Friday, October 30, 2026
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शाकाहारी है या मांसाहारी – साफ-साफ खुलासा करें, : दिल्ली हाईकोर्ट

धोखे से किसी की थाली में कुछ भी नहीं परोस सकते

नयी दिल्ली । दिल्ली हाई कोर्ट ने भोजन कारोबार (फूड बिजनेस ऑपरेटर्स) से जुड़े लोगों को निर्देश दिया है कि वे खाने की चीजों को बनाने में इस्तेमाल सामग्री का पूरा और साफ-साफ खुलासा करें। कोर्ट ने कहा कि हर व्यक्ति को यह जानने का अधिकार है कि वह क्या खा रहा है और छल का सहारा लेकर लोगों को उनकी थाली में कुछ भी परोसा नहीं जा सकता।
जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस जसमीत सिंह की बेंच ने यह आदेश उस याचिका पर जारी किया है, जिसमें घरेलू उपकरणों और कपड़ों सहित जनता द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सभी चीजों पर उन्हें बनाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल सामग्री के आधार पर ‘शाकाहारी’ या ‘मांसाहारी’ का लेबल लगाने का निर्देश देने की मांग की गई। याचिका राम गोरक्षा दल नाम के एक संगठन ने दायर की, जो गायों के कल्याण के लिए काम करने का दावा करता है। कोर्ट ने कहा कि प्रशासन की ऐसी गलतियों की जांच करने में नाकामी न केवल एक्ट और नियमों का पालन न करने की वजह बन रही है, बल्कि फूड बिजनेस ऑपरेटर्स के हाथों जनता के साथ धोखे को भी बढ़ावा दे रहा है, खासतौर पर उन लोगों के साथ जो शुद्ध शाकाहार का कड़ाई से पालन करना चाहते हैं।
आदेश के मुताबिक, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि खाने की किसी चीज को बनाने के लिए जानवरों से मिलने वाले घटक का इस्तेमाल कितनी मात्रा में हुआ। उसका अंशमात्र इस्तेमाल भी ऐसी चीजों को मांसाहारी बना देगा और शुद्ध शाकाहार का पालन करने वाले लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक संवेदनशीलता को चोट पहुंचाएगा। इससे धर्म और विश्वास को उनके स्वतंत्र रूप से मानने, उसका अनुसरण करने और प्रसार करने के अधिकार का हनन होगा।
कोर्ट ने फूड बिजनेस ऑपरेटर्स को निर्देश दिया कि खाने वाले चीज को बनाने के लिए इस्तेमाल सामग्री का पूरा और साफ-साफ खुलासा उनके कोड नामों के साथ किया जाए। यह भी बताया जाए कि वह घटक पौधे से मिलते हैं या जानवरों से या फिर लैब में बने हैं। कारोबारियों को खाद्य सुरक्षा से जुड़े कानूनों का सख्ती से पालन करने का आदेश देते हुए कोर्ट ने साफ कहा कि इसमें कोताही पर दंडात्मक कार्रवाई होगी। हाई कोर्ट ने मामले में एफएसएसएआई को 31 जनवरी को अगली सुनवाई पर अनुपालन रिपोर्ट देने का भी निर्देश दिया है।

हमीरपुर के आर्यसमाजी नेता जो मंदिर के तहखाने में छापते थे अंग्रेजों के खिलाफ अखबार

इनके बुलावे पर बुंदेलखंड में आए थे नेहरू
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में एक आर्यसमाजी विचारधारा के समर्थक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को पहली विधानसभा चुनाव में एमएलए बनने का जनादेश मिला था। इन्‍होंने विधायक बनने से पहले अंग्रेजों के खिलाफ हुंकार भरी थी। वह ऐतिहासिक मंदिर के तहखाने से अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ अखबार का प्रकाशन भी चोरीछिपे करते थे। पकड़े जाने पर इन्‍हें जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा था। इनका नाम था पंडित मन्‍नीलाल गुरुदेव।
हमीरपुर जिले के मुस्करा क्षेत्र के गहरौली गांव निवासी पंडित मन्‍नीलाल गुरुदेव आर्यसमाजी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने असहयोग आन्दोलन, नमक आन्दोलन, सविनय आन्दोलन, अवज्ञा आन्दोलन और भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्‍सा लिया था। अंग्रेजों के खिलाफ हल्ला बोलने पर इन्हें आठ सालों तक हमीरपुर और अन्य जिलों की जेल में निरुद्ध कर सजाएं दी गई थी।
मन्‍नीलाल स्वतंत्रता संग्राम के आन्दोलन में शीर्ष स्तर के क्रांतिकारियों से भी जुड़ गए थे। इसीलिए इन्होंने अपने गांव में कांग्रेस का बड़ा सम्मेलन कराया था, जो संभवत: बुंदेलखंड में कांग्रेस का पहला सम्‍मेलन भी था। वर्ष 1936 में पंडित मन्‍नीलाल गुरुदेव ने अपने गांव गहरौली में कांग्रेस का जिला स्‍तरीय सम्मेलन कराया था जिसमें जवाहरलाल नेहरू आए थे। उनके साथ उनकी बेटी इंदिरा गांधी भी थीं जो उस समय बहुत छोटी थीं।
इस सम्मेलन में राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के अलावा पार्टी के तमाम अन्य नेता और जिले भर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी एकत्र हुए थे। यह सम्मेलन बुन्देलखंड का पहला था जिसमें जवाहरलाल नेहरू ने हजारों लोगों में जोश भरा था। सम्मेलन के बाद जवाहरलाल नेहरू और तमाम नेताओं ने गांव में बने बांके बिहारी जूदेव मंदिर में माथा भी टेका था। यहां एतिहासिक सम्मेलन के बाद मन्‍नीलाल गुरुदेव बुन्देलखंड क्षेत्र में लौह पुरुष के नाम से विख्यात भी हुए थे।
मंदिर के तहखाने में अंग्रेजों के खिलाफ छपता था अखबार
मन्‍नीलाल गुरुदेव के पौत्र विमल चन्द्र गुरुदेव ने बताया कि गांव में पूर्वजों ने 1929 में बांके बिहारी जूदेव मंदिर बनवाया था। इस मंदिर का शिखर भी पचास फीट ऊंचा है। इसी मंदिर के तहखाने में अंग्रेजों के खिलाफ तानाबाना बुना गया था। क्रांतिकारी मन्‍नीलाल गुरुदेव, दीवान शत्रुघ्न सिंह, रामगोपाल गुप्ता व गांव के तमाम सेनानी यहीं पर इकट्ठा होकर अंग्रेजों के खिलाफ ‘बुन्देलखंड केसरी’ नामक अखबार छापते थे। मंदिर के तहखाने से सुरंग के जरिए आम लोगों में अखबार पहुंचाया जाता था। बताया कि अंग्रेजों से बचने के लिए क्रांतिकारी यहीं मंदिर में ठिकाना बनाए हुए थे। मौजूदा समय में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जा चुका है।

