विधि : राजभोग बनाने के लिये सबसे पहले छेना बनाकर तैयार करना है: छैना बनाने के लिये दूध को गर्म करने के लिये गैस पर रख दीजिये। छेना फाड़ने के लिये टाटरी (टार्टरिक एसिड) को आधा कप पानी में घोल कर टाटरी का घोल बना लीजिये। दूध में उबाल आने के बाद गैस बन्द कर दीजिये, दूध को गैस से उतार लीजिये और थोड़ा सा ठंडा होने दीजिये, दूध को 80 % गरम रहने के बाद उसमें थोड़ा थोड़ा टाटरी का पानी डालिये और चमचे से मिलाते हुये चलाइये, जब तक दूध फटने न लगे तब तक टाटरी का पानी मिलाते और दूध को चलाते रहें। जैसे ही दूध फट जाय टाटरी का पानी मिलाना बन्द कर दीजिये. दूध 2 मिनट में अच्छी तरह फटकर तैयार हो जाता है।
अब सूती, सफेद, पतले कपड़े को धोकर छलनी के ऊपर फैलायें और छलनी को किसी बड़े बर्तन के ऊपर रख लीजिये. फटे दूध को कपड़े पर डालिये, छेना कपड़े के ऊपर रह जायेगा, और पानी नीचे के बर्तन में आ जायेगा। कपड़े को चारों ओर से उठा कर, पकड़ कर छेना को दबाकर सारा पानी निचोड़ दीजिये। छैना तैयार है। छेना को किसी बड़ी प्लेट में निकाल लीजिये, और दोनों हाथो की उंगलियों से मथ मथ कर चिकना कीजिये, चिकने छेना में अरारोट डालिये और अच्छी तरह मलते हुये मिला लीजिये. राजभोग के लिये छैना तैयार हो गया है।
पिठ्ठी बना लीजिये: काजू को छोटे छोटे टुकडे में काट लीजिये, पिस्ते को भी छोटे छोटे टुकड़े में काट लीजिये (आप चाहें तो पिस्ते को गरम पानी में डाल कर थोड़ा रख लीजिये, और उसका छिलका उतार लीजिये)। इलायची को छील कर कूट कर पाउडर बना लीजिये। 1 टेबल स्पून छेना और सारी कटे हुये मेवे, इलायची पाउडर अच्छी तरह मिलाकर पिठ्ठी तैयार कर लीजिये. (पिठ्ठी में पसन्द के अनुसार, पीला या लाल फूड कलर डाल सकते हैं). राजभोग के गोले बनाकर तैयार कर लीजिये: छेना को बराबर बराबर के छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ लीजिये (इतने छैना को 12-14 टुकड़ों में तोड़ लीजिये). छेना का एक टुकड़ा उठाइये, हथेली पर रखकर थोड़ा बड़ा कर, बीच में थोड़ी सी गहराई बना लीजिये, गहराई के ऊपर 1/4 छोटी चम्मच पिठ्ठी रख लीजिये। छेना को चारों ओर से उठाकर पिठ्ठी को बन्द कर दीजिये, और अच्छी तरह दोंनों हाथों की सहायता से गोल कर लीजिये, तैयार गोले को प्लेट में रखिये, सारे राजभोग के गोले इसी तरह बनाकर तैयार कर लीजिये.
चाशनी बना लीजिये : किसी बर्तन में चीनी डालिये, और 2.5 कप पानी डाल दीजिये, और चाशनी को चीनी घुलने तक पकने दीजिये. चीनी अगर साफ न हो तो चीनी पानी में घुलने के बाद आधा कप दूध चाशनी में डालिये, उबल कर जो गन्दे से जो झाग चाशनी के ऊपर आ जाय उन्हैं चम्मच से निकाल कर हटा दीजिये। चाशनी को 1 तार या 2 तार देखना आवश्यक नहीं है। चाशनी में अच्छी तरह उबाल आने पर राजभोग को 1 – 1 करके अच्छी तरह उबलती चाशनी में डालिये, गैस प्लेम तेज रखिये, चाशनी हमेशा उबलती रहनी चाहिये। बर्तन को ढककर राजभोग को पकाइये ताकि चाशनी के ऊपर भरपूर झाग बनते रहें, ये चाशनी के झाग राजभोग को पकने में मदद करते हैं। 8-10 मिनट में चाशनी गाढ़ी होने लगती है, अब चम्मच से 1-1 चम्मच पानी डालें, लेकिन ध्यान रहे कि चाशनी में हमेशा उबाल बना रहे, धीरे धीरे एकदम थोड़ा थोड़ा पानी डालते रहे कि चाशनी पतली बनी रहें। राजभोग को उबलती चाशनी में 20 मिनिट तक पका लीजिये। चाशनी में पड़े राजभोग ठंडे हो जाय तब थोड़ा 1-2 चुटकी पीला फूड कलर या केसर एक टेबल स्पून पानी में घोल कर चाशनी में डालकर मिला दीजिये, पीले गोल्डन, बहुत अच्छे राजभोग तैयार है।
रावण ज्योतिष, वास्तुकला, इन्द्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू जानता था। उसके पास विमान और घातक अस्त्र एवं शस्त्र थे। उसे शिव से वरदान प्राप्त था। उसके किले की रक्षा देवी करती थी। रावण मायावी शक्तियों का स्वामी था। रावण को भगवान राम कभी नहीं मार पाते, यदि उन्हें इन 10 लोगों का साथ नहीं मिलता तो। लेकिन यह सभी राम की ही लीला थी। जानते हैं इन लोगों को कृतज्ञता के साथ –
