Sunday, July 5, 2026
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दुर्गोत्सव 2021 : नारायण मेमोरियल अस्पताल पहली बार मरीजों के लिए लाया विशेष दुर्गा पूजा मेन्यू

 थाली में होंगे स्वादिष्ट बंगाली व्यंजन 

कोलकाता  : पूरे साल में दुर्गापूजा का यह समय उत्सव की वह घड़ी है, जब बंगालियों के सबसे बड़े त्योहार में हर बंगाली समुदाय के लोग पारंपरिक बंगाली स्वादिष्ट व्यंजनों को बनाकर मां के समक्ष इसका भोग लगाते है। हालांकि, मौजूदा समय में डेंगू और अन्य बीमारियों के प्रकोप को देखते हुए हर किसी के लिए इस त्योहार को बड़े आकार में मनाना संभव नहीं हो पा रहा है। उत्सव की इस घड़ी में बेहला में स्थित नारायण मेमोरियल अस्पताल ने मरीजों और कर्मचारियों के मिजाज को उत्सव के मूड में ढालने के लिए अपने अस्पताल परिसर में स्वस्थ वातावरण के साथ उत्सव की शुरुआत की घोषणा की है। नारायण मेमोरियल अस्पताल की तरफ से इस मौके पर अस्पताल के सभी रोगियों को उनकी वर्तमान स्वास्थ्य की स्थिति के मुताबिक पहली बार पारंपरिक पूजा में बनने वाले स्वादिष्ट व्यंजन की थाली दी जायेगी। इसे अवसर पर अस्पताल में मरीजों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर पौष्टिक आहार विशेषज्ञ टीम अलग-अलग फूड चार्ट तैयार कर रही है। जिसे डॉक्टरों की सलाह लेने के बाद अस्पताल के अधिकारियों से मंजूरी दी जाएगी। इतना ही नहीं, इन दिनों में मां दुर्गा की विशेष पूजा अर्चना और आरती के बाद शांतिजल के लिए एक विशेष जगह को चुना गया है। यहां मां की आराधना के बाद पुरोहित सभी मरीजों के बेड पर जाकर उन्हें आशीर्वाद देंगे और सभी के बेहतर स्वास्थ की कामना करेंगे।इस त्योहार के सभी चार दिन आयोजित पूजा में बंगाली व्यंजनों से युक्त विस्तृत अनुकूलित भोजन शामिल होगा, जिसमें कुछ शीर्ष बंगाली चर्चित व्यंजन जैसे मूंग दाल, पटोलेर दोरमा, पनीर पसिंदा, भेटकी मछली कालिया, चिकन करी, नवरत्न कोरमा, लाबरा और फ्राई किया हुआ पापड़ और चटनी भी शामिल है। इन सभी व्यंजनों को एक शेफ की निगरानी में बनाया जायेगा। इसके बाद बनाये गये इन व्यंजन को गुणवत्ता एवं पौष्टिकता की जांच के लिए इसे आहार विशेषज्ञों और डॉक्टरों के पास ले जाया जायेगा। वहां इसकी अच्छे से जांच के बाद जिन व्यंजनों को मंजूरी मिलेगी, उन्हें ही वे प्रत्येक रोगी के पास पहुंचाया जायेगा। इस अवसर पर सुपर्णा सेनगुप्ता (सीईओ, नारायण मेमोरियल हॉस्पिटल) ने कहा, “इस कठिन समय को ध्यान में रखते हुए हमने जितना संभव हो, अपने अस्पताल में मरीजों के भोजन में लगे प्रतिबंधों में इन दिनों हल्की ढील देने का फैसला लिया है। हम त्योहार के चार दिनों के दौरान अस्पताल में अपने मरीजों के मन में बसे बंगाली व्यंजन के लजीज स्वाद एवं उनकी भूख को बढ़ाने के लिए अनुकूलित बंगाली पारंपरिक खाद्य पदार्थों की एक श्रृंखला पेश करने जा रहे हैं। हालांकि, हमेशा की तरह हमारे अस्पताल में मरीजों के स्वास्थ्य का ख्याल रखना हमारे लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। हम इसका भी पालन करेंगे। लेकिन हमने महसूस किया कि हमें रोगियों के लिए कुछ करना चाहिए ताकि वे उत्सव के इस सुहाने समय में आगे जीवन के बारे में बेहतर और अच्छा महसूस कर सकें। क्योंकि पिछले डेढ़ वर्षों से हम सभी ने काफी नुकसान और पीड़ा झेली है। उन्होंने आगे कहा, हमने पिछले साल यह फैसला किया था, लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका, क्योंकि पिछले साल की स्थिति अत्यधिक गंभीर थी। इसके कारण हम इस साल इसे लागू करना चाह रहे हैं। इस मौके पर शेफ अनिंद्य रॉय ने कहा, ‘मैं डॉक्टरों की निगरानी में रहूंगा, जो आहार विशेषज्ञों के परामर्श से मेरे साथ पौष्टिक भोजन चार्ट साझा करेंगे। आज के समय में किसी अस्पताल प्रबंधन द्वारा इस तरह के बारे में सोचना एवं इस पहल को शुरू करना काफी प्रशंसनीय प्रयास है।’ हेमंत राउत (आहार विशेषज्ञ) ने कहा, ‘ हमारे इस अस्पताल में प्रत्येक रोगी को उनकी दवाओं और बीमारी के प्रभावों पर विचार करने के बाद सही पोषण युक्त पौष्टिक भोजन उन्हें दिया जाता हैं।’

