Wednesday, March 18, 2026
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महज मनोरंजन नहीं दहला देने वाला सच दिखाती है सरबजीत

 

rekha-रेखा श्रीवास्तव

फिल्म देखने जाने का मतलब होता है, इंटरनेटमेंट। मनोरंजन। पर सरबजीत फिल्म वैसी फिल्म नहीं है। बिल्कुल अलग। मनोरंजन का तो नामो निशान नहीं, पर कई दृश्य में रोंगटे खड़े जरूर हुए, कई दृश्यों पर आँखों से अपने आप आँसू बहने लगे, कई दृश्यों पर समाज, कानून व्यवस्था पर थू-थू करने का मन किया। चाहे भारत हो या पाकिस्तान या कोई भी देश, अगर किसी को इस तरह से सजा देता है, तो सही में कानून व्यवस्था अंधी है। गलती किसी ने की हो, और उसकी सजा किसी और को मिली। ऐसा ही कुछ होता है सरबजीत के साथ। वास्तव में वह शराब के नशे में धूत होने के कारण पाकिस्तान की सीमा को लांघ गया, और उसकी यह एक गलती उसे जिंदा मरने के लिए छोड़ दिया। फिल्म में जिस तरह से दिखाया गया है कि कैदियों को किस तरह काल कोठरी में रखा जाता है। उसे यातनाएँ दी जाती है, दिल को हिला दिया। गुनाह करने वाला किस तरह आजाद घूमता है, और जबरन पकड़ कर किसी बेगुनाह को आरोपी कैसे बना दिया जाता है। यह दिखाया गया है इस फिल्म में। और आखिर में जब सरबजीत की बहन दलबीर आरोपी मंजीत सिंह को खोजने में कामयाब होती है और उसे कोर्ट तक खींच ले आती है तो वह खुलेआम कहता है कि मैं तो अपनी मर्जी से आया हूँ और मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। और ठीक वैसा ही हुआ। उसका कुछ नहीं बिगड़ा, उल्टे वर्षों से काल कोठरी में पड़े कैदी सरबजीत पर हमला करवा कर उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है। जिस काल कोठरी में उसके परिवार वालों को जाने के लिए पूरी तरह से जाँच-पड़ताल से गुजरना पड़ा वहाँ हथियार सहित बदमाश आकर उस पर हमला बोलकर चले गये और कोई कुछ नहीं कर पाया। यह वास्तव में फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि सच्ची घटना पर बनाई गई है। लाहौर में हुए बम विस्फोट के मामले में लिप्त आरोपी मंजीत की तलाश थी, और उसी समय सरबजीत पाकिस्तान की सीमा में घुस गया, तो बस पाकिस्तान वाले  ने उसको आरोपी मानकर पकड़ लिया और उस पर हमला, सजा  और कष्ट देना शुरू कर दिया। जबरन उसे सरबजीत से मंजीत सिंह बना दिया गया। इस फिल्म से बस केवल एक उम्मीद की जा सकती है कि अब ऐसी गलती नहीं होनी चाहिए, और किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलना चाहिए। यहाँ सरबजीत के साथ –साथ उसके परिवार वाले भी सजा काटे। 23 सालों तक इंतजार करने के बाद सरबजीत तो भारत पहुँचा नहीं, बल्कि उसका शव लाया गया।

2 मई 2013 को  पाकिस्तान के जेल में सजा काट रहे कैदी सरबजीत की मौत होती है और ठीक तीन साल बाद मई 2016 में ही सरबजीत को लेकर एक फिल्म रिलीज हुई।  सरबजीत का किरदार रणदीप हुड्डा ने बखूबी निभाया है और उसकी बहन का किरदार ऐश्वर्या राय बच्चन ने। दोनों ने ही काम बेहतर किया है। ऐश्वर्य राय बच्चन ने तो सफेद बाल और आँखों पर चश्मा लगाकर भी अपनी सुंदरता और अभिनय में चांद लगाया। वहीं  सरबजीत की पत्नी का किरदार निभा रही  रिचा चड्ढा ने भी अमिट छाप छोड़ी है। उसकी आँखें, उसका डॉयलॉग डिलीवरी का तरीका काफी अच्छा लगा। वकील का किरदार दर्शन कुमार ने बखूबी निभाया। उमंग कुमार की निर्देशित फिल्म मनोरंजन की दृष्टि से नहीं, पर वास्तवकिता की दृष्टि से सफल जरूर है।

