Thursday, September 24, 2026
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अब पासपोर्ट बुकलेट में नहीं देनी पड़ेगी पिता-पति की डिटेल, केंद्र बदल सकता है फॉर्मेट

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केंद्र सरकार ने पासपोर्ट फार्मेट में बड़ा बदलाव कर सकती है। पासपोर्ट बुकलेट पर अब तक आवेदनकर्ता के पिता, मां और पति या पत्नी का नाम होता था. पर अब इस ऑप्शन को हटाने पर सरकार विचार कर सकती है। एक अंतरमंत्रालीय पैनल ने विदेश मंत्रालय को ये प्रथा खत्म करने का प्रस्ताव दिया था। ये प्रस्ताव कई लोगों खासतौर से महिलाओं की शिकायतों को देखते हुए दिया गया है।

पैनल का कहना है कि अविवाहित, पति से अलग रहने वाली या तलाकशुदा महिलाएं को अक्सर इस तरह की जानकारियां देने में परेशानी होती है। पासपोर्ट में इन सभी जानकारियों की कोई जरूरत नहीं है।

तीन महीने पहले हुआ था पैनल का गठन
महिला व बाल विकास मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और केंद्रीय पासपोर्ट ऑर्गनाइजेशन की ओर से तीन महीने पहले इस पैनल का गठन किया गया था, जिसका काम पासपोर्ट एक्ट 1967 और पासपोर्ट नियम 1980 की समीक्षा करना था।

पैनल ने दिए थे ये तर्क
पैनल का कहना था कि दुनियाभर की सभी विकासशील देशों में पासपोर्ट बुकलेट ये सारी जानकारी नहीं लिखी जाती है। इस प्रस्ताव में ये भी कहा गया कि विदेश मंत्रालय ये सभी जानकारियां अपने रिकॉर्ड के लिए ले सकता है, लेकिन इन्हे पासपोर्ट बुकलेट पर छापना जरूरी नहीं है। खासतौर से महिलाओं को इस पेज की वजह से उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ता है।

केंद्र ने पासपोर्ट नियम में किए थे ये बदलाव
इसके अलावा केंद्र सरकार ने पासपोर्ट नियम में कुछ बदलाव किए थे। पहले जहां आवेदन के समय आवेदक से 12 सवाल पूछे जाते थे, अब वहीं केवल नौ सवालों के ही जवाब देने होंगे। आवेदक के पास पहले पासपोर्ट था या नहीं? और कभी विदेश दौरा किया था? यह दोनों सवाल हटा दिए गए हैं। पुलिस वैरिफिकेशन पासपोर्ट बनने के बाद होगा, लेकिन इसके लिए पासपोर्ट सेवा केंद्र का आधार कार्ड प्रोजेक्ट से लिंक होना जरूरी है। नए फॉर्मेट के मुताबिक, अस्थायी पते पर रहने वाले आवेदकों को पुलिस वैरिफिकेशन में अब यह जानकारी भी देनी होगी कि पासपोर्ट के लिए आवेदन करने से पहले वह पिछले एक साल में कहां-कहां रहा।

लीजिए बिहार के देसी जायके का स्वाद

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लिट्टी चोखा

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आवश्यक सामग्री – आटा लगाने के लिये – – 400 ग्राम ( 4 कप) गेहूं का आटा, -आधा छोटी चम्मच अजवायन, आधा कप घी या तेल, 1/3 छोटा चम्मच खाने का सोडा, 3/4 छोटी चम्मच नमक

भरावन बनाने के लिये – 200 ग्राम (2 कप) सत्तू , 1 इंच लम्बा टुकड़ा अदरक, 2-4 हरी मिर्च,  आधा कप बारीक कतरा हुआ हरा धनियां,1 छोटी चम्मच जीरा, 2 छोटी चम्मच सरसों का तेल, 2 टेबल स्पून अचार का मसाला, 1 नीबू का रस, आधा छोटी चम्मच काला नमक (ऐच्छिक), नमक – स्वादानुसार ( 1/4 छोटी चम्मच )

चोखा – को पारम्परिक तरीके से चौखा सिर्फ हरी मिर्च और नमक डालकर बनाया जाता है, टमाटर, अदरक और हरा धनियां डालकर चोखा और भी स्वादिष्ट लगता है.

