Monday, July 6, 2026
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विश्व का पहला तिलहन है तिल

तिल एक पुष्पीय पौधा है। इसके कई जंगली रिश्तेदार अफ्रीका में होते हैं और भारत में भी इसकी खेती और इसके बीज का उपयोग हजारों वर्षों से होता आया है। यह व्यापक रूप से दुनिया भर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पैदा किया जाता है। तिल के बीज से खाद्य तेल निकाला जाता है। तिल को विश्व का सबसे पहला तिलहन माना जाता है और इसकी खेती 5000 साल पहले शुरू हुई थी।
मकर संक्रांति का त्योहार माघ महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को है। मकर संक्रांति पर सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है। मकर संक्रांति पर दान, स्नान और पूजा का विशेष महत्व होता है। मकर संक्रांति पर विशेष रूप से तिल का दान किया जाता है। साथ ही इसके अलावा पानी में तिल डालकर स्नान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि तिल का दान करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं। तिल शनि की सबसे प्रिय चीज होती है। माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई थी।
तिल वार्षिक तौर पर 50 से 100 से.मी. तक बढता है। फूल 3 से 5 से.मी. तथा सफेद से बैंगनी रंग के पाये जाते हैं। तिल के बीज अधिकतर सफेद रंग के होते हैं, हालांकि वे रंग में काले, पीले, नीले या बैंगनी रंग के भी हो सकते हैं।
तिल प्रति वर्ष बोया जानेवाला लगभग एक मीटर ऊँचा एक पौधा जिसकी खेती संसार के प्रायः सभी गरम देशों में तेल के लिये होती है। इसकी पत्तियाँ आठ दस अंगुल तक लंबी और तीन चार अंगुल चौड़ी होती हैं। ये नीचे की ओर तो ठीक आमने सामने मिली हुई लगती हैं, पर थोड़ा ऊपर चलकर कुछ अंतर पर होती हैं। पत्तियों के किनारे सीधे नहीं होते, टेढे़ मेढे़ होते हैं। फूल गिलास के आकार के ऊपर चार दलों में विभक्त होते हैं। ये फूल सफेद रंग के होते है, केवल मुँह पर भीतर की ओर बैंगनी धब्बे दिखाई देते हैं। बीजकोश लंबोतरे होते हैं जिनमें तिल के बीज भरे रहते हैं। ये बीज चिपटे और लंबोतरे होते हैं।
भारत में तिल दो प्रकार का होता है— सफेद और काला। तिल की दो फसलें होती हैं— कुवारी और चैती। कुवारी फसल बरसात में ज्वार, बाजरे, धान आदि के साथ अधिकतर बोंई जाती हैं। चैती फसल यदि कार्तिक में बोई जाय तो पूस-माघ तक तैयार हो जाती है। वनस्पतिशास्त्रियों का अनुमान है कि तिल का आदिस्थान अफ्रीका महाद्वीप है। वहाँ आठ-नौ जाति के जंगली तिल पाए जाते हैं। पर ‘तिल’ शब्द का व्यवहार संस्कृत में प्राचीन है, यहाँ तक कि जब अन्य किसी बीज से तेल नहीं निकाला गया था, तव तिल से निकाला गया। इसी कारण उसका नाम ही ‘तैल’ (=तिल से निकला हुआ) पड़ गया। अथर्ववेद तक में तिल और धान द्वारा तर्पण का उल्लेख है। आजकल भी पितरों के तर्पण में तिल का व्यवहार होता है।
वैद्यक में तिल भारी, स्निग्ध, गरम, कफ-पित्त-कारक, बलवर्धक, केशों को हितकारी, स्तनों में दूध उत्पन्न करनेवाला, मलरोधक और वातनाशक माना जाता है। तिल का तेल यदि कुछ अधिक पिया जाय, तो रेचक होता है।