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार तथा समीक्षक हैे)

खिदिरपुर कॉलेज में राष्ट्रवाद और रवींद्रनाथ पर संगोष्ठी का आयोजन

खिदिरपुर कॉलेज ने अपने स्वर्ण जयंती के अवसर पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन  भारतीय भाषा परिषद सभागार में किया।  इस संगोष्ठी का विषय था – राष्ट्रवाद : पश्चिम और पूर्व, संदर्भ टैगोर।  इस संगोष्ठी का उद्बोधन मुख्य अतिथि,  सुप्रसिद्ध इतिहासकार और बुद्धिजीवी प्रो.  भारती राय के कर कमलों से हुआ।  उन्होंने रवींद्रनाथ के व्यक्तित्व की विराटता को रेखांकित करते हुए उनके विचारों को  नए सिरे से व्याख्यायित करने की बात कही।  कॉलेज की भार प्राप्त अध्यक्षा डा. दीबा हाशमी ने कॉलेज के स्वर्ण जयंती के कार्यक्रम और गुरुदेव के महत्व की चर्चा की।  बीज भाषण देते हुए प्रो.  सुकांत चौधुरी ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति में पार्थक्य बताया  तथा रवीन्द्रनाथ को सच्चा मानवतावादी माना। दूसरे सत्र में प्रो कृष्णा सेन,  प्रो. रामकृष्ण भट्टाचार्य और प्रो. सुप्रिया  चौधरी ने अपने विचार रखे।  तीसरे सत्र में प्रो विश्वनाथ और डा विश्वजीत ने रवीन्द्रनाथ के राष्ट्रवाद संबंधी विचारों की सारगर्भित समीक्षा की। अंतिम सत्र में पैनल चर्चा थी जिसमें  विविध कला क्षेत्र के विद्वानों ने शिरकत की।  अध्यक्षता प्रो. रामकुमार मुखोपाध्याय ने की तथा प्रो सुशोभन अधिकारी, प्रो सुजातो भद्र,  श्री फे सिन इजाज, स्वपन सोम तथा प्रो.  शेखर कुमार समादार प्रतिभागी थे।  इस सत्र में कला के विविध क्षेत्रों में व्यक्त रवीन्द्रनाथ के राष्ट्रवाद संबंधी विचारों की रोचक व्याख्या की गई।  विभिन्न कॉलेज के शिक्षकों एवं शोध छात्रों ने कार्यक्रम में सक्रिय रूप से भाग लिया।

दुनिया को धरती और आकाश, दोनों की जरूरत है

वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है और हर बदलाव के पीछे उम्मीद होती है कि कुछ अच्छा होगा। कुछ अच्छा होने के पहले जो था, वह उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा और उतरा भी तो उससे बेहतर की उम्मीद होती है। यही कहानी एक आम आदमी की है और व्यवस्था की भी। परीक्षाओं के बाद जब नतीजे घोषित होते हैं तो परीक्षार्थी को भी उम्मीद होती है कि अच्छे अंक से पास हुआ तो नौकरी या दाखिला पक्का है और जब ऐसा नहीं होता, तो कहीं न कहीं या तो टूटने लगता है या फिर उदासीन हो जाता है। व्यवस्था की बात करें तो यह विकल्पहीनता की स्थिति है और जो कम बुरा है, वही अच्छा मान लिया जाता है।

