Sunday, March 22, 2026
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आजादी की लड़ाई के लिए सबसे कम उम्र की जासूस बनीं सरस्वती राजामणि

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कई स्वतंत्रता सेनानियों के साहस और बलिदान की यादें हमारी स्मृति से धुंधली हो चुकी है। देश को अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र कराने के इस आंदोलन में कई ऐसे नायक रहे जिनके योगदान को इतिहासकारों व लेखकों द्वारा नजरंदाज किया गया। ऐसी ही एक अनजानी नायिका है वह महिला जिनके बारे में हम में से बहुत कम लोग जानते है। एक महिला जिनका जीवन हमेशा खतरों व साजिशों से भरा रहा पर उन्होंने अपने देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

यह महिला थी भारत की सबसे कम उम्र की जासूस, 16 साल की सरस्वती राजामणि, जिन्होंने  इंडियन नेशनल आर्मी (आईएनए) के खुफिया विभाग के लिए सूचनाएँ जुटाने का कार्य किया।

राजामणि ने सन 1927 में बर्मा में एक स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार में जन्म लिया। सरस्वती के पिता त्रिची के जाने-माने खदानी थे व भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का पुरजोर समर्थन करते थे; स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करने के कारण अपनी गिरफ्तारी से बचने के लिए वे परिवार सहित बर्मा में रहने लगे थे।

सरस्वती राजामणि का परिवार एक ऐसा उदारवादी परिवार था जहां लड़कियों के लिए ज्यादा पाबंदियाँ नहीं थी। देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत सरस्वती दस वर्ष की भी नहीं होंगी जब वे उस समय रंगून (अब यंगून, बर्मा की राजधानी) में अपने आलीशान निवास को जा रहे महात्मा गांधी से मिली।

राजामणि का पूरा परिवार गाँधीजी से मिलने के लिए एकत्रित हुआ था, जो उस समय तक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख नेता के रूप में उभर चुके थे। जब गर्मजोशी के साथ पूरे परिवार का परिचय गांधी जी से कराया गया तो परिवार को पता चला कि सरस्वती वहाँ नहीं थी। जब घबराकर गांधी जी सहित पूरे परिवार के लोग सरस्वती को ढूंढने लगे तो राजामणि को बगीचे में बंदूक के साथ निशानेबाजी का अभ्यास करता पाया।

एक नन्ही सी बालिका को बंदूक के साथ देख गांधी जी ने आश्चर्य से सरस्वती से पूछा कि उसे बंदूक की क्या जरूरत है?

“अंग्रेजों के खात्मे के लिए,” सरस्वती ने बिना गांधी जी की तरफ देखते हुए तपाक से जवाब दिया।

“हिंसा कभी किसी चीज़ का जवाब नहीं होती, प्यारी बच्ची। हम अहिंसा के साथ अँग्रेज़ों का विरोध कर रहे हैं, आपको भी वही करना चाहिए,” गांधी जी ने कहा।

“क्या हम लुटेरों को नहीं मार डालते? अंग्रेज़ हमारे देश को लूट रहें हैं, और मैं बड़े होने तक जरूर एक अंग्रेज़ को अपनी बंदूक से शूट कर दूँगी,” सरस्वती ने दृढ़ता से कहा।

जैसे-जैसे सरस्वती बड़ी हुई उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस व उनकी आजाद हिन्द फौज के बारे में सुना। जहां वे पूरे दिल से स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करतीं थी परंतु ये सुभाष चन्द्र बोस के शब्द थे, जिन्हें सुनकर उनके दिल में आज़ादी की लड़ाई में सीधा भाग लेने की अलख जगाई।

सरस्वती सिर्फ 16 वर्ष की थी जब दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर था और सुभाष चन्द्र बोस आईएनए के लिए फ़ंड व स्वंयसेवकों की भर्ती के लिए रंगून आए। सुभाष चन्द्र बोस ने गांधी जी व भारतीय नैशनल कांग्रेस की तरह अहिंसा का रुख न अपनाते हुए सभी से आगे बढ़ कर भारत की स्वतंत्रता के लिए हथियार उठाने को कहा। बोस के ओजस्वी भाषण से प्रभावित हो कर सरस्वती ने अपने सभी सोने व हीरे जड़ित मूल्यवान आभूषण आंदोलन के लिए आईएनए को समर्पित कर दिये।

राजामणि का यह असाधारण उदार कृत्य नेता जी की नजरों से नहीं बच पाया, जब नेता जी ने इस बारे में और खोज-खबर ली तो उन्हें पता चला की सरस्वती, रंगून में बसे प्रतिष्ठित भारतीयों में से एक की बेटी है, अगले ही दिन वे सरस्वती के घर उनके सारे आभूषण वापस करने पहुंचे।

“अपने बालमन के चलते, इन्होंने अपने सारे आभूषण समर्पित कर दिये। इसीलिए, मैं यहाँ सब वापस लौटाने आया हूँ,” राजामणि के पिता से मुलाक़ात कर बोस ने उनसे कहा।

उनके पिता, जो खुद एक स्वतंत्रता सेनानी थे और बोस के मिशन में कई बार आर्थिक योगदान दे चुके थे, वे प्रत्यूत्तर मे सिर्फ मुस्कराए।

वहीं क्रोधित होते हुए राजामणि ने कहा “आभूषण मेरे पिता के नहीं हैं, वे आभूषण मेरे हैं। मैंने ये सब आपको दिये हैं, और ये मैं वापस नहीं लेने वाली।”

एक किशोरी की दृढ़ता को देखकर सुभाष चन्द्र बोस प्रशंसा किए बिना नहीं रह सके।

उन्होंने राजामणि से कहा- “लक्ष्मी आती है व जाती है परंतु सरस्वती नहीं। आपके पास माँ सरस्वती जैसी बुद्धिमत्ता है इसीलिए, आज से मैं आपका नाम सरस्वती रखता हूँ।”

इस तरह से राजामणि अब सरस्वती राजामणि नाम से जानी जाने लगी।

मगर राजामणि यहीं नहीं रुकी, 16 साल की राजामणि ने उसी मुलाक़ात में नेता जी से खुद को उनकी आर्मी में शामिल करने की प्रार्थना की, राजामणि के इस प्रस्ताव में इतनी दृढ़ता थी कि सुभाष उन्हें मना नहीं कर सके और राजामणि और उनके चार साथियों को अगले ही दिन आईएनए॰ के खुफिया विभाग में जासूस के रूप में नियुक्त किया।

जल्द ही ये लड़कियां, लड़कों के वेश में ब्रिटिश मिलिट्री कैंप व अंग्रेज़ अफसरों के घर में संदेशवाहक के रूप में कार्य करने लगे। दुश्मन के यहाँ संदेशवाहको का रूप धारण कर काम कर रहे इन जासूसों का काम होता था ब्रिटिश सरकार के आदेशों व सेना की महत्वपूर्ण जानकारी को आईएनए तक पहुंचाना।

राजामणि (लड़के के रूप में मणि) व उनकी साथी लड़कों के रूप में लगभग 2 साल तक खुफिया जानकारी जुटाने का काम करती रही। इन्हें यह सख्त आदेश था कि ये किसी भी कीमत पर दुश्मन के हाथों पकड़ी ना जाए पर उनमें से एक आखिर अंग्रेज़ अफसर के हाथों पकड़ी गयीं। राजामणि दुश्मन के हाथों पकड़े जाने का परिणाम जानती थी इसीलिए उन्होंने अपनी साथी को छुड़ाने का निश्चय किया।

