मिदनापुर।विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से रवींद्र जयंती के अवसर पर परिचर्चा,कविता कोलाज,काव्यपाठ एवं रवींद्र संगीत का आयोजन किया गया।कार्यक्रम की शुरुआत रवींद्रनाथ की तस्वीर पर माल्यार्पण के साथ हुई और चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा श्रेया और राया सरकार ने उद्घाटन गीत प्रस्तुत किया। इस अवसर पर ‘रवींद्रनाथ का साहित्य एवं चिंतन’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि रवींद्र जयंती की अवधारणा ही भारतीयता की अवधारणा है। रवींद्रनाथ का साहित्य विपुल और विराट है।बांग्ला विभाग के प्रो सुजीत पाल ने कहा कि रवींद्रनाथ जितने बांग्ला के हैं उतने ही भारतीय भाषा के भी हैं। विभागाध्यक्ष डॉ प्रमोद कुमार प्रसाद ने कहा कि रवींद्रनाथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।उन्होंने भारतीय लेखकों को बहुत हद तक प्रभावित किया है।डॉ संजय जायसवाल ने कहा कि रवींद्रनाथ बंगाल के सांस्कृतिक पुरूष हैं।उन्होंने साहित्य परिसर को भौगोलिक सीमाओं के पार पहुंचाया, जहां सार्वभौमिकता और मनुष्यता का भाव ही उनका विश्वबोध बन गया है।इसीलिए वे विश्वभारती की स्थापना करते हैं।डॉ श्रीकांत द्विवेदी ने कहा मेरा संबंध शांतिनिकेतन से रहा है।उन्होंने रवींद्रनाथ और हजारी प्रसाद द्विवेदी का संस्मरण सुनाते हुए बताया कि हिंदी और बांग्ला के बीच के संबंधों का जिक्र किया।डॉ मधु सिंह ने निराला की पुस्तक ‘रवींद्र कानन कविता’ का उल्लेख करते हुए रवीन्द्रनाथ की काव्य संवेदना का पर प्रकाश डाला।रवीन्द्रनाथ ने आत्मसंकुचन की जगह आत्मविस्तार को महत्व दिया।शोधार्थी सुषमा कुमारी ने रवींद्रनाथ की कविताओं में देशप्रेम और जागरण विषय पर,मिथुन नोनिया ने बंगभंग आंदोलन के आलोक में और मदन साह ने स्वदेशी के मुद्दे पर रवींद्रनाथ की चर्चा की।
इस अवसर पर टीना परवीन, नीशू कुमारी, बेबी सोनार,श्रेया सरकार,लक्ष्मी यादव ने स्वरचित कविता पाठ किया।रवींद्रनाथ की कविताओं पर आधारित कोलाज में प्रगति दुबे, निशा शर्मा, मुस्कान अग्रवाल, मारिया फ्रांसिस, स्नेहा शर्मा, कुंडल कुमारी, राया सरकार, मधु साव, लक्ष्मी, प्रिया गुप्ता, सिंपल, सत्यम पटेल, त्रिना दास और श्रेया सरकार ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का सफल संचालन संजय जायसवाल तथा धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी उस्मिता गौड़ ने दिया।
विद्यासागर विश्वविद्यालय में रवीन्द्र जयंती का आयोजन
अक्षय तृतीया पर कल्याण ज्वेलर्स का नया कलेक्शन
कोलकाता । कल्याण ज्वेलर्स ने कोलकाता में अक्षय तृतीया के मौके पर नया संग्रह पेश किया। इस मौके पर ब्रांड एंबेसडर रिताभरी चक्रवर्ती मौजूद रहीं। इस नये कलेक्शन में सोने के हल्के वजन के डिजाइन के साथ-साथ फैशनेबल हीरे के एक्सक्लूसिव कलेक्शन भी शामिल है। रिताभरी चक्रवर्ती को कल्याण ज्वैलर्स के निमा कलेक्शन से टेम्पल ज्वेलरी पहने हुए देखा गया। इस सीज़न में ग्राहक सभी आभूषणों की खरीद पर मेकिंग चार्ज पर 25 प्रतिशत की छूट दी गयी । ग्राहकों को कल्याण ज्वेलर्स का 4-स्तरीय आश्वासन प्रमाणपत्र भी प्राप्त होगा । शोरूम में कल्याण के लोकप्रिय घरेलू ब्रांडों का भी स्टॉक होगा, जिनमें मुहूर्त (वेडिंग ज्वेलरी लाइन), मुधरा (हस्तनिर्मित प्राचीन आभूषण), निमाह (टेम्पल ज्वेलरी), ग्लो (डांसिंग डायमंड्स), ज़िया (सॉलिटेयर-जैसे डायमंड ज्वेलरी), अनोखी (अनकट डायमंड्स) शामिल हैं। अपूर्व (विशेष अवसरों के लिए हीरे), अंतरा (शादी के हीरे), हेरा (दैनिक पहनने वाले हीरे), रंग (कीमती पत्थरों के आभूषण) और हाल ही में लॉन्च की गई लीला (रंगीन पत्थर और हीरे के आभूषण) भी मौजूद है।
हेमन्तेर अपरान्ह के पोस्टर का गौतम घोष ने किया अनावरण