सामग्री – 400 ग्राम (1 या 2 बैगन) – बड़ा बैगन, 250 ग्राम ( 4 टमाटर मध्यम आकार के) टमाटर, 2-4 (बारीक कतरी हुई) हरी मिर्च, 1 1/2 इंच लम्बा टुकड़ा ( बारीक कतरा हुआ) अदरक , 2 टेबल स्पून ( बारीक कतरा हुआ) हरा धनियां, नमक – स्वादानुसार ( एक छोटी चम्मच), 1-2 छोटी चम्मच सरसों का तेल

विधि – लिट्टी के लिये आटा लगाइये – आटे को छान कर बर्तन में निकालिये, आटे में घी, खाने का सोडा, अजवायन और नमक डाल कर अच्छी तरह मिला लीजिये, गुनगुने पानी की सहायता से नरम आटा गूथ लीजिये.  गुथे हुये आटे को ढककर आधा घंटे के लिये ढककर रख दीजिये.  लिट्टी बनाने के लिये आटा तैयार है.

भरावन तैयार कीजिये अदरक को धोइये, छीलिये और बारीक टुकड़ों में काट लीजिये (कद्दूकस भी कर सकते हैं)।  हरी मिर्च के डंठल तोड़िये, धोइये और बारीक कतर लीजिये।  हरा धनियां को साफ कीजिये, धोइये बारीक कतर लीजिये। सत्तू को किसी बर्तन में निकालिये, कतरे हुये अदरक, हरी मिर्च, धनियां, नीबू का रस, नमक, काला नमक, जीरा, सरसों का तेल और अचार का मसाला मिला लीजिये, अगर पिठ्ठी सूखी लग रही है तो 4-5  टेबल स्पून डालिये, पिठ्ठी को इतना गीला करना है कि वह, लड्डू बांधने पर बंध जाय, सभी चीजों को अच्छी तरह मिला लीजिये, सत्तू की पिठ्ठी तैयार है।

लिट्टी बनाएं – गुथे हुये आटे से मध्यम आकार की लोइयां बना लीजिये.  लोई को अंगुलियों की सहायता से 2-3 इंच के व्यास में बड़ा कर लीजिये, कटोरी जैसा बना लीजिये, इस पर 1 – 1 1/2 छोटी चम्मच पिठ्ठी रखिये और आटे को चारो ओर से उठा कर बन्द कीजिये और गोल कर लीजिये, गोले को हथेली से दबा कर थोड़ा चपटा कीजिये, लिट्टी सिकने के लिये तैयार है.

तंदूर को गरम कीजिये, भरी हुई लोइयों को तंदूर में रखिये और पलट पलट कर ब्राउन होने तक सेकिये.  (पारम्परिक रूप से  लिट्टी उपले पर सेकीं जाती है)

चोखा – बैगन और टमाटर धोइये और भून लीजिये, ठंडा कीजिये, छिलका उतार लीजिये, किसी प्याले में रख कर चमचे से मैस कीजिये, कतरे हुये मसाले और नमक, तेल डाल कर अच्छी तरह मिलाइये। लीजिये बैगन का चोखा तैयार है। आप लहसुन और प्याज पसन्द करते है तब 5-6 लहसन की कली छीलिये बारीक कतरिये और एक प्याज छीलिये, बारीक कतरिये इन्हैं भी इस बैगन में मिला लीजिये.

आलू का चोखा – उबले आलू 4-5 छील कर बारीक तोड़ लीजिये, कतरे हुये अदरक, हरी मिर्च, हरे धनिये, लाल मिर्च, नमक मिलाइये, आलू का चोखा तैयार है।

परोसिये – चोखा प्याले में डालिये, गरमा गरम लिट्टी को पिघले हुये घी में डुबाइये, लिट्टी को बीच से तोड़ कर भी घी में डुबाया जा सकता है,  चोखा के साथ, हरी धनिये की चटनी के साथ परोसिये और खाइये।

 

ठेकुआ

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सामग्री- गेहूं का आटा- 500 ग्राम सूखा नारियल- 2 चम्‍मच चीनी- 300 ग्राम सौंफ- 1 चम्‍मच तेल- 2 चम्‍मच हरी इलायची पाउडर- 1/2 चम्‍मच पानी- 1 कप तेल, ठेकुआ बनाने का सांचा

