Monday, March 23, 2026
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महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न का दायरा घर तक सीमित नहीं

महिलाओं के खिलाफ हिंसा हमेशा से होती रही है और इसे महिमामंडित भी किया जाता रहा है। आज भी 70 प्रतिशत महिलाएं हिंसा और उत्पीड़न को भाग्य और नियति का खेल मानकर स्वीकार करती हैं या वह यहां तक कहती हैं कि मारपीट पुरुषोचित स्वभाव है मगर मारपीट सिर्फ पुरुष ही नहीं करते। महिलाओं के खिलाफ जब उत्पीड़न होता है तो उसकी जिम्मेदार असुरक्षा बोध से पीड़ित औरतें होती हैं और वह घर से लेकर कार्यस्थल तक हर जगह विराजमान हैं। उनका लक्ष्य किसी भी बेहतर महिला को पीछे धकेलना ही होता है। यह सच है कि पितृसत्तात्मक समाज इसकी जड़ में है मगर पितृसत्तात्मक समाज की तह में जाकर देखिए तो पता चलता है कि इसे संचालित करने वाली महिलाएं ही हैं। पुरुष कई बार संचालित करता है तो कई बार महिलाओं के हाथ की कठपुतली भी वही होता है जिसे भावनात्मक स्तर पर किसी महिला की ब्लैकमेलिंग का शिकार होना पड़ता है। वस्तुतः मेरी नजर में हिंसा एक जेंडर न्यूट्रल मामला है और इसकी शुरुआत परिवार से होती है। कई परिवार में पुरुष दबाते हैं तो कई जगहों पर उनको जुबान खोलने की अनुमति नहीं होती। हिंसा का यह बड़ा कारण है तो इसकी तह में जाकर देखिए तो इसकी शुरुआत तो बचपन से ही हो जाती है मगर आपका सामाजिक दायरा ऐसा है कि पारिवारिक उत्पीड़न (विशेषकर वह माता – पिता, भाई – भाभी का हो) को उत्पीड़न मानने को तैयार ही नहीं होता। अगर कोई लड़की या लड़का शिकायत करे तो उसे गम्भीरता से लिया ही नहीं जाता । सब कुछ देखते हुए भी परिवार और समाज की प्रतिष्ठा का हवाला देकर पीड़ित सदस्य को ही चुप करवा दिया जाता है और प्रताड़क हर जगह पूजा जाता है। आपको यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हर बार माता – पिता – भाई – बहनें या रिश्तेदार नायक नहीं होते, वह प्रताड़क होते हैं मगर सामाजिक सहानुभूति उनको ही मिलती है। यहां तक कि लड़की की हत्या भी हो जाए तो तर्क यह दिया जाता है कि बाप की इज्जत उछाल रही थी। सबसे पहला सवाल क्या इज्जत सिर्फ माता – पिता…मायके या ससुराल की होती है…क्या किसी स्त्री या पुरुष का कोई सम्मान नहीं होता ? पारिवारिक प्रतिष्ठा का सारा ठेका आपने लड़कियों को या लड़कों को ही क्यों सौंप रखा है? क्या बाप शराब पीकर घर पर क्लेश करे, अवैध सम्बन्ध रखे. घर में मारपीट करे तो क्या संतान की इज्जत नहीं जाती? आपने हिंसा को खासकर परिवार में होने वाली हिंसा को इतना सामान्य मान लिया है कि आप उसे समस्या मानते ही नहीं जबकि स्त्री का संघर्ष बचपन से ही छोटी – छोटी बातों से ही आरम्भ हो जाता है। पहले उसका आहार, उसकी शिक्षा, उसकी नौकरी, उसके जीवनसाथी चुनने का मामला, हर चीज परिवार की इच्छा और रिश्तेदारों एवं समाज पर छोड़ दिया जाना और उनके हिसाब से लड़की के लिए नियम -कायदे एवं कानून बनाना ही हिंसा का रूप है। इसकी आड़ में बड़ी से बड़ी साजिशों को अंजाम दिया जाता है। बहुत सी स्त्रियां 498 ए का दुरुपयोग कर रही हैं और अपने से बेहतर हर स्त्री को पीछे रखने के लिए वह किचन पॉलिटिक्स का सहारा ले रही हैं। मैं निजी अनुभवों से ऐसे कई मामले जानती हूँ जहाँ जेठानी के कारण देवरानी को किसी प्रकार की आर्थिक सहायता बंद कर दी गयी। घर के राशन से लेकर बच्चों की फीस के लिए स्त्री निर्भर होती है, खासकर जब उसका पति कम कमाता हो या फिर वह न हो। घर की बेटियों की पढ़ाई छुड़वाने में घर की किसी मां, भाभी या बहन का हाथ हो सकता है। यह मनोवैज्ञानिक उत्पीड़न सारा आत्मविश्वास ही छीन लेता है और उत्पीड़न का यह ऐसा स्वरूप है जिस पर कोई बात ही नहीं करना चाहता। माएं अपने बेटों को खुली छूट देती हैं कि वह अपनी बहनों के साथ मारपीट करे, उसकी चीजें छीनें…यहां तक कि घर की छोटी से छोटी कील लगाने के लिए उसे जबरन भाइयों पर निर्भर बनाया जाता है कि वह छोटी है तो क्या यह हिंसा नहीं है। बहनों के दुप्पटे से लेकर उसकी शिक्षा तक, हर फैसले में जब ऐसी दखलन्दाजी रहेगी तो स्त्री के व्यक्तित्व का विकास कैसे हो सकेगा और कैसे वह अपने लिए खड़ी हो सकेगी? हर साल 25 नवम्बर को महिलाओं पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस मनाते हैं। कार्यक्रम होते हैं, भाषणबाजी होती है, पोस्टर लगते हैं मगर जब तक बुनियाद सही नहीं होगी तब तक समाधान की उम्मीद बेमानी है। बहरहाल बात आज महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा पर ही करते हैं –
अंतराष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस का इतिहास – पैट्रिया मर्सिडीज मिराबैल, मारिया अर्जेंटीना मिनेर्वा मिराबैल और एंटोनिया मारिया टेरेसा मिराबैल द्वारा डोमिनिक शासक रैफेल टुजिलो की तानाशाही का कड़ा विरोध किए जाने पर उस क्रूर शासक के आदेश पर 25 नवंबर 1960 को उन तीनों बहनों की हत्या कर दी गई थी। साल 1981 से उस दिन को महिला अधिकारों के समर्थक और कार्यकर्ता उन्हीं तीनों बहनों की मृत्यु की पुण्यतिथि के रूप में मनाते आए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 17 दिसंबर 1999 को एकमत से हर साल 25 नवंबर का दिन ही महिलाओं के खिलाफ अंतराष्ट्रीय हिंसा उन्मूलन दिवस के रूप में मनाने के लिए निर्धारित किया गया।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों में एक-तिहाई पति और रिश्तेदारों की क्रूरता से जुड़े – सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) की तरफ से किए गए राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, 2016 से 2021 के बीच महिलाओं के खिलाफ लगभग हर तीन में से एक अपराध उसके पति और/या उसके रिश्तेदार की ‘क्रूरता’ से जुड़ा था । इस माह के शुरू में एमओएसपीआई की ‘वीमेन एंड मेन इन इंडिया 2022’ रिपोर्ट में प्रकाशित निष्कर्ष बताते हैं कि पति और उनके रिश्तेदारों की तरफ से क्रूरता देश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा का सबसे आम रूप है । 2016 से 2021 के बीच 6 साल की अवधि में देश में भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 22.8 लाख मामले दर्ज हुए. रिपोर्ट में बताया गया है कि इनमें से लगभग 7 लाख यानी करीब 30 प्रतिशत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत दर्ज किए गए थे। धारा 498ए किसी महिला के खिलाफ पति या उसके रिश्तेदारों की क्रूरता से संबंधित हैं. इसमें ‘क्रूरता’ को किसी ऐसे इरादतन आचरण के रूप में परिभाषित किया गया है जिससे ‘महिला के आत्महत्या जैसा कदम उठाने या गंभीर चोट पहुंचने अथवा किसी शारीरिक अंग या स्वास्थ्य (चाहे मानसिक या शारीरिक) के लिए खतरा उत्पन्न होने की संभावना हो.’