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बंगाल में शायद कुछ ऐसा ही हुआ है। अपार बहुमत के बावजूद तृणमूल की सीटें कम होना और नोटा का अधिक प्रयोग सम्भवतः इसी का परिचायक है और यह विफलता तमाम राजनीतिक पार्टियों की विफलता है। जो भी हो, बंगाल में एक बार फिर त़ृणमूल सरकार है और एक बार फिर ममता बनर्जी यानि दीदी से लोगों की उम्मीदें जुड़ गयी हैं। जून यानि आधा साल बीत गया, हमारी और आपकी दोस्ती भी अब लगभग 6 महीने पुरानी हो चुकी है। मई का महीना माँ के नाम तो जून का महीना पिता के नाम होता है, फादर्स डे इसी महीने में पड़ता है और पर्यावरण दिवस भी। देखा जाए तो इन दोनों रिश्तों का प्रकृति से तारतम्य है क्योंकि तभी तो माँ को धरती और पिता को आकाश या समन्दर देखा जाता है। हमारे देश में पुरुषों को इतना मजबूत मान लिया जाता है कि उनको न तो रोने की इजाजत है और न ही खुलकर जिंदगी से वे जुड़ ही पाते हैं। वह हारने से और टूटने से डरते हैं इसलिए घुटते हैं मगर अपने मन की बात अपने मन में ही रखते हैं। क्या सभी पुरुष और उनमें छिपा पिता एक सा हो सकता है? पिता का मतलब अनुशासन की ऐसी छड़ी जो बच्चों को डराने के काम आती रही है जिससे बच्चे बात करने से भी कतराते हैं मगर वक्त बदला है तो पुरुष और उसमें छिपा पिता बदला है। वह पत्नी के साथ अपने बच्चों की परवरिश दोस्ताना तरीके से करता है। कई बार वह महिलाओं से भी अधिक संवेदनशील साबित हुआ है इसलिए यह मामला तो व्यक्तित्व पर निर्भर करता है। यह फर्क आप विज्ञापन से लेकर फिल्मों में देख सकते हैं। समाज से लेकर साहित्य तक का फलसफा औरतों को समझने और उसे फटकारने में गुजर गया मगर पुरुषों को भी समझे जाने की जरूरत है, यह ख्याल किसी को नहीं आया। स्त्री शिक्षा की तरह ही पुरुषों को भी शिक्षित और मानसिक रूप से समझदार होने की जरूरत है। अपराजिता संतुलन पर जोर देती है और उसका मानना है कि स्त्री और पुरुष, अगर दोनों को समझा जाए और विकास के लिहाज से दोनों को साथ लेकर चला जाए, तो बेहतर समाज बन सकता है जहाँ कुँठा नहीं होगी तो स्वस्थ परिवेश बनेगा। बात अगर सेल्फी विद् डॉटर की हो तो सेल्फी विद् सन क्यों नहीं हो सकता? यह सही है कि हमारे देश में महिलाओं का अनुपात सही नहीं है मगर स्थिति को बेहतर बनाने के लिए बच्चों के साथ भेदभाव जरूरी है? बच्चे तो बच्चे ही होते हैं, बचपन से ही उनमें स्त्री और पुरुष होने का भाव भरा ही क्यों जाए। सेल्फी विद् सन एंड डॉटर हमारी समझ से एक बेहतर विकल्प हो सकता है। संसार को धरती औऱ आकाश, दोनों की जरूरत है इसलिए लड़कियों के साथ लड़कों को भी हर क्षेत्र में मानसिक रूप से संतुलित परिवेश देने की जरूरत है। यही संतुलन पर्यावरण में होना चाहिए। दरअसल, अपनी जीवनशैली में थोड़ा सा बदलाव लाकर भी पर्यावरण की हिफाजत की जा सकती है। प्रकृति ने हमें काफी कुछ दिया है तो हमारा भी फर्ज बनता है कि उसकी हिफाजत करें वरना बाढ़, सूखा और भूकम्प जैसी आपदा हम सबकी किस्मत बन सकती है। एक अनुरोध, यह कि अगर आप इस पत्रिका  में कुछ सुझाव देना चाहते हैं तो संतुलित तरीके से दे सकते हैं और रचनात्मक सहयोग भी।

दृष्टिहीन अनामिका को सीबीएसई में मिले 86 प्रतिशत 

ग्वालियर।अनामिका को भले ही आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन उनका उत्साह हिमालय से ऊंचा है। आखिर ऐसा क्यों नहीं हो, उन्होंने सीबीएसई-12 में 86 प्रतिशत मार्क्स हासिल करके एक मिसाल कायम की है। वो भी ह्यूमिनटी जैसे कठिन विषयों में। अनामिका ने पूरी स्टडी सामान्य बच्चों के स्कूल में की है। बनना चाहती हैं टीचर……

-इस अनामिका से वो स्टूडेंट्स प्रेरणा ले सकते हैं, जो जरा सी असफलता मिलते ही सुसाइड जैसे कदम उठाते हैं।

-अनामिका को दोनों आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन वे स्टडी में किसी से पीछे नहीं हैं।

-अनामिका ने इस साल सीबीएसई 12 की परीक्षा में 86 प्रतिशत अंक हासिल किए। वो भी ह्यूमिनिटी से जुड़े विषयों में, जिसमें स्कोरिंग करना बहुत मुश्किल काम होता है।