 विधि– चीनी और पानी को एक साथ पिघलाएं, फिर आंच बंद कर दें और मिश्रण को ठंडा होने दें। अब गेहूं, घिसा नारियल, इलायची पाउडर, सौंफ और 2 चम्‍मच तेल को एक साथ गूथ लें। अब इस आटे में चीनी वाला पानी मिलाएं और मुलायम आटा तैयार करें। इन्‍हें हथेलियों से दबाएं और सांचे में हल्‍का सा तेल लगा कर उसमें दबाए गए आटे को रखें। अब सोंच को दबा कर आकार दें और आराम से निकाल कर बाहर रखें। कढाई में तेल गरम करें, उसमें ठेकुए को डीप फ्राई करें। एक बार हो जाने के बाद ठेकुए को बाहर निकालें और ठंडा होने के बाद सर्व करें।

 

भोजपुरी लोकगीत – लोरी

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लोरी –

 
चंदा मामा, आरे आव, पारे आवऽ,
नदी के किनारे आवऽ
सोने की कटोरिया में
दूध भात ले ले आवऽ
बुचिया का मुंहवा में घूट! घूट!!
(अनेक जगह यह पंक्ति है – “बबुआ के मुंहवा में घुटुक”।)

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घुघुवा मन्ना, उपजे चन्ना,
एही पड़े आवेले बबुआ के मामा।
उठा ले ले कोरा, थमा दे ले लड्डू,
छेदा देले नाक-कान
पहिरा देले बाला।

छठ के गीत – केलवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय

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केलवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदित्य से सुगा दिहले जुठीयाय
उ जे मरबउ रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरुछाय
सुगनी जे रोवय वियोग से आदित्य होऊ न सहाय

नारियलवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदित्य से सुगा दिहले जुठीयाय
उ जे मरबउ रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरुछाय
सुगनी जे रोवय वियोग से आदित्य होऊ न सहाय

अमरुदवा जे फरये ला घवद से ओहपर सुगा मंडराय
उ जे खबरी जनइबो अदित्य से सुगा दिहले जुठीयाय
उ जे मरबउ रे सुगवा धनुष से सुगा गिरे मुरुछाय
सुगनी जे रोवय वियोग से आदित्य होऊ न सहाय

 