इसके अलावा क्रूरता को ‘महिला के उत्पीड़न….किसी भी संपत्ति या मूल्यवान चीज के लिए किसी भी गैरकानूनी मांग को पूरा करने के लिए उसे या उससे संबंधित किसी भी व्यक्ति को मजबूर किए जाने या उसके या उससे संबंधित किसी व्यक्ति के ऐसी मांग पूरी करने में नाकाम रहने पर प्रताड़ित किए जाने’ से जोड़कर भी देखा जाता है। ध्यान रहे कि दोषी पाए जाने पर आरोपी को तीन साल तक जेल की सजा हो सकती है और जुर्माना भी लगाया जा सकता है । एमओएसपीआई रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि अध्ययन वाले छह वर्षों में से प्रत्येक में 498ए के तहत दर्ज मामले महिलाओं के खिलाफ अन्य सभी अपराधों में सबसे ज्यादा थे यानी बलात्कार और यौन उत्पीड़न से मामलों में भी कहीं ज्यादा।
आगे बात करें तो 2016 से 2021 की इस अवधि के दौरान, देश में आईपीसी की धारा 354 के तहत 5.2 लाख मामले दर्ज किए गए ।‘महिलाओं के शील भंग करने के इरादे से किए गए हमले’ संबंधी इस धारा के तहत दर्ज मामले महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े कुल मामलों में से 23 फीसदी हैं। महिलाओं के खिलाफ अगला सबसे आम अपराध अपहरण और बंधक बनाना है और लड़कियों को उनके ही घर में बंधक बनाया जाता है, यह एक सच है। जिसमें 4.14 लाख घटनाओं के साथ औसतन 18 फीसदी मामले दर्ज किए गए. इन छह साल में भारत में बलात्कार के लगभग 1.96 लाख मामले दर्ज किए गए, जो 2016-2021 में महिलाओं के खिलाफ कुल अपराधों में लगभग 8.6 प्रतिशत थे.
498ए मामलों में अपराध दर की बात करें तो असम चार्ट में सबसे ऊपर है। राज्य में 2021 में 498ए के तहत करीब 13,000 मामले दर्ज किए गए. यह आंकड़ा राज्य में प्रति एक लाख महिला जनसंख्या पर 75 मामले होते हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ क्राइम एंड सिक्योरिटी साइंसेज (आईआईसीएसएस), बेंगलुरु के प्रमुख निदेशक प्रोफेसर के. जयशंकर के अनुसार बड़ी संख्या में अपराधों का पता ही नहीं लग पाता क्योंकि ये जाति, संस्कृति, पितृसत्ता, पुलिस और समाज का डर आदि विभिन्न कारणों से रिपोर्ट नहीं किए जाते. एक स्वतंत्र थिंक टैंक या किसी अकादमिक निकाय की तरफ से अपराध पीड़ितों पर एक समग्र सर्वेक्षण किए जाने की जरूरत है।
लॉकडाउन में और बढ़ा उत्पीड़न – राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने मुताबिक साल 2020 में कोरोना महामारी के कारण राष्ट्रीय तालाबंदी के महीनों के रूप में चिन्हित एक साल में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ पारंपरिक अपराधों में कमी आई लेकिन देश में अपराध के मामले 28 प्रतिशत बढ़ गए। हालांकि लॉकडाउन के बाद महिलाओं और बच्चों के खिलाफ आपराधिक मामलों में तेजी आई है। एनसीआरबी के अनुसार देशभर में 2020 में यौन शोषण के रोजाना औसतन 77 मामले दर्ज किए गए और कुल 28,046 मामले सामने आए। दुनियाभर में पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 3,71, 503 मामले दर्ज किए गए, जो 2019 में 4,05,326 और 2018 में 3,78,236 थे।
वर्क फ्रॉम होम में भी नहीं थमे अपराध के मामले – एनसीआरबी के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली में 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 10,093 मामले दर्ज किए गए, जबकि 2019 में ऐसे 13,395 मामले सामने आए थे यानी 2019 की तुलना में 2020 में महिलाओं के खिलाफ 24.65 फीसदी अपराध कम हुए। कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण जब देश की अधिकांश आबादी अपने घरों में थी, स्कूल-कॉलेज बंद थे, वर्क फ्रॉम होम चल रहा था, ऐसे में भी 2020 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 10,093 मामले सामने आना कम चिंताजनक नहीं है। 2020 में दिल्ली में महिलाओं के अपहरण के 2,938 यौन शोषण के प्रयास के 9 और यौन शोषण या सामूहिक यौन शोषण के बाद हत्या का एक मामला दर्ज किया गया। इस दौरान देशभर में साइबर अपराध 2019 के मुकाबले 11.8 फीसदी बढ़ा है।
सेहत के लिए घातक है उत्पीड़न – सबसे पहले समझिए कि उत्पीड़न सिर्फ शारीरिक नहीं होता, मानसिक और वाचिक भी होता है। स्त्री को कुछ न कहना और उसे दरकिनार कर देना….यह सबसे बड़ा उत्पीड़न है। आर्थिक स्तर पर उसे बाध्य करना कि वह मांगती ही रहे, यह आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाना है। भारतीय परिवारों में उत्पीड़न का यह सामान्य तरीका है जिससे पढ़ने वाली लड़कियां जूझती हैं। परीक्षा के दौरान फीस रोक देना और उसे पैसे देकर नाकारा साबित करना यह आम बात है जहां पैसे तो मिल जाते हैं पर उसका ब्याज उसे कमतर साबित कर और तानों से रक्तरंजित कर वसूला जाता है। अगर किसी महिला ने किसी तरह की मारपीट या यौन हिंसा का अनुभव किया हो, तो उनके मन में कई तरह की भावनाएं वि​कसित हो जाती हैं, जैसे- डर लगना, कन्फ्यूजन महसूस होना, गुस्सा आना या फिर पूरी तरह से सुन्न हो जाना और कुछ भी महसूस न कर पाना. इसके अलावा हमला और हिंसा झेलने वाली महिलाओं को कई बार खुद में शर्मिंदगी और अपराधबोध भी महसूस होने लगता है.
मानसिक बीमारियां होने का खतरा – महिलाओं में कई तरह की मानसिक बीमारियां विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है जैसे: पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी): किसी तरह की यौन हिंसा या शारीरिक दुर्व्यवहार की वजह से व्यक्ति को ट्रॉमा, खौफनाक या डरावना अनुभव महसूस हो सकता है और इसी वजह से पीटीएसडी की समस्या हो सकती है। पीटीएसडी की वजह से पीड़ित महिला, आसानी से चौंक जाती है, चिंता या तनाव महसूस करती हैं, हर वक्त सतर्क रहती हैं, उन्हें सोने में दिक्कत महसूस होती है या फिर बहुत अधिक गुस्से का अनुभव करती हैं। कई बार महिलाओं को मारपीट कर अकेला छोड़ दिया जाता है । जब उसके पास बात करने के लिए कोई न हो और वह लगातार प्रताड़ित होती रहे तो वह अवसाद में चली जाती है और एक समय आता है जब पागल हो जाती है। क्रूरता ऐसी होती है कि तब उसे मानसिक उपचार की जगह ताने मिलते हैं..य़ह एक गम्भीर अपराध है मगर इस तरह के अपराधों के लिए किसी प्रकार का स्पष्ट कानून नहीं है।
अवसाद – महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा से जुड़े अध्ययनों की मानें, तो सामान्य महिलाओं की तुलना में शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार महिलाओं में डिप्रेशन का खतरा 3 गुना अधिक होता है. हर वक्त उदासी महसूस होना, जो भी हुआ उसके लिए खुद को दोषी मानना इस तरह की चीजें लगातार सोचने की वजह से उनके मन में आत्महत्या का ख्याल भी बार-बार आने लगता है ।
एंजाइटी – आसपास जो भी हो रहा है उससे जुड़ी सामान्य चिंता भी हो सकती है, या फिर अचानक पीड़ित महिला को बहुत अधिक डर महसूस हो सकता है, जिसे एंजाइटी अटैक कह सकते हैं. कई बार एंजाइटी की यह समस्या धीरे-धीरे समय के साथ बदतर होने लगती है और व्यक्ति के दैनिक जीवन में भी हस्तक्षेप करने लगती है. इस तरह की चीजों का अनुभव करने पर भी उसे खुद तक सीमित रखने की बजाए डॉक्टर से बात करनी चाहिए वरना, इसका मानसिक सेहत पर गंभीर असर देखने को मिल सकता है ।
(स्त्रोत – द प्रिंट में प्रकाशित रिपोर्ट)

