Sunday, March 22, 2026
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चश्मा पहनती हैं तो ये मेकअप टिप्स जरूर अपनाएं

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चश्मा पहनना भले ही स्टाइलिश कहा जाता हो मगर सच तो यही है कि लड़कियाँ आज भी यही मानती हैं कि यह उनकी खूबसूरती बिगाड़ देता है। हालांंकि ऐसा नहीं है मगर चश्मा आपकी जरूरत भी है और जब यह जरूरत है तो आप इसे भी अपनी तरह स्टाइलिश तरीके से पहन सकती हैं और इसके लिए आजमाइए ये मेकअप टिप्स –

कुछ लेंस आंखों को छोटा दिखाते हैं जबकि असली में ऐसा होता नहीं है। इससे बचने के लिए पिंक आय-लाइनर यूज करें। इसे नीचे वाली लैश-लाइन पर लगाएं जिससे आंखें ज्यादा खुली नजर आएं।

फ्रेम ही आइब्रोज पर फोकस बनाते हैं। इसलिए इन्हें हमेशा वेल-ग्रूम्ड रखें। ब्रो-पेन्सिल या पाउडर लगाने के पहले आइब्रोज के लिए ब्रो-कोम्ब यूज करें।

चश्मा आपके अंडर-आय सर्कल को हाइलाइट कर सकते हैं। फाउंडेशन से कंसीलर का शेड थोड़ा लाइट होना चाहिए। इसे इनर-कॉर्नर और अंडर-आईज में यूज करें तभी पूरा एरिया ब्राइट और लिफ्ट-अप दिखाई देगा।

 

कभी दुकान में मरम्मत करते थे सेलफोन, आज हैं करोड़ों की कंपनी के मालिक

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नई दिल्ली. मोटरकोट्स इंडिया द्वारा कारों को ग्लैमरस बनाने के बिजनेस में कदम रखने वाले हरमीत सिंह की कहानी उनके हाथ से एक सेलफोन के टूटने से शुरू हुई थी। यह सेलफोन उनके दोस्त का था। फरीदाबाद के एनआईटी मोहल्ले में जन्मे हरमीत सिहं एक लोअर मीडिल सिख फैमली से हैं। उनके पिता फरीदाबाद में एक वर्कशॉप चलाते थे। हरमीत ने अपने बचपन में कई बार पिता के इस वर्कशॉप में काम किया। आज उनकी अलग-अलग कंपनियों में लगभग 200 लोग काम कर रहे हैं।

घर की आर्थिक स्थितियां कुछ ऐसी थीं कि हरमीत अपनी पढ़ाई 10वीं से आगे नहीं बढ़ा पाए। दिल्ली के करोलबाग मार्केट में एक छोटी सी मोबाइल रिपेयरिंग शॉप में नौकरी भी करनी पड़ी। हरमीत ने एक इंटरव्यू में बताया था कि ‘मेरे हाथ से एक दोस्त का सीमन्स का काफी महेंगा सेलफोन टूट गया। पूरा फरीदाबाद घूमा, लेकिन वह बन नहीं पाया।  इसके बाद किसी ने बताया कि दिल्ली के करोलबाग में मोबाइल रिपेयरिंग की दुकानें हैं। दिल्ली गया तो वहां मेकैनिक ने दो हजार रुपए मांगे। इतने पैसे मेरे पास थे नहीं, लेकिन मोबाइल बनवाना भी जरूरी था।  पिताजी से इतने रुपए मांग नहीं सकता था, क्योंकि जानता था कि उनके पास भी एक साथ इतने पैसे नहीं मिल पाएंगे।
इधर-उधर से रुपए जमा करने के लिए 20 दिन लग गए। मोबाइल तो बन गया, लेकिन उसी दिन से ठान लिया कि अब कोई मोबाइल खराब होगा तो खुद ही बनाऊंगा।’

