॉकी को प्रोफेशनल रूप में अपनाया और उसके कारण ख्याति प्राप्त हुई। सौ से अधिक विद्यार्थियों से प्रवीण ने एंकरिंग के कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की। ओपनिंग और अंत में बोलने की कला, श्रोताओं का मनोरंजन करना,कार्यक्रम के मध्य में भी किसी के न आने पर कार्यक्रम को संभालना, स्क्रिप्ट बनाना, कहानियाँ तैयार करना आदि बहुत से सृजनात्मक कार्य करने पड़ते हैं। एंकरिंग में आईने के सामने खड़े होकर कई बार अभ्यास करने पड़ते हैं। हिंदी माध्यम विद्यालय से प्रारम्भिक शिक्षा के बाद आर जे प्रवीण ने अंग्रेजी में भी निपुणता प्राप्त की है और आज सोशयल मीडिया, इनस्टाग्राम पर भी एक लोकप्रिय एंकर के रूप में प्रसिद्ध हैं। ग्यारह वर्ष की मेहनत के पश्चात 2017-18-19 में एक के बाद एक आर जे प्रवीण को 37 अवार्ड मिले जो एक रिकार्ड है। रेडियो इंडस्ट्री का आयोजन स्कोप बढ़ता जा रहा है और उसी अनुपात में प्रतियोगिताओं और चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है। दो घंटे तक चले इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने प्रश्नोत्तर सेशन में अपने कई प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर प्राप्त हुआ। रेडियो जॉकी के लिए आत्मविश्वास, सकारात्मकता और सृजनात्मकता एंकरिंग के महत्वपूर्ण पक्ष हैं। 28 अप्रैल, 2020 में इन्स्टाग्राम आरंभ हुआ था जिसमें आरजे प्रवीण पटल को बीस लाख से अधिक दर्शकों ने सराहा जो पहले स्थान पर है। इस कार्यक्रम में प्रो दिव्या उदेशी, डॉ वसुंधरा मिश्र और कॉलेज के शिक्षकों की उपस्थिति रही। भवानीपुर कॉलेज के मैनेजमेंट की ओर से सोहिला भाटिया ने आर जे प्रवीण को मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया ।
विजय दिवस पर विशेष: जब पाकिस्तानी जनरल को मौत के मुंह से बचा दिये हमारे जवान

16 दिसंबर 1971 को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी संसद भवन के अपने कार्यालय में स्वीडिश टेलीविज़न को साक्षात्कार दे रही थीं कि तभी उनकी मेज़ पर रखा लाल रंग का टेलीफ़ोन बजा. रिसीवर उठाकर उन्होंने मात्र चार शब्द कहे, यस-यस, थैंक यू. फोन पर दूसरी ओर भारतीय सेना के जनरल मानेक शॉ थे जो प्रधानमंत्री को बांग्लादेश में जीत की ख़बर दे रहे थे. श्रीमती गांधी साक्षात्कार बीच में ही छोड़कर तुरंत वहां से उठकर तेज़ क़दमों से लोक सभा की तरफ़ बढ़ीं. अभूतपूर्व शोर शराबे के बीच उन्होंने घोषणा की ” ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है.” बाक़ी का उनका वक्तव्य तालियों की गड़गड़ाहट और नारेबाज़ी के बीच डूब गया.
आजाद भारत के इतिहास की उस स्वर्णिम घटना का आज स्वर्ण जयंती वर्ष आज शुरू हो रहा है. एक ऐसी घटना जिसने भारतीय सेना के पराक्रम को इतिहास के स्वर्णाक्षरों में दर्ज कर दिया. इस युद्ध और विजय का श्रेय जांबाज भारतीय सेना के साथ भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी जाता है, जिन्होंने पड़ोसी मुल्क में शांति बहाली और अपनी सीमाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए युद्ध का फैसला लिया. 16 दिसंबर 1971 की तिथि हर भारतीय के लिए गर्व का दिन है. महज 13 दिनों तक चली भारत-पाक की लड़ाई में हमारी सेना ने लगभग 95000 पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेकने के लिए बाध्य कर दिया. साथ ही पाकिस्तान के चंगुल से बांग्लाभाषी लोगों को मुक्त कर उनके लिए स्वतंत्र देश के गठन में महती भूमिका निभायी. आज भी भारतीय सेना, विशेष रूप से पूर्वी कमान की ओर से यह दिवस विशेष रूप से मनाया जाता है. भारत-बांग्लादेश सीमा पर तैनात बॉर्डर सीक्यूरिटी फोर्स के जवान भी विजय दिवस को खास तौर पर मनाते हैं.
लड़ाई, और पाकिस्तान के विभाजन का कारण
विजय दिवस की जयगाथा की नींव तो 25 फरवरी 1948 को उसी समय पड़ गयी थी, जब पाकिस्तानी संसद में उर्दू और अंग्रेजी के साथ बांग्ला को भी मान्यता देने की बात उठायी गयी. पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने न केवल उसे खारिज कर दिया, बल्कि बांग्ला को मान्यता देने की बात का मजाक भी उड़ाया. यहीं से शुरुआत हुई एक नये देश के जन्म की, जिसे आज हम बांग्लादेश के नाम से जानते हैं.
अविभाजित भारत से 14 अगस्त को धार्मिक आधार पर पाकिस्तान बना. लेकिन इसी पाकिस्तान में भी भाषा-बोली, खान-पान और मान्यताओं को लेकर भारी फर्क था. एक हिस्सा पंजाबी, सिंधी बोलता तो दूसरे में बांग्लाभाषी रहते. पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में विषमताएं इतनी ज्यादा थीं कि जल्द ही राजनैतिक रूप से ज्यादा समृद्ध पश्चिमी हिस्सा पूर्वी हिस्से पर नियंत्रण की कोशिश करने लगा, वहां के लोगों को चुनाव में हिस्सा लेने से रोका जाता, राजनैतिक पद नहीं मिलते थे. ऐसे में पूर्वी पाकिस्तान के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने अवामी लीग बनाते हुए अपने हिस्से के लोगों की बात सामने रखने की कोशिश की.
सन् 1970 में पाकिस्तान में हुए चुनाव में पूर्वी पाकिस्तान आवामी लीग ने 169 में से 167 सीटों पर जीत दर्ज की और शेख मुजीबुर रहमान ने संसद में सरकार बनाने की पेशकश की, मगर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो ने इसका विरोध किया और हालात इतने गंभीर हो गए कि राष्ट्रपति को सेना बुलवानी पड़ी, फौज में शामिल अधिकतर लोग पश्चिमी पाक के थे, पूर्वी पाक की सेना को यहां हार का सामना करना पड़ा और शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया, बस यहीं से यद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई.