सेनको गोल्ड एंड डायमंड्स के आभूषणों से सजी चंदननगर के हेलापुकुर जगद्धात्री पूजा की प्रतिमा

गैलरी गोल्ड में आयोजित हुई स्ट्रोक्स एंड स्ट्राइक्स प्रदर्शनी

कोलकाता । उभरते हुए कलाकारों को प्रोत्साहित करने के लिए सेनको गोल्ड एंड डायमंड्स ने सातवीं स्ट्रोक्स एंड स्ट्राइक्स प्रदर्शनी को सहायता दी। गैलरी गोल्ड में यह प्रदर्शनी 17 से 19 नवम्बर तक चली। गैलरी गोल्ड की संरक्षक जोइता सेन ने कहा कि यह प्रदर्शनी उभरते कलाकारों को बढ़ावा देने के लिए है और इस बार प्रदर्शनी में 26 कलाकारों, मूर्तियों और प्रिंट निर्माताओं ने भाग लिया । गैलरी गोल्ड न केवल पारंपरिक और सार्थक कलाकारों के लिए एक मंच है, बल्कि यह शारीरिक रूप से अक्षम व्यक्तित्वों/कलाकारों के लिए भी एक जगह है । गैलरी गोल्ड की संरक्षक शुभंकर सेन ने कहा कि गैलरी गोल्ड सभी कला प्रेमियों के लिए कला का एक स्थान है, और ये कार्यक्रम दर्शकों, समान विचारधारा वाले विचारकों और गैलरी के बीच एक इंटरफ़ेस के रूप में कार्य करते हैं।