– घटना के बाद से ही हरमीत को धुन सवार हो गई कि वे मोबाइल टेक्नोलॉजी के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करें।  वे दोस्तों के खराब मोबाइल लेते उन्हें खोलते और इसके बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करते। कई बार ऐसा होता कि थोड़ी बहुत धूल साफ करने से मोबाइल की खराबी दूर हो जाती।  इस दौरान एक दोस्त का सेलफोन खराब हो गया तो उन्हें एक आइडिया सूझा। उन्होंने आईसी पर कुछ खास निशान लगाए और फिर उसे मेकैनिक को दिया। जब सेलफोन बनकर आया तो वे जान गए कि उसमें क्या बदला गया है।  उनकी दिलचस्पी देखकर एक जान पहचान वाले ने उन्हें जालंधर में अपनी दुकान खोलने के लिए कहा। इस तरह उनकी पहली दुकान जालंधर में खुली, जहां उस समय काफी एनआरआई आया करते थे। दिल्ली के करोलबाग में उनका आना जाना काफी बढ़ गया था। यहां उन्हें एक दुकान में नौकरी मिल गई। जालंधर की अपनी दुकान एक दोस्त को देकर वे दिल्ली चले आए।  इस दौरान उन्होंने किस्तों पर एक कंप्यूटर भी खरीद लिया और अलग-अलग तरह के सॉफ्टवेयर डाउनलोड करने के बारे में जानकारी मिलने लगे।
हरमीत करोलबाग में फोन अनलॉक करने के वाले स्पेशलिस्ट के तौर पर जाने लगे। सेलफोन के बाद उन्होंने सीसीटीवी कैमरा, ड्रोन और अब कारकोटिंग में कदम रखा। हरमीत ने मोबाइवाला.कॉम और जीएसएमफादर.कॉम पर उन्होंने अपना कारोबार चलाया। उन्होंने दिल्ली के बाद हैदराबाद में अपना स्टूडियो खोला है। इस दौरान उन्होंने दिल्ली में वो मकान को खरीदा, जहां पर वो किराए पर रहा करते थे।

 

एक गांव, जहां भैंसों संग प्रैक्टिस करके चैम्पियन हैं बेटियां

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रियो ओलंपिक में देश को बेटियों ने मेडल जिताए। क्या आप जानते हैं कि देश में एक गांव ऐसा है, जहां बेटियां भैंसों के साथ प्रैक्टिस करके चैम्पियन बनी हैं। बात हो रही है, हरियाणा के भिवानी जिले के गांव अलखपुरा की। यहां का दौरा करेंगे तो खेल के प्रति बेटियों का जज्बा नजर आ जाएगा।

बिना किसी साधन सुविधा और ग्राउंड के, इस गांव की लड़कियां फुटबाल की प्रैक्टिस करती हैं और इसी तरह प्रैक्टिस कर कर के वे अब तक राज्य और नेशनल स्तरीय खेलों में हिस्सा ले चुकी हैं। इस गांव की लड़कियां साल 2009 से अंडर 14, अंडर 17 और अंडर 19 के चैम्पियन हैं।

2012 में हुए सुब्रतो मुखर्जी इंटरनेशनल टूर्नामेंट में इस गांव के खिलाड़ी तीसरे नंबर पर रहीं। 2013 में दूसरे नंबर पर और 2015 में उन्होंने मणिपुर को हराकर टूर्नामेंट अपने नाम किया था। यहां तक कि खिलाड़ी नवंबर 2016 में होने वाले सुब्रतो कप में अंडर 17 कैटेगरी में भी क्वालीफाई हो चुकी हैं, लेकिन प्रैक्टिस करने के नाम पर कोई सुविधा नहीं।

तालाब के किनारे प्रैक्टिस करती हैं लड़कियां

ऐसे में लड़कियां गांव के बीचों बीच बने तालाब के किनारे प्रैक्टिस करती हैं, वो भी नहा रही भैंसों के साथ। उधर भैंसे तालाब में नहा रही होती हैं और उधर खिलाड़ी तालाब के किनारे फुटबाल का अभ्यास कर रहे होते हैं। न कोई नेट और न कोई लाइन। बॉल तालाब में चली जाए तो उसे भी तैरकर बाहर निकालना पड़ता है। मजदूरों और कारीगरों की इन बेटियों ने अब इसी जुगाड़ के मैदान को अपनी किस्मत मान लिया है, जिसका परिणाम चैम्पियनों के रूप में सभी के सामने है।

गांव में कोई जिम भी नहीं है। ऐसे में लड़कियां रेत के मैदान में दौड़ लगाकर ही खुद को वार्मअप करती हैं। एक्सरसाइज करके खुद को एक्टिव रखती हैं। इन खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स किट और शूज फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर गोर्धन दास उपलब्ध कराते हैं। इसके लिए वे गांव-गांव घूमकर चंदा इकट्ठा करते हैं। इन्होंने 2006 में लड़कियों के लिए फुटबाल की शुरूआत की थी।

 

इंटरनेट पर किस्सागोई : सुनकर आनंद लीजिए मशहूर हिन्दी कहानियों का

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नयी दिल्लीजीवन की आपाधापी, सिकुड़ते वक्त और किताबों के अस्तित्व पर मंडराते खतरे की चर्चा के बीच इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य की कालजयी और भूली बिसरी कृतियों को आडियो स्वरूप में डालकर प्रौद्योगिकी की मदद से किस्सागोई की नयी पहल हो रही है। इनमें प्रेमचंद, चंद्रधरशर्मा गुलेरी, सुदर्शन से लेकर कमलेश्वर, स्वयं प्रकाश और आधुनिक कहानीकारों की रचनाएं शामिल हैं। अमेरिका में रहने वाले अनुराग शर्मा स्वयं कहानीकार हैं और पिछले कुछ वषरें से ऐसे ही प्रयासों में संलग्न हैं। उन्होंने प्रेमचंद, भीष्म साहनी सहित विभिन्न हिन्दी रचनाकारों की 250 से अधिक कहानियों के आडियो स्वरूप को आर्काइव डाट काम तथा अन्य प्लेटफार्म पर डाला है। इन कहानियों को कोई भी व्यक्ति सुन सकता है और डाउनलोड भी कर सकता है। उन्होंेने बताया कि कहानियों के इन आडियो संस्करण पर अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

अनुराग ने  कहा कि वाचिक परम्परा बीच बीच में टूटती है। किन्तु यही परंपरा पुल भी बनाती है। मसलन, विदेश में पाकिस्तान के पाठक हिन्दी साहित्य और हिन्दी के पाठक उर्दू साहित्य को लिपि बाधा के कारण प्राय: पढ़ने में दिक्कत महसूस करते हैं। पर यदि इन भाषाओं के साहित्य को वे जब आडियो स्वरूप में सुनते हैं तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती।
उन्होंने बताया कि पुरानी कहानियों को सुनने के साथ इनके बारे में जानने की इच्छा पैदा होती है।

 

खर्च ज्यादा हो रहा है तो जरा ध्यान दें

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पैसा हाथ में तो अक्सर उसे बचाकर रखना मुश्किल महसूस होता है। जब आप बेहद खुले हाथ से खर्च कर रही हैं तो यह और भी कठिन हो सकता है। इन टिप्स को अपनाकर कुछ फायदा उठाने की कोशिश करें…

– अपने पास नकद ज्यादा नहीं रखें। जेब के लिए पांच सौ रूपए तक काफी होंगे। नकदी पास होने पर हम अक्सर ज्यादा खर्चे कर देते हैं।

– सिक्के खर्च नहीं करने चाहिए। ये जितने ज्यादा होंगे उतना अच्छा आप  महसूस करेंगी। खरीदी के लिए नकदी इस्तेमाल करें। रोज के जमा हुए सिक्के एक चेंज यानि चिल्लर पाउच में रखते चले जाएं। इसी तरह हर दिन के आखिर में अपने चिल्लर को एक गुल्लक में डालते चले जाएं। हर छह महीने बाद इस गुल्लक को खाली करें तो बेहद खुशी मिलेगी और नोट भी!

– बिल देने वाले भी इंसान ही होते हैं। इनसे जल्दबाजी में गलती हो जाना स्वाभाविक सी बात है इसलिए ग्रॉसरी शॉपिंग के बाद एक बार खुद अपना बिल जरूर जाँच लें। कई बार गलती होने पर ग्रोसरी स्टोर आपको डिस्काउंट देते हैं या आइटम को फ्री कर देते हैं।

– लोग एटीएम से अनावश्यक पैसे निकाल लेते हैं और फिर पता भी नहीं चलता कि ये पैसे खर्च कहां हो गए। हिसाब लगाएं कि इस हफ्ते आपको कितने पैसों की जरूरत है और फिर एटीएम से उतने ही निकालें। जब आपके वॉलेट में पैसे नहीं होंगे तो आप फिजूल खर्च भी नहीं कर पाएंगे।

 