दुर्गोत्सव 2021 : आठ साल से बंद दुर्गा पूजा तीन मुस्लिम युवकों ने की फिर आरम्भ

कोलकाता : कोलकाता में आठ साल से बंद एक दुर्गापूजा को तीन मुस्लिम युवकों ने फिर से शुरू किया हैं। उनके नाम हैं मोहम्मद तौफीक, अब्दुर रहमान और मइनुल। गौरतलब है कि कोलकाता नगर निगम के 62 नंबर वार्ड के तहत अलीमुद्दीन स्ट्रीट की यह दुर्गापूजा 2013 में बंद हो गई थी। इन मुसलमान युवकों ने उसे फिर से शुरू करने का बीड़ा उठाया। पूजा के आयोजन के लिए वे चंदा नहीं संग्रह कर रहे बल्कि सारा खर्च अपनी जेब से वहन कर रहे हैं।
आचार्य जगदीश चंद्र बोस रोड के पास फुटपाथ पर इस समय पूजा पंडाल का निर्माण कार्य जोर-शोर से चल रहा है। गत मंगलवार को ही यहां खूंटी पूजा का आयोजन किया गया था। कुम्हारटोली में दुर्गा प्रतिमा तैयार हो रही है। मोहम्मद तौफीक ने कहा-‘ उत्सव का कोई रंग नहीं होता। हम सभी यहां मिलकर ईद मनाते हैं। अब उसी तरह से दुर्गापूजा भी मनाएंगे।’ उन्होंने आगे कहा-‘ पहले यहां पूजा होती थी लेकिन बाद में कुछ कारणों से बंद हो गई थी। हम इसे फिर से मिलकर शुरू कर रहे हैं। पूजा के चार दिन भोग का आयोजन किया जाएगा।’
वर्षों से बंद पड़ी इस दुर्गापूजा के फिर से शुरू होने से स्थानीय लोग खुश हैं। जयंत दे, जो पूर्व में इस दुर्गापूजा के आयोजन से जुड़े हुए थे, ने बताया-‘पहले हम कुछ लोग मिलकर पूजा करते थे। फंड की कमी व ज्यादा लोगों के पूजा से नहीं जुड़ने के कारण बाध्य होकर इसे बंद कर देना पड़ा था लेकिन अब पूजा फिर से शुरू हो रही है। यह बेहद खुशी की बात है। हम सब मिलकर फिर पहले जैसा ही आनंद करेंगे।’

काम की बात: पीएफ का पैसा निकालने का बेहद आसान तरीका

घर बैठे बैंक खाते में आ जाएगी रकम
हम जब कहीं पूरे महीने काम करते हैं, तब जाकर हमें सैलरी के रूप में पैसे मिलते हैं। हाथ में मिलने वाले पैसों से ज्यादा हमारी सैलरी होती है, लेकिन मेडिकल इंश्योरेंस, ईएसआई और पीएफ जैसी चीजों में हमारी सैलरी का कुछ हिस्सा हर महीने चला जाता है। बात अगर पीएफ की करें, तो हर महीने जमा होने वाला पैसा आपकी और आपकी कंपनी की तरफ से आपके पीएफ खाते में जमा किया जाता है और इसे आप आगे चलकर अपने बैंक खाते में ट्रांसफर करवा सकते हैं। हालांकि, कुछ समय पहले तक आपको अगर पीएफ के पैसे निकालने होते थे, तो इसके लिए आपको पीएफ ऑफिस में जाकर या अपनी कंपनी के जरिए फॉर्म को भेजना पड़ता था और तब जाकर कहीं आपके खाते में आपके पीएफ के पैसे आते थे। लेकिन अब वक्त बदल चुका है और अब आप घर बैठे ऑनलाइन माध्यम से पीएफ के लिए अप्लाई कर सकते हैं। तो चलिए जानते हैं इसकी आसान प्रक्रिया के बारे में।

ये रही प्रक्रिया :-
कदम – 1 -अगर आपका पीएफ कटता है, तो आपको सबसे पहले https:unifiedportal mem.epfindia.gov.in वेबसाइट पर जाना होगा। ये पीएफ डिपार्टमेंट की आधिकारिक वेबसाइट है। जहां आपको यूएन नंबर और पासवर्ड से लॉगिन करना है।
-अब आपको ऑनलाइन सर्विसेज में जाकर क्लेम (फॉर्म 31, 19, 10सी और 10डी) पर क्लिक करना है।
कदम – 2 -इसके बाद आपसे आपका यूएन से लिंक्ड बैंक खाता नंबर पूछा जाएगा, जिसे भरकर आपको वेरिफाई पर क्लिक करना है।

-बैंक खाता सत्यापित यानी वेरिफाई होने के बाद आपको ‘सर्टिफिकेट ऑफ अंडरटेकिंग’ को अप्रूव करने की जरूरत है और इसके बाद प्रोसीड फॉर ऑनलाइन क्लेम पर क्लिक करना है।