युवा भारत की कालजयी प्रेरणा हमारे स्वामी विवेकानंद

भारत के इतिहास में ऐसी कई विभूतियाँ हैं जो हमें आज भी प्रेरित करती हैं। स्वामी विवेकानन्द ऐसे ही व्यक्तित्व हैं जिनका जीवन हमें नयी राह दिखाता है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी उनके जीवन से काफी कुछ सीख सकती है, उनके संघर्ष से सीख सकती है और अपने उद्देश्य की तरफ बढ़ सकती है। पराधीन भारत में जब भारतीयों का विश्वास अपने ही धर्म और अपनी ही संस्कृति पर डगमगाने लगा था तब स्वामी जी ने पूरे विश्व के सामने हिन्दू धर्म और हिन्दूत्व को मजबूती से खड़ा किया। स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 शिकागो भाषण में इस बात को चरितार्थ भी करके दिखाया था। जहां मंच पर संसार की सभी जातियों के बड़े – बड़े विद्वान उपस्थित थे। डॉ. बरोज के आह्वान पर 30 वर्ष के तेजस्वी युवा का मंच पर पहुंचना। भाषण के प्रथम चार शब्द ‘अमेरिकावासी भाइयों तथा बहनों’ इन शब्दों को सुनते ही जैसे सभा में उत्साह का तूफान आ गया और 2 मिनट तक 7 हजार लोग उनके लिए खड़े होकर तालियाँ बजाते रहे। पूरा सभागार करतल ध्वनि से गुंजायमान हो गया। संवाद का ये जादू शब्दों के पीछे छिपी चिर –पुरातन भारतीय संस्कृति, सभ्यता, अध्यातम व उस युवा के त्यागमय जीवन का था। जो शिकागो से निकला व पूरे विश्व में छा गया। उस भाषण को आज भी दुनिया भुला नहीं पाती। स्वामी जी मानते थे कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो समग्र विकास कर सके, चरित्र निर्माण कर सके। उनका मानना था कि शिक्षा ऐसी हो जो सीखने वाले को जीवन संघर्ष में अडिग रहने की शक्ति दे।
12 जनवरी 1863 को जन्मे स्वामी विवेकानंद की जयंती को हम युवा दिवस के रूप में मनाते हैं। उनके जीवन में वह सब कुछ है जो किसी भी युवा को सम्मोहित कर सकता है, प्रेरित कर सकता है। संगीत से लेकर साहित्य तक, तैराकी से लेकर घुड़सवारी तक, अर्थशास्त्र से लेकर वेद -पुराण, वेदान्त तक, उनका अध्ययन विशद था। उनमें ज्ञान की भूख थी, ईश्वर को देखने की ललक थी और यही जिज्ञासु प्रवृति जीवन को एक लक्ष्य देती है। ये नरेन ही थे जो अपने गुरु से पूछ सकते थे कि क्या उन्होंने ईश्वर को देखा है और यह नरेन ही थे जो ठाकुर रामकृष्ण परमहंस के योग्य शिष्य बन सकते थे। नरेन एक आदर्श शिष्य रहे जिन्होंने अपने गुरु के सिद्धांतों का ऐसा प्रसार किया कि आज तक वह हमें राह दिखा रहा है। सेवा का वास्तविक अर्थ रामकृष्ण मिशन आज तक समझा रहा है। समस्त भारत में घूमते हुए उन्होंने देश को सिर्फ देखा ही नहीं बल्कि समझा भी था। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक बार कहा था-“यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पायेंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।” 4 जुलाई 1902 को स्वामी विवेकानंद ने जगत से महाप्रस्थान किया मगर आज भी उनकी प्रेरणा ऐसी है कि जीवन से जूझने की शक्ति देती है।
निश्चित रूप से उनका जीवन आसान नहीं था, शारीरिक, पारिवारिक हर प्रकार के संघर्ष रहे मगर इन संघर्षों के बीच भी नरेन्द्र दत्त जब विवेकानंद बनकर उभरते हैं तो उनका व्यक्तित्व मानों नक्षत्र की तरह समस्त संसार को आलोकित करता है। उनकी वाणी में वह शक्ति थी जो किसी भी हतोत्साहित मनुष्य में प्राण डाल सकती है। आज रामकृष्ण मिशन के अथक प्रयास से गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट स्थित स्वामी विवेकानंद का पैतृक आवास एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में हम सभी को दिशा दिखा रहा है और सभी को यहाँ पर जाना चाहिए। आज भी उनका संदेश हमें प्रेरित करता है – उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त नहीं हो जाता।

स्वामी जी से जुड़ा एक प्रेरक प्रसंग

स्वामी विवेकानंद अमेरिका में भ्रमण कर रहे थे। एक जगह से गुजरते हुए उन्होंने पुल पर खड़े कुछ लड़कों को नदी में तैर रहे अंडे के छिलकों पर बन्दूक से निशाना लगाते देखा। किसी भी लड़के का एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था . तब उन्होंने ने एक लड़के से बन्दूक ली और खुद निशाना लगाने लगे।

उन्होंने पहला निशाना लगाया और वो बिलकुल सही लगा ….. फिर एक के बाद एक उन्होंने कुल 12 निशाने लगाये और सभी बिलकुल सटीक लगे . ये देख लड़के दंग रह गए और उनसे पुछा , –  भला आप ये कैसे कर लेते हैं ?

