Saturday, March 21, 2026
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वो जो कभी नहीॆ था आपकी वफाओं के काबिल

 

कई बार ऐसा होता है कि जिस रिश्ते को हम प्यार और अपनेपन के साथ शुरू करते हैं कुछ समय बाद उसमें खटास आ जाती है। आपस का प्यार खत्म होने लगता है और दो लोगों के बीच का भरोसा कहीं खो जाता है।
रिश्ता चाहे जो भी हो, अगर उसमें प्यार और भरोसे के लिए कोई जगह नहीं है तो उससे बाहर निकल जाने में ही भलाई है। कई बार लड़कियां सारी सच्चाई जानने के बावजूद रिश्ते को खिंचती हैं.उन्हें अलगाव का डर होता है लेकिन यकीन कीजिए ऐसे रिश्ते का कोई भविष्य हो ही नहीं सकता। ऐसे किसी भी रिश्ते से आप जितनी अलग हो लें उतना बेहतर है।
अगर आपके और आपके पार्टनर के बीच तालमेल नहीं बन पा रहा है तो अलग हो जाने में ही भलाई है। अगर आपकी जिंदगी में भी ऐसा कुछ हो रहा है तो अच्छा रहेगा आप अभी संभल जाएं…
आप दोनों एक-दूसरे को लंबे समय से डेट कर रहे हैं लेकिन उसने आपको अभी तक शादी के लिए नहीं पूछा। इसका साफ मतलब है कि वो आपको लेकर श्योर नहीं है या फिर आप उसकी प्राथमिकता नहीं हैं।
क्या आप ही हमेशा मिलने का प्लान बनाती हैं? क्या आप ही उसे अक्सर फोन या मैसेज करती हैं और दूसरी तरफ से हमेशा जवाब का ही इंतजार करती हैं? अगर हां, तो अभी भी वक्त है।
क्या वो आपसे और आपकी जिंदगी से जुड़ी समस्या को सुनना पसंद नहीं करता? क्या वो आपको आपकी मुसीबतों के साथ छोड़कर चला जाता है? अगर वो ऐसा कर रहा है तो…
क्या उसके पास आपके लिए समय नहीं होता है? अगर वो आपके लिए सोच ही नहीं रहा है तो ऐसे रिश्ते का मतलब ही क्या है…
क्या वो अब भी अपनी एक्स-गर्लफ्रेंड के साथ घूमना पसंद करता है? क्या वो उससे आपकी तुलना करता है?
क्या वो आपको आपका व्यवहार बदलने के लिए कहता है? क्या वो आप पर किसी भी बात के लिए भरोसा नहीं करता है?
अगर आपका पार्टनर आपके साथ ऐसा कुछ भी कर रहा है तो इस रिश्ते को आगे बढ़ाने से पहले एकबार सोच जरूर लें।

अच्छे-अच्छों को धूल चटा देती हैं 76 साल की मीनाक्षीअम्मा

सही ही कहते हैं कि किसी की उम्र से उसकी काबिलियत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।अब कहने को तो मीनाक्षीअम्मा 76 साल की हैं लेकिन उनकी फुर्ती और एक्शन के आगे अच्छे-अच्छे मात खा जाते हैं।

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मीनाक्षीअम्मा दक्षिण भारत के एक बेहद पुराने मार्शल आर्ट्स फॉर्म कलरीपयत्तु की मास्टर है। दस साल की उम्र से ही उन्होंने इस विधा को सीखना शुरू कर दिया था। कुछ ही समय पहले मीनाक्षीअम्मा का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वो एक युवक के साथ अभ्यास करती नजर आ रही हैं। हजारों लोगों ने उन्हें घेर रखा है. डेली मेल में छपी खबर के मुताबिक, मीनाक्षीअम्मा सालों से अपने इलाके में इस विधा की ट्रेनिंग दे रही हैं। उनसे ट्रेनिंग पाकर कई दूसरे लोगों ने भी अब अपना ट्रेनिंग सेंटर खोल लिया है। कलरीपयत्तु स्टेप्स, पोश्चर और फाइटिंग स्टाइल का मेल होता है. ये किसी भी दूसरे परंपरागत मार्शल आर्ट से बिल्कुल अलग होता है ।

 

इस २२ वर्षीया छात्रा ने अकेले बचाया गुजरात के १११ बाल मजदूरों को !

अहमदाबाद की छात्रा, झरना जोशी केवल २२ साल की है पर इस छोटी सी उम्र में उन्होंने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है जो बड़े बड़े नहीं कर पायें। झरना ने अकेले ही एक गुप्त मिशन चलाकर १११ मासूम बाल मजदूरों को मोरबी के सिरेमिक कारखाने से बचाकर निकाला और इस दौरान झरने पर हमले भी करवाए गए।

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राजकोट के डिप्टी लेबर कमिश्नर, श्री. एम. सी करिया के मुताबिक़ सौराष्ट्र में बाल मजदूरो को बचाने का अब तक का ये सबसे बड़ा अभियान था।

इन बच्चो में से करीबन १०० लडकियां थी, जिन्हें घुनटू रोड पर स्तिथ सोनाकी सिरेमिक यूनिट से बचाया गया।

“अप्रैल के पहले सप्ताह में मैं अपने चचेरे भाई के घर छुट्टियाँ बिताने आई थी। एक दिन सुबह सुबह मैंने कई बच्चो को बसो में बिठाकर ले जाते देखा। ये स्कूल बसे नहीं थी इसलिए मुझे शक हुआ और मैंने उन बसों का पीछा किया। तब मुझे पता चला कि इन बच्चो को फैक्ट्री में काम कराने के लिए ले जाया जा रहा था,” बीबीए दूसरे वर्ष की छात्रा, झरना ने बताया।

इन बच्चो की सही उम्र पता करने के लिए झरना ने इसी फैक्ट्री में नौकरी करने का फैसला किया। फैक्ट्री में कोई भी जगह खाली न होने की वजह से झरना को डिजाईन यूनिट में नौकरी दे दी गयी। बस १५ दिन यहाँ काम करने के अन्दर ही झरना को ये पता चल गया कि यहाँ काम करने वाले ज़्यादातर बच्चे १८ साल की उम्र के नीचे है और इनसे जबरन सुबह ८ बजे से लेकर शाम के ६ बजे तक काम करवाया जाता है। इन बच्चो को बाहर जाने तक की इजाज़त नहीं थी और कुछ को भीषण तापमान वाली जगहों जैसे कि भट्टियों में भी काम कराया जाता था। इन मासूमो को बिना खाना या पानी के घंटो काम करना पड़ता था।

सारी जानकारी हासिल करने के बाद झरना ने उपयुक्त विभाग में इस बात की रपट लिखवाई।

मैंने प्रधानमंत्री के दफ्तर को पत्र लिखा तथा २४ मई को खुद गांधीनगर भी गयी। और आखिरकार मुझे आश्वस्त किया गया कि शुक्रवार को इसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी,” झरना ने बताया।

विभिन्न विभागों के अफसरों ने मिलकर इस फैक्ट्री पर रेड मारी और इस बचाव अभियान को अंजाम दिया। इन विभागों में सोशल डिफेन्स, पुलिस और लेबर और एम्प्लॉयमेंट विभाग के साथ साथ फैक्ट्री इंस्पेक्टर तथा चाइल्ड प्रोटेक्शन ऑफिसर भी शामिल थे।

इस बहादुर युवती की समाज के प्रति कर्तव्य परायणता तथा सूझ बुझ ने कई मासूमो का बचपन बचा लिया।

 

इ-ड्रॉपबॉक्स से अब बच्चे ऑनलाइन भी कर सकते हैं दुराचार की शिकायत !

देश में बच्चों के साथ दुराचार की घटनाएँ अक्सर सामने आती हैं, लेकिन उससे कई गुना अधिक घटनाएँ ऐसी होती हैं जो कहीं दर्ज ही नहीं की जातीं। उसका एक बड़ा कारण यह  है कि ऐसे मामलों में दोषी बच्चों के परिवार का ही करीबी, रिश्तेदार या जानने वाला होता है, जिसके खिलाफ बच्चे डर और झिझक से कभी शिकायत नहीं करते।

बच्चे ऐसे मामलों की शिकायत अपने घर में भी नहीं करते। ऐसे में इन मामलों पर कार्रवाई का कोई रास्ता नहीं बचता है।

लेकिन अब इन्हीं मामलों पर शिकंजा कसने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और राष्ट्रीय बाल अधिकार सरंक्षण आयोग ने कमर कस ली है। बच्चो का सुरक्षा घेरा बढ़ाने के लिए मंत्रालय ने शिकायत करने का आसान और सुरक्षित तरीका बच्चों को दिया है।

अब बच्चे बिना डरे अपनी शिकायत आसानी से दर्ज करा सकते हैं, जिस पर आयोग कड़ी कार्रवाई करेगा। और इसमें बच्चे को अपनी पहचान बताने की भी जरूरत नहीं पडेगी। 

2007 में हुए एक सरकारी अध्ययन के मुताबिक भारत में करीबन 69 % बच्चे यौन शोषण का शिकार हुए हैं। लेकिन उनमें से ज्यादातर बच्चे शिकायत तक दर्ज नहीं करा पाते। 13 राज्यों के 12447 बच्चों पर कराये गए सर्वेक्षण में आन्ध्र प्रदेश, बिहार,असम राज्यों सहित देश की राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा मामले पाए गए।

शोषण के 50 प्रतिशत मामलों में शोषण करने वाला, बच्चों के घर से या पहचान का रिश्तेदार या भरोसेमंद आदमी ही होता है। और इसीलिए अधिकतर बच्चे शिकायत की तो छोडिये, इसकी जानकारी तक किसी को नहीं होने देते।

ऐसे मामलों से निपटने के लिए बच्चों के साथ होने वाले अश्लील कृत्यों और यौन शोषण की शिकायत के लिए ऑनलाइन शिकायत बॉक्स बनाया गया है। बच्चों के अधिकारों के लिए भारत सरकार का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय एक ऐसे ई-ड्रॉपबॉक्स पर काम कर रहा है, जिसमें बच्चे अपने साथ होने वाली ऐसी घटनाओं की शिकायत आसानी से दर्ज करा सकते हैं।

इस ड्रॉपबॉक्स में बच्चे गाली-गलौज से लेकर शोषण और अश्लील कृत्यों की शिकायत अपनी बिना पहचान बताए दर्ज कर सकते हैं।

मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक यह ड्रॉप बॉक्स ज्यादातर मामलों को सामने लाएगा। 

अक्सर देखा गया है कि ऐसे ज्यादातर मामलों में बच्चों का करीबी ही शामिल होता है जिसके खिलाफ बच्चे घर में भी किसी को बताने से डरते हैं। ऐसे बच्चे अब घर से लेकर बस, ट्यूशन और स्कूल में कहीं भी अपने साथ होने वाली ऐसी घटनाओं के खिलाफ शिकायत कर सकेंगे।

इसकी भाषा से लेकर प्रयोग के विकल्प बेहद आसान बनाये गए हैं। तस्वीरें और कई आइकनों (चिन्हों) के माध्यम से छोटे बच्चे भी समझ सकेंगे और अपनी शिकायत दर्ज कर सकेंगे।

महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा, “बच्चों के साथ होने वाली शोषण और उत्पीडन की घटनाओं को रोकने के लिए यह एक और कदम है। इससे बच्चों की सुरक्षा के लिए लक्ष्मण रेखा और मजबूत होगी।

ये ई-ड्रॉपबॉक्स राष्ट्रीय बाल अधिकार सरंक्षण आयोग (NCPCR) की वेबसाइट पर उपलब्ध रहेगा। जहाँ आसानी से इसका प्रयोग किया जा सकता है। बच्चों की सुरक्षा का यह अभियान दिल्ली पुलिस द्वारा चलाये जा रहे ‘ऑपरेशन निर्भीक’ से प्रेरित है। ‘ऑपरेशन निर्भीक’ लड़कियों की शिकायतों को लेकर चलाया जा रहा बेहतरीन अभियान है, जिसमें दिल्ली के विभिन्न स्कूलों में ‘शिकायत बॉक्स’ रखवाए गए हैं। इन शिकायत बॉक्सों में कोई भी लड़की अपने साथ हुए किसी भी तरह के उत्पीडन की शिकायत लिखकर डाल सकती है। और फिर दिल्ली पुलिस उस शिकायत की पड़ताल करती है। उस बॉक्स की कई शिकायतें एफआईआर में तब्दील कर दी जाती हैं और दोषियों पर कड़ी कारवाई की जाती है। दिल्ली पुलिस और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का ये अभियान बच्चों को घर और स्कूल में अपने साथ कुछ भी गलत किए जाने के खिलाफ बेझिझक शिकायत करने को प्रेरित कर रहां हैं। इससे बच्चे न सिर्फ़ सुरक्षित होंगे बल्कि निडर होकर अपनी बात भी कह सकेंगे।

(साभार – द बेटर इंडिया)

15 की उम्र में मजदूर का बेटा बना आईआईटी का छात्र

जोधपुर.राजस्थान के जोधपुर जिले के बिलाड़ा के पास एक छोटे से गांव के रहने वाले सुनील ने सिर्फ 15 साल 11 माह की उम्र में ही आईआईटी में एडमिशन ले लिया है। जब वह डेढ़ साल का था तभी स्कूल जाने लगा था और 13 साल में 10वीं व 15 की उम्र में 12वीं पास कर लिया था।  – सुनील का जन्म 20 जुलाई 2000 को हुआ था, वह आने वाले 20 जुलाई को 16 साल का होगा, लेकिन इससे पहले ही फर्स्ट अटेम्ट में आईआईटी कानपुर के लिए सिलेक्शन हो गया है।

सुनील दूसरा सबसे छोटा आईआईटीयन है। पहले स्थान पर दिल्ली का सहल कौशिक है, जो 2010 में मात्र 14 साल में आईआईटी पहुंचा था। सुनील के पिता प्रकाशचंद्र बताते हैं कि वे सुनील के जन्म से पहले से ही कमठा मजदूर का काम करते हैं। उन्होंने सुनील जब डेढ़ वर्ष का था तो आसपास के बच्चों को देखकर स्कूल जाने की जिद करने लगा। इस पर उसे स्कूल में एडमिशन दिलवा दिया। सुनील के पिता ने बताया कि वह हर बार क्लास में फर्स्ट आता था। इसके बाद मैंने सेविंग करनी शुरू कर दी, क्योंकि मुझे लग गया था कि एक दिन वह किसी बड़े कॉलेज में जाएगा। पैसे बचाकर सुनील के पिता ने सुनील को 11वीं में पढ़ने के लिए जोधपुर भेजा। दो साल वह जोधपुर में पढ़ा।

इसके बाद एक वर्ष कोटा में रहकर आईआईटी की तैयारी की और इस बार आईआईटी एडवांस में ओबीसी में 1039वीं व सामान्य वर्ग में 5804वीं रैंक हासिल की। उसे 3 जुलाई को काउंसलिंग के बाद कानपुर आईआईटी में प्रवेश मिल गया। वह सिविल में बीटेक करेगा, लेकिन उसका सपना आईएएस बनना है। सुनील ने दसवीं में 85.33 और 12वीं में 88.60 अंक हासिल किए। आईआईटी जेईई की तैयारी के लिए एक वर्ष कोटा रहा। पिता ने तीन वर्ष में उस पर 4 लाख रुपए से ज्यादा खर्च किए। सुनील की मां मांगीदेवी नरेगा में काम करती हैं।

 

सोशल मीडिया पर हुए दुर्व्यवहार की शिकायत अब महिलाये कर सकती है दर्ज !

महिला एवं बाल विकास मंत्री, मेनका गाँधी ने बीते मंगलवार को घोषणा की है, कि सोशल मीडिया पर महिलाओ के ऊपर भद्दे कमेंट और बदसलूकी करने वालो के ऊपर अब कार्यवाही की जाएगी। जिन महिलाओ के पोस्ट के ऊपर भद्दे कमेंट या उनके साथ बदसलूकी की गयी है वो महिलाये अपने फेसबुक और ट्विटर पेज पर  हैशटैग #ImTrolledHelp  के साथ अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है। या फिर अपनी शिकायत सीधे मेनका गाँधी को मेल भी कर सकती है।

मेनका गाँधी ने आगे  कहा कि ये शिकायते सीधे राष्ट्रीय महिला आयोग के पास भेजी जायेंगी और इसके साथ ही राष्ट्रीय महिला आयोग सोशल मीडिया पर होने वाले महिलाओ के साथ दुर्व्यवहार पर निगरानी भी रखेगा।

मेनका गाँधी ने ट्वीट किया “ क्या आप भी उन महिलाओ मेंसे एक है जिसके साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया गया है? तो मुझेइस बारे में [email protected] पर  सूचना दीजिये 

मेनका जी का ये ट्वीट अभी बीते दिनों घटित हुयी एक घटना के सन्दर्भ में आया है, जिसमे एक प्रसिद्ध बॉलीवुड गायिका सोना महापात्रा को सलमान खान के बॉलीवुड कलाकारों के रेप से पीड़ित महिला के  साथ तुलना करने वाले बयांन की आलोचना करते हुए किये गए ट्वीट की वजह से सलमान खान के प्रसंशको की नाराजगी और  सोशल मीडिया पर बदसलूकी का सामना करना पड़ा।

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मेनका गाँधी ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने इंटरव्यू में बताया, “ गायिका के साथ सोशल मीडिया पर  हुए इस तरह के दुर्व्यवहार को नोटिस किया गया और तुरंत इस सन्दर्भ में आगे कार्यवाही करते हुए उस व्यक्ति का ट्विटर अकाउंट बंद करवा दिया गया। सोशल मीडिया पर काफी भद्दे कमेंट्स किये गये थे। इस बात का पता चलते ही हमने तुरंत राष्ट्रीय महिला आयोग को इस मामले में दखल देने को कहा और सम्बंधित व्यक्ति द्वारा  इस तरह की अभद्र टिप्पणिया करने के लिए तुरंत कार्यवाही करने को कहा।”
लेखिका अपर्णा जैन ने वर्ष 2014 में अपने ट्विटर अकाउंट में अनजान व्यक्ति के ट्विटर अकाउंट से बलात्कार करने की धमकियां मिलने के बाद साइबर सेल में अपनी शिकायत दर्ज करवाई थी।
अपर्णा ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया, “ मुझे इस बात की बेहद ख़ुशी है कि किसी ने इस मामले में ध्यान दिया ,कि सच में ये एक समस्या है। पर एक बार शिकायत दर्ज करने के बाद वो आगे क्या करेंगे … क्या इसके बाद भी उन्हें पुलिस के पास जाना पड़ सकता है?”
उच्चतम न्यायालय की वकील करुना नंदी का कहना है, “जबसे राष्ट्रीय महिला आयोग को महिला अधिकारों के उल्लंघन की जाँच में सिविल कोर्ट की तरह कार्यवाही करने का अधिकार दिया गया है , तबसे ही इस तरह के मामलो में आनेवाली शिकायतों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। “

वो आगे कहती है कि अगर आयोग पुलिस को सीधे शिकायत दर्ज करने के लिए कहे तो इस मामले को लोग ज्यादा गंभीरता से लेंगे और ऐसा करने से पहले कई बार सोचेगे।
पर विडम्बना यह है कि, मंत्रीजी को उनके सम्बंधित ट्वीट के बाद बड़ी संख्या में उनके पुरुष फालोवार्स के द्वारा लिंग समानता के नाम पर उपहास का पात्र बनाया गया।

बॉलीवुड के प्रसिद्ध गायक अभिजीत भटटाचार्य जिन पर बीते दिनों पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी के साथ सोशल मीडिया पर बदसलूकी करने का आरोप है, ट्वीट करते है, “मै भी एक आदमी, एक बेटा, एक पिता, एक भाई हूँ और मुझे सोशल मीडिया पर कुछ महिला पत्रकारों और उनके कुछ पाकिस्तानी दोस्तों के द्वारा गाली गलौज  का सामना करना पड़ा और उन्होंने मेरे देश को भी गाली दी तब मुझे कहाँ पर अपनी शिकायत दर्ज करनी चाहिए? ”
मेनका गाँधी ने सोशल मीडिया पर इस तरह की बदसलूकी की घटनाओ पर पहले भी कई बार अपने विचार व्यक्त किये है। इस साल मई में उन्होंने कहा था, “सरकार सोशल मीडिया पर महिलाओ के साथ हो रहे अभद्र व्यवहार पर कड़ी कारवाही करने पर विचार कर रही है।”

(साभार – द बेटर इंडिय़ा)

एक दिन की दावत नहीं बच्चों को उनकेे पैरों पर खड़े होने का हुनर दीजिए

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  • – माधवीश्री

अभी हाल में राजधानी के एक रेस्तरां में एक महिला द्वारा कुछ गरीब बच्चों को भोजन करवाने में बाधा पहुंचाने हेतु एक खबर बहुत तेजी से प्रसारित हुई। आज से कुछ साल पहले की बात होती तो मैं रेस्तरां वाले को बहुत कोसती , उस महिला को बहुत धन्यवाद देती उसके कोमल ह्रदय के लिए, बच्चों के प्रति उनके मन में बसी उदारता के लिए पर कुछ सालो में मुझमे कुछ परिवर्तन आये हैं जिसके कारण मेरे सोचने का नज़रिया बहुत कुछ बदल गया है। यह उस बदले हुए सोच का परिणाम है कि मैं यह सोच रही हूँ कि इस एक दिन की दावत से इन बच्चों के जीवन में क्या परिवर्तन आएगा ? आनेवाले दिनों में ये क्या बनेंगे ? आनेवाले दिनों में यह एक दिन की दावत उन्हें क्या बनने  के लिए प्रेरित करेगी ? अवश्य ही विवेकानंद , भगत सिंह , मार्क जुबेरबरक , स्टीव जॉब, अब्दुल कलाम  ऐसा कुछ बनने के लिए प्रेरित तो नहीं करेगी।  अगर हम इन सभी  प्रसिद्ध हस्तियों के जीवन में नज़र डाले  तो हम पाएंगे कि सभी ने मुश्किलों और तकलीफों का सामना अपने जीवन में किया पर उनसे कभी हार नहीं मानी।  डट कर उसका मुकाबला किया और  उस पर विजय प्राप्त की।  तभी वे हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत्र है।  उनका जीवन हमें कठनाइयों से लड़ने की राह दिखता है।  सपने देखना सीखता है और उस सपने को हासिल करने के लिए काम करना और मजबूत होना सीखता है।

मैं  उक्त महिला के हमदर्दी के बारे में सोच  रही थी , उसकी इस एक दिन की पार्टी से बच्चे क्या सीखेंगे अपने जीवन में यही कि  कोई एक अमीर आएगा उनेह किसी बड़े रेस्तरां ले जायेगा और उनके एक दिन का जीवन धन्य  हो जायेगा।  आगे चल कर वे भी अपने बच्चों के लिए यही सपने बुनेगे – आश्रित होने के सपने। यह एक खतरनाक स्थिति है।  निजामुद्दीन या दिल्ली के कई रेड लाइट सिग्नल पर खड़े हुए ऑटो में बैठे लोगो से हक़ से भीख मंगाते बच्चे मुझे डरा जाते है।  भीख मांगना कभी हक़ नहीं हो सकता।  तनख्वाह मांगना , मज़दूरी मांगना हक़ हो सकता है।  पर इन बच्चों में मैंने भीख को हक़ की तरह मांगते हुए देखा हैं और भीख न मिलने पर वे आपको छूने लगते है या चिकोटी काटने लगते हैं।  यह और भी भयानक स्थिति है।  क्या मीडिया कभी इस एंगल से सोचेगा?

काश कुछ लोग इन बच्चों को कुछ हुनर सिखाए, साफ- सफाई के फायदे समझाए ,पढाई लिखाई  सिखाए , इनमे आत्मविश्वास भरे तो शायद इन बच्चों और इस देश दोनों का कल्याण होगा। किसी को हथेली पर धर  कर कुछ नहीं मिलता यह  बात इन बच्चों को सिखानी चाहिए। उनके अंदर यह आत्मविश्वास जगना होगा कि तुम गरीब पैदा तो हुए हो पर इसमें तुम्हारी गलती नहीं है , पर अगर गरीब मरे तो इसमें तुम्हारी  गलती है।  तुम में वह ताक़त है कि तुम अपना कल बदल सकते हो।  किसी रेस्तरां में एक दिन का भोजन कर लेने से इन बच्चों का जीवन नहीं बदल सकता न ही इनमे आत्माविश्वास पनप सकता है जो इनको लम्बी रेस का इंसान बनाए। आज जरूरत है हमको अपने नज़रिए को बदलने कि ताकि हम इन बच्चों का भविष्य सच में बदल सके न कि एक दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात वाला हाल हो इनका. क्या मीडिया कभी ठहर कर ऐसा सोचेगा?

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं)

 

 

 

 

 

यूनिसेफ के साथ प्रियंका चोपड़ा ने छेड़ी बच्चों को आगे बढ़ाने की मुहिम

हाल ही में दिल्ली मे यूनिसेफ की गुडविल एम्बेस्डर अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने यूनिसेफ द्वारा प्रयोजित ” एक न्याय संगत शुरुआत सभी बच्चों के लिए ” नामक मुहिम की शुरुआत की।  इस अवसर पर पत्रकारों और युवा लड़कियों  के सवालों का जबाब देते हुये अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने कहा कि लड़कियों के साथ भेद – भाव का सबसे बड़ा कारण ” मानसिक सोच ” हैं।  गलत मानसिक सोच के तहत ही हम ये सोचते हैं कि लड़के लड़कियों से बेहतर हैं , लड़कों से मुखाग्नि लेकर ही परिवार का वंश आगे बढ़ सकता हैं।  ये सारे मानसिक सोच ही हमे पीछे धकेलते है और यही सोच ही समाज मे भेदभाव पैदा करता हैं।  उनोहने कहा कि हम अपने आस -पास के माहौल मे भी लड़कियों की शिक्षा मे योगदान दे सकते है जैसे अपने ड्राइवर , घरेलू कर्मचारी के बच्चों को पढ़ा कर।  जरूरी नहीं कि  हम सारी दूनिया को बदल पाये पर जितना योगदान हम अपने अगल- बगल कर सकते है उतना तो जरूर करे।   इस अवसर पर यूनिसेफ के प्रतिनिधि लुईस जॉर्ज ने कहा कि हमारे पास साफ तौर से मुख्य चुनाव हैं कि या तो हम जो बच्चे पिछड़ गये हैं उनके विकास मे अपना योगदान करे या फिर 2030 मे एक ज्यादा विभाजित और असमान समाज का सामना करे।   एक अँकड़े के मुताबिक अभी 61 लाख बच्चे भारत मे स्कूल से बाहर हैं।  करीब एक करोड़ बच्चे काम मे लगे हैं , 3500 बच्चे रोज मर रहे हैं पांच वर्ष की उम्र से पहले।  भारत मे 42 % जनजातीय बच्चे अविकसित हैं।  भारत  लड़कियाँ भी समान अवसर की हकदार है पर 22 लाख से भी ज्यादा लड़कियों की शादी कम उम्र मे कर दी जाती हैं।

 

कहां से आया ‘ईद-उल-फितर’ शब्द

इस्लाम धर्म में पवित्र रमजान के पूरे महीने रोजे अर्थात् उपवास रखने के बाद ईद-उल-फितर का त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार रमजान के अंत में मनाया जाता है। मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए यह अवसर भोज और आनंद का होता है। फितर शब्द अरबी के ‘फतर’ शब्द से बना। जिसका अर्थ होता है टूटना।

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कोई एक निश्चित दिन तय नहीं 

अन्य इस्लामी त्योहारों की तरह रमजान एक दिन विशेष पर नहीं आता है। यह इस्लामी केलेंडर का नौवां महीना होता है। इस प्रकार यह पूरा माह ही त्योहारों की तरह होता है। इबादत या प्रार्थना, भोजन और मेल-मिलाप इस त्योहार की प्रमुख विशेषता है। ईद खुशी का दिन है।

 इसलिए पहनते हैं ईदगाह पर सफेद पोशाक 

इस दिन की रस्मों में सुबह सबसे पहले नहाना, नए कपड़े पहनना,सुगंधित इत्र लगाना, ईदगाह जाने से पहले खजूर खाना आदि मुख्य है। आमतौर पर पुरुष सफेद कपड़े पहनते हैं। सफेद रंग पवित्रता और सादगी का प्रतीक है। इस पवित्र दिन पर बड़ी संख्या में मुस्लिम अनुयायी सुबह जल्दी उठकर ईदगाह, जो ईद की विशेष प्रार्थना के लिए एक बड़ा खुला मैदान होता है, में इबादत ओर नमाज अदा करने के लिए इकट्ठे होते हैं।

 फितर यानी उपहार देना 

नमाज से पहले सभी अनुयायी कुरान में लिखे अनुसार, गरीबों को अनाज की नियत मात्रा दान देने की रस्म निभाते हैं। जिसे फितर देना कहा जाता है। फितर या एक धर्मार्थ उपहार है, जो रोजा तोडने के उपलब्ध में दी जाती है।

मस्जिद के बाहर नमाज की विशेष व्‍यवस्‍था इसी दिन 

ईदगाह पर इमाम द्वारा ईद की विशेष इबादत और दो रकत नमाज अदा करवाई जाती है। ईदगाह में नमाज की व्‍यवस्‍था इस त्योहार विशेष के लिए होती है। अन्य दिनों में नमाज मरिजदों में ही अदा की जाती है।

 

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा से जुड़े हैं ये रहस्य

जगन्नाथ रथ यात्रा के समापन का दिन ‘नीलाद्रि बिजे’ कहलाता है। यह दिन इस बार 14 जुलाई 2016 के दिन है, इस दिन द्वादशी है। यह वही दिन है जब रथों पर ‘अधर पणा’ (भोग) के बाद भगवान जगन्नाथ को मन्दिर में प्रवेश कराया जाता है इसे ‘नीलाद्रि बिजे’ कहते हैं।

इसके पहले भगवान का स्वर्णाभूषणों से श्रृंगार किया जाता है जिसे ‘सुनाभेस’ कहते हैं। इस तरह यह जगन्नाथ रथ यात्रा पूर्ण होती है। अगले वर्ष के इंतजार में भक्त भावविभोर होकर इस पूरे उत्सव का समापन श्रद्धा पूर्वक करते हैं। जब भक्त गुंदेचा मंदिर के भगवान के दर्शन कर रहे होते हैं उसे ‘आड़प दर्शन’ कहते हैं।

हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथि को जगन्नाथ रथ यात्रा निकाली जाती है।

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यहां जाती हैं रथ की लकड़ियां और काष्ठ मूर्तियां

जब अषाढ़ माह में अधिकमास आता है, तब पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा ‘नवकलेवर’ उत्सव मनाया जाता है। नवकलेवर उत्सव 13 दिनों तक जारी रहा।

रथ यात्रा के बाद तीनों रथों की पवित्र काष्ठ (लकड़ी) को भक्त अपने घर ले जाएंगे जहां वो सुख, समृद्धि, संपन्नता के लिए पूजाघर में रखेंगे एवं काष्ठ की वर्षभर पूजा करेंगे।

रथ यात्रा में पहली रोचक बात यह है कि ‘नवकलेवर’ में निर्मित मूर्तियों को हर वर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा में निकाला जाएगा। यह दौर तब तक जारी रहेगा जब तक अगला नवकलेवर नहीं आता यानी ‘अषाढ़ माह में अधिकमास और जगन्नाथ रथ यात्रा का विशेष संयोग।’

मूर्ति शिल्पकार की हो जाती है मृत्यु

जगन्नाथ रथ यात्रा की दूसरी रोचक बात यह है जब ‘नवकलेवर’ उत्सव के लिए नई काष्ठ मूर्तियां जो शिल्पकार बनाता है उसकी मृत्यु हो जाती है। ‘नवकलेवर’ में वह शिल्पकार भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र की काष्ठ मूर्तियां बनाता है।

नवकलेवर उत्सव के समापन पर नई मूर्तियों को मंदिर परिसर में ही एक विशेष स्थान पर रखा जाता है। पुरानी मूर्तियों को मंदिर परिसर में विशेष स्थान पर धरती में समाहित कर दिया जाता है। जहां भक्त पुष्प अर्पित करते हैं। यह वही स्थान होता है जहां नवकलेवर उत्सव के दौरान सदियों से समाहित किया जा रहा है।

आश्चर्य की बात यह है कि जब पुरानी मूर्तियों को धरती में समाहित किया जाता है तब उनसे पहले की मूर्तियां उस स्थान पर अदृश्य मिलतीं हैं। यह क्रम सदियों से चला आ रहा है। जिस पर श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है।

इस तरह नवकलेवर में निर्मित इन तीनों काष्ठ मूर्तियों को हर वर्ष पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा में दर्शनार्थ निकाला जाता है। और यह क्रम अगले नवकलेवर उत्सव तक जारी रहता है।