आईएस की यौन दासता से मुक्त हुई नादिया संयुक्त राष्ट्र की सद्भावना दूत नामित

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इस्लामिक स्टेट के आतंकियों की कैद में बलात्कार और प्रताड़नाएं झेलने के बाद वहां से बच निकलने में सफल रही एक इराकी युवती को मानव तस्करी के चंगुल से बचने वाले लोगों के सम्मान में संयुक्त राष्ट्र का सद्भावना दूत बनाया गया है।नादिया मुराद बसी ताहा नामक 23 वर्षीय यजीदी युवती ने कल जिहादी समूह के पीड़ितों के लिए इंसाफ का आह्वान किया और कहा कि 2014 में यजीदी लोगों पर किए गए हमले को जनसंहार करार दिया जाना चाहिए।
नादिया को इराक के उत्तरी शहर सिंजर के पास स्थित उनके गांव कोचो से अगस्त 2014 में उठा कर आईएस के नियंत्रण वाले मोसुल में ले आया गया था। वहां उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उसे कई बार खरीदा-बेचा गया।
नादिया ने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पर आयोजित एक समारोह में कहा, ‘‘वे जिस तरह चाहते थे, उस तरह से मेरा इस्तेमाल करते थे। मैं अकेली नहीं थी।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं शायद सौभाग्यशाली थी। समय बीतने के साथ, मैंने भाग निकलने का रास्ता खोज लिया जबकि हजारों अन्य ऐसा नहीं कर पाईं। वे अब भी बंधक हैं।’’ कांपती आवाज में नादिया ने उन लगभग 3200 यजीदी महिलाओं और लड़कियों की रिहाई का आह्वान किया, जो अब भी आईएस के आतंकियों की यौन दासियों के रूप में कैद हैं। नादिया ने यह भी आह्वान किया कि उन्हें बंदी बनाने वाले आतंकियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए।

 

सिंगल मदर और तलाकशुदा के टैग को धोकर अपनी पहचान बना रही है शिल्पी

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वह पत्रकार है मगर आम महिला पत्रकारों के बीच रहकर भी काफी अलग। जब आप शिल्पी से मिलते हैं तो अनायास ही उसकी हँसी आपका ध्यान खींच लेती है। वह खुश रहना चाहती है और हमेशा खुश रहती है क्योंकि उसे खुश रहना और जिंदगी को जीना आता है। वह कभी किसी की सहानुभूति नहीं माँगती, सहायता भी नहीं माँगती मगर सहयोग भी बहुत कम माँगती है। शिल्पी दूसरों की तरह होकर भी काफी अलग है क्योंकि वह एक माँ है, सिंगल मदर। शादी के साल भर बाद ही तलाक हो गया और हमारे आस – पास के नुमाइंदे औऱ शुभचिंतक (जिनमें महिलाएं भी जरूर होंगी) एक तलाकशुदा औरत को अछूत समझते हैं और ताने सुनाते हैं, शिल्पी के साथ भी हुआ।

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वह पूर्व मिदनापुर के छोटे से गाँव में पली – बढ़ी थी और जाहिर सी बात है कि उसने ताने भी सुने मगर वह कमजोर नहीं थी क्योंकि उसे जीना था, उसे कुछ करना था। 4 साल के बच्चे को अपने माता – पिता की गोद में छोड़कर वह महानगर कोलकाता की ओर निकल पड़ी, नौकरी तलाशने के लिए मगर गँवई संस्कृति में पली शिल्पी के लिए नौकरी पाना इतना आसान नहीं था। कुछ दिनों तक छोटी – मोटी नौकरी की और वापस गाँव आ गयी मगर कुछ करने का जुनून कुछ ऐसा था कि वह शिल्पी को वापस महानगर ले आया।

उसने पत्रकारिता की पढ़ाई की और पत्रकार बनी मगर सिंगल मदर का टैग हो समाज एक अलग ही नजर से देखता है। ताने और अपमान दोनों शिल्पी को सहने पड़े मगर अब उसे हारना नहीं था, लोगों के मुँह बंद करने थे। शिल्पी कहती है कि तलाकशुदा औरत और सिंगल मदर को समाज एक अलग ही नजर से देखता है। बहुत सारी गंदी – गंदी बातें मुझे सुननी पड़ी मगर जो अपमान मुझे मिला, उसे मैंने मकसद बनाया कि अब मुझे जवाब देना है। मीडिया में कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने उसका साथ दिया। शिल्पी की लड़ाई सिर्फ उसकी लड़ाई नहीं थी, उसे अपने बच्चे को एक अच्छी परवरिश और एक अच्छा भविष्य देने के लिए आगे बढ़ना था। शिल्पी के माता – पिता और भाइयों ने भी उसका साथ दिया।