स्वामी जी बोले , – तुम जो भी कर रहे हो अपना पूरा दिमाग उसी एक काम में लगाओ। अगर तुम निशाना लगा रहे हो तो तम्हारा पूरा ध्यान सिर्फ अपने लक्ष्य पर होना चाहिए। तब तुम कभी चूकोगे नहीं . अगर तुम अपना पाठ पढ़ रहे हो तो सिर्फ पाठ के बारे में सोचो . मेरे देश में बच्चों को यही करना सिखाया जाता है।

 

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में सीक्रेट सांता ने बाँटे तोहफे

कोलकाता । सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में क्रिसमस का त्योहार अलग अन्दाज में मनाया गया। स्कूल की शिक्षिकाओं और छात्राओं ने सीक्रेट सान्ता बनकर खुशियाँ बाँटीं। छात्राओं को एक उपहार चुनकर खूबसूरती से पैक करने को कहा गया। छात्राओं को कहा गया कि वे जिसे भी जरूरतमंद समझती हैं, उस तक यह उपहार रख दें। क्रिसमस का यह सन्देश प्रसारित हुआ कि क्रिसमस देने और खुशियाँ बाँटने का त्योहार है। गत 22 दिसंबर को प्राइमरी विभाग की छात्राओं ने वर्चुअल असेम्बली में भाग लिया। नर्सरी की छात्राओं ने रंगारंग कपड़े क्रिसमस कैरल गाया और हाउजी भी खेली। क्रिसमस पर विशेष नाश्ता और सान्ता बनकर शिक्षिकाओं का घर तक जाना उनके लिए सुखद तोहफा था। किंडरगार्टेन की छात्राओं को वीडियो के माध्यम से ईसा मसीह के जन्म की कहानी बताय़ी गयी और क्रिसमस पर क्विज का आयोजन हुआ। छात्राओं ने क्रिसमस ट्री बनकर खूब मजे किये। दूसरी कक्षा की छात्राओं ने क्रिसमस कार्ड बनाने सीखे।

आकांक्षा कुरील‘ सावित्रीबाई फुले उत्कृष्ट विद्यार्थी पुरस्कार-2021’ की विजेता

कोलकाता । महिला अध्ययन विभाग एवं सावित्रीबाई फुले पीठ के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, डॉ. अम्बेडकर नगर, महू, इंदौर, (मध्य प्रदेश) द्वारा राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले की 191वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित राष्ट्रीय वेब परिसंवाद कार्यक्रम में ‘राष्ट्र सेविका सावित्रीबाई फुले : जीवन एवं कार्य’ विषय पर राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता आयोजित की गई थी । जिसमें आकांक्षा कुरील ने ‘द्वितीय स्थान’ प्राप्त किया और विश्वविद्यालय ने प्रमाण-पत्र देकर ‘सावित्रीबाई फुले उत्कृष्ट विद्यार्थी पुरस्कार-2021’ से गौरवान्वित किया है ।  आकांक्षा कुरील उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तालुका के छोटे से ग्राम ‘मवई पड़ियाना’ में पली-बढ़ी इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गाँव से और उच्च शिक्षा विश्वविद्यालय से प्राप्त कर रही हैं । हाल ही में जेंडर स्टडीज विषय में स्नातकोत्तर पदवी का अध्ययन कर रही हैं । वे इस प्रतियोगिता में शामिल हुई और पुरस्कार से सम्मानित की गई । इसका संपूर्ण श्रेय वे भारत की पहली महिला शिक्षिका राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले, बाबासाहब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर, छत्रपति शाहूजी महाराज, पेरियार, बिरसा मुंडा जैसे महापुरुषों और अपने माता-पिता, अपने जीवन साथी रजनीश कुमार अम्बेडकर व पारिवारिक सदस्यों को देती हैं ।

राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले का महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं । उनके द्वारा महिला शिक्षा और सशक्तिकरण को लेकर किया गया कार्य हमेशा याद किया जाएगा । उन्होंने विषम परिस्थितियों में समाज को एक नई दिशा दी । हमें उनके द्वारा बताए गए अनेक मार्गों को अपनाने की आवश्यकता है । आज हम जब महिलाओं की स्थिति को देखते हैं तो वहीं पर हम पाते हैं कि वे जमीन से लेकर आसमान तक अपना परचम फहरा रही हैं । इसी स्थिति के कारण वे आज डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, वैज्ञानिक, राजनेत्री आदि बनकर समाज परिवर्तन कर रही हैं । ऐसे में आकांक्षा कुरील को ‘सावित्रीबाई फुले उत्कृष्ट विद्यार्थी’ जैसा पुरस्कार मिलने पर उनका समाज अपने-आप में गौरव महसूस कर रहा है । इस अवसर पर प्रो. आशा शुक्ला (कुलपति, ब्राउस), प्रो. कुसुम त्रिपाठी, डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’, डॉ. सुरजीत कुमार सिंह समेत कई अन्य लोगों ने शुभकामनाएं दीं।

बीएचएस में मनाया गया क्रिसमस

कोलकाता। बिड़ला हाई स्कूल में क्रिसमस का त्योहार उल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का प्रसारण स्कूल के फेसबुक पेज पर किया गया। आरम्भ में परिचय तथा स्वागत का दायित्व छात्र राम दफ्तरी ने  निभाया। इसके पश्चात स्कूल की प्रिंसिपल लवलीन सैगल ने सभी को सम्बोधित किया। विद्यार्थियों और शिक्षकों ने क्रिसमस कैरल गाया। कार्यक्रम के माध्यम देने के आनंद का महत्व समझाया गया।

 

बीएचएस में मनाया गया गणित दिवस

कोलकाता । बिड़ला हाई स्कूल में गत 22 दिसम्बर 2021 को गणित दिवस मनाया गया। यह दिन महान गणितज्ञ श्रीनिवासन रामानुजन की जयंती है। इस आयोजन का उद्देश्य गणित के क्षेत्र में हो रही प्रगति और मानवता के विकास में  गणित के महत्व से लोगों को अवगत कराना था।

साथ

प्रो. संजय जायसवाल

उस दिन उसने
बड़े आत्मविश्वास के साथ कहा था
आदतें बदलने से
साथ नहीं छूटता

कुछ देर तक मैं चुप रहा

दरअसल आदतें बदलने से
छूटता है बहुत कुछ
मसलन, उसने सबसे पहले चाय पीने की आदत छोड़ी
तो चाय के साथ
मिट्टी के प्याले का साथ छूटा

छूटा कुम्हार के चाक पर घूमती माटी की गंध
छूटा कुम्हार का दुलार
छूट गया लबों से धरती का प्यार

किसने कहा आदतें बदलने से साथ नहीं छूटता
उसने लिखने की आदत छोड़ी
तो कागज़ से नाता टूटा

उसने पढ़ना छोड़ा तो
किताबों में जीवन के कई रंग छूट गए

उसने गाना छोड़ा तो
नदी, चिड़िया, सरगम छूटे

उसने कहना छोड़ा तो
अर्थ छूटा, संवाद टूटा

किसने कहा
आदतें बदलने से साथ नहीं छूटता
रंगमंच से दूर हुए
तो स्टेज छूटा
सामने बैठे दर्शकों की बेचैनियां छूटीं

दरख्तों से मुँह मोड़ा
तो पीठ का सहारा छूटा
जीवन की हरियाली छूटी

साथ चलने की आदत बदली
तो रास्ते छूटे, मंजिल छूटी

उसने जब चुपचाप क्रांति की भाषा छोड़
ख़ामोशी की चादर ओढ़ ली
तब प्रतिवाद, प्रतिरोध और न्याय का साथ छूटा

उसने जब धीरे-धीरे कॉफी हाउसों और मंडलियों में जाना छोड़ा
तब कहकहे छूटे, बतरस छूटे

