Friday, October 30, 2026
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सर्दियों में दिखें स्टाइलिश

सर्दियों में अगर स्टाइलिश दिखना अगर आपकी समस्या है तो कुछ बातों का ध्यान रखकर अपनी इस समस्या का समाधान कर सकती हैं। स्वेटर का वही पुराना डिज़ाइन तो अब आप पहन नहीं सकतीं, इसलिए इस बार अपने वॉर्डरोब में शामिल करिए ट्रेंडी बेल्टेड स्वेटर जो आपको मॉडर्न लुक देगा। इस स्वेटर को आप जीन्स, स्कर्ट या ट्राउजर के साथ पहन सकती हैं।

-लेदर जैकेट कभी पुराना नहीं होता ये सदाबहार है इसलिए अपने वॉर्डरोब में एक अच्छी क्वालिटी का लेदर जैकेट भी रखेंगे। जींस और स्कर्ट के साथ ये बहुत स्मार्ट लुक देता है।

-डेनिम जैकेट भी आपके पास होनी चाहिए। इसे आप अपनी पसंदीदा स्लीवलेस ड्रेस के साथ पहनकर ठंड से भी बच जाएंगी और स्टाइलिश भी लगेंगी।

-स्टोल या वुलन स्कार्फ भी ज़रूर रखें। इसे आप किसी भी परिधान के साथ पहन सकती हैं। स्कार्फ आपको स्टाइलिश लुक देगा, हां इसे आपको अलग-अलग तरीके से पहनना आना चाहिए।

-सर्दियों के मौसम में एनिमल प्रिंटेड पैटर्न वाले कपड़े भी बहुत चलते हैं। लेपर्ड प्रिंट तो एवरग्रीन है, तो लेपर्ड प्रिंट वाले मिडी स्कर्ट, ट्राउज़र आदि पहनकर स्मार्ट लुक नज़र आ सकती हैं।

-सर्दियों के मौसम में गहरे रंग चलन में रहते हैं। आप ट्रेंच कोट से लेकर जंप सूट और जिप कोट भी ट्राई कर सकती हैं।

-लॉन्ग जैकेट भी आपको स्मार्ट लुक देगा। दरअसल लंबी जैकेट भारतीय और पाश्चात्य परिधानों के साथ जँचती है।  साथ  इसे आप जींस और साड़ी दोनों के साथ पहन सकती हैं।

-सर्दियों में कपड़ो के साथ ही सही फुटवेयर का चुनाव भी ज़रूरी है। इस मौसम में स्टाइलिश सैंडल से काम नहीं चलेगा बल्कि आपको बूट पहनना होगा। इससे ठंड भी नहीं लगेगी और स्टाइलिश लुक भी मिलेगा। बूट खरीदते समय बस अपनी लंबाई का ध्यान रखें, क्योंकि कम हाइट वालों पर एंकल लेंथ बूट अच्छी लगती है जब लंबी लड़कियां किसी भी तरह का बूट पहन सकती हैं।

-सर्दियों में फैशनेबल दिखने के लिए लेयरिंग भी बढ़िया विकल्प है। यानी आप दो-तीन कपड़े साथ पहन सकती हैं या फिर किसी भी परिधान के ऊपर स्कार्फ पहनकर स्मार्ट लुक पा सकती हैं।

(साभार – प्रभासाक्षी)

सर्दियों में भरें गुड़ की मिठास

गुड़ पारा

सामग्री – मैदा – 2 कप तेल/घी – 1/4 कप बेकिंग पाउडर – 1 चम्मच गुनगुना पानी -1/2 कप तेल – तलने के लिए चाशनी बनाने की सामग्री गुड़ – 250 ग्राम पानी – 1 बड़ा चम्मच सौंफ – 1 चम्मच।

विधि – इसे बनाने के लिए आप एक बर्तन में मैदा, तेल और बेकिंग पाउडर डालकर अच्छी तरह से मिक्स करें। – फिर जब यह लड्डू जैसा बंधने लगे तो इसमें थोड़ा-थोड़ा करके गुनगुना पानी डालते रहें और आटे को गूंदते रहें। अब बर्तन से आटे को चॉपिंग बोर्ड या चकले पर रखकर अच्छी तरह मसलते हुए गूंदे। – अब आटे के दो हिस्से करें, एक हिस्से को अच्छी तरह मसलें और इसे रोटी से मोटे साइज में बेल लें। – इसे चाकू से मनचाहे आकार में काटें। -दूसरी लोई से भी से ऐसे कच्चे पारे काट लें। – अब कड़ाही में तेल डालकर गर्म करके इसमें एक-एक करके आधे पारे डालकर गोल्डन ब्राउन होने तक तल लें। – इसे ठंडा होने के लिए थाली में फैलाकर रखें। – अब कड़ाही में गुड़ और एक बड़ा चम्मच पानी डालकर मीडियम आंच पर रखें। फिर कड़छी से चलाते हुए चाशनी पका लें और गुड़ पारे के तीन तार की चाशनी की बनानी है। – मीडियम से धीमी आंच पर चाशनी को चलाते हुए पका लें और कड़छी से थोड़ी चाशनी लेकर अंगूठे और उंगली के बीच चिपकाकर देखें. अगर इसमें मोटी तार बनने लगे तो सौंफ डालकर मिक्स करें। – फिर इसके बाद पारे डाल दें और अच्छी तरह चलाते हुए पारों पर इसकी कोटिंग करें। – आंच को धीमा रखें और इन्हें मिलाते जाएं। – सभी पारों में चाशनी अच्छी तरह कोट हो जाने के बाद गैस बंद कर दें। – इसे आप 6 मिनट के लिए चलाते रहें और फिर आप देखेंगे कि सारे पारों को अच्छी तरह से कोटिंग हो गई है। आपके गुड़ पारे तैयार हैं।

 

दूध और गुड़ का पेड़ा

सामग्री –   दूध – 3/4 कप, घी – 2 बड़े चम्मच, इलायची पाउडर – 1/4 छोटा चम्मच, गुड़ – 1/2 कप, मिल्क पाउडर – 2 कप।

विधि –  दूध गुड पेड़ा बनाने के लिए सबसे पहले एक कटोरी लें और उसमें 3/4 कप दूध डालें। अब इसमें 2 टेबल स्पून घी, 1/4 टीस्पून इलायची पाउडर, 1/2 कप गुड़ डालें। अब सभी चीजों को अच्छे से मिला लें। अब एक पैन को गैस पर रखें, इसमें तैयार मिश्रण डालकर अच्छी तरह मिला लें और गुड़ को पिघला लें। गुड़ के पिघलने पर गैस बंद कर दीजिए और इसमें थोड़ा-थोड़ा करके 2 कप मिल्क पाउडर डालकर अच्छी तरह मिला लीजिए।  अब आँच को तेज कर दे और धीमी आंच पर इसे तब तक पकाएं जब तक कि यह पैन को छोड़ने न लगे। अब, यह जांचने के लिए कि मिश्रण पूरी तरह से पक गया है, मिश्रण का एक छोटा सा हिस्सा लें और एक गेंद तैयार करें; अगर गेंद आपके हाथों पर नहीं चिपकती है, इसका मतलब है कि मिश्रण पूरी तरह से पक गया है। जब मिक्स पूरी तरह से सिक जाये और पेन को छोड़ना शुरू करदे तो गैस बंद कर दें और मिश्रण को प्याले में निकाल कर कुछ देर के लिए ठंडा होने दें। अब, मिश्रण का एक छोटा हिस्सा ले और इससे एक छोटा पेड़ा तैयार करें और इसे अपनी उंगली से डिजाइन करें। अब पेड़े पिस्ते से सजाएं। अब बचे हुए मिश्रण से पेड़ा बनाकर तैयार कर लीजिए। अब आपका दूध पुड़ पेड़ा पूरी तरह से तैयार है।

शुभजिता स्वदेशी : ‘फेविकोल का मजबूत जोड़ है, टूटेगा नहीं….

