Thursday, September 24, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 851

माँ

0
  • रेखा श्रीवास्तव

rekha-di

स्मार्ट मोबाइल की तरह

बढ़ गई है माँ की जिम्मेदारियाँ भी

उसे अब केवल जन्म देकर

बच्चियों की संख्या नहीं बढ़ानी है

उसे देना है अपनी  बच्चियों को

समाज में जीने की सीख

अपने को मजबूत बनाने की सीख

केवल पढ़-लिख कर नहीं, हर क्षेत्र में

पहुँचने की सीख

सिंधु और साक्षी बनने की सीख

उसे देनी है केवल आगे बढ़ने की सीख नहीं

रोटी-रोजी की जुगाड़ के साथ

खुद को पहचानने की सीख

स्मार्ट मोबाइल की तरह

बढ़ गई है माँ की जिम्मेदारियाँ भी

बेटी को बताने के लिए कि

जिस हाथ में तुम पेंसिल पकड़ कर

लिखने की सीख सीखी थी

जरूरत पड़ने पर उसमें तीर-कमान

भी समायेंगे

जिस पाँव को तुमने ताल के साथ

नृत्य करने के लिए उठाया था

उसी से तुम हमला कर किसी को पटक सकती हो

अब तक बताया गया कि

तुम शारीरिक रूप से कमजोर हो

तुममें केवल जनने की क्षमता है

पर यह गलत है

हम अगर पैदा कर सकते हैं,

विकसित कर सकते हैं

तो हमें ही अधिकार है

कि हम ही ध्वंस करेंगे

पर हम ऐसा नहीं करेंगे

क्योंकि हमें खुद बढ़ना है

क्योंकि स्मार्ट मोबाइल की तरह

बढ़ गई है माँ की जिम्मेदारियाँ भी।।

(कवियत्री वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

बंधु, दर्द तो मर्द को भी होता है

1
  • सुषमा त्रिपाठी

सेक्टर फाइव से हावड़ा जाने वाली बस में चढ़ी थी। एक मित्र से मुलाकात हो गयी और मजाक ही मजाक में महिलाओं की सीट पर बैठे उस मित्र को हटाकर मैं बैठ गयी। महिलाओं की सीट को लेकर अधिकार जताने का काम हममें से अधिकतर महिलाएं करती हैं, मैंने भी किया मगर इसी सोच के साथ एक और ख्याल जुड़ा कि अक्सर 2 – 3 घंटे का सफर पुरुष भी ऐसे ही तय करते हैं। कोलकाता के सॉल्टलेक सेक्टर फाइव जाने वाली बसें भले ही सियालदह से गुजरें या साइंस सिटी से, उनमें भीड़ बहुत होती है। इन बसों में चढ़ने वाले विद्यार्थी और प्रोफेशनल्स को देखकर आपको स्कूल जाते बच्चे याद आ सकते हैं क्योंकि दोनों के बैग लगभग बैगपैक ही लगते हैं और उम्र इसमें बाधा नहीं बनती। खचाखच भरी बस में कुछ मनचले भी चढ़ते हैं जो लड़कियों को छूने का एक भी मौका हाथ से नहीं जाने देते और कुछ ऐसे भी हैं जो किसी भी तरह सीट से हिलते भी नहीं हैं मगर इसके अलावा भी पुरुषों का एक बड़ा वर्ग है जो बसों के तमाम धक्कों के बावजूद किसी सिपाही की तरह भारी बैग लेकर तनकर खड़ा रहता है क्योंकि जरा सा स्पर्श उनको मनचलों की श्रेणी में ही ला देगा जो वे नहीं चाहते। आखिर इज्जत का मामला है तो जनाब लड़कियों को ही नहीं बल्कि लड़कों को भी अपने सम्मान का उतना ही ख्याल है।  आज हम ऐसे ही संवेदनशील पुरुषों को लेकर इसलिए बात कर रहे हैं क्योंकि महिला सशक्तीकरण के दौर में उनकी बात पीछे छूटती चली जा रही है और अधिकतर पुरुष इसलिए अपनी बात नहीं रखेंगे क्योंकि उनकी नजर में यह उनको कमजोर बनाता है। मैं महिला हूँ और महिला सशक्तीकरण में पुख्ता यकीन भी रखती हूँ मगर मेरा यह भी मानना है कि महिला सशक्तीकरण का अर्थ पक्षपात नहीं है और न ही यह लैंगिक समानता को सही तरीके से परिभाषित करता है। संवेदनशीलता लड़कियों के लिए ही नहीं लड़कों के लिए भी जरूरी है और जो भी घटनाएं पुरुषों की संवेदनहीनता के कारण हो रही हैं, वह इसलिए क्योंकि आपने उनको मजबूत बनने का ऐसा आवरण पहनाया है कि वे इंसान होना ही भूल गए हैं और मर्द होने का मतलब हिंसक होना समझ बैठे हैं। आपने उनको तकलीफ सहना सिखाया मगर खुलकर अपनी अभिव्यक्ति जाहिर करना भूल गए और नतीजा यह है कि जब वे तकलीफ जाहिर नहीं कर पाते तो या तो प्रतिशोध लेते हैं या फिर पत्थर बन जाते हैं। एक इंसान के तौर पर रोना मेरी नजर में कमजोरी नहीं है क्योंकि यह आपको कहीं न कहीं हल्का कर देता है और पुरुषों को यह छूट कभी नहीं दी गयी तो क्या यह असमानता नहीं है?  