Tuesday, September 29, 2026
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ऑल इंडिया आईटीआर ऐप हुआ लॉन्च, मोबाइल से करें ई-फाइलिंग

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अखिल भारतीय आईटीआर ने ई-फाइलिंग की प्रक्रिया आसान बनाने के लिए मोबाइल ऐप लॉन्च कर दिया है। इस ऐप को गूगल प्ले-स्टोर और ऐप स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है। ऐप के लॉन्चिंग के मौके पर अखिल भारतीय आईटीआर के संस्थापक और निदेशक विकास दहिया ने कहा कि यह ऐप ई-फाइलिंग में क्रांति लाएगा। साथ ही इस ऐप से टैक्स रिटर्न करने पर लोगों के वह पैसे बचेंगे जो किसी एक्सपर्ट को दिए जाते हैं।

इस ऐप में रिफंड स्टेटस पता करने, बकाया टैक्स की जांच करने, एचआरए छूट की गणना और रेंट रसीद क्रिएट करने की सुविधा है। इसके अलावा इस ऐप के जरिए टैक्स से संबंधित सवाल भी चार्टड अकाउंटेंट टीम से पूछ सकते हैं और उनसे सलाह ले सकते हैं। इस ऐप के जरिए आप खुद ही आयकर तैयार कर सकेंगे और जमा कर सकेंगे। यह ऐप आपके चार्टड अकाउंटेंट के ऊपर खर्च होने वाले पैसों को बचाएगा।

आराधना धूप: स्वरोजगार की प्रेरणा बनीं सुषमा

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नौकरी करने का एक क्रेज चल चुका है, जिसको देखो वो नौकरी के लिए ही भाग रहा है। लोगों को ये नहीं समझ आ रहा कि अगर सब नौकरी ही करेंगे तो और नई नौकरी बनाने वाला संस्थान कैसे बनेगा। जब तक खुद का कुछ नया व्यवसाय नहीं करेंगे या नई संस्था नहीं खोलेंगे तो रोजगार के अवसर निरंतर कम होते जाएंगे। बहुत से लोगों के पास कुछ नया शुरू करने का आईडिया भी होता है लेकिन असफल होने का डर उन्हें घेर लेता है। आज जब रोजगार के लिए पलायन लोगों की नियति बन चुका है, ऐसे में हिमाचल प्रदेश की एक महिला न सिर्फ स्वरोजगार के क्षेत्र में प्रतिमान गढ़ रही है, बल्कि अन्य महिलाओं को भी रोजगार की राह दिखाकर उनकी प्रेरणा बनी हुई है। धूपबत्ती बनाने का कारोबार शुरू कर खुद की अलग पहचान कायम करने वाली सुषमा बहुगुणा के साथ आज दो दर्जन से अधिक महिलाएं अपने परिवार की आर्थिक स्थिति संवार रही हैं। सुषमा उत्तराखंड के चंबा जिले में रहती हैं। वो 33 साल की हैं।

सुषमा बहुगुणा काफी शिक्षित हैं। उन्होंने एमए बीएड किया हुआ है। इसके बाद वे आसानी से कहीं भी शिक्षिका के तौर पर काम कर सकती हैं लेकिन नौकरी के पीछे भागने के बजाय उन्होंने खुद का काम शुरू करने की योजना बनाई। सुषमा बहुगुणा के पति  बेरोजगार थे, इसलिए सुषमा ने तय किया कि किसी ऐसे काम में हाथ डाला जाए, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति तो मजबूत हो ही साथ ही दूसरी महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकें। डेढ़ साल पहले सुषमा ने खुद धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण लिया और फिर महिलाओं का समूह गठित कर रानीचौरी में ‘आराधना धूप’ के नाम से लघु उद्योग की शुरुआत की। इसके साथ ही उसने आसपास के गांवों की महिलाओं को भी धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस काम में पति ने भी उनका साथ दिया। आज यह दंपति तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रहा है। सुषमा का कहना है कि ‘उत्पाद सही होना चाहिए फिर बाजार की चिंता नहीं सताती। धूपबत्ती बनाने के काम में बड़े उपकरणों की भी जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही महिलाएं इस काम को आसानी से कर लेती हैं।’

महीने में 40 हजार का मुनाफा

सुषमा हर महीने 5000 के आसपास धूपबत्ती के बॉक्स तैयार करती है। इन्हें बेचने में भी उसे कोई परेशानी नहीं होती। जिले में ही सारे उत्पाद बिक जाते हैं। सुषमा के मुताबिक, अगर आप सही उत्पाद तैयार कर रहे हैं तो आपको बाजार की चिन्ता नहीं सताती है। इस समय दो दर्जन से अधिक महिलाएं सुषमा के साथ फुलटाइम काम करती हैं। वो सब 07 से 10 हजार रुपये महीना कमा रही हैं। सुषमा खुद भी 30 से 40 हजार रुपये प्रतिमाह कमा लेती है। इससे वह अपनी बेटी व बेटे को अच्छी शिक्षा दे रही हैं। अब उनका लक्ष्य अन्य उत्पादों को तैयार करना भी है जिससे अधिक से अधिक महिलाओं को स्वरोजगार मिल सके।

गांव की महिलाओं को भी जोड़ा स्वरोजगार से

सुषमा बहुगुणा ने आसपास के गांवों की महिलाओं को भी धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण देना शुरू किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि धूपबत्ती बनाने के काम में बड़े उपकरणों की भी जरूरत नहीं पड़ती है इस वजह से महिलाएं इस काम को आसानी से कर लेती हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

अब सरकार का जोर महिला नहीं बल्कि पुरुष नसबंदी पर

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देश का महिला एवं बाल विकास मंत्रालय चाहता है कि नसबंदी योजना में पुरुषों की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी हो। मंत्रालय ने महिलाओं के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय नीति में इस प्रस्ताव को शामिल कराया है। 1970 में आपातकाल के समय संजय गांधी के इस विवादित कदम के बाद पहली बार किसी सरकार ने ऐसा प्रस्ताव लाया है। अधिकारियों का तर्क है कि पुरुषों में परिवार नियोजन की जिम्मेदारी डालने के लिए इस तरह का कदम उठाना जरूरी है।

