Monday, July 6, 2026
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वाणी प्रवाह 2022 – सिद्धि जैन

सिद्धि जैन महादेवी बिड़ला शिशु विहार में कक्षा 8 की छात्रा हैं। यह कविता स्वरचित कविता है।

 

विश्व हिंदी दिवस एवं हिंदी विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस पर वेब संगोष्ठी

कोलकाता। विश्व हिंदी दिवस एवं हिंदी विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस के अवसर पर एक वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस मौके पर कोरोना प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय परिसर में माननीय कुलपति प्रो. दामोदर मिश्र ने झंडोत्तोलन किया। स्वागत गीत अनुवाद विभाग की छात्रा सीमा प्रजापति ने प्रस्तुत किया। प्रथम सत्र में वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिंदी में हिंदी विषय पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ शंभुनाथ ने कहा कि हिंदी वह भाषा है जिसने अपनी महान परंपराओं से संबंध बनाए रखा है। साथ ही हिंदी ने धार्मिक और सामाजिक संकीर्णताओं से संघर्ष किया और खुद को बनाए रखा।
आज हिंदी को विविध कलाओं और कौशलों से जोड़ते हुए एक उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। विशिष्ट अतिथि डॉ शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि हिंदी पूरे देश को जोड़ने वाली भाषा है। प्रथम सत्र का विषय प्रवर्तन करते हुए कुलसचिव डॉ सुकीर्ति घोषाल ने कहा कि हिंदी दुनिया की चौथी सबसे बड़ी भाषा है। हिंदी का वैश्विक परिप्रेक्ष्य काफी व्यापक है।अध्यक्षता करते हुए हिंदी विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो.दामोदर मिश्र ने हिंदी के समावेशी रूप की चर्चा करते हुए भारतीय भाषाओं के साथ उसके महत्वपूर्ण संबंधों की चर्चा की। उन्होंने हिंदी के विकास में बंगाल की भूमिका को भी रेखांकित किया।उन्होंने अनुवाद के जरिए भारतीय भाषाओं के जातीय स्वरूप को एक दूसरे से संबद्ध माना। उन्होंने सभी वक्ताओं के विचारों की सराहना करते हुए कहा कि हमें मिलजुलकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद का विरोध करना चाहिए। दूसरे सत्र में शिक्षा के माध्यम-भाषा का प्रश्न और हिंदी विषय पर विषय प्रवर्तन करते हुए कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ सत्या उपाध्याय ने त्रिभाषा सूत्र के साथ नई शिक्षा नीति में भाषा की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। मुख्य अतिथि वक्ता प्रो. अमरनाथ शर्मा ने अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से हिंदी एवं भारतीय भाषाओं पर संकट गहराता जा रहा है। मातृभाषा के साथ अंग्रेजी को बनाए रखना एक बड़ी साजिश है।हमें सजग होकर अपनी भाषा को बचाने की जरूरत है। विशिष्ट वक्ता डॉ प्रमोद कुमार प्रसाद ने कहा कि हिंदी का व्यापक प्रयोग होने से तथा अनुवाद कार्य को प्रोत्साहन देने से हम अपनी भाषाओं के बीच बेहतर संबंध स्थापित कर सकते हैं।
कार्यक्रम को सफल बनाने में हिंदी विश्वविद्यालय के द्वय समन्वयक प्रतीक सिंह एवं मंटू दास का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ जे.के.भारती एवं डॉ अंजू सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ बिजेंद्र कुमार एवं डॉ श्रीनिवास सिंह यादव ने दिया।इस अवसर पर भारी संख्या में शिक्षक ,विद्यार्थी एवं साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