अपने प्रिय नेता को प्रधानमंत्री बनता देखने का सपना संजोये लोगों में पहले ही गुस्सा चरम पर था. पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल याह्या खान की ज्यादतियों ने उन्हें और उकसा दिया. उनके आदेश पर जनरल टिक्का खान ने सैनिकों को बांग्लाभाषी पाकिस्तानियों को जहां दिखें, मार देने का आदेश दिया. खासकर पूर्वी हिस्से में रहने वाले गैर-मुस्लिम लोगों को निशाना बनाया गया. लाखों लोगों के रक्तपात का आदेश देने वाले जनरल खान को इतिहास में बंगाल का कसाई भी कहा जाता है. इस हत्याकांड पर जनरल ने कहा था, ‘महज 30 हजार बंगाली ही तो मरे हैं, क्या हो गया.’
शेख मुजीबुर रहमान पर हुए जुल्म से भड़के लोगों को शांत करने की बजाए पाकिस्तानी सरकार जनसंहार पर उतर आई. पूर्वी लोगों को भारत का एजेंट कहा जाना लगा और ऑपरेशन सर्च लाइट चलाकर उन्हें मारने का अभियान चल पड़ा. निहत्थे, मासूम लोगों को घर से निकाल-निकालकर मारा गया. औरतों के साथ सामूहिक बलात्कार के दौर चलने लगे. बड़ी संख्या में ढाका यूनिवर्सिटी के छात्रों को गोलियों से भून दिया गया. आज भी ढाका मस्जिद के पास एक बड़ी सी कब्र है जिसमें दफ्न हजारों लाशें उस दौर की स्मारक हैं. पाकिस्तानी सेना द्वारा हत्या, बलात्कार और टॉर्चर से बचने के लिए बड़ी संख्या में अवामी लीग के सदस्य भागकर भारत आ गए. भारत में शरणार्थी संकट बढ़ने लगा. एक साल से भी कम समय के अंदर बांग्लादेश से लाखों शरणार्थियों ने भागकर भारत के पश्चिम बंगाल में शरण ली. इससे भारत पर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बढ़ गया.
मुक्तिवाहिनी को भारत का समर्थन
पश्चिमी पाकिस्तान की बर्बरता के कारण मुक्ति वाहिनी का गठन हुआ. मुक्तिवाहिनी दरअसल पाकिस्तान से बांग्लादेश को आजाद कराने वाली पूर्वी पाकिस्तान की सेना थी. मुक्तिवाहिनी में पूर्वी पाकिस्तान के सैनिक और हजारों नागरिक शामिल थे. 31 मार्च, 1971 को इंदिरा गांधी ने भारतीय सांसद में भाषण देते हुए पूर्वी बंगाल के लोगों की मदद की बात कही थी. 29 जुलाई, 1971 को भारतीय सांसद में सार्वजनिक रूप से पूर्वी बंगाल के लड़कों की मदद करने की घोषणा की गई. भारतीय सेना ने अपनी तरफ से तैयारी शुरू कर दी. इस तैयारी में मुक्तिवाहिनी के लड़ाकों को प्रशिक्षण देना भी शामिल था.
इस दौरान पड़ोसी मुल्क की अस्थिरता का असर पड़ा भारत पर. वहां से लोग भाग-भागकर भारत की शरण लेने लगे. माना जाता है कि उसी दौर में लगभग एक करोड़ शरणार्थी भारत आए. भारत ने बॉर्डर खोल दिए थे, प्रवासी कैम्प बनवा दिए थे और शरणार्थियों की देखभाल के लिए आर्थिक व राजनैतिक प्रयास हो रहे थे. भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ये मामला पहले वैश्विक पटल पर उठाया लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. दूसरी ओर जनसंहार जारी रहा.
अक्टूबर-नवंबर, 1971 के महीने में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके प्रतिनिधियों ने यूरोप और अमेरिका का दौरा किया. उन्होंने दुनिया के लीडरों के सामने भरत के नजरिये को रखा, लेकिन इंदिरा गांधी और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के बीच बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची. निक्सन ने मुजीबुर रहमान की रिहाई के लिए कुछ भी करने से हाथ खड़ा कर दिया. निक्सन चाहते थे कि पश्चिमी पाकिस्तान की सैन्य सरकार को दो साल का समय दिया जाए. दूसरी ओर इंदिरा गांधी का कहना था कि पाकिस्तान में स्थिति विस्फोटक है. यह स्थिति तब तक सही नहीं हो सकती है जब तक मुजीब को रिहा न किया जाए और पूर्वी पाकिस्तान के निर्वाचित नेताओं से बातचीत न शुरू की जाए. उन्होंने निक्सन से यह भी कहा कि अगर पाकिस्तान ने सीमा पार (भारत में) उकसावे की कार्रवाई जारी रखी तो भारत बदले कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा.
भारत पर हमला और युद्ध की शुरुआत
पूर्वी पाकिस्तान संकट विस्फोटक हो गया था. पश्चिमी पाकिस्तान में भारत के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की मांग की जाने लगी थी. दूसरी तरफ भारतीय सैनिक पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर चौकसी बरते हुए थे. 23 नवंबर, 1971 को पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान ने पाकिस्तानियों से युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा. 3 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान की वायु सेना ने भारत पर हमला कर दिया. भारत के अमृतसर और आगरा समेत कई शहरों को निशाना बनाया गया. इसके साथ ही 1971 के भारत-पाक युद्ध की शुरुआत हो गई. पाकिस्तानी सेना के हमले की प्रतिक्रिया में भारतीय सेना रणनीति के साथ बांग्लादेश की सीमा में घुसी और लगभग 15 हजार किलोमीटर के दायरे को अपने कब्जे में ले लिया. संघर्ष की शुरुआत हुई, जिसमें दोनों ओर से लगभग 4 हजार सैनिक मारे गए. युद्ध में भारतीय सेना ने जबरदस्त प्रदर्शन किया, 13 दिन चली इस लड़ाई में पाक सेना को मुंह की खानी पड़ी. 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान की सेना के आत्मसमर्पण और बांग्लादेश के जन्म के साथ इस युद्ध का समापन हुआ. पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा बांग्लादेश के रूप में जाना जाने लगा.