पहली विधानसभा के चुनाव में बने थे विधायक
आजादी के बाद वर्ष 1952 में पहली विधानसभा के चुनाव कराए गए थे जिसमें महोबा सीट से क्रांतिकारी मन्‍नीलाल गुरुदेव ने कांग्रेस के टिकट से चुनावी महासमर में भाग्य आजमाया। उन्हें मतदाताओं ने विधानसभा पहुंचने का मौका भी दिया। उनके पौत्र विमल चन्द्र गुरुदेव ने बताया कि मौदहा विधानसभा की सीट पर चौथी बार चुनाव में मन्‍नीलाल गुरुदेव ने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी से नाता जोड़ा और चुनाव मैदान में उतरे लेकिन वह कांग्रेस प्रत्याशी बृजराज सिंह से पराजित हो गए थे। उन्हें 15842 मत ही मिल सके थे। विधानसभा चुनाव में पराजय होने के बाद फिर उन्होंने कोई भी चुनाव नहीं लड़ा था।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

ये हैं अमेरिका की पहली महिला पुरोहित जो अलग अन्दाज में करवाती हैं पूजा

भारतवंशी सुषमा द्विवेदी वैवाहिक और धार्मिक अनुष्ठान करवाने वाली अमेरिका की पहली महिला पुरोहित बन गई हैं। अमेरिका में अब तक ऐसे अनुष्ठान पुरुष पुजारी ही कराते आए हैं। वह समलैंगिकों से लेकर हर जाति, संप्रदाय, रंग, नस्ल आदि के लोगों के लिए पूजा कराती हैं।
भारत और भारत के बाहर भी कई महिला पुजारी हैं जो समलैंगिकों समेत सभी समुदाय के लोगों की शादी और दूसरे धार्मिक अनुष्ठान करवाती हैं। इस पहल के जरिए द्विवेदी हिन्दू धर्म में हो रहे बड़े बदलाव का प्रतीक बन गई हैं। धर्म और उसकी परंपराओं का अध्ययन करने वाले कहते हैं कि भारत या विदेशों में भी महिला पुजारी अभी बहुत ज्यादा नहीं हैं लेकिन हिन्दू धर्म में महिलाएं बढ़-चढ़कर आगे आ रही हैं।
दादी से मिला हिन्दू धर्म का ज्ञान
सुषमा ने जब तय किया कि वह भी शादी के फेरे और अन्य अनुष्ठान कराएंगी तो उन्हें अपनी दादी से इस विषय पर बात की। इस बात को जानकर उनकी दादी बहुत खुश हुईं। सुषमा द्विवेदी की दादी पुरोहित नहीं हैं। दादी ने कभी कोई अनुष्ठान नहीं कराया, लेकिन उनके पास सुषमा को पुरोहित बनाने लायक जानकारी थी। दोनों ने साथ बैठकर सारे ग्रंथों का अध्ययन किया। सुषमा ने इन मंत्रों को छांटकर जेंडर न्यूट्रल मंत्र चुने और बनाए ताकि ये किसी भी जाति, लिंग, नस्ल से ऊपर उठकर आशीर्वचन बनें।
सुषमा द्विवेदी अमेरिका की पहली महिला पुजारी हैं जो समलैंगिकों समेत सभी की शादी आदि करवाती हैं। इसके साथ ही वह ऑर्गेनिक फूड कंपनी ‘डेली हार्वेस्ट’ में वाइस प्रेसिडेंट भी हैं। उनके पति विवेक जिंदल वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी ‘कोर’ में चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर हैं। इनके दो बेटे हैं।
शादी कराने में लगते हैं सिर्फ 35 मिनट
2016 में सुषमा ने न्यूयॉर्क में ‘पर्पल पंडित प्रोजेक्ट’ की स्थापना की जो हर प्रकार की धार्मिक सेवाएं प्रदान करता था। उन्होंने पर्पल शब्द इसलिए चुना क्योंकि यह रंग दक्षिण एशिया में ‘गे’ समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। सुषमा को विवाह कराने में सिर्फ 35 मिनट का समय लगता है जबकि पारंपरिक हिन्दू विवाह में 3 घंटे तक का समय लग सकता है।
काफी पुराने समय से महिलाओं ने पेश की नेतृत्व की मिसाल
हिन्दू टेंपल सोसायटी ऑफ नॉर्थ अमेरिका की अध्यक्ष डॉ. उमा मैसोरकर हैं। जो अमेरिका में सबसे पुराने मंदिरों का संचालन करती हैं। मैसोरकर एक डॉक्टर हैं और 1980 के दशक में वह मंदिर प्रबंधन से जुड़ीं। कई साल से वह इसके प्रबंधन में सक्रिय हैं और अलग-अलग कार्यक्रमों के जरिए समाज में सक्रिय रहती हैं। वह कहती हैं कि पुरातन समय से कितनी ही महिलाओं ने नेतृत्व किया है और उनका योगदान एक मिसाल है। ऐसा नहीं है कि महिलाओं को पुजारी ही बनना पड़ेगा। उनमें ज्ञान के प्रसार की काबिलियत होनी चाहिए।
धार्मिक प्रमुख की भूमिका निभा रहीं कई भारतीय महिलाएं
बिमलाबाई- बिमलाबाई 15 साल से महाराष्ट्र बांके बिहारी मंदिर की सेवा कर रही हैं। उनकी सेवा को देखते हुए उन्हें पुजारी की मौत के बाद पुजारी के पद पर नियुक्त किया गया है। बिमलाबाई इसकी पहली महिला पुजारी हैं।
शारदाबाई गुराव- महाराष्ट्र के बोरेगांव में 42 वर्षीय महिला पुजारी शारदाबाई गुराव कई वर्ष से हनुमानजी की पूजा-अर्चना कर रही हैं। बोरेगांव में मुस्लिम धर्म को मानने वाले अनुयायी भी रहते हैं।
नंदिनी भौमिक– कोलकाता की नंदिनी भौमिक कन्यादान जैसी रस्मों के बगैर ही शादियां करवाती हैं। नंदिनी पेशे से जादवपुर यूनिवर्सिटी में संस्कृत प्रोफेसर और ड्रामा आर्टिस्ट हैं। नंदिनी संस्कृत के कठिन श्लोकों को बंगाली और अंग्रेजी में पढ़ती हैं, ताकि दुल्हन और दूल्हा उनका मतलब समझ सकें। ऐसे पूजा करवाने वाली वह पश्चिम बंगाल की पहली महिला पुजारी हैं। बतौर पेशा वह प्रोफेसर हैं। उन्होंने कोलकाता और आसपास के इलाकों में कई अंतरजातीय, अंतरधार्मिक विवाह करवाएं हैं।
अंजू भार्गव- अंजू भार्गव पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की धर्म आधारित सलाहकार समिति में शामिल एकमात्र अमेरिकी हिन्दू हैं। साथ ही कम्युनिटी बिल्डर फेलोशिप में काम करने वाली भी वह एकमात्र अमेरिकी-भारतीय भी हैं। उन्होंने हिन्दू अमेरिकी सेवा चैरिटी की शुरुआत की है। अंजू भार्गव ‘एशियन इंडियन वुमेन इन अमेरिका’ की प्रेसिडेंट और ‘काउंसिल फॉर अ पार्लियामेंट ऑफ वर्ल्ड रिलिजन सेट’ की ट्रस्टी भी हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

