Tuesday, March 24, 2026
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ये है छठ पर्व का इतिहास और महत्व

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छठ पर्व या छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। छठ पर्व या छठ कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। प्रायः हिंदुओं द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व को इस्लाम सहित अन्य धर्मावलंवी भी मनाते देखे गए हैं। धीरे धीरे यह त्यौहार प्रवासी भारतीयों के साथ साथ विश्वभर मे प्रचलित व प्रसिद्ध हो गया है। छठ पर्व की शुरूआत कहां से हुई, कब हुई और क्यों हुई इसके पीछे कई ऐतिहासिक कहानियां प्रचलित हैं। हम आपको बता रहे हैं छठ पूजा से जुड़ी ऐसी ही कुछ कहानियों के बारे में…

राजा प्रियंवद की कहानी: छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियवंद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा प्रियंवद से कहा कि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं और इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा प्रियंवद से उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा। जिसके बाद राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। तभी से छठ पूजा पूत्रोंं की दीर्घ आयु के लिए मनायी जाती है।

भगवान राम और लंका विजय से जुड़ी कहानी: छठ पूजा से जुड़ी एक अन्य कहानी प्रचलित है जिसके मुताबिक विजयादशमी के दिन लंकापति रावण के वध के बाद दिवाली के दिन भगवान राम अयोध्या पहुंचे। रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी। इसके बाद से ही यह पर्व मनाया जाता है।

 

मैरी कॉम ने बच्चों को लिखी चिट्ठी: कहा- रेप को जानना जरूरी, तुम्हारी मां से भी हुई छेड़छाड़

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बॉक्सर और राज्यसभा सांसद मैरी कॉम ने अपने बच्चों के नाम एक चिट्‌ठी लिखी है। वो भी दुष्कर्म जैसे मुद्दे को समझाने के लिए। इसमें उन्होंने कहा है – “तुम अभी छोटे हो, पर अभी से जानो कि रेप होता क्या है, क्योंकि तुम्हारी मां से भी छेड़खानी हुई है।” मैरी कॉम के तीन बच्चे हैं। 9 साल के जुड़वां और छोटा 3 साल का। मैरी कॉम ने इस लेटर में और क्या लिखा…
– उन्होंने लेटर में लिखा, “आपकी मां भी छेड़छाड़ का शिकार हुई है। वो भी तीन-तीन बार। मैं 17 साल की थी, तब मणिपुर में मेरे साथ छेड़छाड़ हुई थी। फिर अपने दोस्तों के साथ दिल्ली और हरियाणा में भी इससे जूझना पड़ा।”
कब हुई थी मैरी कॉम से छेड़छाड़
– मैरी कॉम ने लिखा, “यह काफी चौंकाने वाली बात है। सुबह के साढ़े आठ बजे थे। मैं रिक्शे से ट्रेनिंग कैम्प जा रही थी। तभी एक अनजान व्यक्ति ने मुझ पर हमला कर दिया। उसने मेरी छाती पर हाथ लगाया। मुझे गुस्सा आया। मैंने चप्पल हाथ में लेकर उसका पीछा किया। मगर वो भाग गया।”
– उन्होंने लिखा, “अफसोस है कि उस वक्त कराटे की ट्रेनिंग मेरे काम न आ सकी। अब 33 साल की हूं। लोग एक मेडलिस्ट के तौर पर मेरी तारीफ करते हैं। लेकिन मैं चाहती हूं कि एक औरत के तौर पर भी मेरा उतना ही सम्मान हो।”
– उन्होंने लिखा, “किसी इंसान के लिए हम नाटी और चपटी हैं, जिसे चिंकी कहकर बुलाया जाता है। किसी के लिए हमारा जिस्म ही सब कुछ है।”
बच्चों को दी महिलाअों की मदद करने की सीख
– मैरी कॉम ने लेटर में लिखा, “मेरे प्यारे बच्चों, याद रखना कि तुम्हारी तरह हमारे पास भी दो आंखें और एक नाक है। बस हमारे जिस्म के कुछ हिस्से तुम से अलग हैं। इतना सा फर्क है हमारे-तुम्हारे बीच। यह मायने नहीं रखता कि महिलाएं क्या पहनें या कब घर से बाहर निकलें, क्योंकि यह दुनिया उतनी ही महिलाओं की है जितनी मर्दों की।”
– उन्होंने लिखा, “मुझे आज तक यह समझ में नहीं आया कि किसी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ छूने से मर्दों को क्या मिलता है। जब कभी तुम किसी महिला के साथ छेड़खानी होते हुए देखना तो तुम उस महिला की मदद के लिए अपने हाथ आगे बढ़ाना।”
– मैरी कॉम ने लिखा, “रोड पर चलता हर व्यक्ति मुझे नहीं पहचान सकता, जैसे धोनी और विराट को पहचानता है, लेकिन मैं यह भी डिजर्व नहीं करती कि कोई मुझे चिंकी कहे। मैं यौन हमलों को लेकर लोगों को जागरूक करूंगी। आओ, हम ऐसा समाज बनाएं जहां लड़कियां हर जगह सुरक्षित रहें और उन्हें किसी तरह का डर न हो।”

समाज की बेड़ियां तोड़ ये 14 साल की फरीहा बनी वुशु चैंपियन

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‘वुशु’ सीखकर हैदराबाद की एक लड़की पूरी दूनिया में मशहूर हो रही है. अब आप सोच रहे होंगे कि ‘वुशु’ है क्‍या. हम आपको बताते हैं कि ‘वुशु’ और फरीहा की कहानी। दरअसल ‘वुशु’ चीन के मार्शल आर्ट्स का एक फाॅर्म है. इसे 1949 में इजाद किया गया था। हैदराबाद के स्‍कूल ने इसे लड़कियों को सिखाने का निर्णय लिया, जिससे वे अपनी रक्षा कर सकें. स्‍कूल में यह सिखाया जाने लगा. जिन लड़कियों ने इसे सीखा, उसमें सबसे सफल रहीं 14 साल की फरीहा तफीम।

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राज्‍य प्रतिस्‍पर्धा जीतने के बाद फरीहा को नेशनल चैंपियनशिप के लिए चुना गया. यह प्रतियोगिता असम में होनी थी. चूंकि यह जगह हैराबाद से बहुत दूर है इसलिए फरीहा की मां उसे वहां नहीं जाने देना चाहती थी. उसकी मां ने उससे कहा, ‘तुम अब बड़ी हो रही हो और तुम्‍हारा इतना दूर जाना सुरक्षित नहीं है’.उसकी मां और भाई का मानना था कि अगर फरीहा ऐसी प्रतियोगिता में भाग लेतीे है तो उनके समुदाय में उसके बारे में कई तरह की बातें की जाएंगी.’

अब फरीहा पर जयीशा पटेल ‘इंडियाज वुशु वॉरियर गर्ल’ नाम की डॉक्‍यूमेंट्री बना रही हैं. जयीशा कहती हैं, ‘मैं फरीहा की उम्र जानकर हैरान थी कि इतनी छोटी बच्‍ची ने किस तरह अपने समुदाय के विचारों से अलग जाकर अपने लिए रास्‍ता बनाया. उसकी कहानी प्रेरणा देने वाली है।’लेकिन फरीहा लगातार अपनी मां को समझाती रही. उसे उसके पिता का साथ मिला, वह गुवाहाटी गई और वहां उसने राष्‍ट्रीय प्रतियोगिता भी जीत ली.

 

सुरों को बांटा नहीं जा सकता: अमजद अली ख़ान

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पद्म विभूषण सरोद वादक उस्ताद अमजद अली ख़ान ने कहा है, “मैं वो पहला कलाकार हूं जो 25 वर्षों के सांस्कृतिक मौन को दर्शाने पाकिस्तान गया था.”

उन्होंने कहा, ”फ़िलहाल पाकिस्तान एक नए अल्फ़ाज़ की तरह है और नए-नए देशों में अक्सर संस्कृति की कमी रहती ही है. पूरी दुनिया में ज़मीन का बंटवारा भले हो गया हो, पर स्वरों का बंटवारा कोई नहीं कर सकता.”

अमजद अली ख़ान कहते हैं, “हम चाहे किसी भी धर्म या संप्रदाय से जुड़े हों, संगीत हमेशा से आध्यात्म का मार्ग रहा है.”

संगीत के महत्व को समझाते हुए उन्होंने बताया, “जब मैं स्टेज पर होता हूं, तब उन चंद लम्हों में मुझे ऐसा अनुभव होता है जैसे मैं किसी अलौकिक दुनिया में चला गया हूं. कभी-कभी यह अविश्वसनीय भी लगता है.”

अमजद अली ख़ान आगे कहते हैं कि, “संगीत से जुड़ना और संगीतज्ञ होना अपने आप में एक वरदान है. जो अपने अंदर अलग ऊर्जा प्रदान करती है.”

अमजद अली ख़ान कहते हैं कि संगीत कोई बहस का मुद्दा नहीं है. संगीत अपने आप में सर्वोच्च शक्ति के साथ जुड़ने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम होता है. संगीत के कई आयाम हैं जो संवाद, मंत्रोच्चार, मौखिक गायन – याद करने से लेकर वाद्य यंत्र वादन तक जुड़े होते हैं.”

देश की सीमा पर हाल में हुए उड़ी हमले पर अफ़सोस जताते हुए वो कहते हैं, “हर रोज कहीं न कहीं यह आतंकी हमले हो रहे है. ऐसे में ज़रूरी है सभी देश खुद को अंदर से मजबूत बनाएं.”

 

लोकगीत को मुख्यधारा में लाना बहुत जरूरी है

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संगीत और अभिनय अगर एक साथ हो तो आपको पुरानी फिल्में याद आ जाती हैं और आज की फिल्मों में ऐसा होता है तो कलाकार को सुरीला बनाने में उसके गले से ज्यादा संगीतकार का योगदान होता है। बहरहाल हम सिनेमा की बात नहीं कर रहे हैं और न ही उन कलाकारों की जिनके लिए अभिनय का अर्थ हिन्दी फिल्में हैं। रंगकर्म को पूरी शिद्दत से अपनाने वाले और इस रंगकर्म के साथ अपनी गायकी को साथ रखने वाले बहुत कम हैं मगर एक ऐसी बहुमुखी प्रतिभा की धनी अभिनेत्री, गायिका और कवियत्री भी है जो इन तीनों मुश्किल विधाओं को एक साथ साधती है। हम बात कर रहे हैं कल्पना ठाकुर की जो एक प्रखर कवियत्री, भावप्रवण अभिनेत्री और सुर की धनी गायिका हैं। इसके साथ ही वे एक केन्द्रीय संस्थान में अनुवादक भी हैं। अपराजिता में इस बार पेश है कल्पना ठाकुर से बातचीत के प्रमुख अंश –

घर से ही मिला संगीत का परिवेश

संगीत का परिवेश घर की ही देन है। पिता बहुत अच्छा गाते थे और माँ लोकगीत बढ़िया गाती थीं। माँ को मैंने घर के पारिवारिक अनुष्ठानों, जैसे शादी – ब्याह, मुंडन, मधुश्रावणी, जनेऊ जैसे अवसरों पर बचपन से ही ढ़ेर सारे लोकगीत गाते हुए सुना। पिता जी भी कभी दोस्तों के साथ तो कभी हम भाई – बहनों को लेकर संगीत की मंडली सजा लिया करते थे। इसी परिवेश में बड़ी हुई और अनजाने में ही संगीत की ओर झुकाव होता गया। माता– पिता को गाते देख मैं भी भजन की किताब लेकर पूरी किताब के भजन गा लेती थी, तब आसन से उठती थी।

लोकगीतों की समुचित मार्केटिंग समय की माँग है

लोकगीत के सीधे सरल बोल हों, या सहज जीवन की स्वाभाविकता लिए उनकी धुनें हों, वे सीधे दिल में उतरते हैं और जीवन से जोड़ लेते हैं । हर मौके और हर मनोभाव के लिए आपको लोकगीत मिलेंगे। फिर चाहे वह फूल तोड़ते हुए हो या राह चलते हुए, ये गीत हमारे साथी होते हैं। पर अफसोस की बात है कि हमारी भावी पीढ़ी इस समृद्ध परम्परा से अनजान है। लोकगीत साधारण बानगी में असाधारण प्रभाव की क्षमता रखते हैं। इन्हें बचाये रखना और इसका विस्तार पीढी दर पीढ़ी करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।

आज तो तकनीक और संचार का युग है… तमाम माध्यम अपनाये जा सकते हैं। सरकार तो करेगी ही… कुछ कारपोरेट घराने इसे प्रायोजित करें। लोक कला मंचों को आर्थिक मदद देकर बढ़ाया जाए। कलाकारों का बीमा… वेतन जैसी कुछ नीतियां हों।अकादमियों में अनिवार्य रूप से क्षेत्रीय लोकगीत संगीत आदि के कार्यक्रम हों जिनमे प्रवेश निःशुल्क हो।

कक्षाओं में कोर्स में अनिवार्य रूप से पाठ हों। सभी पाठ्यक्रमों में विकल्प के विषय में इसे शामिल किया जाए। और सबसे ज़रूरी कि हम गाँव से जुड़े रहें। बच्चों को उस मिटटी पर लोटने दें, जहाँ के कण कण में  संगीत समाया हुआ है।

आधुनिक तकनीक पर जोर देना जरूरी है

फिल्मों की पहुँच सर्वव्यापी है। युवाओं को फिल्में सबसे अधिक प्रभावित करती हैं और फिल्मों में परोसी जाने वाली चकाचौंध के मुकाबले लोकगीत काफी देसी और सीधी – सादी विधा है। आधुनिकता और तकनीक से लैस फिल्म जगत से जुड़े लोग इस पर ध्यान दें तो शायद यह और अधिक प्रभावी तरीके से ज्यादा लोगों तक पहुँच सकेगा।

लोकगीत को मुख्यधारा में लाना बहुत जरूरी है

शुरूआत घर से होती है। माता –पिता लोकगीतों से बच्चों को परिचित करवाएं तो बुनियाद तैयार होगी। स्कूलों में लोकगीत को समुचित स्थान मिले तो शायद एक मानसिकता तैयार होगी। लोकगीत को मुख्यधारा में लाना बहुत जरूरी है।

 लोकगीत के साथ थियेटर भी भाता है

लोकगीत से अधिक मैं थियेटर से जुड़ी रही हूँ। पिछले लगभग 20 वर्षों से रंगकर्मी के साथ काम किया। नाटकों में लोकगीतों का खूब उपयोग होता है। हाल ही में रंगप्रवाह के साथ अंगीरा किया और उसे काफी सफलता मिली। आगे भी इसी विधा से जुड़े रहना पसंद करूँगी।

 साहित्यिक गीतों को सरल भाषा चाहिए

साहित्य को अगर संगीत से जोड़ना है तो भाषा को सहज –सरल बनाना होगा और सरल भाषा में गीत लिखे जाने चाहिए जिसकी धुन आकर्षक हो।

 हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहना होगा

हमें अपनी जड़ों  से जुड़े रहने की जरूरत है। बच्चे हमेशा से अच्छे गीत और अच्छे बोल वाले गीत सुनें, यह हमें सुनिश्चित करना होगा। रूचि विकसित होती जाएगी। वैसे भी लोकधुनों में जो बात है, वो और किसी में नहीं है।

 

 

 

साइना नेहवाल आईओसी एथलीट आयोग की सदस्य बनीं

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भारतीय बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के एथलीट आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया है । साइना को आईओसी अध्यक्ष थामस बाक से कल रात इस आशय का पत्र मिला । पत्र में लिखा था ,‘‘ रियो ओलंपिक के दौरान आईओसी एथलीट आयोग के चुनाव में आपकी उम्मीदवारी को देखते हुए अध्यक्ष से मशविरे के बाद आपको एथलीट आयोग का सदस्य नियुक्त करने में हमें अपार हर्ष हो रहा है ।’’ आयोग की अध्यक्ष एंजेला रूजियेरो है और इसमें नौ उपाध्यक्ष तथा 10 अन्य सदस्य है । आयोग की अगली बैठक छह नवंबर को होनी है । घुटने की चोट से जूझ रही साइना नवंबर में वापसी की कोशिशों में जुटी है ।
साइना के पिता हरवीर सिंह ने इस नियुक्ति पर खुशी जताते हुए कहा ,‘‘ मैं काफी भावुक हो गया हूं । हमारे लिखे यह फख्र की बात है कि उसकी उपलब्धियों के आधार पर उसे आईओसी का सदस्य बनाया गया । उन्हें लगा कि वह काम आ सकती है । चोट के कारण वह ओलंपिक पदक नहीं जीत सकी थी । हमें उस पर गर्व है ।’’

 

यूएस में 9 साल का पार्थ बना पुलिस अफसर

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अमेरिका के न्यूजर्सी में 9 साल के पार्थ पटेल ने लोगों की आंखें नम कर दीं। कैंसर की बीमारी से जूझ रहे पार्थ को एक दिन के लिए पुलिस इंस्पेक्टर बनाया गया। पुलिस परेड में उसे सैकड़ों जवानों और अमेरिकंस ने सम्मान दिए। इस दौरान कई लोग रो दिए। सुपरहीरो बेटमैन बने पार्थ के ड्राइवर…

पार्थ को न्यूजर्सी पुलिस की यूनिफॉर्म पहनाई गई। जवानों ने उसे सलामी और सुपरहीरा बेटमैन पार्थ का ड्राइवर बना। इस दौरान पार्थ के स्कूल के सभी स्टूडेंट्स और टीचर से लेकर भारी संख्या में लोग भी मौजूद थे। जानलेवा बीमारी से जूझ रहे पार्थ के चेहरे पर इस समय मुस्कान थी, लेकिन लोगों की आंखे नम थीं।

पुलिस अफसर ने किया पार्थ के सपने को साकार
न्यूजर्सी के पुलिस अफसर एड्रियन म्युरल को जब यह जानकारी मिली कि पार्थ को कैंसर है तो उन्होंने पार्थ के लिए कुछ स्पेशल करने का मन बनाया। दूसरी तरफ, पार्थ भी बड़ा होकर पुलिस अफसर ही बनना चाहता था। इसलिए एड्रियन ने उसे एक दिन के लिए पुलिस अफसर बनाकर सम्मानित करने का विचार किया। इतना ही नहीं, इस काम के लिए उन्हें पूरे पुलिस डिपार्टमेंट और आम नागरिकों का भरपूर सहयोग मिला। पार्थ को सम्मानित करने के लिए 100 से अधिक पुलिसकर्मी-अफसर और फायर फाइटर्स के जवान भी मौजूद रहे।

घर से स्कूल तक निकाली गई परेड
परेड पार्थ के एवेन्यू नॉर्थ स्ट्रीट पर स्थित उसके घर से स्कूल तक निकाली गई। इस दौरान पूरी सड़क पर हजारों लोगों की भीड़ जमा थी, जो पार्थ का स्वागत करने के लिए खड़े थे। परेड के दौरान पार्थ की बहन और उसके माता-पिता पीछे-पीछे चल रहे थे। इस बारे में पार्थ की बहन हिलेरी ने बताया, ‘यह पार्थ और हमारी जिंदगी का सबसे यादगार पल है। हमने कैंसर की असहनीय तकलीफ से जूझ रहे पार्थ को लंबे समय बाद परेड के दौरान हंसते हुए देखा।’

स्टूडेंट्स और टीचर ने कहा, ‘लेट्स गो पार्थ’
पार्थ की परेड के दौरान सड़क के दोनों ओर स्थानीय लोगों के अलावा पार्थ के स्कूल के स्टूडेंट्स और टीचर भी लाइन बनाकर खड़े हुए थे। सभी एक सुर में पार्थ को ‘लेट्स गो पार्थ’ कहकर चीयर कर रहे थे। पार्थ की एक टीचर केली लोमेक्स ने पार्थ को अपना सुपरहीरो बताया। यह कहते हुए वे रो पड़ीं। परेड के बाद पार्थ के स्कूल में खास पार्टी का आयोजन भी किया गया था। सभी ने दुआ की कि पार्थ इस बीमारी को हरा देगा।

 

ट्वीटर पर हिन्दी का परचम लहरा रहे हैं ‘विदेशी इयान’

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जब भी कोई विदेशी हिन्दी में बात करता है, हम उसे ऐसे देखते हैं जैसे न जाने वह कितना अनोखा काम कर रहा है। अनोखा तो है क्योंकि एक ओर जब हममें से बहुत से लोग आपसी की बातचीत से लेकर सोशल मीडिया पर अँग्रेजी इस्तेमाल करते हैं तो ऐसे में कोई विदेशी शुद्ध हिन्दी में बात करे, तो अजूबा ही लगेगा। यही आश्चर्य है क्योंकि हिन्दी के अच्छे जानकार और शिक्षक भी सोशल मीडिया पर अँग्रेजी लिखते हैं। ऐसी आत्महीनता की स्थिति में चैनलों की वेबसाइट खंगालते हुए जब लल्लन टॉप पर ये आलेख पढ़ा तो लगा कि यह बात सब तक पहुँचनी चाहिए। उक्त वेबसाइट का आभार इस तरह की जानकारी देने के लिए। अपराजिता लल्लन टॉप का आभार व्यक्त करते हुए आलेख आपके लिए कुछ संशोधनों के साथ दे रही है, पढ़िए लिखा भी अच्छा गया है और साक्षात्कार भी कमाल का है। –

भारत में ज्यादातर लोग यही सोचते हैं लेकिन यह धारणा टूटती है जब आप इयान वूलफर्ड के ट्वीट्स देखते हैं ऑस्ट्रेलिया के इस बंदे ने ट्विटर पर अपनी शानदार हिंदी से तहलका मचा रखा है

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अमेरिकी मूल के इयान वूलफर्ड ऑस्ट्रेलिया की ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में हिंदी के लेक्चरर हैं। उनका ट्विटर हैंडल है @iawoolford, जिससे वह हिंदी में ट्वीट करते हैं। यहां उनके करीब साढ़े 11 हजार फॉलोअर हैं। हिंदी के मशहूर लेखक फणीश्वरनाथ रेणु पर उनकी किताब आने वाली है। कभी वह अकबर इलाहबादी के जन्मदिन पर उनका शेर ट्वीट करते हैं तो कभी बच्चन की पंक्तियां याद दिलाते हैं। उनके ज्यादातर ट्वीट्स हिंदी साहित्य से ही जुड़े होते हैं लेकिन इंडियन डिशेज और भारत के राजनीतिक मसलों पर भी इक्का-दुक्का कमेंट से भी वह गुरेज नहीं करते. उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी कमाल का है।

 

इयान वूलफर्ड का हिंदी उच्चारण ऐसा है कि ऑडियो सुनेंगे तो लगेगा ही नहीं कि कोई अंग्रेज है। दिलचस्पी बढ़ी तो हमने (लल्लन टॉप) इयान से संपर्क किया और उनसे यह बातचीत ईमेल के जरिये की।  आपको यह भी बता दें कि हमारे ज्यादातर सवालों के जवाब उन्होंने खुद हिंदी में लिखकर भेजे।

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हिंदी से जुड़ाव बचपन से रहा। मां हेलेन मायर्स म्यूजिक साइंटिस्ट हैं और प्रवासी भारतीय कम्युनिटीज में संगीत पर रिसर्च करती हैं। बचपन में उनके साथ त्रिनिदाद, फिजी और मॉरीशस गया. भारत भी गया। 12 की उम्र में मां ने मेरा दाखिला त्रिनिदाद के एक स्कूल में कराया। वहां स्कूली दोस्तों के साथ भजन और लोकगीत गाते हुए हिंदी पढ़ना शुरू किया।

कॉर्नेल युनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन के दौरान मैंने हिंदी की औपचारिक पढ़ाई शुरू की। संगीत और एशियन स्टडीज मेरा ‘मेन सब्जेक्ट’ था. संगीत अब भी मेरे लिए बहुत मायने रखता है। असल में, कुछ समय के लिए मैं ऑपरा गायक बनना चाहता था। ऑस्ट्रेलिया आने के कुछ ही समय पहले मैंने इंडियन म्यूजीशियन वनराज भाटिया के साथ काम किया जब वे न्यूयॉर्क आए थे।

हिंदी के लिए मेरे आकर्षण की वजह है संगीत और प्रदर्शन की मेरी चाह। भारत में कविता पढ़ने के लिए नहीं, गाने कि लिए होती है। यह एक परफॉर्मेंस है। मैंने यह कॉर्नेल में अपनी बीए के दौरान प्रोफेसर कॉनी फेयरबैंक्स और प्रोफेसर मेहर फारूकी से सीखा।

हिंदी भाषा और साहित्य में एमए और पीएचडी अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस से की. यहां मेरा तआरुफ फणीश्वरनाथ रेणु की रचनाओं से हुआ— जैसे कि ‘तीसरी कसम’ और ‘मैला आंचल’. इसके बाद मैंने भारत में बहुत समय बिताया जिसमें जयपुर के अमेरिकन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज का हिंदी प्रोग्राम शामिल था। वहां मैंने डॉ एएन सिंह, विधु चतुर्वेदी, सईद अयुब, और नीलम बोहरा सिंह से हिंदी सीखी। भारत के हिंदी विशेषज्ञों की अद्भुत टीम के बिना मैं वहां नहीं होता, जहां आज हूं.

पसंदीदा भारतीय फिल्में: लगान, कुछ कुछ होता है, रंग दे बसंती, श्री चार सौ बीस

मैंने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सास, कोर्नेल युनिवर्सिटी, और सिराक्यूज़ युनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाई है। दो साल पहले मैं ऑस्ट्रेलिया आया और मेलबोर्न की लाट्रोब युनिवर्सिटी में होंदी प्रोग्राम के निर्देशक और व्याख्यता का पद हासिल किया। ऑस्ट्रेलिया अप इस विचार से जागृत हो रहा है कि दुनिया में रहने के लिए सिर्फ अंग्रेजी भाषा काफ़ी नहीं है।

मैंने उत्तरी-पूर्व बिहार में रेणु के गांव में अपनी पीएचडी का थीसिस लिखा। मैं रेणु के लोकगीत के प्रति गहरे प्यार से बड़ा मोहित था। ‘मैला आंचल’ पढ़ने के बाद जिसमें सौ से ज़्यादा लोकगीत शामिल है, मैं रेणु के गांव जाकर देखना चाहता था। बिहार में इतने अच्छे लोगों ने मेरा स्वागत किया। तब से मैं वहां के कलाकारों के साथ काम करने जाता रहता हूं।

पसंदीदा साहित्यकार, इसका   जवाब रोज़ बदलता रहेगा। मेरे लिए रेणु जी हिंदी लेखकों में से हमेशा प्रथम रहेंगे. उनके बाद जो लेखक मन में आते हैं वे हैं हरिशंकर परसाई। वे इतने महान व्यंगकार थे और उनके बहुत सारे लेख आज भी प्रासंगिक है। सिर्फ भारत में नहीं बल्कि अन्य देशों में भी। मेरे छात्रों को उनकी कहानियां बहुत पसंद है— जैसे कि ‘चूहा और मैं’ और ‘भेड़ और भेड़िया’. मेरे छात्रों को ऑस्ट्रेलिया के राजनीतिक हालात से इसकी तुलना अहम लगती है।महादेवी वर्मा भी मुझे पसंद हैं. उनकी कविता ‘जो तुम आ जाते एक बार’ एक मास्टरपीस है. कितनी करुणा कितने संदेश — मैंने बहुत लोगों को ये पंक्तियां सुनते ही रोते देखा है.