उस साहसी किशोरी ने एक नृत्यांगना का वेश बनाया और जहां उनकी साथी को बंधक बना कर रखा गया था उस अफसर को बेहोश कर अपनी साथी को मुक्त करा लिया। अंग्रेजों की क़ैद से भागते समय उन पर गोलियां चलाईं गयी और एक गोली राजामणि के पैर पर लगी। पैर में गोली लगने के बावजूद लहूलुहान सरस्वती व उनकी साथी वहाँ से भाग निकालने में कामयाब रहे। वे तीन दिन तक एक पेड़ पर छुपकर बैठे रहे जब तक की अंग्रेजों ने उन्हें ढूँढना बंद नहीं किया।

गोली लगने व समय पर इलाज ना मिलने के कारण उनके दायें पैर ने ठीक से काम करना बंद कर दिया और उन्हें जीवन भर के लिए चलने में तकलीफ होने लगी, लेकिन राजामणि को उस पर सदैव गर्व रहा। उनके लिए यह आईएनए जासूस के रूप में उनके रोमांचक दिनों की निशानी था।

राजामणि याद करती थी कि नेताजी उनके इस साहसिक कदम से कितने खुश थे और वह क्षण जब उन्हें स्वयं जापान के सम्राट द्वारा मेडल प्रदान किया गया था और साथ ही उन्हें आईएनए की रानी झाँसी ब्रिगेड का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया था, कितना गर्व का क्षण था।

जब अंग्रेजों की जीत के बाद आईएनए को  भंग कर दिया गया, तब आईएनए के सभी सदस्य नेताजी के कहने पर भारत लौट गए।

सरस्वती राजामणि व उनके परिवार को भी सब कुछ छोड़ कर भारत लौटना पढ़ा। यह दुःख की बात है कि वह परिवार जिसने अपना सब कुछ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के निमित्त झोंक दिया, उस परिवार को भारत आने पर अभाव का जीवन जीना पड़ा।

लंबे समय तक इस स्वतंत्रता सेनानी को चेन्नई में एक कमरे वाले छोटे, जीर्ण-शीर्ण अपार्टमेंट, जिसकी दीवारों पर नेताजी की तस्वीरें विभूषित थी, में रहना पड़ा। तमिलनाडू सरकार द्वारा उन्हे बस कुछ साल पहले ही एक कालोनी में पुराना घर आवंटित किया गया।

राजामणि की देश- सेवा करने की भावना पर उम्र का कोई असर नहीं पड़ा है। वृद्धावस्था में भी वे दर्जी की दुकानों से बचा हुआ व अस्वीकृत कपड़ा एकत्रित करतीं है। उस कपड़े को वह फिर से इस्तेमाल करने लायक बनातीं है जिसे फिर अनाथालय व वृद्धाश्रम को भेंट कर देतीं हैं। 2006 की तबाही मचा देने वाली सुनामी के समय भी उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर मिलने वाली अपनी पेंशन को सहायता कोष में दान कर दिया था।

पता नहीं क्यों इतिहास में महिलाओं को अधिक याद नहीं रखा जाता। कई ऐसे नायिकाएँ हुई है जो इतिहास में हर मौके पर मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिलकर खड़ी रहीं, पर आज उन्हें याद नहीं किया जाता, उन्हें भुला दिया जाता है और उनकी बहादुरी के किस्से अनकहे रह जाते हैं।  सरस्वती राजामणि भी एक ऐसी ही नायिका रही जिनकी वीरता व बुद्धिमानी को पहचाने जाने व उनको उनकी प्रतिष्ठा दिलाये जाने की जरूरत है।

(साभार – द बेटर इंडिया)

नेत्रहीनों का सहारा बन रही है नेत्रहीन टिफ्फनी

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एक वक्त ऐसा था जब वो खुद चल नहीं सकती थी, पर आज वो दूसरो को चलना सिखा रही है। आईये मिलते है टिफ्फनी से, जो नेत्रहीन होकर भी बहुत दूर की दृष्टि रखती है।

“लोग ऐसा क्यूँ सोचते है कि मैं खुद चल नही सकती या मैं अकेले सफ़र नही कर सकती। मेरे पास बात करने के लिए जुबान है, सोचने के लिए दिमाग है, मैं चल सकती हूँ और अपनी छड़ी की मदद से खुद अपना रास्ता भी ढूंढ सकती हूँ। फिर मैं अकेले सफ़र क्यों नहीं कर सकती हूँ? मैं पिंजरे मैं कैद एक पंछी की तरह थी, जिसे बिना सहारे के अकेले बाहर निकलने की इजाज़त नहीं थी। पर अब मेरी जिंदगी बदल चुकी है। ”

-टिफ्फनी ब्रार बड़े उत्साह से बताती है। जो कभी कुछ करने का सोच भी नही पाती थी वो आज अपने जैसे दूसरे नेत्रहीन लोगो की सहायता कर रही है। किसी दूसरे पर निर्भर रहने वाली लड़की आज आत्मनिर्भर है। २६ वर्षीय टिफ्फ़नी एक अध्यापिका, उद्योजिका और मोटिवेशनल स्पीकर भी है पर वो देख नही सकती। अपने अंधत्व को मात देकर उसने अपनी एक पहचान बनायी है।

खुद नेत्रहीन होने के कारण टिफ्फनी अपने जैसे लोगो को होनेवाली परेशानियों से वाकिफ है इसलिये वो दूसरो को रास्ता दिखा सकती है। कुछ साल पहले उसे खुद पर  भरोसा नही था इस कारण वो अपनी जरूरतें पूरी नही कर पाती थी। वो कभी स्वयं बाहर नहीं जा पाती थी। ‘सफ़ेद छडी’ का इस्तेमाल राह पर चलने के लिये होता है इतना भी उसे पता नहीं था। टिफ्फ़नी १८ साल की उम्र तक एक सर्वसाधारण नेत्रहीन लड़की थी जो दूसरों पर निर्भर थी।

टिफ्फ़नी के पिता सेना  में थे, इसलिये उसकी पढाई दार्जिलिंग, दिल्ली, तिरुवनंतपुरम और वेलिंग्टन जैसे कई शहरो में हुयी। उसके पिता जनरल ब्रार अपने नौकरी में व्यस्त थे, इसलिये उसकी माँ लेज़ली उसका खयाल रखती थी। टिफ्फ़नी अपनी माँ से काफी प्रभावित थी। लेज़ली हमेशा गरीबो की मदद करती थी। अपनी माँ से मिली इस प्रेरणा से उसने बड़ी होकर एक मिसाल कायम की।

१२ साल की उम्र में टिफ्फ़नी ने अपनी माँ को खो दिया। वो दिन उसने बड़े कठिनाईयों के साथ गुजारे। उसके पिता की नौकरी दिल्ली में थी पर उस बड़े शहर में वो जैसे खो गयी थी। वो अपनी जिन्दगी सरलता से जीना चाहती थी, इसलिये तिरुवनंतपुरम वापस चली गयी। उस शहर में उसने ११ वी कक्षा तक पढाई पूरी की और उसके बाद वेलिंग्टन में जाकर आगे की पढाई की।

विनीता अक्का टिफ्फ़नी के छात्रावास में काम करती थी। विनीता अक्का उसे कपडे पहनना, कपडे समेटना, अपना बिस्तर ठीक करना जैसे कई रोज़मर्रा के साधारण काम सिखाती थी।

स्कूल में उसे कभी भी ऐसी छोटी छोटी चीजे नहीं सिखायी गयी थी। उसे याद है कि वो और उसके जैसे अन्य नेत्रहीन लोग कपड़े भी ठीक तरह से पहन नहीं पाते थे। विनीता अक्का की वजह से उसे अहसास हुआ कि उसे भी अच्छे कपडे पहनना चाहिये, अच्छा दिखना चाहिये और अपने छोटे छोटे काम खुद करना चाहिये। और इसी सोच के साथ अपने आत्मनिर्भर होने के मार्ग पर वो चल पड़ी थी।