छोटा जादूगर 

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 जयशंकर प्रसाद

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कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास, जहाँ एक लड़का चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सीु पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्तेे थे। उसके मुँह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपन्नदता थी।
मैंने पूछा, ”क्योंी जी, तुमने इसमें क्याआ देखा?”
”मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निशाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निशाना लगाना अच्छाफ मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मां है। उससे अच्छात तो ताश का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।” उसने बड़ी प्रगल्भाता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रूकावट न थी।
मैंने पूछा, ”और उस परदे में क्या। है? वहाँ तुम गए थे?”
”नहीं, वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।”
मैंने कहा, ”तो चलो, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ।” मैंने मन-ही-मन कहा, ‘भाई! आज के तुम्हींै मित्र रहे।’
उसने कहा, ”वहाँ जाकर क्याह कीजिएगा? चलिए, निशाना लगाया जाए।”
मैंने उससे सहमत होकर कहा, ”तो फिर चलो, पहले शरबत पी लिया जाए।” उसने स्वीाकार-सूचक सिर हिला दिया।
मनुष्यों की भीड़ से जाड़े की संध्या भी वहाँ गरम हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा, ”तुम्हा रे घर में और कौन हैं?”
”माँ और बाबूजी।”
”उन्हों ने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?”
”बाबूजी जेल में हैं।”
”क्योंी?”
”देश के लिए।” वह गर्व से बोला।
”और तुम्हाएरी माँ?”
”वह बीमार है।”
”और तुम तमाशा देख रहे हो?”
उसके मुँह पर तिरस्का र की हँसी फूट पड़ी। उसने कहा, ”तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य़ दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्न्ता होती!”
मैं आश्चहर्य से उस तेरह-चौदह वर्ष के लड़के को देखने लगा।
”हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी! माँजी बीमार हैं, इसीलिए मैं नहीं गया।”
”कहाँ?”
”जेल में! जब कुछ लोग खेल-तमाशा देखते ही हैं, तो मैं क्यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।”
मैंने दीर्घ नि:श्वा स लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्यैग्र हो उठा। मैंने उससे कहा, ”अच्छा’ चलो, निशाना लगाया जाए।”
हम दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए।
वह निकला पक्काे निशानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखनेवाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनों को बटोर लिया, लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे, कुछ जेब में रख लिये गए।
लड़के ने कहा, ”बाबूजी, आपको तमाशा दिखाऊँगा। बाहर आइए, मैं चलता हूँ।” वह नौ-दो ग्याँरह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा, ‘इतनी जल्दीा आँख बदल गई!”
में घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्मानत् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा, ”बाबूजी!”
मैंने पूछा, ”कौन?”
”मैं हूँ छोटा जादूगर।”
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कलकत्तेू के सुरम्यू बोटैनिकल-उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वही छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला, साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्सीर से बँधी हुई थी। मस्तारनी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा –
”बाबूजी, नमस्ते ! आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?”
”नहीं जी, अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।”
”फिर इसके बाद क्याे गाना-बजाना होगा, बाबूजी?”
”नहीं जी, तुमको….” क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा, ”दिखलाओ जी, तुम तो अच्छे आए। भला, कुछ मन तो बहले।” मैं चुप हो गया, क्योंाकि श्रीमतीजी की वाणी में वह माँ की-सी मिठास थी, जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।
उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्याकह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते लोट-पोट हो गए।
मैं सोच रहा था। बालक को आवश्य।कता ने कितना शीघ्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है।
ताश के सब पत्ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा, ”अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो, हम लोग भी अब जाएँगे।”
श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रूपया दे दिया। वह उछल उठा।
मैंने कहा, ”लड़के!”
”छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।”
मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा, ”अच्छा , तुम इस रुपए से क्याभ करोगे?”
”पहले भरपेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कंबल लूँगा।”
मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा, ‘ओह! कितना स्वाअर्थी हूँ मैं। उसके एक रुपया पाने पर मैं ईर्ष्याप करने लगा था न!”
वह नमस्काुर करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले।
उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्या साँय-साँय करने लगी थी। अस्ताोचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक शांत वातावरण था। हम लोग धीरे-धीरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे।
रह-रहकर छोटा जादूगर स्मईरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा, ”तुम यहाँ कहाँ?”
”मेरी माँ यहीं है न! अब उसे अस्पथताल वालों ने निकाल दिया है।” मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्त्री चिथड़ों से लदी हुई काँप रही थी।
छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके शरीर से चिमटते हुए कहा, ”माँ!”
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
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बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने ऑफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्ते् से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्छाक हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी…. मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द् लौट आना था।
दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्ली़ रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्या ह की तैयारी थी, यह सब होते हुए भी जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नथता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेष्टाै कर रहा था, तब जैसे स्वंयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आश्चतर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा। वह जैसे क्षण भर के लिए स्फूेर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा, ”आज तुम्हा रा खेल जमा क्योंं नहीं?”
”माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है।” अविचल भाव से उसने कहा।
”तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए!” मैंने कुछ क्रोध से कहा। मनुष्यण के सुख-दु:ख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है।
उसके मुँह पर वहीं परिचित तिरस्कासर की रेखा फूट पड़ी।
उसने कहा, ”क्योंत न आता?”
और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था।
क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा, ”जल्दी चलो।” मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा।
कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचा। जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था, किंतु स्त्री के मुँह से, ‘बे…’ निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्तसब्धम था। उस उज्व् म ल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्यल करने लगा।

छठ 2016 – छठ पूजा व्रत विधि और शुभ मुहूर्त

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वर्ष में दो बार छठ का महोत्सव पूर्ण श्रद्धा और आस्था से मनाया जाता है| पहला छठ पर्व चैत्र माह में तो दूसरा कार्तिक माह में मनाया जाता है| चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी चैती छठ और कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को कार्तिकी छठ कहा जाता है| यह पर्व सूर्यदेव की उपासना के लिए प्रसिद्ध है|

मान्यता है कि छठ देवी सूर्यदेव की बहन है| इसलिए छठ पर्व पर छठ देवी को प्रसन्न करने हेतु सूर्य देव को प्रसन्न किया जाता है| गंगा-यमुना या किसी भी नदी, सरोवर के तट पर सूर्यदेव की आराधना की जाती है| महाभारत में भी छठ पूजा का उल्लेख किया गया है| पांडवों की माँ कुंती को विवाह से पूर्व सूर्य देव की उपासना कर आशीर्वाद स्वरुप पुत्र की प्राप्ति हुई जिनका नाम था कर्ण| पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी उनके कष्ट दूर करने हेतु छठ पूजा की थी|