मेरी बात अधूरी रह जाएगी अगर मैं तुलसीदास का नाम ना लूं। कभी कभी मुझे लगता है कि कोई भी रामचरितमानस की इस चौपाई से टक्कर नहीं ले पाया है:

घन घमंड नभ गरजत घोरा
प्रिया हीन डरपत मन मोरा ।।
दामिनि दमक रह नघन माहीं
खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं ।।

मेरे पास इस चौपाई का गुंदेचा ब्रदर्स की परफॉर्मेंस की रिकॉर्डिंग है। पर मैं इसे साल में सिर्फ एकाध बार सुनता हूं क्योंकि डर है कि अगर कई बार सुनूंगा तो उनकी आवाज का शानदार असर कम न हो जाए.

बचपन से भारत आता रहा हूं। 2003 में एक साल के लिए जयपुर में था। वाराणसी और उसके इर्द-गिर्द गांवों में काफी समय बिताया है। करीब एक साल के लिए बिहार के अररिया जिले के एक गांव में रहा. अब भी आना-जाना जारी है।

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जब मैं बिहार या यूपी के गांवों में होता हूं तो लोगों को मेरे हिंदी बोलने पर ज्यादा हैरत नहीं होती शायद इसलिए क्योंकि यहां के लोग इतनी अंग्रेजी नहीं बोलते. पर मैंने देखा है कि दिल्ली और दूसरे शहरों के लोग ज्यादा चकित होते हैं।

पसंदीदा भारतीय व्यंजन (cuisine): लिट्टी चोखा

कभी कभी जब मैं लोगों से हिंदी में बात करता हूँ तब उन्हें काफी देर तक महसूस नहीं होता. ऑस्ट्रेलिया की युनिवर्सिटी में सबसे मजेदार भाषा का ऐसा भ्रम हुआ था. मैंने कैंपस में एक भारतीय आदमी को अपने बेटे से बात करते हुए सुना। वे रास्ता भूल गए थे. तो मैंने उनसे हिंदी में पूछा कि वे कहां जाना चाहते हैं। पिता ने अंग्रेजी में जवाब दिया- ‘वी वॉन्ट टू गो टू द लाइब्रेरी’. हिंदी में मैंने उनको रास्ता बताया। जब वे चलने लगे तो मैंने बेटे को हैरान होकर कहते सुना, ‘पापा, उस अंग्रेज को हिंदी कैसे आती है?’ और पापा ने जवाब दिया “क्या मतलब है तुम्हारा, वो तो अंग्रेजी में बोल रहा था.’

डेविड वॉर्नर क्रिकेट के शानदार खिलाड़ी है। कभी कभी मैं मस्ती के लिए यूट्यूब पर उनके स्विच हिट्स देखता हूं। वह भारत के बारे में भी काफी कुछ जानते होंगे क्योंकि वह दिल्ली डेयरडेविल्स और हैदराबाद सनराइजर्स के लिए खेल चुके हैं लेकिन शायद उस दिन एमसीजी पर वह ये भूल गए होंगे। पहली इनिंग के 23वें ओवर में वॉर्नर ने रोहित शर्मा से जाकर कहा, ‘स्पीक इंग्लिश’. मैं नहीं जानता कि वार्नर ने ऐसा क्यों किया। एक क्रिकेट फैन और हिंदी का प्रोफेसर होने के नाते मुझे बुरा लगा। यह शर्मनाक और बुरी बात थी। ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले भारत में कहीं ज्यादा क्रिकेट के खिलाड़ी हैं. क्रिकेट की चर्चा कई भाषाओं में होती है, जैसे कि हिंदी, तमिल, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी, मैथिली और अन्य भारतीय भाषाओं में. जब वॉर्नर ने यह बात कही तब ऐसा लगा कि उन्हें एशिया और विश्व में ऑस्ट्रेलिया की जगह का अंदाजा नहीं है.

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पसंदीदा भारतीय एक्टर-एक्ट्रेस: आमिर खान, रेखा

मैंने वॉर्नर के बर्ताव व्यवहार को भारत-ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते को लेकर भी देखा है – खास कर जब 2009 में इंडियन स्टूडेंट्स पर नस्ली हमले हुए थे। वॉर्नर की टिप्पणी नॉन-ब्रिटिशर्स के लिए कड़वा माहौल पैदा कर सकती है इसलिए जरूरी है कि ऐसे बर्ताव को बढ़ावा न दिया जाए। मेरे कई इंडियन स्टूडेंट्स भी हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य नहीं पढ़ा, क्योंकि वे इंडिया में इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़े हैं। मैं यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हूं, तो इनकी शिक्षा मेरा फर्ज है. लेकिन उनकी सुरक्षा हमारी अव्वल जिम्मेदारी है.

कई हिंदीभाषी हिंदी में टाइप करना चाहते हैं, पर उसका तरीका नहीं जानते। मैं अपने एप्पल लैपटॉप पर बिल्ट-इन हिंदी का इस्तेमाल करता हूं। फोन पर चैटिंग करते समय मैं एप्पल के बिल्ट-इन हिंदी कीबोर्ड का इस्तेमाल करता हूं. एंड्रॉयड में कई विकल्प हैं- जैसे गूगल हिंदी इनपुट. मैंने अपनी पत्नी के एंड्रॉयड फोन में हिंदी इंस्टॉल कर रखी है, ताकि मैं एंड्रॉयड पर भी टाइप करना सीख सकूं और स्टूडेंट्स को सिखा सकूं।