विश्व हिंदी दिवस पर काव्यपाठ का आयोजन

कोलकाता । विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा काव्यपाठ का आयोजन किया गया। मिशन के अध्यक्ष डॉ शम्भुनाथ ने कहा कि हिंदी की समृद्ध परंपरा का संबंध सृजन और चेतना से जुड़ा है। कविताएं मनुष्यता की आख्यान हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भाषाविद अवधेश प्रसाद सिंह ने कहा कि नौजवानों की पीढ़ी में कविता का संस्कार देखकर अच्छा लग रहा है। कवियों को कविता के लिए भाषा का ज्ञान होना जरूरी है। सह्दयता के साथ शिल्प की समझ हमें काव्यात्मक रूप से समृद्ध करती है। इस अवसर पर राजेश मिश्र,सुरेश शॉ, जितेश चौबे, सपना कुमारी, राधा ठाकुर, निशा राजभर, स्वरागिनी अग्रहरि, प्रीति साव, कोमल साव, निखिता पाण्डेय, अभिषेक पाण्डेय, राजेश सिंह, सूर्यदेव रॉय, रेशमी सेन शर्मा, विशाल कु. साव, पंकज सिंह, इंद्रेश कुमार, आकाश गुप्ता, प्रकाश त्रिपाठी ने अपनी कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम का सफल संचालन रूपेश कु. यादव ने तथा धन्यवाद ज्ञापन देते हुए संरक्षक रामनिवास द्विवेदी ने कहा कि नई पीढ़ी रचनात्मक संभावनाओं से भरी है।इस अवसर पर डॉ शुभ्रा उपाध्याय, डॉ रेणु गुप्ता, मृत्युंजय, मंजु श्रीवास्तव, प्रतीक सिंह सहित सैकड़ों साहित्य एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संयोजन मधु सिंह एवं राहुल गौड़ ने किया।

अर्चना संस्था के रचनाकारों ने किया नये वर्ष का स्वागत

कोलकाता । अर्चना संस्था की ओर से रचनाकारों ने नए वर्ष का स्वागत किया और कोरोना जैसी भयंकर बिमारी से छुटकारा करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की। गोष्ठी में सभी ने अपनी रचनात्मक ऊर्जा से भरी रचनाएंँ सुनाई । वरिष्ठ कवयित्री विद्या भंडारी के संचालन में दो घंटे तक ऑनलाइन पर हुई गोष्ठी का आरंभ इंदु चांडक के नव वर्ष गीत से हुआ – मंगलमय हो जिसका हर पल/वर्ष की शुरुआत सुखद हो। उसके पश्चात संगीता चौधरी -सर्दी की धूप गर्म दुशालों सी लगती है।,कोरोना पूर्ण विश्व से,छाया हर वृक्ष को। देबी चितलांगिया – मूक बधिर प्राण, लौटा लाते हैं, एक कविता :एक गान, मृदुला कोठारी – हे पृथ्वी किस शक्ति पर इतनी प्रबल होकर रहती हो खड़ी चिर युवा चिर सुंदरी, दूसरा गीत राजस्थानी तावड़ो चोखो लागे रे, इंदू चांडक – हाइकु- वाद विवाद /असफल संवाद/ युद्ध का नाद, हठ सतत/मन भेद प्रदत्त/महाभारत, भिक्षा का अन्न/ कर लूँगा ग्रहण/ना करूँ रण, भारती मेहता (अहमदाबाद) – पुरूष कप,प्लेट नारी/कप जहाँ- तहाँ टँगने के लिये /सुविधाजनक/प्लेट अपने निश्चित घेरे में फैली/गर्म को शीतल कर देने वाली !,वरिष्ठ कवयित्री प्रसन्न चोपड़ा ने विद्या भंडारी के लिए दो कविताएँ समर्पित की – मुझे नाज तुम पर है साथी प्रणय प्रीत के गीत हूं गाती,मैं मुस्कान अनूठी हूं जो तेरे होठों पर आती, सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गई धीरे-धीरे धूप भी हटती गई,छा हर वृक्ष की मिलती रही,आपदाएं स्वयं ही हटती गई। विद्या भंडारी – बाहर प्रदर्शन भीतर सुषुप्ति क्यों ।, यदि मैं होती खजूर का वृक्ष , रहती खङी तनी हुई/ किन्तु मैं हूँ कोमल – कोमलान्गिनी, झुकती चली गयी।/छोटा सा हमारा संसार विविधता का है सार/शुभकामनायें अपार। /लेखन में हो विस्तार। सुशीला चनानी – दोहे ,क्षणिका ,कविता/मन में दृढ संकल्प हो,सफल। ओर सब काज/प्रेम पर दो क्षणिका/ प्रेम करना है तो कर!/पहले गणित की किताब / संदूकची में धर!/ प्रेम के पहले पन्ने पर/मत नाच/आगे तो बांच!/घड़ी तो बेचते हो /समय बेच सकते हो क्या, एन एम भंडारी – जिन्दगी/देखना चाहता हूॅ/करीब से/पढना चाहता हूॅ/बारीकी से/मगर मेरी पकङ से /बाहर है/उसकी उङान।,शब्द। / बह्म है/परिचायक है/ ज्ञान का/ उद्बोध है/मानसिक चेतना का । हिम्मत चोरड़़िया – सासू से बोली बहुरानी- सरसी छंद आधारित जोगीरा सारा रा रा रा रा/सच्चा साथी तू ही तेरा- सरसी छंद आधारित गीत, दोहा-रंग बिखेरे नित नये, खोले अभिनव द्वार।/ प्यारी मेरी अर्चना, गूँज उठे संसार।, शशि कंकानी – आओ करें चिंतन मनन मंथन/खुशी बाँटे सभी में/ना दुःखी हो किसी का मन, और राजस्थानी रचना आ पत्ते री नहीं पते री बात है/कदे तक रह्यो कोई रो साथ है। वसुंधरा मिश्र – दिन में भी ख्वाब/जब भी बंद करती हूँ/आँखों को/ख्वाब चोरी हो जाते हैं/खुली आँखें सपने देख नहीं पातीं और हर पल नई सुबह /हर क्षण है परिवर्तित/हर पल बीत रहा है /जीवन तो चलने का नाम आदि रचनाएँ सुनाई। बने चंद मालू ने व्यंग्य रचनाएँ कुम्हार ने माटी के लौंदे से /चिलम बनाई/ बनाते बनाते मष्तिष्क में /एक चिनगारी उभर आई,/उसकी मति बदल गई,/और सुराही बनाने की मन में /आगई।, जो आदमी अपने को /सर्व विजयी महान मान बैठा था /कहता था मरने तक की फ़ुरसत / नहीं,/वह आज मरने के डर से/फ़ुरसत में बैठा है। सुनाई। श्रोताओं में मीना दूगड़, समृद्धि, गुलाब बैद, उषा श्राफ आदि सदस्याएँ उपस्थित रहीं । अंत में, धन्यवाद दिया इंदु चांडक ने।