कोलकाता । टॉलीवुड में अब तक कई मशहूर हिट फिल्में देनेवाले पुरस्कार विजेता निर्देशक अशोक विश्वनाथन की आगामी नई फिल्म ‘हेमन्तेर अपरान्ह’ दर्शकों के बीच जल्द रिलीज होने की तैयारी में है। इस फिल्म के पोस्टर का अनावरण गौतम घोष ने किया। इस मौके पर प्रसिद्ध प्रशंसित फिल्म निर्माता और निर्देशक अशोक विश्वनाथन और अमित अग्रवाल के साथ हेमन्तेर अपरान्ह फिल्म के शानदार स्टार कास्ट भी यहां मौजूद थे। इस फिल्म में कोरोना काल के साथ यूक्रेन और मध्य पूर्वी देशों के बीच छिड़े युद्ध से चारो तरफ फैली महामारी के दौरान मानव जीवन में तनाव के साथ जिंदगी और मौत के बीच के दहशत से भरे माहौल को पेश करने की कोशिश की गई है। इस अवसर पर ‘हेमन्तेर अपरान्ह’ के निर्माता और निर्देशक अशोक विश्वनाथन ने कहा, कोलकाता और उसके आसपास शूट की गई यह फिल्म वर्तमान कोरोना काल के समय पर आधारित है। यह फिल्म उन समय के दौरान थिएटर की दुनिया के पीछे के दृश्यों और इसमें काम करनेवाले कलाकारों के संघर्षों की कथा बयां करती है। फिल्म के कहानीकार इस फिल्म में यह पता लगाने की कोशिश करते है कि, दर्शक फिल्मों में पर्दे के पीछे की घटनाओं के साथ अपने संबंधों को कैसे देखते हैं। हाल के दिनों में बड़े तादात में कुछ लोगों द्वारा किए जानेवाले आत्महत्या से जुड़ी चिंता और अवसाद भी इस फिल्म का एक प्रमुख विषय है। अंत में, मुझे खुशी है कि मैंने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अमित अग्रवाल के साथ सहयोग किया है जो अपनी शैली और भाषा की परवाह किए बिना दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखकर लोगों की रुचि को भांप कर इसके अनुरूप सिनेमा बनाने के लिए काफी लोकप्रिय हैं।
अभिषेक दे सरकार की माई करियर माई चॉइस पुस्तक का हुआ लोकार्पण
कोलकाता । सुप्रसिद्ध लेखक अभिषेक दे सरकार की पुस्तक माई करियर माई चॉइस का लोकार्पण लेखक अभिषेक दे सरकार द्वारा किया गया। इस मौके पर अलोकानंदा रॉय (डांस थेरेपिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता), प्रणब रॉय (पूर्व भारतीय क्रिकेटर), केशव रंजन बनर्जी (धौनी के पहले क्रिकेट कोच), महुआ चक्रवर्ती (फ़िल्म निर्देशक), अभिषेक दे सरकार (लेखक और विदेशी शैक्षिक सलाहकार) के अलावा समाज की कई अन्य प्रतिष्ठित हस्तियां इसमें शामिल हुए। बुक लॉन्च कार्यक्रम में आए अतिथियों ने कहा कि, यह अपने करियर के मार्ग का निर्णय लेने के कठिन काम से जूझ रहे छात्रों के लिए एक अमूल्य संसाधन है। “माई करियर, माई चॉइस” केवल युवाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह पुस्तक उन माता-पिता के लिए भी समान महत्व रखती है, जो अपने बच्चों के जीवन में मार्गदर्शक की भूमिका निभाते हैं। अभिषेक दे सरकार की यह पुस्तक उन माता-पिता को एक समग्र दृष्टिकोण प्रदान करती हैं कि, वे अपने बच्चे को एक पूर्ण कॅरियर की यात्रा को कैसे सुविधाजनक बना सकते हैं।
भवानीपुर 75 पल्ली की 6वीं दुर्गा पूजा का टीजर लॉन्च
महाराणा प्रताप संघर्ष के दौरान भी आत्मसम्मान बनाये रखने के अनूठे उदाहरणः प्रतिभा सिंह
कोलकाता । अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना फ़ाउंडेशन, पश्चिम बंगाल की ओर से गुरुवार की शाम कोलकाता के काशीपुर में महाराणा प्रताप की 485वीं जयंती मनायी गयी। इस अवसर पर संगठन की प्रदेश अध्यक्ष और प्रख्यात गायिका प्रतिभा सिंह ने कहा कि राणा प्रताप शौर्य और स्वाभिमान के अनूठे उदाहरण रहे हैं। उनका अदम्य साहस, वीरता और मातृभूमि के प्रति समर्पण सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा है। उनसे यह सीखने योग्य है कि संघर्ष के दौरान भी आत्मसम्मान को बनाये रखना चाहिए और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए। कार्यक्रम में सोदपुर की अध्यक्ष सुनीता सिंह, कोलकाता इकाई की महामंत्री इंदु सिंह, कोषाध्यक्ष संचिता सिंह, उपाध्यक्ष ललिता सिंह, पदाधिकारी मीरा सिंह, सुमन सिंह, नीतू सिंह, लाजवंती सिंह, नारीशक्ति की पदाधिकारी शकुंतला साव, मीनू तिवारी और श्रुति शर्मा उपस्थित थे।