-अनामिका कहती हैं कि मुझे उस समय बहुत दुख होता है, जब फेल होने पर आत्महत्या जैसा कदम उठाता है। भला परीक्षा के लिए जिंदगी क्यों खत्म की जाए।

-अनामिका चाहती हैं कि वे शिक्षिका बनें और निराश होने वाले बच्चों को सही दिशा दिखाना चाहती हैं।

सामान्य बच्चों के साथ पढ़ी अनामिका

-अनामिका ने ग्वालियर के उस केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ाई की है, जहां पर उनका मुकाबला सामान्य बच्चों से होता था।

-स्कूल की प्रिसिंपल रेखा सक्सेना बताती हैं कि अनामिका स्टडी में कभी पीछे नहीं रही औऱ न ही उसके मन में यह विचार आया कि वह देख सकती है।

-अनामिका के पिता कृष्ण मोहन मिश्रा स्वयं टीचर हैं और उन्होंने अनामिका के लिए स्वयं ब्रेल लिपि सीखी और फिऱ पढ़ाया।

 

संसार के पहले संवाददाता हैं नारद मुनि

नारायण! नारायण! की स्तृति करने वाले नारद मुनि भगवान विष्णु के न केवल परम भक्त माने जाते हैं, बल्कि उन्हें संसार के पहले संदेशवाहक के रूप में भी पहचाना जाता है। देवों और दानवों के परामर्शदाता भी। देवलोक से भूलोक तक, देवताओं से दानवों तक संदेश और गोपनीय संदेश महर्षि नारद की भूमिका आज भी प्रासंगिक हैं।

सृष्टि के प्रथम संदेशवाहक, संगीत, कला और साहित्य के ज्ञाता नारद को भी सभी विधाओं में महारत हासिल थी। ब्रम्हा पुत्र नारद ने जन कल्याण को प्राथमिकता दी और लोकहित में समस्त कार्य किए। यही वजह है कि हर वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष माह में आज भी नारद मुनि की जयंती को लोग हर्ष और उल्लास से मनाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन नारद मुनि का जन्म हुआ था और उनके भक्तों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है।

भले ही नारद को देवऋषि कहा गया हो लेकिन उनका कार्य केवल देवताओं तक ही संदेश पहुंचाना नहीं था बल्कि दानवों और मनुष्यों के भी वे संदेशवाहक और मित्र थे। और वे आगामी खतरों को लेकर लोगों को पहले ही सचेत कर दिया करते थे।

संतों के साथ रमता था उनका मन

नारद जी बचपन से ही अत्यंत सुशील थे। वे खेलकूद छोड़कर उन साधुओं के पास ही बैठे रहते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा भी बड़े मन से किया करते थे। संत-सभा में जब भगवत्कथा होती थी तो वे तन्मय होकर सुना करते थे। संत लोग उन्हें अपना बचा हुआ भोजन खाने के लिए दे दिया करते थे।

ब्रम्हा के सात मानस पुत्रों में से एक

हिंदू शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि ब्रम्हा के सात मानस पुत्रों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रम्हार्षि पद प्राप्त किया। वे भगवान विष्णु के प्रिय भक्तों में से एक माने जाते हैं। वे प्रत्येक युग में भगवान की भक्ति और उनकी महिमा का विस्तार करते हुए लोक-कल्याण के लिए हमेशा सर्वत्र विचरण किया करते थे। इनकी वीणा भगवज्जप-महती के नाम से ख्यात है। उससे नारायण-नारायण की ध्वनि निकलती रहती है।

कई विद्वानों के गुरु रहे हैं नारद मुनि

पौराणिक कथाओं के अनुसार देवर्षि नारद व्यास, वाल्मीकि और महाज्ञानी शुकदेव आदि के गुरु हैं। श्रीमद्भगावत जो भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य का परमोपदेशक ग्रंथ है और रामायण्ा देवर्षि नारद की प्रेरणा से ही हमें प्राप्त हो सके हैं।

जब नारद ने मानी अपनी गलती

एक बार नारद पृथ्वी का भ्रमण कर रहे थे। तब उन्हें उनके एक खास भक्त जो नगर का सेठ था ने याद किया। अच्छी सत्कार के बाद सेठ ने नारद जी से प्रार्थना की- आप ऐसा कोई आर्शीवाद दें कि कम से कम एक बच्चा तो हो जाए।