मेनका गांधी के मंत्रालय का कहना है कि इस तरह का कदम महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होगा। मंत्रालय के अनुसार देश में महिला नसबंदी बढ़ रही है, जबकि पुरुष नसबंदी न के बराबर है।

स्वास्थ्य मंत्रालय का 2015 का सर्वे बताता है कि 1986-87 में आठ लाख के करीब पुरुषों की नसबंदी की गई, मगर 2014-15 में यह संख्या एक लाख से भी कम रही। इसके उलट 1980-81 में एक लाख से कम महिलाओं की नसबंदी की गई, जबकि 2014-15 में यह संख्या चार लाख के करीब रही। वहीं, 2010-11 में चार लाख से ज्यादा महिलाओं की नसबंदी की गई।

युक्त राष्ट्र आबादी संभाग के अर्थशास्त्र एवं सामाजिक मामलों के विभाग की रिपोर्ट कहती है कि किसी भी देश के मुकाबले भारत का परिवार नियोजन महिला नसबंदी पर ज्यादा निर्भर करता है। अध्ययन बताता है कि पुरुष कंडोम समेत परिवार नियोजन के तमाम उपाय के मुकाबले सबसे ज्यादा निर्भरता महिला नसबंदी पर है।

भ्रम के कारण पुरुष नहीं कराते नसबंदी
विशेषज्ञों के मुताबिक समाज के अंदर भ्रामक प्रचार और मानसिकता की वजह से भी पुरुष नसबंदी जोर नहीं पकड़ रही है। समाज के अंदर ऐसी बातें फैला दी गई हैं कि पुरुषों में नसबंदी के बाद उनकी मर्दानगी या काम करने की क्षमता कम हो जाएगी।  प्रोफेसर इम्तियाज अहमद कहते है कि पुरुषों में नसबंदी का प्रस्ताव बहुत संवेदनशील है। इसे जल्दबाजी में लागू करना खतरनाक हो सकता है। लिहाजा, ऐसा कदम उठाने से पहले समाज में जागरूकता फैलाना बहुत जरूरी है।

 

अनूठी पहल से सुर्खियां बन गया किसान के बेटे की शादी का कार्ड

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अपनी ‘शादी’ को यादगार बनाने के लिए ‘आसमान में वर माला डालना’, ‘हेलीकॉप्टर से दूल्हे का पहुंचना’ और ‘एयर बैलून’ में विवाह रचाने जैसी खबरें आपने जरूर पढ़ी होंगी लेकिन मिश्रिख के एक किसान ने अपने बेटे की शादी के कार्ड पर बेहद अनूठा ‘स्लोगन’ छपवाकर लोगों की सुर्खियां बटोरीं हैं।

समाज को नई सीख देने वाले इस किसान के बेटे की शादी 23 जून को है। सुर्खियां बटोर रहे शादी के कार्ड पर लाल घेरे में ‘शराब पीकर बारात में आना सख्त मना है’ का संदेश लिखवाया गया है। शादी-पार्टियों में शराब के चलन पर आधुनिकता का परदा डाल इसे आज के नए जमाने का फैशन मानने वालों को यह कार्ड ‘आइना’ दिखा रहा है। मिश्रिख के बलियापुर गांव में रहने वाले किसान कैलाश प्रसाद के बेटे अश्विनी का इसी माह 19 जून को तिलक है। 23 जून को शादी है। इस शादी के कार्ड जब कैलाश के सगे-संबंधियों तक पहुंचे तो यह कार्ड सुर्खियां बन गया। कार्ड पर सबसे ऊपर शराब पीकर बारात में न आने का अनुरोध छपवाया गया है। ज्यादातर लोग इस अनूठी ‘पहल’ की सराहना कर रहे हैं।

शादी-पार्टी में शराब की वजह से अक्सर होता है बवाल

कैलाश कहते हैं, कि शादी-पार्टी में शराब पीने की वजह से अक्सर नशे में बवाल होता है। जिससे वर-वधू पक्ष नाहक परेशान तो होते ही हैं, शादी का सारा उल्लास खत्म हो जाता है। नशा एक सामाजिक बुराई है। कैलाश का मानना है, कि शादी से दो जिंदगियों का नया जीवन शुरू होता है। शुरुआत किसी भी काम की हो उसमें किसी भी तरह की बुराई शामिल नहीं होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि नशे के दुष्परिणामों को देखते हुए शादी के कार्ड पर यह संदेश छपवाने का विचार आया। समाज में विरोध के डर से एक बारगी तो ऐसा न करने का सोच लिया, फिर ख्याल आया किसी भी अनहोनी को टालने के लिए यह कदम उठाना बेहद जरूरी है। हालांकि लोग कैलाश के इस सामाजिक संदेश को काफी पसंद कर रहे हैं। कैलाश समाज के लिए एक मिसाल बन गए हैं।

कुछ रिश्तेदार नाराज भी हुए

कैलाश कहते हैं, कि शादी के कार्ड पर शराब पीकर न आने की बात छपी देख कुछ रिश्तेदार नाराज भी हुए। कॉल कर इसका विरोध दर्ज कराया। कुछ ने तो शादी में शरीक न होने तक की बात कह डाली लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं है।

कुछ अनोखा करने में माहिर
अनोखी पहल से सुर्खियों में आने वाली जिले की यह पहली शादी नहीं है। इससे पहले भी सीतापुरियों ने कुछ अलग करने की धुन में एक शादी को चर्चित किया है। दरअसल, मार्च 2015 में जिले के कमलापुर में एक शादी के दौरान दूल्हा-दुल्हन को ‘तोहफे’ में अरहर की ‘दाल’ दी गई थी। उस समय महंगाई के सारे रिकार्ड तोड़ने वाली अरहर की दाल 200 रुपये प्रतिकिलो में बिक रही थी। शादी के तोहफे में दाल दिया जाना खूब सुर्खियों में रहा था।