1.हनुमान : हनुमानजी ने ही प्रभु श्रीराम की अंगूठी को लेकर समुद्र को पार करने के बाद उसे माता सीता को दिया, मेघनाद के पुत्र अक्षय कुमार का वध कर लंका दहन किया, विभीषण और सुग्रीव को राम से मिलाया, राम और लक्ष्मण का अपहरण कर जब अहिरावण पाताल लोक ले गया था, तो उन्हें मुक्त कराया और उन्होंने ही हिमालय से संजीवनी बूटी को लाकर लक्ष्मण की जान बचाई थी।
2 .लक्ष्मण : प्रभु श्रीराम के भाई लक्ष्मण शेषनाग के अवतार थे। अपनी पत्नी उर्मिला से 14 वर्ष तक दूर रहे लक्ष्मण के बगैर राम न तो सीता माता को ढूंढ पाते और न ही वे युद्ध की तैयारी कर पाते। लक्ष्मण एक श्रेष्ठ धनुर्धर थे और वे पाशुपतास्त्र का संधान करना जानते थे।
3.संपाती और जटायु : राजा दशरथ के मित्र जटायु ने ही सीता को ले जा रहे रावण को रोकने का प्रयास किया और वे मारे गए। जटायु ने राम को पूरी कहानी सुनाई और यह भी बताया कि रावण किस दिशा में गया है? इसके बाद संपाती ने अंगद को रावण द्वारा सीताहरण की पुष्टि की थी। संपाती ने ही दूरदृष्टि से देखकर बताया था कि सीता माता अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं।
4.सुग्रीव : बाली ने सुग्रीव की पत्नी और संपत्ति हड़पकर उसको राज्य से बाहर धकेल दिया था। यही कारण था कि प्रभु श्रीराम ने सुग्रीव से अपने बड़े भाई बाली से युद्ध करने को कहा और इसी दौरान श्रीराम ने छुपकर बाली पर तीर चला दिया और वह मारा गया। बाली वध के बाद सुग्रीव किष्किंधा के राजा बने और उन्होंने राम के लिए वानर सेना को गठित किया था।
5.अंगद : राम की सेना में सुग्रीव के साथ वानर राज बाली का पुत्र अंगद भी था। युद्ध के पूर्व श्रीराम ने अंगद को अपना दूत बनाकर लंका भेजा था। वहां अंगद ने अपना पैर जमाकर अपनी शक्ति का परिचय दिया था। अंगद हनुमान की तरह पराक्रमी और बुद्धिमान थे। रावण की सभा में अंगद ने जो उपदेश दिया, वह अनूठा है।
6.जामवंत : श्रीराम ने जामवंतजी को शिवलिंग स्थापना के समय रावण को आचार्यत्व का निमंत्रण देने के लिए लंका भेजा था। जामवंतजी ने ही हनुमानजी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया था। वे एक इंजीनियर भी थे। समुद्र के तटों पर वे एक मचान को निर्मित करने की तकनीक जानते थे, जहां यंत्र लगाकर समुद्री मार्गों और पदार्थों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता था। मान्यता है कि उन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया था, जो सभी तरह के विषैले परमाणुओं को निगल जाता था। जामवंतजी आज भी जिंदा हैं।
7.नल : नल और नील दो भाई थे। नल ने ही लंका और भारत के बीच पुल बनाया था। यह पुल लगभग 5 दिनों में बन गया जिसकी लंबाई 100 योजन और चौड़ाई 10 योजन थी। रामायण में इस पुल को ‘नल सेतु’ की संज्ञा दी गई है। नल के निरीक्षण में वानरों ने बहुत प्रयत्नपूर्वक इस सेतु का निर्माण किया था। यह सेतु कालांतर में समुद्री तूफानों आदि की चोटें खाकर टूट गया था।
8.गरुड़ भगवान : जब रावण के पुत्र मेघनाथ ने श्रीराम से युद्ध करते हुए श्रीराम को नागपाश से बांध दिया था, तब देवर्षि नारद के कहने पर गरुड़ ने नागपाश के समस्त नागों को खाकर श्रीराम को नागपाश के बंधन से मुक्त कर दिया था। भगवान राम के इस तरह नागपाश में बंध जाने पर श्रीराम के भगवान होने पर गरुड़ को संदेह हो गया था। अंत में काकभुशुण्डिजी ने राम के चरित्र की पवित्र कथा सुनाकर गरुड़ के संदेह को दूर किया।
9.सुषेण वैद्य : राम-रावण युद्ध के समय मेघनाद के तीर से लक्ष्मण घायल होकर मूर्छित हो गए थे, ऐसे में सुषेण वैद्य को बुलाया गया। लक्ष्मण की ऐसी दशा देखकर राम विलाप करने लगे। सुषेण ने कहा- ‘लक्ष्मण के मुंह पर मृत्यु-चिह्न नहीं है अत: आप निश्चिंत रहिए, आप संजीवनी बूटी का इंजताम कीजिए।’ हनुमानजी यह बूटी लेकर आए। यदि सुषेण वैद्य नहीं होते तो लक्ष्मण का जिंदा रहना मुश्किल था और यदि लक्ष्मण का देहांत हो जाता तो संभवत: प्रभु श्रीराम यह युद्ध रोककर पुन: लौट जाते। अत: सुषेण वैद्य की रामकथा में महत्वपूर्ण भूमिका रही।