बिड़ला हाई स्कूल अल्यूमनी ने आयोजित की फन्ताक्षरी

कोलकाता । बिड़ला हाई स्कूल अल्यूमनी ने फन्ताक्षरी का आयोजन किया। यह हिन्दी फिल्मों के गीतों पर आधारित एक प्रतियोगिता थी। प्रतियोगिता बिड़ला हाई स्कूल, मुकुन्दपुर के कलामंडलम में आयोजित हुई। कार्यक्रम का संचालन अल्यूमनी के सदस्य रजत बैद ने किया। प्रत्येक टीम में 2 सदस्य थे। प्रतियोगिता में धुन, विजुअल, मिक्स्ड बैग जैसे चरण थे। कुल 15 टीमों ने भाग लिया और बिड़ला हाई स्कूल अल्यूमनी विजेता बनी। दोनों टीमों के सदस्यों को 20 ग्राम का चांदी का सिक्का, एक ट्रॉफी और गिफ्ट हैम्पर मिला। नोपानी अल्यूमनी दूसरे स्थान पर रही। टीम के प्रत्येक सदस्य को 10 ग्राम चांदी का सिक्का, ट्रॉफी और गिफ्ट हैम्पर दिया गया। सभी प्रतिभागियों को गिफ्ट हैम्पर मिला।

परिश्रम, समर्पण और प्रतिबद्धता से ही पूरे हो सकते हैं सपने – चन्द्रशेखर घोष

हेरिटेज बिजनेस स्कूल में विद्यार्थियों को दिये सफलता के गुर

कोलकाता । हेरिटेज बिजनेस स्कूल में एक परिचर्चा आयोजित की गयी। इस परिचर्चा में बन्धन बैंक के प्रबन्ध निदेशक एवं सीईओ चन्द्रशेखर घोष मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। घोष ने बन्धन बैंक के निर्माण और अपने संघर्ष की कहानी साझा की। उन्होंने कहा कि सपने परिश्रम, समर्पण और प्रतिबद्धता से ही पूरे हो सकते हैं। आप अगर किसी उद्देश्य के प्रति समर्पित हो जाते हैं तो चीजें सही होने लगती हैं। इस अवसर पर हेरिटेज बिजनेस स्कूल के चेयरमैन एच.पी. बुधिया, द हेरिटेज कॉलेज के चेयरमैन संजय अग्रवाल, द हेरिटेज स्कूल की एसएमसी की सदस्य स्वाति बुधिया सरावगी और बन्धन बैंक के निदेशक तथा हेरिटेज बिजनेस स्कूल के मेंटर अनूप सिन्हा भी उपस्थित थे। हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के निदेशक प्रबीर राय, हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के सीईओ प्रदीप अग्रवाल, हेरिटेज बिजनेस स्कूल के निदेशक प्रो. के. के. चौधरी, हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रिंसिपल एवं केबीटी (उच्च शिक्षा) के वरिष्ठ निदेशक प्रो. बासव चौधरी, द हेरिटेज कॉलेज के टीचर इन्चार्ज प्रो. अमिताभ घोष, बीओजी के सदस्य प्रो. देविन्दर बन्वेत भी उपस्थित थे। हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के सीईओ प्रदीप अग्रवाल ने सत्र को प्रेरक एवं संस्थान की गतिविधियों का अंग बताया।