स्वच्छता अपनाने की अपील भी…
शादी के कार्ड पर साफ-सफाई रखने की अपील भी की गई है। कैलाश बताते हैं, कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर स्वच्छ भारत और एक कदम स्वच्छता की ओर लोगो भी छपवाया है। ताकि शादी-विवाह में अक्सर दोना-पत्तल से होने वाली गंदगी को रोकने में मदद मिले।

पिता ऐसे, जिन्‍होंने बेटियों के लिए बदली दुनिया

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मां बच्चों को गर्भ में पालती है और पिता अपने दिमाग में… दंगल फिल्‍म का यह डॉयलॉग तो आपको याद ही होगा। वास्‍तविकता में यह बात बिल्‍कुल सही है, क्योंकि बच्चें के पैदा होने से लेकर बड़े होने तक पिता हर सुख ​सुविधा का इंतजाम करने में व्‍यस्‍त रहते हैं। आज फादर्स डे के मौके पर हम कुछ ऐसे पिता की दास्‍तां बता रहे हैं जिन्होंने अपनी बेटियों के हक और प्रतिष्‍ठा के लिए समाज के खिलाफ खड़े होकर आवाज उठाई। जिन्‍होंने अपने बेटियों की समानता के लिए जंग लड़ी तो किसी ने अपनी बेटी के सपने पूरा करने के लिए समाज की हर बनाई दीवार तोड़ दी। इनकी इस परवरिश के चलते उन्हें ‘फेमिनिस्ट फादर्स’ कहा जाने लगा है। आइए इस फादर्स डे पर हम आपको दुनिया के फेमिनिस्‍ट फादर से मिलवाते हैं, जिन्‍होंने अपनी बेटियों की दुनिया संवारने के लिए दुनिया ही बदल दी।

खतना रोकने के लिए बनाया ‘अनकट गर्ल्स‘ ग्रुप

खतना या सुन्नत एक तरह कि शारीरिक शल्यक्रिया है जिसमें आमतौर पर मुसलमान नवजात लड़के और लड़कियों के लिंग के ऊपर की चमड़ी काटकर अलग की जाती है। लड़कियों के केस में खतना में योनि के एक हिस्से क्लाइटॉरिस को निकाल दिया जाता है। या फिर कुछ जगहों पर क्लाइटॉरिस और योनि की अंदरूनी त्वचा को भी आंशिक रूप से हटा दिया जाता है। ऐसे में इथोपिया के 38 वर्षीय केबिबी के इस खतने के खिलाफ थे। और वह नहीं चाहते थे कि उनकी 9 साल कि बेटी का खतना हो। इसलिए उन्होंने बेटी कि शिक्षा पर जोर दिया और स्कूल स्टूडेट्स संग मिलकर इस दर्दनाक प्रथा को समाप्त करने के लिए प्रेरित किया। लोगों को जागरुक करने के लिए उन्होंने अपने स्कूल में ‘अनकट गर्ल्स’ नामक ग्रुप बनाया है, जिसके तहत वह इस प्रथा के विरोध में काम करते है। लोगों में एफजीएम (फीमेल जेंटल मुटीलेशन) के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिए केबिबि बच्चों के साथ मिलकर रैली निकालते है और संदेश देते है। उनके इन्हीं प्रयासों के चलते उनके इस फाउंडेशन से शहर के कुछ और लड़के भी जुड़ चुके है।

सपनो को पूरे करने लिए दिए पंख

गुटामेला के अलविरों को जब पता चला कि उसकी 11साल कि बेटी नेदीलिन, आम बच्चों कि तरह चलने में असमर्थ है, तब उन्होंने परेशान होने के बजाएं बच्ची के लिए कुछ करने कि ठानी। अपनी इस लगन के चलते ही अलविरों ने नेदीलिन के लिए स्पेशल ऐसे जूते बनाएं, जिनकी मदद से वह आज आराम से चल फिर सकती है। आज नेदीलिन अपने हमउम्र के बच्चों के साथ आराम से स्कूल जा सकती है। अलविरों खुश है कि आज उनकी बच्ची स्कूल जा रही है और पढ़ाई पूरी कर वह अपने कदमों पर खड़ी हो सकती है।

ईको फ्रैंडली सेनेटरी पेड

मासिक धर्म कि प्रक्रिया से हर लड़की हो हर महीनें गुजरना होता है। ऐसे में युगांडा के विलियम ने अपनी 11 साल कि बेटी एंजी के पहले मासिक धर्म पर न सिर्फ उसका विश्वास बढ़ाया बल्कि उसके लिए ईको सैनेटरी पैड्स बनाएं। हालांकि यह स्थिति विलियम और एंजी दोनों के लिए असहज थी। मासिक धर्म के दौरान एंजी को स्‍कूल जाने में बहुत समस्‍या होती थी और महंगे डिस्‍पोजल सेनेटरी पैड खरीदना बहुत मुश्किल काम था।हालांकि युगांडा में लड़कियां इस बारे में अपने पिता से खुलकर इस बारे में बात करने में झिझक करने में क्योंकि एंजी अपने पिता से लड़की होने के नाते अपने पिता से यह बातें साझा नहीं कर सकती थी। और विलियम एक पुरुष होने के नाते इस स्थिति को समझते हुए विलियम ने एंजी जैसी बच्चियों के लिए आगे बढ़कर ईको सैनेटरी पैड्स उपलब्ध करवाना शुरू कर दिया।