कदम – 3 -अब आपको पीएफ निकालने का कारण चुनना होगा और इसके बाद आपको अपना पूरा पता भरना होगा।
-फिर चेक या बैंक पासबुक की एक स्कैन कॉपी आपको यहां अपलोड भी करनी पड़ेगी।
कदम – 4 -इसके बाद आपको नियम व शर्तों वाले बॉक्स पर क्लिक करते हुए गेट आधार ओटीपी पर क्लिक करना है, जो कि आपके आधार से लिंक मोबाइल नंबर पर आएगा।
-अब ओटीपी को दर्ज करना है और फिर सब्मिट कर देना है, जिसके कुछ दिनों बाद आपके खाते में पैसा आ जाएगा।
(साभार – अमर उजाला )

लेह में फहरा 225 फीट लम्बे एवं 150 फीट चौड़े 1400 किलो वजनी तिरंगा

49 दिन में बनकर तैयार हुआ

37,500 वर्ग फीट की जगह घेरता है

गांधी जयंती के मौके पर आज लेह में दुनिया के सबसे बड़े तिरंगे का अनावरण किया गया। लेह की जंस्कार पहाड़ी पर लगाया गया यह तिरंगा खादी का है और इसे हाथ से बनाया गया है। यह 225 फीट लंबा, 150 फीट चौड़ा और 1400 किग्रा वजन का है। इसे बनाने में 49 दिन का समय लगा। यह 37,500 वर्ग फीट की जगह घेरता है। लद्दाख के लेफ्टिनेंट गवर्नर आरके माथुर ने इसका अनावरण किया। इस मौके पर सैन्य प्रमुख जनरल एमएम नरवणे भी मौजूद थे। इस तिरंगे को खादी विकास बोर्ड और मुंबई की एक प्रिंटिंग कंपनी ने मिलकर बनाया है। इसे 8 अक्टूबर को वायु सेना दिवस पर हिंडन एयरबेस ले जाया जाएगा।
इंजीनियर रेजिमेंट के 150 जवान 2000 फीट की ऊंचाई पर ले गए
इसे फहराने के लिए इंजीनियर रेजिमेंट के 150 जवान अपने कंधे पर तिरंगा उठाकर जमीन से 2000 फीट की ऊंचाई पर ले गए। जवानों को चोटी पर पहुंचने में दो घंटे लगे। इसका वीडियो सामने आया है।

के-9 -वज्र तोपों का भी हुआ परीक्षण
पहली बार लद्दाख से सटी सीमा पर भारत ने के-9 -वज्र तोपें तैनात की हैं। यह सेल्फ-प्रोपेल्ड हॉवित्जर तोप 50 किलोमीटर दूर तक लक्ष्य पर निशाना साधने में सक्षम है। चीन के साथ 1 साल से ज्यादा समय से बने गतिरोध के चलते इसे सीमा पर तैनात किया गया है।
बढ़ेगी सेना की ताकत
बॉर्डर पर के-9 वज्र को ऊंचाई वाले इलाकों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका सफल परीक्षण भी हो चुका है। इसे आर्मी की सभी रेजीमेंट में शामिल किया जाएगा, जिससे सेना की ताकत बढ़ेगी।

लाल बहादुर शास्त्री….जिनकी जरूरत हमें आज तक है

देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 2 अक्टूबर को 118वीं जयंती मनायी गयी। महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का जन्म एक ही दिन हुआ था। दोनों ने ही अपना पूरा जीवन इस देश के लिए समर्पित कर दिया। शास्त्री जी का जन्म उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में 2 अक्टूबर, 1904 को शारदा प्रसाद और रामदुलारी देवी के घर हुआ था। देश की आजादी में लाल बहादुर शास्त्री का खास योगदान है। साल 1920 में शास्त्री जी भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे और स्वाधीनता संग्राम के जिन आंदोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इनमें मुख्‍य रूप से 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च और 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उल्लेखनीय हैं। शास्त्री ने ही देश को ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था।

1. बचपन में ही पिता की मौत होने के कारण वे अपनी मां के साथ नाना के यहां मिर्जापुर चले गए। यहीं पर ही उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई। उन्होंने विषम परिस्थितियों में शिक्षा हासिल की। कहा जाता है कि वह नदी तैरकर रोज स्कूल जाया करते थे। क्योंकि उस समय बहुत कम गांवों में ही स्कूल होते थे।
2. भारत में गहरी जड़ें जमाने वाली जाति-व्यवस्था का विरोध करते हुए, 12 वर्ष की आयु में, 1917 में, उन्होंने अपना उपनाम ‘श्रीवास्तव’ छोड़ दिया। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि दी गई, जिसका अर्थ है विद्वान।