हिन्दू धर्म में छठ पर्व का अत्यंत महत्त्व है और पुरुष एवं स्त्री एक सामान रूप से इस पर्व को मनाते हैं| यह पर्व कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से आरंभ होकर सप्तमी तक चलता है| प्रथम दिन यानि चतुर्थी तिथि ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है| आगामी दिन पंचमी को खरना व्रत किया जाता है और इस दिन संध्याकाळ में उपासक प्रसाद के रूप में गुड-खीर, रोटी और फल आदि का सेवन करते है और अगले 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखते हैं| मान्यता है कि खरन पूजन से ही छठ देवी प्रसन्न होती है और घर में वास करती है| छठ पूजा की अहम तिथि षष्ठी में नदी या जलाशय के तट पर भारी तादाद में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं और उदीयमान सूर्य को अर्ध्य समर्पित कर पर्व का समापन करते हैं|

छठ पर्व – महत्व                                                                           

छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है| हालाँकि अब यह पर्व देश के कोने-कोने में मनाया जाता है| पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि यह भारत के सूर्यवंशी राजाओं के मुख्य पर्वों से एक था| कहा जाता है कि एक समय मगध सम्राट जरासंध के एक पूर्वज का कुष्ठ रोग हो गया था| इस रोग से निजात पाने हेतु राज्य के शाकलद्वीपीय मग ब्राह्मणों ने सूर्य देव की उपासना की थी| फलस्वरूप राजा के पूर्वज को कुष्ठ रोग से छुटकारा मिला और तभी से छठ पर सूर्योपासना की प्रातः आरंभ हुई है|

छठ व्रत पूर्ण नियम तथा निष्ठा से किया जाता है| श्रद्धा भाव से किए गए इस व्रत इ नि:संतान को संतान सुख की प्राप्ति होती हैं और धन-धान्य की प्राप्ति होती है| उपासक का जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है|

छठ व्रत – विधि

  • छठ पर्व में मंदिरों में पूजा नहीं की जाती है और ना ही घर में साफ़-सफाई की जाती है|
  • पर्व से दो दिन पूर्व चतुर्थी पर स्नानादि से निवृत्त होकर भोजन किया जाता है।
  • पंचमी को उपवास करके संध्याकाळ में किसी तालाब या नदी में स्नान करके सूर्य भगवान को अर्ध्य दिया जाता है| तत्पश्चात अलोना भोजन किया जाता है।
  • षष्ठी के दिन प्रात:काल स्नानादि के बाद संकल्प लिया जाता है| संकल्प लेते समय निम्न मन्त्रों का उच्चारण करे

ऊं अद्य अमुकगोत्रोअमुकनामाहं मम सर्व

पापनक्षयपूर्वकशरीरारोग्यार्थ श्री

सूर्यनारायणदेवप्रसन्नार्थ श्री सूर्यषष्ठीव्रत करिष्ये।

  • पूरा दिन निराहार और नीरजा निर्जल रहकर पुनः नदी या तालाब पर जाकर स्नान किया जाता है और सूर्यदेव को अर्ध्य दिया जाता है|

अर्ध्य

अर्ध्य देने की भी एक विधि होती है| एक बांस के सूप में केला एवं अन्य फल, अलोना प्रसाद, ईख आदि रखकर उसे पीले वस्त्र से ढक दें| तत्पश्चात दीप जलाकर सूप में रखें और सूप को दोनों हाथों में लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए तीन बार अस्त होते हुए सूर्यदेव को अर्ध्य दें।

ऊं एहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।

अनुकम्पया मां भवत्या गृहाणार्ध्य नमोअस्तुते॥

छठ पूजा 2016 शुभ मुहूर्त

छठ पर्व तिथि          :      6 नवम्बर 2016, रविवार

सूर्योदय, छठ तिथि      :   प्रातः काल 06:36, 6 नवम्बर 2016

सूर्यास्त, छठ तिथि      :   सांय काल 05:32, 6 नवम्बर 2016

षष्ठी तिथि प्रारंभ        :     सुबह 10:47 बजे से, 5 नवम्बर 2016

षष्ठी तिथि समाप्त      :     दोपहर 12:16 बजे तक, 6 नवम्बर 2016

 

ये है छठ पर्व का इतिहास और महत्व

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छठ पर्व या छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। छठ पर्व या छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलंवी भी मनाते देखे गए हैं। धीरे धीरे यह त्यौहार प्रवासी भारतीयों के साथ साथ विश्वभर मे प्रचलित व प्रसिद्ध हो गया है। छठ पर्व की शुरूआत कहां से हुई, कब हुई और क्यों हुई इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं। हम आपको बता रहे हैं छठ पूजा से जुड़ी ऐसी ही कुछ कहानियों के बारे में…