बाल विवाह का विरोध

बांग्लादेश के नाजीर और शारीन का बाल विवाह हुआ, जिसके चलते उन्हें अपनी स्कूलिंग बीच में ही छोड़ने पड़ी। तभी से दोनों ने यह तय कर लिया था, कि वह अपने बच्चों को शिक्षा का पूरा अवसर देंगे। इसलिए जब उनके यहां बेटी टोनी का जन्म हुआ तो उन्होंने तय कर लिया कि वह टोनी को पढ़ा लिखाकर डॉक्टर बनाएंगे। इसलिए नाजीर और शारीन ने मिलकर बाल विवाह के विरूध मुहिम छेड़ी हैं। एक अनुमान के मुताबिक 720 मिलियन लड़कियों को मजबूरन बाल विवाह करना पड़ता हैं।

बेटी को बनाया सक्षम

 

दिल्ली के सल्म ऐरिया में रहने वाले मजदूर विजय दिन का 350 रुपए कमाते है। ऐसे में बेटी कोमल को पढ़ा लिखाकर सक्षम बनाना एक चुनोती थी। लेकिन विजय ने हार नहीं मानी और उन्होंने एक एनजीओं कि मदद से बेटी को पढ़ाया। कोमल आज पढ़ लिखकर फास्ट फूड रेस्ट्रॉन्ट में काम कर हायर एजुकेशन के लिए फंड जमा कर रही है। साथ ही विजय भी खुश है कि उन्होंने सामाजिक नीतियों से परे सोचकर बेटी में विश्वास जगाया और उसे सक्षम बनाया।

 

पापा जब करते हैं ऐसी बातें, अच्छा लगता है

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फादर्स डे के मौके पर हर कोई अपने अपने पापा को याद कर रहा है। जो घर पर बैठे हैं वो पापा के साथ इस दिन को सेलिब्रेट करने की तैयारी कर रहे हैं और जो उनसे दूर हैं उनकी बातों को याद करके उन्हें मिस कर रहे हैं। इस बार अगर आप भी किसी वजह से अपने पापा से दूर हैं तो हम कुछ इस तरह आपको आपके पापा की याद दिला देते हैं। इस फादर्स डे पर जानें हर पापा के कुछ फेवरेट डायलॉग्स के बारे में जो कभी न कभी वो अपने बच्चों से जरूर बोलते हैं।

डोंट वरी तेरा बाप अभी जिंदा है
जब कभी आप किसी परेशानी में फंस जाते हैं तो आप अपने पापा के मुंह से ये बात अक्सर कहते सुनते होंगे कि डोंट वरी तेरा बाप अभी जिंदा है। तुझे घबराने की कोई जरूरत नहीं हैं।

मेरी बिटिया क्या किसी लड़के से कम है
जब कभी मम्मी ये कहकर किसी काम को करने से मना करती हैं कि तू कोई लड़का थोड़ी है जो ये करेगी तो पापा झट से बोलते हैं कि हमारी बिटिया क्या किसी लड़के से कम हैं और आप शान से पापा के कंधे पर हाथ रख देती हैंं।

मुझे गर्व है अपने बच्चों पर

स्कूल या कॉलेज में अच्छे नंबर लाने पर पापा अक्सर कहते हैं कि मुझे अपने बच्चों पर गर्व है। अपने मोबाइल पर हर किसी को आपकी सफलता की कहानी सुनाते हैं और जी खुश हो जाता है। आपकी टॉफी, खिलौने सब आपकी गैरमौजूदगी में उनके पास रहते हैं।

मेरे बच्चें मेरा गुरूर हैं
मम्मी जब छोटी-छोटी बातों के लिए डांटकर शिकायत की गठरी पापा को थमाती है तो पापा हमेशा यही कहते हैं कि मेरे बच्चें मेरा गुरूर हैं वो कोई गलत काम नहीं कर सकते जिसकी वजह से हमारा सिर लोगों के सामने नीचे हो।

पिता बेच रहे सब्जी, बेटा यूथ एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में लगाएगा पंच

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संगमनगरी की एक और खेल प्रतिभा दुनिया भर में जलवा बिखेरने को बेताब है। झूंसी के सुदीप कुमार का चयन यूथ एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए हुआ है। यह चैंपियनशिप थाईलैंड में एक जुलाई से शुरू होगी। वह भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करेंगे। सुदीप के पिता बल्लू यादव झूंसी में सब्जी की दुकान लगाते हैं।

सुदीप ने पांच साल पहले झूंसी से बॉकि्ंसग का प्रशिक्षण लेना शुरू किया तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। दो साल तक बॉक्सिंग संघ के सचिव भारत भूषण और अंकित प्रताप सिंह से दो साल तक प्रशिक्षण लिया। इसके बाद झांसी हॉस्टल में चयनित हो गए। तीन साल तक वहां प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उत्तराखंड स्थित काशीपुर छात्रावास गए।

वहां से देश की बॉक्सिंग टीम में शामिल हो गए। फिलहाल, वह हरियाणा में नेशनल टीम में प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। सुदीप ने अपने चयन पर खुशी जताई है। कहा कि चयन से उनकी जिम्मेदारी बढ़ गई है। वह इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाएंगे। जिला बॉक्सिंग संघ के सचिव भारत भूषण ने बताया कि थाईलैंड में होने वाली यूथ एशियन एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप के लिए देश के कुल 10 बॉक्सरों का चयन हुआ है। यूपी से सुदीप के अलावा मुजफ्फरनगर के हर्षप्रीत भी शामिल हैं।

 

जब विराट ने पिता के निधन के बीच खेला मैच

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भारत-पाकिस्तान के इस मैच में सबकी निगाह भारतीय कप्तान विराट कोहली पर है और इसे अजब इत्तेफाक ही कहेंगे कि आज ही फादर्स डे है। आज के दिन हम आपको बता रहे हैं विराट कोहली और उनके पिता के जीवन से जुड़ी एक ऐसी घटना जो आपको झकझोर देगी और ये साबित कर देगी कि क्यों मात्र 28 साल के विराट कोहली आज देश के सबसे प्रतिभावान खिलाड़ियों की सूची में शामिल हैं।