3. 15 अगस्त 1947 को वे पुलिस और परिवहन मंत्री बने। उनके कार्यकाल के दौरान पहली बार महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की गई थी। उन्होंने ही अनियंत्रित भीड़ को तितर-बितर करने के लिए लाठियों के बजाय पानी के जेट के इस्तेमाल का सुझाव दिया था।
4. आधिकारिक उपयोग के लिए उनके पास शेवरले इम्पाला कार थी। एक बार उनके बेटे ने ड्राइव के लिए कार का इस्तेमाल किया। जब शास्त्री को इसके बारे में पता चला तो उन्होंने अपने ड्राइवर से कहा कि कार का इस्तेमाल निजी इस्तेमाल के लिए कितनी दूरी पर किया गया और बाद में सरकारी खाते में पैसे जमा कर दिए गए।
5. 1952 में वे रेल मंत्री बने, लेकिन 1956 में तमिलनाडु में एक ट्रेन दुर्घटना में लगभग 150 यात्रियों की मौत के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं दूध के उत्पादन और आपूर्ति को बढ़ाने के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने श्वेत क्रांति को बढ़ावा दिया। साथ ही भारत के खाद्य उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने हरित क्रांति को बढ़ावा दिया।
6. लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बनने के बाद 1965 में भारत पाकिस्तान का युद्ध हुआ जिसमें शास्त्री जी ने विषम परिस्थितियों में देश को संभाले रखा। सेना के जवानों और किसानों महत्व बताने के लिए उन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा भी दिया।
7. आजादी के बाद वे 1951 में नई दिल्ली आ गए और केंद्रीय मंत्रिमंडल के कई विभागों का प्रभार संभाला। वह रेल मंत्री, परिवहन एवं संचार मंत्री, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री, गृह मंत्री एवं नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री भी रहे।
8. जब वे प्रधानमंत्री थे, तो उनके परिवार ने उन्हें एक कार खरीदने के लिए कहा था। उन्होंने जो फिएट कार खरीदी वह 12,000 रुपये में थी। चूंकि उनके बैंक खाते में केवल 7,000 रुपये थे, इसलिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5,000 रुपये के बैंक ऋण के लिए आवेदन किया। कार को आज नई दिल्ली के शास्त्री मेमोरियल में रखा गया है।
9. भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश में अन्न की कमी हो गई। देश भुखमरी की समस्या से गुजरने लगा था। इस संकट के समय में लाल बहादुर शास्त्री ने अपनी तनख्वाह लेनी बंद कर दी और उन्‍होंने देश के लोगों से अपील की कि वो हफ्ते में एक दिन एक वक्त व्रत रखें। उनकी अपील को अच्छी प्रतिक्रिया मिली और सोमवार शाम को भोजनालयों ने शटर बंद कर दिए और जल्द ही लोगों ने इसे ‘शास्त्री व्रत’ कहना शुरू कर दिया।
10. लाल बहादुर शास्त्री जी 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद में पाकिस्तान के साथ शांति समझौते पर करार के महज 12 घंटे बाद (11 जनवरी) को अंतिम सांस ली थी। उनकी मृत्यु को आज भी एक रहस्य माना जाता है। वह मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित होने वाले पहले व्यक्ति थे।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

राजनीति की शिक्षिका…कांक्षी सिखा रही हैं महिलाओं को राजनीति

नयी दिल्ली : ‘मेरी एक अच्छे वेतन वाली नौकरी थी। एक लेजिस्लेटिव एसिसटेंट ऐंड पॉलिटिकल स्ट्रैटजिस्ट का काम कर रही थी। 2018 में जीएसटी काउंसिल ने सेनेटरी नेपकिन पर 18% टैक्स लगा दिया। मुझे इस फैसले पर बहुत हैरानी हुई। इसकी वजह जाननी चाही तो पता चला कि जीएसटी काउंसिल में महिलाएं थी ही नहीं। पॉलिसी मेकिंग पर काम करने के दौरान देखा कि फैसले लेते समय, खासकर महिलाओं जुड़े फैसले लेने में महिलाओं की भागीदारी दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। राजनीति में महिलाएं जब होती हैं तब उन्हें महिला मुद्दे ही देखने को कहा जाता है। बेरोजगारी से लेकर और सभी मुद्दों को पुरुषों की नजर से देखा जाता है। मैंने यह भी देखा कि चुनावी कैंपेन में भी महिलाओं की गिनती कम थी। जब इस तरह से राजनीति में महिलाओं की कम हिस्सेदारी और गैर बराबरी देखी तो 2019 में ‘नेत्री फाउंडेशन’ की शुरुआत की।’ भोपाल में पली-बढ़ी 28 साल की कांक्षी अग्रवाल की ये कहानी है।  वे कहती हैं, ‘जो मेरे जैसा दिखता नहीं है, मेरे जैसे कपड़े नहीं पहनता, मेरी परेशानियों को नहीं समझता, जिसे हर महीने माहवारी नहीं होती, वो हमारे लिए पॉलिसी मेकिंग में कैसे जस्टिस कर पाएंगे। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसिस, मुंबई से अर्बन पॉलिसी ऐंड गर्वनेंस पढ़कर आई थी। मुझे लेजिस्लेटिव ऐड टू मेंबर ऑफ पार्लियमेंट ( एलएएमपी) फेलोशिप मिली, जिसकी वजह से मुझे कई एमपी और एमएल के साथ काम करने का मौका मिला। राजनीति में रहकर जब मैंने ये फर्क देखा तो इस असमानता को समानता में बदलने की कोशिश की। साथ ही मन में ये भी सवाल आ रहा था कि अगर मुझे राजनीति में एंट्री लेनी हो तो कैसे ली जाए? ये सारे सवाल और समझ ‘नेत्री’ (वुमन हू लीड) की पृष्ठभूमि बने।

