Tuesday, September 29, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 795

कोलकाता में अभी मनुष्य बसते हैं

0
            शंभुनाथ
मैंने 1970 के दशक में कोलकाता के लेखकों का प्रचंड व्यवस्था-विरोध देखा है, जो अब एक मरती हुई भावना है।हिंदी और बांग्ला लेखकों के बीच तब नमस्कार-भालोबासा कहीं नहीं तो देशी शराब के एक चर्चित अड्डे खलासीटोला में दिख जाता था, जहां दोनों भाषाओं के लेखक आते थे और घुल-मिल जाते थे।
उन बांग्ला लेखकों में अहं नहीं था, नखरे नहीं थे। वे अपनी भाषा और संस्कृति से सदा प्रेम करते रहे हैं, चाहे जितने क्रांतिकारी विचारों के हों। यह प्रेम हिंदी में नहीं दिखता।
एक बार महाश्वेता देवी के लेखक बेटे नवारुण भट्टाचार्य के साथ टैक्सी में घर लौट रहा था। टैक्सी वाले ने उन्हें पहचान लिया। भीड़ में भी लेखक दिखता है, यदि उसके जन सरोकारों में ईमानदारी और निरंतरता हो।  इस दिन मेरा विस्मय और बढ़ा, जब नवारुण ने बताया कि प्रसिद्ध बांग्ला कवि शक्ति चट्टोपाध्याय एक रात 11.30 बजे के करीब कोलकाता की एक सड़क पर नशे में हिलते-डुलते चल रहे थे कि गैरेज की ओर खाली लौटती एक डबल डेकर बस के ड्राइवर ने उन्हें पहचान लिया। इसने उन्हें बस में बैठाया और यह विशाल बस अकेले उन्हें लेकर उनके घर के दरवाजे तक पहुंची।
इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में लेखक की पहचान दुनिया के अन्य नगरों की तरह कोलकाता में भी धूमिल हुई है। यदि वह राजनीतिज्ञों या फिल्मी अभिनेताओं के साथ खड़ा नहीं है तो उसे कोई नहीं देखता। काफी हाउस के पहले जैसे अड्डे नहीं हैं। लेखक अपने घर से बाहर नहीं निकलते। शहर में हर तरफ रोशनी इतनी ज्यादा है कि आंखें कुछ देख न सकें। खाने-पीने की मस्त दुकानें खुल गई हैं। अब अकेलेपन को महसूस करते हुए टहलने की कोई जगह नहीं है। पहले की तरह भटकन नहीं है, और खोज नहीं है, गंतव्य इतने स्पष्ट हैं।
कोलकाता अब न जुलूसों-प्रदर्शनों से गूंजता राजनीतिक शहर है और न बहसों से उत्तप्त सांस्कृतिक शहर। जुलूसों की जगह अभिजात किस्म के रोड शो हैं। साहित्यिक बहसों की जगह लिटरेरी फेस्टिवल हैं। पिछली फरवरी में ऐसे ही एक फेस्टिवल में आए लेखकों के लिए डिनर का प्रबंध शहर के सबसे महंगे होटल द हयात में था।
वहां से केदारनाथ सिंह, अरुण माहेश्वरी और निर्मला तोदी के साथ मैं अधखाया लौटा था। ज्यादातर लेखक ऐसे थे जो मीडियाकर किस्म के थे। मीडियाकरों का कभी समाज नहीं होता। प्रश्न उठता है, आज लेखक संगठित क्यों नहीं हो पाते हैं? क्या इतना भीषण सामाजिक अंतर्द्वंद्व इसलिए है कि शहर शिकारियों से भरता जा रहा है? यदि आदमी शिकारी नहीं है, तो बस किसी का शिकार है।
कोलकाता में एक समय तर्क का तूफान था, वह बुद्धिवाद का युग था। आज तर्क की जगह जुमले हैं। बुद्धिवाद अब व्यावसायिक बुद्धिवाद और तकनीकी बुद्धिवाद में सीमित हो चुका है। कोलकाता एक व्यावसायिक नगर है, जहां शिक्षा और चिकित्सा में व्यवसाय का सबसे भयंकर रूप है। यह मानवता का एक बड़ा सिरदर्द है। बुद्धिवाद के दीर्घ इतिहास से संबंधविच्छेद का नतीजा है कि एक तरफ अतीत से अंध-राष्ट्रवादी संबंध बना है तो दूसरी तरफ व्यावसायिक मुनाफाखोरी के लिए कुछ सनसनीखेज कहने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
कुछ लोग “अतीतबद्ध राष्ट्रवादी” हैं तो कुछ “अतीतविहीन ग्लोबल” हैं। ये दोनों ही नव-औपनिवेशिक तत्व हैं। क्या महानगर में बुद्धिपोषित महान भाव फिर लौटेंगे? यह सवाल इस शहर के “आत्म” को रि-डिस्कवर करने से जुड़ा है।
यहां की कुछ चीजें खास तौर पर प्रसिद्ध रही हैं — रसगुल्ला, फुटबाल और बुद्धिजीवी। रसगुल्ला अब कैडवरीज की मिठाइयों में डूब गया। फुटबाल के उत्तेजक मैच फीके पड़ गए, मोहन बगान-ईस्ट बंगाल की लड़ाई आइपीएल के मजे में खो गई। बंगाल लोकल है या एकदम ग्लोबल । बुद्धिजीवी महत्वाकांक्षी हो गए हैं। जहां नए मूल्यों का जन्म हुआ, वहां मूल्यबोध अब कोई मुद्दा नहीं है।
कोलकाता के बारे में कहा जाता है कि कोलकाता में अनेक कोलकाता हैं, उनके बीच से अपना कोलकाता ढूंढ़ लेना होता है। यह खास शहर है जहां फिर भी प्रेम और कृतज्ञता का अभी  पूरी तरह अंत नहीं हुआ है। इस शहर ने जिसे पकड़ लिया, वह इसके आकर्षण से बाहर नहीं निकल सका, भले अब यहां बहुत कलह है, हिंसा है और जीवन पहले से ज्यादा असुरक्षित है। सभ्यता की नकाब में हिंसा आदमीयत को ज्यादा खाती है, पर कोलकाता में ऐसे काफी लोग हैं जो अभी इस तरह से सभ्य नहीं हैं। कई शहर मनुष्य की वापसी के इंतजार में हैं, जबकि कोलकाता में अभी मनुष्य बसते हैं।