ये बात है 18 दिसंबर 2006 की। दिल्ली के फिरोजशाह कोटला क्रिकेट मैदान पर दिल्ली और कर्नाटक के बीच रणजी मैच खेला जा रहा था। इसी मैच में दिल्ली की ओर से खेल रहे 18 साल के एक बच्चे ने कुछ ऐसा किया जिसने उसकी अपनी ही टीम नहीं बल्कि, विरोधियों को भी चौंका दिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस घटना को फिरोजशाह कोटला क्रिकेट मैदान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

कर्नाटक ने पहले खेलते हुए अपनी पहली पारी में 446 रन का लक्ष्य रखा था। ‌उस दिन दिल्ली में जबरदस्त सर्दी पड़ रही थी। लक्ष्य का पीछा करते हुए दिल्ली की टीम ने अपने शुरुआती पांच विकेट गंवा दिए थे।

अब मैच में बने रहने और फॉलोऑन से बचने की जिम्मेदारी इसी 18 साल के युवा विराट कोहली पर थी। विराट के साथ टीम के विकेट कीपर पुनीत बिष्ट बैटिंग कर रहे थे। दूसरे दिन का खेल खत्म होने पर विराट ने अपना विकेट बचाए रखा था और वो 40 रन पर नॉटआउट थे।

लेकिन दिल्ली को फॉलोऑन बचाने के लिए अभी भी लंबी दूरी तय करनी थी। दिल्ली टीम का स्कोर 103 रन था जिसमें अकेले विराट का योगदान 40 रन का था। अब सबकी निगाह तीसरे दिन के मैच पर टीकी थी।

लेकिन उस रात अचानक विराट के 54 वर्षीय पिता प्रेम कोहली को दिल का दौरा पड़ा और उनका देहांत हो गया। ये खबर जंगल में आग की तरह फैली और टीम के कोच को इसकी सूचना दी गई। कोच ने विराट को इस दुखद समाचार से अवगत कराया।

अब विराट के पास दो विकल्प थे। या तो वो अगले दिन सुबह अपने पिता का अंतिम संस्कार करने घर जाएं या दिल्ली को हार से बचाने के लिए मैदान में उतरें।

अगले दिन सुबह कोहली के बाद बैटिंग करने वाले चेतन्य नंदा को तैयार होने को कहा गया। लेकिन इससे पहले कि चेतन्य मैदान में उतरते सब ये देखकर चौंक गए कि विराट कोहली ड्रेसिंग रूम में है और अपने पैर में पैड बांधकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।

मैदान में जब विरोधी दल ने विराट को देखा तो उन्हें भी इस दृश्य को देखकर यकीन नहीं हुआ‌ कि वो लड़का जिसके पिता का पिछली रात देहांत हो गया है वो आज मैदान में खेलने के लिए हाजिर है।

इस मैच में विराट ने 281 मिनट तक बल्लेबाजी की और 238 गेंदों का सामना करते हुए 90 रन बनाए। जब विराट आउट हुए तो उनकी टीम खतरे से बाहर थी। अब दिल्ली की टीम को फॉलोऑन बचाने के लिए केवल 36 रनों की जरूरत थी।

आउट होने के बाद दोपहर करीब 12 बचे विराट कोहली ड्रेसिंग रूम में पहुंचे और अपने आउट होने का रिप्ले टीवी पर देखा। इसके बाद चुपचाप अपने पैड, ग्लब्स व हेलमेट उतारे और अपने पिता का अंतिम संस्कार करने के लिए निकल पड़े।

इस एक घटना ने एक रात में ही 18 साल के इस युवा को एक परिपक्व और गंभीर खिलाड़ी में तब्दील कर दिया। इसके बाद विराट कोहली ने ‌कभी मुड़कर पीछे नहीं देखा और हर रोज नई ऊंचाइयों को छूते गए।

 

 

सड़कों पर रिक्शा चलाने वाले हरिकिशन बने कामयाब उद्यमी

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हरिकिशन पिप्पल ने जिस कंपनी में हेल्पर का काम किया, आगे चलकर उसी कंपनी के साथ उन्होंने कारोबार करना शुरू किया। जीवन में हालात कुछ इस तरह से खराब हुए थे, कि उन्हें रिक्शा चलाने के लिए भी मजबूर होना पड़ा था। कुछ साथियों ने उन्हें धोखा भी दिया, कारोबार में उन्हें घाटा भी झेलना पड़ा, संकट कुछ इतना बढ़ गया था कि उनके मन में ख़ुदकुशी करने के भी ख्याल आने लगे थे, लेकिन किसी तरह हरिकिशन के खुद को संभाला और आगे बढ़े।

बचपन से ही खाए हैं गरीबी के थपेड़े

हरिकिशन पिप्पल के पिता उत्तरप्रदेश के आगरा में जूते बनाने की एक छोटी-सी फैक्टरी चलाते थे। आमदनी ज्यादा थी नहीं। मुश्किल से घर-परिवार का गुज़र-बसर होती थी। पढ़ाई-लिखाई के खर्च के लिए हरिकिशन बचपन में ही मेहनत-मजदूरी करने लगे थे। गर्मी के दिनों में हरिकिशन ने आगरा एयरपोर्ट पर खस की चादरों पर पानी डालने का काम भी किया और इस काम के लिए उन्हें हर महीने 60 रुपये मिलते थे। जब वे दसवीं में थे तब उनके पिताजी बीमार पड़ गये जिससे फैक्टरी का काम बंद हो गया। तबीयत कुछ इस तरह से बिगड़ी कि पिता काम करने की स्थिति में नहीं रहे, इसीलिए घर-परिवार चलाने की जिम्मेदारी हरिकिशन के कंधों पर आ गयी। घरवालों को बताए बिना वे शाम को साइकिल-रिक्शा चलाने लगे जो उनके मामा के बेटे की थी। कोई उन्हें पहचान न ले इस मकसद से वे अपने चेहरे पर कपड़ा लपेटकर साइकिल-रिक्शा चलाया करते थे।