लिटिल थेस्पियन का 22वां रंग अड्डा सम्पन्न
कोलकाता । लिटिल थेस्पियन ने अपना 22वां रंग अड्डा सुजाता देवी विद्या मंदिर के प्रांगण में 28 अप्रैल को सफलतापूर्वक संपन्न किया । अप्रेल माह का रंग अड्डा मुख्य रूप से आग़ा हश्र कश्मीरी, रामेश्वर प्रेम, सफदर हाशमी तथा अज़हर आलम पर केंद्रित रहा l रंग अड्डा का मुख्य उद्देश्य छात्रों कों रंगमंच से जुड़ी बारीकीयों कों बताने के साथ- साथ रंगमंच से जुड़े विशिष्ट व्यक्ति, नाटककार, निर्देशक आदि के बारे में बताना भी है l स्कूल तथा कॉलेज में नाटक भी कहानी कि तरह ही पढ़ाया जाता रहा है l नाटक के प्रति रूचि पैदा करना भी रंग अड्डा का उद्देश्य है l आग़ा हश्र कश्मीरी के नाटक ‘सीता बनवास ‘ पर आलेख प्रियंका सिंह ने प्रस्तुत किया l आलेख के माध्यम से छात्र नाटक से जुड़े नाटककार के बारे में जानते है तथा समझते है l कॉलेज में छात्र केवल गिने चुनें नाटक ही पढ़ते है l इसीलिए उनकी जानकारी में कुछ ही नाटककार होते है l आलेख के माध्यम से वह कई और नाटककारों के विषय में भी जानकारी प्राप्त कर लेते है l सीता बनवास नाटक रामायण को आधार बना कर लिखा गया नाटक है l जो समाज को आईना दिखाता है l समाज में स्त्रियों को ही दोष देता आया है l राम भी एक धोबी के दोषारोपण के कारण ही सीता को बनवास पर भेज देते है l यहाँ राम के चरित्र पर ऊँगली नहीं उठती है केवल सीता को ही सवालों के घेरे में छोड़ दिया जाता है l रामेश्वर प्रेम के नाटक ‘पुत्र, फल और जहर’ पर आलेख पाठ सुधा गौड़ ने प्रस्तुत किया l प्रस्तुत नाटक में घर के मालिक को आधार बना कर समाज तथा देश के चरित्र को दिखाया गया है l वह व्यक्ति जो अपने घर का मुखिया है तथा धर्म का भी लेकिन वह पर स्त्री के साथ संबंध रखता है तो उसके चरित्र पर ऊँगली नहीं उठती है पर जब कोई नारी किसी पराये पुरुष से बात भी करती है तो वह कटघरे में खड़ी कर दी जाती है l पुरुष अपने स्वार्थ के लिए किसी कि भी आहुति दे सकता है चाहें वह उसका खुद का बेटा ही क्यों न हों बदले कि आग में वह अपने पुत्र को भी उकसा सकता है और उसे उसकी माँ का हत्यारा भी बना सकता है l भारतीय संस्कृति के नाम पर हम कुछ भी ऊल जलूल काम कर सकते है l लिटिल थेस्पियन कि निर्देशिका तथा वरिष्ठ रंगकर्मी उमा झुंझुनवाला ने सफदर हाशमी के जीवन के बारे में बताते हुआ रंगकर्मी कि प्रतिबद्धता पर रोशनी डाली | रंग अड्डा के अंत में अज़हर आलम के अंतिम नाटक ‘चाक ‘ का अभिनयात्मक पाठ किया गया l जिसे संगीता व्यास,सुधा गौड़, प्रियंका सिंह, पार्वती कुमारी शॉ, इंतेखाब वारसी, मो. आसिफ अंसारी, दानिश वारिस खान ने किया l जैसे चाक पर बर्तन घूमते है और चाक पर ही उनका आकर तय होता है उसी प्रकार समय के चाक पर बटवारे की त्रासदी का दुःख भोगता हुआ अभिशप्त मुस्लिम परिवार भारत से पाकिस्तान तथा पाकिस्तान से बंगलादेश बने अपनी अस्मिता को खो देता है भारतीय या हिंदुस्तानी कहे जाने परिवार से ‘बंगाल’ का धब्बा लगाए हुए मुस्लिम परिवार कि कहानी का दर्द दिखाया गया है जो देश का होकर भी प्रवासी है और अपने अस्मिता कि लड़ाई लड़ रहा है l रंग अड्डा का संचालन इंतखाब वारसी तथा दानिश वारिस खान ने किया l इस रंग मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित थे वरिष्ठ समाज सेवक श्री गोपाल अग्रवाल | उन्होंने कहा कि रंग मंच हमें हर परिस्थिति में जीना सिखाता है और यह विधा थी, है और हमेशा ही रहेगी |
विन फिट ने मनाई पहली वर्षगांठ
