दीपंकर एडबार
नवद्वीप (नदिया) । पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक नगरी नवद्वीप की पहचान मुख्य रूप से चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव भक्ति आंदोलन से जुड़ी रही है। हालांकि, इस प्राचीन धार्मिक केंद्र के इतिहास में शाक्त साधना और तांत्रिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। नवद्वीप की आगमेश्वरी काली पूजा इसी समृद्ध आध्यात्मिक विरासत का एक प्रमुख उदाहरण है। तांत्रिक साधक कृष्णानंद आगमवागीश की साधना और स्मृतियों से जुड़ी यह पूजा आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं और विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठानों के लिए जानी जाती है।
दीपान्विता अमावस्या के अवसर पर आयोजित होने वाली इस पूजा में लगभग 16 फुट ऊंची मां काली की प्रतिमा स्थापित की जाती है। देवी के नाम पर ही आसपास के इलाके की पहचान आगमेश्वरी पाड़ा के रूप में विकसित हुई। वर्षभर मंदिर में नियमित पूजा होती है, लेकिन काली पूजा के अवसर पर यहां विशेष धार्मिक वातावरण देखने को मिलता है। दूर-दराज से श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
कृष्णानंद आगमवागीश बंगाल की तांत्रिक साधना परंपरा के महत्वपूर्ण विद्वान और साधक माने जाते हैं। प्रचलित ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, घर-घर में दक्षिणाकाली अथवा श्यामा स्वरूप में देवी की आराधना को लोकप्रिय बनाने में उनकी अहम भूमिका रही। उनकी चर्चित रचना ‘तंत्रसार’ में देवी की पूजा-पद्धति और साधना संबंधी विधियों का उल्लेख मिलता है।
नवद्वीप पुरातत्व परिषद के महासचिव शांतिरंजन देव के अनुसार, कालितंत्र में दक्षिणाकाली के जिस स्वरूप का वर्णन मिलता है, कृष्णानंद आगमवागीश ने उसी स्वरूप को मान्यता दी थी। वर्तमान आगमेश्वरी मंदिर का स्थान भी उनकी साधना भूमि माना जाता है।
इस पूजा की सबसे विशिष्ट विशेषता शाक्त और वैष्णव परंपराओं का अनूठा संगम है। कृष्णानंद आगमवागीश स्वयं शाक्त साधक थे, लेकिन उनके पिता महेश्वर गौड़ाचार्य और भाई माधवानंद भगवान गोपाल के उपासक थे। इसी पारिवारिक धार्मिक परंपरा की छाप आज भी पूजा के विधान में दिखाई देती है। मां काली की आराधना के दौरान सामने गोपाल की प्रतिमा रखी जाती है। देवी के बाईं ओर गोपाल और दाईं ओर नारायण शिला स्थापित रहती है। वहीं महाकाल के मस्तक के समीप यंत्र की स्थापना की जाती है। इस प्रकार पूजा में तांत्रिक साधना के साथ वैष्णव उपासना की परंपरा भी कायम है।
प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया भी अपने आप में विशिष्ट है। कार्तिक महीने की पंचमी से इसकी शुरुआत होती है। सबसे पहले पांच पोआ की छोटी खড় की प्रतिमा तैयार की जाती है, जिसकी एकादशी तक मंदिर में नियमित पूजा होती है। इसके बाद मुख्य प्रतिमा का ढांचा तैयार किया जाता है और छोटी प्रतिमा को बड़ी प्रतिमा के वक्षस्थल में स्थापित किया जाता है। चतुर्दशी को देवी का मुख तैयार किया जाता है, जबकि अमावस्या के दिन प्रतिमा की आंखें बनाई जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मूर्तिकार को शुद्ध वस्त्र धारण करना अनिवार्य होता है।
दीपान्विता अमावस्या की रात मां की मुख्य पूजा आरंभ होती है, जो सुबह तक चलती है। देवी को अड़हर दाल की खिचड़ी, कचू का साग, मोचा, एंचोर और चालता की खट्टी चटनी का भोग लगाया जाता है। काली पूजा के दिन दोपहर में पंचमुंडी आसन पर तांत्रिक साधक कृष्णानंद आगमवागीश को स्मरण कर विशेष पूजा अर्पित करने की परंपरा भी है। शाम को मंदिर परिसर में दीप प्रज्वलित करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
पूजा के अगले दिन दोपहर में पारंपरिक बেহारों के कंधों पर मां की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। आधुनिक समय में भी इस प्राचीन परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।
इस ऐतिहासिक पूजा की जिम्मेदारी लंबे समय से सान्याल परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाता आ रहा है। प्राचीन मंदिर को हेरिटेज का दर्जा भी मिल चुका है। परिवार की सदस्य पूरबी सान्याल के अनुसार, मां की पूजा के खर्च के लिए कोई निश्चित आर्थिक व्यवस्था या अनिवार्य चंदा नहीं है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करते हैं। उनका विश्वास है कि मां अपने पूजा आयोजन की व्यवस्था स्वयं करती हैं।
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, कृष्णानंद आगमवागीश का जन्म लगभग 1600 से 1610 ईस्वी के बीच हुआ था। माना जाता है कि उन्होंने 1635 से 1644 ईस्वी के बीच ‘तंत्रसार’ की रचना की थी।
नवद्वीप की धार्मिक पहचान को समझने के लिए आगमेश्वरी काली पूजा एक महत्वपूर्ण कड़ी है। चैतन्य महाप्रभु की वैष्णव भक्ति परंपरा के साथ-साथ यह पूजा बंगाल की शाक्त साधना, तंत्रचर्चा और धार्मिक समन्वय की उस विरासत को भी सामने लाती है, जो सदियों से इस ऐतिहासिक नगरी की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनी हुई है।