कवि कल्प द्वारा नववर्ष पर काव्यांजलि

कोलकाता। नए वर्ष के शुभ अवसर पर कोलकाता की प्रतिष्ठित संस्था ‘बंगीय हिन्दी परिषद’ के तत्वावधान में गत 9 जनवरी को गूगल मीट के माध्यम से डॉ. गिरिधर राय की अध्यक्षता में कवि-कल्प की गोष्ठी का सफल आयोजन किया गया, जिसमें नवोदित एवं वरिष्ठ कवियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कार्यक्रम का आरंभ परिषद के मंत्री और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.राजेन्द्र नाथ त्रिपाठी के स्वागत वक्तव्य से हुआ। गोष्ठी की शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई, जिसे रामाकांत सिन्हा ने प्रस्तुत किया। वरिष्ठ एवं नवांगतुक कवियों ने मिलकर काव्य गोष्ठी को सफल बनाया और नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ-साथ कोरोना के वर्तमान परिदृश्य को अपनी रचनाओं के ज़रिए मुखरित किया।

गोष्ठी में सम्मिलित कविगण डॉ. राजेन्द्र नाथ त्रिपाठी, मनोज मिश्रा, धर्मनाथ दुबे, कृष्ण कुमार दूबे, स्वागता बसु, मौसमी प्रसाद, शीला संचेती. रामाकांत सिन्हा, रंजीत कुमार संकल्प, निखिता पाण्डेय, अंजू छारिया, हिमाद्रि मिश्रा, सुदामी यादव, गजेंद्र नाहटा, मनोरमा झा तथा सुषमा राय पटेल ने अपनी कविताओं से गोष्ठी को समृद्ध किया। सागर चौधरी की पटल पर प्रेषित कविता ने भी वाहवाही बटोरी। अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. गिरिधर राय ने नव वर्ष की शुभकामनाएं देते हुए रचनाकारों की प्रस्तुति की समीक्षा की तथा कविता को समाज का आईना बतलाते हुए रचनाकारों को लिखने के लिए प्रेरित किए। साथ-साथ उन्होंने गुरु गोविंद सिंह जयंती पर अपनी एक ओजपूर्ण कविता द्वारा उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए । श्रोतागण के रूप में पुष्पा मिश्रा, भानु प्रताप पाण्डेय, सुदेशना चक्रवर्ती, ज़ोया अहमद और नेहा आदि जुड़े थे। परिषद की संयुक्त मंत्री सुषमा राय पटेल द्वार संचालन किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन परिषद की उप साहित्य मंत्री निखिता पाण्डेय ने किया।

एसेंसिव एडुकेयर लिमिटेड का लिस्टिंग समारोह संपन्न

कोलकाता । कौशल विकास और व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली और अखिल भारतीय उपस्थिति वाली कोलकाता आधारित कंपनी एसेंसिव एडुकेयर लिमिटेड ने 30 दिसंबर 2021 को आईपीओ जारी किया था। कंपनी ने 2.26 करोड़ की पूंजी जुटाने के लिए प्रति शेयर 26/- रुपये के प्रीमियम पर प्रत्येक 10 रुपये के 868000 इक्विटी शेयरों की पेशकश की थी। आईपीओ 2.5 गुना तक ओवरसब्सक्राइब हुआ था। कंपनी बीएसई एसएमई स्टार्टअप प्लेटफॉर्म पर सूचीबद्ध हो चुकी है। लिस्टिंग समारोह के अवसर पर कन्फेडरेशन ऑफ वेस्ट बंगाल ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील पोद्दार मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। समारोह में  संजीव जायसवाल, प्रबंधक – बीएसई क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता,  अभिषेक विजय कुमार शर्मा, निदेशक – जीवाईआर कैपिटल एडवाइजर्स, अमित कुमार बनर्जी: एसोसिएट वीपी और हेड – कोलकाता ऑपरेशन, लिंक इनटाइम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड। गणमान्य व्यक्तियों में सिमल सोरेन, उपाध्यक्ष, पश्चिम बंगाल आदिवासी विकास सहकारी निगम और तन्मय भट्टाचार्य, प्रसिद्ध पत्रकार और ट्रस्टी, आईएमएपी व अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
कौशल विकास उद्योग में एक जाना-माना नाम एसेंसिव एडुकेयर लिमिटेड ने वर्ष 2012 में पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक छोटे से शहर चंदननगर से अपनी यात्रा शुरू की थी। कुछ ही समय में एसेंसिव एडुकेयर ने शानदार प्रदर्शन के साथ 10 साल पूरे कर लिए हैं। एसेंसिव, जिसका अर्थ है “उठने की ओर बढ़ना।” इस 10 वर्षों के भीतर कंपनियों के एक समूह में विकसित हो गया है। कंपनी के संस्थापक अभिजीत चटर्जी ने सभी निवेशकों, अपनी टीम और अपने परिवार को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलित कर हुई और कंपनी की एमडी श्रीमती सायनी चटर्जी के धन्यवाद ज्ञापन के साथ समाप्त हुई।

सावित्री गर्ल्स कॉलेज में मानसिक स्वास्थ्य पर वेबिनार

कोलकाता । सावित्री गर्ल्स कॉलेज में हाल ही में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता लाने के उद्देश्य से एक वेबिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का यू ट्यूब लिंक नीचे दिया जा रहा है। यह आयोजन विद्यार्थी सप्ताह के तहत किया गया था। आप वक्ताओं को सुन सकते हैं –

 

 

गीता दी बताएंगी

संवाद हमारे समय की जरूरत है..कई बार हम उलझन में रहते हैं, दोराहे पर रहते हैं और हमारी समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए, तब कोई आकर हमें राह दिखा जाता है तो मुश्किल और जिन्दगी, दोनों आसान हो जाती हैं। अगर आप भी कुछ पूछना चाहते हैं तो हमें नीचे कमेन्ट्स बॉक्स में, फेस बुक पेज पर या ई मेल के माध्यम से पूछ सकते हैं। यह पहल विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं को ध्यान में रखकर आरम्भ की गयी है। तो आपकी उलझन और परेशानियों का हल गीता दी बताएंगी भी किसी उलझन में हैं तो अपने सवाल हमें लिख भेजें।