JYOTIRMAY SCHOOL

टिफ्फनी खुद बाहर नहीं जा पाती थी। उसके साथ हमेशा कोई न कोई होता था। लोग हमेशा “ये नामुमकिन है” और “उससे नहीं हो पायेगा” – इस तरह उसके बारे में कहते थे। पर टिफ्फनी ने सबको गलत साबित कर दिखाया।अपनी जिंदगी के १८ साल तक वो किसी और पर निर्भर थी।
वेलिंग्टन में शिक्षा पूरी करके वो तिरुवनंतपुरम में B.A. (इंग्लिश) की पढाई करने के लिये आयी। इस बार उसके साथ विनीता अक्का भी थी। उसके पिता उसे कंथारी सेंटर लेके गये जहा पर उसे लीडरशिप ट्रेनिंग दी गयी जिससे उसमे बहुत बदलाव दिखाई दिया। टिफ्फनी ने कंथारी सेंटर जाने के लिये अपने पिता का हाथ थामा हुआ था। कंथारी सेंटर के सह-संस्थापक साब्रिये तेनबेरकेन ने उसे सफ़ेद छड़ी दी और कहा कि अब इसके सहारे उसे चलना चाहिये।

उसके पिता जोर से चिल्लाने लगे “नहीं, तुम अकेले नहीं चल पाओगी। यहाँ हर पल दिक्कतें है। तुम्हे परशानी होगी।”पर टिफ्फनी ने अपने पिता का हाथ छोड़ा और सफ़ेद छड़ी पकड ली। टिफ्फनी रोज उस सफ़ेद छड़ी की मदद से अपने घर से ऑफिस आने लगी। छड़ी की आवाज से वो अपनापन महसूस करती थी। अब उसे एहसास होने लगा था कि उसे खुद के सहारे चलना है।

टिफ्फनी कंथारी सेंटर में रिसेप्शनिस्ट का काम करने लगी और उद्योजक का कोर्स भी करने लगी। वो अपना रास्ता खुद ढूंड पाती थी। वो बस में सफर करती थी और जरुरत पड़ने पर लोगो से मदत लेती थी। अपने सफ़र में उसने दोस्त भी बना लिये थे जिन्हें उसपपर नाज़ था।

साब्रिये तेनबेरकेन खुद एक नेत्रहीन व्यक्ति होकर भी अपने पति पॉल क्रोनेनबेर्ग, जो कंथारी सेंटर के सह-संस्थापक है, उनके साथ मिलकर अन्य नेत्रहीनो की मदत कर रही थी। टिफ्फनी, साब्रिये के इस अच्छे काम से प्रभावित थी।

साब्रिये और उसके पति ने तिब्बत में नेत्रहीनो के स्कूल की स्थापना की और “ब्रेल विथआउट  बॉर्डर्स” नाम से एक फाउंडेशन की भी स्थापना की जो दृष्टीहीन लोगो को अपनी जिंदगी सवारने का मौका देती है।

टिफ्फनी को एहसास हुआ कि वो दूसरे दृष्टिहीन लोगो को भी सही रास्ता दिखाकर उनकी मदद कर सकती है। अपने इस सपने को पूरा करने के उद्देश से उसने श्री रामकृष्ण मिशन विद्यालय, कोइम्बतुर से B.Ed. (स्पेशल एजुकेशन) में पढाई करने का निश्चय किया है। खुद नेत्रहीन होने के कारण वो दूसरे दृष्टिहीन लोगो की परेशानियों को समझ सकती है। उनमे आत्मविश्वास, तत्परता और रोजमर्रा की जरूरतो को पूरा करने की क्षमता की कमी होती है। २००१ के सेन्सस सर्वे के मुताबिक केरल राज्य में ४००,००० नेत्रहीन है।

“वो सब नेत्रहीन लोग कहाँ है? हम लोगो को वो सडको पर चलते हुए क्यों नही दिखते है? मैंने ठान लिया कि मैं उनके लिये कुछ करू।” टिफ्फनी बड़े ही गर्व से कहती है कि ऐसा उसने २०१२ में सोचा जब उसकी पढाई पूरी हुयी। अपने इस मिशन को पूरा करने के लिये उसने “ज्योतिर्गमय” नामसे प्रोजेक्ट शुरू किया।

ज्योतिर्गमय का मतलब होता है ‘अँधेरे से उजाले की ओर’। टिफ्फनी ने ज्योतिर्गमय नामक मोबाइल अंध स्कूल की स्थापना की जिसका उद्देश है कि अगर नेत्रहीन लोग स्कूल में नहीं आ सकते तो स्कूल उनके पास जाकर उन्हें शिक्षा प्रदान करे। इसकी कल्पना एन. कृष्णास्वामी, रिटायर्ड पुलिस ऑफिसर, तमिलनाडु की है। केरला राज्य में यह ऐसी एकमात्र संकल्पना है।

ज्योतिर्गमय के माध्यम से टिफ्फनी और उसके सहयोगी तिरुवनंतपुरम में रहने वाले दृष्टिहीन लोगो के घर में जाकर उनका मार्गदर्शन करते है। टीम उन्हें ब्रेल, कंप्यूटर और पर्सनल स्किल्स के बारे में जानकारी देता है। सफ़ेद छड़ी का इस्तेमाल करके खुदको आत्मनिर्भर बनाकर चलना सिखाया जाता है।

ज्योतिर्गमय केरल में कैम्पस का आयोजन भी करती है। आउटडोर एक्टिविटीज, सिटी टूर और अन्य माध्यम से वो उन्हें छोटी छोटी चीजे सिखाती है जिनका उपयोग रोज आनेवाली कठिनाईयों का सामना करने के लिये किया जा सकता है।
२६ वर्षीय टिफ्फनी को इस मिशन से अपने जिंदगी का मकसद मिल गया है।
टिफ्फनी बड़े ही उत्साह से कहती है-

“नेत्रहीन और सामान्य व्यक्ति के बीच हमारे समाज में अभी भी शारीरिक और मानसिक दुरी है। मैं ऐसी कठिनाईयो को दूर करके ऐसा वातावरण निर्माण करना चाहती हूँ, जिसमे अंधे लोग सहजता से चल सके, काम कर सके, अपने बारे में सोच सके और सामान्य लोगो के जैसा जीवन व्यतीत कर सके। लोगो को लगता है कि हम सिर्फ गाना गा सकते है, शिक्षक बन सकते है और बैंक में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी कर सकते है। पर हम इससे भी ज्यादा कर सकते है। हम नाच सकते है, हम मार्शल आर्ट्स सीख सकते है, हम कंपनी में बड़े ओहदों पर काम कर सकते है। समाज हमेशा हमें, हम क्या नही कर सकते है, इसी के बारे में सोचने पर विवश करता है। मुझे लगता है हमें ये सोच बदलनी चाहिये।”

टिफ्फनी की आँखों में भले ही रौशनी न हो पर उनमे सपने है; और ये सपने उन्हें कुछ भी करने से नहीं रोक सकते!