स्त्री अस्मिता और समकालीन महिला उपन्यास को पढ़ते हुए

– डॉ. वसुंधरा मिश्र

डॉ. नमिता जायसवाल की पुस्तक’ स्त्री अस्मिता और समकालीन महिला उपन्यास’ वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण मौलिक कृति है। भारत में स्त्री को अभी भी दोयम दर्जे का स्थान पर माना गया है। परिवर्तन के इस दौर में जो कामना स्त्री बिरादरी के लिए अपेक्षित था, वह अब भी दूर है। चित्रा मुद्गल जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि नमिता जायसवाल एक विचारशील शिक्षाविद् ही नहीं, बल्कि चैतन्य जूझारू स्त्री हैं जो हारना, हताश होना नहीं जानती, वह जानती हैं तो केवल जिजीविषा की उत्कटता को।
इस पुस्तक में पितृसत्तात्मक समाज के उस चेहरे को बेनकाब किया है जो अब तक अदेखा और अचीन्हा है। शोषण के बहुआयामी पक्षों को बहुत ही गहनता से विश्लेषित किया गया है।
स्त्री अस्मिता से जुड़े विभिन्न पहलुओं को इतिहास के आईने में पढ़ते हुए लेखिका ने बेबाक होकर अपने विचारों को व्यक्त किया है। वह ‘अपनी बात’ में लिखती हैं कि नारी जागरण और प्रगति का जो आधार पिछली सदी में तैयार हुआ उस पर ही इस सदी का नया सामाजिक ढांँचा निर्मित किया जाना था, जो नहीं हो पाया। इन सब विषम परिस्थितियों के बीच में, सामाजिक रूप से अपनी पहचान बनाती चेतना संपन्न नारी की भागीदारी साहित्यिक क्षेत्र में बढ़ी तथा स्वीकृत हुई। समकालीन महिला लेखन नारी की वैयक्तिक सत्ता, उसकी अस्मिता तथा उसे मानवी रूप में स्वीकारे जाने की सशक्त दावेदारी के साथ स्त्री अस्मिता के प्रश्न को भी दृढ़ता के साथ उपस्थित करता है।
लेखिका ने पुस्तक को सात अध्यायों में अपने विषय को समेटा है जो स्त्री मुक्ति आंदोलन, स्त्री अस्मिता के बदलते संदर्भों में आई चुनौतियांँ और रणनीतियांँ, हिंदी उपन्यास परंपरा तथा प्रारंभिक एवं समकालीन महिला उपन्यास लेखन की विशिष्टता और प्रमुख समकालीन महिला उपन्यासकारों कृष्णा सोबती, मृदुला गर्ग, मंजुल भगत, सूर्य बाला, राजी सेठ, नासिरा शर्मा, प्रभा खेतान, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा, गीतांजलि श्री जैसी प्रबुद्ध प्रतिभाओं के उपन्यासों में आईं स्त्री पात्रों के माध्यम से विभिन्न समस्याओं को पाठकों के समक्ष रखा है। वर्तमान समय में परिवार और समाज के बीच अवस्थित स्त्री की अस्मिता के स्वरूप को सामने रखा है।
लेखिका बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध को स्त्री जागरण का युग मानती है। नवजागरण काल के बाद से जब स्त्रियाँ स्वयं नेतृत्व में भाग लेने लगीं। उनके अधिकार सोच और स्थिति में किंचित परिवर्तन आने लगे। समान अधिकार, पुरुष उत्पीड़न से सुरक्षा, पुरुष शासन से मुक्ति आदि ऐसी नई दृष्टि दिखाई पड़ी जिसकी नींव पर ही आज का स्त्री मुक्ति संघर्ष खड़ा है। लेखिका ने महिला आंदोलन की जड़ों तक इस विषय को खंगाला है।
स्त्री मुक्ति का अर्थ है कि उसे एक मनुष्य की तरह आचरण मिले और उसे अपने निर्णय लेने का अधिकार हो। नारी मुक्ति आंदोलन महिला पुरुष के बीच की गैरबराबरी और उसके कारण महिलाओं पर हो रहे अन्याय व शोषण के विरुद्ध है, पुरुषों के विरुद्ध नहीं। पृष्ठ 17. महिला आंदोलन की जड़ें महिलाओं के रोजमर्रा जीवन से पनपी हैं, जहाँ स्त्री के अधिकार, जागरूकता, स्वतंत्रता, समानता, प्रगति, संघर्ष और विद्रोह जैसे अनगिनत सवाल हैं।
इसमें सीमोन द बोउवार के ‘सेकेंड सेक्स’ की भी चर्चा हुई है ‘जहाँ स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है’ । विवाह पूर्व और विवाहेत्तर यौन संबंध आदि के विषय में भी विस्तार से जानकारी दी है।
1970 के बाद स्त्री आंदोलन के रूप में आए परिवर्तन जहांँ स्त्री सामाजिक राजनीतिक समस्याओं पर पुरुषों के साथ नारी की हिस्सेदारी में विस्तार दिखाई देता है। श्रीमती मृणाल गोरे, प्रमिला दण्डवते, अहिल्या रांगणेकर आदि राजनीतिक आंदोलनों में आगे रहीं। मँहगाई, जमाखोरी, भ्रष्ट व्यापारियों से रक्षा करना आदि मुद्दों पर लड़ना। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 1975 का वर्ष सयुंक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया। पुस्तक में विभिन्न नए संगठनों की भूमिका पर भी विचार किया गया है जो 1970 – 2000 तक के हैं। समाज के महिला आंदोलन, बलात्कार, यौन उत्पीड़न जैसे तमाम मुद्दों पर चर्चा की गई है।
बाजारवाद और उपभोक्ता वाद के रूप में विभिन्न प्रलोभनों के माध्यम से पुनः नारी को कमोडिटी अर्थात् वस्तु बना देने के पुरुष षड्यंत्र को समझाने की कोशिश की है और नारी को सुदृढ़ और अपनी सुरक्षा पर स्वयं रणनीति तय करनी होगी।
अस्मिता का तात्पर्य ‘आइडेंटिटी’ से है जो व्यक्तित्व और अपनी पहचान से जुड़ा हुआ है। पहचान का तत्व मानव का प्रकृति प्रदत्त गुण है। जब व्यक्ति या समूह विशेष के मन बुद्धि को वर्षों उत्पीड़न, प्रतारणा और अन्यायपूर्ण वंचना मिलती है तो उस स्थिति में अपने को पहचानने की छटपटाहट पैदा करती है। डॉ शंभुनाथ लिखते हैं कि हर आदमी की अस्मिता होती है, जो वह परंपरा से अर्जित करता है। वैयक्तिक अस्मिता के साथ ही सामाजिक अस्मिता भी होती है। ये प्रतिरोध की प्रेरणा से परिचालित होती है। अस्मिता का स्वरूप भी सकारात्मक होना चाहिए तभी विकास और सर्जना संभव है। वर्तमान पूंँजीवादी दौर में नारी अस्मिता का सामंतीय रूप दमनशील है या विकासोन्मुख? इस पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। भारतीय समाज की संरचना और पाश्चात्य समाज दोनों को ध्यान में रखते हुए विवेचना की गई है।
स्वतंत्रता के बाद सन् 1950 में भारतीय संविधान लागू होने पर स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार मिले। लेकिन विडंबना है कि वैधानिक संरक्षण और अधिकार मिलने पर स्त्री पहले से अधिक असुरक्षित हो गई हैं जिससे अलग समस्याओं का जन्म हुआ। गाँधी जी ने माना है कि जिस देश, जिस राष्ट्र में, नारी का सम्मान नहीं, वह कभी महान नहीं हो सकता। भारतीय परंपरा में माँ के स्थान और उसके बदलते स्वरूप की भी चर्चा की गई है। प्रेम नारी संरचना का मुख्य तत्व है जो अपनी ममता, स्नेह आदि गुणों के कारण समाज की श्रृंखला को जोड़ने वाला है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में वह आनंदमय क्षणों के उपभोग के साधन के रूप में माना जाने लगा है जो निश्चित ही आयातित मानसिकता से आया है।