जब उसने नदी के किनारे से मुँह मोड़ा
तब लहरें छूटीं, नाव छूटी।

किसने कहा आदतें बदलने से साथ नहीं छूटता

राजनेताओं ने सह्दयता और विवेक छोड़ा
तो जनकल्याण छूटा

धर्माचार्यों ने सर्वधर्म छोड़ा
तो छूटा सौहार्द

जिसने राम को छोड़ा
उससे रामराज्य छूटा

किसने कहा आदतें बदलने से साथ नहीं छूटता

आज भी वही अयोध्या है
आज भी वही राम हैं
आज भी वही ब्रज है

पर बहुत पीछे छूट गए हैं
कबीर, जायसी, सूर, तुलसी और मीरा

हमने आदमी होने की तमीज बदल दी

तो आदमियत छूटी

किसने कहा आदतें बदलने से
साथ नहीं छूटता।

संयम, अनुशासन, सृजन ही हमारे रक्षक हैं, शामिल कीजिए जीवन में

नया साल शुरू हो गया है और साल के आरम्भ में ही कोविड ने डराना शुरू कर दिया है। ओमिक्रॉन के बढ़ते मामलों को लेकर सरकारो ने सख्ती बरतनी शुरू कर दी है। बंगाल में भी आंशिक लॉकडाउन लग चुका है। सवाल यह है कि इतना सब कुछ होने के बाद आखिर नागरिक और सरकार, इतने लापरवाह क्यों हैं? देश की छोड़िए, क्या अपने प्रति लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? 2019 के बाद जिस तरह का भयावह दृश्य कोविड – 19 ने दिखाया, इतनी मौतें हुईं, इतने कारुणिक दृश्य दिखे, आखिर क्या कारण है…कि इसे देखकर भी हम नहीं सुधरे? हम मानते हैं कि हमारी संस्कृति और परम्परा समावेशी है लेकिन समावेशी होने के लिए जनता का जीवन दाँव पर लगाना कहाँ की बुद्धिमानी है? क्या राजनीतिक महत्वाकाँक्षाएँ इतनी बड़ी होनी चाहिए कि खतरे के बावजूद रैलियाँ होती रहें? जब हम बात डिजिटल भारत की करते हैं, ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की करते हैं तो हम डिजिटल मतदान के बारे में विचार क्यों नहीं करते? जिस तरह से हमारी लापरवाही बनी हुई है और कोविड का आतंक फैल रहा है, वहाँ अर्थव्यवस्था को खड़ा करना ही सबसे बड़ी चुनौती है तो क्या ऐसी स्थिति में घर से काम करने की संस्कृति को अधिक व्यावहारिक बनाना एक सही विकल्प नहीं होगा? एक बात तो तय है कि लम्बे समय तक कोविड हमारे बीच रहने जा रहा है, बीमारी को तो बदला नहीं जा सकता, बदलना तो हर एक नागरिक को है। तैयारी तो सरकारों को करनी है तो हम अपनी संरचना को मजबूत करें, यह एक ऐसा कदम है जो आगे की राह खोलेगा मगर उससे भी जरूरी है कि हमारे जीवन में संयम, अनुशासन, सृजन जैसे शब्दों का व्यावहारिक रूप लागू हो क्योंकि यही हमारा रक्षक है मगर उससे पहले भी एक सवाल हम सुधरेंगे कब?

बंगाल में आंशिक लॉकडाउन, बंद रहेंगे सभी स्कूल-काॅलेज

50 फीसद क्षमता के साथ चलेंगी लोकल व मेट्रो ट्रेनें

कोलकाता। बंगाल में कोरोना वायरस संक्रमण के लगातार बढ़ते मामलों के बीच राज्य सरकार ने रविवार को बड़ा कदम उठाते हुए कई कड़े प्रतिबंधों (मिनी लाकडाउन) की घोषणा की। तीन जनवरी, सोमवार से नए नियम लागू होंगे। सोमवार से राज्य में सभी स्कूल-कालेज, विश्वविद्यालय व शिक्षण संस्थान बंद रहेंगे। राज्य के मुख्य सचिव एचके द्विवेदी ने एक संवाददाता सम्मेलन में इसकी घोषणा करते हुए बताया कि सरकारी व निजी कार्यालयों में भी 50 फीसद कर्मचारियों के साथ काम की अनुमति होगी। राज्य में लोकल ट्रेन व मेट्रो 50 फीसद क्षमता के साथ चलेगी। वहीं, लोकल ट्रेन शाम सात बजे तक ही चलेगी। स्वीमिंग पुल, स्पा, सैलून, ब्यूटी पार्लर व जिम बंद रहेंगे। पर्यटन स्थल, चिडियाघर भी बंद रहेंगे। शापिंग माल व कांप्लेक्स सुबह 10 बजे से शाम पांच बजे तक आधी क्षमता यानी 50 फीसद उपस्थिति के साथ खुलेंगे। मीटिंग, हाल और कांफ्रेंस में 50 फीसद उपस्थिति की अनुमति होगी। होम डेलिवरी सेवा की अनुमति होगी। शादी-विवाह में मात्र 50 तथा अंतिम संस्कार में 20 लोगों के ही शामिल होने की अनुमति होगी। रात 10 बजे से पांच बजे तक नाइट कर्फ्यू लागू रहेगा। इस दौरान सिर्फ जरूरी सेवाओं को ही अनुमति होगी।

लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में वर्तमान स्थिति की समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया। बैठक के बाद संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्य सचिव ने कहा कि सीएम ममता बनर्जी ने पहले ही कहा था कि कुछ पाबंदियां लगाई जाएगी। ब्रिटेन से आने वाली फ्लाइट पर भी सोमवार से पूरी तरह रोक रहेगी। उन्होंने बताया कि इस बारे में पहले ही पत्र लिखकर केंद्र सरकार को सूचित कर दिया गया है। जोखिम भरे देशों से आने वाले फ्लाइट के यात्रियों का 10 फीसदी आरटी-पीसीआर टेस्ट किया जाएगा तथा दूसरे देशों से आने वाले यात्रियों रैपिड एंटीजन टेस्ट बाध्यतामूलक किया गया है। वायरस के नए स्वरूप ओमिक्रोन के बारे में विश्व स्वास्थ्य संगठन की चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है। वहीं, मुंबई और दिल्ली से सप्ताह में मात्र दो दिन सोमवार और शुक्रवार को फ्लाइट चलेगी।

राज्य सरकार ने जो नई कोविड गाइडलाइंस जारी की है, उसके अनुसार मास्क पहनने, शारीरिक दूरी बनाए रखने और साफ-सफाई रखने के नियमों का हमेशा पालन करना अनिवार्य है। कोलकाता में 11 माइक्रो कंटेंनमेंट जोन भी होगा। अन्य जिलों में भी इसी तरह का जोन बनाया जाएगा। अधिसूचना में कहा गया कि जिला प्रशासन, पुलिस आयुक्तालय और स्थानीय अधिकारी मास्क पहनने और शारीरिक दूरी बनाए रखने के राज्य के निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करेंगे। प्रतिबंध उपायों के किसी भी उल्लंघन के खिलाफ आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 और भारतीय दंड संहिता की प्रासंगिक धाराओं के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

दयाप्रकाश सिन्हा और ब्रात्य बसु को साहित्य अकादमी पुरस्कार

 कोलकाता : साहित्यकार दया प्रकाश सिन्हा को इस वर्ष का साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी के लिए दिया जाएगा। इसके साथ ही साहित्य अकादमी राज्य के शिक्षा मंत्री और प्रसिद्ध नाटककार ब्रात्य बसु को उनके नाटकों के लिए सम्मानित करेगी। दया प्रकाश सिन्हा को उनके नाटक ‘सम्राट अशोक’ के लिए मिला यह सम्मान मिला है जबकि बसु को यह सम्मान ‘मीर जाफर’ और अन्य नाटकों के लिए दिया जा रहा है। अंग्रेजी के लिए नमिता गोखले को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाएगा। इनके साथ ही 20 भारतीय भाषाओं के लेखकों को वर्ष 2021 का प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा गत गुरुवार को की गयी।

ब्रात्य बसु को ‘अश्लीन’ और ‘अरण्यदेव’ समेत कई नाटकों ने उन्हें खास लोकप्रियता दिलाई है। ‘विंकल ट्विंकल’, ‘रुद्धसंगीत’, ‘कृष्णनगर’ और ‘मुंबई नाइट्स’ सहित उनके कई नाटकों का मंचन अलग-अलग समय पर किया गया है। बता दें कि ब्रात्य बसु ने प्रेसीडेंसी कॉलेज और कलकत्ता विश्वविद्यालय में बांग्ला साहित्य का अध्ययन किया है। बाद में उन्होंने कलकत्ता सिटी कालेज में पढ़ाया। उन्होंने अपने अभिनय कॅरियर की शुरुआत गणकृति नामक एक थिएटर ग्रुप में एक साउंड आपरेटर के रूप में की थी। बाद में उन्होंने उस ग्रुप के लिए नाटकों का लेखन और निर्देशन शुरू किया। ब्रात्य बसु राज्य के प्रमुख नाट्यकार और शिक्षाविद् हैं।