अब एक खास तरह के शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और लेखकों से कोलकाता खाली-खाली लगता है। वे लोग व्यवस्था में कहीं शरीक होते हुए भी पूरी तरह उसमें डूबे नहीं होते थे। वे  मेहनती थे, जागरूक थे और जोखिम उठाते थे। उन क्रांतिकारी प्रतिरोधों को भूलना आसान नहीं है जो कोलकाता की अविस्मरणीय घटनाएं हैं। नव-उदारवाद ने विभिन्न स्तरों पर सबकुछ निगल लिया — प्यार, गुस्सा, आत्मविश्वास, हार्दिकता। मुक्तिबोध ने एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि तुम्हारे पास और हमारे पास क्या है, सिर्फ ” ईमान का डंडा है, बुद्धि का बल्लम है,अभय की गेती है, हृदय की तगारी है तसला है– नए-नए बनाने के लिए भवन—आत्मा के, मनुष्य के”। वामपंथी अति-उत्साह में पहले ईमानदारी और समझदारी का संबंधविच्छेद हुआ, ईमानदारी की तुलना में समझदारी ज्यादा जरूरी चीज मानी गई। फिर निर्भयता की जगह वफादारी ने ले ली। निर्भयता और कायरता में कायरता का पलड़ा भारी पड़ता गया। खुदगर्जी पनपी। हृदय का अभाव होता गया। राजनीति के केंद्र में जब गधे आ गए,इन्होंने सब कुछ चरना शुरू कर दिया — प्रेम, गुस्सा,आत्मविश्वास, निर्भयता, हार्दिकता– हर अच्छी चीज। जीवन में “श्रेष्ठ”, “मूल्यप्रवण” और “तर्कसंगत” को बचाने की कोशिशें जब मूर्तियों, स्मारकों के निर्माण और महापुरुषों की छवियों पर माल्यार्पण तक सीमित हो जाती हैं ये महज सांस्कृतिक बाह्याडंबर के चिह्न होते हैं।
कोलकाता में बांग्ला लेखकों के अड्डे घटे हैं। अखबारों में साहित्यिक घटनाओं के लिए जगह सिकुड़ी है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श जैसे मामले नदारद हैं। मीडिया में राजनीतिक खबरों के बाद फिल्म, क्रिकेट, अपराध और एलीट मनोरंजन ही हावी हैं। किसी जमाने में साहित्य की प्रधानता थी। अब लघु पत्रिकाएं हैं और कुछ पत्रिकाओं ने अच्छे प्रकाशन खड़े कर लिए हैं। यह हिंदी में दुर्लभ है। सभी तरफ लेखकों में बिखराव है।
सरकार से लेखकों-कलाकारों के मधुर रिश्ते रखने का चस्का लंबे समय से है। उनका राजनैतिक समायोजन पहले से बढ़ा है। ऐसे ही दृश्य हिंदी में भी हर तरफ हैं। यह अब विरोधों का युग नहीं है, अवसरों की तलाश का समय है। गाय घास खाकर दूध देती है, पर कर्इ लेखक-शिक्षक दूध-मलाई खा कर घास दे रहे हैं। नोटबंदी का ज्यादा असर न हो, नेटबंदी का व्यापक दुष्प्रभाव है। लोग घर में भी हर समय इंटरनेट पर हैं। सारी बौद्धिकता सोशल मीडिया पर खलास हो जाती है। इसने लोगों को असामाजिक बनाया है और लेखकों के सृजनात्मक पंख कतर डाले हैं। यहां भी हिंसा है। कोई शहर राजनैतिक झुंडों से भर जाए, अंध-राष्ट्रवाद का ज्वार हो और साहित्यिक वस्तु भी पुल न हो कर दीवार होती जाए तो यह उस शहर का घृणा में पागल होना है। पहले के पागल कितने अच्छे थे — टोबाटेक सिंह (मंटो),बावनदास (रेणु), जरनैल सिंह (भीष्म साहनी) जैसे पागल! अब ऐसे पागल ढूंढ़े नहीं मिलते।
पार्क स्ट्रीट से लेकर न्यू टाउन तक तुच्छ ही विराट है — विराट भवन, विराट रास्ते, विराट बाजार और विदेशी ब्रांड की वस्तुएं। बेरोजगारी और अपराध का अनंत। ऐसी घड़ियों में शहर अपनी कृतियों से नहीं कृत्रिम सजावटों से पहचाने जाने लगते हैं।
कोलकाता का लंबा इतिहास रह-रह कर पुकारता है। उसमें आधुनिक हिंदी के निर्माण का इतिहास भी है। यहां हिंदी का पहला अखबार छपा। यहां निराला हुए। यहां से “मतवाला”, “विशाल भारत”,”ज्ञानोदय” आदि पत्रिकाएं निकलीं। अब इतिहास कोई न ढोता है और न बनाता है। अपने इतिहास से बाहर निकल रहा है कोलकाता,इतिहास द्वारा बार-बार पुकारा जाता हुआ भी। अकेले शहर कोलकाता में बांग्ला लेखकों के नाम पर जितने पुल,सड़कें और स्मारक हैं, दस राज्यों के हिंदी क्षेत्र में हिंदी साहित्यकारों के नहीं होंगे।
गंगा कोलकाता के इतने करीब बहती है, पर यह शहर भूल चुका है कि गंगा कहां से बहते हुए आती है। वह कभी विभाजित नहीं की जा सकी। उसकी छाती पर नावों की जगह अब बड़े-बड़े जहाज हैं। विलासिता पूर्ण क्रूज हैं — गंगा के फोड़े की तरह। फिर भी जेटी से अब भी कूदते हैं नंग-धड़ंग बच्चे। इन्हें नागार्जुन ने 1984 में हावड़ा के बिचाली घाट से चालीस कवियों के साथ देखा था– बाबा और चालीस कवि!