आधुनिक युग में नई नई समस्याओं का उदय हुआ है जिसमें भ्रूण हत्या, अशिक्षा, यौन उत्पीड़न, बलात्कार, कुपोषण, अधिक मृत्युदर, हिंसा, आत्महत्या, विस्थापन, सांप्रदायिकता, पर्सनल ला जैसी अनेक भयानक स्थितियों और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मानवता का अपमान और मानवाधिकार की सीमाओं का अन्याय पूर्ण उल्लंघन है।
पुस्तक में स्त्री उपन्यास लेखन का हिंदी इतिहास भी दिया गया है। बांग्ला के उपन्यास हिंदी में अनुदित हो रहे थे। महिला उपन्यास को लेखिका ने चार भागों में विभाजित किया है –
प्रारंभिक काल – सन् 1890 – 1927,
विकास काल – 1928 – 1947,
उत्कर्ष काल – 1947-1970 और
वर्तमान काल 1970 से अब तक।
कृष्णा सोबती का जन्म 18 फरवरी सन् 1925 में पंजाब के उस भाग में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है शिमला, लाहौर, दिल्ली से शिक्षा प्राप्त जिंदगीनामा उपन्यास के लिए 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित की गईं। ‘डार से बिछुड़ी’ 1958 का उपन्यास है जिसमें ‘पाशो’ स्त्री पात्र की कहानी है जो पुरुष आश्रय में अपनी सुरक्षा तलाशती, भटकती, लुटती हुई क्षतविक्षत होती रहती है। छह प्रमुख उपन्यासों की स्त्री पात्रों पर लेखिका ने चर्चा की है।
मृदुला गर्ग 25 अक्टूबर 1938 में कलकत्ता में एक अमीर परिवार में जन्म। 6 उपन्यासों की चर्चा इस पुस्तक में कई गई है। ‘चित्तकोबरा’ की स्त्री पात्र मनु में काम की चाहत है जिसकी तृप्ति स्काटलैंड के पादरी से मिलती है, उसके संवेदनहीन पति से नहीं मिलती। ‘कठगुलाब’ उपन्यास पुरुष वर्चस्व वाले समाज में नारी के दोहन शोषण की विश्वव्यापी स्थिति को दर्शाता है। मंजुल भगत के ‘लेडिज क्लब ‘में बंबई की संभ्रांत महिलाओं की खोखली जिंदगी और खोखले आदर्शों की कथा है। विस्थापन, निम्नवर्गीय स्वावलंबी स्त्री की कथा है।
राजी सेठ का जन्म सन् 1935 में, प्रभा खेतान का जन्म 1942 में, मैत्रेयी पुष्पा का जन्म सन्1944 में, चित्रा मुद्गल का जन्म 1944, गीतांजलि श्री का 1957 में जन्म हुआ।लेखिका ने सभी महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में स्त्री- संवेदना को अपनी पुस्तक का विषय बनाया जो पुस्तक के केंद्र बिंदु है।
समकालीन समालोचना हर युग की माँग है। आजकल साहित्य समीक्षा के नाम पर जो कुछ छ्प रहा है वह अपनी अपनी दृष्टि है। आज जीवन के हर क्षेत्र में मिलावट का बोलबाला है। फिर भी पाठक ईमानदार होता है। हांँ, साहित्य समालोचना के क्षेत्र में विशुद्धता मिलना कठिन है। स्त्री विमर्श, दलित साहित्य, आदि विषयों पर चर्चा आवश्यक है। लेखिका ने बहुत बड़े फलक का विषय लिया है जिस पर लगभग अलग – अलग तीस से अधिक पुस्तकें लिखी जा सकती हैं।
कृष्णा सोबती जी की रचना संसार की नारियों का विरोध पुरुष से नहीं है बल्कि अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था पुरुष की सामंती पूर्वाग्रही स्वार्थसिक्त एवं अन्यायपूर्ण नारी शोषण की नीतियों से है। नारी के परंपरागत रूप से लेकर आधुनिक युग में उनके बदलते स्वरूप को अपनी रचनाओं के केंद्र में रखा है। सोबती जी की स्त्री पात्र ‘मित्रो’ अपने को ढूंँढ लेती है।
कमोवेश, सभी महिला उपन्यासकारों ने नारीवाद के चिंतन को समझने की भूमि तैयार की है, जहाँ विरोध और संघर्ष के पहले आत्मचिंतन और विश्लेषण को अवसर दिया गया है। स्त्री लेखन की बेबाकी ने कहीं भी सामाजिक श्रृंखला को तोड़ा नहीं है और न ही उपन्यास के स्त्री पात्रों ने भी, जो भी विद्रोह के स्वर हैं वह नारी चेतना के दीप प्रज्वलित करने की चाह है और पुरुष मानसिकता के शोषण प्रवृत्ति के उस चट्टानी स्वार्थ को गलाने की आकांक्षा है जो सदियों से नारी की वैयक्तिक सत्ता को नकारता आ रहा है।
इस पुस्तक में जितनी भी महिला उपन्यासकार को लिया गया है उनकी भाषा, शिल्प और परिवेश उनके लेखन में कहीं न कहीं परिलक्षित हुआ है। एक अच्छी बात है कि सभी स्त्री पात्र ठोकर खाकर भी पुनः एक नई जीवनी शक्ति और जिजीविषा के साथ अपनी पहचान बनाने एवं अपना ‘स्व’ अर्जित करने के मार्ग पर अग्रसर होती हैं। समाज को स्त्री-पुरुष दोनों पक्षों की समान आवश्यकता है जो सामाजिक संगठन की एकता को मजबूत करते हैं।
बाजारवाद और उपभोक्तावाद की संस्कृति नारी के लिए एक नई पुरुष प्रवृत्ति से सामना है। वैश्वीकरण, दूरसंचार माध्यम, प्रौद्योगिकी तकनीक के उन्नत सामाजिक परिवेश के लुभावने विषय की चुनौतियाँ भी सामने हैं, इस पर भी महिला उपन्यास हैं, जिनमें बहुत – सी समस्याओं को लिया गया है। वर्तमान समय में दैहिक बाध्यता, पर- पुरुष गामी, स्त्री का बहुपुरुषगामी होना, आत्महत्या, किराए की कोख, उपभोक्ता वाद के प्रलोभन में फंँसती स्त्री जैसी समस्याएंँ अपना फन उठा रही हैं। समकालीन महिला लेखन के विषय में लेखिका नमिता जायसवाल ने यह स्थापित किया है कि भारतीय स्त्री अपनी अस्मिता गढ़ने में तभी सफल हो सकेगी, जब उसकी संघर्ष की नीति उच्छृंखल न होकर संतुलित तथा संयमित हो। अधिकांश महिला लेखिकाएंँ शहरी उच्च मध्य वर्ग से सम्बद्ध होने के कारण लेखन भी शहरी क्षेत्र और वर्ग की महिलाओं की स्थिति तक ही सीमित रहा है, जो गाँव से आने वाली स्त्री गंध लिए हुए हैं, जिसके केंद्र में सामग्रिक सामाजिक चेतना का लक्ष्य निहित है।
पश्चिम बंगाल के हिंदी जगत् में परिचित नाम डॉ. नमिता जायसवाल स्वयं कई संस्थाओं में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं।’ ध्रुवस्वामिनी ‘नाटक में शीर्षक अभिनयात्मक भूमिका को अभिनीत की हैं, साथ ही चित्रा मुद्गल के उपन्यास’आवां’ का नाट्य सह रूपांतरण भी किया है।
इस पुस्तक में पाठक स्त्री- विमर्श के विविध पक्षों को एक जगह पढ़ सकता है।
यह पुस्तक कोलकाता के आनंद प्रकाशन से 2017 में प्रकाशित हुई है। 296 पृष्ठों की यह पुस्तक हिंदी शोधार्थियों और साहित्य के विद्यार्थियों के लिए एक संग्रहणीय पुस्तक है। शुभकामनाएं। – डॉ वसुंधरा मिश्र, कोलकाता ।