आधुनिक नाटक ‘अशालीन’ उनका पहला नाटक है। उन्होंने वह नाटक 1996 में लिखा था. उनके अन्य उल्लेखनीय नाटक में ‘अरण्यदेव’, ‘शहरियार’, ‘विंकल ट्विंकल’ और ‘मर्डर मिस्ट्री ड्रामा’ हैं। उन्हें 1998 में श्यामल सेन मेमोरियल अवार्ड और 2000 में दिशारी अवार्ड मिला है। साल 2006 में, उन्होंने अपना खुद का थिएटर ग्रुप, ‘ब्रात्यजन’ बनाया। साल 2009 में देवव्रत बिस्वास के जीवन पर आधारित नाटक ‘रूद्ध संगीत’ उनका नवीनतम नाटक है। ब्रात्य बसु ने दो फिल्मों का निर्देशन भी किया है। एक है ‘रास्ता’ और दूसरा है ‘तारा’। पहली फिल्म एक युवक के आतंकवादी बनने के बारे में है, और दूसरी फिल्म समाज और प्रेम की विफलता के बारे में है। उन्होंने कालबेला समेत कई फिल्मों में काम किया है। उन्होंने हाल ही में डिक्शनरी नामक एक और फिल्म का निर्देशन किया है।

देश का 80 फीसदी अनाज-सब्जियां उगाने वाली महिलाओं को ‘किसान’ का दर्जा क्यों नहीं?