नारद ने कहा कि तुम लोग चिंता न करो, मैं अभी नारायण से मिलने जा रहा हूं। उन तक तुम्हारी प्रार्थना पहुंचा दूंगा और वे अवश्य कुछ करेंगे। नारद विष्णु ध्ााम विष्णु से मिलने गए और सेठ की व्यथा बताई। भगवन् बोले कि उसके भाग्य में संतान सुख नहीं है इसलिए कुछ नहीं हो सकता।

उसके कुछ समय बाद नारद ने एक दीये में तेल ऊपर तक भरा और अपनी हथेली पर सजाया और पूरे विश्व की यात्रा की। अपनी निर्विघ्न यात्रा का समापन उन्होंने विष्णु धाम आकर ही संपन्न किया।

इस पूरी प्रक्रिया में नारद को बड़ा घमंड हो गया कि उनसे ज्यादा ध्यानी और विष्णु भक्त कोई ओर नहीं। अपने इसी घमंड में नारद पुन: पृथ्वी लोक पर आए और उसी सेठ के घर पहुंचे। इस दौरान सेठ के घर में छोटे-छोटे चार बच्चे घूम रहे थे।

नारद ने जानना चाहा कि ये संतान किसकी हैं तो सेठ बोले- आपकी हैं। नारद इस बात से खुश नहीं थे। उन्होंने कहा- क्या बात है, साफ-साफ बताओ।

सेठ बोला- एक साधु एक दिन घर के सामने से गुजर रहा था और बोल रहा था कि एक रोटी दो तो एक बेटा और चार रोटी दो तो चार बेटे। मैंने उन्हें चार रोटी खिलाई। कुछ समय बाद मेरे चार पुत्र पैदा हुए।

नारद आग-बबूला हुए और विष्णु की खबर लेने विष्णु धाम पहुंचे। नारद को देखते ही भगवान अत्यध्ािक पीड़ा से कराह रहे थे। उन्होंने नारद को बोला- मेरे पेट में भयंकर रोग हो गया है और मुझे जो व्यक्ति अपने हृदय से लहू निकाल कर देगा उसी से मुझे आराम होगा।

नारद उल्टे पांव लौटे और पूरी दुनिया से विष्णु की व्यथा सुनाई, पर कोई भी आदमी तैयार नहीं हुआ। जब नारद ने यही बात एक साधु को सुनाई तो वो बहुत खुश हुआ, उसने छुरा निकाला और एकदम अपने सीने में भौंकने लगा और बोला- मेरे प्रभु की पीड़ा यदि मेरे लहू से ठीक होती है, तो मैं अभी तुम्हें दिल निकालकर देता हूं।

जैसे ही साधु ने दिल निकालने के लिए चाकू अपने सीने में घोपना चाहा, तभी विष्णु वहां प्रकट हुए और बोले- जो व्यक्ति मेरे लिए अपनी जान दे सकता है, वह किसी व्यक्ति को चार पुत्र भी दे सकता है। साथ ही नारद से यह भी कहा कि तुम तो सर्वगुण संपन्न् ऋषि हो। तुम चाहते तो उस सेठ को भी पुत्र दे सकते थे। नारद को अपने घमंड पर पश्चाताप हुआ।

 

जब एक बस ड्राइवर का बेटा लंदन का मेयर बना

लंदन से आने वाली यह खबर भी ऐतिहासिक संदर्भ रखती है। वहां बीते दिनों पाकिस्तानी मूल के सादिक खान को लंदन का मेयर चुन लिया गया है।

खास बात यह है कि इस पद तक पहुंचने वाले वह पहले अप्रवासी मुसलमान हैं। उनका दुनिया के सबसे खूबसूरत और सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध शहर का मेयर चुना जाना सुकून तो देता ही है। बता दें कि वे ब्रिटेन की लेबर पार्टी के सदस्य व नेता हैं।

सादिक के पिता बस ड्राइवर थे…
सादिक का परिवार कभी बेहद गरीबी और संघर्ष के दिनों से गुजरा है। उनके पिताजी एक बस ड्राइवर थे और मध्यम वर्गीय परिवार में मौजूद सात भाई-बहनों के लिए दो जून की रोटी जुगाड़ करना कोई आसान काम नहीं था। उनका परिवार एक अप्रवासी परिवार था और उन्हें ब्रिटेन के प्रजातांत्रिक ढाचे से काफी सहूलियतें मिलीं। उस दौर में उन्होंने राज्य द्वारा वित्त प्रदत्त स्कूलों में पढ़ाई की और अच्छे नंबर लाकर विश्वविद्यालयों का रुख किया।