 

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कहते हैं ‘फर्स्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन’ और अगर मौका वैलेंटाइन्स डे का हो तो फर्स्ट इमप्रेशन पर ध्यान देना और भी जरूरी है। प्यार करने वालों के लिए इस दिन अपने प्यार का इजहार करने का एक खास मौका होता है और अगर आपका लुक इस दिन आपका साथ न दे तो यह मौका चूंकने की आशंका तो बढ़ ही जाएगी।

ऐसे में अपनी वैलेंटाइन का दिल जीतने के लिए डेट के लिए की गई अपनी तैयारियों में अपने लुक को तवज्जो देने में बिल्कुल न चूकें, जिससे आपकी वैलेंटाइन पहली नजर में ही आपको अपना मिस्टर परफेक्ट मान ले।

मौके के अनुसार हो पहनावा
आपकी डेट आपके लिए बेहद पर्सनल है फिर पहनावा फॉर्मल क्यों रहे। इस दिन आप जिस तरह की डेट प्लान कर रहे हैं, उसके अनुसार ही आपका पहनावा होना चाहिए। डेट के लिए कैजुअल ड्रेसिंग सबसे अच्छा ऑप्शन है। आप एक कैजुअल पोलो टीशर्ट के साथ जैकेट ट्राइ करें या फिर सेमी कैजुअल सूट पहनें जिसमें शर्ट रेड, पिंक या ब्लू और उनके ऊपर कोट हो। थ्री पीस सूट या बिजनेस सूट कतई न पहनें।

चुनें सही फुटवेयर
आपकी ड्रेसिंग कितनी भी बेहतरीन क्यों न हो पर जूते पर ध्यान नहीं दिया तो मजा वहीं किरकिरा हो जाएगा। जूतें बिल्कुल साफ रखें। स्पोर्ट शूज के बजाय लोफर्स कैजुअल ड्रेसिंग के लिए एक अच्छा ऑप्शन हैं।

हेयरस्टाइल पर दें ध्यान
आपकी हेयरस्टाइल आपके लुक का ग्रेस बढ़ा भी सकती है और घटा भी सकती है। ऐसे में अपने चेहरे के आकार को ध्यान में रखकर आपके एक अच्छा हेयरकट लें जिससे आपका लुक फ्रेश लगे।

परफ्यूम का संभलकर करे इस्तेमाल
डेट पर जाने के पहले परफ्यूम या डियोड्रेंट लगाते वक्त यह ध्यान रखें कि बहुत अधिक तेज परफ्यूम का इस्तेमाल कभी भी समझदारी नहीं है। हल्का कोलोन परफ्यूम या आफ्टरशेव आपकी पर्सेनालिटी को ज्यादा डीसेंट बनाएगा।

 

कभी अपने साथ भी वक्त बिताइए

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प्यार का रिश्ता बेहद खास होता है और इसका दायरा बहुत बड़ा होता है, हम सब यह जानते हैं। आस – पास की हवा में वेलेंटाइन डे घुल गया है, आपके आस – पास आपकी सहेलियाँ और दोस्त अपने साथी के साथ यह दिन मनाने के लिए बेकरार हैं और आप भर रहे हैं आहें। अब अगर हम यह कहें कि आप उसके लिए उदास हैं जो आपकी जिन्दगी में अब तक नहीं है या जो कभी आपके लिए कभी था ही नहीं और ऐसा करके खुद को तकलीफ पहुँचाने या दिल उदास करने का कोई मतलब नहीं है। दूसरों के पीछे प्यार की तलाश में भागते आप, यह भी भूल गए कि कोई और न हो तो भी आप अपने लिए मौजूद हैं और आपका एक रिश्ता अपने साथ भी है। क्या आपने कभी दिल की बात सुनी या कभी अपने साथ वक्त बिताया? अधिकतर लोग कहेंगे कि भला ये क्या बात हुई। दरअसल, रिश्तों की पैकेजिंग में रिश्ते ऐसे बाँधे गए कि प्यार का मतलब प्रेमी – प्रेमिका या पति – पत्नी में सिमट गया और वेलेंटाइन डे भी ऐसी ही पैकेजिंग है। सच है, हर रिश्ते का जिन्दगी में अपना महत्व है मगर क्या इतना अधिक महत्व है कि आप एक रिश्ते के पीछे खुद से भी रिश्ता तोड़ बैठें। अगर आप वेलेंटाइन डे पर यह सोचकर उदास हैं कि आपके साथ तो यह दिन मनाने के लिए कोई है नहीं तो हम बताते हैं कि आप भी इस शाम का लुत्फ उठा सकती हैं, जरा नजर तो डालिए –

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शॉपिंग – शॉपिंग से बढ़कर क्या हो सकता है? चाहे कैसा भी मूड हो, शॉपिंग से सब ठीक हो जाता है। वेलेंटाइन्स डे पर जाएं और जमकर अपनी मनपसंद खरीददारी करें। इस वक्त आपको ये ख्याल भी नहीं आएगा कि आपके पास पार्टनर नहीं है। शॉपिंग ना सिर्फ आपका स्ट्रेस दूर करेंगी, बल्कि आप इससे खुश भी फील करेंगी। तनाव को गोली मारिए और वो खरीदिए जिसका प्राइस टैग देखकर अब तक आप भागती रही हैं।

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कुछ नया करें –  आप रोज एक जैसा स्टाइल लेकर दफ्तर या कॉलेज जाती हैं तो इस बार यह छोड़ दीजिए। इंटरनेट का जमाना है, खोजिए और देखिए कि आप पर नया क्या अच्छा लगता है और रोजमर्रा की जिन्दगी से कुछ अलग करें। जब सब आपको देखकर झटका खाएंगे तो वह आनंद ही निराला होगा।

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स्पा कराएं – रोज अपने साथ बहुत अत्याचार करती हैं तो एक दिन खुद को जरा प्यार दें और स्पा करवा लें। इस दिन बॉडी स्पा, हेयर स्पा कराएं। ये आपको भागदौड़ भरी ज़िंदगी में एक ताजगी देगा। दूसरों को स्पेशल ट्रीट करवाने की बजाए खुद को स्पेशल ट्रीटमेंट दें। अपने साथ वक्त बिताएं। स्पा आपको आराम देगा।

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अपना हेयरकट बदलें – नया लुक हर किसी को ताजगी देता है। आप भी अपने लुक में बदलाव करें। नया हेयरकट ले, हेयर हाईलाइट्स करवाएं। आप रेनबो हेयर ट्रेंड भी ट्राय कर सकती हैं।

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स्टाइलिश बनकर गर्ल गैंग के साथ मस्ती करें – वेलेंटाइन्स नाइट को लेकर उदास होने की जरूरत नहीं है। अपनी गर्ल गैंग के साथ पसंदीदा मेकअप करके क्लब जाएं और अपनी स्टाइल दिखाएं। क्लब जाने में रुचि न हो तो तैयार होकर कमरे में स्पीकर लगाकर सहेलियों के साथ जमकर नाचें, बहुत खुशी होगी।

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वो पहनें जिसे आप हमेशा से पहनना चाहती थीं – आपके वॉर्डरोब में ऐसी एक ड्रेस तो ज़रूर होगी, जो आपने बहुत मन से खरीदी होगी, लेकिन उसे अब तक नहीं पहन पाई। तो ये वक्त से उस ड्रेस को कबर्ड से बाहर निकालने का. वो ड्रेस पहनें, जिसे आप हमेशा से पहनना चाहती थी, चाहे आपका कोई भी फिगर हो। अगर आप किसी आउटफिट को अच्छी तरह कैरी करेंगी तो वो आप पर अच्छा ही लगेगा।

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खुद को डायमंड रिंग गिफ्ट करें – अगर आप ये सोच कर अपसेट हो रही हैं कि आपकी फ्रेंड को उसके पार्टनर से रिंग मिली है और आप के पास कोई डेट ही नहीं है, तो दुखी ना हो। अपनी डेट खुद बनें और इस बार वेलेंटाइन्स डे पर खुद को डायमंड रिंग गिफ्ट करें। डायमंड़ नहीं है तो अमेरिकन डायमंड भी चलेगा।

 

 

इस बार वेलेन्टाइन डे हो कुछ खास

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प्रेम भारतीय संस्कृति में बहुत मायने रखता है। वक्त बदला है तो इश्क फरमाने के अंदाज भी बदले हैं। कभी चुपके – चुपके दिल कह देता था और एक दिल सुन लेता है मगर आज प्यार जश्न है और वेलेन्टाइन डे भी ऐसा ही जश्न है। जाहिर है कि इस दिन को आप खास बनाना चाहती हैं तो इसके लिए जरूरत बस नयी सोच, वक्त और ढेर सारे प्यार की है। चलिए, हम आपकी मदद करते हैं जरा – जरा –

मनपसंद जगह जाकर जश्न मनाएं – अगर आपका पार्टनर घूमने का शौकीन है तो आप उसे इस दिन किसी ऐसी जगह की सैर पर ले जा सकती हैं जो उसे बेहद पसंद आएं। आप चाहें तो अपने ही शहर का गाइडेड टूर उसे करवा दें ताकि उनहें आपके साथ खास लगे। इसके अलावा, इस दौरान आप अपने साथ उनकी तस्‍वीरों को क्लिक कर लें और उनका अच्‍छा सा एलबम बना लें।

घर पर लें बाहर का मजा – आप चाहें तो घर पर ही रेस्‍टारेंट बनाकर एक सरप्राइज पार्टी प्‍लान कर सकती हैं। उनके लिए कैंडल लाइट डिनर की तैयारी करें और एक खुशनुमा शाम बिताएं। इसके लिए आपको अपनी बालकनी को बिल्‍कुल रोमेंटिक अंदाज में डेकोरेट करना होगा ताकि ये शाम थोड़ी अलग लगे।

सिंगल दोस्‍तों के लिए रखें पार्टी – अगर आपके कुछेक दोस्‍त सिंगल हो तो उनके लिए इस दिन अपनी ओर से एक पार्टी का इंतजाम करें जो उन्‍हें खुश करने के लिए पर्याप्‍त होगी। आपको भी अपने पुराने दिन याद आ जाएंगे।

निजी एहसास वाला तोहफा – अगर आपको कुछ भी नहीं समझ में आ रहा है तो आप ऐसी चीज़ भी दे सकती हैं जिसकी जरूरत उसे और आपको हमेशा से रही हो। अगर आप कपल हैं तो घर का कोई सामान ला सकते हैं। या किसी कोलार्ज को बनवाकर लगा सकते हैं। आप चाहें तो लव मैसेज को भी रेडियो पर ब्रॉडकास्‍ट करवा सकते हैं।

किसी एक को नहीं सबको प्‍यार दें – वैलेंटाइन का दिन सभी को प्‍यार देने का होता है। इस दिन आप सभी से प्‍यार से पेश आएं। सभी से प्‍यार जताएं और उनका सम्‍मान करें। परिवार के लोगों को बाहर खाने पर ले जाएं। किसी को कपडें दान करें या खिलौने दें। इससे आपको खुशी मिलेगी और जिसे आप देंगी उसे भी आंतरिक खुशी होगी।

अगर करना है इश्क का इजहार, तो इन बातों से करें तौबा

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कुछ लोग वैलेंटाइन डे का बेसब्री से इंतजार करते हैं क्योंकि वह इस दिन को प्यार का इजहार करने के लिए सबसे अच्छा मानते हैं। इस दिन कई नए कपल्स बनते हैं तो पुरानों का भी प्यार परवान चढ़ता है। अगर आप इस दिन अपने प्यार का इजहार करने जा रहे हैं तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें।

सबसे पहले तो आपको ये पता होना जरूरी है कि जिसे आप प्रपोज करने जा रहे हैं क्या उसकी भी आप में रुचि है? कहीं ऐसा ना हो कि आप उसे प्रपोज करें और वह नाराज हो जाए।

अगर आपको लगता है कि वह आपमें रुचि रखती है तो उसके लिए डिनर डेट प्लान करें और उसके पसंद का ही खाना ऑर्डर करें। आप चाहें तो साथ में फिल्म देखने का भी प्लान बना सकते हैं।

आजकल के नौजवान रिलेशनशिप में आने को एक फैशन समझते हैं और बिना कुछ सोचे-समझे बस सामने वाले प्रपोज कर बैठते हैं। ये आगे चलकर आपके लिए मुसीबत खड़ी कर सकता है। इसलिए प्रपोज करने में कोई जल्दबाजी ना करें, पहले उस से अच्छी तरह जान पहचान कर लें।

सीधे शादी के लिए प्रपोज ना करें। अगर आगे चलकर किसी वजह से आप शादी ना कर पाए तो सामने वाले की नजरों में आप झूठे साबित हो जाएंगे और हो सकता है कि वह आपसे नफरत करने लगे।

किसी भी बात को लेकर सामने वाले से झूठ ना बोलें क्योंकि ये आपके बनते हुए रिश्ते को बिगाड़ सकता है। साथ ही जैसे हैं वैसे ही रहें, किसी के भी सामने कभी भी शो ऑफ ना करें।

ऐप्स जो सकारात्मकता के साथ बदल रहे हैं दुनिया

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मोबाइल आज हमारी जिन्दगी का हिस्सा है। हम और आप अपनी जरूरतों के हिसाब से फोन और उस पर उपलब्ध एप्स इस्तेमाल करते हैं मगर उसके परिणाम हम पर निर्भर करते हैं। कुछ ऐप्स ऐसे हैं जो आपकी जिन्दगी को आसान बनाते हैं तो कुछ ऐप्स ऐसे हैं जो दुनिया बदल रहे हैं।  वोडाफोन फाउंडेशन की पहल ‘मोबाइल फॉर गुड अवॉर्ड्स’ ऐसे मोबाइल अपलिकेशन्स को सम्मानित करती है जो भारत मे विभिन्न क्षेत्रो जैसे की स्वास्थ, शिक्षा, कृषि आदि के क्षेत्र मे लाखो लोगो के जीवन मे सकारात्मक बदलाव लाने मे सक्षम है। ऐसे ही कुछ ऐप्स की जानकारी यहाँ पर दी जा रही है –

  1. सेल्फ़- रिलायंट इनिशियेटिव्स थ्रू जॉइंट एक्शन (सृजन) SRIJAN :

यह एक ऐसा एप है जो महिलाओ को सोया की फसल पर नज़र रखने मे मदद करते हुए उसकी गुणवत्ता, लाभप्रदता तथा क्षमता को बढ़ाता है। उत्पादन मे गिरावट तथा उपयुक्त बाज़ार की कमी हमेशा से ही भारत के किसानो के लिए दो भारी चुनौतियाँ रही है. सृजन(SRIJAN) इन ग़रीब किसानो की ऐसी ही चुनौतियों का सामना करने मे सहायता करता है  जिससे उनकी आमदनी मे बढ़ौतरी हो।.  SRIJAN (सृजन) का सोया समृद्धि प्रॉजेक्ट छोटे किसानो की उत्पादकता एवम् लाभ को बढ़ाने की ओर अपना ध्यान केंद्रित करता है। SRIJAN के होने से, सोया समृद्धि किसानो को कम बारिश होने के बावजूद बाकी किसानो के मुक़ाबले ४७ प्रतिशत ज़्यादा पैदावार का लाभ हुआ।

और ये सब कुछ सिर्फ़ एक मोबाइल फोन की बदौलत संभव हो पाया।  महिला किसानो का विवरण, फसल की जानकारी तथा बाकी पूरा ब्योरा मोबाइल फोन के द्वारा बिल्कुल सिरे से दर्ज़ किया जाता है। बाद मे इन खेतो की जाँच की जाती है तथा जाँच के हिसाब से खेती को बेहतर बनाने के सुझाव दिए जाते है. चुने हुए प्रोफैइलो को ‘जियो टॅगिंग’ द्वारा विश्व स्तर पर उपलब्ध कराया जाता है।  इस तरह से किसान अपनी फसल का विवरण भरकर उससे जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ तथा विशेषज्ञों की सलाह ले सकते है। यह सेवा फसल के उत्पादन का पूर्वानुमान, उसकी कीमत एवम् बाकी सभी महत्वपूर्ण जानकारियो को बेहद आसानी से मोबाइल फोन के द्वारा उपलब्ध कराती है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