कोलकाता । विन फिट ने पहली वर्षगांठ मनाई। इस अवसर पर जिम में टॉलीवुड अभिनेत्री देवलीना कुमार, जो पहले से ही इस फिटनेस स्टूडियो की सदस्य हैं, उनकी मौजूदगी में जिम में विभिन्न प्रकार के वर्कआउट का आयोजन किया। इस समारोह में शामिल होनेवाले मीडिया जगत के लोगों के लिए भी एक विशेष ज़ुम्बा और योग सत्र का आयोजन किया गया था। विन फिट सिर्फ एक जिम नहीं बल्कि इसमें जिम से कहीं अधिक उपकरण उपलब्ध है। इस फिटनेस स्टूडियो में एक ही छत के नीचे सात कसरत कार्यक्रमों की एक विविध श्रृंखला पेश की गई हैं, जिनमें भारोत्तोलन के जुड़ा उपकरण भी मौजूद हैं। इसके अलावा नृत्य फिटनेस, हवाई योग, हाइपरट्रॉफी-विशिष्ट प्रशिक्षण, उच्च-तीव्रता अंतराल प्रशिक्षण (एचआईआईटी ), योग, मुक्केबाजी और ताकत और कंडीशनिंग इनमे शामिल है। इस अवसर पर विन फिट की सह-संस्थापक स्वाति बाहेती ने कहाअपने साथी प्रशिक्षकों की मदद से कक्षाओं को अधिक गतिशील और आकर्षक बनाने का लगातार प्रयास कर रही हूं। इधर विन फिट की प्रमुख अमृता बांगड़ बाजोरिया ने कहा, ऐसा लगता है कि एक बहुत ही रोमांचक यात्रा के साथ यह एक साल देखते ही देखते बीत गया। इन एक वर्षों में 600 से अधिक सदस्यों की रिकॉर्ड संख्या के साथ, हम आगे की विस्तृत योजना बना रहे हैं। बड़ों के साथ यहां अब यहां बच्चों के लिए भी विशेष कार्यशालाएँ, जिसमे – मज़ेदार फिटनेस पार्टियाँ और कार्यक्रम के आयोजन में साथ उनके पोषण से लेकर कसरत तक बच्चों की फिटनेस पर ध्यान केंद्रित करने वाला एक नया अवसर प्रदान करना हमारे आगे की योजना के पाइपलाइन में है। इस मौके पर हुए टॉलीवुड अभिनेत्री देवलीना कुमार ने कहा कि विन फिट में सहायक समुदाय और शानदार सुविधाएं हैं, जो मुझे हमेशा खुशी देती हैं। यहां कुशल और जानकार प्रशिक्षक हमे हमेशा प्रोत्साहित करते रहते हैं, जो मुझे नए स्तरों तक पहुंचने के लिए हमेशा प्रेरित करता हैं।
देशभक्ति प्रेम कविताओं और गीतों की गोष्ठी सम्पन्न
राइटर्स एंड जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन महिला इकाई कोलकाता द्वारा किया गया आयोजन
कोलकाता । राइटर्स एंड जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन महिला इकाई कोलकाता की ओर से आयोजित काव्य गोष्ठी में देशप्रेम और देशभक्ति के साहित्यिक गीतों और कविताओं द्वारा देश के प्रति अपनी भावनाओं को व्यक्त किया गया। गत 3 मई 2024 शुक्रवार को यह कार्यक्रम जूम पर संध्या 3 बजे से किया गया। कोलकाता की वाजा महिला ईकाई कोलकाता की कार्यकारी समिति के सभी सदस्यों ने इस गोष्ठी में हिस्सा लिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता आओ फिर से दिया जलाएँ से शुभ्रा त्रिवेदी ने किया।वाजा की उपाध्यक्ष डॉ मंजूरानी गुप्ता ने जयशंकर प्रसाद की रचना हिमालय के आंगन में , महासचिव डॉ सुषमा हंस ने विनोद प्रसून की रचना तिरंगे की शान ,संयुक्त सचिव, पूनम त्रिपाठी ने स्वरचित कविता गढ़ आला पर सिंह गेला छत्रपति शिवाजी के परम योद्धा ताना जी पर सुनाई , संयुक्त सचिव कविता कोठारी ने वंशीधर शुक्ल की कदम कदम बढ़ाए जा और स्वरचित कविता 26 जनवरी देश के इतिहास में एक स्वर्णिम दिन…. का वाचन किया । सुषमा त्रिपाठी ने यदि तुम्हारे घर के/एक कमरे में आग लगी हो/तो क्या तुम/दूसरे कमरे में सो सकते हो?सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता , शकुन त्रिवेदी ने देश के लिए किसी पहचान की आवश्यकता नहीं है सुनाई,
रीमा पांडेय ने गजल मंदिर की मस्जिदों की हिफाजत की बात कर, अम्न-ओ-अमान और मुहब्बत की बात कर सुनाई ।
उषा श्राफ ने हम दिवानों की क्या हस्ती है आज यहां कल वहां चले -भगवतीचरण वर्मा की कविता सुनाई, शौर्यांक त्रिवेदी ने सोहनलाल द्विवेदी की रचना वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो गाकर सभी को देश के साथ जोड़ा।