सादिक कट्टरपंथ के सख्त खिलाफ हैं.
सादिक पूरी दुनिया और खास तौर पर ब्रिटेन के भीतर बढ़ने वाले कट्टरपंथ पर कहते हैं कि उनकी पहली प्राथमिकता लंदन को सुरक्षित रखने की होगी – चाहे वह हिंसक अपराधी हों या असामाजिक तत्व। वे कहते हैं कि उन्हें इसमें संकोच नहीं है कि वे ब्रिटिश मुसलमान हैं और कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई लड़ने को प्रतिबद्ध हैं।

 

गर्मियों में बालों को चाहिए खास देखभाल

गर्मियों के मौसम में त्वचा की तरह ही बालों को भी खास देखभाल की जरूरत होती है. इस चिपचिपे मौसम में भी आप अपने बालों को खूबसूरत बनाए रख सकती हैं। जानिए गर्मी के मौसम में भी बालों को हेल्दी रखने के ये पांच टिप्स.

बढ़ते तापमान के साथ बालों में तेल की जगह हेयर सीरम लगाएं. यह कम चिपचिपा होता है.।

घर से बाहर जाने पर अपने बालों को स्कार्फ, टोपी या स्टोल से ढककर रखें।

अपने बालों को कलर करने के लिए अमोनिया फ्री हेयर कलर्स का इस्तेमाल करें। ये इनके दुष्प्रभाव से बचाते हैं और बालों को पोषण देते हैं।

बालों को ज्यादा कसकर न बांधें. इससे बाल खराब हो सकते हैं और उनके झड़ने की संभावना बढ़ जाती है। गर्मी के मौसम के अनुरूप हेयर स्टाइल्स रखें. अपने बालों की चोटी या ढीला टॉप नॉट बनाएं।

 

उम्मीदों के आसमां उड़ान भरने को तैयार ये युवा परिंदे

मुश्किलों का डटकर जो सामना करे, जिंदगी खुद उसके लिए रास्ते खोल देती है। जीतता वही है जो अपने सपनों के साथ समझौता नहीं करता। तमाम आर्थिक परेशानी और मुश्किल हालात का सामना करते हुए कुछ युवा ऐसे होते हैं जो अपने सपने पूरे करते हॆं। इन सभी युवाओं को सिनी का सहयोग मिला है और इन युवाओं ने सिनी के लर्निंग सेंटर से कोचिंग ली। ऐसे ही कुछ होनहार युवाओं की कहानी अपराजिता आपके सामने रख रही है जिन्होंने हार नहीं मानी और उच्च माध्यमिक परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया।

मनीष महतो – मनीष के पिता बड़ाबाजार में कपड़े की दुकान पर काम करते हैं और उसका परिवार लोहापट्टी की झुग्गियों में रहता है। मनीष अपने 2 भाइयों में बड़ा है।त तमाम मुश्किलों के बावजूद श्री डीडू माहेश्वरी पंचायत विद्यालय के इस परिश्रमी छात्र ने उच्च माध्यमिक की परीक्षा में 81 प्रतिशत अंक हासिल किए। उसे 405 अंक मिले हैं। उसे सिनी के रामबागान स्थित लर्निंग सेंचर में कोचिंग मिली है।

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राज गुप्ता – राज गुप्ता के पिता पुराने कपड़े बेचते हैं और उसकी माँ घरों में काम करके बेटे को पढ़ा रही हैं। उसे 382 यानि 76.4 प्रतिशत अंक उच्च माध्यमिक की परीक्षा में मिले हैं। वह भी श्री डीडू माहेश्वरी पंचायत विद्यालय का छात्र है।

RAJ GUPTA

रोनित मिश्रा – रोनित एक रेड लाइट इलाके में रहता है। उसके 2 भाई हैं। रोनित के पिता हॉकर हैं। उसने ज्ञान भारती विद्यापीठ से साइंस की पढ़ाई की है। उसे 327 अंक यानि 65.4 प्रतिशत अंक मिले हैं।