एक शहर तब मरता है जब बहसें अवरुद्ध हो जाती हैं और लोकतांत्रिक परिसर सिकुड़ जाता है, भले वह आसमान छूते हुए अपनी चौहद्दी का लगातार विस्तार करता जाए। कोलकाता में बहस अब अंग्रेजों के जमाने में बने सटर्डे क्लब, टालीगंज क्लब जैसी लाखों रुपयों की सदस्यता वाली जगहों पर सेलेब्रिटी व्यक्तियों के पैनेल डिस्कशन में खिलखिलाती है। वह वेशकीमती होती है — ग्लैमर भरी। आम तौर पर बहस वहीं संभव है, जहां संवाद बचा हो। अब हर झुंड में श्रोता बन कर आज्ञा पालन में खड़े लोग हैं। तर्क करने वाले को अकेले हो जाना होगा। कोलकाता तब जिंदा रहता है सिर्फ अकेलेपन की पीड़ाओं में और युवा कलरवों में!
कोलकाता ट्राम, हावड़ा पुल और विक्टोरिया मेमोरियल के लिए प्रसिद्ध रहा है और इन सबसे अधिक रवींद्रनाथ ठाकुर के लिए। उन्होंने कहा था, “हृदय भय शून्य हो और सिर हमेशा ऊंचा उठा रहे!”
कोलकाता में निर्भय होकर आत्मसम्मान के साथ आज भी जिया जा सकता है। कहा गया है, “यदि साफ और हरा-भरा शहर देखना हो दिल्ली को देखो। यदि अमीर और एक-दूसरे से बेखबर लोगों का शहर देखना हो तो मुंबई जाओ। यदि हाई-टेक शहर चाहिए तो तुम्हारे लिए बेंगलुरु है, पर यदि ऐसे शहर में जाना चाहते हो जहां आत्मा हो तो कलकत्ता आओ।” आज भी यदि अनजानों के बीच कोई मुसीबत में पड़ जाए, एक न एक अपरिचित का हाथ सहायता के लिए बढ़ जाता है। इस मानव भावना ने ही कोलकाता को जिंदा रखा है।
अमेरिका के कंसास शहर में जब एक अमेरिकी ने दो भारतीयों पर यह कह कर गोली चलाई, “तुम बाहरी हो,अमेरिका से निकल जाओ”, चौबीस साल का एक श्वेत अमेरिकी युवक उन्हें बचाने के लिए बंदूकधारी पर टूट पड़ा था। वह भी गोली से घायल हुआ। उस अमेरिकी युवा का भारतीयों से न मजहब का रिश्ता था और न देश का। यह मानव भावना ट्रंपवाद की जयजयकार के बावजूद संसार में बची है। इसके बिना संसार चल नहीं सकता। इसे सार्वभौमिकता कह कर कोई सभ्यता खोना नहीं चाहेगी। भारत के शहरों में भी “बाहरी” को लेकर घृणा इधर बढ़ी है, पर यह मानव भाव भी है। कोलकाता में भी यह है। यह भाव ही किसी शहर की आत्मा है।
नजीर अकबराबादी के “आदमीनामा” की लाइनें हैं, “यां आदमी पे जान को वारे है आदमी/ और आदमी पे तेग को मारे है आदमी/ पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी/ चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी/ और सुन के जो दौड़ता है वह भी आदमी।” शहर में चीख सुनने पर दौड़े आने की तमीज अभी बची है, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। अपनों की सहायता करने वाले तो हर जगह मिलते हैं। कोलकाता में सदियों की संस्कृति है, अपरिचितों के  विपत्ति में पड़ने पर भी किसी न किसी के अंदर मनुष्य भाव जग जाता है। एक बुरा और बदमाश  आदमी भी तब थोड़ी देर के लिए इन्सान बन जाता है
मेरा जीवन कोलकाता में बीता है। इसलिए मन ऐसा है, “जैसे उड़ि जहाज से पंछी पुनि जहाज पै आवै।” कोलकाता से मैं ज्यादा साल बाहर नहीं रह सका। दिल्ली-आगरा से एक दूसरे शिखर की ओर राह बनाने की जगह अपने घर लौट आया।
अब कोलकाता ऐसा शहर नहीं है, जहां सच के लिए जीने-मरने का पहले-सा जज्बा है। राजनैतिक संकीर्णताओं ने इस शहर में अजनबीपन का बोध बढ़ाया है, लोग मन मार कर  शांतिपूर्वक रहते हैं। आपस में दूरियां बढ़ी हैं, जिसके कारण सृजनात्मकता और विकास दोनों प्रभावित हुए हैं। परिवर्तन की जगह प्रतीकवाद आ गया है। यह “पोस्ट ट्रुथ” का समय है। हर तरफ झूठ की चमचमाहट है। महत्वाकांक्षाओं के लिए मानवीय संबंधों को रौंद डालने का नया रिवाज बन गया है। पहले जहां पेड़ के पक्षी भी पहचानते थे, वहां आसमान इतना सिकुड़ गया है कि अब संकरी होती गई गलियों में चांद दिखाई नहीं देता। भीड़ में लोग इतने बदल गए हैं कि अपनेपन की तलाश की जगह आशाओं में भटकती उदास आखें  होती हैं — कभी कुछ पातीं, कभी कुछ नहीं पातीं।
हर शहर ऐसे हो गए हैं जहां लोग शिवाजी और अफजल खां की तरह मिलते हैं। फिर भी हर शहर में कुछ ऐसा होता है जो मानव भाव को खत्म होने नहीं देता। इतिहास की तेजस्विता मनुष्य की अंत:शक्ति में छिपी होती है। कोलकाता तो मां की गोद की तरह है। यहां गंगा बहती है। इसका हृदय कितना विशाल है, इस पर कितने अधिक पुल हैं!
   ( हिन्दी मासिक ‘सबलोग’ के मार्च 2017   तथा अनहद में प्रकाशित)
(लेखक वरिष्ठ आलोचक, कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व प्रोफेसर तथा फिलहाल भारतीय भाषा परिषद के निदेशक हैं।)

भारत और जापान दोनों को कवि सूरदास से प्रेरणा लेने की जरूरत 

0

कोलकाता – जापान के हिंदी विद्वान प्रो. तेजी सकाता ने भारतीय भाषा परिषद में ‘ब्रज संस्कृति और सूरदास’ पर बोलते हुए कहा कि भारत और जापान शांतिप्रिय देश हैं और दोनों देशों की संस्कृतियाँ प्रेम और भाईचारे पर टिकी हैं। ब्रज संस्कृति ने इस देश में प्रेम का महान आदर्श एक ऐसे समय उपस्थित किया जब इसकी सबसे अधिक जरूरत थी। मैंने गोवर्धन की ब्रजभूमि की पूरी परिक्रमा पैदल की है और सूरदास से बहुत प्रभावित हूँ। वल्लभाचार्य की प्रेरणा से ही सूरदास ने अंधा होने के बावजूद कृष्ण के सौंदर्य का ऐसा वर्णन किया जो आँख वाले भी नहीं कर सकते।  रविप्रभा वर्मन ने उनसे संवाद करते हुए पूछा कि आखिरकार ब्रज संस्कृति ने उन्हें क्यों प्रभावित किया तो इसके जवाब में तेजी सकाता ने कहा कि उन्हें ब्रज भूमि ने ही भारत से प्रेम करना सिखाया। मुख्य अतिथि के रूप में बांग्ला के प्रमुख प्रकाशक सुधांशु शेखर दे ने अपने वक्तव्य में कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने सूरदास को अपनी एक कविता में नमन किया है। चैतन्य सूरदास से नौ साल छोटे थे और दोनों ने ही भारत में प्रेम का गान किया।

भारतीय भाषा परिषद विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद का मंच बन रही है, यह कोलकाता के लिए एक गौरव की बात है। परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने जापानी विद्वान तेजी सकाता का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी विश्‍व में ऐसे विद्वानों की वजह से प्रचारित और प्रसारित हो रही है। अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी ने तेजी सकाता के ब्रज प्रेम और सूरदास के उद्गारों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सूरदास ने कृष्ण भक्ति को प्रसारित करने में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। इस संवाद सभा का संचालन श्रीमती बिमला पोद्दार ने किया। मंच पर उपस्थित थे श्री राजीव लोचन कानोड़िया। परिषद के मंत्री नंदलाल शाह पुष्पगुच्छ से सभी अतिथियों का स्वागत किया।

श्वेता मेहता बनी एमटीवी के ‘रोडीज राइजिंग’ की विजेता

0

एमटीवी के रियलिटी शो रोडीज राइजिंग की विजेता श्वेता मेहता बन गई हैं। कई हफ्तों तक कड़ी मेहनत करने के बाद आखिरकार नेहा धूपिया की टीम की श्वेता मेहता रोडीज राइजिंग की विजेता बनी। बता दें कि श्वेता का मुकाबला प्रिंस नरुला टीम के बसीर अली से था।

झांसी से शुरू हुआ रोडीज का ये सफर ग्वालियर, आगरा, अमरोहा और पानीपत से होते हुए कुरुक्षेत्र में खत्म हुआ। श्वेता मेहता को विनिंग अमाउंट के तौर पर एक रेनॉल्ट डस्टर कार मिली और साथ ही 5 लाख रुपये इनाम में मिले।