राजा प्रियंवद की कहानी: छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियवंद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा प्रियंवद से कहा कि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा प्रियंवद से उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा। जिसके बाद राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तभी से छठ पूजा पूत्रोंं की दीर्घ आयु के लिए मनायी जाती है।

भगवान राम और लंका विजय से जुड़ी कहानी: छठ पूजा से जुड़ी एक अन्य कहानी प्रचलित है जिसके मुताबिक विजयादशमी के दिन लंकापति रावण के वध के बाद दिवाली के दिन भगवान राम अयोध्या पहुंचे। रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी। इसके बाद से ही यह पर्व मनाया जाता है।

 

मैरी कॉम ने बच्चों को लिखी चिट्ठी: कहा- रेप को जानना जरूरी, तुम्हारी मां से भी हुई छेड़छाड़

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बॉक्सर और राज्यसभा सांसद मैरी कॉम ने अपने बच्चों के नाम एक चिट्‌ठी लिखी है। वो भी दुष्कर्म जैसे मुद्दे को समझाने के लिए। इसमें उन्होंने कहा है – “तुम अभी छोटे हो, पर अभी से जानो कि रेप होता क्या है, क्योंकि तुम्हारी मां से भी छेड़खानी हुई है।” मैरी कॉम के तीन बच्चे हैं। 9 साल के जुड़वां और छोटा 3 साल का। मैरी कॉम ने इस लेटर में और क्या लिखा…
– उन्होंने लेटर में लिखा, “आपकी मां भी छेड़छाड़ का शिकार हुई है। वो भी तीन-तीन बार। मैं 17 साल की थी, तब मणिपुर में मेरे साथ छेड़छाड़ हुई थी। फिर अपने दोस्तों के साथ दिल्ली और हरियाणा में भी इससे जूझना पड़ा।”
कब हुई थी मैरी कॉम से छेड़छाड़
– मैरी कॉम ने लिखा, “यह काफी चौंकाने वाली बात है। सुबह के साढ़े आठ बजे थे। मैं रिक्शे से ट्रेनिंग कैम्प जा रही थी। तभी एक अनजान व्यक्ति ने मुझ पर हमला कर दिया। उसने मेरी छाती पर हाथ लगाया। मुझे गुस्सा आया। मैंने चप्पल हाथ में लेकर उसका पीछा किया। मगर वो भाग गया।”
– उन्होंने लिखा, “अफसोस है कि उस वक्त कराटे की ट्रेनिंग मेरे काम न आ सकी। अब 33 साल की हूं। लोग एक मेडलिस्ट के तौर पर मेरी तारीफ करते हैं। लेकिन मैं चाहती हूं कि एक औरत के तौर पर भी मेरा उतना ही सम्मान हो।”
– उन्होंने लिखा, “किसी इंसान के लिए हम नाटी और चपटी हैं, जिसे चिंकी कहकर बुलाया जाता है। किसी के लिए हमारा जिस्म ही सब कुछ है।”
बच्चों को दी महिलाअों की मदद करने की सीख
– मैरी कॉम ने लेटर में लिखा, “मेरे प्यारे बच्चों, याद रखना कि तुम्हारी तरह हमारे पास भी दो आंखें और एक नाक है। बस हमारे जिस्म के कुछ हिस्से तुम से अलग हैं। इतना सा फर्क है हमारे-तुम्हारे बीच। यह मायने नहीं रखता कि महिलाएं क्या पहनें या कब घर से बाहर निकलें, क्योंकि यह दुनिया उतनी ही महिलाओं की है जितनी मर्दों की।”
– उन्होंने लिखा, “मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि किसी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ छूने से मर्दों को क्या मिलता है। जब कभी तुम किसी महिला के साथ छेड़खानी होते हुए देखना तो तुम उस महिला की मदद के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाना।”
– मैरी कॉम ने लिखा, “रोड पर चलता हर व्यक्ति मुझे नहीं पहचान सकता, जैसे धोनी और विराट को पहचानता है, लेकिन मैं यह भी डिजर्व नहीं करती कि कोई मुझे चिंकी कहे। मैं यौन हमलों को लेकर लोगों को जागरूक करूंगी। आओ, हम ऐसा समाज बनाएं जहां लड़कियां हर जगह सुरक्षित रहें और उन्हें किसी तरह का डर न हो।”