‘बेटियों को नहीं दी जाती राजनीति की शिक्षा’
मेरी परवरिश भी राजनीतिक परिवार में हुई, लेकिन फिर भी वैसा समर्थन नहीं मिला जैसा मिलना चाहिए था। हमारे समाज में बेटियों को टीचर, इंजीनियर, पॉलिसी मेकर सब कुछ बनना सिखाया जाता है, राजनेता बनना नहीं। लड़कियों के लिए राजनीति ‘गंदी’ जगह मानी जाती है। बस ये सारे घटनाक्रम मेरी जिंदगी को आकार देने में भी काम आए और मैंने एक फाउंडेशन की शुरुआत की। अब मैं गर्व से कह सकती हूं कि मैं एक ऐसे फाउंडेशन की संस्थापक हूँ जो भारत का पहला ऐसा संस्थान है जो महिलाओं को राजनीति में जाने की ‘पढ़ाई’ कराता है। महिलाओं का पॉलिटिकल करिअर शेप कराता है। ये सब करना फूलों से भरा नहीं था। ‘नेत्री’ की शुरुआत से पहले खूब शोध किया और सीधे नई महिला के घर का दरवाजा खटखटाकर नहीं कहा कि ‘आओ राजनीति करें।’ इसके लिए मैंने अलग-अलग जिलों में महिलाओं के जो सेल्फ हेल्प ग्रुप चल रहे हैं उनसे संपर्क किया। उनके साथ पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया।

महिलाओं के लिए राजनीति ‘गंदी’?
जब महिलाओं को ‘नेत्री’ से जोड़ रही थी। तब सबसे बड़ी दिक्कत आई कि ‘राजनीति’ शब्द ही लोगों को पसंद नहीं, क्योंकि ये ‘गंदा’ शब्द माना है। इससे बड़ी परेशानी ये थी कि पंचायती राज के इर्द-गिर्द महिलाओं को राजनीति की जो समझ होनी चाहिए, वो नहीं है। कई महिलाओं को लगता है कि वे रिजर्व सीट पर ही लड़ सकती हैं, जबकि ऐसा नहीं है। उनमें राजनीति को लेकर कई तरह के मिथ हैं। पुरुषों के लिए सीटें रिजर्व होती हैं, ऐसा महिलाओं को लगता है। दूसरी समस्या, महिलाओं को लगता है कि घर और राजनीति दोनों संभाल नहीं सकते। राजनीति कोई अच्छा करिअर नहीं है। राजनीति फुल टाइम करिअर केवल पुरुषों के लिए समझा जाता है। तीसरी समस्या, जो महिलाओं ने सामने रखी, वो संसधानों की थी। महिलाओं के पास पैसे नहीं हैं। चौथी समस्या है कि उन्हें परिवार की तरफ से मोटिवेशन नहीं मिलता कि वे राजनीति में आएं… इस तरह की सच्चाइयां हमारे सामने आईं। इन सभी परेशानियों और मिथ्याओं को तोड़ते हुए हम महिलाओं को राजनीति में भुनाने की कोशिश करते हैं। अब मेरी लड़ाई सत्ता के डिसेंट्रिलाइजेशन की लड़ाई बन गई।

‘राजनीति का ककहरा सिखाती हैं’
मेरा काम गांव स्तर पर ज्यादा रहा। मैंने नेत्री की शुरुआत भोपाल से की। आज हम बरेली, राय बरेली, अमेठी और हारूदा जैसे जिलों में भी काम कर रहे हैं। अपनी संस्था के जरिए मैं इलेक्टोरल पॉलिटिक्स के अलावा ग्राम पंचायत तक की राजनीति बताती हूं। मैं उन्हें सिखाती हूं कि राजनीति में घुसते कैसे हैं? नेत्री के जरिए हम कई ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाते हैं। जिसमें पॉलिटिकल क्वीन बनने से लेकर पॉलिटिकल क्वीन बनाने तक का सफर तय कराते हैं। इन प्रोग्राम्स में बूथ मैनेजमेंट, कांस्टीट्यूएंसी मैनेजमेंट, ऑर्गनाइजिंग स्किल्स, कैपेसिटी बिल्डिंग, सोशल मीडिया हैंडलिंग, कम्युनिटी बिल्डिंग सब कराते हैं। राजनीति बहुत ही अकेलेपन का सफर है, इसलिए यहां कम्युनिटी बिल्डिंग होना भी बहुत जरूरी है।

‘महिलाओं की राजनीतिक समझ मजबूत करना जरूरी’
मेरे पास आज भी कई ‘भले मानुष’ आते हैं और कहते हैं कि कांक्षी आपको महिलाओं की आजीविका पर काम करना चाहिए, लेकिन मुझे लगता है बिना पॉलिटिकल एजंसी के इकनॉमिक इंपावरमेंट एक झूठ है। इसलिए महिलाओं का राजनीति में आना जरूरी है। मैंने देखा है कि महिलाएं जब सत्ता में आती हैं, वे अपने नागरिकों के प्रति ज्यादा जिम्मेदार होती हैं। घोषणापत्र के ज्यादा वादे पूरे करती हैं। महिलाएं शांति बनाए रखने में ज्यादा विश्वास रखती हैं। आर्थिक और सामाजिक नीतियों पर विशेष नजर रखती हैं। महिलाएं राजनीति में होती हैं तो अलग तरह से पॉलिसी मेकिंग करती हैं। इस वजह से पॉलिसी मेकिंग सबके हित की बात कर पाती है।
‘कानूनी समझ होना जरूरी’
महिलाओं की राजनीतिक समझ बेहतर होने से पहले कानूनी समझ होना जरूरी है। उसके लिए भी मैंने एक पिटीशन डाली है। हमें महिलाओं को ये समझाना जरूरी है कि न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका का स्ट्रक्चर क्या है? ये काम कैसे करते हैं? जब आपको किसी की जरूरत पड़े तो आप किसके पास मदद लेने जाएं? महिलाएं जब नोमिनेशन फाइल करने जाएं तो उसकी पूरी कानूनी समझ हो ताकि उनका नॉमिनेशन कोई कैंसिल न करवा दे। ‘माय कानून सखी’ पिटीशन शुरू की जिसमें हम राष्ट्रीय महिला आयोग से निवेदन कर रहे हैं कि वे देश में “कानून सखी” हॉटलाइन नंबर शुरू करें, जहां से महिलाएं अपने कानूनी और संवैधानिक अधिकारों के बारे में जानकारी इकट्ठा कर पाएं।
आज ‘नेत्री’ में महिलाओं की संख्या अच्छी खासी है। पिछले एक साल में हमने 400 महिलाओं को तैयार किया है। मैं बस यही कहना चाहती हूं कि राजनीति कोई रॉकेट साइंस नहीं है। ये एक लंबा और मुश्किल सफर है। राजनीति महिलाओं की स्थिति बदलने का सबसे आसान रास्ता है इसलिए इसके बारे में पढ़ना और कानूनी समझ बनाना जरूरी है
(साभार – दैनिक भास्कर)