विशन सिखवाल ने राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता कलम आज उनकी जय बोल सुनाई। डॉ सुषमा हंस ने
डाॅ विनोद प्रसून रचित ‘ शान तिरंगा रहे हमारी, सीमा भावसिंहका ने खूब लडी़ मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी – कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान की लोकप्रिय कविता सुनाई।
बेंगलूरू से वाजा के अध्यक्ष हिरेमगलूर नरसिंहा ने और वामिका संस्था की सदस्या सुनीता सिंह ने स्वरचित कविताएँ पढ़ीं।
डॉ वसुंधरा मिश्र ने सोहनलाल द्विवेदी द्वारा लिखित रचना जन्म भूमि मेरी वह मातृभूमि मेरी/ऊँचा खड़ा हिमालय आकाश चूमता है/नीचे पखार पग तल, नित सिंधु झूमता है,
गंगा पवित्र यमुना, नदियाँ लहर रही हैं/पल-पल नई छटाएँ, पग पग छहर रही हैं पक्तियों से संचालन करते हुए देशभक्ति कविताओं से अपने देश प्रेम के प्रति व्यक्त किया। राइटर्स एंड जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय महासचिव और नई पीढ़ी दिल्ली के संपादक शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की भेड़िया कविता सुनाकर वाजा लेडिज विंग कोलकाता की अध्यक्ष डॉ वसुंधरा मिश्र के साथ सभी सदस्याओं को कार्यक्रम के लिए हार्दिक बधाई दी।
ताजा टीवी के निदेशक वरिष्ठ संपादक वाजा कोलकाता के अध्यक्ष विश्वंभर नेवर ने अपने धन्यवाद वक्तव्य में कहा कि इस तरह के राष्ट्रगीत और देश भक्ति के कार्यक्रम हमें देश से जोड़े रखते हैं। राष्ट्र बढ़ेगा तो हम बढ़ेंगे राष्ट्र रहेगा तो हम रहेंगे। दिनकर जी कविता सुनाकर वाजा लेडिज विंग कोलकाता के सभी सदस्याओं को धन्यवाद दिया। नयी पीढ़ी के संपादक शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी वाजा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कार्यक्रम की सराहना की एवं शुभकामनाएं दी। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
म्हारा मेवाड़ी सरदार

शोधार्थी, कलकत्ता विश्वविद्यालय
महाराणा प्रताप की जयंती पर विशेष
“बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः। उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता।।”
यह नीति वाक्य वीरत्व के गुण को उजागर करते हुऐ भारत के गौरवशाली इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित उन अनगिनत शूरवीरों की याद दिलाता है, जिन्होंने जीवनपर्यंत इस वाक्य में वर्णित श्रेष्ठ गुणों को धारण किया। वास्तव में शौर्य क्या है ? अपने लिए लड़ना ? अपने अधिकारों के लिए लड़ना ? नहीं। अपने लिए तो हर कोई लड़ सकता है परन्तु अपनी मातृभूमि के लिए लड़ना ही शौर्य है। जब व्यक्ति स्व से ऊपर उठकर अपनी मिट्टी के लिए मर-मिटे, उसे ही वीरता कहते हैं। भारतवर्ष का इतिहास ऐसे असंख्य वीर-वीरांगनाओं से भरा पड़ा है जिन्होंने आजीवन कष्ट झेले, मृत्यु का आलिंगन कर लिया परन्तु आक्रांताओं के समक्ष कभी घुटने नहीं टेके। इस राष्ट्र के इतिहास में राजस्थान का इतिहास अपना एक विशिष्ट स्थान रखता है। उसमें भी मेवाड़ का इतिहास सबसे भारी है।
महाराणा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई के ज्येष्ठ पुत्र वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। हिन्दू पञ्चांग के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को प्रताप जयंती मनाई जाती है। वे सूर्यवंशी राजा थे और उनके कुल को मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के वंशज कहलाने का गौरव प्राप्त है। महाराणा प्रताप का नाम सुनते ही धमनियों में शौर्य और पराक्रम का रक्त प्रवाहित होने लगता है, मस्तक गर्व और स्वाभिमान से ऊँचा हो उठता है। यह बात उस कालखण्ड की है जब भारतवर्ष पर मलेच्छ वंशियों का निरंतर आक्रमण हो रहा था और वे अपना राज्य विस्तार करने में सफल भी हो रहे