आईआईटी खड़गपुर में दिखे रोशनी के सजीले रंग

खड़गपुर । आईआईटी खड़गपुर ने दिवाली को रोशनी के रंग से सजाया। हर साल की तरह इल्यूमिनेशन आयोजित किया गया जो संस्थान की विरासत और धरोहर का महत्वपूर्ण अंग है। आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को प्रोत्साहित करते हुए स्थानीय विक्रेताओं जैसे दीया बनाने वालों, कारीगरों और अन्य विक्रेताओं को भी काफी लाभ मिला और विद्यार्थियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया । हर साल, हम प्रत्येक हॉल के छात्रों को “चटाई” बनाने, दीये जोड़ने और विस्तृत कलाकृतियाँ बनाने के लिए एक साथ काम करते हुए देखते हैं। इसका विस्तार विभिन्न हॉलों के बीच पारंपरिक रंगोली प्रतियोगिता तक भी होता है और इस बार भी अनोखी रंगोली दिखाई पड़ी। रंगोली, जीवंत रंगों का मिश्रण, पौराणिक कथाओं, सांस्कृतिक प्रतीकों और जटिल ज्यामितीय पैटर्न के दृश्यों को दर्शाती है। इस प्रक्रिया में एक-दूसरे के साथ एक अविभाज्य बंधन विकसित करते हुए, वरिष्ठ और कनिष्ठ पैनल और भित्तिचित्रों के माध्यम से शानदार विषयों को व्यक्त करने के लिए सहयोगात्मक रूप से काम करते हैं। रोशनी आईआईटी खड़गपुर की संस्कृति और सहकर्मी-संबंध का एक अनिवार्य हिस्सा है। रोशनी अविस्मरणीय यादों और पुरानी यादों का अवतार है जो हर केजीपी वासी के दिल में गहराई से बसी रहती है – जिसे आने वाले वर्षों तक याद किया जाएगा और संजोया जाएगा।

जो पढ़ेगा, वही रचेगा और जो रचेगा, वही टिकेगा

साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में डॉ. एस. आनंद एक सुपरिचित व्यक्तित्व हैं। कोलकाता की पत्रकारिता में इन्होंने अनेकों पत्रकारों को अपने ज्ञान, अनुभव से सींचा है, खड़ा किया । डॉ. एस. आनन्द पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 50 वर्षों से सक्रिय हैं। उनको साहित्य एवं पत्रकारिता का समन्वय करने के लिए जाना जाता है। महानगर के कई अग्रणी समाचार पत्रों में कार्य करते हुए वे नियमित स्तम्भ लेखन, विशेषकर व्यंग्य लेखन के लिए जाने जाते हैं। लस्टम– पस्टम पाठकों में बहुत लोकप्रिय रहा है। देश की चर्चित पत्रिकाओं में इनकी रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। है। शुभ सृजन नेटवर्क का सृजन सारथी सम्मान- 2023 महानगर के वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार डॉ. एस. आनन्द को दिया जा रहा है। शुभजिता ने सृजन सारथी डॉ. एस. आनंद से विशेष बातचीत की, प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश – 
प्र. पत्रकारिता और साहित्य, दोनों से आपका जुड़ाव रहा है, आमतौर पर इन दोनों को एक दूसरे के सामने खड़ा कर देने की परिपाटी रही है, आपका दृष्टिकोण क्या है? 
पत्रकारिता और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं। बिना एक के दूसरे का अस्तित्व ही नहीं, ऐसा मेरा मानना है।  चार दशकों पूर्व मैंने वाराणसी से प्रकाशित संसार हिन्दी दैनिक में यह मंजर अपनी आंखों से देखा था जहां बहुत सारे साहित्यकार उस समाचार पत्र में काम करते थे। प्रूफ संशोधन से लेकर समाचार लेखन, फीचर सब कुछ उनके ही जिम्मे था। अपने समय का सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखबार था। इसके बंद होने के बाद  इसी टीम के अधिकांश पत्रकार  ‘आज’ हिन्दी दैनिक में आ गये और उसे परवान चढ़ाया।। बनारस के जाने माने कवि और हास्य व्यंग्य लेखक मोहन लाल गुप्त ( भैया जी बनारसी) ने एक साहित्यिक गोष्ठी में कहा था – एक अच्छा पत्रकार एक उम्दा साहित्यकार होता है क्योंकि बिना साहित्य को जाने किसी भी विधा में सृजन नामुमकिन है। साहित्य से हमें नये शब्द मिलते हैं, नयी संवेदनाएं जाग्रत होती हैं जिनका उपयोग कर हम समाचारों को संवेदनशील और मानवीय बना सकते हैं। जैसे दाल के बिना भात खाने में मजा नहीं आता वैसे ही बिना साहित्यिक ज्ञान के समाचारों का उम्दा प्रस्तुतीकरण नहीं कर सकते।
प्र. 50 वर्षों से आप हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय हैं, इन 50 वर्षों में आप क्या परिवर्तन देखते हैं?
पेट प्रबल होता है और उससे भी प्रबल है उसे पालने की जद्दोजहद। जमाना महंगा है और जीवनयापन की समस्या दिन -प्रतिदिन भयंकर ही होती जा रही है।  पाव भर पसीने की कीमत चंद पैसे ही मिलते हैं। साहित्य में मनोरंजन करने,उस पर सहानुभूति प्रकट करने और उससे प्रेम रखने के लिए न तो हमारे पास समय है और न ही सामर्थ्य क्योंकि हमारे समक्ष है जीविका की विकट समस्या। हमारा पहला कर्तव्य है किसी प्रकार जीवित रहना। जीवन पहले है, साहित्य पीछे। परन्तु मनुष्य मात्र में अन्तर की अभिव्यक्ति के लिए एक आकुलता अनादिकाल से रही है,वह अपने को बहुत लोगों में प्रतिष्ठित करने के लिए व्याकुल रहता है। इसे ही कहते हैं – साहित्य का आवेग। उसमें एक और व्यग्रता होती है, वह यह कि वह बहुतों के अन्तर के निगूढ़तम भावों का जानकार हो, बहुतेरे हृदय से उसका परिचय हो-वह है साहित्य प्रेम। फलत:  साहित्य न केवल आत्मा का दर्पण, हृदय का प्रतिबिंब और जीवन का चित्र है बल्कि वह स्वयं आत्मा है, हृदय है, जीवन है।
प्र. नवजागरण काल में पत्रकारिता के पीछे एक मिशनरी भाव रहता था, आज भी लगभग 200 साल बीत जाने के बाद भी यही उम्मीद बनी हुई है, वर्तमान समय में इसे बनाए रखना कहां तक सम्भव ह?
पत्रकारिता और साहित्य का सम्बन्ध मेरे हिसाब से  दाल में घी जैसा होता है। पत्रकारिता मिशन हैं तो साहित्य उस मिशन में चार चांद लगाने का एक यंत्र है। जैसे बिना अक्षर ज्ञान के शब्दों को या वाक्यों को लिखना नामुमकिन है वैसे ही साहित्य से विलग होकर समाचार तो लिखे जा सकते हैं मगर उसमें वह प्रवाह और रवानी नहीं होगी जो एक सुधी पाठक के लिए आवश्यक होती है। आज तो ऐसे- ऐसे पत्रकार आ गये हैं जिन्हें न तो व्याकरण का पता है और न ही इमले का। वचन, लिंग, क्रिया की तो बात ही छोड़ दीजिए। दरअसल, युग बदल गया, पत्रकारिता का मिशन बदल गया। पहले पत्रकारिता देश, समाज और मानवीय उत्कर्ष के लिए की जाती थी ,आज वह एक व्यापार बन गयी है। पत्रकारिता को पैसे कमाने की मशीन मान लिया गया है। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं?यह पेशा आज पूंजीपतियों के हाथ की कठपुतली बन  गया है। जहां तक बात निष्पक्ष पत्रकारिता की है तो मेरा यही कहना है, बकौल बशीर बद्र –
बड़े प्यार से मेरा घर जला
कभी आंच तुम पे न आयेगी
ये जुबां किसी ने खरीद ली
ये कलम किसी की गुलाम है।