30 लाख लोग मारे गये
पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के जुल्म इतने बढ़ गए थे कि भारतीय फौज ने पाकिस्तानी सेना पर हमला बोल दिया. तारीख थी 3 दिसंबर 1971. केवल 13 दिनों तक चले इस युद्ध में भारतीय सेना के आगे पाकिस्तान को घुटने टेकने पड़े और तभी पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा बांग्लादेश बन गया. इस युद्ध और आजादी के पीछे जनसंहार और मानसिक-शारीरिक-आर्थिक यातनाओं की लंबी-चौड़ी पृष्ठभूमि रही. हालांकि भारतीय सेना के दखल के पहले ही पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने पश्चिमी पाकिस्तान की ज्यादतियों के खिलाफ मोर्चा खोल लिया था. आंतरिक युद्ध साल 1971 में मार्च में ही शुरू हो गया था. तब के पूर्वी पाकिस्तानवासियों का मानना है कि इस दौरान बर्बर सेना ने 30 लाख से भी ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. आजादी की ये लड़ाई इतिहास में मुक्ति संग्राम के नाम से दर्ज है.
इंदिरा गांधी ने मनवाया लोहा
तीन दिसंबर 1971 को इंदिरा गांधी कलकत्ता में एक जनसभा को संबोधित कर रही थीं. शाम के धुँधलके में ठीक पाँच बजकर चालीस मिनट पर पाकिस्तानी वायुसेना के सैबर जेट्स और स्टार फ़ाइटर्स विमानों ने भारतीय वायु सीमा पार कर पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर और आगरा के सैनिक हवाई अड्डों पर बम गिराने शुरू कर दिए. इंदिरा गांधी ने उसी समय दिल्ली लौटने का फ़ैसला किया. दिल्ली में ब्लैक आउट होने के कारण पहले उनके विमान को लखनऊ मोड़ा गया. ग्यारह बजे के आसपास वह दिल्ली पहुँचीं. मंत्रिमंडल की आपात बैठक के बाद उन्होंने देश को भी संबोधित किया.
पूरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी को कभी विचलित नहीं देखा गया. वह पौ फटने तक काम करतीं और जब दूसरे दिन दफ़्तर पहुँचतीं, तो कह नहीं सकता था कि वह सिर्फ़ दो घंटे की नींद लेकर आ रही हैं. जाने-माने पत्रकार इंदर मल्होत्रा के अनुसार जब आधी रात के समय जब रेडियो पर इंदिरा गांधी ने देश को संबोधित किया था तो उनकी आवाज़ में तनाव था और ऐसा लगा कि वह थोड़ी सी परेशान सी हैं. लेकिन उसके अगले रोज़ जब वे उनसे मिलने गये तो ऐसा लगा कि उन्हें कोई फ़िक्र ही नहीं. जब जंग के बारे में पूछा तो बोलीं अच्छी चल रही है.
जब मुक्तिवाहिनी ने नियाजी को घेर लिया
16 दिसंबर की सुबह सवा नौ बजे जनरल जैकब को जनरल मानेकशॉ का संदेश मिला कि आत्मसमर्पण की तैयारी के लिए तुरंत ढाका पहुँचें. उसी दिन शाम को चार बजे पूर्वी पाकिस्तानी सेना के प्रमुख जनरल एके नियाज़ी और जैकब ढाका में भारतीय कमांडर ले जनरल जगदीश सिंह अरोड़ा को लेने ढाका हवाई अड्डे पहुँचे. रास्ते में जैकब ने दो भारतीय जवानों को भी अपने पीछे आने के लिए कहा. तभी जैतूनी हरे रंग की मेजर जनरल की वर्दी पहने हुए एक व्यक्ति उनका तरफ़ बढ़ा. जैकब समझ गए कि वह मुक्ति बाहिनी के टाइगर सिद्दीकी हैं. उन्हें कुछ ख़तरे की बू आई. उन्होंने वहाँ मौजूद भारतीय जवानों से कहा कि वह नियाज़ी को कवर करें और सिद्दीकी की तरफ़ अपनी राइफ़लें तान दें. जैकब ने विनम्रता पूर्वक सिद्दीकी से कहा कि वह हवाई अड्डे से चले जाएं. टाइगर टस से मस नहीं हुए. जैकब ने अपना अनुरोध दोहराया. टाइगर ने तब भी कोई जवाब नहीं दिया. जैकब ने तब गुर्राते हुए कहा कि वह फ़ौरन अपने समर्थकों के साथ हवाई अड्डा छोड़ कर चले जाएं. तब टाइगर सिद्दीकी वहां से हटा.
साढ़े चार बजे अरोड़ा अपने दल बल के साथ पाँच एम क्यू हेलिकॉप्टर्स से ढाका हवाई अड्डे पर उतरे. रेसकोर्स मैदान पर पहले अरोड़ा ने गार्ड ऑफ़ ऑनर का निरीक्षण किया. अरोडा और नियाज़ी एक मेज़ के सामने बैठे और दोनों ने आत्म समर्पण के दस्तवेज़ पर हस्ताक्षर किए. नियाज़ी ने अपने बिल्ले उतारे और अपना रिवॉल्वर जनरल अरोड़ा के हवाले कर दिया. नियाज़ी की आँखें नम हो गयी थीं. वहां मौजूद भीड़ नारे लगा रही थीं. नियाजी को मारने पर उतारू भीड़ से बचाने के लिए हमारे जवानों ने मानव प्राचीर बना दी. भारतीय सेना के वरिष्ठ अफ़सरों ने नियाज़ी को एक जीप में बैठा कर एक सुरक्षित जगह पहुंचा दिया.