शिल्पी कई चैनलों में काम कर चुकी है और अपराध जैसे क्षेत्र की पत्रकारिता पर भी उसकी पकड़ है जिसे सराहा भी गया है और अब शिल्पी ने नयी उड़ान भरी है अपने बुटिक के साथ। शोरूम खोलने के लिए पैसे नहीं हैं इसलिए वह फिलहाल घर से ही काम कर रही है। अपने बेटे अस्मित के नाम पर अस्मित गारमेंट्स शुरु किया है और माँग होने पर शिल्पी के अनुसार वह सारी दुकान उठाकर ले जाती है मगर आज वह अपने बेटे के साथ काफी खुश है। शिल्पी के साहस और जज्बे को अपराजिता का सलाम।

गरीबी से लेकर अपंगता भी को हरा कर स्वर्ण पदक ले आए मरियप्पन

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हम असफलता के बहाने खोजते हैं, कभी अपनी रूकावट का दोष परिस्थितियों को, तो कभी हादसों के सिर मढ़ते रहते हैं। परिस्थितियों और हादसों से लड़कर मंजिलें पाने वालों को देखकर हमें एहसास होता है कि इनके मुकाबले हमारी परिस्थितियां तो कुछ भी नहीं थीं। ऐसी ही कहानी है हमारे नायक मरियप्पन की जिन्होंने पैरालंपिक में भारत को एतिहासिक पदक दिलाया।

रियो में चल रहे दिव्यांगों के ओलम्पिक में भारत के लिए हाई जम्प में पहला गोल्ड जीतने वाले मरियप्पन थंगावेलु की कहानी हमें जीने के साथ जीतने की प्रेरणा भी देती है।

भारत ने 32 साल बाद एक ही ईवेंट में दो मैडल जीते हैं, हाई जम्प में मरियप्पन ने स्वर्ण पदक जीता है, उनके साथ वरुण भाटी ने देश को कांस्य पदक दिलाया।

मरियप्पन का जन्म तमिलनाडु के सलेम में हुआ। जब वे पांच साल के थे तो एक दिन स्कूल जाते वक़्त एक हादसे ने उनकी ज़िन्दगी बदल दी। सड़क पर एक तेज बस ने उनका दायां पैर कुचल दिया। इस हादसे ने उन्हें हमेशा के लिए दिव्यांग बना दिया। मरियप्पन की माँ ने 17 साल तक कानूनी लड़ाई लड़ी तब जाकर उन्हें बेटे के पैर का मुआवजा मिल पाया।

बचपन में ही पिता ने परिवार छोड़ दिया। माँ घर चलाने के लिए ईंट ढोने का काम करने लगीं। लेकिन सीने में दर्द बढ़ने की वजह से उन्हें काम छोड़ना पड़ा। पिता के छोड़ने के बाद उनके परिवार को किसी ने किराए पर रहने के लिए मकान नहीं दिया। माँ ने 500 रूपये उधार लेकर सब्जी बेचने का काम शुरू किया और परिवार का पेट पालने लगीं। मरियप्पन के इलाज के लिए 3 लाख का कर्जा लेकर बेटे की सलामती के लिए लड़ती रहीं। उनके इलाज के लिए लिया गया कर्जा उनकी माँ अभी तक चुका नहीं पाईं है।

मरियप्पन ने 14 साल की उम्र में स्कूल टूर्नामेंट में सामान्य प्रतियोगियों से मुकाबला कर हाई जम्प का सिल्वर जीता, तब उनकी ओर कोच सत्यनारायण का ध्यान गया। मरियप्पन वॉलीबॉल के खिलाडी थे लेकिन कोच सत्यनारायण के कहने पर वे हाई जम्प की प्रतियोगिताओं में खेलने लगे।

मरियप्पन इसी वर्ष मार्च में तब चर्चा में आए जब उन्होंने IPC ग्रांड प्रिक्स में 1.78 मीटर की हाई जम्प लगाई, जो उनके रियो पैरालंपिक में प्रवेश का आधार बनी।

 

सैकड़ों साल पुरानी कुप्रथा तोड़, किन्नरों का पिंडदान करेंगे बनारस के 151 पंडित!