एचआईटी में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

कोलकाता । हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में हाल ही में इंजीनियरिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर आधारित एक दो दिवसीय वेबिनार आयोजित किया गया। इस संगोष्ठी का विषय सस्टेनेबल डेवलपमेंट एंड सर्कुलर इकोनॉमी इन सिविल इंजीनियरिंग तथा इनोवेशन इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग था। सिविल इंजीनियरिंग और अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित सेमिनार का उद्घाटन गत 16 दिसम्बर को मुख्य अतिथि एनआईटी मणिपुर के निदेशक प्रो. गौतम सूत्रधार ने किया। दोनों ही संगोष्ठियों में विशेषज्ञों ने सम्बोधित किया। प्रो. सूत्रधार ने कहा, नवाचार ही चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) को गति देंगे। संगोष्ठियों में कल्याण भारती ट्रस्ट के निदेशक प्रबीर रॉय, हेरिटेज ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के सीईओ प्रदीप अग्रवाल, हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के प्रिंसिपल बासव चौधरी समेत कई अन्य शिक्षाविद् व अतिथि उपस्थित थे। हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के मेकेनिकल इंजीनियरिंग के विभागाध्यक्ष प्रो. सुकांत सरकार ने कहा कि यह संगोष्ठी विद्यार्थियों को विषय के प्रति एक समझ देगी। सिविल इंजीनियरिंग के विभागाध्यक्ष प्रो. तापस साधु ने विद्यार्थियों को नवीनतम आविष्कारों की जानकारी से अपडेट रहने की सलाह दी।

पल्लव हल्दर की अर्को सीरिज अब हार्ड कवर में

कोलकाता । लेखक पल्लव हल्दर की किताब पल्लव हल्दर की किताब अर्को समग्र – वॉल्यूम 1 अब हार्ड कवर में भी उपलब्ध है। हाल ही में कॉफी हाउस में बोईचित्र गैलरी में प्रकाशक धी प्रकाशनी द्वारा आयोजित एक साहित्यिक अड्डे में किताब का लोकार्पण किया गया। इस कार्यक्रम में मोनीष मुखोपाध्याय, तमघ्न नस्कर, डॉ. पल्लव बसु, रणदीप नन्दी समेत कई अन्य साहित्यकार उपस्थित थे। फिलहाल नाइजीरिया के लागोस में रह रहे लेखक ने अपनी किताब के मुख्य चरित्र डॉ. अर्को के बारे में बात की और बताया कि यह चरित्र किस तरह से मरीजों की मानसिक समस्याओं का समाधान करता है। मुखोपाध्याय ने धी प्रकाशनी के प्रथम प्रकाशन और आवरण चित्र बनाने वाले अभिव्रत की भी सराहना की।

दावा – आधुनिक युग में बाल के गिरने का इलाज है क्यूआर 678®

आजकल पुरूषों और महिलाओं में बालों का गिरना जिसे एंड्रोजेनिक एलोपेसिया(गंजापन) कहते हैं, एक चिंता का विषय बना हुआ है, खासकर 25 साल या उससे ऊपर की उम्र के लोगों में. क्लिनीशियन और कास्मेटालिजिस्ट इसका उपाय लंबे समय से ढ़ूंढ़ने में जुटे हैं. एक तरफ जहां गैर सर्जरी वाले बाल उगाने के उपाय जैसे ऊपर से लगाने वाले मिनाक्सडिल, प्रिस्क्रिप्शन ओरल फिनास्टेराइड, प्लेटेलेट वाले प्लाज्मा (पीआरपी) इंजेक्शन और लाइट एंड लेजर थेरेपी के मिले-जुले इलाज बालों का गिरना रोक सकते हैं, लेकिन इन सभी के साइड इफेक्ट भी होते हैं.

आइए बात करते हैं क्यूआर 678® थेरेपी की जो एक मौलिक (पेटेंट) और बालों के गिरने को रोकने और फिर से उगाने की थेरेपी है, जिसने गंजेपन के इलाज में एक तरह से क्रांति ला दी है. इस थेरेपी का नामकरण आज की पीढ़ी में चल रहे क्विक रिस्पांस या क्यूआर कोड के नाम पर रखा गया है, क्यूआर 678® जबकि 678 मोर्स कोड का संकेत देता है, जिसका मतलब हुआ कोई जवाब नहीं है.

इस थेरेपी का आविष्कार डा.देबराज शोम- क्लिनिकल साइंटिस्ट एंड लीडर, आर एंड डी टीम क्यूआर 678® और डा.रिंकी कपूर ने किया है। दोनों ही डाक्टर भारत के मशहूर कास्मेटिक सर्जन हैं और दी ऐस्थेटिक क्लिनिक्स के सह-संस्थापक भी। दी ऐस्थेटिक क्लिनिक्स, डरमेटालाजी और प्लास्टिक सर्जरी की एक जानीमानी चेन है जिसके देश भर के शहरों में कई केंद्र हैं। इन दोनों डाक्टरों का ध्यान इस बात पर गया कि भारत में 58 फीसदी पुरूष जिनकी उम्र 30-50 तक है वे तेजी से गंजेपन(एंड्रोजेनिक एलोपेसिया) के शिकार हो रहे हैं, जिसके चलते दोनों ने रिसर्च करने की योजना बनाई। इस कास्मेटिक मुद्दे की जिज्ञासा और उसके निदान के रूप में उन्होंने रिसर्च की जिसके फलस्वरूप क्यूआर 678® थेरेपी का जन्म हुआ। इस थेरेपी से बालों का झड़ना तेजी से रूकता है, साथ ही, बचे हुए बालों की कोशिकाएं मोटी होती हैं, उनका घनत्व बढ़ता है और संख्या भी। इससे गंजेपन के शिकार हुए लोगों को काफी राहत मिलती है। दोनों डाक्टरों ने अपनी टीम के साथ क्यूआर 678 और पीआरपी के इलाजों के बीच जांच के परीक्षण तुलनात्मक रूप से किए और पाया कि क्यूआर 678 के परिणाम, पीआरपी की तुलना में 300 फीसदी से ज्यादा अच्छे हैं। इस थेरेपी से परंपरागत रूप से किए गए ट्रास्प्लांट में भी 50 फीसदी ज्यादा अच्छे परिणाम दिखते हैं।