प्र. पत्रकारिता और साहित्य का समन्वय किस प्रकार किया जा सकता है?

इन दिनों साहित्यिक पत्रकारिता समस्याग्रस्त है। सबसे बड़ी समस्या है बिक्री और पठनीयता की। अब समाचार पत्र खरीद कर पढ़ने वाले बहुत कम हो गये हैं। एक समय था कि ‘मतवाला’ के प्रकाशन के दिन पाठक प्रेस को घेरकर खड़े हो जाते थे। लखनऊ से ‘माधुरी’ पत्रिका लगभग सात दशकों तक  ग्राहकों के बल पर चलती रही है। प्रेमचंद, पंडित रूपनारायण पांडेय और डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र ने इसकी वस्तु सज्जा में अकूत श्रम किया था। आज के पत्र-पत्रिकाएं प्राय: संपादक या मालिक की अखाड़ेबाजी अथवा आइडियोलॉजी या वर्णनामूलक सनक अथवा छद्म बौद्धिकता की शिकार हो गयी है।
साहित्यिक पत्रकारिता के लिए आवश्यक है कि वह पाठकीय प्रवृत्ति का परिष्कार करे। जन साधारण से संवाद स्थापित करके मोहक शैली में उसे पेश करे और यह तभी संभव है जब पत्रकार साहित्यिक प्रतिभा से लबरेज हो। इमला, वर्तनी, व्याकरण का अच्छा ज्ञान हो तथा उसके पास शब्द भंडार हो क्योंकि बिना परिष्कृत और सरल शब्दों के वह अपना प्रस्तुतीकरण सही ढंग से नहीं कर सकता इसलिए पत्रकारिता में साहित्य का समन्वय जरूरी है।

प्र. 50 वर्षों की यात्रा को आप किस प्रकार देखते हैं…स्मृतियों में जाकर? आज के युवा पत्रकारों के बारे में आपकी क्या राय है?

जहां तक मेरा कार्यानुभव कहता है कि वो दिन गुजर गए जब पसीने गुलाब थे। पहले पत्रकारों की नियुक्ति उसकी शैक्षिक योग्यता, साहित्यिक दक्षता और कार्यानुभव को देखकर की जाती थी किन्तु आज जिसने कंप्यूटर ,पेज मेकिंग  तथा कट-पेस्ट की जानकारी हासिल कर ली, वह संपादक हो जाता है और ऐसी स्थिति में आप उनसे स्वस्थ पत्रकारिता की आशा नहीं कर सकते। अनुवाद की शैली भी तभी ठीक होगी जब आपके पास शब्दों का संग्रह होगा। शब्द की तीन शक्तियां होती हैं -अमिधा, लक्षणा और व्यंजना, यह बात कितनों को मालूम है? उपसर्ग और प्रत्यय के बारे में कितने लोग जानते हैं? और यही कारण है कि चाहे अखबार हो या न्यूज चैनल सभी -सशक्तिकरण,  तुष्टिकरण लिख रहे हैं जो ग़लत है। व्याकरण ज्ञान न होने से ऐसी गलतियां होती हैं फिर भी संपादकों और मालिकों को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे अखबार या पत्रकारिता को मिशन नहीं व्यापार समझते हैं और इसी से पत्रकारिता में क्षरण आ रहा है।
6. आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?
मैं बहुत छोटा और अदना सा साहित्यकार हूं, मैं किसी को क्या संदेश दूंगा? मै तो आज भी सीख रहा हूं फिर भी इतना जरूर कहूंगा कि जो पढ़ेगा, वही रचेगा और जो रचेगा, वही टिकेगा।