28 साल की श्वेता मेहता एक इंजीनियर हैं। श्वेता जेराई वुमेन फिटनेस मॉडल चैंपियनशिप भी जीत चुकी हैं।

 

शानदार शतक के बाद रेलवे हरमनप्रीत को पदोन्नति देगा

0

मुंबई : स्टार बल्लेबाज हरमनप्रीत कौर का इंतजार पदोन्नति और सम्मान कर रहे हैं जिन्होंने आईसीसी महिला विश्व कप के सेमीफाइनल में आस्ट्रेलिया की बेहद मजबूत टीम के खिलाफ शानदार शतक जड़कर भारत को फाइनल में जगह दिलाई।
सेमीफाइनल में 28 साल की इस दायें हाथ की बल्लेबाज ने 115 गेंद में 171 रन की पारी खेली जिससे भारत ने गत चैंपियन आस्ट्रेलिया को हराकर फाइनल में प्रवेश किया जहां उसका सामना आज इंग्लैंड से होगा।

हरमनप्रीत के नियोक्ता पश्चिम रेलवे के मुंबई संभाग ने कहा है कि इस बल्लेबाज ने असाधारण प्रतिभा दिखाई इसलिए उनकी पदोन्नति की सिफारिश रेलवे बोर्ड से की जाएगी।

पश्चिम रेलवे के मुख्य पीआरओ रविंदर भाकर ने कहा, ‘‘निश्चित तौर पर हम पदोन्नति के लिए उसके नाम की सिफारिश रेल मंत्रालय को करेंगे। उसके वापस आने पर हम उसका सम्मान भी करेंगे।’’ उन्होंने बताया कि हरमनप्रीत फिलहाल मुंबई में चीफ आफिस सुपरीटेंडेंट हैं।

भाकर ने कहा, ‘‘जब भी हमारे खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं, हम उनके नाम की सिफारिश पदोन्नति के लिए करते हैं।’’ मध्य रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी और रेलवे की महिला क्रिकेट टीम चुनने वाली समिति के प्रमुख सुनील उदासी ने कहा कि रेलवे हमेशा अपने खिलाड़ियों का ख्याल रखता है और उन्हें उचित ट्रेनिंग मुहैया कराता है। उन्होंने बताया कि मौजूदा भारतीय राष्ट्रीय टीम में शामिल कप्तान मिताली राज, एकता बिष्ट, पूनम राउत, वेदा कृष्णमूर्ति, पूनम यादव, सुषमा देवी, मोना मेशराम, राजेश्वरी गायकवाड़ और नुजहत परवीन रेलवे से हैं।

 

रामनाथ कोविंद बनेगें देश के अगले राष्ट्रपति

0

नयी दिल्ली : राष्ट्रपति चुनाव में राजग के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने 65 फीसदी से अधिक वोट प्राप्त कर जीत दर्ज की। वह देश के 14वें राष्ट्रपति होंगे। वह 25 जुलाई को शपथ ग्रहण करेंगे।

राष्ट्रपति चुनाव के लिये निर्वाचन अधिकारी अनूप मिश्रा ने संवाददाताओं को बताया कि कोविंद को 65 . 65 प्रतिशत मत मिले जबकि विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 34.35 फीसदी वोट मिले। कोविंद ने करीब 31 प्रतिशत मतों के अंतर से मीरा कुमार को पराजित किया । 71 वर्षीय कोविंद दूसरे दलित नेता हैं जो इस शीर्ष संवैधानिक पद को सुशोभित करेंगे । कोविंद को 2930 मत प्राप्त हुए जिसका मूल्य 7,02,044 मत है। उनसे पूर्व के. आर नारायणन दलित समुदाय से देश के पहले राष्ट्रपति निर्वाचित हुए थे। कोविंद भाजपा के पहले सदस्य हैं जो राष्ट्रपति निर्वाचित हुए हैं।

मीरा कुमार भी दलित समुदाय से आती हैं और उन्हें 1844 मत प्राप्त हुए जिसका मूल्य 3,67,314 है।

कोविंद को 522 सांसदों के वोट मिले जिसका मूल्य 369576 है जबकि कुमार को 225 सांसदों के मत प्राप्त हुए जिसका मूल्य 159300 है।

राष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल में 4,896 मतदाता है जिसमें से 4,120 विधायक और 776 सांसद शामिल हैं। राष्ट्रपति चुनाव में रामनाथ कोविंद को 702044 मत और विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार को 367314 मत हासिल हुए हैं। रामनाथ कोविंद ने मीरा कुमार को 3.34 लाख मतों से हराया है।

राष्ट्रपति चुनाव में राज्यवार प्राप्त मतों के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में कोविंद को 22490 और मीरा कुमार को 18867, छत्तीसगढ़ में कोविंद को 6708 एवं मीरा कुमार को 4515, झारखंड में कोविंद को 8976 एवं मीरा को 4576, आंध्र प्रदेश में रामनाथ कोविंद को 27189 और मीरा कुमार को शून्य मत प्राप्त हुए ।