पीएम पोषण योजना बना मिड डे मील

नयी दिल्ली : देश भर के सरकारी और प्राथमिक विद्यालयों में बांटा जाने वाला राष्ट्रीय मध्याह्न भोजन योजना अर्थात मिड डे मील का नाम भारत सरकार ने बदल कर पोषण योजना रख दिया है। सालों पुरानी इस योजना से देश भर के कई विद्यार्थी लाभान्वित हुए हैं। सरकारी स्कूलों में मिलना वाला मिड डे मील भोजन अब देश भर में पीएम पोषण योजना के तहत जाना जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हुई आर्थिक मंत्रिमंडलीय समिति की एक बैठक में इस प्रस्ताव को पारित कर दिया गया है। गौरतलब बात है कि भारत सरकार ने इस योजना में कई बदलावों को भी मंजूरी दी है, जो आने वाले समय में हमें इस योजना के भीतर देखने को मिलेंगे। इन बदलावों का सीधा फायदा भारत के कई गरीब छात्रों को मिलेगा। इसी कड़ी में आइए जानते हैं कि भारत सरकार ने पोषण योजना के भीतर क्या बड़े बदलाव किए हैं।
आपको बता दें कि मध्याह्न योजना की शुरुआत साल 1995 में की गई थी। इसका उद्देश्य देश भर में प्राथमिक स्कूलों के छात्रों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना था। इस योजना के कई सकारात्मक बदलाव देशभर के स्कूलों में देखने को मिले हैं। कहा जा रहा है कि इससे देश भर के 11.20 लाख स्कूलों के 11.80 करोड़ बच्चे लाभान्वित होंगे। इस योजना में हुए बदलावों के तहत तिथि भोजन की अवधारणा को भी शामिल किया गया है। इसमें त्योहारों या खास अवसरों पर बच्चों को विशेष प्रकार का भोजन दिया जाएगा। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के अनुसार पीएम पोषण योजना के क्षेत्र में वाटिका (प्री स्कूल) के भी बच्चे आएंगे। इसके अलावा सरकारी, सरकारी सहायता-प्राप्त स्कूलों में पहली कक्षा से आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों को भी पोषण योजना के तहत खाना मिलेगा। इसके अलावा पोषण योजना में किसान उत्पादक संगठनों और महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी को भी बढ़ावा दिया जाएगा। आपको बता दें कि इस योजना में सोशल ऑडिट को अनिवार्य कर दिया गया है। वहीं महत्वपूर्ण जिलों में बच्चों को पोषण उपलब्ध कराने के लिए भी कई विशेष प्रावधान किए गए हैं।

ट्रांसजेंडरों को कोलकाता पुलिस की भर्ती परीक्षा में बैठने की अनुमति दें : कलकत्ता हाईकोर्ट