‘फेविकोल का मजबूत जोड़ है, टूटेगा नहीं….यह पँक्तियाँ आज एक मुहावरा बन चुकी हैं। इसने अपने आप को कुछ ऐसे जोड़ा कि देश के हर घर में उसका इस्तेमाल होने लगा। फिर चाहे वह किताबों के कवर चिपकाना हो, जूते का सोल चिपकाना हो, टूटी हुई चीजों को जोड़ना हो, फर्नीचर हो या फिर घर की दीवारों पर रंग रोगन…
फेविकोल ब्रांड की मुख्य कंपनी पिडिलाइट को नामचीन बनाने में फेविकोल का बड़ा हाथ है। और फेविकोल को लोकप्रिय बनाने में इसके दिलचस्प और सृजनात्मक विज्ञापनों का। फेविकोल ब्रांड ने मार्केटिंग और ‘स्टेड एडहेसिव’ के प्रारूप को एक नई परिभाषा दी। एक वक्त ऐसा आया, जब ग्लू का दूसरा नाम ही फेविकोल हो गया। एडहेसिव यानी गोंद।
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ये थे भारत के फेविकोल मैन

दुनियाभर में जिस शख्स को ‘भारत के फेविकोल मैन’ के नाम से जाना गया, वह थे बलवंत राय कल्याणजी पारेख। 1925 में जन्मे बलवंत राय फेविकोल बनाने वाली कंपनी पिडिलाइट इंडस्ट्रीज के संस्थापक थे। गुजरात के भावनगर जिले में महुआ कस्बे में पैदा हुए बलवंतराय ने वकालत में डिग्री हासिल की थी, लेकिन कभी प्रैक्टिस नहीं की बल्कि वे मुंबई में एक डाइंग व प्रिंटिंग प्रेस में काम करने लगे। इसके बाद वह लकड़ी के एक व्यापारी के कार्यालय में चपरासी भी बने, जहां वह वेयरहाउस में अपनी पत्नी के साथ रहते थे लेकिन बलवंतराय को अपना व्यवसाय करना था। उन्होंने मोहन नाम के एक निवेशक की मदद से साइकिल, एरेका नट, पेपर डाइज को पश्चिमी देशों से भारत में आयात करने का व्यवसाय
शुरू किया। बलवंत ने जर्मनी की कम्पनी फेडको के साथ 50 फीसदी की एक साझेदारी की थी। 1954 में होचस्ट के एमडी के निमंत्रण पर बलवंत एक महीने के लिए जर्मनी गए। होचस्ट के एमडी की मृत्यु के बाद बलवंत ने अपने भाई सुशील के साथ मिलकर मुंबई के जैकब सर्किल में डाई, इंडस्ट्रियल केमिकल्स, पिगमेंट एमल्शंस यूनिट का निमार्ण और व्यवसाय आरम्भ किया। कंपनी का नाम पारेख डायकेम इन्डस्ट्रीज रखा गया। इसके बाद पारेख ने फेडको में और ज्यादा हिस्सेदारी की खरीद शुरू की और एक ग्लू बनाया, जिसका नाम था ‘फेविकोल’। यह नाम जर्मन शब्द कोल से प्रेरित था, जिसका अर्थ है ऐसी चीज जो दो चीजों को जोड़ती है। जर्मनी कंपनी भी ऐसा ही एक उत्पाद मोविकोल बनाती थी। फेविकोल को 1959 में लॉन्च किया गया। बलवंत की कंपनी में बात में उनके एक और भाई नरेन्द्र पारेख भी जुड़े। 1959 में ही कंपनी का नाम बदलकर पिडिलाइट इंडस्ट्रीज हो गया।

​शुरू में इंडस्ट्रियल केमिकल कंपनी थी पिडिलाइट
शुरुआत में पिडिलाइट एक इंडस्ट्रियल केमिकल कंपनी थी क्योंकि उस वक्त गोंद बिना किसी ब्रांड के बेचे जाते थे। कम्पनी का उपभोक्ताओं तक पहुँच बनाना 1970 के दशक में विकसित होना शुरू हुआ। यह वह वक्त था, जब पिडिलाइट ने फेविकोल ब्रांड के तहत अपने एडहेसिव्स के विज्ञापन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। ओगिल्वी एंड मदर एडवर्टाइजिंग एजेंसी के मार्गदर्शन में फेविकोल का हाथी वाला प्रतीक बनाया गया। पिडिलाइट के जिन विज्ञापनों को आज भी याद किया जाता है, वे 1980 के दशक के आखिर में अस्तित्व में आए। ओगिल्वी में पीयूष पांडे, कंपनी को उसकी पहचान बनाने में मदद करने का माध्यम बने।

​फेविकोल के लिए लीक से हटकर मार्केटिंग रणनीति
फेविकोल को कारपेंटर्स यानी बढ़ई के लिए एक ईजी टू यूज ग्लू के तौर पर कोलेजन और जानवरों की चर्बी पर बेस्ड गोंद का विकल्प बनाने के लिए उतारा गया था। कोलेजन और फैट बेस्ड गोंद, आम भाषा में सरेश के रूप में जाना जाता है। इसे अप्लाई करने से पहले पिघलाने की जरूरत होती है। फेविकोल को लोकप्रिय बनाने के लिए पारेख ब्रदर्स ने इसे रिटेल स्टोर्स को न बेचकर सीधा बढ़ईयों को देना शुरू किया। यह उस वक्त बिल्कुल नया कदम था। फेविकोल की मार्केटिंग 54 देशों में होती है और इसका इस्तेमाल कारपेंटर, इंजीनियर, शिल्पकार, इंडस्ट्री से लेकर आम लोग भी करते हैं। फेविकोल भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला गोंद है।

​कैसे बढ़ती चली गई पिडिलाइट

जब फेविकोल अस्तित्व में आया तो पिडिलाइट केवल एक फैक्ट्री के साथ केवल एक उत्पाद बनाती थी, जो था फेविकोल। इसके बाद 1963 में कंपनी ने मुंबई के कोंडिविटा गांव में पहला आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित किया। आज इसी इमारत में कंपनी का कॉरपोरेट हेड ऑफिस है। 1990 में पिडिलाइट इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड बनी। पिडिलाइट 1993 में शेयर बाजार पर सूचीबद्ध हुई। इसने तेजी से प्रगति की और विदेशों भी अपने पांव फैलाए। 1997 में कंपनी को एफई ब्रांडवैगन ईयर बुक द्वारा टॉप 15 भारतीय ब्रांड्स में जगह दी गई। साल 2000 में कंपनी ने एमसील को खरीदा और एक नया डिवीजन बनासाल 2001 में डॉ. फिक्सइट- द वाटरप्रूफिंग एक्सपर्ट लॉन्च हुआ। फेविकोल को साल 2002 में कान्स लॉइन्स इंटरनेशनल फेस्टिवल ऑफ क्रिएटिविटी में सिल्वर लॉइन अवॉर्ड मिला। इसका ‘बस वाला विज्ञापन काफी लोकप्रिय हुआ था। साल 2004 में पिडिलाइट 1000 करोड़ रुपये के टर्नओवर पर पहुंची और इसी साल फेविकोल मरीन लॉन्च हुआ। पिडिलाइट की 2013 तक 14 सहायक कम्पनियाँ थीं।