10. विभीषण : रावण के 10 सिर थे। जिस सिर को राम अपने बाण से काट देते थे पुन: उसके स्थान पर दूसरा सिर उभर आता था। राम द्वारा लाख प्रयास करने के बाद भी जब रावण नहीं मारा गया, तो वानर सेना में चिंता होने लगी थी। रावण ने अमरत्व प्राप्ति के उद्देश्य से भगवान ब्रह्मा की घोर तपस्या कर वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्मा ने उसके इस वरदान को न मानते हुए कहा था कि तुम्हारा जीवन नाभि में स्थित रहेगा। यही कारण था कि वानर सेना पर रावण भारी पड़ने लगा था। ऐसे में विभीषण ने राम को यह राज बताया कि रावण का जीवन उसकी नाभि में है। नाभि में ही अमृत है। तब राम ने रावण की नाभि में तीर मारा और रावण मारा गया।
भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक व शौर्य की उपासक रही है। आज से अनेक वर्ष पूर्व त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने 9 दिन मां भगवती की आराधना उपरांत विजयादशमी के दिन बलशाली रावण का वध कर माता सीता को बंधनमुक्त किया था। भगवान श्रीराम की यह विजय सत्य की असत्य पर, न्याय व धर्म की अधर्म पर, अच्छाई की बुराई पर, पुण्य की पाप पर विजय होने के कारण विजयादशमी महापर्व मनाया जाता है। देवी भगवती के विजया नाम पर दशमी पूर्णातिथि होने के कारण भी विजयादशमी कहा जाता है। आश्विन शुक्ल दशमी को श्रवण का सहयोग होने से विजयादशमी होती है।
‘ज्योतिर्निबंध’ में लिखा है कि-
‘आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये।
स कालो विजयो ज्ञेय: सर्वाकार्यार्थसिद्धये।।’
अर्थात् आश्विन शुक्ल दशमी के सायंकाल में तारा उदय होने के समय विजय काल रहता है, जो सभी कार्यों को सिद्धि प्रदान करता है।
ऋतु परिवर्तन
नवरात्र से ऋतु परिवर्तन की शुरुआत होने लगती है। इन पवित्र दिनों में संयम, सदाचार और ब्रह्मचर्य का व्रत करते हुए शरद ऋतु का स्वागत करना चाहिए और खुद को उसके अनुरूप ढालने का प्रयत्न करना चाहिए।
दशहरे पर पूरे दिनभर ही मुहूर्त होते हैं इसलिए सारे बड़े काम आसानी से संपन्न किए जा सकते हैं। यह एक ऐसा मुहूर्त वाला दिन है जिस दिन बिना मुहूर्त देखे आप किसी भी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं।
आश्विन शुक्ल दशमी को मनाए जाने वाला यह त्योहार ‘विजयादशमी’ या ‘दशहरा’ के नाम से प्रचलित है। यह त्योहार वर्षा ऋतु की समाप्ति का सूचक है। इन दिनों चौमासे में स्थगित कार्य फिर से शुरू किए जा सकते हैं।
दशहरे के दिन भगवान श्रीराम की पूजा का दिन भी है। इस दिन घर के दरवाजों को फूलों की मालाओं से सजाया जाता है। घर में रखे शस्त्र, वाहन आदि भी पूजा की जाती है। दशहरे का यह त्योहार बहुत ही पावनता के साथ संपन्न किया जाता है। उसके बाद रावण दहन किया जाता है।
* भगवान राम-सीता और हनुमान की पूजा-अर्चना की जाती है।
* विजयादशमी पर शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है।
* रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र से भगवान शिव की आराधना की जाती है।
* इस दिन करोड़ों रुपए के फूलों की बिक्री होती है और लोग अपने घर के दरवाजे फूलों की मालाओं से सजाकर उत्सव मनाते हैं।
* इस दिन लोग अपनी-अपनी क्षमतानुसार सोना-चांदी, वाहन, कपड़े तथा बर्तनों की खरीददारी करते हैं।
* इस दिन देशभर में रावण के पुतले बनाकर जगह-जगह जलाए जाते हैं।
* दशहरे के दिन शहर-कस्बों और गांवों में श्रीराम-सीता स्वयंवर प्रसंग, रामभक्त हनुमान का लंकादहन कार्यक्रम, रामलीला का बखान करते हुए राम-रावण युद्ध के साथ रावण दहन किया जाता है।
* इस दिन खासतौर पर गिलकी के पकौड़े और गुलगुले (मीठे पकौड़े) बनाने का प्रचलन है।
* रावण दहन के बाद एक-दूसरे के घर जाकर, गले मिलकर, चरण छूकर बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है और साथ ही शमी पत्तों को एक-दूसरे को बांटा जाता है। यह पावन त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है।
सभी सखियों को नमस्कार। साथ ही देवी पर्व की अशेष शुभकामनाएँ। देवी पर्व पर सबसे ज्यादा उपेक्षा हम तथाकथित देवियों को ही झेलनी पड़ती है, इस बात को हम से बेहतर और कौन समझ सकता है। लेकिन इस तस्वीर को बदलने के लिए कोशिश भी हमें ही करनी है। जब तक हम स्त्रियाँ अपनी स्थिति को बेहतर बनाने या बदलने के लिए किसी मसीहा की आकांक्षा में बैठी रहेंगी, स्थिति खराब ही रहेगी और अगर बदलाव आया भी तो वह ऊपरी और दिखावटी ही होगा। हम स्त्रियों को इस बनावटी बदलाव से बचने की आवश्यकता है और कोशिश करनी चाहिए कि हमारे जीवन में वास्तविक धरातल पर परिवर्तन आए, सिर्फ किताबी नहीं।