भवानीपुर कॉलेज ने मनाया इंट्रा कॉलेज एथलेटिक मीट ऊर्जा 2023 

कोलकाता । गीतांजलि स्टेडियम में भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के छात्र- छात्राओं ने इंट्रा एथलेटिक मीट ऊर्जा 2023 के अंतर्गत स्पोर्ट्स और एथलीट्स के प्रदर्शन, कॉरनिवाल फेस्ट और फनफेयर रहा। 22 नवंबर को उद्घाटन समारोह में कॉलेज के अध्यक्ष रजनीकांत दानी और रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने मशाल प्रज्वलित कर खेल का आरंभ किया। 50 विद्यार्थियों ने समूह नृत्य से खिलाडियों का उत्साहवर्धन किया। साथ में, कॉलेज के डायरेक्टर जनरल डॉ सुमन मुखर्जी, मैनेजमेंट पदाधिकारियों में जीतू भाई, उमेद ठक्कर और प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो समीक्षा खंडूरी, डॉ वसुंधरा मिश्र, प्रो विवेक पटवारी, प्रो चंदन झा, प्रो दर्शना त्रिवेदी और बड़ी संख्या में वोलिंटियर्स विद्यार्थियों  आदि की उपस्थिति रही। डॉ सुमन मुखर्जी ने स्वामी विवेकानंद के शब्दों द्वारा बच्चों को खेल के प्रति जागरूक किया। प्रो दिलीप शाह ने सभी विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए कॉलेज के खेल में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया। कॉलेज के 300 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। सौ – दो सौ – चार सौ रेस, डिस्कस थ्रो, शार्ट पुट, रिले रेस, जेवलिन थ्रो आदि विभिन्न स्पोर्ट्स में कई बैचों में लड़कियों और लड़कों ने अपने अपने शानदार प्रदर्शन किया। खाने, पीने और स्नेक्स आदि के 13 स्टॉल लगाए गए जो विद्यार्थियों ने लगाए।एनसीसी के कैडटों ने मार्चपास्ट किया और तिरंगे को सलामी दी। मार्चपास्ट में कॉलेज के 17 कलेक्टिव के विद्यार्थियों ने अपने-अपने झंडे के साथ सलामी दी। फ्लेम, क्रिसेंडो, इन एक्ट, सेतु, बुलशाई, फैशनिस्टा, सेल्युलायड, एक्सप्रेशन, एनसीसी, एन एस एस आदि सभी के विद्यार्थियों ने पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाते हुए झंडे को सलामी दी। । 100 और 200 मीटर रेस में प्रथम द्वितीय और तृतीय स्थान पर आने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। शिक्षकों और नॉन टीचिंग स्टाफ ने भी रेस में हिस्सा लिया जिसमें चंदन झा, विवेक पटवारी, दर्शना त्रिवेदी ने अच्छा प्रदर्शन किया।अंत में, सांस्कृतिक कार्यक्रम संगीतज्ञ सौरभ गोस्वामी के बैंड द्वारा किया गया। सभी विजयी विद्यार्थियों को उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त वालों को मेडल ट्राफी और सर्टिफिकेट देकर पुरस्कृत किया गया।  सर्वश्रेष्ठ मेल और फीमेल ट्राफी प्रदान की गई। स्पोर्ट्स के  रूपेश गांधी का प्रमुख सहयोग रहा। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज पहुंचे अभिनेता विक्की कौशल

कोलकाता । प्रसिद्ध गीत ‘माथे पे तिलक जय हिंद लगा वो मेरी निशानी है’ फिल्म ‘सैम बहादुर’ के लोकप्रिय अभिनेता विक्की कौशल का स्वागत भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने किया।विक्की कौशल एक भारतीय अभिनेता हैं जिन्हें 2015 में पुरस्कार विजेता फिल्म मसान में उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है,उरी सर्जिकल स्ट्राइक में विक्की कौशल ने एक सैनिक की भूमिका निभाई थी जिसमें बेस्ट एक्टर का अवार्ड मिला था। सैम बहादुर फिल्म में विक्की कौशल ने मानेकशॉ का जबर्दस्त अभिनय किया है जो रिलीज होने वाली है। फिल्म सैम बहादुर फिल्म के प्रोमो के लिए विक्की कौशल भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी में आए और अपनी फिल्म के प्रोमो को विद्यार्थियों के साथ देखा जो एक दिसम्बर को रीलिज होगी।
यह फिल्म फील्ड मार्शल सैम बहादुर यानि सैम हॉरमुसजी फेम जी जमशेद जी मॉनेक शॉ की बायोपिक पर बनी है। इस फिल्म की निर्देशक मेघना गुलजार हैं। बड़ी संख्या में उपस्थित विद्यार्थियों ने गीतों का आनंद लिया। तू मेरा कोई ना अपना बना ले पिया, फलक से चांद लाऊंगा, वेवफा झूठा प्यार, आदि पंजाबी की कई गीतों की धुन पर सभी छात्र छात्राएँ थिरकते रहे। कॉलेज के मैनेजमेंट के पदाधिकारियों, रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह और उपाध्यक्ष मिराज डी शाह, शिवानी डी शाह, सोहिला भाटिया ने विक्की कौशल का स्वागत किया ।छात्राओं ने विक्की कौशल का पोट्रेट देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर कॉलेज के फ्लेम और इन एक्ट कलेक्टिव ने विक्की कौशल की फिल्मों से विभिन्न नृत्य और सैन्य नाट्य प्रस्तुति दी । मेरा हीरो विक्की विक्की चिल्लाते हुए जोरशोर से हर कदम पर जोश दिखाया जिसे विक्की कौशल ने बहुत पसंद किया ।
विक्की कौशल ने बताया कि इस फिल्म में सभी सैनिक वास्तविक हैं और इसके लिए उन्होंने कहा कि भारतीय सेना को सैल्यूट किया साथ में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने भी किया। फील्ड मार्शल का पद धारण करने वाले सैम बहादुर पहले भारतीय सैन्य अधिकारी थे। मानेकशॉ सैम बहादुर नाम से प्रसिद्ध हुए। सैम बहादुर 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय सेना अध्यक्ष थे और फील्ड मार्शल का पद धारण करने वाले पहले भारतीय सैन्य अधिकारी थे। सैम बहादुर का सैनिक करियर द्वितीय विश्व युद्ध से आरंभ होकर चार दशकों और पांच युद्ध तक विस्तृत रहा।
विक्की कौशल ने विद्यार्थियों के साथ अपनी सेल्फी और बातें शेयर की। यह कार्यक्रम भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के टर्फ पर हुआ।रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी समीक्षा खंडूरी और वोलिंटियर्स विद्यार्थियों द्वारा यह कार्यक्रम बहूत ही कम समय में आयोजित किया गया। इसकी जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