समाज की बेड़ियां तोड़ ये 14 साल की फरीहा बनी वुशु चैंपियन

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‘वुशु’ सीखकर हैदराबाद की एक लड़की पूरी दूनिया में मशहूर हो रही है. अब आप सोच रहे होंगे कि ‘वुशु’ है क्‍या. हम आपको बताते हैं कि ‘वुशु’ और फरीहा की कहानी। दरअसल ‘वुशु’ चीन के मार्शल आर्ट्स का एक फाॅर्म है. इसे 1949 में इजाद किया गया था। हैदराबाद के स्‍कूल ने इसे लड़कियों को सिखाने का निर्णय लिया, जिससे वे अपनी रक्षा कर सकें. स्‍कूल में यह सिखाया जाने लगा. जिन लड़कियों ने इसे सीखा, उसमें सबसे सफल रहीं 14 साल की फरीहा तफीम।

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राज्‍य प्रतिस्‍पर्धा जीतने के बाद फरीहा को नेशनल चैंपियनशिप के लिए चुना गया. यह प्रतियोगिता असम में होनी थी. चूंकि यह जगह हैराबाद से बहुत दूर है इसलिए फरीहा की मां उसे वहां नहीं जाने देना चाहती थी. उसकी मां ने उससे कहा, ‘तुम अब बड़ी हो रही हो और तुम्‍हारा इतना दूर जाना सुरक्षित नहीं है’.उसकी मां और भाई का मानना था कि अगर फरीहा ऐसी प्रतियोगिता में भाग लेतीे है तो उनके समुदाय में उसके बारे में कई तरह की बातें की जाएंगी.’

अब फरीहा पर जयीशा पटेल ‘इंडियाज वुशु वॉरियर गर्ल’ नाम की डॉक्‍यूमेंट्री बना रही हैं. जयीशा कहती हैं, ‘मैं फरीहा की उम्र जानकर हैरान थी कि इतनी छोटी बच्‍ची ने किस तरह अपने समुदाय के विचारों से अलग जाकर अपने लिए रास्‍ता बनाया. उसकी कहानी प्रेरणा देने वाली है।’लेकिन फरीहा लगातार अपनी मां को समझाती रही. उसे उसके पिता का साथ मिला, वह गुवाहाटी गई और वहां उसने राष्‍ट्रीय प्रतियोगिता भी जीत ली.

 

सुरों को बांटा नहीं जा सकता: अमजद अली ख़ान

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पद्म विभूषण सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ख़ान ने कहा है, “मैं वो पहला कलाकार हूं जो 25 वर्षों के सांस्कृतिक मौन को दर्शाने पाकिस्तान गया था.”

उन्होंने कहा, ”फ़िलहाल पाकिस्तान एक नए अल्फ़ाज़ की तरह है और नए-नए देशों में अक्सर संस्कृति की कमी रहती ही है. पूरी दुनिया में ज़मीन का बंटवारा भले हो गया हो, पर स्वरों का बंटवारा कोई नहीं कर सकता.”

अमजद अली ख़ान कहते हैं, “हम चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय से जुड़े हों, संगीत हमेशा से आध्यात्म का मार्ग रहा है.”

संगीत के महत्व को समझाते हुए उन्होंने बताया, “जब मैं स्टेज पर होता हूं, तब उन चंद लम्हों में मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं किसी अलौकिक दुनिया में चला गया हूं. कभी-कभी यह अविश्वसनीय भी लगता है.”

अमजद अली ख़ान आगे कहते हैं कि, “संगीत से जुड़ना और संगीतज्ञ होना अपने आप में एक वरदान है. जो अपने अंदर अलग ऊर्जा प्रदान करती है.”

अमजद अली ख़ान कहते हैं कि संगीत कोई बहस का मुद्दा नहीं है. संगीत अपने आप में सर्वोच्च शक्ति के साथ जुड़ने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम होता है. संगीत के कई आयाम हैं जो संवाद, मंत्रोच्चार, मौखिक गायन – याद करने से लेकर वाद्य यंत्र वादन तक जुड़े होते हैं.”

देश की सीमा पर हाल में हुए उड़ी हमले पर अफ़सोस जताते हुए वो कहते हैं, “हर रोज कहीं न कहीं यह आतंकी हमले हो रहे है. ऐसे में ज़रूरी है सभी देश खुद को अंदर से मजबूत बनाएं.”