पिता की फैक्ट्री दोबारा शुरु करने के फैसले ने डाली मजबूत नींव

गरीबी के थपेड़े हरिकिशन को तोड़ नहीं पाये, बल्कि इससे उनका हौसला और बढ़ गया। उन्होंने निश्चय किया कि एक दिन वे अपने पिता की फैक्टरी दोबारा शुरू करेंगे। हरिकिशन ने आगरा के जैनसन पिस्टन में मजदूरी का काम भी किया, यहाँ उनकी तनख्वाह प्रतिमाह 80 रुपये थी। इसी बीच हरिकिशन की शादी भी हो गयी। साल 1975 में हरिकिशन पिप्पल ने अपनी पत्नी गीता की सलाह पर पंजाब नेशनल बैंक में लोन का आवेदन दिया जिससे पुश्तैनी व्यवसाय फिर से शुरू किया जा सके। बैंक ने 15 हज़ार का लोन पास कर दिया। कुछ घरेलू समस्याओं के चलते आया हुआ पैसा जाता हुए दिखा, तो पत्नी ने हरिकिशन से लोन की रकम बैंक को वापस करने को कहा, लेकिन वे इरादों के पक्के थे। बड़ी मुश्किल से जो रास्ता दिखा था उसे वे छोड़ नहीं सकते थे। उन्होंने वह पुश्तैनी घर ही छोड़ दिया और आगरा के गांधी नगर में एक कमरा किराये से लेकर अपने कारखाने की नींव रखी।

पहले कॉन्ट्रैक्ट ने ही दिखा दिया अपना दम-ख़म

किसी तरह भागदौड़ कर उन्हें सरकारी कंपनी स्टेट ट्रेडिंग कार्पोरेशन से 10 हज़ार जोड़ी जूते बनाने का ऑर्डर मिल गया। ये जूते विदेश में निर्यात किए जाने थे। दिन-रात मेहनत कर उन्होंने यह ऑर्डर समय पर पूरा कर लिया। तीन महीनों में ही बैंक ने उनकी क्रेडिट लिमिट बढ़ाकर तीन लाख रुपये तक कर दी। जल्द ही उन्हें अच्छा मुनाफा होने लगा और हेरिक्सन नाम से उनके जूतों का ब्रांड मशहूर हो गया। उनके जूतों के दाम भले ही दूसरी ब्रांड के जूतों से कुछ अधिक थे लेकिन क्वालिटी भी सबसे बेहतर थी।

बाटा से जुड़ने के बाद कामयाबी की राह पर रफ़्तार हुई तेज़

हरिकिशन ने बाटा के लिए भी नॉर्थ स्टार जूते बनाने का काम किया। इसके लिए कंपनी डिज़ाइन और कच्चा माल देती थी और हरिकिशन की कंपनी पीपल्स एक्स्पोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ऑर्डर पूरा करके उन्हें सौंपती थी। नब्बे के दशक में बाटा ने अमेरिका के मशहूर ब्रांड हश पपीज़ का जूता भारतीय बाज़ार में लाने का फैसला किया। इसके लिए हश पपीज़ की टीम अमेरिका से आई थी और उम्दा जूते बनाने वाले की खोज में आगरा पहुंची। हरिकिशन पहले से ही बाटा के साथ काम कर चुके थे इसीलिए उन्हें भी सैंपल लेकर बुलाया गया। पहली बार में उन्हें हरिकिशन का बनाया जूता पसंद नहीं आया, लेकिन उन्होंने अगले तीन घंटे में टीम के प्रमुख जॉन बेस्ट के पैर के साइज़ का जूता तैयार करके उन्हें दिखाया। काम बेहतर था और उन्हें कॉन्ट्रैक्ट मिल गया। हरिकिशन ने कामयाबी की राह पकड़ ली थी लेकिन मुश्किलों का दौर खत्म नहीं हुआ, नयी-नयी चुनौतियां सामने आती ही गयीं। अस्सी दशक के अंतिम सालों में पूर्वी यूरोप में बड़े राजनीतिक परिवर्तन हुए। कम्युनिस्ट देशों में सोवियत रूस टूट गया और पूर्वी तथा पश्चिमी जर्मनी एक हो गए। इसका काफी असर जूतों के कारोबार पर पड़ा क्योंकि इसका अधिकतर व्यापार निर्यात से ही होता था। हरिकिशन को भी कारोबार में घाटा होने लगा। हरिकिशन जल्द ही समझ गए कि जूतों के कारोबार के सहारे वे तरक्की की राह पर नहीं बढ़ सकते हैं और उन्हें ये एहसास हो गया कि दूसरे कारोबार से ही उनकी ज़िंदगी की गाड़ी आगे बढ़ेगी।

कठिनाइयों के नए दौर में हरिकिशन ने रेस्टोरेंट खोलने का निर्णय लिया, नाम रखा अग्रवाल रेस्टोरेंट। एक दलित का अग्रवाल समाज के नाम से रेस्तरां चलाना अजीब था लेकिन इसका जवाब भी हरिकिशन अपने ही अंदाज़ में देते हैं। उनका कहना होता है कि यदि दूसरे व्यापारी जूते बनाने जैसे उनके पुश्तैनी कारोबार में हाथ डाल सकते हैं तो वे अग्रवाल उपनाम का इस्तेमाल अपने बिज़नेस में क्यों नहीं कर सकते। रेस्टोरेंट अच्छा चल पड़ा और इसी काम को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने वहीं ‘मैरिज हाल’ यानी शादीखाना शुरू कर दिया। शादीखाना लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन धीरे-धीरे उनका शादीखाना ट्रेंड-सेंटर बन गया और आस-पास और भी मैरिज हॉल खुल गए। इससे हरिकिशन की आय में कमी आने लगी। मैरिज-हॉल का बिज़नेस अधिक न चलता देख दो डॉक्टर हरिकिशन के पास आए और उन्हें प्रस्ताव दिया कि वे मैरिज हॉल की ज़मीन उन्हें अस्पताल खोलने के लिए दे दें। हरिकिशन उन्हें टालते रहे लेकिन वे लोग नहीं माने। आखिर हरिकिशन को उनकी बात माननी पड़ी लेकिन इस शर्त पर कि अस्पताल के लिए वे डॉक्टर एक लाख रुपये किराया देंगे तथा बाकी सारा निवेश हरिकिशन ही करेंगे। मुनाफे में दोनों (हरिकिशन और डॉक्टर) का हिस्सा 50-50 प्रतिशत रहेगा।