आज का सवाल 

प्र.  बी.एड के बाद एम. एड. करना सही रहता है या पी.एच.डी? – रेशमी सेन शर्मा

उ. बी एड के बाद एम एड करना सही रहेगा। आप जिस दिशा में चलना प्रारंभ करते हैं, उसी दिशा में आगे बढ़ना आपके लिए अच्छा रहेगा। दिशा तभी बदले जब आपको उसमें कोई संभावना दिखाई दे रही हो। सामान्यतः विद्यालय में पढ़ाने के लिए बी एड की डिग्री ली जाती है और बी एड का अगला कदम एम एड हो सकता है।
हां एम एड के बाद पी एच डी की जा सकती है लेकिन उसके बाद महाविद्यालय में अध्यापन के बारे में सोचना चाहिए।

 

अपने प्रश्न भेजें – [email protected]

 

प्रेम कुमार को प्रदान की गई डॉक्टरेट उपाधि

कोलकाता ।  वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ने अपने रजत जयंती अवसर पर 08 जनवरी 2022 को पंचम दीक्षांत महोत्सव का आयोजन किया। यह कार्यक्रम कोरोना के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए तथा भारत सरकार के निर्देशानुसार मुख्यतः ऑनलाइन आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने प्रेम कुमार को डॉक्टरेट उपाधि प्रदान की।

            प्रेम कुमार मूलतः उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद के छोटे से गाँव ‘नमेंनी’ के निवासी हैं। उनका परिवार एक निम्नमध्यवर्गीय कृषक परिवार रहा है। जो कि नब्बे के दशक में कृषि के लिए पर्याप्त जमीन के अभाव तथा जीविका की तलाश में दिल्ली शहर की ओर पलायन कर गया और वहीं बस गया। दिल्ली की आजादपुर मंडी में उनके पिता ने पल्लेदारी, दिहाड़ी मजदूरी की, तथा विभिन्न कॉलोनियों की गलियों में सब्जियों की फेरी लगाकर अपने परिवार का पालन-पोषण किया। प्रारम्भ से ही परिवार की  स्थिति अत्यंत दयनीय थी, इसलिए प्रेम कुमार ने कक्षा दस से ही पार्ट टाइम काम करना शुरू कर दिया था, जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे बड़े शैक्षणिक संस्थान से स्नातकोत्तर होने तक जारी रहा। जीवन के तमाम संघर्षों का सामना करते हुए भी शिक्षा के प्रति उनकी लगन उत्तरोत्तर बढ़ती ही रही। यही कारण रहा कि स्नातकोत्तर करते समय ही उन्होंने यूजीसी नेट की परीक्षा दी और जेआरएफ सहित उतीर्ण हुए। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करने के उपरांत आगे की शिक्षा प्राप्त करने की चाह में प्रेम कुमार महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यलय, वर्धा, महाराष्ट्र चले गए। यहाँ से उन्होंने पहले प्रो. कृष्ण कुमार सिंह के निर्देशन में ‘प्रेमचन्द की कहानियों में हाशिये का समाज’ विषय पर एम. फिल. हिंदी की उपाधि, तथा अब डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी के निर्देशन में ‘नई कविता के कवि आलोचकों का तुलनात्मक अध्ययन’ विषय पर पी-एच. डी. तुलनात्मक साहित्य की उपाधि प्राप्त की है। बताते चलें कि प्रेम कुमार एक मेधावी छात्र रहे हैं जिन्होंने जाति व्यवस्था में अत्यंत निम्न व आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़े होने को कभ-भी अपनी कमजोरी न बनने दिया। उन्होंने साहित्यिक और सामाजिक विषयों पर दर्जनों लेख लिखे, प्रपत्र वाचन किए जो कि कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कविताओं में व्यक्त स्वर समतामूलक समाजव्यवस्था का पक्षधर है।