बालों को फिर से उगाने वाले आज जो इलाज बाजार में उपलब्ध हैं, उनकी अपनी ढेर सारी सीमाएं हैं,वे बालों को एक निश्चित स्तर के बाद नया नहीं कर सकते। क्यूआर 678® की प्रक्रिया के तहत बढ़ोतरी के कारकों को बालों की कोशिकाओं में इंजेक्ट कर देते हैं, जिससे न सिर्फ बालों का झड़ना रूक जाता है बल्कि बालों में वृद्धि भी होती है। क्यूआर 678® बालों के दोबारा बढ़ने के लिए एक गैर-सर्जिकल, दर्द रहित और बिना शल्यक्रिया वाली प्रक्रिया है, जिसका असर 100,000 से ज्यादा मरीजों में बहुत ही अच्छा देखने को मिला है। क्यूआर 678® थेरेपी को वर्ष 2017 में अमेरिका के प्रतिष्ठित कंपोजिशन एंड मैकेनिज्म आफ एडमिस्ट्रेशन पेटेंट का अवार्ड भी मिल चुका है। साथ ही, भारतीय एफडीए ने भी इसे व्यावसायिक उत्पादन और बिक्री की अनुमति वर्ष 2019 में प्रदान की है। इस थेरेपी को ईयू, यूके, कुवैत जैसे देशों में भी एफडीए की अनुमति मिल चुकी है और कुछ देशों में मिलनी बाकी है। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) की अनुमति मिलने का मतलब ही होता है कि इसकी प्रभावशीलता और क्षमता का विश्लेषण सीडीईआर ने किया है और अब यह पक्का हो चुका है कि इसके लाभ संभावित जोखिमों से कहीं ज्यादा हैं।
ईयू और ब्रिटेन के बाजारों में क्यूआर 678® थेरेपी की लांचिंग शूरू हो चुकी है, इसके बाद इन बाजारों के ज्यादातर हेयर क्लिनिकों में यह थेरेपी उपलब्ध हो जाएगी. वर्तमान में QR678® उत्पाद की मैन्यूफैक्चरिंग कोरिया में की जा रही है, और यूरोप में भी इसकी इकाइयां लगाई जा रही हैं. फिलहाल अभी य़ूरोपीय कंपनी इसके वितरण का काम दुनिया भर में करेगी, क्यूआर 678®को लेकर तमाम संशोधन किए जा रहे हैं जिसके कारण, इसके पेटेंट को लेकर नए सिरे से आवेदन किया जाएगा, ये पेटेंट ज्यादा प्रभावशाली रहेंगे. इसके अलावा, क्यूआर 678®की टीम जल्द ही बाजार में अपने हेयर प्रोडक्ट्स लेकर आ रही है, जिसमें पौष्टिक शैंपू, सेरम्स जैसे तमाम उत्पाद होंगे।
वृद्धि के कारक, हारमोन में असंतुलन, जीवन शैली का अस्त – व्यस्त होना, तनावपूर्ण जीवन आदि तमाम ऐसे कारण हैं जिनसे बालों का गिरना शुरू होता है. QR678® एक सिद्ध निदान के रूप में इन गैपों को भरने की कोशिश करता है।
कोविड के कारण बालों का गिरना
कोविड से प्रभावित मरीजों में शारिरिक और भावनात्मक तनावों के कारण बालों की तेजी से गिरने की प्रवृत्ति देखने को मिली है. कोविड के मरीज के बाल आमतौर पर मरीज के कोविड-19 से ठीक होने के दो या तीन महीने बाद गिरने शुरू होते हैं। ज्यादातर बालों का गिरना औसतन 55 दिनों के बाद शुरू होता है। बालों के गिरने के कारण मुख्य रूप से संक्रमण, भोजन में बदलाव, अकेले रखे जाने के काऱण उपजा तनाव और तनाव वाले दूसरे कारक हो सकते हैं. इस तरह के बालों के गिरने को टेलोजेन एफल्यूवियम कहते हैं। यह बालों के गिरने की एक अस्थाई स्थिति होती है और अक्सर कोविड के मरीजों में देखने को मिलती है, जो झटका मरीज को बीमारी के दौरान आए बुखार और दूसरे कारणों से होता है। इस महामारी के साइड इफेक्ट में बालों का गिरना तेजी से बढ़ते हुए देखा गया है, लेकिन क्यूआर 678® थेरेपी के सिर्फ चार सेशन करने के बाद, बालों की कोशिकाओं के घनत्व में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिली, और बाल झड़ने की प्रक्रिया में काफी रूकावट आई। इस रिसर्च स्टडी को जर्नल आफ कास्मेटिक डर्मेटालोजी में भी प्रकाशित किया गया है।

