Monday, March 23, 2026
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दुनिया की 100 प्रभावशाली महिलाओं में शामिल हुईं 105 साल की सालूमरादा

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कर्नाटक की पर्यावरणविद सालूमरादा थिम्‍मका की उम्र 105 साल है। आज भी वे जिंदादिली से पौधे लगाती दिख जाती हैं। हाल ही में BBC’s 100 Most Influential Women की लिस्‍ट में शामिल किया गया है. वे इस लिस्‍ट में शामिल होने वाली सबसे बुजुर्ग महिला हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि सालूमरादा पिछले 80 साल से पौधे लगा रही हैं। अब तक वे 8 हजार से ज्‍यादा पौधे लगा चुकी हैं, जो अब विशाल वृक्ष बन चुके हैं।

इससे भी ज्‍यादा प्रभावित करने वाली उनकी कहानी है। उन्‍होंने पौधे लगाना तब आरंभ किया जब उनके ससुराल वाले उन्‍हें बच्‍चा ना पैदा कर पाने पर ताने मारने लगे। वे सालूमरादा के साथ सौतेला व्‍यवहार करते. पर उनके पति जो पेशे से किसान थे, उनका साथ देते थे।

बता दें कि इस लिस्‍ट में दुनिया भर की व्‍यवसायी महिलाओं, इंजीनियर्स, खिलाड़ी, बिजनेस वूमन, फैशन आइकंस और कलाकारों को शामिल किया गया है। ऐसे में सालूमरादा इन सबसे एक अलग पहचान कायम करती हैं।जब पति-पत्‍नी के लिए इन तानों को सहना असहनीय हो गया तो दोनों ने प्रकृति की शरण में जाने की ठान ली। सालूमरादा कहती हैं, ‘आज लगता है कि ये अच्‍छा ही है कि मेरा कोई बच्‍चा नहीं हुआ. उसके कारण ही हमने पौधे लगाने आरंभ किया. हम अपने बच्‍चों की ही तरह इनकी देखभाल करते हैं.’

 

ट्रक मैकेनिक शांति देवी टायर बदलकर जिंदगी जीने की देती हैं सीख

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शांति देवी भारत की पहली महिला ट्रक मैकेनिक हैं। शायद उनको भी इस बात का आभास है इसलिए वे कहती हैं, ‘जब मैं ट्रक के टायर बदलती हूं तो लोग मुझे चौंक कर देखते हैं. कई लोग तो यह सब देखने के लिए रुक भी जाते हैं। मैं बस वही करना चाहती हूं जो मेरा मन कहता है. मैं दूसरों के द्वारा सेट किए गए मानकों पर जीवन नहीं जीना चाहती।

शांति देवी दिल्‍ली के संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर (SGTN) की AW-7 दुकान पर ये काम करती दिख जाती हैं। शांति देवी बताती हैं, ‘मेरे पति राम बहादुर और मैं मिलकर ये काम करते हैं. मैं घर भी संभालती हूं और ये काम भी करती हूं।’

SGTN, 75 एकड़ के क्षेत्र में फैला है और यह एशिया में सबसे बड़ा ट्रकों को स्‍टॉपओवर प्‍वाइंट है। यहां प्रतिदिन 70,000 ट्रक पार्क किए जाते हैं और करीब 20,000 ट्रक यहां से रोज गुजरते हैं। यहां इन दोनों पति-पत्‍नी ने चाय की दुकान से काम करना आरंभ किया था।

शांति ने टायर बदलना और मैकेनिक के अन्‍य काम अपने पति और अन्‍य मैकेनिक्‍स से सीखे हैं। शांति कहती हैं, ‘अगर कोई महिला ठान ले तो वो किसी पुरुष से ज्‍यादा बेहतर काम कर सकती है।’शांति कहती हैं, ‘चाय की दुकान जब चल पड़ी तो हमने सोचा कि यह सही जगह है कि हम यहां ट्रक की वर्कशॉप शुरू कर सकते हैं। शुरू-शुरू में तो यहां आने वाले लोग मुझे घूरते थे, शायद वे पहली बार किसी महिला को ये काम करते हुए देखते थे, लेकिन अब और भी कई महिलाएं बाहर आकर इस काम में अपने पतियों की मदद कर रही हैं।.’