RONIT MISHRA

रिंकू कुमारी – रिंकू की माँ मजदूरी करती हैं और पिता बेरोजगार हैं। घर की आय 2 हजार रुपए है और उसी से परिवार चलता है। रिंकू की एक छोटी बहन और छोटा भाई भी है। माध्यमिक पास करने वाली रिंकू अपने घर की पहली सदस्य है। माध्यमिक में उसका रिजल्ट अच्छा नहीं रहा मगर रिंकू ने हार नहीं मानी। उसने भूतनाथ महामाया इंस्टिट्यूशन से पढ़ाई की और उच्च माध्यमिक परीक्षा में उसे 62 प्रतिशत अंक मिले हैं।

Rinku Kumari

ताशीन परवीन – ताशीन के पिता रिक्शा चलाते हैं और माँ मजदूरी करती हैं। उसके एक भाई और एक बहन भी है। ताशीन माध्यमिक परीक्षा में बैठने वाली घर की पहली सदस्य ही नहीं है बल्कि उसे 65 प्रतिशत अंक भी बटोरे। वह सिनी की वॉलेंटियर रह चुकी है और संस्था ने उसके स्कूल और ट्यूशन फी का प्रबंध किया। ताशीन डॉक्टर बनना चाहती है। अभी वह नीट परीक्षा की तैयारी कर रही है। भूतनाथ महामाया इंस्टिट्यूशन की इस छात्रा को उच्च माध्यमिक परीक्षा में 328 यानि 65.6 प्रतिशत अंक मिले हैं।

Tahsin Parveen

भारती माली – भारती पहले रेड लाइट इलाके से सटे इलाके में रहती थी। पिता की मौत 2 साल पहले हो चुकी है और भाई पार्किंग लॉट में काम करता है। बहन कपड़े की दुकान में काम करती है। भारती घर में सबसे छोटी है। श्री बाल कृष्ण विट्ठलनाथ विद्यालय की छात्रा भारती को उच्च माध्यमिक परीक्षा में 252 (50.4 प्रतिशत) अंक मिले हैं।

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पूजा गुप्ता – पूजा सिनी के साथ चौथी कक्षा से है। पिता हॉकर हैं। माँ घरों में काम करती है। पूजा के घर में बिजली तक नहीं है। पूजा ने सावित्री पाठशाला से कॉमर्स की पढ़ाई की है और उच्च माध्यमिक परीक्षा में उसे 281 यानि 56 प्रतिशत अंक मिले हैं।

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वाममोर्चा और तृणमूल के लिए सबक साबित हुआ चुनाव