राज्य सरकार को दिया निर्देश

कोलकाता : कलकत्ता हाई कोर्ट ने एक ट्रांसजेंडर आवेदक को राहत देते हुए राज्य सरकार को ट्रांसजेंडरों को कोलकाता पुलिस भर्ती परीक्षा में बैठने की अनुमति देने का निर्देश दिया। हाई कोर्ट ने गत दिनों एक ट्रांसजेंडर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त निर्देश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया था कि वर्ष 2021 के लिए कोलकाता पुलिस में सब-इंस्पेक्टर और सार्जेंट के पद पर भर्ती के लिए एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति को आवेदन करने की अनुमति देने के लिए आनलाइन एप्लिकेशन फार्म में आवश्यक ट्रांसजेंडर कालम नहीं दिया गया।
न्यायमूर्ति अरिंदम मुखर्जी ने अपने आदेश में इस मामले में राज्य सरकार से जवाब मांगा था। कोर्ट को बताया गया कि राज्य सरकार ने 14 सितंबर को कोलकाता पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर भर्ती के लिए ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति देने का फैसला किया था।
राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता की ओर से उपयुक्त हस्तक्षेप के साथ पश्चिम बंगाल सरकार ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति को सब-इंस्पेक्टर/लेडी सब-इंस्पेक्टर (अनआर्म्ड ब्रांच) के पद पर भर्ती के लिए परीक्षा में बैठने की अनुमति देने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार द्वारा 14 सितंबर, 2021 को लिए गए निर्णय को विधिवत रूप से राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता को सूचित किया गया।
इसके अलावा कोर्ट ने 14 सितंबर को बंगाल सरकार के अतिरिक्त सचिव द्वारा हस्ताक्षरित इस तरह के एक फैसले की एक प्रति और राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता को संचार को रिकार्ड में लिया। राज्य सरकार द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई की सराहना करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता की ओर से हस्तक्षेप और राज्य द्वारा मामले में लिए गए त्वरित निर्णय की सराहना की जाती है। तदनुसार, याचिका का निपटारा यह देखते हुए किया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए मुख्य मुद्दे का विधिवत समाधान किया गया।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की यदि कोई व्यक्तिगत शिकायत कोई हो, तो उम्र में छूट की अनुमति देने के लिए याचिकाकर्ता को एक ट्रांसजेंडर के रूप में आवेदन करने की अनुमति देने के लिए और अन्य मुद्दों को याचिकाकर्ता द्वारा संबंधित प्राधिकारी को उचित प्रतिनिधित्व दर्ज करके प्रसारित किया जा सकता है।

 

ऐ सखी सुन 50वाँ अंक : रत्नकुँवरि कहै राम रँगीलो, रूप गुनन आगारो रे

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों साहित्य- सृजन के क्षेत्र में आज असंख्य स्त्रियाँ सक्रिय हैं लेकिन एक जमाना वह भी था जब अक्षर ज्ञान तक स्त्रियों के लिए वर्जित था, लिखना तो दूर की बात है। हालांकि राजकुल की स्त्रियों की नियति इस मायने में थोड़ी सी ही सही अलग जरूर हुआ करती थी। राजकुल की लड़कियों को पढ़ने- लिखने के अवसर आसानी से मुहैया हो जाते थे और उनमें से कुछ प्रतिभावान लड़कियाँ, स्त्रियाँ पोथी पढ़ते हुए ग्रंथ लिखने के रास्ते पर भी अनायास ही चल पड़ती थीं। राजस्थान की बहुत सी स्त्रियों ने साहित्य- सृजन कर तत्कालीन समाज और साहित्य को अपने रचनात्मक अवदान से समृद्ध किया है। राजस्थान राजघराने की ऐसी कुछ स्त्रियों की साहित्य साधना से मैं आपको परिचित करवा चुकी हूं। आज आपका परिचय मध्यकालीन कवयित्री रत्नकुँवरि बाई से करवाऊंगी जो रत्नकुँवरि भटियानी के नाम से भी जानी जाती हैं। 

रत्नकुँवरि बाई जोधपुर के महाराजा मानसिंह की महारानी प्रतापकुँवरि बाई के भाई ठाकुर लक्ष्मण सिंह जखाणा की सुपुत्री थीं। कहा जाता है कि जब इनकी उम्र सिर्फ पाँच वर्ष की थी तभी इनका ब्याह महाराजा तख्तसिंह के पुत्र प्रतापसिंह के साथ हो गया था जो बाद में ईडर (शेखावत)  के महाराजा बने। विवाह के समय प्रतापसिंह की उम्र नौ वर्ष थी। “स्त्री कवि कौमुदी” के रचनाकार श्री ज्योति प्रसाद “निर्मल” के अनुसार रत्नकुँवरि का विवाह पंद्रह वर्ष की उम्र में हुआ था और यह विवाह उनकी फूफी प्रतापकुँवरि ने करवाया था। प्रतापकुँवरि जो स्वयं एक ऊंचे दर्जे की राम भक्त  कवयित्री थीं, की संगति में रत्नकुँवरि का मन भी भक्ति में रम गया और उन्होंने राम की भक्ति में विभोर होकर भक्तिकाव्य की रचना की। सियावर राम के चरणों में स्वयं को न्योछावर करती हुई वह लिखती हैं –

“सियावर तेरी सूरत पै हूँ वारी रे।

सीस- मुकुट की लटक मनोहर मंजु लगत है प्यारी रे।।

या छवि निरखन को मो नैना जोवत बाट तिहारी रे।

रत्नकुँवरि कहे मो ढिंग आके झलक दिखा धनुधारी रे।।”

राम की भक्ति में आपाद मस्तक डूबी कवयित्री अपनी मनस्थिति का वर्णन इस प्रकार करती हैं –

“मेरा मन मोह्यो रंगीले राम।

उनकी छवि निरखत ही मेरो बिसर गयो सब काम।

आठों पहर ह्रदय बीच मेरो आन कियो निज धाम।।

रत्नकुँवरि कहै वाकै पल पल ध्यान धरूँ नित सा।।”

ध्यान देने की बात यह है कि धनुर्धारी और मर्यादापुरुषोत्तम राम को कवयित्री अपने इस पद में “रंगीले राम” कहकर संबोधित करती हैं। ऐसा लगता है मानो भक्तिभाव ही मुख्य है और उसके वेगमय प्रवाह में राम और कृष्ण की छवियाँ आपस में घुलमिलकर एक हो गई हैं। तभी तो राम भी कृष्ण की भांति रंगीले नजर आते हैं और उनके प्रति अपने ह्रदय का प्रेम उड़ेलती हुई, अपनी विरह व्यथा को चित्रित करती हुई मिलन की आकांक्षा को कवयित्री इस प्रकार स्वर देती हैं –