​इन क्षेत्रों में भी फेविकोल मैन ने दिया योगदान

महुआ में एक आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज को शुरू करने में योगदान दिया।
भावनगर के साइंस सिटी प्रॉजेक्ट के लिए 2 करोड़ रुपये दान किए।
गुजराती साहित्य परिषद को भी दान दिया।
2009 में बड़ौदा में बलवंत पारेख सेंटर फॉर जनरल सीमेंटिक्स एंड अदर ह्यूमन साइंसेज की स्थापना की।
​धीरूभाई अंबानी के थे दोस्त

बलवंत राय, रिलायंस इंडस्ट्रीज के संस्थापक धीरूभाई अंबानी के घनिष्ठ मित्र भी थे। बलवंत राय को साल 2011 में जे टैलबॉट विन्शेल अवॉर्ड मिला। फोर्ब्स ने 2012 में उन्हें धनवानों की सूची में 45वां स्थान दिया। वह विनायल केमिकल्स के चेयरमैन भी रहे। बलवंत राय का निधन 25 जनवरी 2013 को हुआ। पिडिलाइट इंडस्ट्रीज अमेरिका, ब्राजील, थाइलैंड, इजिप्ट, बांग्लादेश, दुबई आदि में भी बिक्री करती है। इस वक्त पिडिलाइट इंडस्ट्रीज का टर्नओवर 19.39 करोड़ रुपये है। कंपनी का मार्केट कैप 1,12,373.04 करोड़ रुपये है। बीएसई पर पिडिलाइट के शेयर की कीमत 2211.40 रुपये है। वित्त वर्ष 2020-21 में पिडिलाइट का राजस्व 6,216.33 करोड़ रुपये रहा था। सितंबर तिमाही में पिडिलाइट का राजस्व 2,213.40 करोड़ रुपये रहा है। पिडिलाइट के प्रॉडक्ट्स में फेविकोल के अलावा फेविक्विक, डॉ. फिक्सइट, एमसील, फेविकोल मरीन, फेविकोल एसएच, फेविकोल स्पीड एक्स, फेविकोल स्प्रे, फेविकोल फ्लोरिक्स, फेविकोल फोमिक्स आदि शामिल हैं।

( स्त्रोत साभार : नवभारत टाइम्स )

फूलों का बाग सजाने वाली पंजाब की पारम्परिक कढ़ाई फुलकारी

फुलकारी पंजाब की लोक कढ़ाई को संदर्भित करती है । हालांकि फुलकारी का अर्थ है फूलों का काम, डिजाइनों में न केवल फूल शामिल हैं, बल्कि रूपांकनों और ज्यामितीय आकृतियों को भी शामिल किया गया है।
फुलकारी की उत्पत्ति के बारे में अलग-अलग मत हैं। ऐसी ही एक मान्यता है कि यह कशीदाकारी देश के विभिन्न भागों में ७वीं शताब्दी ईस्वी में प्रचलित थी, लेकिन केवल पंजाब में ही प्रचलित थी। फुलकारी से मिलती जुलती कढ़ाई बिहार और राजस्थान में भी दिखती है। कढ़ाई की यह शैली ईरान से आई थी जहां इसे गुलकारी कहा जाता था , जिसका अर्थ फूलों का काम भी होता है। हालांकि, पाल (१९६०) ने नोट किया कि फुलकारी की शैली गुलकारी के काम से अलग है।
पंजाब के प्राचीन ग्रंथों, लोक कथाओं और साहित्य में फुलकारी का उल्लेख मिलता है। हर्षचरित में पता चलता है कि सम्राट हर्षवर्धन (590-647 सीई), महान प्राचीन भारतीय वर्धन साम्राज्य के अंतिम शासक की जीवनी, सातवीं सदी के इतिहासकार बाना ने लिखा, “कुछ लोगों को रिवर्स साइड से कपड़े पर फूल और पत्तियों की कढ़ाई कर रहे थे, ” जो फुलकारी कढ़ाई का तकनीकी विवरण है। हालांकि, फुलकारी शब्द का सबसे पहला संदर्भ पंजाबी साहित्य में १८वीं शताब्दी के वारिस शाह के हीर रांझा (एक पौराणिक पंजाबी दुखद रोमांस) के संस्करण में है, जो महिला नायक हीर की शादी की पोशाक का वर्णन करता है और फुलकारी के साथ विभिन्न कपड़ों की वस्तुओं को सूचीबद्ध करता है। कढ़ाई। फुलकारी पर पहला व्यापक अंग्रेजी प्रकाशन 1880 में फ्लोरा एनी स्टील द्वारा किया गया था जहां उन्होंने विभिन्न शैलियों का वर्णन किया और चित्र के रूप में किस्मों का प्रदर्शन किया। अपने वर्तमान स्वरूप में, फुलकारी कढ़ाई १५वीं शताब्दी से लोकप्रिय है। पाल (१९६०) का मानना ​​है कि इसकी उत्पत्ति चाहे जो भी हो, फुलकारी का काम विशिष्ट और विशिष्ट पंजाबी है।
फुलकारी सहित कढ़ाई के काम के लिए विभिन्न मोटे संरचित कपड़े जैसे खादर, दसुती , और खद्दर का उपयोग किया जाता था। पहला मोटे धागों वाला एक ढीला बुना हुआ खद्दर था, जो “हलवान” (हल्का और बारीक बुने हुए खद्दर) के विपरीत खड़ा था, और तीसरा “चौंसा खद्दर” था, जिसे महीन धागों से बुना गया था और “भाग” के लिए चुना गया था।।
फुलकारी कढ़ाई की मुख्य विशेषताएं रंगीन रेशमी धागे के साथ मोटे सूती कपड़े के गलत साइड पर रफ़ सिलाई का उपयोग है । पंजाबी महिलाएं रफ़ स्टिच के अपने कुशल हेरफेर से असंख्य आकर्षक और दिलचस्प डिज़ाइन और पैटर्न बनाती हैं। कहल (2009) के अनुसार जिस कपड़े में कुछ ही फूल होते हैं, उसे फुलकारी कहते हैं। अन्य प्रकार विशिष्ट किस्में हैं। फुलकारी की पारंपरिक किस्में कपड़े की बड़ी वस्तुएं हैं और इसमें चोप, तिलपत्र, नीलक और बाग शामिल हैं। कभी-कभी, बाग को फुलकारी की अन्य किस्मों की तरह अलग वर्गीकरण दिया जाता है, कपड़े के हिस्से दिखाई देते हैं, जबकि एक बाग में , कढ़ाई पूरे परिधान को कवर करती है ताकि आधार कपड़ा दिखाई न दे। इसके अलावा, समकालीन आधुनिक डिजाइनों में, साधारण और कम कढ़ाई वाले दुपट्टे (लंबे स्कार्फ), ओधिनी (बड़े आकार के लंबे स्कार्फ), और शॉल, जो रोजमर्रा के उपयोग के लिए बने होते हैं, को फुलकारी कहा जाता है , जबकि कपड़ों की वस्तुएं जो पूरे शरीर को ढकती हैं , शादियों जैसे विशेष और औपचारिक अवसरों के लिए बनाए गए बाघों को कहा जाता है(बड़ा बागीचा)। फुलकारी आज भी पंजाबी शादियों का एक अभिन्न अंग है।
फुलकारी के शिल्प में सदियों से बदलाव आया है। पाल (1960) के अनुसार, पटियाला विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित फुलकारी के इतिहास और उपयोग पर अपने शोध से पता चलता है कि फुलकारी की कढ़ाई की पारंपरिक विधि और पंजाब में इसके व्यापक उपयोग , भारत में 1950 के दशक तक गिरावट आई। परंपरागत रूप से, महिलाएं स्टेंसिल का उपयोग किए बिना फुलकारी की कढ़ाई करती थीं । पाल (1960) का कहना है कि महिलाएं अपने आंगनों को साफ करतीं और दोस्तों और परिवार को औपचारिक रूप से फुलकारी की कढ़ाई की प्रक्रिया शुरू करने के लिए आमंत्रित करती थीं। इस मौके पर लोकगीत गाए जाते । “इह फुलकारी मेरी मान ने कढ़ी / इस नू घुट जाफियां पवन” (यह फुलकारी मेरी मां द्वारा कढ़ाई की गई थी, मैं इसे गर्मजोशी से गले लगाता हूं)। इस तरह के लोक गीत इस बात का संकेत देते हैं कि लड़की का अपनी माँ या दादी या मौसी की कढ़ाई वाली फुलकारी से भावनात्मक लगाव था।
बताते हैं कि जैसे ही एक लड़की का जन्म होता था, माता और दादी बाग और फुलकारी कढ़ाई करना शुरू कर देती थीं, जो शादी के समय दी जानी थी। परिवार की स्थिति के आधार पर माता-पिता 11 से 101 बाग और फुलकारी दहेज देंते। ऐतिहासिक रूप से, बागों के लिए उत्तम कढ़ाई हजारा , पेशावर , सियालकोट , झेलम , रावलपिंडी , मुल्तान , के जिलों में बनाई गई है। अमृतसर , जालंधर , अंबाला , लुधियाना , नाभा , जींद , फरीदकोट , कपूरथला और चकवाल के पंजाब क्षेत्र भी इस कला का प्रतिनिधित्व करते हैं। फुलकारी और बाग कढ़ाई ने गुजरात की कढ़ाई को प्रभावित किया है जिसे हीर भारत के रूप में जाना जाता है , इसके ज्यामितीय रूपांकनों और सिलाई के उपयोग में। शादी के त्योहारों और अन्य खुशी के अवसरों के दौरान पूरे पंजाब में महिलाओं द्वारा फुलकारी और बाग पहने जाते थे । वे महिलाओं द्वारा अपने स्वयं के उपयोग और परिवार के अन्य सदस्यों के उपयोग के लिए कढ़ाई की जाती थीं और बाजार में बिक्री के लिए नहीं थीं। इस प्रकार, यह विशुद्ध रूप से एक घरेलू कला थी जिसने न केवल सृजन के लिए उनके आंतरिक आग्रह को संतुष्ट किया बल्कि दिन-प्रतिदिन के जीवन में रंग लायी। एक तरह से यह सच्ची लोक कला थी । पारंपरिक फुलकारी के महत्व को ध्यान में रखते हुए, आर्यन (1983) ने उनकी शानदार कलाकृति को देखते हुए कपड़ों को एकत्र किया। फुलकारी की कला को संरक्षित करने के इस तरह के प्रयासों ने इसके पुनरुद्धार को प्रभावित किया है।
फुलकारी की पहचान लंबी और छोटी रफ़ टांके का उपयोग करके असंख्य पैटर्न बनाना है। तब कोई पैटर्न वाली किताबें नहीं थीं और पूरी तरह से कपड़े के पीछे से कढ़ाई का काम किया गया था। डिजाइनों का पता नहीं लगाया गया था। तकनीक और पैटर्न दर्ज नहीं किया गया था, लेकिन मुंह के वचन से प्रेषित और प्रत्येक क्षेत्रीय समूह कढ़ाई या डिजाइन की शैली के साथ पहचान की थी कढ़ाई सोता रेशम धागे के साथ किया जाता है। पैट नामक नरम बिना मुड़े रेशम के धागों का उपयोग कढ़ाई के लिए किया जाता था। धागा कश्मीर , अफगानिस्तान और बंगाल से आया था और बड़े शहरों में ललारियों द्वारा रंगा गया था । सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला रेशम चीन से आता है । गांव की महिलाओं को धागा फेरीवालों या पेडलरों से मिलता था जो गांव-गांव जाकर दैनिक जरूरत का सामान बेचते थे।

सबसे पसंदीदा रंग लाल और उसके रंग थे, क्योंकि लाल को पंजाब के हिंदू और सिख दोनों ही शुभ मानते हैं। मैडर ब्राउन, रस्ट रेड, या इंडिगो कढ़ाई के लिए आधार के लिए सामान्य पृष्ठभूमि रंग थे। बाग में सफेद रंग का प्रयोग बुजुर्ग महिलाओं और विधवाओं द्वारा किया जाता था। पश्चिमी पंजाब में काले और नीले रंग को कम पसंद किया जाता था, जबकि पूर्वी पंजाब में सफेद रंग का प्रयोग कम होता था । फुलकारी पर आमतौर पर ज्यामितीय पैटर्न की कढ़ाई की जाती है। फुलकारी ने गांवों में रोजमर्रा की जिंदगी के दृश्यों को चित्रित किया। पशु और पक्षी सफलता, सुंदरता, गर्व और सद्भावना का प्रतिनिधित्व करते हैं और विभिन्न फल धन, समृद्धि और उर्वरता के प्रतीक हैं। गेहूं और जौ के डंठल वाले कान भी सामान्य रूप थे । कोई धार्मिक विषय या दरबार (सिख मंदिर हॉल) के दृश्यों पर कढ़ाई नहीं की गई थी। दुपट्टे या शॉल के सजाए गए छोर, पल्लू में आकर्षक डिजाइनों के साथ उत्कृष्ट फुलकारी कारीगरी के अलग-अलग पैनल हैं।
इस तथ्य के बावजूद कि यह कढ़ाई मूल रूप से व्यावसायिक पैमाने पर नहीं की गई थी, इसमें से कुछ को 19 वीं शताब्दी में विदेशों में एक बाजार मिला। यूरोपीय घरों के लिए पर्दे बनाने के लिए शॉल या घाघरा (एक लंबी पूरी तरह से सजी हुई स्कर्ट) की कढ़ाई का इस्तेमाल किया जाता था। पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों से फुलकारी कपड़े के नमूने ब्रिटिश शासन के तहत आयोजित औपनिवेशिक और भारतीय प्रदर्शनी में भेजे गए थे। 19वीं सदी के अंत तक फुलकारी और बाग को यूरोप और अमेरिका में एक बाजार मिल गया था। अमृतसर में ऐसी फर्में थीं जहाँ किसी भी आकार या आकार की फुलकारी का ऑर्डर दिया जा सकता था। कुछ फर्मों ने व्यावसायिक स्तर पर फुलकारी की आपूर्ति के लिए यूरोप से ऑर्डर प्राप्त किए। नए बाजार ने डिजाइन और रंग संयोजन में बदलाव तय किए।
प्रकार
पारंपरिक कपड़ा हाथ से काता हुआ कपास का उपयोग करके खद्दर होगा। भारी सामग्री बनाने के लिए कपास को पेशेवर रूप से बुना जाएगा। हलवा नामक हल्के संस्करणों का भी उपयोग किया जाता था। पाल ने कहा कि खादी सामग्री भी लोकप्रिय हो रही है। रंग लाल, सफेद, सुनहरा पीला हरा और गहरा नीला था। सामग्री को रंगने के लिए प्राकृतिक तरीकों का उपयोग किया जाएगा जैसे कि फूलों का उपयोग करना। रुबिया कॉर्डिफोलिया के पेड़ को पंजाबी में इंडियन मैडर और मजीथ के नाम से जाना जाने वाला एक लोकप्रिय तरीका था । पैट के रूप में जाना जाने वाला अनस्पन रेशम का धागा पंजाबी में दासुति ट्रोपा, हेरिंगबोन सिलाई और साटन सिलाई के रूप में जाना जाने वाला डबल सिलाई का उपयोग करके डिज़ाइनों को कढ़ाई करने के लिए उपयोग किया जाएगा । लंबे और छोटे टांके लगाए जाएंगे। डिजाइनों पर कढ़ाई करने के लिए किसी स्टैंसिल का उपयोग नहीं किया जाएगा।
फुलकारी की कढ़ाई करने के लिए महिलाएं इकट्ठा होती थीं। समूह द्वारा पारंपरिक लोक गीत गाए जाते। पाल ने एक महिला का एक उदाहरण भी दिया है कि वह अपनी प्रत्येक सिलाई के लिए गेहूं का एक दाना एक तरफ रख देती है। फुलकारी संपन्न होने पर महिला ने अनाज दान कर दिया। कभी-कभी एक फुलकारी पर अलग-अलग शैलियां देखी जा सकती हैं। इसका कारण यह है कि प्रत्येक लड़की अपनी कल्पना का उपयोग एक डिजाइन सिलाई करने के लिए करती है, शायद लड़की को याद दिलाने के लिए कि जब वह अपने दोस्तों से शादी करती है, जिन्होंने फुलकारी सिलाई में मदद की थी।  थिंड (२००५) में एक अन्य किस्म का उल्लेख है: बावन बाग जहां एक कपड़े पर एक से अधिक बाग शैली का उपयोग किया जाता है। कई किस्में संग्रहालय प्रदर्शनियों और निजी संग्रह का हिस्सा हैं।

बाग

बाग एक ऐसी शैली है जिसमें पूरी सतह पर कढ़ाई की जाती थी। डारिंग स्टिच के साथ काम करके क्षैतिज, ऊर्ध्वाधर और विकर्ण टांके के उपयोग से कई डिज़ाइन बनाए गए थे। इसके उपयोग के आधार पर कई प्रकार के बाग थे जैसे घूंघट (घूंघट) बाग और वारी दा बाग। कई मामलों में, कढ़ाई करने वाले ने अपने आस-पास जो देखा उससे डिजाइन प्रेरित थे। रसोई ने कई बागों के डिजाइन प्रदान किए – बेलन (रोलिंग पिन) बाग, मिर्ची (मिर्च) बाग, गोभी (फूलगोभी) बाग, करेला (करेला) बाग, और डब्बी (धातु कंटेनर) बाग। दिल्ली दरवाजा, शालीमार चार और चौरसिया बाग जैसे अन्य प्रसिद्ध मुगल उद्यानों के लेआउट को दर्शाते हैं।  कपड़े पर बिखरे हुए काम को “आधा बाग” (आधा बाग) कहा जाता है। सूती खादर पर सफेद या पीले रेशम के फ्लॉस से जो काम कपड़े के बीच से शुरू होकर पूरे कपड़े तक फैल जाता है, उसे “चश्म-ए-बुलबुल” कहते हैं। होल्बीन स्टिच का उपयोग करके बनाया गया एंटीक चोप जिसके परिणामस्वरूप टेक्सटाइल के आगे और पीछे समान दृश्य दिखाई देते हैं।
चोप और सुभारी

चोप और सुबार की दो शैलियों को दुल्हनें पहनती हैं। चोप कपड़े के दोनों किनारों पर कढ़ाई की जाती है। चोप पारंपरिक रूप से पीले रंग के साथ लाल रंग में कढ़ाई की जाती है। दो फैब्रिक पैनल आपस में जुड़े हुए हैं जिनके दोनों सिरों पर समान पैटर्न की कढ़ाई की गई है। दोनों सेल्वेज पर कशीदाकारी करने वाला एकमात्र रूप त्रिकोण की एक श्रृंखला है जिसका आधार सेल्वेज की ओर है और अंदर की ओर इशारा करता है। डिजाइन को स्टेप-लैडर फैशन में छोटे वर्गों के साथ काम किया जाता है।
दर्शन द्वारी

दर्शन द्वार एक प्रकार की फुलकारी है जिसे प्रसाद या भेट (प्रस्तुति) के रूप में बनाया जाता था। इसमें पैनल आर्किटेक्चरल डिजाइन है। खंभे और गेट के शीर्ष जालीदार ज्यामितीय पैटर्न से भरे हुए हैं। कभी-कभी मनुष्य को भी द्वार पर खड़ा दिखाया जाता है।

सांची
यह एकमात्र ऐसी शैली है जिसमें काली स्याही से आकृतियों की रूपरेखा तैयार की जाती है। फिर इसे रफ़ स्टिच से कशीदाकारी करके भर दिया जाता है। अन्य शैलियों में, कोई पैटर्न नहीं खींचा जाता है और काम केवल पीछे से धागों को गिनकर किया जाता था। सांची बठिंडा और फरीदकोट जिलों में लोकप्रिय था।
सांची फुलकारी फिरोजपुर और उसके आसपास भी लोकप्रिय थी । सांची कढ़ाई ग्रामीण जीवन से प्रेरणा लेती है और रोजमर्रा के ग्रामीण जीवन के विभिन्न दृश्यों को दर्शाती है जैसे कि एक आदमी जोतता है, चारपाई (जूट की खाट) पर लेटा है, चौपर (एक क्रॉस और सर्कल बोर्ड गेम), हुक्का धूम्रपान करता है, या शरबत पीने वाले मेहमान (मीठा) सौहार्दपूर्ण)। सामान्य विषयों में दूध मथने, चक्की पर गेहूं का आटा पीसने और चरखे पर काम करने जैसे काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं। महिलाओं ने कढ़ाई वाले दृश्य भी जो उन्हें दिलचस्प लगे, जैसे कि एक ब्रिटिश अधिकारी का गाँव में आना या महिलाएँ छाता लेकर और मेमसाहिब (एक ब्रिटिश अधिकारी की पत्नी) के साथ चलना। पक्षियों, ट्रेनों, सर्कस के साथ-साथ लोकप्रिय पंजाबी किंवदंतियों जैसे सोहनी महिवाल और सस्सी-पुन्नुन के दृश्यों को अक्सर चित्रित किया गया था शैली में कंगन, झुमके, अंगूठियां और हार के आभूषण डिजाइन भी शामिल हैं। पाल (1960) का मानना ​​​​है कि इस तरह के डिजाइन फुलकारी की कढ़ाई की पारंपरिक पद्धति का हिस्सा नहीं थे, बल्कि एक महिला की इच्छा व्यक्त की थी कि उसके पास आभूषण की ऐसी वस्तुएं हों।
तिलपत्र