सदियों से देवी के नाम पर पूजित लेकिन आम जीवन में हो या साहित्य पटल पर उपेक्षित स्त्रियों की कतार इतनी लंबी है कि उनकी गणना करना मुश्किल काम है। आज ऐसी ही एक कवयित्री से आप का परिचय करवाना चाहती हूं जिनके बारे में बहुत कम जानकारी हमारे पास है। इनका नाम है रानी बख्त कुंवरि और ये “प्रियासखी” उपनाम से कविताएँ लिखा करती थीं। इनके बारे में विभिन्न खोज रपटों से इतनी ही जानकारी मिलती है कि इनका रचनाकाल संवत 1734 था और इस हिसाब से ये मध्ययुगीन कवयित्री ठहरती हैं। ये दतिया की रानी थीं। इनके एक ग्रंथ के बारे में जानकारी मिलती है, जिसका नाम है “प्रियासखी की बानी” जिसमें राधा कृष्ण की प्रेम लीलाओं का वर्णन है। भले ही पदों में आलंबन रूप में राधा और कृष्ण के नामों का प्रयोग किया गया है लेकिन पदों का स्वरूप भक्तिमय न होकर शृंगार परक है। प्रेमी युगल की उन्मुक्त क्रीड़ाएं राधा कृष्ण की प्रणय लीला के आवरण में मुखर हो उठी हैं। मध्ययुगीन स्त्री वह चाहे साधारण स्त्री हो या छोटे-बड़े रियासत की रानी, न जाने कितने सामाजिक बंधनों में जकड़ी हुई भी सुखी और संतुष्ट होने का स्वांग रचती थी या फिर सामाजिक मर्यादा की रक्षा के नाम पर अपनी इच्छाओं- आकांक्षाओं को हँसते हुए कुर्बान कर देती थी। लेकिन मन के किसी कोने में दुबकी पड़ी इच्छाएँ कल्पनाशीलता की डोर थामे, कलम की नोंक पर आ बैठती थीं और अंततः कागज पर उतर ही जाती थी। संभवतः लोक लज्जा की ओट के कारण रचनाओं का बाह्य आवरण भले ही भक्ति का रहता था पर वर्णन की सघनता में ऐन्द्रिकता का समावेश सायास या अनायास हो ही जाता था। इसके लिए तत्कालीन युग की परिस्थितियाँ भी काफी हद तक जिम्मेदार थीं जहाँ स्त्री को साँस लेने, जीने और स्वप्न देखने के लिए भी सामाजिक अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। लेकिन स्त्री तो हर हाल में एक झरोखा खोज या खोल ही लेती है। प्रियासखी ने यह झरोखा भक्ति के गलियारे में खोला ताकि कोई उंगली ना उठा सके लेकिन मन में कैद प्रेमिल कल्पनाओं को शब्दों में साहस के साथ पिरोने से उन्हें कोई नहीं रोक पाया। एक ऐसा ही पद देखिए जिसमें राधा कृष्ण के होली खेलने का उन्मुक्त चित्र खींचा गया है-
“सखी ! ये दोई होरी खेलें।
रंगमहल में राधावल्लभ रूप परस्पर झेलें
रूप परस्पर झेलत होली खेलत खेल नवेले
प्रेम पिचक पिय नैन भरे तिय, रूप गुलाल।”
यह साधारण होली का चित्र नहीं है। दो प्रेमी युगलों की प्रेम के रंग से रंगमहल अर्थात एकांत में खेली जाने होली है जिसके साक्षी सिर्फ वही दोनों हैं और कोई नहीं। इस तरह की प्रेमसिक्त होली की आकांक्षा हर प्रेमी युगल के मन के कोने में कहीं ना कहीं छिपी होती है। प्रियासखी ने उस आकांक्षा को शब्दों में पिरोकर बंधनों में जकड़ी मध्ययुगीन स्त्री की मुक्ति की आकांक्षा को भी शब्द दिए हैं।
सखियों, प्रियासखी के अन्यान्य पदों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। प्रेमपगे पदों की रचयिता प्रियासखी के सरस- सुंदर पद इतिहास के पन्नों में जाने कहाँ विलुप्त हो गये।
कोलकाता : दिल्ली पब्लिक स्कूल, रूबी पार्क में दुर्गा पूजा मनायी गयी। इस आयोजन में प्री प्राइमरी कक्षा के बच्चों ने वर्चुअल यानी आभासी माध्यम पर महिषासुरमर्दिनी शक्ति की विजय का आनन्द लेते हुए कार्यक्रम में भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल की प्रिंसिपल जयती चौधरी के स्वागत भाषण से हुई। इसके बाद एक नाटक का मंचन हुआ जिसमें त्योहार के 5 दिनों का उल्लास प्रदर्शित किया गया। बच्चों ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।
कोलकाता : दुर्गा पूजा पूरे भारत में देवी दुर्गा की पूजा के लिए मनाई जाती है। दुर्गा को आदि शक्ति या अंतिम/परम शक्ति भी कहा जाता है। यह नौ दिनों का त्योहार है, जो शरद ऋतु के दौरान मनाया जाता है। त्योहार महिषासुर राक्षस पर देवी दुर्गा की जीत का प्रतीक है और इस प्रकार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