“रघुवर म्हांरा रे म्हांकू दरस दिखाजारे|

तो देखन की चाह बनी है, टुक इक झलक दिखा जा रे|

लाग रही तेरी केते दिन की, मीठे बैन सुना जा रे|

रतनकुँवरि तो सों यह विनती, एक बेर ढिग आ जा रे||

भक्तिकाव्य में भक्त द्वारा भगवान के रूप वर्णन की परंपरा देखने में आती है। कवयित्री रत्नकुँवरि भी इसका अपवाद नहीं हैं। अपने आराध्य देव राम के प्रेम में मगन होकर, उनके प्यारे, मनभावन रूप का वर्णन वह बेहद सरसता के साथ करती हैं-

“रघुवर प्यारो रे।

दसरथराज-दुलारो रे।

सीस मुकुट पर छत्र विराजत, कानन कुंडल वारो रे।

बाँकी अदा दिखाय रसीली, मोह लियो मन म्हाँरो रे।।

रत्नकुँवरि कहै राम रँगीलो, रूप गुनन आगारो रे।।

सहज, सरल ब्रजभाषा में रचित ये पद अत्यंत सरस और ह्दयग्राही हैं। जनमानस के बीच इनकी रचनाओं की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी इनके पद और भजन हरजस रात्रि जागरण पर गाए जाते हैं। इन्होंने राजस्थानी भाषा में भी पदों की रचना की है। भाषा भले ही अलग है लेकिन भाव वही हैं। यहाँ भी राम को प्रियतम के रूप में याद किया गया है और स्वयं को उनके चरणों में वारती हुई कवयित्री उनसे कृपा की आकांक्षा व्यक्त करती हैं। उदाहरण देखिए-

“थारी छूँ जी म्हाँरा प्यारा राम, कीजो म्हाँसू दिलदाड़ी बात।

मिल बिछुड़ण नहिं कीजै साँवरा, राखो जी चरणारी साथ।।

ध्यान धरूँ हरदय बिच तुमको, याद करूँ दिन रात।

रत्नकुँवरि पर महर करो अब, निज कर पकरो हाथ।।”

रत्नकुँवरि बाई के किसी संग्रह के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है। विभिन्न पुस्तकों में संकलित उनके पद अवश्य मिलते हैं जो पाठकों को अपनी सरसता से सहज ही प्रभावित कर लेते हैं। भक्त कवयित्री की विरह व्यथा और व्याकुलता में बंधनों में जकड़ी मध्युगीन स्त्री की पीड़ा को सहजता से अनुभूत किया जा सकता है जो मुक्ति के लिए अपने आराध्य से विनती करती दिखाई देती है।   

 

संघर्षशीलों का सम्बल बनें, तभी देवी की आराधना सफल होगी।

देवी पक्ष का आगमन हो रहा है और मातृ शक्ति की आराधना के लिए हम सब तैयार हैं। देखा जाये तो उत्सव का यह वातावरण बहुत प्रिय लगता है। स्त्री की शक्ति का अनुभव होता है, गर्व होता है मगर यथार्थ से टकराव होता है…बस मन सोच में पड़ जाता है। आखिर किस दृष्टि को सच माना जाये? देखा जाये तो स्त्री आगे तो बढ़ी ही है..हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रही है मगर उसके संघर्ष भी उतने ही बढ़े हैं। स्त्री की उपलब्धियों को स्वीकारना, उसे सम्मान देना तो समाज सीख ही नहीं पा रहा है। पुरुषों की छोड़िए, आज ही नहीं, बल्कि हमेशा से स्त्रियाँ ही स्त्रियों की राह में पत्थर डालती आ रही हैं। पितृसत्ता पहनावा नहीं है, एक भयानक विचार है..जो वैचारिक स्तर पर बहुत खतरनाक है और आज इसका कुप्रभाव हमें आस – पास दिखाई भी पड़ रहा है। तन स्वतन्त्र होवे स्वतन्त्रता की तड़प का होना जरूरी है, आज पितृसत्ता को पोषण देने वाली स्त्रियों के कारण संघर्षशील सबल स्त्री की लड़ाई कहीं अधिक कठिन हो गयी है। स्त्री को ईर्ष्या, द्वेष से भरी अनचाही प्रतियोगिता के बीच अनायास खड़ा कर दिया गया है। उसकी आधी शक्ति तो इन प्रतियोगिताओं से जूझने में समाप्त हो रही है। कल्पना कीजिए कि ऐसी प्रतियोगिता अगर सृष्टि बनाने वालों के बीच होती तो सृष्टि की क्या स्थिति होगी। एक सामन्जस्य , तारतम्य और एकता होना बहुत जरूरी है स्त्री सशक्तीकरण के लिए…पीछे मुड़कर अपनी पूर्वजाओं से सीखने की जरूरत है। अपने क्षुद्र स्वार्थ से आगे बढ़कर संघर्षशील स्त्रियों का सम्बल बनें, तभी देवी की आराधना सफल होगी।

शुभजिता के स्तम्भ ऐ सखी सुन अपने 50 अंक पूरे कर चुका है। स्तम्भ लेखिका प्रो. गीता दूबे का आभार और आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन।