संसार के पहले संवाददाता हैं नारद मुनि

नारायण! नारायण! की स्तृति करने वाले नारद मुनि भगवान विष्णु के न केवल परम भक्त माने जाते हैं, बल्कि उन्हें संसार के पहले संदेशवाहक के रूप में भी पहचाना जाता है। देवों और दानवों के परामर्शदाता भी। देवलोक से भूलोक तक, देवताओं से दानवों तक संदेश और गोपनीय संदेश महर्षि नारद की भूमिका आज भी प्रासंगिक हैं।

सृष्टि के प्रथम संदेशवाहक, संगीत, कला और साहित्य के ज्ञाता नारद को भी सभी विधाओं में महारत हासिल थी। ब्रम्हा पुत्र नारद ने जन कल्याण को प्राथमिकता दी और लोकहित में समस्त कार्य किए। यही वजह है कि हर वर्ष ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष माह में आज भी नारद मुनि की जयंती को लोग हर्ष और उल्लास से मनाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन नारद मुनि का जन्म हुआ था और उनके भक्तों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है।

भले ही नारद को देवऋषि कहा गया हो लेकिन उनका कार्य केवल देवताओं तक ही संदेश पहुंचाना नहीं था बल्कि दानवों और मनुष्यों के भी वे संदेशवाहक और मित्र थे। और वे आगामी खतरों को लेकर लोगों को पहले ही सचेत कर दिया करते थे।

संतों के साथ रमता था उनका मन

नारद जी बचपन से ही अत्यंत सुशील थे। वे खेलकूद छोड़कर उन साधुओं के पास ही बैठे रहते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा भी बड़े मन से किया करते थे। संत-सभा में जब भगवत्कथा होती थी तो वे तन्मय होकर सुना करते थे। संत लोग उन्हें अपना बचा हुआ भोजन खाने के लिए दे दिया करते थे।

ब्रम्हा के सात मानस पुत्रों में से एक

हिंदू शास्त्रों के अनुसार नारद मुनि ब्रम्हा के सात मानस पुत्रों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रम्हार्षि पद प्राप्त किया। वे भगवान विष्णु के प्रिय भक्तों में से एक माने जाते हैं। वे प्रत्येक युग में भगवान की भक्ति और उनकी महिमा का विस्तार करते हुए लोक-कल्याण के लिए हमेशा सर्वत्र विचरण किया करते थे। इनकी वीणा भगवज्जप-महती के नाम से ख्यात है। उससे नारायण-नारायण की ध्वनि निकलती रहती है।

कई विद्वानों के गुरु रहे हैं नारद मुनि

पौराणिक कथाओं के अनुसार देवर्षि नारद व्यास, वाल्मीकि और महाज्ञानी शुकदेव आदि के गुरु हैं। श्रीमद्भगावत जो भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य का परमोपदेशक ग्रंथ है और रामायण्ा देवर्षि नारद की प्रेरणा से ही हमें प्राप्त हो सके हैं।

जब नारद ने मानी अपनी गलती

एक बार नारद पृथ्वी का भ्रमण कर रहे थे। तब उन्हें उनके एक खास भक्त जो नगर का सेठ था ने याद किया। अच्छी सत्कार के बाद सेठ ने नारद जी से प्रार्थना की- आप ऐसा कोई आर्शीवाद दें कि कम से कम एक बच्चा तो हो जाए।

नारद ने कहा कि तुम लोग चिंता न करो, मैं अभी नारायण से मिलने जा रहा हूं। उन तक तुम्हारी प्रार्थना पहुंचा दूंगा और वे अवश्य कुछ करेंगे। नारद विष्णु ध्ााम विष्णु से मिलने गए और सेठ की व्यथा बताई। भगवन् बोले कि उसके भाग्य में संतान सुख नहीं है इसलिए कुछ नहीं हो सकता।

उसके कुछ समय बाद नारद ने एक दीये में तेल ऊपर तक भरा और अपनी हथेली पर सजाया और पूरे विश्व की यात्रा की। अपनी निर्विघ्न यात्रा का समापन उन्होंने विष्णु धाम आकर ही संपन्न किया।

इस पूरी प्रक्रिया में नारद को बड़ा घमंड हो गया कि उनसे ज्यादा ध्यानी और विष्णु भक्त कोई ओर नहीं। अपने इसी घमंड में नारद पुन: पृथ्वी लोक पर आए और उसी सेठ के घर पहुंचे। इस दौरान सेठ के घर में छोटे-छोटे चार बच्चे घूम रहे थे।

नारद ने जानना चाहा कि ये संतान किसकी हैं तो सेठ बोले- आपकी हैं। नारद इस बात से खुश नहीं थे। उन्होंने कहा- क्या बात है, साफ-साफ बताओ।

सेठ बोला- एक साधु एक दिन घर के सामने से गुजर रहा था और बोल रहा था कि एक रोटी दो तो एक बेटा और चार रोटी दो तो चार बेटे। मैंने उन्हें चार रोटी खिलाई। कुछ समय बाद मेरे चार पुत्र पैदा हुए।

नारद आग-बबूला हुए और विष्णु की खबर लेने विष्णु धाम पहुंचे। नारद को देखते ही भगवान अत्यध्ािक पीड़ा से कराह रहे थे। उन्होंने नारद को बोला- मेरे पेट में भयंकर रोग हो गया है और मुझे जो व्यक्ति अपने हृदय से लहू निकाल कर देगा उसी से मुझे आराम होगा।

नारद उल्टे पांव लौटे और पूरी दुनिया से विष्णु की व्यथा सुनाई, पर कोई भी आदमी तैयार नहीं हुआ। जब नारद ने यही बात एक साधु को सुनाई तो वो बहुत खुश हुआ, उसने छुरा निकाला और एकदम अपने सीने में भौंकने लगा और बोला- मेरे प्रभु की पीड़ा यदि मेरे लहू से ठीक होती है, तो मैं अभी तुम्हें दिल निकालकर देता हूं।

जैसे ही साधु ने दिल निकालने के लिए चाकू अपने सीने में घोपना चाहा, तभी विष्णु वहां प्रकट हुए और बोले- जो व्यक्ति मेरे लिए अपनी जान दे सकता है, वह किसी व्यक्ति को चार पुत्र भी दे सकता है। साथ ही नारद से यह भी कहा कि तुम तो सर्वगुण संपन्न् ऋषि हो। तुम चाहते तो उस सेठ को भी पुत्र दे सकते थे। नारद को अपने घमंड पर पश्चाताप हुआ।

 

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