थे। आबू, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, मालवा आदि शक्तिशाली राजे-रजवाड़े अकबर का आधिपत्य स्वीकार कर चुके थे। ऐसे में, एकमात्र महाराणा प्रताप ही थे जो अपने शौर्य पर अटल थे। उनके नाम मात्र से ही विधर्मी अकबर और उसकी सेना थर्रा उठती थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कुछ तथाकथित दरबारी इतिहासकारों ने बड़े ही प्रायोजित ढंग से हमारे भीतर हीन भावना पैदा करने की घृणित चेष्टा की। हमारे मन-मस्तिष्क में यह भर दिया गया कि भारत का इतिहास तो पराजय का इतिहास है। हद तो तब हो गई जब मलेच्छों के सिरमौर अकबर को इन तथाकथित इतिहासकारों ने‘द ग्रेट’का स्थायी विशेषण जोड़कर, माँ भारती के अमर सपूत महाराणा प्रताप सहित समूचे भारतवर्ष को भी अपमानित कर दिया। उनके विराट व्यक्तिव को संकुचित और धूमिल करने हेतु हल्दीघाटी युद्ध में उनको पराजित घोषित कर अध्याय ही समाप्त कर दिया। सत्य तो यह है कि मुगल न तो महाराणा प्रताप को कभी पकड़कर बंदी ही बना सके और न ही मेवाड़ पर पूर्ण आधिपत्य जमा सके। हल्दीघाटी का भयावह युद्ध अकबर के गुरुर और प्रताप के स्वाभिमान की पहली लड़ाई मात्र थी। तत्पश्चात् अगले 10 वर्षों में मेवाड़ में महाराणा ने कैसे स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रखी, इसकी जानकारी इतिहास पुस्तकों से नदारद ही रही। यदि अकबर वास्तव में विजयी हो गया था तब कालांतर में भी युद्ध क्यों हुए ?
कुछ तथाकथित विद्वान महाराणा प्रताप और अकबर को एक ही तराजू में तौलते हुए यह घोषणा करते हैं कि दोनों ही समान रूप से वीर थे। परन्तु मैं ऐसा कदापि नहीं मानती। दूसरे के घर पर अकारण आक्रमण करने वाला, लूटपाट मचाने वाला भला वीर कैसे हो सकता है ? स्वयं योद्धा की तरह सामने से कभी कोई युद्ध न लड़कर, मुठ्ठी भर राजपूती सेना से अपने लाखों सैनिकों को लड़वाने वाला वीर कत्तई नहीं हो सकता। वीर तो वह थे जिन्होंने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता हेतु राजपाट, सुख, वैभव का एक क्षण में त्याग कर दिया, जंगलों-बीहड़ों के खाक छाने, घांस की रोटियाँ खायी, जिनके पूरे परिवार ने दर्दनाक कष्ट उठाए परन्तु किसी भी मूल्य पर अपनी पगड़ी नहीं उतारी। भारत माँ के उस वीर सपूत का दृढ़ संकल्प था कि, “ कटे शीश पड़े, पर ये पाग नहीं, पराधीन कदे ना होवण दूँ ।।”उनके इसी आत्मबल का परिणाम था कि विधर्मी अकबर समस्त भारतवर्ष का सम्राट बनने के केवल स्वप्न ही देखता रह गया।
तथाकथित महान अकबर लंबे समय तक मोइनुद्दीन चिश्ती का मुरीद रहा, जो हिन्दू धर्म-समाज पर इस्लामी हमले का बड़ा प्रतीक था। सन् 1568 में चित्तौड़गढ़ पर कब्ज़ा जमाने के बाद अकबर ने चिश्ती अड्डे से ही ‘फतहनामा-ए-चित्तौड़’ जारी किया था, जिस के हर वाक्य से जिहादी जुनून टपकता है। उस युद्ध में 8 हजार वीरांगना क्षत्राणियों ने जौहर कर अपनी अस्मिता की रक्षा की थी। अकबर ने राजपूत सैनिकों के अलावा 30 हजार सामान्य नागरिकों का भी कत्ल किया था। मारे गए सभी पुरुषों के जनेऊ को एकत्रित कर तौला गया, जो साढ़े चौहत्तर मन था। यह केवल एक स्थान पर, एक बार में! इस भयावह नरसंहार के विवरण में अकबर लिखवाता है कि, “हम अपना क़ीमती वक्त, अपनी सलाहियत के मुताबिक़ जंग और जिहाद में गुजारते हैं। शैतान काफिरों के खिलाफ़ टोली बनाकर हमला हुआ और उस जगह कब्ज़ा हो गया जहाँ क़िला खुलता है। हम अपनी ख़ून की प्यासी तलवारों से एक के बाद एक कत्ल करते गए और कत्ल हुए लोगों का अंबार हो गया। बाकी बचे हुए लोगों का पीछा हुआ जैसे वो डरे हुए गधे हों शेर से भागते हुए।” समाज की स्त्रियों पर कुदृष्टि डालने वाला, अनगिनत निर्दोष, निहत्थे लोगों की हत्या करवाकर स्वयं को श्रेष्ठ समझने वाला वीर तो क्या साधारण मनुष्य कहलाने का भी अधिकारी हो सकता है भला ?