तिल (तिल) पात्र में सजावटी कढ़ाई होती है जो तिल के बीज फैलती है। तिलपत्र शब्द का अर्थ है “बीजों का प्रसार”।

नीलक

नीलक फुलकारी पीले या चमकीले लाल कढ़ाई के साथ काले या लाल रंग की पृष्ठभूमि से बना है। फुलकारी का रंग धातुओं के साथ मिलाया जाता है।

घूंघट बाग

रावलपिंडी में उत्पन्न , घूंघट बाग को सिर पर पहना जाने के लिए किनारे पर केंद्र के चारों ओर भारी कढ़ाई की जाती है। कशीदाकारी केंद्र को फिर चेहरे पर खींचा जाता है ताकि एक कशीदाकारी घूंघट बनाया जा सके।
छमासी

छमास फुलकारी रोहतक , गुड़गांव , हिसार और दिल्ली में बनायी जाती है। चामा फुलकारी में दर्पण शामिल होते हैं जिन्हें पीले, भूरे या नीले रंग के धागे से कपड़े में सिल दिया जाता है।

दक्षिण और दक्षिण-पश्चिमी पंजाब क्षेत्र की फुलकारी

दक्षिण और दक्षिण-पश्चिमी पंजाब क्षेत्र में दक्षिण पंजाब, भारत , पंजाब के दक्षिण और दक्षिण पश्चिम , पाकिस्तान शामिल हैं । दक्षिण और दक्षिण-पश्चिमी पंजाब क्षेत्र की फुलकारी में चौड़े किनारे होते हैं जिन पर जानवरों और पक्षियों के डिजाइन की कढ़ाई की जाती है। चॉप की तरह, कपड़े के दोनों किनारों पर किनारों पर कढ़ाई की जाती है।
परंपरागत रूप से फुलकारी वस्त्र एक लड़की की शादी का हिस्सा थे। इसके रूपांकन उसकी भावनाओं को व्यक्त करते थे और फुलकारी के टुकड़ों की संख्या परिवार की स्थिति को परिभाषित करती थी। फुलकारी ने कठिन समय का सामना किया है। एक समय में 52 विभिन्न प्रकार की फुलकारी मौजूद थीं। वे अब एक मुट्ठी भर से भी कम हो गए हैं। पुराने दिनों में, महिलाएं ट्रेसिंग ब्लॉकों के उपयोग के बिना कढ़ाई कर सकती थीं। अधिकांश समकालीन कशीदाकारी अब ऐसा नहीं कर सकते हैं और ट्रेसिंग ब्लॉक का उपयोग कर सकते हैं। हथकरघा और हस्तशिल्प परंपरा विशेषज्ञ जसलीन धमीजा के अनुसार, “कढ़ाई का रूप कमोबेश विलुप्त हो गया। किसी ने भी इनका प्रचार नहीं किया।”
पाल (1960) ने फुलकारी की किस्मों और उन्हें बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विधियों का वर्णन करने के बाद कहा कि अविभाजित पंजाब में पिछले 50 वर्षों से कला में कमी होने के बावजूद, लड़कियों और महिलाओं ने अभी भी फुलकारी की कढ़ाई जारी रखी है। पंजाब में आधुनिक पंजाब, भारत , हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्से कम से कम 1950 के दशक तक शामिल थे। शहरों से दूर गांवों में, चोप जैसी फुलकारी अभी भी पारंपरिक परिवारों की दुल्हनों को दी जाती थी। फुलकारी को दीवारों पर कीलों से लटकते हुए देखा जा सकता है, जब धार्मिक व्यक्ति गांवों में जाते हैं तो जमीन पर रखे जाते हैं, खेतों में फसलों को इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और लत्ता के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। विदेशों से आने वाले कलेक्टरों को फुलकारी सस्ते दामों पर बेची जा रही थी जो बाद में उन्हें ऊंची दरों पर बेच देते थे। महिलाएं नौकरों को हल्की फुलकारी देती थीं। पाल का मानना ​​था कि पंजाब भारत का एक प्रगतिशील राज्य है लेकिन वह अपने पारंपरिक शिल्प को महत्व नहीं देता। 1947 के विभाजन के बाद शरणार्थी संकट के कारण ही नई रुचि पैदा हुई है, जिसके तहत संगठनों ने महिलाओं को फुलकारी को कढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि वे अपनी जरूरतों को पूरा कर सकें। फुलकारी स्कार्फ और फुलकारी बैग लेकर लड़कियों और महिलाओं में नई दिलचस्पी देखी जा सकती है। हालांकि, फुलकारी की कढ़ाई का नया तरीका पारंपरिक तरीके से अलग है। फुलकारी अब मशीनों और आधुनिक सामग्रियों का उपयोग करके कढ़ाई की जाती है।
(स्त्रोत साभार – विकिपीडिया और द वोवेन्सौल्स कलेक्शन)

 

युवाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण : साथ आये जीनियस फाउंडेशन और ईएसएससीआई