  • सुषमा त्रिपाठी

बंगाल में एक बार फिर दीदी राज लौट आया है। जनता ने प्रचंड बहुमत देकर तृणमूल के हाथ में 5 साल के लिए अपना भविष्य सौंप दिया है। अकेले ममता बनर्जी ने विरोधियों को धूल चटा दी है और वाममोर्चा के लिए तो अब शायद यह अस्तित्व बचाए रखने की लड़ाई साबित होने जा रहा है। वाममोर्चा और काँग्रेस, दोनों को गठबंधन से बड़ी उम्मीदें थीं कि शायद वे बिहार का करिश्मा एक बार फिर बंगाल में दोहरा सकते हैं। दरअसल, यह चुनाव कई मामलों में मील का पत्थर भी साबित हो सकता है और सबक भी, सबक यह कि एक राज्य का फार्मूला दूसरे राज्य में भी चल जाए, ये जरूरी नहीं है। सच तो यह है कि वाममोर्चा ने बेहद बड़ा जोखिम लिया था और शायद यही वजह थी कि अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता न करने के लिए जानी जाने वाली पार्टी ने अपने चुनाव चिन्ह के साथ भी समझौता कर लिया था। अपने साथी दलों को छोड़कर किसी भी कीमत पर गठबंधन करना वाकई पार्टी को महंगा पड़ा है क्योंकि कहीं न कहीं इससे पार्टी के समर्थकों को चोट पहुँची और उनकी सहानुभूति काँग्रेस के साथ चली गयी। राहुल गाँधी और बुद्धदेव भट्टाचार्य को एक मंच पर देखना लोगों को रास नहीं आया और जनता तक गठबंधन की अवसरवादी छवि ही पहुँची। इसके विपरीत काँग्रेस के वोट माकपा को नहीं मिले। अब ये अलग बात है कि वाममोर्चा के चेयरमैन विमान बोस गठबंधन की बात से ही इनकार कर रहे हैं जबकि सूर्यकांत मिश्र इसे बरकरार रखने की बात कर रहे हैं। देखा जाए तो इस पूरी कवायद में सबसे अधिक फायदा काँग्रेस को हुआ है और नुकसान सिर्फ माकपा को हुआ है। काँग्रेस अब 44 सीटों के साथ राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी बनने जा रही है तो दूसरी ओर वाममोर्चा महज 32 सीटों पर सिमट गया है। राज्य में भाजपा ने भी 3 सीटों के साथ अपना खाता खोल लिया है और भविष्य में पार्टी अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश करेगी और उसका मकसद 2019 के लोकसभा चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत करना ही होगा। लगभग 8 लाख लोगों ने नोटा का प्रयोग किया और कई जगहों पर तृणमूल प्रत्याशियों के वोट उनके अपने ही इलाके में कम हुए हैं। तृणमूल के 8 मंत्री चुनाव हार चुके हैं जिसमें दीदी के चहेते मदन मित्रा भी शामिल हैं। इन सबके बावजूद रही बात तृणमूल की, तो आतंक के तमाम आरोपों के बावजूद कहीं न कहीं पार्टी अपने 5 साल के कामकाज और योजनाओं को भुनाने में कामयाब रही है। इसके साथ ही गौर से देखा जाए तो भाजपा के वोटों का तृणमूल के खाते में चला जाना और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अप्रत्यक्ष समर्थन तृणमूल को सत्ता की ओर ले जाने में मददगार साबित हुआ। सत्ता सम्भालते ही दीदी ने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं और चुनाव आयोग द्वारा पक्षपात के आरोपों के बाद हटाए गए राजीव कुमार एक बार कोलकाता के पुलिस कमिश्नर हैं। भारती घोष भी चुनाव आयोग के खिलाफ हाईकोर्ट जा रही हैं। भाजपा प्रत्याशी रूपा गाँगुली पर हमले हुए और विरोधियों के खिलाफ हिंसा जारी है। कई जगहों पर तृणमूल पर हमले हुए हैं, यह भी सही है मगर देखना यह है कि अब बंगाल की जनता ने जिस विश्वास के साथ ममता को चुना है, क्या उनकी सरकार उस विश्वास पर खरी उतरेंगी। अभी नारद और सारधा मामले में फैसला आना बाकी है, सरकार का भविष्य भले ही उससे तय न हो, यह भी सही है कि कई मंत्रियों की किस्मत इससे जरूर तय होगी। दरअसल, कहीं न कहीं तृणमूल और भाजपा एक दूसरे की ताकत भी हैं और जरूरत भी, दोनों ही पक्षों के लिए यह स्थिति और भी मुखर होने वाली है इसलिए दोनों ही चाहें तो एक – दूसरे को नजरअंदाज नहीं कर सकते। रही बात वाममोर्चा की तो इस करारे झटके के बाद पार्टी को सम्भलने में वक्त लगेगा, यह तय है मगर यह एक संदेश है कि पार्टी अब युवाओं को सामने लाए, तभी उसके बचने की उम्मीद है।

किरण बेदी बनीं पुडुचेरी की उपराज्यपाल

भाजपा की ओर से दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार रहीं किरण बेदी को पुडुचेरी का उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है। पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने बीबीसी से कहा, “मुझे खुशी है कि मुझे पुडुचेरी के साधारण नागरिकों की सेवा करने का मौका मिला है।”

एक प्रशासक के रूप में पुडुचेरी के लिए अपनी प्राथमिकताओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया, “मैं सरकार में अंतिम कर्मचारी तक पहुंचने वाली हूं और अपनी जिम्मेदारी खूब अच्छी तरह से निभाऊंगी।”

लगभग 30 साल तक पुलिस सेवा में रहीं बेदी का कहना है कि जब आखिरी सरकारी सेवक काम करता है तब साधारण व्यक्ति को उत्तम सेवा मिलती है.।

पिछले दिल्ली विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के बाद पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गई थीं और भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था। वे 1972 में देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी बनी थीं. आईपीएस अधिकारी के रूप में वो काफी चर्चित रहीं। यही नहीं, तिहाड़ जेल में किए गए उनके काम को बड़े पैमाने पर सराहना मिली. इसके लिए उन्हें 1994 में रमन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिल चुका है।