इतिहास साक्षी है कि भारत के वीरों की तलवारें कभी म्यानों में सोयी ही नहीं। इस पावन धरा पर निरंतर संघर्ष चलता रहा और हम सदा विजयश्री का वरण करते आए। अकबर तो क्या! किसी भी मुग़ल की हुक़ूमत कभी भी समूचे भारतवर्ष पर रही ही नहीं। वे अलग-अलग राजाओं के साथ मिलकर इस देश पर शासन करते रहे। इनके लिए साम्राज्य या सल्तनत शब्द प्रयुक्त करना किसी उपहास से कम नहीं। वास्तव में तो मगध, चोला, चेरा, पांड्यान आदि साम्राज्य हुआ करते थे। महरौली से यमुना तक शासन करने वाले चंद लुटेरों को हमने आवश्यकता से अधिक सम्मान दे दिया और अपने शूरवीर पूर्वजों को बिसराकर इन अपराधियों को नायक बना दिया। क्या यह सत्य नहीं कि जिन-जिन देशों पर विदेशी-विधर्मी आक्रांताओं ने आक्रमण किया वहाँ की संस्कृति समूल नष्ट हो गई? जैसे पर्शिया गुलाम हुआ तो ईरान हो गया, मेसोपोटामिया इराक़ हो गया, इजिप्ट की हालत तो हमारे सामने है ही। परन्तु भारत अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने में सफल रहा है। अब इस तथ्य को कौन उजागर करेगा कि हमारा इतिहास पराजय का नहीं अपितु संघर्ष, साहस, शौर्य, पराक्रम, त्याग और बलिदान का इतिहास रहा है ?
यह इस देश की विडंबना ही तो है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के इतने वर्षों पश्चात भी हमसे हमारे गौरवशली इतिहास को छुपाया जाता है। वहीं दूसरी ओर, विदेशी आक्रांताओं की पीढ़ी को रटवाकर मस्तिष्क को कलुषित करने का प्रयास होता है। महाराणा प्रताप जिस महान कुल के उजियाले थे उसमें अनेक वीर पैदा हुए जिन्होंने अपने अदम्य साहस का न सिर्फ परिचय दिया अपितु विदेशी आक्रांताओं से सदैव इस पावन धरा की रक्षा भी की। हमारी पीढ़ियों को आखिर कब बतलाया जायेगा कि सातवीं सदी में बप्पा रावल ने मोहम्मद बिन क़ासिम को ईरान तक दौड़ा-दौड़ा कर मारा था। महाराणा हमीर सिंह ने मोहम्मद बिन तुगलक को छः महीने कैद में रखा था, महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी को महीनों बंदी बनाकर रखा। महाराणा सांगा ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को खटोली के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया था, यह सब अध्याय इतिहास पुस्तकों में कब सम्मिलित होंगे ? यह कब पढ़ाया जाएगा कि जब हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ने मानसिंह के हाथी पर चढ़ाई कर दी तब अकबर की शाही फ़ौज भयातुर हो पाँच-छः कोस दूर भाग गई थी और अकबर के रणभूमि में स्वयं आने की झूठी अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई।
दिवेर का निर्णायक महासंग्राम :
इतिहास साक्षी है कि सन् 1576 में हुए हल्दीघाटी युद्ध के बाद भी अकबर ने महाराणा को बंदी बनाने और उनकी हत्या करने के लिए सन् 1577 से 1582 के बीच लगभग एक लाख सैन्यबल भेजे। अंग्रेजी इतिहासकारों ने लिखा है कि हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको उन्होंने ‘बैटल ऑफ दिवेर’ कहा है, मुगल बादशाह के लिए एक करारी हार सिद्ध हुआ था। कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में जहाँ हल्दीघाटी को ‘थर्मोपल्ली ऑफ मेवाड़’ की संज्ञा दी, वहीं दिवेर के युद्ध को ‘मेवाड़ का मैराथन’ बताया है (मैराथन का युद्ध 490 ई.पू. मैराथन नामक स्थान पर यूनान के मिल्टियाड्स एवं फारस के डेरियस के मध्य हुआ, जिसमें यूनान की विजय हुई थी, इस युद्ध में यूनान ने अद्वितीय वीरता दिखाई थी), कर्नल टॉड ने महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, युद्ध कुशलता को स्पार्टा के योद्धाओं सा वीर बताते हुए लिखा है कि वे युद्धभूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से भी नहीं डरते थे।