5वीं विश्व शतरंज बॉक्सिंग चैंपियनशिप में भवानीपुर कॉलेज ने जीते कांस्य पदक 

इटली में आयोजित हुई थी प्रतियोगिता

कोलकाता । इटली में आयोजित पांचवीं विश्व शतरंज बॉक्सिंग चैंपियनशिप भारतीय चेसबॉक्सिंग टीम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया।  शतरंजबॉक्सिंग एक अनोखा और दिलचस्प खेल है जो शतरंज की बौद्धिक चुनौती को मुक्केबाजी की भौतिक मांगों के साथ जोड़ता है। यह खेल शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से भी फिट रहने के लिए प्रेरित करता है। 5वीं विश्व शतरंजबॉक्सिंग चैंपियनशिप 28 अक्टूबर से 2 नवंबर 2023 तक रिकसिओन, इटली में आयोजित की गई थी। चेसबॉक्सिंग के इतिहास में यह भव्य चैंपियनशिप उल्लेखनीय है इसलिए है कि विश्व में चेसबॉक्सिंग के 20 साल पूरे होने का जश्न मनाया गया।
भारतीय शतरंज मुक्केबाजी संगठन के संस्थापक और अध्यक्ष मोंटू दास के नेतृत्व में टीम इंडिया ने इस मेगा आयोजन में भाग लिया।प्रेरित टीम ने विभिन्न चेसबॉक्सिंग स्पर्धाओं में 2 स्वर्ण, 4 रजत और 6 कांस्य पदक जीते। सेंचुरी प्लाईबोर्ड्स इंडिया लिमिटेड के कर्मचारी और प्रायोजित आशुतोष कुमार झा ने सीनियर पुरुष -95 किलोग्राम वर्ग में दो कांस्य पदक जीते। भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज की छात्रा और प्रायोजित खुशी लाकड़ा ने सीनियर महिला -70 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता।किंग्शुक साहा ने सीनियर पुरुष -60 किग्रा वर्ग में रजत पदक जीता।नोंगशा सिंह ने सीनियर पुरुष -75 किग्रा वर्ग में एक रजत और एक कांस्य पदक जीता। एमएस प्रतिभा थक्कड़पल्ली ने सीनियर महिला -48 किग्रा वर्ग में स्वर्ण पदक जीता। स्नेहा संजय वायकर ने सीनियर महिला -55 किग्रा वर्ग में दो रजत और एक स्वर्ण पदक जीता, माधवी रामचन्द्र गोनबारे ने सीनियर महिला -50 किग्रा वर्ग में दो रजत पदक जीते। पिछले लगातार वर्षों में भारत ने समग्र रूप से सभी चैंपियन ट्रॉफी जीतता आ रहा  और भी मजबूत वापसी की उम्मीद रही है। जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर  एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने सीए संस्थान आईसीएआई से मिलाया हाथ

 कोलकाता ।  भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज और आईसीएआई के बीच दिनांक एक नवंबर 2023 को  एम ओ यू पर हस्ताक्षर किए गए जो कॉलेज के लिए एक ऐतिहासिक दिन रहा।विशेष रूप से सीए विशाल दोषी अध्यक्ष बोर्ड ऑफ़ स्टडीस एकेडमिक आईसीएआई,सीए सुशील कुमार गोयल सेंट्रल काउंसिल मेंबर, आई सी ए आई, सीए देवयान पात्रा अध्यक्ष ईआईआरसी आईसीएआई, सीए विष्णु कुमार तुलस्यान  सेक्रेटरी ईआईआरसी, आईसी ए आई, सीए मयूर अग्रवाल ट्रेजरर, ईआईआरसी, आईसीएआई की उपस्थिति में भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के साथ एम ओ यू पर हस्ताक्षर किए।
आई सी ए आई के विशिष्ट अतिथि सीए विशाल दोशी ने कहा कि सीए सीएस के पाठ्यक्रम में अब पांच साल से अपडेट कर रहे हैं। विद्यार्थियों के लिए हम हर प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं जैसे अॉन-लाइन सारांश जर्नल उपलब्ध है जो विद्यार्थियों को परीक्षा की तैयारी में मदद करेगा। देश भर के सीए पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए हम बेहतर कार्य कर रहे हैं।
सीए सुशील कुमार गोयल ने वर्तमान भारत की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत में विकास करने के लिए ये दस साल बहुत महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों को इसका लाभ लेना चाहिए।
सीए देबायन पात्रा ने कहा कि लक्ष्मी के बिना फाइनेंस विकसित नहीं हो सकता। आज कॉमर्स के विद्यार्थियों की अधिक आवश्यकता है। यह एग्रीमेंट विद्यार्थियों को नई दिशा प्रदान करने में सहायक होगी।
भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने अपने वक्तव्य में कहा कि भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज में लगभग आठ हजार से अधिक कॉमर्स के विद्यार्थी हैं। आई ए एस आई के साथ एमओयू करने से विद्यार्थियों को और फैकल्टी दोनों को ही लाभकारी होगा। कॉलेज में कॉमर्स की 15 फैकल्टी सीए हैं।
करियर के क्षेत्र में विद्यार्थियों को इस एमओयू एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।कार्यक्रम का उद्घाटन सीए विशाल दोशी और, सीए सुशील कुमार गोयल, सीए देबायन पात्रा सीए विष्णु कुमार तुलस्यान, सीए मयूर अग्रवाल के साथ कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह,टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय,डॉ पिंकी साहा सरदार, प्रो सस्पो चक्रवर्ती, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी दीप प्रज्वलित करके किया गया।
सीए विशाल दोशी को कॉलेज के टीआईसी डॉ सुभब्रत गंगोपाध्याय ने उत्तरीय और मोमेंटो देकर सम्मानित किया। सभी विशिष्ट अतिथियों का स्वागत किया गया। यह समझौता ज्ञापन एक शिक्षाविद संस्थान को पेशेवर निकाय यानी आईसीएआई के करीब लाएगा। आने वाले दिनों में हम अपने छात्रों को वाणिज्य के विभिन्न क्षेत्रों में पेशेवर कौशल से समृद्ध करने में सक्षम होंगे। हम शिक्षा में उन्नति के लिए संकाय का आदान-प्रदान करने में भी सक्षम हो सकते हैं। इसके द्वारा एक अतिरिक्त पहल के रूप में संकाय विकास कार्यक्रम भी शुरू किया जा सकता है। शायद हम लेखापरीक्षा और लेखांकन के दायरे को बढ़ाने के लिए अनुसंधान की संभावनाएं भी तलाश सकते हैं। कुल मिलाकर दोनों संस्थान ऐसी पहलों के माध्यम से शिक्षा में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना चाहेंगे।
इस अवसर पर बॉस सेंट्रल काउंसिल के अध्यक्ष और आईसीएआई के कई अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में बॉस की ओर से कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी प्रो मोहित साव, प्रो विवेक पटवारी को संस्थान ने सम्मानित किया।
कार्यक्रम का संचालन किया प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने और धन्यवाद ज्ञापन दिया प्रो विवेक पटवारी ने। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।इस अवसर पर कॉलेज की फैकल्टी की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही और दोपहर का भोजन लिया गया।