अस्पताल में भारी घाटा, आत्महत्या तक का ख्याल आया था मन में

2001 में हैरिटेज पीपुल्स हॉस्पिटल की स्थापना हुई। इसके लिए हरिकिशन ने बैंक से 4-5 करोड़ रुपये का कर्ज़ लिया लेकिन कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार हरिकिशन का हॉस्पिटल के काम में कोई दखल नहीं होता था। इस क्षेत्र में कोई जानकारी न होने के कारण वे काफी नुकसान में रहे, उनका परिवार कर्ज़ में डूब गया। इतना बड़ा घाटा वे सहन करने की स्थिति में नहीं थे। यहाँ तक कि उनके मन में आत्महत्या तक का ख्याल आने लगा। उनके बेटों ने उन्हें हौसला दिया और यह तय हुआ कि अब ये हॉस्पिटल पिप्पल परिवार खुद चलाएगा। दोनों डाक्टरों को हटा दिया गया। बाद में हरिकिशन को अहसास हुआ कि डॉक्टर उन्हें धोखा दे रहे थे।

‘जातिवाद’ ने भी डाले कामयाबी की राह में रोड़े

अस्पताल का प्रबंधन पिप्पल परिवार के हाथों में आ गया, लेकिन चुनौतियां नए सिरे से सामने आकर खड़ी हो गयीं। जातिवाद की सोच ने उनकी राह में रुकावटें खड़ी करनी शुरू कर दीं। कई डॉक्टर अस्पताल आने से कतराने लगे। उन्हें मनाने के लिए पिप्पल परिवार को नई और ख़ास नीति अपनानी पड़ी। पिप्पल परिवार ने डॉक्टरों को ऑपरेशन के लिए एडवांस देना शुरू किया। ये तरकीब कामयाब रही और धीरे-धीरे डॉक्टर और मरीजों को अस्पताल पर भरोसा बढ़ने लगा। जल्द ही अस्पताल लोकप्रिय हो गया। साल 2005 में पिप्पल के अस्पताल ने दिल्ली के एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट से एक करार किया जिसके तहत वहाँ से दिल के मरीजों को एस्कॉर्ट्स भेजा जाएगा। मीडिया में आयी ख़बरों से पता चलता है कि दलित होने के कारण उनके अस्पताल के प्रतिस्पर्धियों ने उन्हें रास्ते से हटाने के प्रयास भी किए। उनका अस्पताल आगरा में रेलवे के पैनल के तीन अस्पतालों में से एक है, अन्य दोनों अस्पताल ऊँची जाति वालों के हैं। 2010 में कुछ मरीजों ने इलाज को लेकर उनके अस्पताल की रेलवे पैनल में शिकायत कर दी थी जिसके चलते रेलवे ने उऩ्हें पैनल से हटा दिया। पिप्पल ने खुद इसकी जांच-पड़ताल की और पाया कि अन्य अस्पतालों में से एक ने रिश्वत देकर यह झूठी शिकायत दर्ज करवाई थी। हरिकिशन ने अपने कारोबारी जीवन में जूतों का बिज़नेस करने और अस्पताल चलाने के अलावा होंडा की डीलरशिप ली और एक पब्लिकेशन हाउस भी शुरू किया। हरिकिशन ने नायाब कामयाबी के बाद अपना कारोबार अपने बेटों को सौंप दिया है और खुद समाजसेवा में जुट गए हैं। वे राजनीति के दंगल में भी कूदे। हरिकिशन कहते हैं, कि अपने और अपने परिवार के लिए वे बहुत कुछ कर चुके हैं और अब उनकी नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वे समाज के उत्थान के लिए काम करें। उनका मानना है कि नामुमकिन कुछ भी नहीं है, इंसान को अपने अंदर के जूनून और जज़्बे को मरने नहीं देना चाहिए। दूसरों की कामयाबी से जलने की बजाय उनसे प्रेरणा लेने की प्रवृति किसी को भी सफलता के रास्ते पर आगे ले जा सकती है।

 

(साभार – योर स्टोरी)

चन्द्रलेखा की 5 कविताएं

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चंद्रलेखा

 

कहाँ गलत थी ?

 तुम्हें न हो याद शायद

पर मैं भूली नहीं

रखी थी जो शर्त तुमने

मुझे ‘अपना’ कहने से पहले

सच्ची ‘अर्धांगिनी’ तभी कहलाऊंगी

अपने लिए जीना नहीं,

औरों के लिए जीना जब

मैं सीख जाऊँगी ;

घूँघट उठाने से पहले,

मुझे छूने से पहले यही कहा था

तुम्हें याद न हो मगर

मैं भूली नहीं;

 

धन्य समझा था अपने जीवन को

और तुम्हें महान

एक नहीं सात जन्मों तक

कर सकती थी मैं इंतजार ;

बहुत आसान लगा मुझे

तुम्हारी शर्त पूरी करना

दिन, हफ्ते, महीने, साल बीते

और बीतते चले गए

तुम्हारी ख़ुशी, चाहतों और तुम्हारी शर्तों को

पूरा करते-करते मैं

पूरी से आधी

आधी से तिहाई और चौथाई में बंटती गई,

बंटते- बंटते फिर

सिमट गई शून्यों में ;