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दुनियां बदल रही है! देश आजादी के 70 सालों के बाद नई उम्मीदों की ओर बढ़ रहा है। आज़ाद भारत में लाख निराशाओं के मुद्दों पर बहस हो रही है। लेकिन कहीं कहीं बिखरीं आज़ादी की छींटे हमें आशा से भर देती हैं, कि आने वाला वक़्त भेदभाव की परम्पराओं से ऊपर उठकर इंसानियत के कंधे से कंधा मिलकर चलने की होड़ में है।

ट्रांसजेंडर समूह का संघर्ष हाल के कुछ वर्षों में रंग लाया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के इन्हें थर्ड जेंडर का दर्जा देने के बाद, हर क्षेत्र में आज कहीं न कहीं कोई ऐसा सितारा उभर रहा है। पिछले दिनों उज्जैन कुम्भ में किन्नर अखाडा बनने की घटना से धार्मिक क्षेत्रों में भी किन्नरों का हस्तक्षेप बढ़ गया और अब देश की धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी बनारस से एक और ऐतिहासिक पहल ने जन्म लिया है। वाराणसी के 151 ब्राहमण पहली बार ट्रांसजेंडर मृतकों का पिंडदान करेंगे।

किन्नरों के हित में काम करने वाली संस्था ‘किन्नर अखाडा’ एक ऐतिहासिक आयोजन करने जा रही है, जिसमें हाल के वर्षों में स्वर्ग सिधारे किन्नरों का पिंडदान संस्कार किया जायेगा।

पिंडदान संस्कार एक हिन्दू प्रथा है, जिसमें स्वर्ग सिधारे पूर्वजों को श्राद्ध अर्पित किया जाता है। सितम्बर महीने में पितृपक्ष जिसे पितरों का पक्ष (पखवारा) भी कहा जाता है, 17 दिनों का होता है। इन 17 दिनों के पितृपक्ष मे श्राद्ध एवं पिंडदान करने का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस पुण्य क्षेत्र में पिता का श्राद्ध करके पुत्र अपने पितृऋण (पितृदोष) से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है।

सैकड़ों वर्षों से किसी भी धर्म के किन्नरों का धार्मिक अंतिम संस्कार नहीं किया गया है। इतना ही नहीं ज्यादातर किन्नरों को कब्रिस्तान के बजाय कहीं सुनसान में जलाया जाता रहा है। हिन्दू पंडित उनके म्रत्यु बाद के कर्मकांड करने से मना कर देते हैं और इसीलिए हर साल पितृपक्ष में मृतक परिजनों को दिया जाने वाला श्राद्ध भी कभी नहीं होता। लेकिन इस वर्ष मृतक किन्नरों को पिंडदान देने की शुरुआत हो रही है, जो उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा मिलने के संघर्ष में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

किन्नर अखाडा के संस्थापक सदस्य ऋषि अजय ने ‘द एशियन एज‘ को बताया कि,“हिन्दू धर्म में जन्मा प्रत्येक मनुष्य 16 कर्मकांडो का अधिकारी हो जाता है, जिनमें जन्म के समय किये जाने वाले संस्कारों सहित नाम संस्कार, मुंडन संस्कार, जनेहू संस्कार, विवाह संस्कार और अंतिम संस्कार शामिल हैं। लेकिन किन्नरों को अब तक शुरू से लेकर अंतिम संस्कार तक हर अधिकार से दूर रखा गया। हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि अब ऐसा और न हो। “

किन्नर अखाडा की महामंडलेश्वर लक्ष्मी त्रिपाठी कहती हैं, “हम तीन सौ वर्ष पुरानी कुप्रथा को तोड़ रहे हैं, जिसमें किन्नरों को म्रत्यु पश्चात कर्मकांड करने की इजाजत नहीं है। हम अब से किन्नरों के अंतिम संस्कार की परंपरा भी शुरू करेंगे। “‘किन्नर अखाडा’, बनारस के गंगा किनारे पिंडदान संस्कार समारोह 24 सितम्बर को आयोजित करेगा। जिसमें 151 ब्राह्मणों का समूह अन्य संतो के साथ श्राद्ध प्रक्रिया पूरी करेंगे।

इस समारोह की अध्यक्षता कर रहे आचार्य बद्री नारायण ने बताया कि, “ये ऐतिहासिक मिसाल है और एक सबूत भी कि वक़्त बदल रहा है। किन्नर भी मनुष्य हैं और उन्हें भी सभी धार्मिक संस्कारों का समान अधिकार है। ये पहल उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने में भी मदद करेगी। “हमारा समाज बदल रहा है। हम सारे विभेदों को भुलाकर इंसानियत की ओर कदम बढा रहे हैं। बदलते वक़्त के साथ भारत भी नए आयाम गढ़ रहा है। इंसान को इंसान से जोड़ने की ओर मिसाल बन रही ऐसी पहलों को सलाम!