बिस्क फॉर्म के विज्ञापन में अलग अन्दाज में दिखे सौरभ गांगुली

कोलकाता । भारत में चौथे सबसे बड़े बिस्किट ब्रांड बिस्क फार्म ने अपने उत्पादों की रिच मैरी रेंज के लिए एक उच्च-डेसीबल 360 डिग्री अभियान – ‘मी टाइम, मैरी टाइम’ शुरू किया, जिसमें भारतीय क्रिकेट के दिग्गज सौरव गांगुली ने अभिनय किया, जो कट्टर भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के जुनून का जश्न मना रहे हैं। यह अभियान भारतीय क्रिकेट टीम की सफलता में योगदान देने के प्रशंसकों के तरीके और विश्वास का जश्न मनाता है। इसमें सौरव गांगुली भी अपनी सिग्नेचर जर्सी लहराने की अदा को दोहरा रहे हैं, लेकिन इस बार लॉर्ड्स के पवेलियन से नहीं बल्कि आराम से अपने सोफ़े पर बैठकर। यह अभियान क्रिकेट मैच के दौरान सामान्य भारतीय प्रशंसक के व्यवहार को दर्शाने के लिए रोजमर्रा के मजेदार जीवन परिदृश्यों से भी प्रेरणा लेता है। यह संबंधित स्थितियों के अनूठे कोलाज पर निर्मित, जो प्रशंसकों का प्रतीक है। टीवीसी में सौरव गांगुली को ऐसे ही एक अंधविश्वासी प्रशंसक के रूप में चित्रित किया गया है। कैंपेन में सौरव गांगुली अपनी लकी जर्सी पहने नजर आ रहे हैं और मैच खत्म होने तक वे अपने किसी भी दोस्त को अपनी सीट से हिलने नहीं दे रहे हैं। उनके गले और बांहों में सोने की चेन वाले रैपर की तुलना में अधिक ताबिज़ है और यह उनके माथे पर भी दिख रहा है। वे भारत की जीत के लिए प्रार्थना करते हुए क्रिकेट बल्लों की पूजा करते हैं।विशेष अभियान पर टिप्पणी करते हुए बिस्क फार्म के प्रबंध निदेशक विजय सिंह ने कहा, “भारत एक क्रिकेट दीवाना देश है। हमारा मानना है कि इसमें भारतीय प्रशंसकों का बहुत बड़ा योगदान है, जिन्होंने खेल के प्रति अपने जुनून से खेल को भारत में एक धर्म में बदल दिया है। सौरव गांगुली भारतीय क्रिकेट में अपने अतुलनीय योगदान के लिए भारत में एक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व हैं और हमें लगता है कि सौरव गांगुली के नेतृत्व में यह अभियान भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के बीच उत्साह पैदा करने के सभी सही पहलुओं को छूता है। क्रिकेट, जीवन के सभी पहलुओं में मनाया जाता है और बिस्किट का सेवन हर कोई करता है, इसलिए यह हमारे लिए ब्रांड को बढ़ावा देने का एक शानदार अवसर प्रदान करता है। हमें विश्वास है कि अभियान अच्छा प्रदर्शन करेगा और इस क्रिकेट सीज़न में हमारे विकास में योगदान देगा।”

कोलकाता में खुला ताज ताल कुटीर होटल

कोलकाता ।  भारत की सबसे बड़ी आतिथ्य कंपनी, इंडियन होटल्स कंपनी (आईएचसीएल) ने कोलकाता में ताज ताल कुटीर खोलने की घोषणा की है। कोलकाता अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के निकट स्थित, होटल अपने औपनिवेशिक डिजाइन को न्यू टाउन में आधुनिकता के रंग भरता दिखेगा। प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पुनीत छतवाल ने कहा, “कोलकाता में तीन दशकों से अधिक समय से मजबूत उपस्थिति के साथ ताज अब न्यू टाउन में ताज ताल कुटीर के साथ अपनी पेशकश बढ़ा रहा है। इस अतिरिक्त के साथ, आईएचसीएल  शहर में उभरते सूक्ष्म बाजारों की बढ़ती मांग को संबोधित कर रहा है। पूर्वी भारत के प्रवेश द्वार के रूप में काम करते हुए, कोलकाता में वाणिज्यिक और पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और हम इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमें एक बार फिर श्री हर्षवर्द्धन नेवटिया और अंबुजा नेवटिया समूह के साथ साझेदारी करके खुशी हो रही है।”
इको पार्क में 100 एकड़ की झील के दृश्य के साथ, ताज ताल कुटीर में 75 शानदार कमरे और सुइट हैं, जिनमें ऊँची छत, पुरानी शैली के फर्नीचर और सिट-आउट के औपनिवेशिक स्पर्श हैं। मेहमान पूरे दिन चलने वाले भोजनालय द वेरांडा में अपने पसंदीदा भोजन का आनंद ले सकते हैं, क्लासिक जैज़ और गैट्सबी युग से प्रेरित बार – रिडिम का आनंद ले सकते हैं या द लेकव्यू लाउंज में सुस्त शाम बिताने का विकल्प चुन सकते हैं। भारत की समृद्ध और उपचार परंपराओं में निहित व्यापक समग्र प्रथाओं के साथ पुरस्कार विजेता जे वेलनेस सर्कल स्पा में कल्याण को अपनाएं। 50,000 वर्ग फुट में फैली विशाल भोज और कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाएं 3,000 वर्ग फुट से लेकर 12,000 वर्ग फुट से अधिक के छह स्थान उपलब्ध हैं।  इसमें खुले आकाश की छतों के साथ इनडोर और आउटडोर स्थान शामिल हैं, जो इसे भव्य सामाजिक कार्यक्रमों के लिए एक आदर्श स्थान बनाता है।
अंबुजा नेवटिया समूह के अध्यक्ष हर्षवर्द्धन नेवटिया ने कहा, “ताज ताल कुटीर के उद्घाटन से हमें बहुत खुशी हो रही है, जो कोलकाता के समकालीन टाउनशिप न्यू टाउन में पिछले युग की याद दिलाने वाली आर्ट-डेको वास्तुकला के साथ एक शानदार छुट्टी की पेशकश करता है। ताज ताल कुटीर इन बुटीक पेशकशों के पोर्टफोलियो में सबसे नया जोड़ है, जिन्हें ‘कुटीर’ कहा जाता है। यह गुरास कुटीर, गंगा कुटीर, राजकुटीर और चिया कुटीर के बाद श्रृंखला में पांचवां है। हमने कोलकाता में अपना तीसरा होटल जोड़कर, आईएचसीएल के साथ अपनी साझेदारी में एक और कदम आगे बढ़ाया है।” इस अतिरिक्त के साथ, आईएचसीएल के पास कोलकाता में ताज, सेलेक्शन्स, विवांता और जिंजर ब्रांडों में छह होटल होंगे, जिनमें से एक का विकास चल रहा है।