कोलकाता । रोजगार क्षमता बढ़ाने और रोजगार योग्य युवाओं को आगे बढ़ाने की दृष्टि से अग्रणी मानव संसाधन संगठन, जीनियस कंसल्टेंट्स लिमिटेड की सीएसआर शाखा जीनियस फाउंडेशन ने इलेक्ट्रॉनिक सेक्टर स्किल काउंसिल ऑफ इंडिया (ईएसएससीआई) के साथ सहयोग किया है। इस सहयोग के तहत विभिन्न रोजगार योग्य श्रमिकों के बीच कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण और कोचिंग प्रदान की जाएगी।
इस प्रयास को शुरू करने के लिए जीनियस कंसल्टेंट्स लिमिटेड और ईएसएससीआई द्वारा प्रशिक्षण और उद्यमिता विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर आरपी यादव, अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, जीनियस कंसल्टेंट्स लिमिटेड, पीयूष चक्रवर्ती, उपाध्यक्ष, ईएसएसआई, बिक्रम दास, राज्य संबद्ध  अधिकारी, एनएसडीसी, और अभिजीत चटर्जी, अध्यक्ष, एसेन्सिव एडुकेयर लिमिटेड की  उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
कार्यक्रम के दौरान, एमओयू पर हस्ताक्षर करने के बाद गेस्ट ऑफ ऑनर, साक्षी गोपाल साहा, जीएम, पीएनबी बैंक, और आरपी यादव, सीएमडी, जीनियस कंसल्टेंट्स लिमिटेड ने अपने विचार रखे। इस कार्यक्रम में आकर्षक पैनल चर्चा हुई, जिसमें विषयों पर प्रकाश डाला गया। जैसे सूक्ष्म उद्यमिता को सशक्त बनाना और आजीविका, कौशल और पदोन्नति आदि को बढ़ाने के लिए सीएसआर गतिविधियों का लाभ उठाना। इस सहयोग के हिस्से के रूप में, जीनियस कंसल्टेंट्स लिमिटेड पूरे पश्चिम बंगाल में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करेगी ताकि उन्हें स्थायी आजीविका सृजन के लिए प्रशिक्षित किया जा सके और उन्हें एक उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। वह  आवश्यकता के अनुसार इन श्रमिकों की भर्ती में अपनी सहायता प्रदान करेगी। विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों जैसे मैकेनिक्स, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिकल, ऑटोमोटिव और कई अन्य क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस पहल को सफल बनाने के लिए जीनियस कंसल्टेंट्स एनएसडीसी के तहत पंजीकृत विभिन्न कामगारों को कुशल बनाने में मदद के लिए 20 लाख रुपये का निवेश करेगी। वह एक नामित टीम भी गठित करेगी  जो ऐसे कई कामगारों की पहचान करेगी और उनकी मदद करेगी जो इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों से लाभान्वित हो सकते हैं।
इस पहल पर टिप्पणी करते हुए, जीनियस कंसल्टेंट्स लिमिटेड के सीएमडी, आरपी यादव ने कहा, “हम स्थायी रोजगार सृजन और समावेशी विकास की दिशा में काम कर रहे ईएसएससीआई के साथ अपनी साझेदारी की घोषणा करने के लिए बेहद उत्साहित हैं। हम विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों की सुविधा प्रदान करेंगे।
उन्होंने आगे कहा, “हम वास्तव में मानते हैं कि उचित प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और कौशल विकास के साथ, हम एक बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं और कई लोगों की आजीविका में सुधार कर सकते हैं। कौशल प्रदान करके, हम न केवल श्रमिकों को सशक्त बनाते हैं, बल्कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उत्पादक और रोजगार योग्य कार्यबल को बढ़ाकर अपनी अर्थव्यवस्था की संरचना और नींव को भी मजबूत कर रहे हैं।”

ए वीर सपूतों! तुम्हें सलाम अर्चना ने दी काव्यांजली

कोलकाता ।  कोलकाता की प्रसिद्ध संस्था अर्चना द्वारा स्वरचित रचनाओं के द्वारा अॉन-लाइन काव्यांजली आयोजित की गई। विभिन्न विषयों पर कविता के विभिन्न रूपों में भी नये प्रयोग की कविताओं को सुनाया गया। मुक्तक, दोहा, सोरठा और मुकरियों- क्षणिकाओं के साथ कविताओं और गीतों के द्वारा काव्य संध्या में सभी सदस्यों ने अपनी रचनाएँ सुनाई।
संगीता चौधरी ने ए वीर सपूतों! तुम्हें सलाम कविता सुना कर विजय दिवस के अवसर पर सभी वीर सपूतों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई । सुशीला चनानी, मृदुला कोठारी, हिम्मत चौरडिया, भारती मेहता(अहमदाबाद) , बनेचंद मालू, संगीता चौधरी, मीना दूगड़, शशि कंकानी, उषा श्राफ, इंदु चांडक और डॉ वसुंधरा मिश्र ने भाग लिया।
क्षणिकाएं-सुशीला चनानी ने क्षणिकाओं के साथ अपनी कविता और मुकरियांँ सुनाई उनकी पंक्तियाँ – हवा भी दीपक से कैसा रिश्ता निभाती है!/जलाती भी है बुझाती भी है, पायदान जैस विनम्र भी न बनो,पौंछने लगेंगे लोग पैरों की रजकण, चाटुकारिता की सीढ़ी चढ़ना चाहते हो, आसमाँ में घर बसाने,चाहते हो/कैसे अहमक हो चाहते हो बालू के घरौंदों तले रास रचाना! शशि कंकानी ने दिलों दिल की बात समझ ली /चुप रहकर, कुछ न कहकर /जो बात जुबां न कह सकीं वो बात समझ गयी थी नजर और बढ़ते रहे अपने लक्ष्य की और /निरंतर- गतिशील ,कलम की तरह भर खुशियों की स्याही बढ़े चले- आओ बढ़े चले, मीना दूगड़ – थम गई बरखा,छा गई हिम कणों की बहार, वनस्पति जगत में सजी ओस बूंदों की कतार। और खूंटी से टंगा कलैंडर हवा से फड़फड़ा रहा था/वर्ष का अंत जान विदाई का गम जता रहा था। उषा श्राफ -माँ ने बेटे को चूमा और रिश्तों की बगिया मुरझा न जाए कहीं। भारती मेहता रिश्ता हो तो हाइडरोजन आक्सीजन जैसा/मिलने पर अपना अहम् खो बनाते हैं शीतल, तृप्तिदायक जल ! हिम्मत चोरड़़िया – दोहा-सतत चले ये गोष्ठियाँ, बढ़े कलम की धार।/करे क्रांति ये अर्चना, रचे नया संसार।।मुक्त हरिगीतिका छंद में-जन्मे जहाँ पर बेटियाँ…/अन्याय का हो सामना…हाइकु-कूड़े का ढ़ेर/धरा के नन्हें फूल/रोटी खोजते।।, मृदुला कोठारी -हर रंग में रंग दे रहे खुशियों को तमाम उम्र/ मृदु हस्ताक्षर की तरह कागजों में दर्ज किए जा रहे हैं/सफेद कागज पर कलम के साथ/स्याही को बिखरते देखा है/दिल तो मेरा था पर गैरों को बसते देखा है। इंदु चांडक – गीत नींद से सबको जगाती है सुबह, कुं- जीवन जीने की कला बिरला जाने कोय, जो जाने हँसता रहे नहीं जाने सो रोय, कुं- किसके मन में क्या भरा कैसे जाने कोय, अन्तस में सब छिपा रहे मुख पर लिखा न होय, गीत – जीवन का संदेश लाती है सुबह/सूर्य का रथ खींच लाती है सुबह, बनेचंद मालू – मेरी रचना जो पढ़ी गई /मैं सोचता बहुत हूँ।/ सोचना मेरी आदत है।/यह भी सोचता हूँ/जे नहीं सोचता हूँ/उनको लानत है। वसुंधरा मिश्र – परिवर्तन होना चाहिए। सोच में परिवर्तन लाना होगा कविताएं सुनाई।इंदु चांडक ने ऑन-लाइन जूम तकनीक को संभाला तथा धन्यवाद ज्ञापन किया मृदुला कोठारी ने और संचालन किया डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

2021-22 के हिंदी मेला में प्रो. कल्याणमल लोढ़ा शिक्षण सम्मान प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय को