(साभार – द बेटर इंडिया)

‘ एक साँझ कविता की-2 और बंगाल का नीलांबरी जादू

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नीलांबर ने हावड़ा के शरत सदन में ‘ एक साँझ कविता की-2 ’ का आयोजन किया । कार्यक्रम के दौरान कविताओं को आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करते हुए प्रस्तुत किया गया साथ ही इसमें नृत्य और माइम का भी समावेश किया गया । इस अवसर पर भोपाल से आशुतोष दूबे, इंदौर से हेमंत देवलेकर, कानपूर से वीरू सोनकर और तथा कोलकाता से राज्यवर्द्धन, निशांत, उमा झुनझुनवाला तथा कल्पना ठाकुर ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया । दिल्ली की कवयित्री रश्मि भारद्वाज किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से नहीं आ सकीं थीं, उनकी कविताओं को ऑडियो विडियो के माध्यम से प्रस्तुत किया गया । आमंत्रित कवियों की कविता पर ममता पांडेय, पूनम सिंह, नीलू पाण्डेय, मधु सिंह और प्रियंका सिंह ने अद्भूत कोलाज प्रस्तुत किया। अजय राय जी के गाए निराला के गीतों पर नृत्य की प्रस्तुति हुई । वहीं उदय प्रकाश की कविता ‘औरतें’ पर सुशान्त दास द्वारा निर्देशित हृदय स्पर्शी माइम प्रस्तुत किया गया, इसमें चार वर्षीय स्नेहा ने अपने अभिनय से सभी का दिल जीत लिया । मंगलेश डबराल की कविता ‘तानाशाह’ का विडियो फिल्म प्रस्तुत हुआ । नीलांबर के इस आयोजन का लक्ष्य है कि हिन्दी साहित्य को विभिन्न विधाओं के साथ युक्त करके उन्हें लोकप्रिय बनाना। सोशल मीडिया पर नीलांबर के इस कार्यक्रम के बारे लोग उत्सुकता से चर्चा कर रहे है।

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राहुल शर्मा, अवधेश साह, पंकज सिंह, प्रदीप तिवारी, विशाल पांडेय, अभिषेक पांडेय एवं सुजीत राय ने अपने अपने योगदान से कार्यक्रम को संचालित किया। कार्यक्रम के बारे में बोलते हुए  प्रो. शंभुनाथ ने अपने अध्यक्षीय भाषण में इसे“अद्भुत और मार्गदर्शक” बताया । कवयित्री कल्पना ठाकुर ने कार्यक्रम पर टिप्पणी करते हुए कहा कि“अद्भुत तैयारी थी नीलाम्बर की। ग़ज़ब का टीम वर्क है। एक एक चीज़ करीने से सजाया हुआ।” कवि वीरू सोनकर ने इस कार्यक्रम की रूपरेखा के बारे में कहा कि ‘ हिन्दी बहुल क्षेत्र में इस तरह का सर्मपण हिन्दी कविताओं को लेकर नदारद है, नीलांबर का प्रयास अतुलनीय है और मैं बार बार इस कार्यक्रम में आना चाहूँगा।’ भोपाल के प्रसिद्ध ‘विहान ड्रामा वर्क्स’ के संस्थापक और कवि हेमंत देवलेकर ने कहा- ‘ये अनुभव को जिन्दगी भर के सहेज लिया है।’ राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात कवि आशुतोष दूबे ने कहा ‘नीलांबर द्वारा संजोयी गई कविता की इस दूसरी सांझ में काव्यानुभव एक कंपोज़िट अनुभव बनता है। यह बंगाल का नीलाबंरी जादू है।’नीलांबर के अध्यक्ष विमलेश त्रिपाठी ने कहा कि संस्था इसी तरह साहित्य के विभिन्न विधाओं पर नये तकनीकों के साथ साहित्य के लोकप्रियकरण हेतु प्रयास करता रहेगा। ज्ञात हो कि नीलांबर को बाहर से कोई आर्थिक सहयोग या अनुदान नहीं मिलता है, संस्थापक सदस्यों और सहयोगी सदस्यों के अनुदान पर ही सारे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। अंत में संजय जायसवाल ने सभी अतिथियों और श्रोता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।