इसी प्रकार अरुणाचल प्रदेश में कोविंद को 448 एवं मीरा कुमार को 24, असम में कोविंद को 10556 एवं मीरा कुमार को 4060, गोवा में कोविंद को 500 एवं मीरा को 220, गुजरात में कोविंद को 19404 एवं मीरा को 7203 तथा हरियाणा में कोविंद को 8176 एवं मीरा को 1792 मत प्राप्त हुए । हिमाचल प्रदेश में कोविंद को 1530 मत एवं मीरा को 1887 मत, जम्मू एवं कश्मीर में कोविंद को 4032 एवं मीरा को 2160 मत प्राप्त हुए ।

रामनाथ कोविंद को 522 सांसदों का और मीरा कुमार को 225 सांसदों का समर्थन मिला जबकि 21 सांसदों के मत रद्द हो गये हैं।

 

फेडरर ने रिकॉर्ड आठवीं बार जीता विंबलडन

0

रिकॉर्डों के बेताज बादशाह स्विट्जरलैंड के स्टार टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर ने रिकॉर्ड आठवीं बार विंबलडन खिताब जीतकर इतिहास रच दिया है। तीसरी सीड फेडरर ने रविवार को खेले गए पुरुष एकल के फाइनल में क्रोएशिया के मारिन सिलिच को 6-3, 6-1, 6-4 से पराजित कर यह उपलब्धि हासिल की। फेडरर इस खिताब को आठ बार जीतने वाले विश्व के पहले खिलाड़ी बन गए हैं।

फेडरर ने ब्रिटेन के विलियम रेनशॉ (07) और अमेरिका के पीट सम्प्रास (07) को पीछे छोड़ दिया है। फेडरर के खाते में अब 19 ग्रैंड स्लैम खिताब हो गए हैं। विंबलडन को जीतने के लिए वर्ष के पहले ग्रैंड स्लैम ऑस्ट्रेलियन ओपन के बाद से ही रणनीति बनानी शुरू कर दी थी।

उन्होंने ऑस्ट्रेलियन ओपन के बाद खुद को क्ले कोर्ट सीजन से दूर रखा। उनका यह फैसला फायदेमंद साबित हुआ। बेहतरीन रिटर्न, बैकहैंड और तेज दिमाग के साथ फेडरर ने पहले सेट में सिलिच की दो बार सर्विस ब्रेक की। दूसरे सेट में सिलिच काफी थके और पिछड़ते नजर आए। जिसका फायदा फेडरर ने उठाया और दूसरा सेट आसानी से 6-1 से जीत लिया। फेडरर दो ग्रैंड स्लैम सहित पांच टूर्नामेंट इस सत्र में जीत चुके हैं।

खिताबी जीत के बाद फेडरर की रैंकिंग में भी इजाफा होगा। वह अब नंबर तीन पर पहुंच जाएंगे। 35 वर्षीय फेडरर खिताबी मुकाबला खेलने वाले दूसरे सबसे उम्रदराज खिलाड़ी बने। इससे पहले ऑस्ट्रेलिया के केन रोसवॉल ने 1974 में 39 साल की उम्र में फाइनल खेला था। हालांकि वह फाइनल में हार गए थे।

 

अब अनाज से बनी कटलरी का कीजिए इस्तेमाल

2

आंत्रेप्रेन्योर्स के बारे में कहा जाता है कि वे पुरानी समस्याओं का नया समाधान पेश करते हैं। हैदराबाद के  नारायण पीसापति के बारे में यह बात बिल्कुल सटीक बैठती है। इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट, हैदराबाद के पूर्व वैज्ञानिक पीसापति ने प्लास्टिक चम्मच, पत्तलों की जगह पर ऐसी कटलरी विकसित की है, जो पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ स्वास्थ के लिए भी नुकसानदायक नहीं है। आमतौर पर बाजार में बिकने वाली प्लास्टिक की कटलरी से पर्यावरण को भारी नुकसान होता है क्योंकि प्लास्टिक को डिस्पोज नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही इन कटलरी में परोसा जाने वाला खाना भी शरीर के लिए नुसकानदायक होता है। पीसापति ने इन प्लास्टिक कटलरी का अच्छा विकल्प पेश किया है।

इस चम्मच और प्लेट की खासियत यह है कि यह खाद्यान्न से बनी होने के साथ ही जल्दी नष्ट भी हो जाती है। इसका मतलब है कि खाना खाने के लिए इस छुरी, चम्मच और प्लेट का इस्तेमाल करने के बाद इन्हें भी खाया जा सकता है। नारायण इस तरह की डिस्पोजबल कटलरी करीब एक दशक से बना रहे हैं और जब विदेश से उनके पास इन्क्वॉयरी आई तो उन्हें ऐसा लगा कि उनकी कोशिश को अंतरर्राष्ट्रीय पहचान मिल गई है। 2016 के अप्रैल के महीने में नारायण पीसापति के पास कुछ ऐसी कारोबारी पूछताछ आई थी जिसमें उनसे खाना खाने में इस्तेमाल होने वाले छुरी, चम्मच और प्लेट की एक खास किस्म को फ्रांस और जर्मनी में आपूर्ति करने को कहा गया था।