  1. ऑपरेशन आशा

ऑप्स आशा की ‘टीबी कॉंटॅक्ट ट्रेसिंग आंड आक्टिव केस फाइंडिंग’ नामक सॉफ्टवेअर टीबी के संभावित मरीज़ो को पहचानने मे मदद करता है। एप आशा बेहद बड़े पैमाने पर टीबी याने की यक्ष रोग के उपचार तथा इसके बारे मे जागरूकता फैलाने का काम कर रही है। भारत के कुल ९ राज्यो के २०५३ मलिन बस्तियों मे अपनी छाप छोड़ने के साथ साथ ऑप आशा कंबोडिया के टीबी मरीज़ो के लिए भी काम कर रही है। इस मुहिम का असल मकसद ग़रीब और लाचार लोगो तक अच्छी और भरोसेमंद सुविधाए तथा वस्तुओ को कम दरो पर उनके घर तक पहुँचाना है।

२०१३ मे ज़्यादा से ज़्यादा लोगो तक पहुचने के उपलक्ष्य से ऑप आशा ने एक मोबाइल एप की स्थापना की। इस एप का मूल उद्‍देश्य टीबी के मरीज़ो को पहचानना तथा उन्हे ढूंढना था। इस एप के ज़रिए टीबी के संभावित मरीज़ो को कुछ प्रश्न पूछे जाते है और इस जानकारी के आधार पर जो परिणाम सामने आते है उन्हे मरीज़ के नाम, पते सहित दर्ज कर लिया जाता है।  इस जानकारी के दर्ज होने के बाद मरीज़ से नियमित रूप से पूछताछ की जाती है जब तक की जाँच की प्रक्रिया समाप्त नही हो जाती।  यह एप करीब ७००० लोगों द्वारा विभिन्न जगहों पर सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा रहा है।  इस एप को अपने एंडराय्ड फोन पर डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करे। इस मुहिम के बारे मे अधिक जानकारी हेतु यहाँ क्लिक करे

 

  1. स्वयं शिक्षण प्रयोग (SSP)

आरोग्य सखी एक ऐसा मोबाइल एप्लीकेशन है जो ग्रामीण व्यवसायी महिलाओ को प्रतिरोधक स्वास्थ सेवाए उपलब्ध करवाती है। स्वयं शिक्षण प्रयोग (SSP) ग्रामीण महिलाओ तथा संगठनो को कौशल निर्माण, जीविका तथा स्वास्थवर्धक साधन मुहैया करवाकर व्यवसायी और अग्रणी बनने मे सहयोग करता है। ये महिलाओ को सामाजिक स्तर पर प्रतिरोधक स्वास्थ सेवाएँ देने का कारोबार शुरू करवाने मे मदद करता है. और इस प्रकार उन्हे उनकी जीविका के लिए कमाने का अवसर प्रदान करता है। इन महिलाओंं को आरोग्य सखी कहा जाता है। ये स्त्रियाँ SSP मोबाइल एप सिस्टम जो उनके टेक्नॉलॉजी पार्ट्नर सोफोमो द्वारा निर्मित है, की रीढ़ की हड्डी साबित हुई है. क्योंकि ये चिकित्सको और ग्रामीण मरीज़ो के बीच एक पुल का काम करती है।  इन सखियो के पास टॅब्लेट्स  और मोबाइल मे उपलब्ध स्वास्थ्य उपकरण होते है जैसे कि  ग्लूकॉमीटर्स, ब्लड प्रेशर जाँचने की मशीन, वग़ैरा ताकि वे घर घर जाकर  महिलाओ की जाँच कर सके, उनका विवरण ले सके और अंत मे उसे अपने टॅबलेट के ज़रिए क्लाउड सर्वर मे दर्ज कर सके. दर्ज़ जानकारी के आधार पर एक डॉक्टर किसी भी जगह से (फिलहाल पुणे से) उपयुक्त समाधान और सुझाव दे सकता है और इन मरीज़ो मे से जिन्हे आगे और इलाज की आव्यशकता होती है उन्हे उनके स्थानीय अस्पताल तथा डॉक्टर के पास भेज दिया जाता है. इस सेवा से विभिन्न क्षेत्रो के करीब १८०० महिलाओ को फ़ायदा पहुचा है. अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे


  1. स्नेहा (सोसाइटी फॉर न्यूट्रीशन एजुकेशन आंड हेल्त आक्षन) SNEHA

 लिट्ल सिस्टर्स एक ऐसा प्रॉजेक्ट है जो घरेलू हिंसा जैसे सामाजिक बुराई से जूझने के लिए मोबाइल तकनीकी का उपयोग कर रहा है।

मुंबई मे स्थापित यह संस्था गर्भवती महिलाओ की प्रसूति के समय हो रहे मृत्यु दर मे कमी लाने के लिए , नवजात शिशु के मृत्यु दर मे कमी लाने के लिए, कुपोषण तथा घरेलू हिंसा मे कमी लाने के लिए कार्यरत है। सही समय पर बीच बचाव कर के’ स्नेहा’ ऐसी औरतो को बेहद संवेदनशील मौको पर घरेलू हिसा से बचाती है. यह संस्था पुलिस, आरोग्य तथा क़ानूनी संस्थाओ से जुड़कर वक़्त आने पर इन ज़रूरतमंद महिलाओ तथा बच्चो की सहयता करती है।

 अपनी पहुँच को और बढ़ाने के लिए स्नेहा ने लिट्ल सिस्टर्स प्रॉजेक्ट की स्थापना की, जो की भीड़-जारित सूचना प्रक्रिया है। इसके कार्यकर्ता स्मार्ट फोन की मदत से घरेलू हिंसा के दोषियो की पहचान करता है तथा उनकी शिकार महिलाओ की मदत भी करते है. इस सन्दर्भ मे एक कर मुक्त फोन नंबर भी जारी किया गया है जिसे उन क्लाइंट्स को दिया जाता है जो स्नेहा तक अपनी सेवाए पहुचाना चाहते है. इस नंबर पर मिस्ड कॉल देकर वे तुरंत मदद ले सकते है. अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे . इस पर आधारित TBI पर पूर्वप्रकाशित लेख . (१५० संगिनियाँ इसके लिए कार्यरत है और अब तक ३०० मामले इस तकनीक की मदत से दर्ज़ किए गये है)

  1. सूरत मुनिसिपल कॉर्पोरेशन

सिटिज़न कनेक्ट एसएमएस मोबाइल एप एक ऐसा एप है जो नागरिको को स्थानीय सरकारी सेवाओ के बारे मे अधिक जानकारी देकर उन्हे सशक्त बनाता है।

एस.एम.सि की स्थापना सरकारी सुविधाओं को आम लोगो तक पहुचने के लिए तथा उन्हे नवीनतम  जानकारियो से अवगत कराने के लिए की गयी थी. जिसके तहत ‘सिटिज़न्स कनेक्ट’ नामक एक मोबाइल एप शुरू किया गया जिससे नयी तकनीक द्वारा जानकारियो का आदान प्रदान संभव हो पाता है। यह एप मुफ़्त मे आंड्राय्ड फोन पर डाउनलोड किया जा सकता है। इसके द्वारा चुने गये तथा प्रशासनिक शाखाओ के विषय मे, पंजीकरण की संपूर्ण विधि,  रोज़गार की जानकारी, यहाँ तक की बारिश की संभावना के बारे मे भी पता लगाया जा सकता है। उपभोक्ता इसके ज़रिए जन्म तथा मृत्यु प्रमाण पत्र से संबंधित सभी जानकारी और संपत्ति कर का विवरण भी देख सकते है। वे इससे पानी का कर चुका सकते है तथा अपने सुशाव भी दर्ज कर सकते है. २०१३ मे शुरू हुआ यह एप अब तक १८० लाख सेवाएँ तथा ७४०० शिकायते दर्ज़ कर चुका है. अपने आंड्राय्ड फोन पर डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक  करे .   और  iTunes के लिए यहाँ क्लिक करे . अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

  1. जयालक्ष्मी अगरोटएक

एक मोबाइल एप जो किसानो को कृषि संबंधी जानकारी देता है। जयलक्ष्मी एग्रोटेक द्वारा शुरू किया गया यह एप ग़रीब तथा अनपढ़ किसानो को दृश्य-शव्य यंत्रो की मदत से फसल के बारे मे जानकारी देता है। यह एप विभिन्न आधुनिक उपाय प्रदान करता है। इस एप को किसानो के आंड्राय्ड स्मार्ट फोन पर एक बार शुरू कर देने के बाद इसे बगैर इंटरनेट के भी इस्तेमाल किया जा सकता है इस एप की सबसे रोचक बात ये है की यह सभी क्षेत्रीय भाषाओ मे जानकारी प्रदान करता है जिससे की भाषा की सारी बाँधाए मिट जाती है। अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

  1. चिन्ह इंडिया

‘चिन्ह’, ग़रीबी रेशा के नीचे रह रहे बच्चो और बडो, दोनो को सशक्त बनाने मे कार्यरत है. बच्चो के लिए बनाया गया यह एप एक ऐसा अतभूत एप है जो बच्चो को बच्चो द्वारा बनाए हुए चलचित्रो के ज़रिए शिक्षित करती है। इस एप का मुख्य उद्देश्य बच्चो को विचाराधीन बनाना, उन्हे संप्रेषण की शक्ति से अवगत कराना तथा संवेदनशील बनाना है। इस एप के द्वारा बच्चे स्वयं भी अपनी कहानियाँ तथा फ़िल्मे बना सकते है। और ये सभी चलचित्र बाद मे इस चॅनेल पर उपलब्ध किए जाते है। यह एप अब तक करीब ५ लाख बच्चो तक पहुच चुका है. अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

  1. इंफ़ोकराट्स वेब सोह्लुशन्स प्राइवेट लिमिटेड

सिटिज़न कॉप एक ऐसा एप है जो आम जनता को ,पुलिस की सहायता करने मे तथा उनकी सहायता पाने मे मदद करता है।

मध्यप्रदेश मे केंद्रित यह एप, मोबाइल फोन के ज़रिए पुलिसवालो को क़ानून व्यवस्था बनाए रखने मे सहायता करता है।  इस एप का नाम ‘सिटिज़न कॉप’ है। इस एप के माध्यम से हम किसी भी दुर्घटना की सूचना दे सकते है, किसी भी आपातकालीन स्थिति मे तुरंत मदत माँग सकते है,  पुलिस द्वारा उठाए हुए गाडियो की जानकारी हासिल कर सकते है और टॅक्सी और ऑटो का किराया भी पता लगा सकते है। आपातकालीन स्थिति के लिए उपभोक्ता कोई भी ४ फोन नंबर इस एप मे दर्ज़ कर सकते है। ज़रूरत पड़ने पर यह एप आपका संदेश इन नंबरो तथा स्थानीय पुलिस थानो तक पहुँचाता है। फिलहाल यह एप मध्यप्रदेश के पाँच शहरो मे सक्रिय है तथा अब तक ४६००० लोगो तक पहुच चुका है। पुलिस विभाग इसे पूरे मध्यप्रदेश मे लागू कराने मे कार्यरत है. अपने आंड्राय्ड फोन पर डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक  करे . और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करे

  1. टेक सर्विसेस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड  (स्मार्ट शहर)

‘जंप इन जंप आउट’,एक ऐसा एप है जो आपको किसिके साथ वाहन बाँटने की सहूलियत देकर ट्रॅफिक जाम को कम करने मे मदद करता है।

शहरो मे जिस गति से ट्रॅफिक जाम की समस्या बढ़ रही है, ऐसी हालत मे अपने वाहनो को बाँटना यक़ीनन एक बड़ा हल हो सकता है। इससे सिर्फ़ पैसो की ही बचत नही होगी बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी बहुत लाभदायक होगा। ‘टेक सर्विसेस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ द्वारा निर्मित एप, ‘जंप इन जंप आउट’ की मदत से आप अपने बस, टॅक्सी, ऑटो अथवा कार को किसी भी ऐसे व्यक्ति के साथ बाँट सकते है जो उसी जगह जा रहा हो जहा आप जा रहे है। एक उपभोक्ता यदि अपने स्थान की जानकारी इस एप मे डाल दे तो अन्य उपभोक्ता उसे उसी वक़्त देखकर उस व्यक्ति के साथ अपना वाहन बाँट सकते है. इस एप को इस्तेमाल करना सीखे

  1. दिमागी सॉफ्टवेर इनोवेशन्स प्राइवेट लिमिटेड

कोम्केयर फॉर क्यथोलिक रिलीफ सर्विसेस (सी आर एस) रिमाइंड – रेड्यूसिंग मेटर्नल अंड न्यूबोर्न डेत्स –(माँ तथा नवजात बच्चे के मृत्यु दर को कम करने हेतु) यह प्रोग्राम आशा के घर घर जाने मे मदत करता है। आज देश मे अधिकतर लोगो के पास मोबाइल फोन है और ‘दिमागी’ नाम की संस्था ने इस बात का लाभ उठाते हुए एक एप तैयार किया है। यह एप आशा जैसे संस्थान जो की उत्तर प्रदेश मे माँ तथा नवजात शिशुओ की मृत्युदर को कम करने मे तत्पर है, की मदद करता है। यह एप गर्भवती महिलाओ तथा नवजात शिशुओ की ,  घर घर जाकर जाँच करने मे ‘आशा’ की सहायता करता है. आशा की कार्यकर्ताओ को इस एप की मदत से जानकारी दर्ज़ करने मे तथा विभिन्न मल्टीमीडिया फाइलो के ज़रिए अपने सूझावो को समझाने मे आसानी होती है. इसके ज़रिए आशा की कार्यकर्ताओ की कार्य क्षमता का भी आंकलन किया जा सकता है. इस एप  की सहायता से अब तक १.३९ करोड़ महिलाओ तथा बच्चो को फायदा हुआ है. अधिक जानकारी के लिए उनकी वेबसाइट पर जाएँ  तथा  इस पर आधारित TBI पर पूर्वप्रकाशित लेख

11.श्री काँची कामकोटी मेडिकल ट्रस्ट

आइ कनेक्ट, एक ऐसा अनुकूलित मोबाइल अप्लिकेशन है जो छोटे शहरो तथा ग्रामीण क्षेत्रो मे आँखो से जुड़ी समस्याओ का समाधान करने मे सहायक है। यह संस्था १९७७ से ग़रीब जनता को, संकारा आइ केयर इन्स्टिट्यूशन की मदद से  स्वस्थ आँखो के लिए सुविधाएँ प्रदान कर रही है। इस संस्था का मूल उद्देश्य ग़रीब लोगो को आँखो की ऐसी बीमारियो से मुक्त कराना है जो की इलाज से ठीक हो सकती है। इस काम को आसान बनाने के लिए उन्होने एक मोबाइल एप, ‘आइ कनेक्ट’ की शुरूवात की, जो इस सारी प्रक्रिया को स्वचलित बनाता है। मोबाइल फोन की मदद से संस्था के कार्यकर्ता, गाँव के उन लोगो को ढूँडने मे सफल होते है जिनकी आँखो मे समस्या है और फिर चुने हुए लोगो को उनकी समस्या के हिसाब से ‘डिसिशन सपोर्ट सिस्टम’ की  मदत से उपचार के लिए किसी नज़दीकी शिविर मे भेज दिया जाता है। यह एप नेत्रदान, आँखो के स्वास्थ  से जुड़ी सुविधाए और बाकी दृश्य शव्य यंत्रो के बारे मे भी जानकारी देता है जिससे की ये जानकारी बहोत रोचक हो जाती है. इस सुविधा ने अब तक ७०० लोगो की ज़िंदगियाँ बदली है।

(यह लेख हमने द बेटर इंडिया से लिया है और लिंक में सम्पादन इसलिए नहीं किया गया क्योंकि  इसे जिस उद्देश्य से लिखा गया है, वह पूरा हो और अधिक से अधिक लोगों तक इसका लाभ पहुँचे।) 

वेलेनन्टाइन डे हो या शादी….हिट हैं राधिका जैन का ‘गार्डेन ऑफ इडेन’

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एक समय था जब गहने तिजोरी में रखने के लिए पहने जाते थे मगर बदलते वक्त के साथ गहने पहनने का अंदाज बदला और ज्वेलरी डिजाइनरों के काम में विविधता बढ़ती गयी। उनकी रचनात्मकता हर बार नए अंदाज में सामने आती रही है।

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गहनों का खजाना अब सोना, हीरा, मोती और चाँदी या रत्नों तक सीमित नहीं है। कभी हाथीदाँत के गहने खूब पहने जाते थे मगर यह हमारे पर्यावरण के लिए घातक साबित हुआ, हाथियों की हत्या को रोकने के लिए हाथीदाँत के गहनों पर रोक लगी मगर शौक तो शौक है।

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इसी शौक से तो नयी चीजें सामने आती हैं, कोलकाता की मशहूर ज्वेलरी डिजाइनर राधिका जैन ने इस शौक को अपने सिग्नेचर स्टाइल मायरा के तहत  बड़ी  खूबसूरती के साथ एक अलग अंदाज में पेश किया।

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उन्होंने हाथीदाँत की जगह फाइबर इस्तेमाल किए और उनका यह प्रयोग काफी पसंद किया जा रहा है।

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हाल ही में राधिका के सिग्नेचर मायरा के अंर्तगत पेश किए गए फाइबर ज्वेलरी कलेक्शन को लैक्मे फैशन वीक में भी खूब तारीफें मिली।

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राधिका के गहनों की डिजाइन काफी अलग है और उनके काम की बारीकी आपको गहनों में नजर आती है। कलेक्शन में चिड़िया, गुलाब, पत्तियों को बारीकी से पेश किया गया है और यह प्रकृति के महत्व को दर्शाने में पूरी तरह सफल रहा है।

 

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आप सादगी पसंद करती हैं या कामकाजी महिला हैं, राधिका के खजाने में आपके लिए हर तरह के जेवर हैं।  इस कलेक्शन में गोल्ड एंड सिल्वर प्लेटेड इन गहनों में सेमी प्रेशियस स्टोन का काम किया गया है जिसे आप किसी भी मौके पर भारतीय या पश्चिमी परिधान के साथ पहन सकती हैं।

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राधिका जैन

कलेक्शन में 15 से अधिक रंग, स्टाइल और टेक्सचर हैं। इस बार आपको वेलेन्टाइन में चमक – दमक और सादगी एक साथ चाहिए तो यह कलेक्शन आपके लिए है।

सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय में मनायी गयी निराला जयंती

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सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के तत्वावधान में सूर्यकांत त्रिपाठी’निराला’ जयंती के अवसर पर कोलकाता के महाविद्यालय की छात्र-छात्राओं ने महाकवि निराला की कविताओं की आवृत्ति की । कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम से विद्यार्थी की प्रतिभा विकसित होती है तथा उनमें संस्कार पैदा होते हैं । उन्होंने जालान परिवार की इस पहल की प्रशंसा की । मुख्य वक्ता बानरहाट कॉलेज के प्राध्यापक अभिजीत सिंह ने निराला के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विवेचना करते हुए निराला की काव्यशैली एवं उनके जीवन संघर्ष पर प्रकाश डाला । इस प्रतियोगिता में महानगर के लगभग 12 कालेजों के विद्यार्थियों ने निराला जी की कविताओं की आवृत्ति कर उपस्थित श्रोताओं को अभिभूत कर दिया । निर्णायक मण्डल में यूको बैंक के हिंदी अधिकारी अजेन्द्र त्रिवेदी, उमेशचन्द कालेज के वरिष्ठ प्राध्यापक अनिल शुक्ल एवं कवयित्री करुणा पाण्डेय शामिल थी । खिदिरपुर कालेज के शुभोजीत धवल को प्रथम तथा सेठ सूरजमल जालान गर्ल्स कॉलेज की छात्राओं श्वेता तिवारी तथा मनीषा गुप्ता को क्रमशः द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया । इसके अलावा विभिन्न कालेजों के 7 छात्र – छात्राओं को सांत्वना पुरस्कार दिया गया ।

कार्यक्रम का शुभारम्भ सेठ सूरजमल जालान बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ । स्वागत भाषण देते हुए डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने कहा कि निराला ने उस युग में लिखना शुरू किया जब कई साहित्यकार स्थापित हो चुके थे और आलोचना के उस युग से निकलकर उन्होंने परम्पराओं को तोड़ते हुए अपने लिए एक अलग मुकाम हासिल किया । कार्यक्रम का कुशल संचालन पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन उपाध्यक्ष भरत जालान ने किया । वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र एवं पुस्तकालय के अध्यक्ष तुलाराम जालान भी मंच पर उपस्थित थे ।इस अवसर पर बड़ी सख्या में महानगर के साहित्यकार एवं पत्रकार तथा शिक्षाविद उपस्थित थे जिनमे अनुराधा जालान, संदीप जालान, दिव्या जालान, महाबीर बजाज, हरेराम जलूका, घनश्याम शोभासरिया, डॉ. गिरिधर राय, अरुण प्रकाश मल्लावत, कवि रावेल पुष्प, सत्यप्रकाश दुबे, डॉ. सूरज प्रसाद गुप्त, कवि अनिल ओझा नीरद, डॉ. अर्चना पाण्डेय. प्रो. कमल कुमार, शिक्षिका इन्दरपाल कौर, डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी, ओम प्रकाश अग्रवाल, शकुंतला शर्मा आदि प्रमुख थे । कार्यक्रम को सफल बनाने में पुस्काध्यक्ष श्रीराम तिवारी, श्रीमोहन तिवारी, लक्ष्मी जायसवाल तथा रमाकांत सिन्हा ने महत्वपूर्ण योगदान रहा।

 

3 लाख से अधिक कैश लेने पर लगेगा 100 फीसदी जुर्माना  

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उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, ‘यदि आप चार लाख रुपये कैश लेते हैं तो आपको 4 लाख रुपये का ही जुर्माना देना होगा। इसी तरह 50 लाख रुपये नकद लेने पर जुर्माना राशि 50 लाख रपये होगी। यह जुर्माना उस व्यक्ति पर लगेगा, जो नकद स्वीकार करेगा।’ अधिया ने कहा कि यदि आप नकद में कोई महंगी घड़ी खरीदते हैं तो दुकानदार को यह कर देना होगा। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान लोगों को बड़ी राशि के नकद लेनदेन से रोकने के लिए लाया गया है।