हां अंग्रेजी में ही। यह रेणु के गांव में होने वाली पारंपरिक परफॉर्मेंस के बारे में है. रेणु की लिखाई में कई लोक संगीत के उदाहरण है. जब मैं उस गांव में था तब मैंने कुछ ऐसे कलाकारों के साथ काम किया जिन्होंने असल में रेणु के साथ कुछ गीत गाए थे। मेरी सब से एक्साइटिंग डिस्कवरी थी कि रेणु खुद एक कलाकार थे। वे बिदापत नाच के कलाकारों के साथ काम करते थे। धान के खेतों में धान रोपते हुए वे भी बारहमासा गाते थे. रेणु के उपन्यास में लिखे गीतों की परफॉर्मेंस बिहार में देखना मेरे लिए कितना एक्साइटिंग था, मैं बता नहीं सकता. वह तब भी था जब मैंने श्री रामप्रसाद मंडल के समुह को बारहमासा गाने गाते सुना—

फागुन मासा रे गवना छे
कि पहिरू कुसुम ही रंग हो
पंथ चलाइत केसिया संहारू बान्हू
कि अंचर पवन झरे

रामप्रसाद जी ने ‘मैला आँचल’ नहीं पढ़ा था। उनके यह गाना इसलिए पता था क्योंकि वे एक किसान थे। उनको याद है कि रेणु जी बारिश के मौसम में ये गाना गाते थे. रामप्रसाद जी ने ‘मैला आंचल’ को मेरे लिए जिंदा किया।

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रामप्रसाद अब इस दुनिया में नहीं रहे. 18 महीने पहले वे दिल के दौरे से गुजर गए। वे 65 साल के थे। उनके बारे में सोचते हुए आंखें भर आती हैं। उनकी आवाज की रिकॉर्डिंग सुनकर भावुक हो जाता हूं। जब भी मैं उनके घर जाता था या उनके साथ खेत में बैठता था वे मुझे कुछ ना कुछ नया सुनाते थे। मेरे हर सवाल के लिए उनके पास जवाब में एक गाना था। वे हमेशा कहते थे, ‘फिर आना, अपना माइक लाना और मैं तुम्हें कुछ और बताऊंगा.’ मुझे लगा था कि मेरे पास उनके साथ काम करने के कई साल हैं, पर अफसोस ऐसा नहीं है। उम्मीद करता हूं कि रेणु के साहित्य और बिहार के लोकगीतों के बारे में मेरी किताब रामप्रसाद जी की विरासत का वर्णन कर पाएगी.

ऑस्ट्रेलिया में हिंदी के छात्रों की संख्या बढञ रही है। इस साल हिंदी फर्स्ट ईयर में गैर-भारतीय मूल के 15 स्टू़डेंट्स थे। उन में से कई दूसरे और तीसरे साल में भी हिंदी भी पढ़ेंगे। उन्होंने बहुत अच्छा फैसला लिया है। नक्शे पर नजर डालिए और देखिए कि ऑस्ट्रेलिया के लिए एशिया कितना अहम है। भारत ऑस्ट्रेलिया के लिए मूल सहयोगी बनता जा रहा है और भारत से रिश्ते कायम रखने के लिए सिर्फ अंग्रेजी काफी नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के कई इलाकों में ऐसे लोगों की जरूरत है जो हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के जानकार हों।

भारत में पुरूषों के लिए पहनावा कठिन नहीं है। विदेशी भी इसके साथ सहज हैं. कई बार जीन्स और शर्ट ठीक रहती है। बिहार जाता हूं तो अपने साथ लुंगी, कुर्ते, जीन्स, और कभी कभी वेस्टर्न सूट भी ले जाता हूं।  कभी न कभी इन सबकी जरूरत पड़ती है। गांव में रास्ते के हैंड-पंप के पास नहाता हूँ। एक लड़का पानी निकालता है और दूसरा मुझे साबुन देता है। उस दौरान लुंगी बहुत जरूरी है। हैंड-पंप के पानी से भीगते हुए आप जीन्स नहीं पहन सकते.

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एक बार बारिश के मौसम में मैंने धान की रोपनी में मदद की क्योंकि मैं बारहमासा के गाने रिकॉर्ड करना चाहता था, जो सिर्फ उस काम के दौरान गाए जाते हैं। उस काम के लिए भी लुंगी जरूरी है. पर जब मैं गांव छोड़कर पूर्णिया जाता हूं तब मेरा पहनावा अलग होता है — पैंट, शर्ट, और अच्छे जूते.

मैं शायर तो नहीं, मगर भारत ने मुझे शायरी सिखा दी। कभी कभी कुछ लिख लेता हूं. वे काफी छोटी होती हैं, 140 अक्षरों की, ताकि वे एक ट्वीट में समा जाएं। दिल्ली चुनाव के समय जब मैं लाट्रोब युनिवर्सिटी के पास कंगारुओं से भरे जंगल से गुजर रहा था, तब मैंने ये पंक्तियां लिखीं:

जब भी मैं देखता हूं वन में कंगारू
लग रहा है कि हम रहते गंवारू
रात भर पीता हूं बोतल या दारू
कहता−क्या इस बार चलेगा झाड़ू?

यह कहने के लिए बहुत धन्यवाद. कभी कभी मैं सपना देखता हूं कि बॉलीवुड की फिल्म में कोई रोल करूं- जैसे लगान में कप्तान रसेल। उस के लिए मुझे ब्रिटिश-हिंदी एक्सेंट का इस्तेमाल करना पड़ेगा जो मैं मैं कभी-कभार मजाक में कर लेता हूं तो कभी कोई रेणु के ‘मैला आंचल’ पर फिल्म बनाए तो मैं जरूर कहूंगा कि डायरेक्टर साहब कि शुरुआत के मार्टिन साहब का रोल मुझे दें। उस से मेरा सपना सच हो जाएगा.

जहां तक मेरे उच्चारण की बात है, इसका श्रेय मेरे शिक्षकों को जाता है. भारत में रहने का भी फायदा मिला है।

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उच्चारण भाषा सीखने का कठिन हिस्सा है. पढ़ाने के दौरान भी पहले दिन से इस पर ध्यान देता हूं। अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियन अंग्रेजी बोलने वालों को कुछ अक्षरों का उच्चारण करने में काफी तकलीफ होती है— जैसे ‘त’ को वह ‘थ’ बोलते हैं. कभी कभी हमें ‘अ’ और ‘आ’ का फर्क समझने में दिक्कत पेश आती है. ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ) के अक्षर भी बहुत मुश्किल होते हैं। पर मैं अपने छात्रों को यह भी याद दिलाता हूं कि अगर वे हिंदी को ऑस्ट्रेलियन एक्सेंट से बोलें तो फिर भी भारत में लोग उन्हें समझ लेंगे और उनकी हिंदी सीखने की प्रेरणा को सराहेंगे.