कुन्नर हादसा : ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह का बेंगलुरु के अस्पताल में निधन
नयी दिल्ली : तमिलनाडु के कुन्नर में हुए हेलीकाप्टर हादसे में एकमात्र जीवित बचे ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह का निधन हो गया है। बीती 8 दिसंबर को क्रैश हुए एमआई17 वी5 हेलीकाप्टर में वो एकमात्र जीवित बचे थे। उनका इलाज कमांड अस्पताल, बेंगलुरु में चल रहा था, जहां उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया था। दुर्घटना में सीडीएस जनरल बिपिन रावत और 12 अन्य लोगों की मौत हो गई थी। भारतीय वायुसेना ने ट्वीट कर कहा कि यह बताते हुए काफी दुख हो रहा है कि ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह का इलाज के दौरान आज निधन हो गया है। वो 8 दिसंबर 2021 को हुए हादसे में अकेले जीवित बचे थे। एयरफोर्स उनके निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त करता है और उनके परिवार के साथ मजबूती से खड़ा है। ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह यूपी के देवरिया के खोरमा कन्हौली गांव के रहने वाले थे, लेकिन उनका जन्म दिल्ली में हुआ था। उनके पिता कृष्ण प्रताप सिंह सेना से कर्नल के पद से रिटायर हुए हैं। बचपन से ही उनकी परवरिश फौजी वातावरण में हुई, उनका छोटा भाई तनुज सिंह नव सेना में हैं। अपने पीछे वरुण सिंह पत्नी गीतांजली बेटे रिद रमन और बेटी आराध्या को छोड़ गए हैं, फिलहाल उनका परिवार भोपाल में रहता है।
एमआई17 वी5 हैलीकाप्टर क्रैश हादसे के बारे में जानकारी देते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद को बताया था कि, 8 दिसंबर 2021 को दोपहर के वक्त भारतीय वायुसेना का एमआई17 वी5 हेलीकाप्टर कुन्नूर के पास क्रैश हो गया। इस हादसे में सीडीएस जनरल बिपिन रावत समेत 12 लोगों की मौत हो गई। जनरल बिपिन रावत वेलिंग्टन स्थित डिफेंस सर्विस स्टाफ कालेज के पूर्वनिर्धारित दौरे पर थे। वायुसेना के एमआई 17 हेलिकॉप्टर ने सुलूर एयरबेस से 11बजकर 48मिनट पर उड़ान भरी। इसे 12बजकर 15 मिनट पर वेलिंग्टन में लैंड करना था, लेकिन 12बजकर 08मिनट पर यह क्रैश हो गया। इस दुर्घटना में सीडीएस जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत, ब्रिगेडियर एल एस लिड्डर, कर्नल हरजिंदर सिंह, लांस नायक विवेक कुमार, नायक गुरुसेवक सिंह , लांस नायक बी साई तेजा, नायक जितेंद्र कुमार, हवलदार सतपाल राई, विंग कमांडर पीएस चौहान, स्क्वॉड्रन लीडर कुलदीप सिंह, राणा प्रताप दास, जेडब्ल्यूओ प्रदीप का उसी दिन निधन हो गया था।
सुष्मिता और लारा के बाद भारत की हरनाज बनीं मिस यूनिवर्स 2021
21 साल बाद किसी भारतीय ने जीता है खिताब
मिस यूनिवर्स 2021 का ताज भारत की हरनाज संधू ने अपने नाम कर लिया है। इजराइल में हुई इस प्रतियोगिता के प्रीलिमिनरी राउंड में 75 से ज्यादा खूबसूरत और प्रतिभाशाली युवतियों ने हिस्सा लिया था। टॉप 3 में साउथ अफ्रीका और पराग्वे की सुंदरियों को पीछे छोड़ते हुए हरनाज संधू ने ‘ब्रह्माण्ड सुंदरी’ के ताज पर अपना नाम लिख डाला। खास बात ये है कि हरनाज से पहले केवल दो भारतीय महिलाएं मिस यूनिवर्स बनी हैं। भारत ने इससे 21 साल पहले इस खिताब पर कब्जा किया था। 1994 में अभिनेत्री सुष्मिता सेन और 2000 में लारा दत्ता ने यह खिताब जीता था। हरनाज से पूछा गया था कि आज के दबावों से निपटने के लिए युवा महिलाओं को आप क्या सलाह देंगी?
इस सवाल पर हरनाज ने जवाब दिया, ‘आज का युवा जिस सबसे बड़े दबाव का सामना कर रहा है, वह है खुद पर विश्वास करने का। यह जानना कि आप यूनीक हैं, आपको सुंदर बनाता है। दूसरों के साथ अपनी तुलना करना बंद करें और दुनिया भर में हो रही ज्यादा महत्वपूर्ण चीजों के बारे में बात करें। बाहर निकलें, अपने लिए बोलें, क्योंकि आप अपनी लाइफ की लीडर हैं। आप खुद अपनी आवाज हैं। मुझे खुद पर विश्वास था और इसलिए मैं आज यहां खड़ी हूं।’ मिस यूनिवर्स 2021 का क्राउन जीतने के बाद एक वीडियो में हरनाज काफी खुश नजर आ रही हैं। हंसते हुए हरनाज ‘चक दे फट्टे इंडिया… चक दे फट्टे’ कहती दिखी। भारत की हरनाज संधू ने तीन घंटे चली लाइव प्रतियोगिता में मिस यूनिवर्स का खिताब अपने नाम करने से पहले कई राउंड पार किए। उन्होंने नेशनल कॉस्ट्यूम, इवनिंग गाउन, इंटरव्यू और स्विमवियर राउंड में कॉन्फिडेंस और ग्रेस दिखाया। उनके साथ टॉप 10 में पराग्वे, प्यूर्टो रिको, यूएसए, दक्षिण अफ्रीका, बहामास, फिलीपींस, फ्रांस, कोलंबिया और अरूबा की सुंदरियां शामिल थीं। सभी राउंड में बेहतर प्रदर्शन करते हुए हरनाज ने इतिहास रचा।
नेहरू के टोकने पर 10 भाषाओं में बोल गये झाँसी के पहले सांसद धुलेकर
हिन्दी बोलने पर टोका गया था
झांसी : झांसी के पहले सांसद आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर मराठी परिवार से थे। लेकिन, उनकी बोलचाल की भाषा हिंदी ही थी। वह हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में उनका योगदान अहम रहा है। एक रोचक किस्सा संसद से जुड़ा है। किस्सा कुछ यूं है कि वह एक बार संसद में हिंदी में बोल रहे थे। इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें टोक दिया। पं. नेहरू ने कहा, संसद में अलग-अलग भाषाओं को जानने वाले बैठे हुए हैं। यदि आप अपनी बात अंग्रेजी में रखें तो सबको समझ में आएगी। इस पर धुलेकर रुके नहीं। वह, अंग्रेजी में ही नहीं, बल्कि मराठी, गुजराती, उड़िया, अरबी, बंगाली, संस्कृत, उर्दू समेत दस भाषाओं में बोले। वह बोलते जा रहे थे और संसद में मौजूद सभी लोग हतप्रभ थे। धुलेकर ने कहा, मुझे दस भाषाओं का ज्ञान है। पर, भारत को जोड़ने वाली भाषा हिंदी ही है, जिसे राजभाषा बनाया जाना चाहिए।