नारायण बताते हैं, कि जब वह फील्ड विजिट पर होते थे तो उन्हें बाजरे की ठंडी रोटी से ही काम चलाना पड़ता था। तब उन्होंने यह महसूस किया कि यह लोगों को खाने के लिए भी सही रहेगा। इसके अलावा फ्लाइट और दूसरी जगहों पर दिया जाने वाला प्लास्टिक चम्मच बहुत साफ सुथरी और अच्छी कंडिशन में नहीं बनाया जाता, इसलिए इससे खाना खाने से बहुत से कैमिकल हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। नारायण ने 2006 में इडिबल कटलरी के बारे में सोचा। उनके दिमाग में सबसे पहले यह बात आई कि बाजरा बहुत ही पौष्टिक है। एक ऐसा तत्व जो नेचुरल और फायदेमंद हैं और जो खेती में इस्तेमाल होता है। इसके बाद उन्होंने इससे कटलरी बनाने का फैसला किया।

 

नारायण की कंपनी बेकीस को देश के भीतर और बाहर से पहले से ही 2.5 करोड़ चम्मच और दूसरी तरह की कटलरी की आपूर्ति के ऑर्डर मिल चुके हैं। 2016 में जून के महीने में उनकी कंपनी ने खाने योग्य कटलरी के उत्पादन का पूर्ण स्तर हासिल कर लिया। इसकी वजह से उनकी कंपनी का दैनिक उत्पादन स्तर बढ़कर 50 हजार यूनिट हो गया है।

नारायण के दावे के मुताबिक वह खाने लायक कटलरी का व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन करने वाले पहले उद्यमी हैं। लेकिन इस साधारण से दिखने वाले नई तरह के उत्पाद को लोगों की स्वीकार्यता हासिल करने में अच्छा खासा वक्त लग गया। नारायण ने कहा कि उनकी खास कटलरी बायो-डिग्रेडेबल प्लास्टिक और लकड़ी से बने डिस्पोजबल कटलरी की तुलना में सस्ती पड़ती है और इसकी कीमत 2.75 रुपयेप्रति इकाई पड़ती है। नारायण कहते हैं कि ‘हालांकि कोटेड प्लास्टिक से बने तथा चांदी के चम्मच की तरह दिखने वाली कटलरी और सस्ते प्लास्टिक से बने उत्पाद अब भी हमारी कटलरी से सस्ते हैं। अगर मैं खाने योग्य कटलरी के दाम को एक रुपये प्रति इकाई के स्तर तक ले आता हूं तो मेरी कटलरी कोटेड प्लास्टिक से भी सस्ती हो जाएगी।’

अब जरा यह जान लेते हैं कि वह ऐसी कटलरी बनाते कैसे हैं, जिसे बाद में खाया भी जा सके। दरअसल वह खास तरह की कट्लरी बनाने के लिए ज्वार, चावल और गेहूं के आटे के मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं। उनकी इस खोज का उद्देश्य बड़ा है और बाजार की जरूरतों के साथ अर्थशास्त्र के पूरी तरह तालमेल बिठाने पर ही उसे हासिल किया जा सकता है। नारायण इसके बारे में विस्तार से बताते हैं। वह कहते हैं, ‘आखिर किसी समारोह में यह कौन तय करता है कि खाने के लिए किस तरह की डिस्पोजबल कटलरी का इस्तेमाल किया जाएगा? यह खाना मुहैया कराने वाला वेंडर होता है और उसके लिए कीमत बहुत बड़ा फैक्टर होता है। इसलिए हमें इस मोर्चे पर लड़ाई लडऩी होगी।’

नारायण ने बेकिंग में इस्तेमाल होने वाले हीटर ब्राजील चीन से मंगवाए हैं। वह अपने उत्पादन स्तर को बढ़ाकर लागत मूल्य में कटौती करना चाहते हैं ताकि प्लास्टिक कटलरी की चुनौती का मुकाबला कर सकें।

हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट के शोधछात्र रहे नारायण ने वर्ष 2007 में प्लास्टिक कट्लरी के बढ़ते इस्तेमाल से निपटने के लिए यह नायाब उपाय पेश किया था। लेकिन इस उत्पाद को इस्तेमाल के दौरान टूटने से बचाने लायक बनाने में लंबा वक्त लग गया। उन्होंने खाने योग्य कटलरी के विकास में संतोषजनक स्तर हासिल करने के बाद वर्ष 2010 में बेकीस फूड्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी की स्थापना की। नारायण की बनाई हुई अनूठी कटलरी मसालेदार से लेकर मीठे स्वाद में भी उपलब्ध है और इसमें पौष्टिकता भी है। उन्होंने चीनी, अदरक और काली मिर्च का इस्तेमाल कर इसे स्वादिष्ट भी बनाने की कोशिश की है। इस कटलरी को तैयार करने के बाद ऊंचे तापमान पर सेंका जाता है। पूरी तरह सूखने के बाद इस तकनीक से बने चम्मच और छुरी-कांटे इतने सख्त हो जाते हैं कि गर्म सूप और दूसरे पेय पदार्थ के साथ भी उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। नारायण के कांटे-चम्मच कम-से-कम 20 मिनट तक तो आपका साथ दे ही देंगे।

नारायण बताते हैं कि देश भर में हर साल प्लास्टिक से बने करीब 120 अरब चम्मच और प्लेट इस्तेमाल करने के बाद फेंक दिए जाते हैं। दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक चम्मच और प्लेट की संख्या के बारे में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए उन्होंने हैदराबाद के चेरलापल्ली में पूरी तरह ऑटोमेटिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का भी डिजाइन तैयार किया है। अब उनके कर्मचारियों को केवल मशीन में मिश्रण की लोई बनाकर डालनी होती है और कई मशीनों से गुजरते हुए कटलरी पूरी तरह तैयार हो जाती है। अब वह पैकेजिंग के काम को भी पूरी तरह स्वचालित बनाने की तैयारी कर रहे हैं।