मैं भारतीय राजनीति पर अपनी टिपण्णियां वहां तक सीमित रखने की कोशिश करता हूं जहां तक भाषा और साहित्य के क्षेत्र शामिल होते हैं। जैसे कि आपने जो राजस्थान का उदाहरण दिया उससे स्कूलों में साहित्य की पढ़ाई शामिल है. जहां तक बिहार के चुनाव का सवाल है, मैंने बड़े चाव से उसका अनुसरण किया। ऐसा लगता है कि मैंने हफ्तों भर के लिए किसी और चीज के बारे में नहीं सोचा। यह इसलिए क्योंकि मेरे कई खास मित्र बिहार में रहते हैं, जिनमें ऐसे दोस्त शामिल हैं जो बिहार की पार्टियों में सक्रिय हैं।

पसंदीदा भारतीय मिठाई: खीर

काफी साहित्य जो मैं पढ़ता हूं और जिस पर मैं शोध करता हूं, वह बिहार से है। बहुत सारा दिल्ली-केंद्रित रिपोर्टिंग का ध्यान राष्ट्रीय राजनीति के असर पर था− जैसे कि ‘यह चुनाव मोदी और बीजेपी के लिए क्या मायने रखते हैं?’ पर मेरा इंटरेस्ट इसलिए था कि पटना से लेकर पूर्णिया तक मेरे बहुत दोस्त हैं। मैं जानता हूं कि यह चुनाव उनके लिए; उनकी भविष्य की आशाओं के लिए कितना महत्वपूर्ण था.

मेरी पढ़ाई का क्षेत्र हिंदी साहित्य है इसलिए मैं भारतीय समाचार पर तब गौर करता हूं जब साहित्य के बारे में कुछ समाचार आते हैं. 30 अगस्त को कन्नड़ साहित्यकार एमएम कलबुर्गी की उनके घर में हत्या कर दी गई। ऐसा लगता है कि उनकी हत्या उनके विचारों के लिए की गई। कोई भी हत्या अस्वीकार्य है; अपमानजनक है. और जब किसी विद्वान की हत्या उसके अकादमिक विचारों के लिए की जाती है तब उनके साथीदार अकादमिक और साहित्यकारों का हक बनता है कि वे अधिक सुरक्षा की मांग करें; कि वे लिखने का हक, और जीने का हक की मांग करें। इसी दिशा में कई लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस किए हैं.

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कई विरोध करने वाले लेखकों ने कहा है कि भारत में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है. इसीलिए दादरी की भयानक हत्या और ऐसी घटनाएं बहस का हिस्सा बन चुकी हैं। मैं नहीं जानता कि बढ़ती इनटॉलेरेंस की बात सही है या नहीं. मुझे लगता है कि ऐसी चीज़ को नापना बहुत मुश्किल है. मगर मैं नहीं मानता कि आज के विरोध अमान्य हैं क्योंकि बीते हुए समय में चीजें और भी बूढ़ी रही होंगी। इसलिए मेरे दिल में उन लेखकों के लिए ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ है जिन्होंने पुरस्कार वापस किए हैं।

काश कि इन चर्चाओं में इन लेखकों की रचनाओं के बारे में ज्यादा बातें होतीं. उदाहरण के लिए 90 साल की कृषणा सोबती को ही लीजिए. उनकी ‘ए लड़की’ बीसवीं सदी की सबसे बड़ी साहित्यिक रचनाओं में से एक है। इस लघु उपन्यास के विषय आज के चर्चाओं से सीधे-सीधे जुड़े हैं। उनके उपन्यास का रिश्ता जीने का हक, बूढ़ा होने का हक और अपने माता-पिता को बूढ़े होते देखने के हक के बारे में है। यह उपन्यास उस हक के बारे में है जो जिंदगी की खुशी या ग़म महसूस कर सकें। यह हक डॉ कलबुर्गी और उनकी परिवार से छीन लिए गए. मोहम्मद अखलाक और उनके परिवार से भी। अगर आम जनता को कृष्णा सोबती की रचनाओं को पढ़ने और उन पर बहस करने का मौका मिलता तो शायद ‘अवार्ड वापसी’ की छवि कुछ और ही होती।

भारत में बीस प्रतिशत से कम लोग अच्छी अंग्रेजी बोल पाते हैं. जब मैं पूर्णिया में काम करता हूं तो कई दिनों तक अंग्रेजी का एक वाक्य तक नहीं सुनने को मिलता। पीएम मोदी के हिंदी के इस्तेमाल से कई लोगों को उम्मीद बंधती है कि हिंदी भाषा और सफलता में रिश्ता कायम हो सके और दुनिया में हिंदी भाषा की स्थिति ऊंची हो सके।

मेरी बीवी शैनन और मेरी दो बेटियां. ऐडी 9 और बिक्सी 7 साल की। दोनों यहां पर प्राइमरी स्कूल में हैं. शैनन ला ट्रोब यूनिवर्सिटी में साइंटिस्ट हैं और बायोलॉजी के फील्ड में रिसर्च करती हैं। वह हिंदी नहीं बोलतीं, लेकिन भारत में प्रवास का आनंद ले चुकी हैं. मेरे बच्चे हिंदी सीखने में दिलचस्पी रखते हैं। खास तौर से बिक्सी, जो अगले साल विक्टोरिया स्कूल ऑफ लैंग्वेजेस में हिंदी प्रोग्राम में एडमिशन लेना चाहती है। मैं अपने ऑस्ट्रेलियन छात्रों को बोल-चाल की हिंदी ही सिखाता हूं। अगर उन्हें सिर्फ शुद्ध या औपचारिक हिंदी सिखाऊं तो लोग उनका मजाक उड़ाएंगे कि वे रामानंद सागर के रामायण सीरियल के कलाकारों की तरह बात करते हैं।

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मैं रेणु का इसीलिए कायल हूं कि वे भाषा से खेलते हैं। रेणु के जमाने में हिंदी के कुछ विद्वानों ने कहा था कि रेणु ने उत्तर पूर्वी बिहार की हिंदी को अलग रीत से पेश किया है। आज भी कुछ लोगों को उनके लिखने का अंदाज अजीब लगता है। रेणु समझ चुके थे कि भाषा के बदलाव के रास्ते में कुछ नहीं आ सकता. इस विवाद का कभी अंत नहीं आएगा कि हिंदी को अन्य भाषाओं से शब्द उधार लेने चाहिए या नहीं पर सच्चाई यही है कि भाषा कभी स्थित नहीं हो सकती। वह हमेशा बदलती रहेगी. वही भाषा बदलने से इनकार कर सकती है जो मर चुकी हो।

 

महिलाओं और बच्चों को सशक्त बनाने से बनेगा स्वस्थ समाज

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गुलाबी सर्दियों की आहट सुनायी देने लगी है और त्योहार में डूबे हम धीरे – धीरे अपनी दुनिया में वापस लौट रहे हैं मगर इस बार के लौटने में थोड़ी सी तसल्ली है। दिवाली पर इस बार दीए खूब जले, अच्छा लगा, कारीगरों के चेहरे की हँसी लौटते देख, अब छठ की बारी है। थोड़े दिन में बाल दिवस भी आने वाला है, कारीगरी की बात करें तो बच्चे याद आ ही जाते हैं क्योंकि हस्तशिल्प की दुनिया में कालीन से लेकर पटाखों तक और चाय की दुकान से लेकर सब्जी की दुकान तक, हमने इनका होना तय कर रखा है। जिस उम्र में किताबें और और खिलौने बच्चों की दुनिया होनी चाहिए, वे कड़कड़ाती सर्दी में रात को खुले आसमान के नीचे बरतन धोते दिखते हैं। बाल श्रम पर रोक है मगर संशोधन के बाद कहा जा रहा है कि पारिवारिक व्यवसाय में हाथ बँटाने पर रोक नहीं है।