बहन भले ही कॉलेज में पढ़ रही हो मगर उसको छोड़ने और लेने उसका भाई ही जाएगा, फिर भले ही उसका ट्यूशन छूटे या क्लास छूटे और भले ही उसका इम्तहान हो और वह खुद बच्चा हो क्योंकि वह एक मर्द है। क्या यह असमानता नहीं है? आप लड़कियों पर इतना विश्वास रखकर उसे इतना सक्षम क्यों नहीं बनाते कि वह अपनी जिम्मेदारी खुद उठाए? मर्द होना तमाम इच्छाओं का मर जाना भी होता है क्योंकि बीबी भले ही शिक्षित हो, गुणी हो मगर जोरू का गुलाम कहे जाने के भय से वह उसे बाहर जाकर काम नहीं करने देगा, फिर भले ही ओवरटाइम करके बीमारियों का बोझ क्यों ही न बढ़ा ले। अगर रसोई में जाकर मदद करता है तो लोग कहेंगे कि बीबी ने उस पर जादू कर दिया है और नतीजा यह है कि बच्चों की परवरिश में हाथ बँटाकर उनके साथ वक्त बिताने की खुशी उसके हाथ से चली जाती है। आप थोड़ी देर के लिए क्यों नहीं मान सकते कि पुरुषों को भी महिलाओं की तरह घर की जरूरत है और घर की जिम्मेदारी उसकी भी है। वह अपनी बहन और माँ से लेकर पत्नी तक के ताने भी सुनता है क्योंकि वह उनकी बात कम सुनता है। अक्सर वह परिवार के लिए पैसे कमाने की मशीन से अधिक महत्व नहीं रखता औऱ ऐसे लोग ही अपराध के रास्ते पर बढ़ते हैं क्योंकि किसी भी तरह कमाने के चक्कर में वे भ्रष्टाचार और व्याभिचार, दोनों ही रास्तों पर चल पड़ते हैं। आप जरूरत नहीं समझते है कि लड़के कहाँ जा रहे हैं, क्या कर रहे हैं, किससे दोस्ती कर रहे हैं और होता यह है कि आवेश जैसे बच्चे गलत रास्ते पर चलकर जान गँवा बैठते हैं। लड़के किसी लड़की को छेड़कर आए या मारपीट कर के आएं तो भी परिवारों में उनके रुतबे पर खास असर नहीं पड़ता और नतीजा पार्क स्ट्रीट और निर्भया कांड में दिखता है। लड़कों को लड़का होने के कारण कुछ भी करने की छूट देना खुद लड़कों के साथ भी तो अन्याय ही है क्योंकि आपने उनसे एक अच्छा इन्सान बनने का मौका छीन लिया और उसकी परिणति यह हुई कि वह आगे चलकर एक अपराधी बन जाता है। ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता था अगर उनके घरों में ही उनकी गलतियों पर परदा नहीं डाला जाता मगर मोह में ऐसा नहीं हुआ तो लड़कों से अधिक बड़ा अपराध तो इन घरों में हुआ और हो रहा है। बसों में अक्सर देखती हूँ कि सीटें खाली रह जाती हैं और पुरुष खड़े होकर कई घंटे यात्रा करता हैं, बैग अगर भारी भी हुआ तो कोई हाथ नहीं बढ़ाता कि उसका बोझ थोड़ी देर के लिए उठा ले जिससे उसके कंधों को जरा सा आराम मिले, क्योंकि वह मर्द है और युवा भी है। क्या युवा पुरुष होना गुनाह है और क्या यह असमानता नहीं है?  हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है कि पुरुष या स्त्री ने जरा सा मदद का हाथ बढ़ाया नहीं कि लोग चक्कर ढूँढने बैठ जाते हैं और चरित्र का थर्मामीटर लेकर इश्क का बुखार उतारने वाले डॉक्टर बन जाते हैं। नतीजा यह है कि सड़क पर कोई मर भी जाए तो लोग सामने नहीं आएंगे और जिसने बेपरवाह होकर किसी लड़के या लड़की की मदद कर दी, वह निरा घनघोर चक्करबाज बना दिया जाता है और ऐसे समाज में आप संवेदनशीलता खोजेंगे तो वह दूरबीन लेकर ढूँढने से नहीं मिलने वाली है। यह सही है कि लड़कियों का शोषण होता है और उनका फायदा भी उठाया जाता है मगर यह भी सही है कि कुछ लड़कियाँ आगे बढ़ने के लिए शॉर्टकट अपनाती भी हैं और काम से अधिक अपने हाव – भाव और परिधानों से भी बॉस को आगे बढ़ने की सीढ़ी भी बनाती हैं। इसका खामियाजा भी उन लड़कियों को उठाना पड़ रहा है जो सचमुच काम करना चाहती हैं क्योंकि उपरोक्त देवियों की मेहरबानी से बॉस उनसे भी कुछ स्पेशल ट्रीटमेंट चाहने लगते हैं। ऑनर किलिंग का शिकार लड़के भी होते हैं और यकीन न हो तो जोड़ों में आत्महत्या करने वाले या फाँसी पर लटकाए जाने वाले युवाओं को याद कर लीजिए। रिजवानुर के मामले में भी यही हुआ क्योंकि उनकी मौत के बाद भी उसका इस्तेमाल भी उनके अपनों ने भी किया। आज सब अपनी – अपनी जगह पर हैं मगर जान तो रिजवानुर को गँवानी पड़ी। कई ऐसे लड़के हैं जिनकी ऐसी नियति हुई है और वह एक असफल विवाह को ढोकर अपनी और अपनी पत्नी का जीवन नष्ट कर रहे हैं क्योंकि उनकी खीझ और उनका गुस्सा घरेलू हिंसा, अवैध संबंध, हत्या और नशे के रूप में निकल रहा है। रैगिंग का शिकार भी अक्सर लड़के ही होते हैं और यकीन न हो तो आँकड़े यूजीसी से माँगकर देख लीजिए। हम तो चाहेंगे कि मोदी जी अगली बार सेल्फी विद् किड्स का नारा दें क्योंकि डॉटर अगर प्यारी है तो सन ने कोई गुनाह नहीं किया। कल्पना कीजिए कि 4 साल के बच्चे के सामने उसकी बहन की तस्वीर आप भेजकर सोशल मीडिया पर महान बनते हैं तो वह बच्चा अपनी बहन को दुश्मन नहीं समझेगा तो क्या समझेगा? क्या यह असंतुलन लाना नहीं है। कहने का मतलब यह है कि संवेदनशील होना पुरुषों की कमजोरी नहीं, ताकत है और बच्चों पर जबरन मर्दाना बोझ न लादकर इंसान बने रहने दीजिए, उसे एक सामान्य परवरिश दीजिए, अगर कोई तकलीफ है तो उनकी बात सुनिए और उसे खुलकर रोने और हल्का होने दीजिए क्योंकि ये इंसान होने के नाते उसका हक है और क्योंकि बंधु मानों या न मानो, दर्द तो मर्द को भी होता है और उसे स्वीकार कर आगे बढ़ना आपके साथ समाज की सेहत के लिए भी बहुत अच्छा होता है।

