-अब परिवार का सहारा बने सुदीप
दीपंकर एडबार
रानाघाट (नदिया) । एक हादसे ने बचपन के सपनों और जिंदगी की सामान्य रफ्तार को अचानक बदल दिया। लेकिन शारीरिक अक्षमता को अपनी पहचान नहीं बनने देने वाले नदिया जिले के रानाघाट स्थित हिजुली निवासी सुदीप दास ने संघर्ष के बीच आत्मनिर्भरता की राह तलाश ली है। दोनों पैरों की कार्यक्षमता खोने के बावजूद वह एक निजी कंपनी में काम कर रहे हैं और अपनी कमाई से परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों में हाथ बंटा रहे हैं।
सुदीप कभी हिजुली शिक्षानिकेतन में नौवीं कक्षा के छात्र थे। क्रिकेट के प्रति उनका खास लगाव था। भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी उनके पसंदीदा खिलाड़ी थे और उनकी तरह सफलता हासिल करना सुदीप का सपना था। लेकिन वर्ष 2021 में आए एक भीषण कालबैशाखी तूफान ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी।
एक दिन दोपहर बाद दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलने के दौरान अचानक एक मिट्टी का मकान ढह गया और सुदीप उसके मलबे में दब गए। गंभीर हालत में उन्हें पहले रानाघाट अनुमंडलीय अस्पताल ले जाया गया। बाद में कल्याणी और फिर कोलकाता के अस्पतालों में उनका इलाज चला। लंबे उपचार के बाद उनकी जान तो बच गई, लेकिन दोनों पैरों की कार्यक्षमता चली गई।
इस हादसे के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जीवन में लौटने और परिवार के लिए कुछ करने की थी। शारीरिक सीमाओं के बावजूद उन्होंने रोजगार की तलाश शुरू की। काम की उम्मीद में कोलकाता भी गए, लेकिन रोजाना लंबी दूरी तय करना उनके लिए काफी मुश्किल साबित हुआ।
आखिरकार करीब सात महीने पहले उन्हें रानाघाट की एक निजी कंपनी में काम मिला। अब वह व्हीलचेयर या बैसाखी के सहारे रोजाना कार्यस्थल पहुंचते हैं। नियमित रूप से काम करते हुए वह अपनी कमाई से परिवार की जरूरतों को पूरा करने में योगदान दे रहे हैं।
सुदीप का कहना है कि जीवन में मुश्किलें आती हैं, लेकिन उनसे डरकर पीछे नहीं हटना चाहिए। इस कठिन सफर में उनकी मां सबसे बड़ी ताकत रही हैं। परिवार के सहयोग और अपने दृढ़ संकल्प के सहारे उन्होंने फिर से जीवन को व्यवस्थित करने की कोशिश की है।
अब उनका अगला सपना अपनी कमाई से परिवार के लिए एक सुंदर घर बनाना है। कभी क्रिकेट के मैदान पर अपनी पहचान बनाने की इच्छा रखने वाले सुदीप आज जीवन की दूसरी पारी में आत्मनिर्भरता को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
सुदीप की कहानी केवल एक दुर्घटना से उबरने की दास्तान नहीं है। यह रोजगार, आत्मसम्मान और पारिवारिक जिम्मेदारी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को भी सामने लाती है। उनका संघर्ष बताता है कि शारीरिक चुनौतियों के बीच भी अवसर और सहयोग मिलने पर व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है।