 

तुम्हारे सपनों को सच किया

सपने देखना मैंने छोड़ दिया ;

छोटे-छोटे तुम्हारे दुखों को सहेजा

अपने पहाड़ से दुखों को

बिखरने कभी न दिया ;

बढ़ते बच्चों की आशा- उम्मीदों को

ईंधन दिया

सुबह के नाश्ते और रात के खाने के बीच

घुटती आवाज़ को मैंने

कभी बोलने न दिया

 

तुमको ‘तुम्हारे’ परिवार, बच्चों, दफ्तर, सपनों

औ’ ‘समाज’ से जोड़ दिया

दूर होती गई तुमसे

मैं धीरे-धीरे-धीरे

तुम यह  जान न पाए

कह भी न सकी मैं

मुझे तुम्हारी सच्ची ‘अर्धांगिनी’ जो बनना था

मैं भूली नहीं कभी ;

 

मुझसे विलग होकर ही जुड़े तुम

अपने ‘अपनों’ से,

जीते रहे तुम ‘अपनों’ के लिए

देव! कितनी स्वार्थी हो गई मैं

जोड़ना चाहती थी तुम्हें सिर्फ अपने से

 

अपनों का सुख, परायों का दुःख

सहेजा तुमने कितनी सहजता से

मैं क्या थी तुम्हारे लिए?

‘अपनी’ या कि ‘पराई’ ?

‘अर्धांगिनी’ न बन सकी तुम्हारे लिए

हार गई मैं शर्त

तुम्हारे लिए जीते-जीते

अपने लिए जीना न सीख पाई मैं

 

2. आज़ादी

 

उड़ सकती हूँ मैं

बादलों के भी पार

गा सकती हूँ सुरीला गान

होगा जो कोकिल से भी मीठा

रच सकती हूँ कोई

एक नया महाकाव्य

दायरे हैं न बंदिशे कोई

मैं आज़ाद हूँ घर में

‘अकेली’ हूँ ‘अपने साथ’

 

 

3. स्वीकार

तुम्हारे साथ  जिया मैंने जीवन

और (शायद) तुमने भी  !

जो दिया तुमने

जिस रूप में भी दिया

मैंने, स्वीकार किया ;

धर्म इसी को बताया गया

आराधना यही ईश्वर की

जीवन की साधना यही

लक्ष्य जीवन का यही

आदि यही और अंत भी  यही

शास्त्रों में यही समझाया गया ;

 

स्वीकार किया तुम्हें मैंने

और तुमसे मिले हर दान को

लेकिन ;

तुमने कभी पूछा  नहीं

मुझे यह स्वीकार है ?

या नहीं ?

 

 

4. शिकायत है तुमसे

लगाया  दांव पर द्रुपद सुता को

फिर भी धर्मराज कहलाये

बने रहे पुरुषोतम तुम

और सिया ने कष्ट उठाये

 

त्याग यशोधरा का करके

योगी, ज्ञानी, बुद्ध हुए तुम

कभी अहिल्या, कभी जानकी

और द्रौपदी बनी रही मैं

तिरस्कार,त्याग नहीं यह मेरा

अपमान हुआ सिर्फ नारी देह का;

 

तुम देवराज ! तुम्ही धर्मराज !

राम भी तुम्ही, रावण भी तुम्ही

तुम समाज के,  समाज तुम्हारा

बने समाज के तुम्ही अधिष्ठाता !

अपना तिलक आप सजा के

ऊँचे सिंहासन जा बिराजे

भूले से भी याद नहीं क्यों

इसी देह से तुम भी जन्मे !

 

नियति नहीं थी फिर भी,लेकिन

होती रही ये देह तिरस्कृत;

अदेह शक्ति को पूज-पूज कर

किया अपमान नारी देह का

मान तुम्हारा रखने खातिर
लुटती रही ये देह सदा
बली सदा तुम बने रहे

रह गई ये देह अबला;

आँचल रात्रि जब ले समेट

तब होता हर रोज़ उजाला

इठलाता सागर का यौवन

नदियाँ ले जब देह समेट;

 

न ये माता, न ये भार्या

न सुता , न भगिनि तुम्हारी

हर युग हर काल  में

रही सामने  देह सदा ;

 

बहता रक्त शिराओं मे

और सांस भी चलती

भावना जगती, सपने पलते

ठीक तुम्हारे भीतर जैसे

समझो न केवल देह इसे

 

रोष नहीं यह, न कोई विरोध

पीछे चलने की चाहत, न

आगे निकलने की होड़

गिला नहीं विधाता से

पर हाँ, शिकायत !

तुम से…सिर्फ तुम्ही से है

भूले  से ही सही, कभी तो

इंसा  ही समझ लिया होता

देह से परे कभी तो जाकर

मन में झाँक लिया होता …

 

5.  आधी दुनिया

 

बचपन गुज़रा

जवानी बीती

बुढ़ापे तक भी

छिपी रही पहचान;

 

देवी सी पूजी गयी

तिरस्कृत हुई  दासी-सी

रही महरूम हमेशा ही

अपनी ही पहचान से ;

 

पाषण से कंप्यूटर तक

पहुँच चुका संसार

घर आँगन में ही

दफन है

आधी दुनिया का संसार !

 

(कवियित्री पूनम पाठक ‘ चन्द्रलेखा की कविताओं में स्त्री की मनोदशा का चित्रण ही नहीं बल्कि उन सवालों की गूँज भी सुनाई पड़ती है जो वह करना चाहती थी मगर वे दबे रहे या दबा दिए गए। उपरोक्त कविताएँ चन्द्रलेखा के काव्य सँग्रह ‘संग्रह ‘सन्नाटा बुनता है कौन’ से ली गयी हैॆ। सम्पर्क सूत्र – 9433700506)