थेरेपी कैसे काम करती है
त्वचा की ऊपरी और निचली सतह पर जो सिग्नल भेजे जाते हैं, उससे बालों की कोशिकाओं में काफी ब़ढ़ोतरी होती है, बालों की कोशिकाओं के विकास के तीन चरण हैं एनेजन (वृद्धि), कैटेजन (डारमेंसी) और टेलोजन (झड़ना), एनेजन के चरण को विस्तार देने से बालों के विकास और वृद्धि में मदद मिलती है, जो इसके संकेत देता है। वृद्धि के कारक, डर्मल पैपीला कोशिकाओं को बढ़ने का संकेत देते हैं या फिर एनेजन के चरण को बढ़ा देते हैं और QR678® इन वृद्धि के कारकों को बढ़ाने के लिए विशेष तैयारी करता है, जो इस संदेश को भेजते हैं।
इस प्रक्रिया को मिसोथेरेपी से संपन्न किया जाता है, जो पेटेंट किए गए QR678 परमाणुओं के द्वारा की जाती है। इन परमाणुओं को विकास के तत्वो की संज्ञा दी गई है, जिन्हें व्यावहारिक तौर पर सिर की त्वचा पर बिना दर्द पहुंचाए आरोपित किया जाता है। बालों की कोशिकाओं का विकास 5-8 सत्रों में होता है जिन्हें 2-3 हफ्तों के अंतराल में डाला जाता है. आमतौर पर 1 मिली का साल्यूशन प्रति बैठक में डाला जाता है जिसमें 15 मिनट का समय लगता है, कहीं रूकने की जरूरत नहीं पड़ती और हर सत्र का शुल्क लगभग 7,000 रूपए होता है।
QR678® को एफडीए ने न्यूनतम इनवेसिव रिग्रोथ ट्रीटमेंट के तौर पर मान्यता दी है. इसके लाभ निम्न हैं –
⦁ इसमें कई तरह के ग्रोथ के कारक होते हैं, जिनसे बालों को बढ़ने में और बालों की कोशिकाओं को मजबूत बनाने में मदद मिलती है.
⦁ यह पीआरपी की तुलना में ज्यादा आरामदेह और मजबूत होता है.
⦁ प्लांट में किसी तरह का साइड इफेक्ट नहीं होता
⦁ इसके परिणाम देर तक रहते हैं और सफलता की दर 90 फीसदी तक रहती है.
⦁ दस से ज्यादा क्लिनिकल जांचों के दौरान तमाम बाल झड़ने की स्थितियों में मजबूत परिणाम देखने को मिले हैं, जो अमेरिका के श्रेष्ठ जनर्लो और उसी तरह के जनर्लों में समीक्षा की गई है.
इस प्रकार के हेयर ट्रीटमेंट/थेरेपी में उन प्राकृतिक ग्रोथ कारकों का मिश्रण रहता है जो पहले से त्वचा में शामिल रहते हैं और इसी कारण यह सभी के लिए पूरी तरह से सुरक्षित हैं। इसमें उचित प्रकार के हेयर ग्रोथ फैक्टर उपस्थित होते हैं,जिनका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता। इसका प्रयोग एक आउटपेशेंट प्रक्रिया के रूप में होता है और इलाज कराने के आठ हफ्तों के भीतर ही परिणाम दिखने शुरू हो जाते हैं। इस थेरेपी से बालों का झड़ना बंद हो जाता है, और बालों की संख्या में बढ़ोतरी होती है, बालों की कोशिकाएं और घनत्व में वृद्धि होती है।
यह पुरूषों के गंजेपन के लिए काफी कारगर होता है साथ ही, महिलाओं के बाल झड़ने को भी काफी हद तक रोकता है। क्यूआर 678® थेरेपी के बहुत अच्छे परिणाम कैमियोथेरेपी के बाद झड़ने वाले बालों को रोकने में भी सामने आए हैं। साथ ही, सीबोरिहिक डर्माटाइटिस और इम्यूनोजेनिक बीमारियों जैसे एलोपेसिया एरिएटा जैसी बालों की बीमारियों में भी यह थेरेपी बहुत उपयोगी सिद्ध हुई है।
हो सकता है कि बालों का झड़ना एक कास्मेटिक का मामला लगता हो, लेकिन इससे मानसिक नुक्सान ज्यादा हो जाता है. हमारे अध्ययनों के दौरान यह बात सामने आई है कि बालों के गिरने से मनोवैज्ञानिक असर बहुत ज्यादा पड़ता है, जिसके प्रभाव निजी संबंधों, आत्मविश्वास, भविष्य की तरक्की पर पड़ते हैं, जिससे बाद में लोग कम असरकारक और कमजोर महसूस करने लगते हैं। वास्तव में देखा जाए तो भारत सरकार बालों के मसलों को एक कास्मेटिक रूप में देखती है जिसके कारण इसपर जीएसटी का प्रावधान है, फिलहाल क्यूआर 678®के अध्ययनों से जो बात सामने आई वह बताती है कि यह एक मेडिकल का मसला है जिससे मनोवैज्ञानिक कारकों की उत्पत्ति होती है।
यह वास्तव में एक स्वदेशी उत्पाद है जिसको अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिल चुकी है। य़ह सिद्ध हो चुका है कि बालों के फिर से आने के लिए यह इलाज दूसरे किसी सर्जिकल या गैर सर्जिकल से अच्छे परिणाम देता है। यह थेरेपी आज दुनिया के 10 से भी ज्यादा देशों के नामचीन त्वचा और हेयर क्लिनिकों में इस्तेमाल की जा रही है। हालांकि QR 678 ® हेयर ग्रोथ थेरेपी अब फ्रेंचाइजी और वितरकों की एक विशाल श्रंखला के माध्यम से दुनिया भर में उपलब्ध है, लेकिन दी ऐस्थेटिक क्लिनिक्स की टीम आज भी इसके आविष्कार और रिसर्च एंड डेवलेपमेंट के लिए उत्तरदायी है। उत्तर भारत के बाजारों खासकर पंजाब में इस थेरेपी के कारण दो हजार (2000) से भी ज्यादा मरीज ठीक हो चुके हैं। पंजाब में कोविड से संबंधित बाल के गिरने वाले मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा थी जिनको QR 678 ® हेयर ग्रोथ थेरेपी का काफी लाभ हुआ। क्यूआर 678®हेयर ग्रोथ थेरेपी की कीमत परंपरागत हेयर ट्रांस्प्लांट के जैसी ही है और इसका उपयोग सभी लिंगों औऱ उम्र के लोग कर सकते हैं।

सर्दियों में बना रहे स्टाइल का जादू

मौसम में बदलाव का सबसे पहला असर वार्डरोब पर पड़ता है। जैसे ही मौसम बदलता है तो व्यक्ति अपनी वार्डरोब को भी पूरी तरह से चेंज कर देता है। अगर बात मेन्स विंटर वियर की हो तो स्टाइलिश दिखने के लिए इनके पास भी ऑप्शंस की कमी नहीं है। बस जरूरत है तो सही तरीके से स्टाइलिंग की। तो चलिए जानते हैं कि पुरुष सर्दियों में स्मार्ट व स्टाइलिश दिखने के लिए कौन से टिप्स अपनाएं−

लेयरिंग पर दें ध्यान

इस मौसम में खुद को कवर करने के लिए लेयरिंग एक अच्छा ऑप्शन हो सकती है। इसके अतिरिक्त लेयरिंग के जरिए वह खुद को काफी स्मार्ट भी दिखा सकते हैं। लेयरिंग करते समय टी−शर्ट व शर्टस को बेस लेयर की तरह पहना जा सकता है। इसके बाद मिडिल लेयर के लिए डेनिम जैकेट, स्वेटर्स आदि पहनें। अंत में ओवर कोट्स विद स्कार्फ को टॉप लेयर में पहना जा सकता है।

एसेसरीज भी है जरूरी

विंटर के मौसम में कुछ ऐसी एसेसरीज होती हैं तो पुरूषों पर खूब जंचती है। कैप्स, बिनी, मफलर, स्कार्फ व ग्लव्स आदि पहन कर न सिर्फ खुद को ठंड से बचाएं।

ऐसा हो कैजुअल लुक

सर्दियों में कैजुअल लुक में विंटर थर्मल वेस्ट व पैंट्स बेसिक है। इनके ऊपर स्वेटशर्टस व हुडी आदि पहनें। युवा लड़कों पर यह लुक काफी अच्छा लगता है। इसके अतिरिक्त क्लासिक व्हाइट टी को जींस के साथ पेयर करके पहनना भी एक अच्छा ऑप्शन है।

कोट का चयन

सर्दी के मौसम में कोट्स की एक बड़ी रेंज मार्केट में मौजूद होती है और टॉप लेयर में पहना जाने वाला हर कोट ओवरकोट ही हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए पहले अपनी बॉडी व लुक को ध्यान में रखते हुए ओवरकोट, टेंच कोट, पारका जैकेट, केजुअल जैकेट आदि का चयन किया जा सकता है।

फैब्रिक बनाएगा स्टाइलिश

विंटर में कपड़ों का स्टाइल व फैब्रिक दोनों ही काफी महत्वपूर्ण होता है। इन कपड़ों में वूलन फैब्रिक के अतिरिक्त सिल्क व वेलवेट फैब्रिक भी इन दिनों काफी इन है। अगर आप किसी पार्टीवियर ड्रेस का चयन कर रहे हैं तो वेलवेट का चयन करना अच्छा रहेगा। वहीं अगर रंग की बात हो तो मौसम को देखते हुए कपड़ों में कुछ वार्म कलर्स को वार्डरोब में शामिल करें। वैसे इस साल बरगंडी, नेवी ब्लू, ऑलिव ग्रीन, क्लासिक ब्लैक व महोगनी कलर ग्लोबली ट्रेंड में हैं।

(साभार – प्रभा साक्षी)