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अगर ऐसा हुआ तो फिर इस बात की गारंटी कौन देगा कि बच्चे से काम करवाने के लिए जबरदस्ती नहीं की गयी है। ऐसे बच्चे दूसरे राज्यों से आते देखे हैं जिनको 5 या 6 साल की उम्र में ही कमाने के लिए घर से दूर भेज दिया गया है।

कई बार बच्चे स्कूल के बाद काम में हाथ बँटाते हैं और वे खुशी से करते हैं मगर हमें ध्यान रखना होगा कि उनकी पढ़ाई खतरे में न पड़े।

एक ऐसा संशोधन जो, हमारी समझ से किया जा सकता है कि नियोक्ता अगर बच्चे को काम पर रखता है तो उसकी शिक्षा का दायित्व भी उसे दिया जाए और उसकी पड़ताल हो।

इससे एक तो बच्चे स्कूल जा सकेंगे और बड़े घराने या बड़ी कम्पनियाँ ऐसा कर सकती हैं कि वे जिन कारीगरों के बच्चों से काम लेती हैं, उनके लिए स्कूल खोलें, भले ही वह सांध्य स्कूल हो, यह उनकी सीएसआर योजना का हिस्सा बन सकता है।

इसके साथ ही बच्चों के साथ उनकी माँओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की जरूरत है। घरेलू हिंसा निरोधी दिवस भी इसी महीने में पड़ता है और यह भी हमारी मानसिकता से जुड़ा है। तकलीफदेह बात यह है कि बहुत सी महिलाएं ऐसी हैं जिनको पतियों द्वारा की जाने वाली मारपीट में कोई बुराई नजर नहीं आती तो अधिकतर पुरुष ऐसे हैं जिनको यह अपना अधिकार लगता है।

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दरअसल, बच्चों और स्त्रियों का मामला अलग नहीं है।

अगर हम दोनों का सम्मान करते हैं तो निश्चित रूप से एक स्वस्थ समाज बनाया जा सकता है। अपराजिता की ओर से आप सभी को भैया दूज, छठ पूजा और बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

 

नकली मिठाइयों से रहें सावधान

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त्योहार का मजा मिठाइयों के साथ है और इन दिनों मिठाइयों की माँग भी काफी बढ़ जाती है। कई बार ऐसा होता है कि माँग पूरी करने के लिए मिठाई विक्रेता गुणवत्ता के साथ समझौता कर लेते हैं मगर इसका खामियाजा हम सबको भुगतना पड़ता है। इससे बचा जा सकता है बशर्ते जरा सी सावधानी बरती जाए। यहाँ बताए जा रहे हैं कुछ ऐसे तरीके जिनकी मदद से आप असली और नकली मिठाई का फर्क जान सकते हैं –

यूरिया : दूध में दो मिली यूरिया रिजेंट डालें और दोनों को अच्छी तरह मिलाएं, पीला रंग दिखाई दे तो यूरिया की मिलावट है।
अमोनिया: दूध में अमोनिया रिजेंट मिलाएं, रंग भूरा हो जाए तो दूध में अमोनिया फर्टिलाइजर मिलाया है।
स्टार्च :दूध उबालें, ठंडा होने पर इसमें स्टार्च की कुछ बूंदें डालें, नीला रंग हो तो फर्टिलाइजर है।
ग्लूकोज : ग्लूकोज रिजेंट केमिल डालें। तीन मिनट तक इसे उबलते पानी में रहने दें। ठंडा होने पर मिलीमीटर ग्लूकोज रिजेंट मिलाएं। गहरा नीला रंग हुआ तो ग्लूकोज है।

मावा : यूरिया,वनस्पति घी, रिकमंड पाउडर, उबले आलू के मिले होने की संभावना रहती है।

ऐसे करें जांच –  मावा शुद्ध है या नहीं, इसकी पहचान के लिए टिंचर आयोडीन डालते ही मिलावटी मावा नीला पड़ जाता है। क्रीम निकले मावे की चिकनाई कम होती है। मिलावटी मावा चखने पर कड़वा एवं खट्टा लगता है।

देशी घी : वनस्पति घी, एसेंस, उबले आलू एवं तेल की मिलावट की संभावना।

ऐसे करें जांच –  इसकी जांच के लिए घी को हथेली पर रगड़ने पर खुशबू एवं चिकनापन रहता है। नकली घी होने पर दाने उभर जाते हैं।

सोन पापड़ी : घटिया क्वालिटी के घी की मिलावट की संभावना हो सकती है, सोन पापड़ी देशी घी से बनती है और बहुत सॉफ्ट होती है।
ऐसे करें जांच :मिलावटी सोन पापड़ी सख्त होती है। मिलावटी से अजीब-सी बदूब आती है।

ऐसे करें दूध की जाँच – यूरिया : दूध में दो मिली यूरिया रिजेंट डालें और दोनों को अच्छी तरह मिलाएं, पीला रंग दिखाई दे तो यूरिया की मिलावट है।

अमोनिया: दूध में अमोनिया रिजेंट मिलाएं, रंग भूरा हो जाए तो दूध में अमोनिया फर्टिलाइजर मिलाया है।
स्टार्च :दूध उबालें, ठंडा होने पर इसमें स्टार्च की कुछ बूंदें डालें, नीला रंग हो तो फर्टिलाइजर है।
ग्लूकोज : ग्लूकोज रिजेंट केमिल डालें। तीन मिनट तक इसे उबलते पानी में रहने दें। ठंडा

मिलावटी मिठाई बेचने से दुकानदार की तो चांदी हो जाती है, मगर खरीदने वाला मावा, दूध, बर्फी में  25 प्रतिशत की मिलावट हो तो भी दाम 100 प्रतिशत शुद्धता के ही चुकाता है।

मावा मिठाई में सूजी, कार्बोहाइड्रेट, स्टार्च आदि की मिलावट हो सकती है। डॉक्टरों के अनुसार फंगस वाली या बासी मिठाई खाने से पेट में इंफेक्शन व फूड पॉयजन हो सकता है। इससे कई तरह की हानि हो सकती है। कुछ रुपए में खरीदी गई मिलावटी मिठाई को खाने से बीमार होने पर इलाज में कई गुना रुपए खर्च हो सकते हैं।