पैरालंपियन भी शीर्ष सम्मान और पुरस्कारों के हकदार : मिल्खा सिंह

0

चंडीगढ़ – महान एथलीट मिल्खा सिंह का मानना है कि परालम्पिक एथलीट भी देश के सर्वोच्च खेल पुरस्कारों और सम्मान के हकदार हैं।‘फ्लाइंग सिख’ के नाम से मशहूर मिल्खा ने कहा, ‘‘ये एथलीट भी देश के सर्वोच्च सम्मान और पुरस्कार के हकदार हैं क्योंकि ये उदाहरण है कि समाज कड़ी मेहनत, दृढ़ निश्चय और प्रतिबद्धता से क्या क्या हासिल कर सकता है। ’’ मरियप्पन थांगवेलु ने रियो परालम्पिक खेलों में पुरूषों की टी42 उंची कूद स्पर्धा में स्वर्ण, वरूण भाटी ने इसी स्पर्धा में कांस्य पदक और दीपा मलिक ने महिलाओं की एफ53 गोलाफेंक स्पर्धा में रजत और देवेंद्र झाझरिया ने पुरूष एफ46 भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। इसके बाद मांग उठ रही है कि परालम्पिक पदकधारियों को भी राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से नवाजा जाये।
ओलंपिक पदक जीतने वाला खिलाड़ी स्वत: ही ओलंपिक वर्ष के दौरान खेल रत्न पुरस्कार के लिये क्वालीफाई कर लेता है लेकिन पैरालम्पियनों के लिये इस तरह की कोई नीति नहीं है। मिल्खा सिंह 1960 रोम ओलंपिक में करीब से कांस्य पदक से चूक गये थे। उन्होंने रियो परालम्पिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ियों को उनके प्रयास और सफल प्रदर्शन के लिये बधाई दी।
उन्होंने कहा, ‘‘2014 में मुझे भारतीय परालम्पिक समिति ने ‘स्पोर्ट्स फॉर डेवलपमेंट रन’ को हरी झंडी दिखाने के लिये आमंत्रित किया था और मैं उस दिन वहां परालम्पिक एथलीटों से मिलकर उनके उत्साह से काफी हैरान था। ’’

 

दाना मांझी बोले- बेटियों को डॉक्टर- आईपीएस बनाऊंगा

0

नई दिल्ली.ओडिशा के दाना मांझी अपनी एक बेटी को डॉक्टर और दूसरी को पुलिस अफसर बनाना चाहते हैं, ताकि वे गांव के गरीबों की मदद कर सकें। मांझी वही शख्स हैं, जिन्हें पत्नी की मौत के बाद उसकी डेड बॉडी को कंधे पर लादकर मजबूरन 13 किमी पैदल चलना पड़ा था। कालाहांडी के हॉस्पिटल ने इन्हें एम्बुलेंस देने से इनकार कर दिया था। मामला सामने आने के बाद काफी विवाद हुआ था। गुरुवार को मांझी फ्लाइट से दिल्ली पहुंचे। उन्हें बहरीन के किंग की ओर से 8.87 लाख रुपए का चेक सौंपा गया। इस मौके पर मांझी ने बेटियों को आगे पढ़ाने की इच्छा जाहिर की।

”मैं चाहता हूं कि मेरी एक बेटी डॉक्टर बने और गांव के गरीबों की सेवा करे। दूसरी को पुलिस अफसर (आईपीएस) बनाना चाहता हूं।’ हॉस्पिटल का वाकया याद कर इमोशनल हुए मांझी ने कहा, “मैं कई बार लोगों के सामने गिड़गिड़ाया, लेकिन किसी ने मेरी नहीं सुनी।” ”डॉक्टरों ने भी कोई मदद नहीं की, क्योंकि मेरे पास एम्बुलेंस के लिए पैसे नहीं थे।”

– ”ऐसी स्थिति में मेरे पास सिर्फ एक ही रास्ता था कि पत्नी की बॉडी कंधे पर उठाऊं और बेटी के साथ घर की ओर चल दूं।’ बता दें कि अगस्त में कालाहांडी के सरकारी हॉस्पिटल में मांझी की पत्नी की मौत हो गई थी। उसे टीबी की बीमारी थी।  मांझी जब पत्नी का शव कंधे पर लेकर चले, तो उस दौरान उनके साथ रोते-बिलखते हुए बेटी चांदनी भी थी।

यह मामला कई दिनों तक सुखिर्यों में रहा था। सोशल मीडिया में मांझी को भारी समर्थन मिला था।

भुवनेश्वर का कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस (KISS) मांझी की बेटियों चांदनी (13), सोबेई (7) और प्रमिला को फ्री एजुकेशन देगा।  ओडिशा से दिल्ली आने के लिए इंस्टीट्यूट ने ही मांझी की एयर टिकट का इंतजाम किया। प्रोग्राम के बाद मांझी बोले- मैं फ्लाइट से ओडिशा जाऊंगा। KISS के फाउंडर और सोशल वर्कर अचुत्य सामंता ने मांझी के केस को बहरीन के किंग के पास पहुंचाया था। मांझी को सुलभ इंटरनेशनल से भी 5 लाख रुपए की मदद मिली है। बेहद गरीब मांझी के पास सरकार की दी हुई थोड़ी जमीन है, जिसमें वे खेती कर गुजर-बसर करते हैं।

 

जीवन पर बनी फिल्म गुणगान नहीं, मेरा सफर दिखाती है: धोनी

0

न्यूयार्क,: महेंद्र सिंह धोनी चाहते थे कि उनके जीवन पर बनी फिल्म में उनकी यात्रा को दिखाया जाए लेकिन उनका गुणगान नहीं किया जाए और फिल्म के निर्देशक नीरज पांडे को ‘एमएस धोनी-द अनटोल्ड स्टोरी’ के शुरूआती चरण के दौरान भारत के सीमित ओवरों के कप्तान ने यही बात कही थी।

पत्नी साक्षी और निर्माता अरूण पांडे , जिनकी कंपनी धोनी का प्रबंधन करती है,  के साथ अपनी फिल्म का प्रचार करने अमेरिका आए धोनी ने अपने जीवन और एक छोटे शहर के प्रतिभावान लड़के से भारत के सबसे सम्मानित कप्तानों में से एक बनने के बदलाव पर बात की। यह फिल्म दुनियाभर में 30 सितंबर को रिलीज होगी।

धोनी ने यहां फिल्म के प्रचार कार्यक्रम के दौरान कहा, ‘‘एक चीज मैंने पांडे :निर्देशक नीरज: को कही कि इस फिल्म में मेरा गुणगान नहीं होना चाहिए। यह पेशेवर खिलाड़ी के सफर के बारे में है और इसे यही दिखाना चाहिए।’’ असल जीवन में वर्तमान में जीने वाले धोनी के लिए यह मुश्किल था कि वह अपने जीवन में पीछे जाएं और फिल्म के लिए कहानी नीरज को सुनाएं।

धोनी से जब यह पूछा गया कि क्या वह चिंतित हैं कि फिल्म देखने के बाद एक व्यक्ति और क्रिकेटर के रूप में दुनिया उन्हें किस तरह देखेगी तो उन्होंने कहा कि ऐसा कुछ नहीं है।

उन्होंने कहा, ‘‘शुरूआत में जब फिल्म की धारणा रखी गई तो मैं थोड़ा चिंतित था लेकिन एक बार काम शुरू होने के बाद मैं चिंतित नहीं था क्योंकि मैं सिर्फ अपनी कहानी बयां कर रहा था।’’ जारी

 

कल्पना झा की तीन कविताएं

4

kalpana di

चिरशिशु

उन पर कविताएँ नहीं लिखी जाती
उन्हें तोहफे नहीं दिए जाते
उनसे किसी बात की माफी नहीं माँगी जाती कभी
उन्हें संपत्ति का हिस्सा नहीं दिया जाता
आगंतुकों के साथ नहीं बिठाया जाता
उन्हें न्योते नहीं दिए जाते

उनके सफ़र का कोई हमसफ़र नहीं होता
उनकी कमीज में जेब नहीं होती
उनकी पतलून में पर्स नहीं रहता
उन्हें कोई रोज़गार नहीं देता
उनकी खबरें अख़बारों और टेलीविज़न पर नहीं आती
उनकी कोई मांग नहीं होती
उनके मुद्दों पर संसद में चर्चा नहीं होती

उन्हें कैलेंडर के पन्ने पलटने आते हैं
पर दिन गिनने नहीं आते
उन्हें सिर्फ भूख लगती है
पेट की और स्नेह की
उन्हें आकर्षित करते हैं कागजों के रंगीन चित्र
उन्हें अचरज होता है देख कर
अपने हम उम्रों को किताबों में सर घुसाये

उन्हें अपने कान नाक मुंह गले का दर्द बताना नहीं आता
उन्हें दवाइयों के नाम नहीं आते

उन्हें आता है तो सिर्फ
बारिश की बूंदों को खिड़की से हाथ निकाल कर छूना
रंगों पर लोटना
आँधियों को अपलक निहारना
अनबोले शब्दों को आँखों से पढ़ना
उन्हें आता है हाथ मिलाना
आता है दया और प्यार में फ़र्क़ करना
आता है अंतहीन प्रतीक्षा करना

उन्हें जीवन के फलसफे नहीं मालूम होते
उन्हें पता होता है तो सिर्फ अपने खाने का वक़्त
और ये
कि अतिथियों के आने पर
उन्हें घर के किस कोने में जाकर बैठ जाना है

wine-painting

घर सजा कर

घर सजा कर
खिड़कियां बंद कर देने का रिवाज़
ख़त्म करते हैं
तेज़ हवा के झोंके सजावटी गमले न गिरा दें
यह डर दफ़्न करते हैं

खोलते हैं उन खिड़कियों को
जिनसे कहीं पास की झोपड़ियों के भात की खुशबू आती है
चूल्हे का धुंआ दाखिल होता है

उन धमाकों की आवाज़ें आने देते हैं
जो आये दिन हुआ करते हैं कहीं न कहीं
कुछ क्षण के लिए दिल दहल जाने देते हैं,
आशंकित होने देते हैं मन को कभी
उन बंदूकों की आवाज़ों से
जो चलती रहती हैं हर रोज़ कहीं न कहीं

खिड़कियां बंद कर लेने से
बाहर का शोर नहीं बंद हो जाता
झिलमिलाती रौशनी और परदों के पीछे से
थोड़ा थोड़ा सच घुस जाने देते हैं भीतर

चलो थोड़ा थोड़ा डरते हैं
उससे
जो अभी तक खिड़कियों के बाहर डरा रहा है दूसरों को
और किसी भी वक़्त दरवाज़ा तोड़ कर भीतर घुस सकता है

आओ
थोड़ा सा आक्रोशित होते हैं उस पर
जिसने अब तक हमला नहीं किया हम पर
पर पैरों के नीचे की ज़मीन काँप रही है जिसके पदचाप से
शायद कहीं पास ही
रौंदी जा रही है हरी घास
और उससे रिस रहा खून
थोड़ा थोड़ा बह रहा है इस ओर

आने देते हैं दूर से आ रही उन चीत्कारों को अपने पास
जज़्ब कर लेते हैं उस आर्तनाद को
पलने देते हैं गुस्सा अपने भीतर
हाथों की मुट्ठी भींच कर रखते हैं
और आँखों की नसों में खून उतर जाने देते हैं

तैयार रहते हैं उस युद्ध के लिए
जिसका एक पक्ष
किसी भी वक़्त हम बन सकते हैं

mona_1

और मुस्कुराती है मोनालिसा !

यहाँ मूंगफली बेचते हैं बच्चे
गाड़ियों के शीशे साफ़ करते हैं
बसों में पत्थर बजाते फ़िल्मी गाने  गाते हैं
मासूम कन्धों पर एक और मासूम देह लटकाए
बेचारगी से गाड़ियों के पीछे भागते हैं
दूध और चॉकलेट के लिए नहीं,
पेट भर खाने के लिए
और मुस्कुराती है मोनालिसा

यहाँ बच्चे कुदाल और फावड़ा चलाते हैं
ईंट पत्थर तोड़ते हैं
कूड़ा बीनते हैं और चुन लेते हैं उसमें से कुछ खेलने लायक कूड़ा
यहाँ बच्चे मंडी जाते हैं
सड़कों पर घूम घूम कर गुब्बारे बेचते हैं
और हाथों के फफोलों से रिसते पानी से
तक़दीर पर जमी मैल पोंछते हैं
और मोनालिसा मुस्कुराती है ड्राइंग रूम में

यहाँ सड़क किनारे चिथड़े बिछा
उसपर छोटे बच्चे को सुला
अपाहिज बनने का नाटक कर
भीख मांगती है औरतें
और शाम को चिल्लर समेट बस में चढ़ जाती हैं रात की रोटी सेकने
और मुस्कुराती है मोनालिसा

यहाँ घर से बेघर बूढ़े
दो चार सब्ज़ियों की दूकान लगा
बेचते हैं हर रोज़ आंसू
और मोल भाव करते लोग दो चार रुपये उनसे भी बचा लेते हैं
और मोनालिसा मुस्कुराती है ड्राइंग रूम में

यहाँ गाड़ियों के सामने आ जाते हैं पागल
अधनंगे, बालों का जट फैलाए
पहले से ही मरे हुए ये पागल
रोज़ बचते हैं मौत से
और रोज़ सुनते हैं दुर्दुराहट
पर और ज़्यादा पागल नहीं होते
नहीं हो सकते,
हंस कर, कुछ बड़बड़ा कर निकल जाते हैं
मुर्दा आँखों से ताकते हुए

और मुस्कुराती है मोनालिसा
सुन्दर घर के सुन्दर कमरे की दीवार पर।

(कवियत्री प्रख्यात रंगकर्मी तथा गायिका हैं। फिलहाल एक केन्द्रीय संस्थान में वरिष्ठ अनुवादक के रूप में कार्यरत)

चश्मा पहनती हैं तो ये मेकअप टिप्स जरूर अपनाएं

0

चश्मा पहनना भले ही स्टाइलिश कहा जाता हो मगर सच तो यही है कि लड़कियाँ आज भी यही मानती हैं कि यह उनकी खूबसूरती बिगाड़ देता है। हालांंकि ऐसा नहीं है मगर चश्मा आपकी जरूरत भी है और जब यह जरूरत है तो आप इसे भी अपनी तरह स्टाइलिश तरीके से पहन सकती हैं और इसके लिए आजमाइए ये मेकअप टिप्स –

कुछ लेंस आंखों को छोटा दिखाते हैं जबकि असली में ऐसा होता नहीं है। इससे बचने के लिए पिंक आय-लाइनर यूज करें। इसे नीचे वाली लैश-लाइन पर लगाएं जिससे आंखें ज्यादा खुली नजर आएं।

फ्रेम ही आइब्रोज पर फोकस बनाते हैं। इसलिए इन्हें हमेशा वेल-ग्रूम्ड रखें। ब्रो-पेन्सिल या पाउडर लगाने के पहले आइब्रोज के लिए ब्रो-कोम्ब यूज करें।

चश्मा आपके अंडर-आय सर्कल को हाइलाइट कर सकते हैं। फाउंडेशन से कंसीलर का शेड थोड़ा लाइट होना चाहिए। इसे इनर-कॉर्नर और अंडर-आईज में यूज करें तभी पूरा एरिया ब्राइट और लिफ्ट-अप दिखाई देगा।

 

कभी दुकान में मरम्मत करते थे सेलफोन, आज हैं करोड़ों की कंपनी के मालिक

0

नई दिल्ली. मोटरकोट्स इंडिया द्वारा कारों को ग्लैमरस बनाने के बिजनेस में कदम रखने वाले हरमीत सिंह की कहानी उनके हाथ से एक सेलफोन के टूटने से शुरू हुई थी। यह सेलफोन उनके दोस्त का था। फरीदाबाद के एनआईटी मोहल्ले में जन्मे हरमीत सिहं एक लोअर मीडिल सिख फैमली से हैं। उनके पिता फरीदाबाद में एक वर्कशॉप चलाते थे। हरमीत ने अपने बचपन में कई बार पिता के इस वर्कशॉप में काम किया। आज उनकी अलग-अलग कंपनियों में लगभग 200 लोग काम कर रहे हैं।

घर की आर्थिक स्थितियां कुछ ऐसी थीं कि हरमीत अपनी पढ़ाई 10वीं से आगे नहीं बढ़ा पाए। दिल्ली के करोलबाग मार्केट में एक छोटी सी मोबाइल रिपेयरिंग शॉप में नौकरी भी करनी पड़ी। हरमीत ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ‘मेरे हाथ से एक दोस्त का सीमन्स का काफी महेंगा सेलफोन टूट गया। पूरा फरीदाबाद घूमा, लेकिन वह बन नहीं पाया।  इसके बाद किसी ने बताया कि दिल्ली के करोलबाग में मोबाइल रिपेयरिंग की दुकानें हैं। दिल्ली गया तो वहां मेकैनिक ने दो हजार रुपए मांगे। इतने पैसे मेरे पास थे नहीं, लेकिन मोबाइल बनवाना भी जरूरी था।  पिताजी से इतने रुपए मांग नहीं सकता था, क्योंकि जानता था कि उनके पास भी एक साथ इतने पैसे नहीं मिल पाएंगे।
इधर-उधर से रुपए जमा करने के लिए 20 दिन लग गए। मोबाइल तो बन गया, लेकिन उसी दिन से ठान लिया कि अब कोई मोबाइल खराब होगा तो खुद ही बनाऊंगा।’

– घटना के बाद से ही हरमीत को धुन सवार हो गई कि वे मोबाइल टेक्नोलॉजी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करें।  वे दोस्तों के खराब मोबाइल लेते उन्हें खोलते और इसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करते। कई बार ऐसा होता कि थोड़ी बहुत धूल साफ करने से मोबाइल की खराबी दूर हो जाती।  इस दौरान एक दोस्त का सेलफोन खराब हो गया तो उन्हें एक आइडिया सूझा। उन्होंने आईसी पर कुछ खास निशान लगाए और फिर उसे मेकैनिक को दिया। जब सेलफोन बनकर आया तो वे जान गए कि उसमें क्या बदला गया है।  उनकी दिलचस्पी देखकर एक जान पहचान वाले ने उन्हें जालंधर में अपनी दुकान खोलने के लिए कहा। इस तरह उनकी पहली दुकान जालंधर में खुली, जहां उस समय काफी एनआरआई आया करते थे। दिल्ली के करोलबाग में उनका आना जाना काफी बढ़ गया था। यहां उन्हें एक दुकान में नौकरी मिल गई। जालंधर की अपनी दुकान एक दोस्त को देकर वे दिल्ली चले आए।  इस दौरान उन्होंने किस्तों पर एक कंप्यूटर भी खरीद लिया और अलग-अलग तरह के सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने के बारे में जानकारी मिलने लगे।
हरमीत करोलबाग में फोन अनलॉक करने के वाले स्पेशलिस्ट के तौर पर जाने लगे। सेलफोन के बाद उन्होंने सीसीटीवी कैमरा, ड्रोन और अब कारकोटिंग में कदम रखा। हरमीत ने मोबाइवाला.कॉम और जीएसएमफादर.कॉम पर उन्होंने अपना कारोबार चलाया। उन्होंने दिल्ली के बाद हैदराबाद में अपना स्टूडियो खोला है। इस दौरान उन्होंने दिल्ली में वो मकान को खरीदा, जहां पर वो किराए पर रहा करते थे।

 

एक गांव, जहां भैंसों संग प्रैक्टिस करके चैम्पियन हैं बेटियां

0

रियो ओलंपिक में देश को बेटियों ने मेडल जिताए। क्या आप जानते हैं कि देश में एक गांव ऐसा है, जहां बेटियां भैंसों के साथ प्रैक्टिस करके चैम्पियन बनी हैं। बात हो रही है, हरियाणा के भिवानी जिले के गांव अलखपुरा की। यहां का दौरा करेंगे तो खेल के प्रति बेटियों का जज्बा नजर आ जाएगा।

बिना किसी साधन सुविधा और ग्राउंड के, इस गांव की लड़कियां फुटबाल की प्रैक्टिस करती हैं और इसी तरह प्रैक्टिस कर कर के वे अब तक राज्य और नेशनल स्तरीय खेलों में हिस्सा ले चुकी हैं। इस गांव की लड़कियां साल 2009 से अंडर 14, अंडर 17 और अंडर 19 के चैम्पियन हैं।

2012 में हुए सुब्रतो मुखर्जी इंटरनेशनल टूर्नामेंट में इस गांव के खिलाड़ी तीसरे नंबर पर रहीं। 2013 में दूसरे नंबर पर और 2015 में उन्होंने मणिपुर को हराकर टूर्नामेंट अपने नाम किया था। यहां तक कि खिलाड़ी नवंबर 2016 में होने वाले सुब्रतो कप में अंडर 17 कैटेगरी में भी क्वालीफाई हो चुकी हैं, लेकिन प्रैक्टिस करने के नाम पर कोई सुविधा नहीं।

तालाब के किनारे प्रैक्टिस करती हैं लड़कियां

ऐसे में लड़कियां गांव के बीचों बीच बने तालाब के किनारे प्रैक्टिस करती हैं, वो भी नहा रही भैंसों के साथ। उधर भैंसे तालाब में नहा रही होती हैं और उधर खिलाड़ी तालाब के किनारे फुटबाल का अभ्यास कर रहे होते हैं। न कोई नेट और न कोई लाइन। बॉल तालाब में चली जाए तो उसे भी तैरकर बाहर निकालना पड़ता है। मजदूरों और कारीगरों की इन बेटियों ने अब इसी जुगाड़ के मैदान को अपनी किस्मत मान लिया है, जिसका परिणाम चैम्पियनों के रूप में सभी के सामने है।

गांव में कोई जिम भी नहीं है। ऐसे में लड़कियां रेत के मैदान में दौड़ लगाकर ही खुद को वार्मअप करती हैं। एक्सरसाइज करके खुद को एक्टिव रखती हैं। इन खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स किट और शूज फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर गोर्धन दास उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए वे गांव-गांव घूमकर चंदा इकट्ठा करते हैं। इन्होंने 2006 में लड़कियों के लिए फुटबाल की शुरूआत की थी।

 

इंटरनेट पर किस्सागोई : सुनकर आनंद लीजिए मशहूर हिन्दी कहानियों का

0

नयी दिल्लीजीवन की आपाधापी, सिकुड़ते वक्त और किताबों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे की चर्चा के बीच इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य की कालजयी और भूली बिसरी कृतियों को आडियो स्वरूप में डालकर प्रौद्योगिकी की मदद से किस्सागोई की नयी पहल हो रही है। इनमें प्रेमचंद, चंद्रधरशर्मा गुलेरी, सुदर्शन से लेकर कमलेश्वर, स्वयं प्रकाश और आधुनिक कहानीकारों की रचनाएं शामिल हैं। अमेरिका में रहने वाले अनुराग शर्मा स्वयं कहानीकार हैं और पिछले कुछ वषरें से ऐसे ही प्रयासों में संलग्न हैं। उन्होंने प्रेमचंद, भीष्म साहनी सहित विभिन्न हिन्दी रचनाकारों की 250 से अधिक कहानियों के आडियो स्वरूप को आर्काइव डाट काम तथा अन्य प्लेटफार्म पर डाला है। इन कहानियों को कोई भी व्यक्ति सुन सकता है और डाउनलोड भी कर सकता है। उन्होंेने बताया कि कहानियों के इन आडियो संस्करण पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

अनुराग ने  कहा कि वाचिक परम्परा बीच बीच में टूटती है। किन्तु यही परंपरा पुल भी बनाती है। मसलन, विदेश में पाकिस्तान के पाठक हिन्दी साहित्य और हिन्दी के पाठक उर्दू साहित्य को लिपि बाधा के कारण प्राय: पढ़ने में दिक्कत महसूस करते हैं। पर यदि इन भाषाओं के साहित्य को वे जब आडियो स्वरूप में सुनते हैं तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती।
उन्होंने बताया कि पुरानी कहानियों को सुनने के साथ इनके बारे में जानने की इच्छा पैदा होती है।