            प्रेम कुमार कहते हैं कि, मेरे माता-पिता ने स्वयं अभावपूर्ण जीवन जीते हुए भी शिक्षा के महत्व को जाना-समझा और मुझे पढ़ाया। एक सहायक प्रोफेसर के रूप में किसी संस्थान में सरकारी नौकरी पाकर स्वर्गीय पिता के सपने को साकार करना ही वे अपने जीवन का लक्ष्य मानते हैं। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। वे ज्योतिबाराव फुले, सावित्रीबाई फुले, महात्मा गांधी, छत्रपति साहू जी, बोधिसत्व बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर, स्वामी विवेकानन्द, भगत सिंह आदि महापुरुषों से अत्यंत प्रभावित हैं। इस प्रभाव को उनके लेखन में स्पष्टतः देखा जा सकता है। अपने गुरुजनों डॉ. अशोक नाथ त्रिपाठी, प्रो. अवधेश कुमार, प्रो. कृष्ण कुमार सिंह, प्रो. प्रीति सागर, डॉ. रामानुज अस्थाना, डॉ. उमेश कुमार सिंह, डॉ. बीर पाल सिंह यादव, डॉ. सुनील कुमार, डॉ. रूपेश कुमार सिंह का वे विशेष आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने उनके भीतर वैचारिक समझ विकसित की। प्रेम कुमार से डॉ. प्रेम कुमार बनने पर रजनीश कुमार ‘अम्बेडकर’, गिरहे दिलीप, लोकेश कुमार, मुकेश कुमार, अवतार सिंह, बंसराज आदि मित्रों ने सोशल मीडिया के माध्यम से बधाइयाँ दीं।

इस अवसर पर प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी (कुलाधिपति, म. गां. अं. हिं. वि. वर्धा), डॉ. विनय सहस्रबुदधे (मुख्य अतिथि), डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ (विशिष्ट अतिथि, पूर्व शिक्षा मंत्री भारत सरकार), प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल (कुलपति, म. गां. अं. हिं. वि. वर्धा), प्रो. अवधेश कुमार (डीन, साहित्य विद्यापीठ, म. गां. अं. हिं. वि. वर्धा), श्री कादर नवाज़ खान (कुलसचिव, म. गां. अं. हिं. वि. वर्धा) तथा अन्य विद्वज्जन उपस्थित रहे।

हवा में उड़ती जाए पतंग

2 हजार साल पुराना है पतंगबाजी का इतिहास

कम से कम 6 किमी प्रति घंटा की हवा हो तभी उड़ती है पतंग
कागज का छोटा टुकड़ा जब किसी डोर से बंध जाता है और हवा का एक झोंका पाकर इठलाने लगता है तो बन जाती है पतंग। इंसान ने परिंदों को हवा में गोते लगाते देखा तो सोचा कि क्यों न मैं भी कुछ ऐसा करूं। बस, यहीं से उपजी पतंग की सोच, जो कालांतर में मनोरंजन, कला और संस्कृति का हिस्सा बन गई। इतिहास, धर्म और सभ्यता के साथ रूप बदलती पतंग और पतंगबाजी को पर्यटन से भी जोड़ दिया गया है। मकर संक्रांति के मौके पर याद किए जाने वाले सूर्य और पतंग दोनों ही प्रेरणा के स्रोत भी हैं। समझते हैं कि पतंग के अलग-अलग पक्ष और पहलू क्या हैं…

विज्ञान : आसमान में कैसे उड़ती है पतंग?