हल्दीघाटी के पश्चात् अक्तूबर 1582 में दिवेर का निर्णायक युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुगल सेना की अगुवाई करने वाला अकबर का चाचा सुल्तान खां था। विजयादशमी का दिन था और महाराणा ने अपनी नई संगठित सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया। एक टुकड़ी की कमान स्वयं महाराणा के हाथों में थी, तो दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे। अपने पिता की तरह ही कुंवर सा भी बड़े पराक्रमी योद्धा थे। उन्होंने मुगल सेनापति पर भाले का ऐसा वार किया कि भाला उसके शरीर और घोड़े को चीरता हुआ जमीन में जा धंसा और सेनापति मूर्ति की तरह एक जगह गड़ गया। इसी भीषण युद्ध में महाराणा ने बहलोल खान के सिर पर इतना तीव्र प्रहार किया कि वह घोड़े समेत दो टुकड़ों में कट गया। प्रताप का ऐसा रौद्र रूप देख मुग़ल सेना में हाहाकार मच गया। वीर राजपूती सैनिकों ने शत्रु की सेना को अजमेर तक खदेड़ा। बचे-खुचे 36,000 भयभीत मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। दिवेर के युद्ध ने मुगलों के मनोबल को बुरी तरह तोड़ दिया। इस युद्ध के पश्चात् प्रताप ने गोगुंदा, कुम्भलगढ़, बस्सी, चावंड, जावर, मदारिया, मोही, माण्डलगढ़ जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों को अपने अधीन कर लिया। केवल चितौड़गढ़ को छोड़ अन्य सभी दुर्गों पर पुनः केसरिया ध्वज फहरने लगा। यह भी वर्णित है कि इसके पश्चात भयातुर अकबर ने आगरा छोड़कर लाहौर को अपनी राजधानी बना ली थी।
वीर बलिदानी चेतक :
जिस प्रकार प्रभु श्रीराम की कथा हनुमान जी महाराज के बिना अधूरी है ठीक उसी प्रकार वीरों के सिरमौर महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा भी उनके घोड़े चेतक के बिना पूर्ण नहीं हो सकती। चेतक भले ही पशु योनी में जन्मा एक अश्व मात्र था परन्तु उसकी बुद्धिमता और स्वामीभक्ति का कोई सानी नहीं। एक ओर जहां मनुष्य योनी में जन्म पाकर भी राजपूती कुल कलंक मान सिंह केवल अपनी झूठी शान में मश्गूल होकर विधर्मी शत्रुओं की सेना का प्रतिनिधित्व कर रहा था वहीं दूसरी ओर रणभूमि में पूज्य चेतक महाराणा के साथ कदम से कदम मिलाकर अपनी मातृभूमि का ऋण चुका रहा था। महाकवि श्याम नारायण पाण्डेय अपनी कृति ‘हल्दीघाटी’में लिखते हैं, “रण–बीच चौकड़ी भर–भरकर, चेतक बन गया निराला था। राणा प्रताप के घोड़े से, पड़ गया हवा का पाला था। गिरता न कभी चेतक–तन पर, राणा प्रताप का कोड़ा था। वह दौड़ रहा अरि–मस्तक पर, या आसमान पर घोड़ा था।। जो तनिक हवा से बाग हिली, लेकर सवार उड़ जाता था। राणा की पुतली फिरी नहीं, तब तक चेतक मुड़ जाता था।।”
वीर चेतक अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए विशालकाय हाथी पर चढ़ बैठा जिसपर गद्दार मान सिंह सवार था। यह घटना विश्व के इतिहास में अत्यंत अनूठी, अकल्पनीय और अद्भुत घटना है। इस युद्ध में चेतक अपने राणा को सकुशल सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर स्वयं सदा के लिए सो गया। प्रताप अपने परम मित्र, भाई समान घोड़े को हृदय से लगाकर दहाड़ मारकर रोने लगे। इस दारुण दृश्य को देखकर शक्ति सिंह (महाराणा के छोटे भाई जो मुग़लों से जा मिले थे) का हृदय परिवर्तन हो गया और वे अपने भ्राता के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगे।
महाराणा की जयंती के अवसर पर हमें इस बात का मूल्यांकन करने की महती आवश्यकता है कि वर्तमान पीढ़ी को कौन सा इतिहास पढ़ाया जाए ? वह कायरतापूर्ण इतिहास जिसमें साम्राज्य-विस्तार की लपलपाती-अंधी लिप्सा थी, अनैतिकता और अधर्म की दुर्गंध थी अथवा अपने पूर्वजों का वह गौरवशाली ओजपूर्ण इतिहास जिसमें संघर्ष, स्वाभिमान, साहस, त्याग, बलिदान और नैतिकता की पुण्यसलिला भावधारा समाहित है। आज यह विचार आवश्यक है कि क्या हमें गुलामी की उन ग्रंथियों को ही पोसने-सींचने-फैलाने का कार्य निर्बाध रूप से करते रहना है अथवा उस शाश्वत सत्य को पुनः प्रतिष्ठित कर राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा करनी है। आज जब नवभारत अंगड़ाई ले रहा है तब क्या हमारा यह परम कर्त्तव्य नहीं बनता कि हम भावी पीढ़ी को अपने पूर्वजों द्वारा स्थापित मानबिन्दुओं और जीवन-मूल्यों की रक्षा हेतु तैयार करें ? जिस क्षण हमें इन प्रश्नों के उत्तर ज्ञात हो जायेंगे उसी क्षण महाराणा प्रताप व अन्य पूर्वजों तक हमारी सच्ची श्रद्धांजलि पहुँचेगी।