दुर्गा पूजा भी एक फसल उत्सव है जो देवी दुर्गा को ब्रह्मांड के निर्माता और भोजन के प्रदाता के रूप में याद दिलाता है। इस प्रकार रूबी पार्क पब्लिक स्कूल के छात्रों ने सिर झुकाकर अपने अंतरात्मा को रोशन करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। कार्यक्रम की शुरुआत नवीं कक्षा के सौनाब दत्ता द्वारा गाए गए एक सुंदर श्लोक के साथ हुई, जिसके बाद गणेश वंदना ,विभिन्न नृत्य और गीतों का प्रदर्शन किया गया।इसके बाद ही स्लाइड प्रस्तुति के माध्यम से छात्रों की कला का मिलान किया गया।
कोलकाता : नव बालीगंज महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा ‘रवींद्र: कबीर और छायावाद प्रसंग’ विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें देश-विदेश से साहित्य-प्रेमियों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो.वेद रमण, महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट, मॉरीशस, प्रो.गीता दुबे, स्कॉटिश चर्च कॉलेज, प्रो. अल्पना नायक, श्रीशिक्षायतन कॉलेज और प्रो.संजय जायसवाल, विद्यासागर विश्वविद्यालय उपस्थित थें। स्वागत भाषण देते हुए प्रो. अब्दुल सत्तार ने कबीर के दोहों की ख़ूब प्रशंसा की तथा छायावाद के उत्थान में रोमांटिसिज्म की भूमिका पर प्रकाश डाला। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रो. राजश्री शुक्ला ने तुलनात्मक रूप से कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद के बीच बौद्धिक दृष्टिकोण पर समानता की बात कही। इन्होंने कहा कि रवींद्रनाथ पर संत कवियों का काफी गहरा प्रभाव था और वैश्विक मानवता के स्वर तीनों में समान रूप में विधमान है। प्रो. संजय जायसवाल ने कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद में समतुल्यता दिखाते हुए कहा कि कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद तीनों मानवता और विवेकपरकता के त्रिभुज हैं। साथ ही कबीर की आध्यात्मिकता का विकास रवींद्रनाथ और छायावाद में देखा जा सकता है। तीनों का लक्ष्य समान रूप से आत्मा के विस्तार, मानवमुक्ति के स्वर और लौकिक सम्बन्ध के सार्वभौम सत्य के रूप में जुड़ा है। इन्होंने कहा कि कबीर, रवींद्र और छायावाद में मानवीय संवेदना और तार्किकता का स्वर प्रबलता से दिखाई देता है। प्रो.गीता दुबे ने कहा कि कबीर, रवींद्र और छायावाद तीनों प्रेम के डोर से बंधे हुए हैं तथा उनके यहां मानवता का विस्तार है।उन्होंने तीनों के बीच के संबंधों और प्रभाव का तुलनात्मक विश्लेषण किया।प्रो.अल्पना नायक ने भारतीय जागरण को कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद का मूल मंत्र कहा और इसके अंतर्गत सामाजिक जागरण, राजनीतिक जागरण और सांस्कृतिक जागरण पर प्रमुखता से बल दिया। प्रो.वेद रमण ने रहस्यवाद को कबीर, रवींद्रनाथ और छायावाद के बीच केंद्रित करते हुए तमाम तरह के रहस्यों का जिक्र किया तथा रवींद्रनाथ को कबीर और छायावाद की कड़ी कहा।उन्होंने रवींद्रनाथ के हंड्रेड पोयम्स ऑफ कबीर के अनुवाद की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण चर्चा की। कार्यक्रम का सफल संचालन और धन्यवाद ज्ञापन देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो. मनीषा साव ने कहा कि कबीर, रवीन्द्रनाथ और छायावाद का मूल स्वर मनुष्यता का है।
कोलकाता : कोलकाता के यंग ब्वॉयज क्लब की दुर्गा पूजा में दुर्गति नाशिनि मां दुर्गा कोरोना विनाशिनी के रूप में कोरोना राक्षस का संहार करते दिखेंगी। इस पूजा पंडाल का पंचमी यानी रविवार को उद्धाटन किया गया। पंडाल का उद्घाटन सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने किया। इस मौके पर, सुशील कुमार सिंह, मीना देवी पुरोहित, स्मिता बख्शी, संजय बख्शी, शगुफ्ता परवीन, रेहाना खातून, राकेश सिंह, मुख्य आयोजक; विक्रांत सिंह, युवा अध्यक्ष; विनोद सिंह, सक्रिय सदस्य; ओपी मॉल, अध्यक्ष; बी सी पुगुलिया, अध्यक्ष; राम चंद्र बडोपलिया, महासचिव और कई अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तित्व। कोलकाता के यंग ब्वॉयज क्लब ने अपने 52वें वर्ष पर ‘कोरोना विनाशनी मां’ को थीम बनाया है, जो कोरोना दानव का संहार करेंगी। प्रतिमा मेदिनीपुर के कलाकार देव शंकर महेश ने बनायी मंडप की ऊंचाई 40 फीट है। इसके साथ ही उनके पूजा समिति की ओर से डॉक्टर, पुलिस, चिकित्सा कर्मचारी, सफाई कर्मचारी, परिवहन चालक और कंडक्टर को उनके काम के लिए उन्हें सलाम करते हैं।
कोलकाता : मो. अली पार्क यूथ एसोसिएशन समिति ने एक चुनौती के तौर पर इस साल का पंडाल का थीम ‘वैक्सीनेशन वीन्स ओवर कोरोना’ रखा है। पंडाल का उद्धाटन सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने किया तथा इस मौके पर तापस रॉय, नयना बंद्योपाध्याय, विवेक गुप्त, संजय बख्शी, स्मिता बख्शी, रेहाना खातून आदि उपस्थित थे। इस मौके पर संवाददाताओं से बात करते हुए समिति के महासचिव सुरेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि यदि साल 2020 का दुर्गापूजा कोरोना संक्रमण में बीता तो साल 2021 का दूर्गापूजा वैक्सीनेशन को समर्पित है।
इस साल हम अपने पूजा परिसर में वैक्सीनेशन का महत्व बताने का प्रयास कर रहे हैं। गौर हो कि पिछले साल मो. अली पार्क ने महिषासुर को कोरोनासुर के तौर पर दर्शाया था। संरक्षक रामचन्द्र बड़ोपलिया, चेयरमैन मनोज पोद्दार, कार्यकारी अध्यक्ष प्रमोद चाण्डक, संयुक्त सचिव अशोक ओझा, पवन बंसल, गणेश शर्मा, कोषाध्यक्ष सुभाष चन्द्र गोयनका, वाईस चेयरमैन ओम प्रकाश पोद्दार एवं अन्य गणमान्य उपस्थित थे।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 11 अक्टूबर, 1884 ईस्वी को बस्ती जिले के अगोना नामक गांव में हुआ था।
इनकी माता जी का नाम निवासी था और पिता पं॰ चंद्रबली शुक्ल की नियुक्ति सदर कानूनगो के पद पर मिर्जापुर में हुई तो समस्त परिवार वहीं आकर रहने लगा।
जिस समय शुक्ल जी की अवस्था नौ वर्ष की थी, उनकी माता का देहान्त हो गया। मातृ सुख के अभाव के साथ-साथ विमाता से मिलने वाले दुःख ने उनके व्यक्तित्व को अल्पायु में ही परिपक्व बना दिया।अध्ययन के प्रति लग्नशीलता शुक्ल जी में बाल्यकाल से ही थी। किंतु इसके लिए उन्हें अनुकूल वातावरण न मिल सका।
मिर्जापुर के लंदन मिशन स्कूल से 1901 में स्कूल फाइनल परीक्षा (एफए) उत्तीर्ण की। उनके पिता की इच्छा थी कि शुक्ल जी कचहरी में जाकर दफ्तर का काम सीखें, किंतु शुक्ल जी उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। पिता जी ने उन्हें वकालत पढ़ने के लिए इलाहाबाद भेजा पर उनकी रुचि वकालत में न होकर साहित्य में थी। अतः परिणाम यह हुआ कि वे उसमें अनुत्तीर्ण रहे। शुक्ल जी के पिताजी ने उन्हें नायब तहसीलदारी की जगह दिलाने का प्रयास किया, किंतु उनकी स्वाभिमानी प्रकृति के कारण यह संभव न हो सका।
1903से 1908 तक ‘आनन्द कादम्बिनी’ के सहायक संपादक का कार्य किया। 1904 से 1908 तक लंदन मिशन स्कूल में ड्राइंग के अध्यापक रहे। इसी समय से उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं में छपने लगे और धीरे-धीरे उनकी विद्वता का यश चारों ओर फैल गया। उनकी योग्यता से प्रभावित होकर 1908 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने उन्हें हिन्दी शब्दसागर के सहायक संपादक का कार्य-भार सौंपा जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक पूरा किया।
श्यामसुन्दरदास के शब्दों में ‘शब्दसागर की उपयोगिता और सर्वांगपूर्णता का अधिकांश श्रेय पं. रामचंद्र शुक्ल को प्राप्त है। वे नागरी प्रचारिणी पत्रिका के भी संपादक रहे। 1919 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक नियुक्त हुए जहाँ बाबू श्याम सुंदर दास की मृत्यु के बाद 1937 से जीवन के अंतिम काल (1941) तक विभागाध्यक्ष का पद सुशोभित किया। कृतित्व – आलोचनात्मक ग्रंथ : सूर, तुलसी, जायसी पर की गई आलोचनाएं, काव्य में रहस्यवाद, काव्य में अभिव्यंजनावाद, रसमीमांसा आदि शुक्ल जी की आलोचनात्मक रचनाएं हैं। निबन्धात्मक ग्रन्थ : उनके निबन्ध चिंतामणि नामक ग्रंथ के दो भागों में संग्रहीत हैं।
अन्य निबंधों में मित्रता निबन्ध जीवनोपयोगी विषय पर लिखा गया उच्चकोटि का निबन्ध है जिसमें शुक्लजी की लेखन शैली गत विशेषतायें झलकती हैं। क्रोध निबन्ध में उन्होंने सामाजिक जीवन में क्रोध का क्या महत्व है, क्रोधी की मानसिकता-जैसै संबंधित पहलुओं का विश्लेषण किया है। ऐतिहासिक ग्रन्थ : हिन्दी साहित्य का इतिहास उनका अनूठा ऐतिहासिक ग्रंथ है।
अनूदित कृतियां – ‘शशांक’ उनका बांग्ला से अनुवादित उपन्यास है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी से विश्वप्रपंच, आदर्श जीवन, मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन, कल्पना का आनन्द आदि रचनाओं का अनुवाद किया। आनन्द कुमार शुक्ल द्वारा “आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का अनुवाद कर्म” नाम से रचित एक ग्रन्थ में उनके अनुवाद कार्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
सम्पादित कृतियाँ – सम्पादित ग्रन्थों में हिंदी शब्दसागर, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भ्रमरगीत सार, सूर, तुलसी, जायसी ग्रंथावली उल्लेखनीय है।आचार्य शुक्ल हिन्दी के आलोचक, निबन्धकार, साहित्येतिहासकार, कोशकार, अनुवादक, कथाकार और कवि थे। उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में हिन्दी साहित्य का इतिहास है जिसमें हिन्दी इतिहास के कालनिलवर्धारण को प्रामाणिक स्वीकृति मिली और पाठ आधारित वैज्ञानिक आलोचना का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा किया गया । हिन्दी निबन्ध के क्षेत्र में भी शुक्ल जी का महत्त्वपूर्ण योगदान है। भाव, मनोविकार सम्बंधित मनोविश्लेषणात्मक निबन्ध उनके प्रमुख हस्ताक्षर हैं। शुक्ल जी ने इतिहास लेखन में रचनाकार के जीवन और पाठ को समान महत्त्व दिया। उन्होंने प्रासंगिकता के दृष्टिकोण से साहित्यिक प्रत्ययों एवं रस आदि की पुनर्व्याख्या की।
शैली – शुक्ल जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की छाप है। उनकी शैली अत्यंत प्रौढ़ और मौलिक है। उसमें गागर में सागर पूर्ण रूप से विद्यमान है। शुक्ल जी की शैली के मुख्यतः तीन रूप हैं –
आलोचनात्मक शैली- निबंध की इस शैली की भाषा गंभीर है। उनमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है। वाक्य छोटे-छोटे, संयत और मार्मिक हैं। गवेषणात्मक शैली- इस शैली में शुक्ल जी ने नवीन खोजपूर्ण निबंधों की रचना की है। आलोचनात्मक शैली की अपेक्षा यह शैली अधिक गंभीर और दुरूह है। इसमें भाषा क्लिष्ट है। वाक्य बड़े-बड़े हैं और मुहावरों का नितान्त अभाव है। भावात्मक शैली– शुक्ल जी के मनोवैज्ञानिक निबंध भावात्मक शैली में लिखे गए हैं। यह शैली गद्य-काव्य का सा आनंद देती है। इस शैली की भाषा व्यवहारिक है। भावों की आवश्यकतानुसार छोटे और बड़े दोनों ही प्रकार के वाक्यों को अपनाया गया है। बहुत से वाक्य तो सूक्ति रूप में प्रयुक्त हुए हैं। जैसे – बैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।
इनके अतिरिक्त शुक्ल जी के निबंधों में निगमन पद्धति, अलंकार योजना, तुकदार शब्द, हास्य-व्यंग्य, मूर्तिमत्ता आदि अन्य शैलीगत विशेषताएं भी मिलती हैं।
विशेष अंश – –
सभ्यता के आवरण और कविता–
सभ्यता की वृद्धि के साथ-साथ ज्यों-ज्यों मनुष्यों के व्यापार बहुरूपी और जटिल होते गए त्यों-त्यों उनके मूल रूप बहुत कुछ आच्छन्न होते गए। भावों के आदिम और सीधे लक्ष्यों के अतिरिक्त और-और लक्ष्यों की स्थापना होती गई; वासनाजन्य मूल व्यापारों के सिवा बुद्धि द्वारा निश्चित व्यापारों का विधान बढ़ता गया। इस प्रकार बहुत से ऐसे व्यापारों से मनुष्य घिरता गया जिनके साथ उसके भावों का सीधा लगाव नहीं। जैसे आदि में भय का लक्ष्य अपने शरीर और अपनी संतति ही की रक्षा तक था, पर पीछे गाय, बैल, अन्न आदि की रक्षा आवश्यक हुई, यहाँ तक कि होते-होते धान, मान, अधिकार, प्रभुत्व इत्यादि अनेक बातों की रक्षा की चिंता ने घर किया और रक्षा के उपाय भी वासना-जन्य प्रवृत्ति से भिन्न प्रकार के होने लगे। इसी प्रकार क्रोध, घृणा, लोभ आदि अन्य भावों के विषय भी अपने मूल रूपों से भिन्न रूप धारण करने लगे। कुछ भावों के विषय तो अमूर्त तक होने लगे, जैसे कीर्ति की लालसा। ऐसे भावों को ही बौद्धदर्शन में ‘अरूपराग’ कहतेहैं।
भावों के विषयों और उनके द्वारा प्रेरित व्यापारों में जटिलता आने पर भी उनका संबंध मूल विषयों और मूल व्यापारों से भीतर-भीतर बना है और बराबर बना रहेगा। किसी का कुटिल भाई उसे संपत्तिा से एकदम वंचित रखने के लिए वकीलों की सलाह से एक नया दस्तावेज तैयार करता है। इसकी खबर पाकर वह क्रोध से नाच उठता है। प्रयत्क्ष व्यावहारिक दृष्टि से तो उसके क्रोध का विषय है वह दस्तावेज या कागज का टुकड़ा। पर उस कागज के टुकड़े के भीतर वह देखता है कि उसे और उसकी संतति को अन्न-वस्त्रा न मिलेगा। उसके क्रोध का प्रकृत विषय न तो वह कागज का टुकड़ा है और न उस पर लिखे हुए काले-काले अक्षर। ये तो सभ्यता के आवरण मात्र हैं। अत: उसके क्रोध में और उस कुत्तों के क्रोध में जिसके सामने का भोजन कोई दूसरा कुत्ता छीन रहा है, काव्य-दृष्टि से कोई भेद नहीं है-भेद है केवल विषय के थोड़ा रूप बदलकर आने का। इसी रूप बदलने का नाम है सभ्यता। इस रूप बदलने से होता यह है कि क्रोध आदि को भी अपना रूप कुछ बदलना पड़ता है, वह भी कुछ सभ्यता के साथ अच्छे कपड़े-लत्ते पहनकर समाज में आता है जिससे मार-पीट, छीन-खसोट आदि भद्दे समझे जानेवाले व्यापारों का कुछ निवारण होता है।
क्रोध – –
यह कहा जा चुका है कि क्रोध दु:ख के चेतन कारण के साक्षात्कार या परिज्ञान से होता है, अत: एक तो जहाँ कार्यकारण के संबंध ज्ञान में त्रुटि या भूल होती है, वहाँ क्रोध धोखा देता है। दूसरी बात यह है कि क्रोध करनेवाला जिस ओर से दु:ख आता है उसी ओर देखता है; अपनी ओर नहीं। जिसने दु:ख पहुँचाया उसका नाश हो या उसे दु:ख पहुँचे, क्रोध का यही लक्ष्य होता है। न तो वह यह देखता है कि मैंने भी कुछ किया है या नहीं, और न इस बात का ध्या न रहता है कि क्रोध के वेग में मैं जो कुछ करूँगा उसका परिणाम क्या होगा। यही क्रोध का अंधापन है। इसी से एक तो मनोविकार ही एक दूसरे को परिमित किया करते हैं, ऊपर से बुद्धि या विवेक भी उन पर अंकुश रखता है। यदि क्रोध इतना उग्र हुआ कि मन में दु:खदाता की शक्ति के रूप और परिणाम के निश्चय, दया, भय आदि और भावों के संचार तथा अनुचित विचार के लिए जगह ही न रही तो बड़ा अनर्थ खड़ा हो जाता है, जैसे यदि कोई सुने कि उसका शत्रु बीस पचीस आदमी लेकर उसे मारने आ रहा है और वह चट क्रोध से व्याकुल होकर बिना शत्रु की शक्ति का विचार और अपनी रक्षा का पूरा प्रबंध किए उसे मारने के लिए अकेले दौड़ पड़े, तो उसके मारे जाने में बहुत कम संदेह समझा जाएगा। अत: कारण के यथार्थ निश्चय के उपरांत, उसका उद्देश्य अच्छी तरह समझ लेने पर ही आवश्यक मात्रा और उपयुक्त स्थिति में ही क्रोध वह काम दे सकता है, जिसके लिए उसका विकास होता है।
शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा, जिसमें काव्य प्रवृत्तियों एवं कवियों का परिचय भी है और उनकी समीक्षा भी लिखी है। दर्शन के क्षेत्र में भी उनकी विश्व प्रपंच पुस्तक उपलब्ध है। पुस्तक यों तो रिडल ऑफ दि युनिवर्स का अनुवाद है, पर उसकी लंबी भूमिका शुक्ल जी के द्वारा किया गया मौलिक प्रयास है। इस प्रकार शुक्ल जी ने साहित्य में विचारों के क्षेत्र में अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इस संपूर्ण लेखन में भी उनका सबसे महत्त्वपूर्ण एवं कालजयी रूप समीक्षक, निबंध लेखक एवं साहित्यिक इतिहासकार के रूप में प्रकट हुआ है।
नलिन विलोचन शर्मा ने अपनी पुस्तक साहित्य का इतिहास दर्शन में कहा है कि शुक्ल जी से बड़ा समीक्षक संभवतः उस युग में किसी भी भारतीय भाषा में नहीं था। अपनी समस्त सीमाओं के बावजूद उनका पैनापन, उनकी गंभीरता एवं उनके बहुत से निष्कर्ष एवं स्थापनाएं किसी भी भाषा के समीक्षा साहित्य के लिए गर्व का विषय बन सकती हैं।
रामचंद्र शुक्ल हिंदी के प्रथम साहित्यिक इतिहास लेखक हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष के पद पर रहते हुए ही सन् 1941 ई. में उनकी श्वास के दौरे में हृदय गति बंद हो जाने से मृत्यु हो गयी। साहित्यिक इतिहास लेखक के रूप में उनका स्थान हिंदी में अत्यंत गौरवपूर्ण है।