13% ही जमीन की मालकिन
नयी दिल्ली । महंगाई बढ़ी तो खेती किसानी में आमदनी कम होने लगी। नफा-नुकसान का तोल-मोल करने वाले पुरुष खेती-बाड़ी छोड़ कमाने खाने शहर चले गए और पीछे रह गईं महिलाएं। खेत की बुआई से लेकर सिंचाई, निराई-गुड़ाई और फसल की कटाई में जी-तोड़ मेहनत करती हैं। अनाज और सब्जियों को मंडी ले जाकर बेचती हैं।
ऑक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, देश का 80% अनाज और सब्जियां महिलाएं उगाती हैं। इसके बावजूद सिर्फ 13% महिलाएं उस जमीन की मालकिन हैं, जिस पर वे खेती करती हैं। खेती-किसानी से जुड़ी सरकारी योजनाएं भी पुरुषों को ध्यान में रखकर ही बनाईं जाती हैं, जिनमें महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है। महिलाओं को तो आधिकारिक रूप से ‘किसान’ कहे जाने की मान्यता भी नहीं मिली है। खेत-खलिहान से जुड़े ज्यादातर सरकारी संस्थानों पर भी पुरुषों का ही कब्जा है। किसान भाइयों के साथ किसान बहनों का जिक्र तक नहीं किया जाता है। 10 माह के रोते बच्चे को गोद में लेकर चुप कराने की कोशिश करती किसान सरिता राउत बताती हैं कि पूरे-पूरे दिन खेतों में काम करते हैं। रोपाई करते हुए कमर टेढ़ी हो जाती है। खेत पर जाने से पहले और लौटकर आने के बाद घर के काम निपटाने के साथ ही बच्चों को संभालते हैं। जब फसल पककर तैयार हो जाती है तब काट-छांट कर घर ले आते हैं। जब बेचने की बारी आती है, तब महिलाओं का खून-पसीना याद नहीं आता है। महिलाएं अगर उस पैसे से अपनी पसंद की एक साड़ी भी खरीद लें तो बहुत बड़ी बात हो जाती है। सरिता राउत मध्य प्रदेश के बाला घाट जिले में खुद खेती करने के साथ ही अपने जैसी अन्य महिला किसानों को आधुनिक खेती के गुर सिखाती हैं।
‘समाज की सोच में नहीं है महिला किसान का अस्तित्व’
महिला किसान अधिकार मंच (मकाम) से जुड़ कर महिला किसानों के हक की लड़ाई लड़ने वाली सीमा कुलकर्णी कहती हैं, ”ग्रामीण क्षेत्र में 85 फीसदी से अधिक महिलाएं खेती किसानी का करती हैं। फिर भी हमारे समाज में अभी तक महिला किसान जैसा कुछ अस्तित्व में है ही नहीं। चमकदार व नुमाइशी सरकारी नीति-दस्तावेज में भले ही ‘महिला किसान’ का जिक्र मिल जाए, लेकिन लोगों की सोच और कृषि योजनाओं में किसान लफ्ज का मतलब सिर्फ मर्द ही है। किसानों को मिलने वाले खाद और बीज उन्हीं को मिलते हैं। जमीन हो या फसल दोनों की खरीद और बेच मर्द ही कर सकते हैं।
सरकारी योजनाओं में नहीं है महिला किसानों का जिक्र
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के डाटा के मुताबिक, देश के ग्रामीण क्षेत्र में सबसे ज्यादा पैसा महिलाएं बैंक में जमा कराती हैं। बावजूद इसके महिलाओं को कर्ज नहीं मिलता। उन्हें कर्ज के लिए मुद्रा योजना या फिर अन्य स्कीमों का सहारा लेना पड़ता, जिसकी ब्याज दर भारी-भरकम होती है। कृषि क्षेत्र में सरकारी योजनाओं का फायदा, कर्ज और क्रेडिट कार्ड की व्यवस्था भी पुरुषों के लिए ही है।
महिलाओं के अनुकूल नहीं है मार्केटिंग संरचना
भारतीय किसान यूनियन उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष सचिन शर्मा कहते हैं कि महिलाएं जब फसल को मंडी लेकर जाती हैं या गन्ने को मिल पर लेकर जाती हैं तो वहां 4-4 दिन बाद नंबर आता है। गन्ने की फसल का भुगतान होने में साल बीत जाता है, इससे सबसे ज्यादा दिक्कत महिला किसानों को होती है। वे कैसे बच्चों को पढ़ाएं, कैसे अपना घर चलाएं। बता दें कि गल्ला-मंडियों में महिलाएं काम करती मिल जाएंगी, लेकिन आज तक मार्केटिंग संरचना महिलाओं के अनुकूल नहीं बनायी गयी। मंडियों में महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट तक नहीं होते हैं। न ही अलग बैठने की जगह।
जमीन पर नहीं है मालिकाना हक
इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे-2018 के मुताबिक, 2% से भी कम पैतृक संपत्ति में महिलाओं के नाम हैं। सीमा कुलकर्णी बताती हैं कि महिला किसानों का जमीन पर मालिकाना हक न के बराबर है, जिससे उनकी संसाधनों तक पहुंच सीमित हो जाती है। पति की मौत के बाद महिला किसान को जमीन का स्वामित्व नहीं मिलता है। जमीन पति से सीधे बेटे या भाई के नाम ट्रांसफर कर दी जाती है। महिला किसान सरिता राउत बताती हैं कि जो महिलाएं अकेली हैं, लेकिन खेती है तो उनका गुजारा जैसे-तैसे चल जाता है। लेकिन जिन महिलाओं के पास खेती नहीं है। उन महिलाओं को बटाई या उगाई पर खेती नहीं मिलती है। उन्हें मजबूरन दूसरों के खेत में मजदूरी करने पड़ती है, जहां उन्हें पैसा पुरुषों की तुलना में कम मिलता है।
दरअसल, केंद्र सरकार के पास भूमिहीन किसानों का आंकड़ा नहीं, इसलिए भूमिहीन महिला किसानों की संख्या कितनी है, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है। ऐसे में वे खेतों में खून पसीना बहाती हैं, लेकिन उन्हें इसका फायदा नहीं मिलता। किसान सम्मान निधि, सौर पंप जैसी मदद हो फिर सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से फसल नष्ट होने पर मिलने वाला मुआवजा नहीं मिलता है। भूमिहीन महिलाओं को किसान सम्मान निधि, सौर पंप जैसी मदद हो फिर सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से फसल नष्ट होने पर मिलने वाला मुआवजा, कुछ नहीं मिलता।
भूमिहीन महिलाओं को किसान सम्मान निधि, सौर पंप जैसी मदद हो फिर सूखा और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से फसल नष्ट होने पर मिलने वाला मुआवजा, कुछ नहीं मिलता।
महिला किसानों की मांगें

किसान की परिभाषा जमीन के मालिकाना हक के आधार पर न तय हो।
पैतृक जमीन के दस्तावेजों में महिलाओं के नाम भी शामिल हों।
बजट में महिलाओं पर खर्च किया जाने वाला हिस्सा तय हो।
महिला किसानों को ध्यान में रखकर कृषि उपकरण और योजनाएं बनाई जाएं।
महिला किसानों को भी मिले सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा।
महिला किसानों को मान्यता देने के क्या होंगे फायदे?
महिलाओं को खेती, पशुपालन, मछली पालन के लिए कर्ज मिल सकेगा।
किसान सम्मान निधि, फसल बीमा और मार्केटिंग सेवाओं को लाभ मिलेगा।
कृषि क्षेत्र में महिलाओं को समान हक देने से 20-30% बढ़ेगी कृषि उत्पादकता।
कृषि उत्पादन भी 2.5% से 4% तक बढ़ जाएगा।

(साभार – दैनिक भास्कर)