
तुम मिले रूह को ताजगी मिल गई/ जिंदगी को नयी जिंदगी मिल गयी/बाद मुद्दत खिला ये हृदय का कंवल/ बेवसी मिट गई बंदगी मिल गयी (पृष्ठ 96भाव अभिव्यंजना)
रचनाकार मीतू कानोड़िया के काव्य संग्रह ‘हृदय पुष्प’ की ये पंक्तियाँ किसी भी पाठक को पढ़ने के लिए उत्सुक कर सकती हैं । माता-पिता के दिए संस्कारों से युक्त सहृदय मीतू कानोड़िया ने काव्य संग्रह का नाम भी अपने पिता और माता के प्रथम शब्दों को मिला कर दिया है जो अनूठा प्रयोग है। संवेदनशील और भावनात्मक लगाव से संबंधित कवयित्री का यह प्रथम काव्य संग्रह इस कारण भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें 81 रचनाएं हैं जिसमें 41 गीत 33 गजल गीतिकाएं एवं साथ अन्य रचनाएं हैं। हृदय की विविध अनुभूतियों को कवयित्री ने काव्य सौंदर्य के विविध छंदों और शब्द आभूषणों से सुसज्जित किया है और अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है।जैसे मापनी,अवधी गीतिका ,बर्वे छंद, मनोरम छंद , आनंदवर्धक छंद ,पियूष रजनी छंद, मनोरम रूप माला छंद, बरवै छंद ,विधाता छंद आदि गीत विधा में लिखा है जो बहुत ही सटीक मात्राओं में छंद के नियमों को स्वीकारते हुए किया है और भावपूर्ण हैं।
‘छंद गीतों की कहानी ।
शब्द भावों की रवानी ।।
बह रही अविरल युगों से,
काव्य की धारा सुहानी।। ‘
मनोरम छंद में आपकी रचना ‘काव्य की धारा ‘पृष्ठ 80 में बारह मात्राओं में छंद सजाया गया है । काव्य छंदों की जानकारी रखने वाला ही इस प्रकार से लिख सकता है, साथ में भावपूर्ण स्पर्श । दोनों का ज्ञान रखने वाली कवयित्री ने अपनी सभी रचनाओं में मानो प्राण डाल दिए हैं। कोई भी रचना पढ़ने वाले पाठक को विवेकवान बनाती है। “बेटी के लिए “कविता की ये पंक्तियां –
शोरगुल में कृष्ण की वो बाँसुरी है।(पृ99)
काव्य संग्रह हृदय पुष्प में भावों की कोमलता के साथ भाषा भी परिष्कृत और सुगम है। रचना के अनुरूप शब्दों का चयन किया गया है। निश्चित ही मीतू कानोड़िया का यह प्रथम संग्रह संग्रहणीय है और इसकी गीत- ग़ज़ल फिल्मी धुनों में गाई जा सकती हैं ।आशा है सभी पाठक इसका आनंद ले सकेंगे। शुभकामनाओं के साथ।