साधारण पतंग को उड़ने के लिए सबसे बेहतर समय तब होता है, जब कम से कम 6 किलोमीटर और अधिकतम 20 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवा चल रही हो। हवा की गति 6 किमी से कम होने पर उड़ने में दिक्कत आती है और अधिक होने पर पतंग से नियंत्रण खोने लगता है।
जिस तरह हवाई जहाज के उड़ने का संबंध हवा से है ठीक वैसा पतंग के साथ भी है। पतंग की हवा में उड़ने की क्षमता उसकी बनावट और उससे बंधी कन्नी की स्थिति पर निर्भर करती है।
आमतौर पर उड़ाई जाने वाली साधारण आकार की पतंग तब उड़ती है, जब उसकी निचली सतह की ओर से हवा का दबाव पड़ता है। कन्नी की ऊपर वाली डोरी पतंग को हवा में खींचती है,जिससे पतंग को ऊंचा उड़ाने के लिए इसके नीचे वाले हिस्से में हवा के सापेक्ष एक कोण बन जाता है।
हवा की गति को जानने के लिए इन दिनों कई तरह की डिवाइस मौजूद हैं। पहले पत्तियों या झंडे के मूवमेंट देखकर हवा की गति का पता लगाया जाता था।

इतिहास : बांस से बने कागज से हुआ था पतंग का आविष्कार

पतंग का इतिहास लगभग 2000 साल से भी अधिक पुराना है। माना जाता है कि सबसे पहले पतंग का आविष्कार चीन के शानडोंग में हुआ। इसे पतंग का घर के नाम से भी जाना जाता है।
एक कहानी के मुताबिक, एक चीनी किसान अपनी टोपी को हवा में उड़ने से बचाने के लिए उसे एक रस्सी से बांध कर रखता था, इसी सोच के साथ पतंग की शुरुआत हुई।
मान्यता ये भी है कि 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में चीन दार्शनिक मोझी और लू बान ने बांस के कागज से पतंग का आविष्कार किया था।
549 ईसवीं से कागज की पतंगों को उड़ाया जाने लगा था, क्योंकि उस समय पतंगों को संदेश भेजने के रूप में इस्तेमाल किया गया था। ज्यादातर लोगों का मानना है कि चीनी यात्री हीनयान और ह्वैन सांग पतंग को भारत में लाए थे। वायुमंडल में हवा के तापमान, दबाव, आंर्द्रता, वेग और दिशा के अध्ययन के लिए पहले पतंग का ही प्रयोग किया जाता था।
1898 से 1933 तक संयुक्त राज्य मौसम ब्यूरो ने मौसम के अध्ययन के लिए पतंग केंद्र बनाए हुए थे,जहां से मौसम का अनुमान लगाने की युक्तियों से लैस बॉक्स पतंगें उड़ा कर मौसम सम्बंधी अध्ययन किए जाते थे।

अर्थशास्त्र : भारत में 1200 करोड़ रुपए का पतंग बाजार

एसोचैम के मुताबिक, भारत में सालाना पतंग का बाजार 1200 करोड़ रुपये से अधिक का है। देशभर में 70 हजार से ज्यादा कारीगर पतंग बाजार से जुड़े हैं। बाजार में एक पतंग की कीमत 2 से 150 रुपये तक होती है, लेकिन काइट फेस्टिवल्स मेंं उड़ाई जाने वाली पतंग महंगी होती हैं। यह उसके आकार, बनावट और मटेरियल पर निर्भर करती है।
पतंग कारोबार के लिए गुजरात और उत्तर प्रदेश के कई जिले मशहूर हैं। बरेली, अलीगढ़, रामपुर, मुरादाबाद और लखनऊ में तैयार होने वाला मांझा और पतंग राजस्थान समेत कई राज्यों में भी सप्लाई किया जाता है।
इसी तरह गुजरात में वडोदरा, सूरत, राजकोट और अहमदाबाद पतंग के बड़े बाजार हैं और यहां मनाया जाने वाला उत्तरायण पर्व दुनियाभर में मशहूर है।
एक बड़े आकार की चरखी में मांझे की छह रील भरी जा सकती है। एक रील में 900 मीटर लंबा मांझा होता है। एक औसत क्वालिटी वाली छह रील वाली चरखी लेंगे तो 400-600 रुपये का खर्च आता है।

कला : समझें कन्नी बांधने और पेंच लड़ाने का तरीका

पतंग की उड़ान कन्नी बांधने की कला पर निर्भर है। इसमें कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी है, जैसे हवा बेहद कम या सामान्य है, तो कन्नी को थोड़ी छोटी रखना ही बेहतर है। हवा की गति तेज है तो आगे और पीछे दोनों तरफ कन्नी को बराबर रखें।
पतंग के कन्नी बांधने के लिए मांझे का प्रयोग न करें। इसके लिए सद्दी बेहतर है, क्योंकि इसके टूटने का खतरा बेहद कम रहता है।
पेंच दो तरह से लड़ाए जाते हैं डोर खींचकर या ढील देकर। डोर खींचकर पेच लड़ाना चाहते हैं तो आपकी पतंग विरोधी पतंग से नीचे होनी चाहिए।
अगर ढील देकर पेंच लड़ाना चाहते हैं तो ध्यान रखें कि डोर को धीरे-धीरे छोड़ें। इस दौरान पतंग को गोल-गोल घुमाते रहेंगे तो जीतने की संभावना रहेगी। पेंच लड़ाते समय मांझा टकराएं।
भूगोल : देश-दुनिया में पतंग को समर्पित फेस्टिवल्स

ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा पतंगोत्सव फेस्टिवल ऑफ विंड्स के नाम से सिडनी में हर साल सितंबर में सेलिब्रेट किया जाता है।

चीन के वेईफांग शहर में हर साल अप्रैल में काइट फेस्टिवल आयोजित होता है। यहां मान्यता है कि ऊंची पतंग को देखने से नजर अच्छी रहती है।
जापान में हर साल मई के पहले सप्ताह में हमामात्सु के शिजुका प्रान्त में पतंगोत्सव होता है। यहां मानते हैं कि पतंग उड़ाने से देवता प्रसन्न होते हैं।
भारत में खासतौर मकर संक्रांति के मौके पर पतंग उड़ाने का रिवाज है। जनवरी के पहले सप्ताह में अहमदाबाद और जयपुर में भारत के सबसे बड़े काइट फेस्टिवल आयोजित किए जाते हैं।
ब्रिटेन में हर साल अगस्त के दूसरे सप्ताह में पोर्ट्समाउथ इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है। यहां डिजाइनर से लेकर 3डी पतंगों के लिए लोग जुटते हैं।
हर साल 1 नवंबर को ग्वाटेमाला में काइट्स ऑफ सुपेंगो के नाम से पतंग उत्सव मनाया जाता है। जिसमें 15-20 मीटर चौड़ी पतंगे उड़ाई जाती हैं।
इंडोनेशिया के बाली काइट फेस्टिवल में 4-10 मीटर चौड़ी और 100 मीटर की पूंछ वाली पतंगे उड़ाई जाती हैं। यह अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में सेलिब्रेट किया जाता है।
साउथ अफ्रीका के केपटाउन में जनवरी के दूसरे हफ्ते में इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल सेलिब्रेट किया जाता है।
अमेरिका में द जिल्कर काइट फेस्टिवल सेलिब्रेट किया जाता है। हर मार्च में यहां म्यूजिक कॉन्सर्ट से लेकर हर उम्र वर्ग के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।
इटली में सर्विया इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल हर साल अप्रैल में मनाया जाता है।
गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड जो पतंग के नाम बने

ऑस्ट्रेलिया के रॉबर्ट मूरे ने 2014 में दुनिया में सबसे ऊंची पतंग (चार हजार नौ सौ मीटर ) उड़ाने का रिकॉर्ड बनाया था।
2005 में कुवैत के एक काइट फेस्टिवल में अब्दुल रहमान और फारिस ने दुनिया की सबसे बड़ी पतंग उड़ाई। यह 25 मीटर लंबी और 40 मीटर चौड़ी थी।
2006 में एक डोर से 43 पतंगों का उड़ाने का रिकॉर्ड चीन के मा क्विंगहुआसेट के नाम है।
पुर्तगाल के फ्रेसिस्को लुफिन्हा के पास यात्रा करते हुए सबसे लंबी काइटसर्फिंग यात्रा (862 किमी) करने का रिकॉर्ड है।
2011 में यूनाइटेड नेशनल रिलीफ एंड वर्क एजेंसी ऑर्गेनाइजेशन ने फिलीस्तीन बच्चों के लिए गाजा स्ट्रिप के समुद्रतट पर 12,350 पतंगें उड़ाकर रिकॉर्ड बनाया।

(साभार – दैनिक भास्कर)