कोलकाता । कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रथम अध्यक्ष प्रो. कल्याणमल लोढ़ा की जन्मशती के अवसर पर हिंदी मेला में 2021 का प्रो. कल्याणमल लोढ़ा शिक्षण सम्मान प्रो. सोमा वंद्योपाध्याय को दिया जाएगा। इसकी जानकारी आज सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के संयुक्त महासचिव डा.राजेश मिश्र और प्रो. संजय जायसवाल ने दी। प्रो. कल्याणमल लोढ़ा की कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के निर्माण, कई कालेजों में हिंदी विभाग खुलवाने और हिंदी शिक्षण के प्रसार में एक बड़ी भूमिका थी। वे एक कुशल वक्ता ही नहीं बांग्ला संसार में सम्मानित एक प्रमुख मानवतावादी शिक्षाविद थे। प्रो. संजय जायसवाल ने अपने वक्तव्य में बताया कि 2021 का वर्ष कोलकाता में अपना दीर्घ कर्ममय जीवन बिताने वाले लोढ़ा जी का जन्मशती वर्ष है। इसबार निर्णय लिया गया है कि आगामी 26 दिसंबर को शुरू होने वाले हिंदी मेला में ‘प्रो. कल्याणमल लोढ़ा शिक्षक सम्मान’ प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय को दिया जाएगा। आप पश्चिम बंगाल में शिक्षण की गुणवत्ता में वृद्धि में निरंतर सक्रिय हैं और हिंदी के विकास और प्रसार में पूरी निष्ठा से लगी हुई हैं। सोमा बंद्योपाध्याय की कई कृतियाँ प्रकाशित हैं। पुरस्कार की निर्णायक समिति के अध्यक्ष हिंदी के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार और भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डा. शंभुनाथ थे। प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय को यह सम्मान 26 दिसंबर को शुरू हो रहे सात दिवसीय हिंदी मेला के उद्घाटन सत्र में राजा राममोहन हाल में दिया जाएगा। इस दिन लघु नाटकों का प्रदर्शन आयोजित है। गौरतलब है कि कोलकाता में हिंदी मेला विद्यार्थियों और युवाओं के बीच मातृभाषा प्रेम और साहित्य के लोकप्रियकरण के लिए पिछले 27 सालों से आयोजित हो रहा है और यह हिंदी जगत की एक प्रमुख राष्ट्रीय घटना है।

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया मिट्टी दिवस

कोलकाता :  सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में हाल ही में विश्व मिट्टी दिवस मनाया गया। हर साल 5 दिसम्बर को यह दिन मनाया जाता है और मिट्टी के संरक्षण व स्वास्थ्य के महत्व के बारे में बताया जाता है। पाँचवीं कक्षा की छात्राओं ने ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान इस दिवस का पालन किया। इस वर्ष की थीम मिट्टी के क्षय को रोककर उसकी उर्वरता बढ़ाने पर केन्द्रित थी। इसके जरिए पर्यावरण संरक्षण का सन्देश भी दिया गया। छात्राओं ने इस अवसर पर विशेष ई पोस्टर तथा पोस्टर बनाये और सॉएल हाउजी गेम भी खेला।

बंगाल की दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने दिया ‘सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा

कोलकाता : एक ओर जहां भारतीय प्रतिभाएं पूरी दुनिया में अपना परचम लहरा रही हैं, वहीं भारतीय पर्वों को भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मान्यता मिल रही है। बंगाल में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा को वैश्विक पटल पर एक नई पहचान मिली है। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र संघ की कल्चर यूनिट (यूेनेस्को) ने बुधवार को बंगाल की दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल करने की घोषणा की। यूेनेस्को ने इस बाबत ट्वीट किया है। वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रीट्वीट कर कहा कि यह हर भारतीय के लिए गर्व और खुशी की बात है। दुर्गा पूजा हमारी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विशेषताओं के सर्वोत्तम पहलुओं पर प्रकाश डालती है। और सभी को कोलकाता में दुर्गा पूजा का अनुभव होना चाहिए।

बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी रीट्वीट कर कहा कि यह बंगाल के लिए गर्व का क्षण है। दुनिया भर में हर बंगाली के लिए दुर्गा पूजा एक त्यौहार से कहीं अधिक है। यह एक भावना है जो सभी को एकजुट करती है।और अब दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में जोड़ा गया है। हम सबके लिए यह खुशी का क्षण है। बता दें कि बंगाल सरकार ने ही यूनेस्को से दुर्गा पूजा को विरासत की सूची में शामिल करने का आवेदन किया था। अब यूनेस्को ने इस आवेदन को स्वीकार कर लिया है। इससे बंगाल की दुर्गा पूजा को विश्व स्तर पर मान्यता मिल गई है।

जानकारी के मुताबिक, अंतर सरकारी समिति के 16वें सत्र में दुर्गा पूजा को यूनेस्को ने इस लिस्ट में शामिल करने की घोषणा की। बता दें कि यूनेस्को ने दुनियाभर की कुछ खास अमूर्त सांस्कृतिक विरासतों की बेहतर सुरक्षा और उनके महत्व के बारे में दुनिया को जागरुक करने के लिए 2008 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची बनाई थी। दुनिया भर से आए प्रपोजल्स को लेकर यूनेस्को की समिति उनके प्रोजेक्ट्स और प्रोग्राम्स की समीक्षा के बाद इस लिस्ट में शामिल करने पर फैसला करती है। कोलकाता की दुर्गा पूजा को इस बार भारत की ओर से इस लिस्ट के लिए नामांकित किया गया था।

यूनेस्को ने अपनी साइट पर कोलकाता की दुर्गा पूजा को लेकर लिखा, ‘दुर्गा पूजा को धर्म और कला के पब्लिक परफॉर्मेंस के सबसे अच्छे उदाहरण के साथ-साथ सहयोगी कलाकारों और डिजाइनरों के लिए एक बड़े मौके के रूप में देखा जाता है। इसके आगे यूनेस्को की ओर से लिखा गया है, ‘दुर्गा पूजा के दौरान, वर्ग, धर्म और जातीयता का विभाजन टूट जाता है।’ आपको बता दें कि इस सूची में साल 2016 में नवरोज और योग को भी शामिल किया गया था। इसके अलावा 2008 में रामलीला और 2017 में कुंभ मेले को भी इस सूची में महत्वपूर्ण जगह मिली थी।

सीआरपीएफ जवानों ने निभाया भाई का फर्ज, शहीद साथी की बहन की शादी में आए साथ

रायबरेली : यूपी के रायबरेली जिले में सीआरपीएफ के जवान एक शहीद की बहन की शादी में भाई की भूमिका नें नजर आए। दरअसल, सीआरपीएफ के शहीद जवान की बहन की शादी हो रही थी। तभी कुछ जवान मंडप में पहुंच गए और भाई का फर्ज निभाया। जवानों ने शहीद की बहन को विदा भी किया। इस दौरान वहां मौजूद हर किसी की आंखें नम हो गई। ये शादी थी शहीद कांस्टेबल शैलेंद्र प्रताप सिंह की बहन की। भाई का फर्ज निभाते सीआरपीएफ जवानों की तस्वीरें सोशल मीडिया में वायरल हो गई हैं। सीआरपीएफ ने जवानों के इस काम की तारीफ की है। सीआरपीएफ के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से शादी की तस्वीरें ट्वीट की गई हैं। ट्वीट में लिखा है कि सीआरपीएफ जवान बड़े भाई की तरह शहीद कांस्टेबल शैलेंद्र प्रताप सिंह की बहन की शादी में पहुंचे। गौरतलब है कि कांस्टेबलशैलेंद्र प्रताप सिंह जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। सीआरपीएफ जवानों पर ये हमला 5 अक्टूबर को हुआ था। कैप्टन शैलेंद्र प्रताप सिंह 110 बटालियन के जवान थे।