संविधान सभा में सबसे विवादास्पद विषय था भाषा । इस बात पर सबसे अधिक विवाद था की सदन में कौन सी भाषा बोली जाएगी , संविधान किस भाषा में लिखा जाएगा और किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाएगा। इस पर 10 दिसंबर 1946 का दिन ऐतिहासिक है ।
संयुक्त प्रांत से चुनकर आनेवाले आर. वी. धुलेकर (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित रघुनाथ विनायक धुलेकर का जन्म 1891 -1980, झांसी, शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय व इलाहाहाबाद विश्वविद्यालय) ने एक संशोधन विधेयक प्रस्ताव पेश किया । जब उन्होंने हिंदुस्तानी भाषा में बोलना शुरू किया तो सभा के अध्यक्ष ने उन्हें याद दिलाया कि बहुत सारे सदस्य उस भाषा को नहीं समझते जिस भाषा में वह बोल रहे हैं। इस पर धूलेकर का जवाब था, कि जो लोग हिंदुस्तानी नहीं समझते हैं उन्हें इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है । जो लोग भारत का संविधान बनाने के लिए इस सदन में मौजूद हैं, लेकिन हिंदुस्तानी भाषा नही जानते वे इस सदन के सदस्य रहने के काबिल नही हैं अच्छा हो वह सदन से बाहर चले जाएं, सदन में हंगामा मच गया , लेकिन धुलेकर ने अपना वक्तव्य जारी रखा और कहा प्रस्ताव करता हूं कि प्रक्रिया समिति अपना नियम अंग्रजी में न बनाकर हिंदुस्तानी भाषा में बनाए। धुलेकर ने अपना वक्तव्य जारी रखते हुए कहा, मैं अपील करता हूं की हमलोगों को, जिसने आजादी की लड़ाई जीती है और इसके लिए संघर्ष करते रहे हैं , अपनी भाषा में सोचना और अभिव्यक्ति करनी चाहिए । कितने धुरंधर , कितने दृढ़ निश्चय वाले थे हमारे वह पूर्वज जिन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर करके बिना कुछ पाने की उम्मीद के लीक से उतरे देश को केवल आत्मबल से ही लीक पर लाने का प्रयास करते रहे। शायद उनके मन ने एक दिवास्वप्न देखा था की हमारा आजाद भारत ऐसा होगा वैसा होगा शायद स्वर्ग से भी सुंदर ।
यह भाषाई बात इसलिए उठी थी कि भारत अब आजाद होने जा रहा था , लेकिन वर्षो तक अंग्रेजी भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के बल पर उसका काम चलाता रहा , लेकिन अब जब देश आजाद होने जा रहा था, तो प्रश्न यह उठ रहा था कि किस भाषा में संविधान लिखी जाए और उत्तर और दक्षिण के और पूरब पश्चिम के राज्यों में सामंजस्य कैसे स्थापित हो ? उत्तर में गंगा के किनारे और उसके आसपास की भाषा अवधी , भोजपुरी, मैथिली, मारवाड़ी और भी कई अन्य भाषाओं की बोली समझ में आती थी । दूसरी बात यह की दक्षिण भारत के लोगों के लिए यह भाषाएं अपरिचित थी । पूर्वी और दक्षिण भारत के लोग असमी,बंगाली, उड़िया, तमिल और तेलुगू भाषा बोली जाती थी जिनके हरेक की अपनी लिपि थी और उनकी श्रेष्ठ कोटि की अपनी साहित्यिक परंपरा थी । इस मसले पर पुरुषोत्तम दास टंडन से खुलकर बहस हुई जो हिंदी को विदेशी प्रभावों से मुक्त करने के कट्टर हिमायती थे । टंडन अखिल भारतीय हिंदी साहित्य परिषद के उपाध्यक्ष थे, जिन्होंने मांग की थी की देवनागरी लिपि ही एक मात्र वह भाषा है, जिसके कारण हिंदी ही इस देश की एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है राजर्षी पुरुषोत्तम दास टंडन 13 वर्षों तक उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष रहे और उन्हें भारत रत्न से भी नवाजा गया ।
(साभार – अमर उजाला, चिरौरी न्यूज)
देवघर एम्स व एयरपोर्ट से जुड़ेगा पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे
कोलकाता/ पटना : केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा भारत माला-2 प्रोजेक्ट के तहत पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे की स्वीकृति दिये जाने के बाद जनवरी में इस एक्सप्रेस-वे का टेंडर निकालने की अनुमति दे दी गयी है। एनएचआई ने पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे की रूपरेखा तैयार कर ली है। पटना से 6 लेन यह एक्सप्रेस-वे बिहारशरीफ, सिकंदरा, चकाई से सीधे झारखंड में देवघर जिले के देवीपुर क्षेत्र में प्रवेश करेगी। देवीपुर में यह एक्सप्रेस-वे एम्स को जोड़ने वाली प्रस्तावित फोरलेन सड़क को कनेक्ट करते हुए मधुपुर की ओर निकल जायेगी। इससे देवघर की बिहार व बंगाल से कनेक्टिविटी बढ़ेगी. इतना ही नहीं, बिहार और बंगाल से एम्स आने वाले रोगियों को भी सुविधा होगी।
देवघर के मधुपुर में एयरपोर्ट को कनेक्ट करने वाली चांदडीह-मधुपुर स्टेट हाइवे पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे से जुड़ जायेगा। मधुपुर से करौं होते हुए यह एक्सप्रेस-वे करमाटांड़ व जामताड़ा से दुर्गापुर होते हुए कोलकाता निकल जायेगी। देवघर जिले में करीब 250 गांवों से यह एक्सप्रेस-वे गुजरेगी। पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे की लंबाई 495 किलोमीटर होगी। यह सड़क 6 लेन होगी व इसमें कुल 21 हजार करोड़ रुपये खर्च किये जायेंगे। यह एक्सप्रेस-वे पूरी तरह से नया ग्रीनफिल्ड बनेगा।
बिहार सरकार के प्रस्ताव पर केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इस ग्रीनफिल्ड एक्सप्रेस-वे को मंजूरी दी है। अगस्त में देवघर आये बिहार के पीडब्ल्यूडी मंत्री नितिन नवीन व गोड्डा सांसद डॉ निशिकांत दुबे की बैठक में पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे को एम्स व एयरपोर्ट से जोड़ने के लिए एलाइमेंट को फाइनल किया गया था। इस एलाइमेंट के अनुसार देवघर जिले में बहुत कम मकान टूटेंगे. अधिकांश खाली जमीन से एक्सप्रेस-वे गुजरेगी। यह मार्ग तैयार होने के बाद देवघर से पटना व कोलकाता का सफर दो से ढाई घंटे में पूरी करने की संभावना जतायी गयी है।
फसलों को जहरीले आर्सेनिक से बचाव करेगी नयी खाद
कोलकाता के दो विश्वविद्यालयों का साझा शोध
अब नई खाद फसलों को जहरीले आर्सेनिक से बचाव करेगी
कोलकाता : अब नई खाद फसलों को जहरीले आर्सेनिक से बचाव करेगी। कोलकाता के दो विश्वविद्यालयों के शोध से पता चला है कि कृषि में उर्वरक के रूप में सोडियम सल्फेट का उपयोग फसलों में आर्सेनिक के प्रवेश को रोक सकता है। यह मूल रूप से आर्सेनिक को मिट्टी के अंदर ही सोख लेता है। कलकत्ता और जादवपुर दो विश्वविद्यालयों का शोध पत्र हाल में एनवायरमेंट पाल्यूशन नामक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं की एक टीम धान सहित विभिन्न फसलों में आर्सेनिक के प्रवेश को रोकने के लिए नए तरीके तलाश रही है। आर्सेनिक भूजल में पाया जाना वाला जहरीला रासायनिक तत्व है। शोधकर्ताओं ने आर्सेनिक को नियंत्रित करने के लिए खेती में सोडियम सल्फेट के इस्तेमाल का सुझाव दिया है। इस मामले में उन्होंने मुख्य रूप से धान पर शोध किया है। शोध पत्र के मुख्य लेखक जादवपुर के पारिस्थितिकी विभाग के दीपांजन मृधा हैं। उनके अनुसार सोडियम सल्फेट फसलों में आर्सेनिक जैसे घातक जहर के प्रवेश को रोकने में सक्षम है।
कृषि और पर्यावरणविदों ने बार-बार कहा है कि सिंचाई के लिए भूजल का उपयोग करने के परिणामस्वरूप आर्सेनिक भी धान और अन्य अनाजों में प्रवेश कर रहा है। उनके मुताबिक यह खतरा सिर्फ आर्सेनिक प्रभावित इलाकों तक ही सीमित नहीं है, यह अनाजों के जरिए अलग-अलग हिस्सों में फैल रहा है।
देश के 20 प्रतिशत भूजल में जहरीली मात्रा में आर्सेनिक मौजूद
आइआइटी खडग़पुर ने हाल में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से एक अध्ययन में पता लगाया है कि देश के करीब 20 प्रतिशत भूजल में जहरीला आर्सेनिक बड़े स्तर पर मौजूद है। देश की करीब 25 करोड़ आबादी आर्सेनिक वाले जहरीले पानी के संपर्क में है। देश में पंजाब, हरियाणा, बंगाल, बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, असम, आदि राज्यों में आर्सेनिक की समस्या गंभीर है। आर्सेनिक के लगातार संपर्क में आने से त्वचा, हृदय संबंधी रोग, डायबिटीज, श्वसन और गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल संबंधित समस्याएं व कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं।
अब लीज पर दिया जायेगा दिल्ली का पहला पाँच सितारा होटल अशोक
25 एकड़ में फैला है, 550 कमरे हैं
नयी दिल्ली : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ढांचागत परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिये पुरानी संपत्तियों को पट्टे पर देने या बेचने को लेकर राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइपलाइन (एनआईपी) की घोषणा की थी, इसके तहत अशोक होटल को 99 साल के लीज पर दिया जा सकता है
पंडित नेहरू ने बनवाया अशोक होटल
होटल अशोक साल 1956 में शुरू हुआ था। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की चाणक्यपुरी में मौजूद अशोक होटल में 7 मंजिल और 550 कमरे हैं। अशोक होटल की खासियत यहां मौजूद बिना खम्भों के सबसे बड़ा कन्वेंशन हॉल है। होटल अशोक का निर्माण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा जम्मू-कश्मीर के राजकुमार कर्ण सिंह द्वारा सरकार को दान की गई 25 एकड़ की जमीन पार्कलैंड पर किया गया था। मशहूर आर्किटेक्ट ई बी डॉक्टर की अगुवाई में अशोक होटल का पूरा खाका तैयार हुआ था।
यूनेस्को की मेजबानी
अशोक की इमारत इंडो-मॉडर्निस्ट आर्किटेक्चर स्टाइल का प्रतीक है। अशोक होटल नई दिल्ली को नौवें यूनेस्को सम्मेलन के आयोजन के हिसाब से दुनिया भर के नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों की मेजबानी के लिए बनाया गया था। अशोक होटल की स्थापना के वक्त इसके 23 शेयरहोल्डर्स में 15 रियासतों के शासक थे।
पंडित नेहरू के दिल के करीब
पीएम जवाहरलाल नेहरू अशोक होटल के निर्माण के काम को देखने के लिए घोड़े पर बैठकर आते थे। अशोक होटल परियोजना नेहरू के दिल के इतने करीब थी कि उन्होंने खुद परिसर में पेड़-पौधों को रोपने का काम देखा था। उसी समय होटल में आम का पहला पेड़ लगाया गया था। आज इसे ‘पिकल ट्री’ के नाम से जाना जाता है और इससे मिले फलों से होटल की जैम और मुरब्बे की जरूरतें पूरी हो जाती हैं।

अमिताभ की फिल्म शूट हुई
अमिताभ बच्चन की फिल्म लावारिस का एक सीन भी साल 1981 में अशोक होटल में शूट किया गया था। साल 2017 में अशोक होटल को बिल्डिंग ऑपरेशन और रखरखाव के लिए एलईईडी एलगोल्ड सर्टिफिकेट मिला था। 1970 के दशक में अशोक होटल ने नई दिल्ली में पहले नाइट क्लबों में से एक की मेजबानी की, जिसे सपर क्लब कहा जाता है। उषा उत्थुप , शेरोन प्रभाकर , हेमा मालिनी , उदय शंकर सभी ने स्टारडम हासिल करने से पहले कार्यक्रम स्थल पर प्रदर्शन किया।
कई बड़े आयोजनों का बना गवाह
साल 1968 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अपने बेटे राजीव गांधी की सोनिया से शादी का जश्न मनाने के लिए अशोक होटल में एक बड़े भोज की मेजबानी की थी। 1980 के दशक में फिल्म अभिनेता शाहरुख खान अपने करियर के शुरुआती दिनों में अक्सर अशोक होटल जाते थे। साल 1989 में यश चोपड़ा की फिल्म चांदनी की शूटिंग भी अशोक होटल में हुई थी।
एनडीए नेताओं का भोज
अशोक होटल में करीब 1000 कर्मचारी काम करते हैं, जिसके संचालन में रोजाना करीब 35 लाख रुपये का खर्च आता है। भारत में साल 2019 के आम चुनाव के बाद सरकार बनाने से पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए गठबंधन के नेताओं के लिए अशोक होटल में अमित शाह की अध्यक्षता में एक रात्रिभोज की मेजबानी की थी।
अशोक होटल का प्रबंधन
अशोक होटल में फिदेल कास्त्रो, अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी स्वागत हो चुका है। अशोक होटल में एयर इंडिया के स्टाफ के लिए 150 कमरे पहले से ही बुक रहते थे। पर्यटन मंत्रालय के अधीन आने वाला भारतीय पर्यटन विकास निगम लि. (आईटीडीसी) सार्वजनिक उपक्रम है, जो अशोक होटल को संभालता है। यह देश में विभिन्न स्थानों पर पर्यटकों के लिए होटल, रेस्तरां का परिचालन करने के साथ परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराता है।
सांसदों को भी अशोक का सुख
दिल्ली में सरकारी आवास मुहैया कराए जाने तक सांसदों को होटल में कमरे की सुविधा देने का प्रावधान था। पांच सितारा अशोक होटल में महीनों तक सांसद रहते थे। संसद में बड़ी संख्या में नए सदस्य आने और पुराने सांसदों की ओर से आवास खाली करने, घर की मरम्मत आदि में वक्त लगने की वजह से सांसद को पांच सितारा होटल अशोक में रहने की सुविधा मिलती थी।
अशोक को पट्टे पर देने की तैयारी
अशोक समूह के होटल आईटीडीसी के तहत प्रमुख होटल श्रृंखला हैं। अशोक होटल का ब्रांड मूल्य पिछले 40-50 वर्ष में विकसित हुआ है और विभिन्न मंत्रालयों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं द्वारा आयोजित सभी सरकारी कार्यक्रमों के लिए केंद्रीय मंच रहा है। मोदी सरकार की सोच है कि अशोक समूह के ब्रांड मूल्य का लाभ उठाया जा सकता है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)
दुनिया में सबसे पहले समुद्र से निकला सिंहभूम, अफ्रीका-ऑस्ट्रेलिया से 20 करोड़ साल पुराना
7 साल की खोज में हुआ साबित
सिंहभूम : दुनिया में सबसे पहले समुद्र से बाहर कौन सा द्वीप बाहर आया? अब तक हम सब यही मानते रहे कि सबसे पहले अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया समुद्र से बाहर आए, लेकिन अब नये शोध में सामने आया है कि झारखंड में सिंहभूम जिला समुद्र से बाहर आने वाला दुनिया का पहला महाद्वीप है। 3 देशों के 8 शोधकर्ता, 7 साल के शोध के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं। सिंहभूम में रिसर्च टीम की अगुआई करने वाले ऑस्ट्रेलिया के पीटर केवुड ने कहा, ‘हमारा सौरमंडल, पृथ्वी या दूसरे ग्रह कैसे बने? इन सवालों की खोज में मैं और मेरी टीम के 7 साथी, जिनमें 4 भारत से थे, ने 7 साल तक झारखंड के कोल्हान और ओडिशा के क्योंझर समेत कई दूसरे जिलों के पहाड़-पर्वतों को छान मारा। पृथ्वी से जमीन कब बाहर निकली, इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जुनून जरूरी था। ये जगह नक्सल प्रभावित है लेकिन हमने तय किया था कि करना है, सो करना है।’ ‘अपने 6-7 साल के फील्ड वर्क में लगभग 300-400 किलो पत्थरों का लेबोरेट्री में परीक्षण किया है। इनमें कुछ बलुआ पत्थर थे और कुछ ग्रेनाइट। हमने जो बलुआ पत्थर देखें, उनकी खासियत यह थी कि उनका निर्माण नदी या समुद्र के किनारे हुआ था। नदी या समुद्र का किनारा तभी हो सकता है, जब आसपास भूखंड हो।
सिंहभूम 320 करोड़ साल पहले बना था
पीटर ने कहा, ‘जब हमने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारित करने की कोशिश की, तब हमें पता चला कि सिंहभूम आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था। इसका मतलब यह हुआ कि आज से 320 करोड़ साल पहले यह हिस्सा एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था।’ ‘अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले लेकिन हमने पाया कि सिंहभूम क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले बाहर आया। हमारा दावा कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है, यह हमारी पूरी टीम के लिए बड़ा ही रोमांचक पल था।’
सिंहभूम महाद्वीप के नाम से जाना जाता है इलाका
हमने सिंहभूम के ग्रेनाइट पत्थर की जब जांच की तो यह पता चला- सिंहभूम महाद्वीप आज से तकरीबन 350 से 320 करोड़ साल पहले लगातार ज्वालामुखी गतिविधियों से बना था। इसका मतलब यह हुआ कि 320 करोड़ साल पहले सिंहभूम महाद्वीप समुद्र की सतह से ऊपर आया, लेकिन उसके बनने की प्रक्रिया उससे भी पहले शुरू हो गई थी। यह क्षेत्र उत्तर में जमशेदपुर से लेकर दक्षिण में महागिरी तक, पूर्व में ओडिशा के सिमलीपाल से पश्चिम में वीर टोला तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र को हम सिंहभूम क्रेटान या महाद्वीप कहते हैं। पीटर ने बताया, ‘शोध के लिए हमने पिछले 6-7 साल में कई बार सिंहभूम महाद्वीप के कई हिस्सों में फील्ड वर्क किया जैसे कि सिमलीपाल, जोडा, जमशेदपुर, क्योंझर इत्यादि। अध्ययन के दौरान हमारा केंद्र जमशेदपुर और ओडिशा का जोड़ा शहर था। यहीं से कभी बाइक से कभी बस-कार से फील्ड वर्क पर निकलते थे।’
आगे के शोध के लिए राह खुली
सिंहभूम दुनिया का पहला द्वीप है जो समुद्र से बाहर निकला, यानी यहां के आयरन ओर की पहाड़ियों समेत दूसरी पहाड़ियां 320 करोड़ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। इस रिसर्च के मॉड्यूल से पहाड़ी इलाकों अथवा पठारी क्षेत्र में आयरन, गोल्ड माइंस खोजने में सहूलियत हाेगी। इसके अलावा बस्तर, धारवाड़ इलाकों में भूमिगत घटनाओं की उत्पति की जानकारी मिलेगी। भू-गर्भीय अध्ययन के लिए भी यह रिसर्च बहुत उपयोगी साबित होगी।
कोलकाता-बारीपदा से कूरियर के जरिए ऑस्ट्रेलिया भेजते थे पत्थर
हमारी टीम अलग-अलग समय पर शोध के लिए भारत पहुंची। इस दौरान तीन से चार क्विंटल पत्थर रिसर्च के लिए इकट्ठे किए। उन्हें बारीपदा और कोलकाता के रास्ते ऑस्ट्रेलिया के लिए कूरियर से भेजा। हम लोग स्थानीय होटल या ढाबे में खाना खाते थे और रिसर्च के लिए जंगल-पहाड़ों काे निकलते थे। हमारा फील्ड वर्क 2017 और 2018 में ज्यादा रहा। हम खासतौर से बताना चाहते हैं कि नक्सल प्रभावित एरिया हाेने के बावजूद कभी परेशानी नहीं हुई।
सैंपल कलेक्शन में स्थानीय लोगों ने मदद की
हम पत्थरों को उनके प्राकृतिक रूप में समझने की कोशिश करते थे। जैसे उनका स्वरूप कैसा है, उनका रंग क्या है, वे कितनी आसानी से टूट सकते हैं, कितनी दूर तक फैले हुए हैं। हम अलग-अलग समय में आते थे। कभी बरसात, कभी गर्मी के दिनाें में। फील्ड वर्क में सबसे कठिन काम यह ढूंढना होता था कि पत्थर कहां पर मौजूद हैं। हमारे पास मैप होते थे, लेकिन ज्यादातर समय छोटी चट्टानें या फिर सड़कों के किनारे या नदी नालों के किनारे स्थित पत्थरों तक पहुंचने के लिए हमें स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ी। सिंहभूम में फील्ड वर्क करने के दौरान ऐसी परिस्थितियां आईं, जब स्थानीय लोगों ने हमें पत्थर ढूंढने में बहुत मदद की थी।
5-5 किलो के थैलों में एकत्रित करते थे सैंपल
पत्थरों को प्राकृतिक रूप में जांचने के बाद हम उनका सैंपल कलेक्ट करते और लैबोरेट्रीज में ले जाते। हम 5-5 किलो के थैलों में सैंपल कलेक्ट करते थे। सैंपल कलेक्ट करने के लिए हम पत्थरों को हथौड़े से मारकर उनके टुकड़े करते। यह भी एक कठिन काम था। कभी-कभी ऐसे पत्थर मिलते थे, जिन्हें तोड़ने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी। इन सैंपल को हम लैबोरेट्री में ले जाते थे। वहां यह खोज की जाती थी कि वह किन- किन रासायनिक तत्वों से बने थे जैसे- लोहा, मैग्नीशियम, ऑक्सीजन वगैरह। आखिरकार हमारे संघर्ष का मुकाम सुखद रहा। इस तरह हमने पाया कि समुद्र से निकलने वाला द्वीप हमारा सिंहभूम ही था।
रिसर्च टीम में ये वैज्ञानिक शामिल
सिंहभूम पर 7 साल तक रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों की टीम में ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिविर्सिटी के पीटर केवुड, जैकब मल्डर, शुभोजीत राय, प्रियदर्शी चौधरी और ऑलिवर नेबेल, ऑस्ट्रेलिया की ही यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न की ऐश्ली वेनराइट, अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टूट्यूट ऑफ टेकनोलॉजी के सूर्यजेंदु भट्टाचार्य के साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी के शुभम मुखर्जी शामिल हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
कश्मीर से कन्याकुमारी की पसन्द अलवर का कलाकंद
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी भाता था इसका स्वाद
अलवर : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब भी सड़क मार्ग से जयपुर आते या जाते थे, तो बीच में एक जगह उनका काफिला जरूर रुकता था। ये जगह होती थी अलवर और रुकने की वजह होती दूध से बनी खास मिठाई कलाकंद। इस मिठाई को पसंद करने वालों की सूची काफी लंबी है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत के कोने-कोने तक इसका स्वाद पहुंच चुका है। मिल्क केक के नाम से प्रसिद्ध अलवर के कलाकंद का जायका आज कई सरहदें पार कर चुका है। राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको ले चलते हैं कलाकंद के मीठे सफर पर।
कलाकंद बनने की कहानी काफी रोचक है। अभिषेक तनेजा बताते हैं आजादी से पहले पाकिस्तान में बाबा ठाकुर दास के हाथ से दूध फट गया था। तब बतौर हलवाई उन्होंने एक प्रयोग किया। दूध को फेंकने की बजाय इसमें चीनी मिलाकर ओटाने लगे। दूध से पानी खत्म होने के बाद इसे ठंडा करने के लिए खोमचे में रख दिया। जब इसे चखकर देखा तो स्वाद बेहतरीन लगा। ग्राहकों ने भी इसे काफी पसंद किया। आजादी के बाद बाबा ठाकुरदास का परिवार अलवर आकर बस गया। यहां छोटी सी दुकान खोली और कलाकंद बनाना शुरू किया। अभिषेक बाबा ठाकुरदास की तीसरी पीढ़ी से हैं। अलवर में आज उनके 5 स्टॉल हैं, यहां लगी भट्टियों में दिन रात कलाकंद तैयार होता है।
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ठाकुरदास के हाथों बने कलाकंद का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा। धीरे-धीरे स्थानीय हलवाईयों ने भी इसे बनाने का तरीका सीखा। आज पूरे अलवर में करीब ढाई हजार से ज्यादा दुकानों पर कलाकंद बनता है। कारोबारी बताते हैं कि अलवर शहर और गांवों में बनने वाले करीब 15 हजार किलो कलाकंद की खपत रोज होती है। अब तो अलवर का कलाकंद देश की सीमाओं के बाहर भी पहुंच चुका है। यहां आने वाले सैलानी तो इसे अपने साथ ले जाते ही हैं, लेकिन बाबा ठाकुरदास के नाम से इसका एक आउटलेट दुबई में भी खुलने जा रहा है।
ऐसे तैयार होता है कलाकंद
करीब 4 किलो दूध में 1 किलो मिल्क केक तैयार होता है। दूध को गर्म कर उसका छेना ( फाड़ा ) तैयार किया जाता है। फिर उसमें स्वाद के अनुसार चीनी मिलाई जाती है। केसर डालकर सांचे में जमाया जाता है। जरूरत के अनुसार ड्राई फ्रूट काम लेते हैं। ज्यादा भुना हुआ और कम भुना हुआ। दोनों का स्वाद अलग होता है।
सालाना कारोबार 200 करोड़ से ज्यादा
बाबा ठाकुर दास के पोते अभिषेक तनेजा ने बताया कि 1954 में मिल्क केक 2 रुपये प्रति किलो बिकता था। आज इसके भाव 400 रुपये किलो है। अभिषेक बताते हैं कि अकेले अलवर में कलाकंद का सालाना कारोबार 200 करोड़ से भी ज्यादा है। अगर जिले में ढाई हजार कारोबारियों को जोड़ा जाए तो इस काम में 10 हजार से ज्यादा लोग जुटे हुए हैं। अकेले बाबा ठाकुरदास की फैक्ट्री में करीब 1 हजार किलो मिल्क केक रोज तैयार होता है। फेस्टिवल सीजन में प्रोडक्शन दोगुना हो जाता है।
दूध पहुँचाने वालों की भी तीसरी पीढ़ी
खास बात ये भी है कि जो परिवार बाबा ठाकुरदास को दूध सप्लाई करता था, उसी परिवार की तीसरी पीढ़ी आज भी उन्हें दूध की आपूर्ति कर रहे हैं। मिल्क केक बनाने वाले कारोबारियों तक दूध गांवों से ही पहुंचता है।अलवर की मिल्क केक का स्वाद यहां आने वाले हर पर्यटक को अपनी ओर खींच लाता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)