 

दिमाग में कोई नया आइडिया हो तो उसे जरूर आजमाएं

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अपनों की जिंदगी के अनमोल पलों को हम सब खास बनाना चाहते हैं औऱ इसके लिए कोशिश करते हैं मगर इस दौड़ती भागती जिंदगी में यह कर पाना बेहद मुश्किल है। दरअसल, हम तोहफों के साथ एक खूबसूरत यादगार लम्हा बाँटना चाहते हैं और किसी वजह से जब हम ऐसा नहीं कर पाते तो लगता है कि काश, हमारे लिए कोई ऐसा कर देता। कोलकाता में दो दोस्तों ने ऐसी ही शुरुआत की और आज उनकी कामयाबी अपने आप में कहानी है। सेंट जेवियर्स कॉलेज के कौशल मोदी और सुकृति अग्रवाल का आउटबॉक्स बेहतरीन अनुभव बाँटने और खुशियाँ फैलाने का खजाना बन गया है, आइए जानते हैं सुकृति के शब्दों में –

आउटबॉक्स छोटी सी घटना से शुरू हुआ

आउटबॉक्स की शुरुआत एक छोटी सी घटना के साथ हुई। कौशल के भाई की शादी थी और ढेर सारे तोहफे रिश्तेदारों तक ले जाने थे। इसे देखकर ख्याल आया कि इस तरह तोहफे ले जाना, अपनों और दोस्तों के लिए कुछ खास करना सबको पसंद है और किसी के लिए यह कोई और भी कर सकता है। इसके बाद हम दोनों ने आउटबॉक्स की शुरुआत की। कभी सगाई में मिनी बारात भेजी तो कभी रात के 12 बजे हम हैप्पी बर्थ डे मनाते हैं और यह अनुभव को खास बना देता है।

हर बजट के हिसाब से काम कर लेते हैं

अगर आप किसी को खुशी देना चाहते हैं तो इसके लिए महँगा बजट जरूरी नहीं है। हम हर बजट के हिसाब से आपकी खुशी को शानदार बना सकते हैं। इसके लिए आप भी हमें आइडिया दे सकते हैं और हम भी कुछ नया करने की कोशिश करते हैं। हमने क्रिसमस पर ट्राम पार्टी भी की है और उसमें मैजिक शो भी किया और इस साल भी करने जा रहे हैं। हमने हेलिकॉप्टर चार्टिंग भी शुरू की। शुरुआत मैंने और कौशल ने की थी मगर आज हमारी टीम है जिसे हम पूरा प्रशिक्षण देकर तैयार करते हैं।

किसी भी समय नए आइडिया के साथ तैयार रहते हैं

यह सुबह 9 से शाम 5 बजे का काम नहीं है। आपको हमेशा तैयार रहना पड़ता है। त्योहारों का समय हमारे लिए बेहद व्यस्त रहने वाला समय है। अगर किसी को किसी से प्रपोज करना हो, तो वह भी हमारी मदद ले सकता है। हमारे पास वह सब कुछ है जिससे आप अपने बजट के साथ अपनों को ढेर सारी खुशियाँ, सरप्राइज और एक यादगार लम्हा दे सकते हैं। अगर आपके दिमाग में कुछ नया है तो उसे एक बार आजमाकर देखिए।

बदलाव लाने के लिए महिला पत्रकारों को साथ लाना चाहती हैं मेनका

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देश भर की 100 से अधिक महिला पत्रकार हाल ही में नयी दिल्ली में दूसरे ‘अखिल भारतीय महिला पत्रकार’ कार्यशाला के लिए एकजुट हुईं। इस कार्यशाला का आयोजन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के पत्र सूचना कार्यालय के सहयोग से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किया गया था। इस कार्यशाला का उद्घाटन केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी द्वारा किया गया। मेनका गांधी ने पत्रकारों को बदलाव लाने की मुहिम में भागीदार बन साथ आने का आह्वान किया।

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उन्होंने कहा कि मंत्रालय द्वारा कार्यशालाओं का आयोजन महिला पत्रकारों को सशक्त् बनाने के लिए किया जा रहा है जिससे कि वे, विशेष रूप से महिला एवं बाल विकास से जुड़े मामलों में,बदलाव के कारकों के रूप में काम कर सकें। उन्होंने कहा कि मंत्रालय की कोशिश उन्हें जमीनी स्तर से जोड़ने की है जिससे कि उन्हें बदलाव की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनाया जा सके, उनसे फीडबैक प्राप्त किया जा सके और साथ ही जमीनी स्तर से विचारों को प्राप्त किया जा सके जो महिलाओं एवं बच्चों को लाभ पहुंचाएगा। मेनका गांधी ने कहा कि पत्रकारों को सफलता की कहानियों को भी रेखांकित करने और प्रेरक लोगों को ढूंढने का प्रयास करना चाहिए जिससे कि मंत्रालय सच्चे लोगों, खासकर, महिलाओं को समुदाय निर्माण के क्षेत्र में योगदान देने के लिए उन्हें सम्मानित कर सके।

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उन्होंने पिछले दो वर्षों के दौरान उनके मंत्रालय की उपलब्धियों एवं मंत्रालय द्वारा उठाए गए मुद्दों को प्रदर्शित करने के लिए व्यापक प्रस्तुतिकरण किया तथा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना,परेशानी में फंसी महिलाओं के लिए वन स्टॉप सेंटर, महिला-ई -हाट,मोबाइलों पर पैनिक बटन, मैट्रीमोनियल साइट् के लिए दिशानिर्देश,पुलिस बल में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण आदि जैसे कई अभिनव पहलों को रेखांकित किया। छोटे एवं क्षेत्रीय मीडिया संगठनों समेत देश के कोने से कोने से प्रिंट,इलेक्ट्रॉनिक एवं ऑनलाइन मीडिया से जुड़ी महिला पत्रकारों ने इस सम्मेलन में भाग लिया।
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री कृष्णा राज एवं महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में सचिव लीना नायर ने भी सम्मेलन में भाग लेने वाले पत्रकारों को संबोधित किया। प्रथम अखिल भारतीय महिला पत्रकार कार्यशाला इस वर्ष जून में आयोजित की गयी थी।

आम आदमी ही देश को सरकार के साथ आगे ले जा सकता है

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देखते – देखते साल अलविदा कहने जा रहा है। सर्दियों की गुनगुनी धूप का इंतजार है और अब तक जाड़े का मजा लेने की तैयारी भी आप करने लगे होंगे और इन तमाम ख्यालों के बीच एक इंतजार अर्थव्यवस्था के खुशहाल होने का भी है। तकलीफदेह बात है कि मौत, कतार और किसी नेता का ट्वीटर अकाउंट हैक होना भी सियासत के खेल का हिस्सा हो गया है। देश को आगे बढ़ाने के लिए संसद का सकारात्मक होना जरूरी है मगर अफसोस यह है कि इस देश के नेता जनता को नाकारा समझ रहे हैं जो कभी आगे बढ़ने की कोशिश नहीं कर सकती। इस देश में जब कम्प्यूटर आया था, तब भी शोर मचा था मगर आज यह हमारी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। हम मानते हैं कि देश में संरचना की कमी है मगर क्या इसका हवाला देकर देश के हर गाँव में जाने वाले विकास का रास्ता मोड़ देना चाहिए? हमारी समस्या यह है कि हम गिलास को आधा खाली देखने के आदी हो चुके हैं मगर हमारे दिमाग में गिलास को पूरा भरने की उम्मीद नहीं दिखती मगर आगे बढ़ने के लिए यह उम्मीद और एक नयी सोच जरूरी है। यह काम सरकार अकेले नहीं कर सकती। आज दुनिया के तमाम विकसित देश कैशलेस होने की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, हमारे यहाँ अर्थव्यवस्था का 80 प्रतिशत भाग अभी भी नकद पर टिका है।

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यह सही है कि इसे एकबारगी खत्म नहीं किया जा सकता मगर इस दिशा में शुरुआत तो की जा सकती है। अगर देश आपका है, आप उस पर अधिकार जताते हैं तो आपकी जिम्मेदारी महज वोट डालने पर खत्म नहीं होती, विकास की प्रक्रिया में आपको भागीदार बनना पड़ेगा। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो यह आपकी स्वार्थपरता है। हम विषमता का रोना रोते हैं मगर यह हमारा ही किया –धरा है, वरना क्या वजह है कि जितने रूपयों में एक गरीब का खर्च चल जाता है, वह आपका एक दिन या कुछ घंटों का खर्च है? यह देश किसी नेता और किसी सरकार का नहीं है बल्कि हमारा है और हमारे देश को आगे ले जाने में हाथ बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है। कैशलेस होने की प्रक्रिया में एक आम आदमी भी कड़ी बन सकता है, अपने आस – पास के लोगों को जागरुक कीजिए, उनके खाते खुलवाने, आर्थिक रूप से सजग बनाकर ठगी से बचाने, एटीएम की जानकारी देने और ई –वॉलेट का उपयोग सिखाने में आप मदद कर सकते हैं, यह आपकी ताकत है।

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गरीब होने का मतलब जानकारी से वंचित रहना नहीं होता। सच तो यह है कि शहर की जीवनशैली में सुविधा से भरे जीवन के बीच हमें यह गवारा नहीं होता कि हमारी जिंदगी में खलल पहुँचे। परिवर्तन हमें चाहिए जरूर मगर उसके लिए हम तकलीफ उठाने को तैयार नहीं हैं। सरकारें आती हैं, जाती हैं मगर एक बात तय है कि आम आदमी ही देश को आगे ले जा सकता है, सरकार को उसकी जरूरत है। सांता क्लाज और नया साल दोनों आने वाले हैं। आप सभी को अपराजिता की तरफ से मेरी क्रिसमस।

बंगलुरु में कैनरा बैंक ने एटीएम बस शुरू कर, दी लोगो को लंबी कतारों से राहत!

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कैनरा बैंक ने बंगलुरु में एटीएम बस सेवा शुरू कर दी है। यह बस ग्रामीण इलाको में जाकर लोगों को निकासी की सुविधा मुहैया करा रही है।

बंगलुरु में मोबाइल एटीएम बस शाम को तकरीबन 5:30 बजे एम. जी. रोड पर दिखाई दी जिसे देखकर हताश लोगों की आँखों में चमक आ गयी। इस एटीएम बस से तकरीबन 800 लोगों ने  इस सेवा का लाभ उठाकर करीब 8 लाख रूपये की निकासी की।

मोबाइल बैंक एटीएम के विचार पर कैनरा के जनरल मेनेजर एम् एम् चिनिवार ने बताया, “मैं शाम को एम जी रोड से गुजर रहा था कि देखा वहां के किसी भी एटीएम में कैश नहीं है, तो हमने अपने मोबाइल एटीएम की सेवा शुरू कर दी ताकि बेंगलूर के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को पैसे के लिए दिक्कत न उठानी पड़े।”

उन्होंने आगे बताया कि अभी एटीएम से 2000 रूपये के नोट निकल रहे हैं। पर्याप्त करेंसी बैंक और एटीएम तक एक दो दिन में पहुंचा दी जायेगी ताकि लोगों को दिक्कत न हो।

कैनरा बैंक की पहल एक उम्मीद की तरह है। यदि ऐसी सुविधाएँ अन्य बैंक भी शुरू करें तो आम लोगों को हो रही भारी परेशानी में सहूलियत मिल सकेगी। लोगों को मूलभूत जरूरतों के लिए पैसे की जरूरत है और इस वक़्त देश के बैँको पर बेहतर सेवा देने की जिम्मेदारी बढ़ गयी है। अगर बैंक पहले से बने एटीएम केंद्रों के साथ-साथ इस तरह के और भी उपाय अपनाएं तो लोगों को पैसे निकलने में कठिनाइयां नहीं झेलनी पड़ेंगीं।

रीढ़ की हड्डी की मरम्मत के लिए अहम प्रोटीन का पता चला

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वॉशिंगटन,: वैज्ञानिकों ने एक ऐसे प्रोटीन का पता लगाया है जो मनुष्यों में रीढ़ की हड्डी की चोट से उबरने में अहम साबित हो सकता है और नष्ट हुए उतकों की मरम्मत की चिकित्सकीय पद्धति के लिए अहम हो सकता है।

एक जेब्राफिश अपनी रीढ़ की हड्डी के टूटने के बाद उसकी स्वत: पूर्ण मरम्मत कर लेती है जबकि वही मनुष्यों के लिए जानलेवा चोट साबित हो सकती है और वे लकवाग्रस्त हो सकते हैं।

अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिकों ने एक विशेष प्रोटीन का पता लगाया है जो मनुष्यों के उतकों की मरम्मत की प्रक्रिया में अहम साबित हो सकता है।

ड्यूक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर केन्नेथ पोस ने कहा, ‘‘नष्ट हुए उतकों की मरम्मत के लिए आज सीमित मात्रा में सफल चिकित्सा पद्वतियां उपलब्ध हैं, ऐसे में हमें उनकी पुन: उत्पत्ति प्रोत्साहित करने को लेकर जेब्राफिश जैसे जीवों की ओर देखने की आवश्यकता है।’’ जब जेब्राफिश की टूट चुकी रीढ़ की हड्डी की फिर से उत्पत्ति की प्रक्रिया शुरू होती है तो आठ सप्ताह में नए तंत्रिका उतक चोट से पैदा हुए फासले को भर देते हैं और जेब्राफिश गंभीर रूप से लकवाग्रस्त होने से बच जाती है।

वैज्ञानिकों ने इस शानदार प्रक्रिया के लिए संभावित रूप से जिम्मेदार अणुओं को समझने के लिए उनकी उन सभी जीन का अध्ययन किया जिनकी गतिविधि रीढ़ की हड्डी की चोट के बाद अचानक बदली।

इस प्रक्रिया में कनेक्टिंग टिशू ग्रोथ फेक्टर :सीटीजीएफ: अहम है। वैज्ञानिकों ने जब सीटीजीएफ को आनुवांशिक रूप से नष्ट करने की कोशिश की तो मछली उतक की फिर से उत्पत्ति नहीं कर पाई। मनुष्यों एवं जेब्राफिश में अधिकतर प्रोटीन कोडिंग जीन साझे हैं और सीटीजीएफ अपवाद नहीं है और जब वैज्ञानिकों ने मछली की चोट वाली जगह में सीटीजीएफ का मानवीय संस्करण जोड़ा तो इसने पुन: उत्पत्ति की प्रक्रिया को बढ़ाया और मछली चोट के दो सप्ताह बाद बेहतर तैरने लगी।

पोस के समूह में शोधार्थी मायस्सा मोकाल्लड ने कहा, ‘‘मछली लकवे की समस्या से उबरकर टैंक में तैरने लगी। इस प्रोटीन का प्रभाव विचित्र है।’’ इस अध्ययन को पत्रिका ‘साइंस’ में प्रकाशित किया गया है।

 

सलमान लड़कियों को करते थे परेशान इसलिए कभी नहीं लिया उनका इंटरव्यू: सयानी

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पुणे.अमीन सयानी ने सलमान खान को लेकर एक खुलासा किया है। पुणे में एक प्रोग्राम के दौरान मशहूर रेडियो एनाउंसर ने कहा,” सलमान लड़कियों को परेशान करते थे इसलिए मैंने जानबूझकर उनका एक भी इंटरव्यू नहीं लिया।” बता दें कि शनिवार को यहां पुलोत्सव में सयान को सम्मानित किया गया। अमीन ने कहा- सलमान ने महिलाओं का आदर नहीं किया…

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सयानी ने बताया, ”जब मैं रेडियो में काम करता था तब कई बड़े फिल्म स्टार के इंटरव्यू लिए थे।”

”एक दौर एेसा भी था कि सलमान , शाहरुख और आमिर खान तीनों अपने करियर में तरक्की कर रहे थे।”
”मुझे सलमान खान के बारे में बता चला कि वे लड़कियों को परेशान करते हैं तो मैंने जानबूझकर उनका इंटरव्यू नहीं किया।”
”मैं पहले से ही महिलाओं का सम्मान करता आ रहा हूं, लेकिन सलमान ने महिलाओं का आदर नहीं किया इसलिए मैंने उन्हें टाल दिया।”

अमीन ने कहा- हीरो बनना चाहता था

अमीन सयानी ने इंटरव्यू में बताया, ”मैं पहले से फिल्मों में हीरो बनने की कोशिश कर रहा था।”

“कई कोशिशों के बाद भी मुझे फिल्मों में मौका नहीं मिला। इसलिए मैं रेडियो अनाउंसर बन गया।”
– सयानी बोले, “मैंने अपने करियर के दौर में कई दिग्गजों के इंटरव्यू लिए, जिनकी काफी तारीफ भी हुई।”

अब बदल चुकी है रेडियो की दुनिया

सयानी ने रेडियो में आए बदलाव को लेकर कहा कि हमारे दौर में रेडियो सुनने वालों की तादाद ज्यादा थी।

कहा- “आज के दौर में रेडियो एफएम की तादाद बढ़ गई लेकिन ऑडियंस कम होती जा रही है।”
”आज के दौर में प्रेजेंटेशन जल्बादी में होता है। रेडियो जाॅकी या अनाउंसर क्या बात करता है, ये ऑडियंस को समझ में नहीं आता है।”

 

इस कैब ड्राइवर ने दिखायी दरियादिली, बताया भारतीयता और मानवता का मतलब

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जब प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने अचानक ही पांच सौ और हज़ार रुपयों के नोटों को बंद करने का ऐलान किया तब केवल काला धन छुपाये रखने वालो में  ही नहीं बल्कि आम जनता में भी हफरा-तफरी का माहौल छा गया।

जहाँ पुरे देश ने भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री की इस कड़ी पहल का स्वागत किया वहीँ कई ऐसे लोग भी थे जिन्हें इस फैसले की वजह से कई मुसीबतों का सामना करना पडा। ऑटो चालक, पेट्रोल पंप तथा छोटी दुकानों पर जहाँ दुकानदारों के 500 और 1000 के नोट लेने से मना कर देने से लोग मुश्किल में पड़ गए वही सोशल मीडिया पर एक ओला कैब ड्राईवर की दरियादिली की कहानी खासी चर्चित रही।

विपिन कुमार नाम के इस ओला कैब ड्राईवर ने अपने हिस्से के पैसे इसलिए छोड़ दिए क्यूंकि उनके ग्राहक के पास केवल 500 के ही नोट थे।

मंगलवार की ही ऐतासिक रात को दिल्ली के एक आर्किटेक्ट विप्लव अरोरा को अपनी ट्रेन पकड़ने स्टेशन तक जाना था।  हालांकि उनके बटुए में केवल 500 के ही नोट थे फिर भी उन्होंने ये सोच कर ओला कैब बुलवा ली कि उनके ओला मनी अकाउंट में कुछ पैसे है। पर उन्हें इस बात का अंदेशा नहीं था कि उनका किराया ओला मनी अकाउंट में बचे हुए पैसो से ज्यादा हो जायेगा।

स्टेशन पहुँचकर किराए की रकम सुनते ही विप्लव असमंजस में पड़ गए क्यूंकि उनके पास देने के लिए 500 रूपये के अब बेकार हो चुके नोटों के अलावा कुछ भी नहीं था। पर ऐसे में कैब ड्राईवर विपिन कुमार के जवाब ने उन्हें भावविभोर कर दिया।

कैब ड्राईवर विपिन ने विप्लव से कहा, “सर बाकी के पैसे रहने दीजिये।  दो पैसे कम कमा लेंगे, थोड़ी सी तकलीफ होगी और वो तो सबको हो रही है।  अब सरकार के फैसले का सम्मान करते हुए, देश की तरक्की में ये हमारा योगदान ही समझ लेंगे।  आप बेफिक्र होकर अपनी ट्रेन लीजिये।

इसके बाद विप्लव ने विपिन कुमार के इस दरियादिली की कहानी ओला के फेसबुक पेज पर साझा की और कुछ घंटो में ही ये पोस्ट वायरल हो गया। ओला ने भी इस बात की जानकारी मिलते ही कैब ड्राईवर विपिन कुमार के बाकी पैसो का भुगतान कर दिया।

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विप्लव अरोरा का फेसबुक पोस्ट इस प्रकार था –

इस पुरे पोस्ट का हिंदी अनुवाद पढ़े –

“आज घर से रेलवे स्टेशन जाने के लिए मैंने ओला बुक की। दुर्भाग्यवश उस वक़्त मेरे बटुए में सिर्फ 500 के ही नोट थे और मुझे 500 और 1000 रूपये के नोट रद्द किये जाने के बारे में भी पता था। इसलिए मैंने ओला मनी से किराया देने का फैसला किया।

पर मेरा किराया मेरे ओला मनी में बचे पैसो से थोडा ज्यादा हो गया और अब मुझे बाकी के पैसे ड्राईवर को नगद में ही देना था।

कोई एटीएम भी काम नहीं कर रहा था और ये बात तो तय थी कि ऐसे समय में कोई भी 500 का छुट्टा नहीं देता।

पर ऐसे वक़्त में उस ड्राईवर का जवाब हम सभी के सम्मान का हकदार है और इसीलिए मैं ये पोस्ट लिख रहा हूँ।

उन्होंने कहा, “सर बाकी के पैसे रहने दीजिये। दो पैसे कम कमा लेंगे, थोड़ी सी तकलीफ होगी और वो तो सबको हो रही है।  अब सरकार के फैसले का सम्मान करते हुए, देश की तरक्की में ये हमारा योगदान ही समझ लेंगे।  आप बेफिक्र होकर अपनी ट्रेन लीजिये।”

कैब ड्राईवर #vipinkumar (विपिन कुमार) को मेरा सलाम। उन्होंने प्रधानमंत्री की कही उस बात को सच कर दिखाया, जिसमे उन्होंने कहा था कि – भारत की आम जनता देश हित में योगदान देने के लिए किसी भी मुश्किल का सामना करने को हमेशा तत्पर होती है। #oladriver #appreciation #respect

(साभार – द बेटर इंडिया)

भारतीय मूल की ‘चायवाली’ उपमा बनीं बिजनेस वूमन ऑफ द इयर

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अगर आप मेलबर्न में रहते हैं तो आपके लिए ‘चायवाला’ या ‘चायवाली’ बनना आसान नहीं है। चूंकि ऑस्‍ट्रेलिया में लोग कॉफी का अधिक सेवन करते हैं इसलिए यहां चाय बेचकर अपनी पहचान बनाना आसान काम नहीं है।

पर ये कारनामा कर दिखाया है 26 साल की उपमा विरदी ने। उपमा भारतीय मूल की हैं और वकील हैं. उपमा फुल टाइम चाय का रेस्‍टोरेंट या कैफे नहीं चलातीं लेकिन चाय का ऑनलाइन बिजनेस जरूर करती हैं. वे चाय पर वर्कशॉप्‍स भी करती हैं.

चाय से उनका ये प्‍यार उनके दादा जी के कारण है, जो आयुर्वेदिक डॉक्‍टर थे। वे जब छोटी थीं तब पूरे परिवार के लिए चाय बनाती थीं। बस वहीं से उन्‍हें महसूस हुआ कि वे परफेक्‍ट चायवाली बन सकती हैं। विरदी का परिवार चंडीगढ़ में है। वे भी उसी तरह चाय बनाती हैं जितने प्‍यार से हम भारतीय बनाते हैं। विरदी ने कहा, ‘भारतीय परंपरा में लोग चाय के माध्‍यम से पास आते हैं. चाहे खुशी का माहौल हो या गम का, लोग चाय पीते ही हैं। मैंने बहुत कोशिश की लेकिन मैं ऑस्‍ट्रेलिया में चाय के अच्‍छे ठिकाने नहीं ढूंढ़ सकी.’

वे कहती हैं, ‘लोग अब ऑस्‍ट्रेलिया में चाय को पसंद कर रहे हैं क्‍योंकि वे कॉफी का अच्‍छा विकल्‍प तलाश रहे हैं। मेरा असली मकसद तो चाय के बहाने से ऑस्‍ट्रेलियाई लोगों को भारतीय संस्‍कृति से रूबरू करना है.।

विरदी को इंडियन ऑस्‍ट्रेलियन बिजनेस एंड कम्‍युनिटी अवॉर्ड्स यानी IABCA ने बिजनेस वूमन ऑफ द ईयर 2016 के खिताब से नवाजा है।