नारायण को अपने उत्पाद को बेचने के लिए ज्यादा जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद जिस तरह के उपभोक्ताओं के सामने रखना है वो पहले से ही जागरूक हैं। उनका अगला लक्ष्य तो केएफसी और मैकडॉनल्ड की तरह फूड चेन स्थापित करने का है।

नारायण ने बेकिंग में इस्तेमाल होने वाले हीटर ब्राजील चीन से मंगवाए हैं। वह अपने उत्पादन स्तर को बढ़ाकर लागत मूल्य में कटौती करना चाहते हैं ताकि प्लास्टिक कटलरी की चुनौती का मुकाबला कर सकें। नारायण ने कुछ महीनों पहले वेल्लूर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक कार्यक्रम में अपने मकसद का उल्लेख किया था। दरअसल वह चाहते हैं कि ज्वार और जौ से बनी कटलरी की मांग बढऩे से चावल की मांग में थोड़ी गिरावट आए।

धान की फसल के लिए ज्यादा पानी की जरूरत होती है और अगर उसकी मांग घटती है तो उसकी बुआई के रकबे में भी कमी आएगी। नारायण को अपने उत्पाद को बेचने के लिए ज्यादा जद्दोजहद करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उन्हें अपने उत्पाद जिस तरह के उपभोक्ताओं के सामने रखना है वो पहले से ही जागरूक हैं। उनका अगला लक्ष्य तो केएफसी और मैकडॉनल्ड की तरह फूड चेनस्थापित करने का है।

वह पैराडाइज बिरियानी हैदराबाद और आसिफी बिरियानी चेन्नई और कुछ अन्य कॉर्पोरेट हाउसेज से बात कर रहे हैं ताकि वह कटलरी की सीधे आपूर्ति कर सकें। इन कटलरीज को वह अपने कंपनी की वेबसाइट के जरिए बेचते हैं। इसके अलावा वह समय-समय पर एग्जिबिशन भी लगाते हैं। नारायण की पत्नी प्रग्न्या पीसापति बेकीस कंपनी की डारेक्टर हैं। नारायण कहते हैं, ‘प्रग्न्या का शुरू से ही पूरा सपोर्ट मिलता रहा और इसी वजह से उन्होंने सफलता हासिल की।’

नारायण की एक बेटी भी है जो कनाडा में मैथमैटिक्स की पढ़ाई कर रही है। नारायण जैसे लोगों की ऐसी मुहिम पर्यावरण को बचाने के लिए काफी सराहने योग्य है।

 

(साभार – योर स्टोरी)

प्रणब मुखर्जी : राष्ट्रपति भवन में छोड़ जायेंगे यादों का खजाना

0

नयी दिल्ली ः दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी एक अनकही प्रगाढ़ता साझा करते हैं सिर्फ लाक्षणिकता के लिये ही नहीं वास्तविक रूप में।

कहा जाता है कि यह मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव सा था कि कोई बाहरी उनसे वह जानकारी निकलवा सके जिसका वे खुलासा नहीं करना चाहते।

पत्रकार और राष्ट्रपति के लंबे समय से मित्र रहे जयंत घोषाल 1985 से उन्हें जानते हैं और प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी) और उनके वित्त मंत्री (प्रणब मुखर्जी) के बीच अटूट विश्वास को याद करते हुये कहते हैं, ‘‘यहां तक कि श्रीमती गांधी भी कहती थीं , ‘कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई कितनी शिद्दत से कोशिश करता है, वह प्रणब के मुंह से कभी एक शब्द बाहर नहीं निकलवा सकता। वे सिर्फ प्रणब की पाइप से आता हुआ धुंआ देख सकते हैं।’’’ भारत के 13वें राष्ट्रपति के तौर पर वह कल अपने उत्तराधिकारी राम नाथ कोविंद के लिये राष्ट्रपति भवन छोड़ेंगे। इस मौके पर पुराने दोस्त उनके लंबे राजनीतिक जीवन कई अहम पड़ावों को बेहद चाव से याद करते हैं।

कहा जाता है कि धूम्रपान छोड़ने के बाद भी मुखर्जी का अपनी पाइप के प्रति लगाव कम नहीं हुआ।

घोषाल ने बताया, ‘‘उन्होंने कभी सिगरेट नहीं पी, सिर्फ पाइप। स्वास्थ्य कारणों से जब उनसे धूम्रपान छोड़ने के लिये कहा गया, तो उसके बाद से वह धूम्रपान भले ही न करें लेकिन बिना किसी निकोटिन के अपने मुंह में पाइप रखते थे, और उसे चबाते रहते थे ताकि उसे महसूस कर सकें।’’ विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों और विदेशी हस्तियों द्वारा तोहफे में प्रणब दा को 500 से ज्यादा पाइप मिली थीं और उन्होंने यह पूरा संग्रह राष्ट्रपति भवन संग्रहालय को दान दे दिया।

घोषाल कहते हैं कि उनका पहला पाइप उन्हें असम के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता देबकांत बरूआ ने दिया था।

पत्रकार ने कहा कि वह पहली बार 1985 में प्रणब से दक्षिण कलकत्ता के सदर्न एवेन्यू स्थित उनके घर पर मिले थे। उस वक्त घोषाल बांग्ला दैनिक बर्तमान में जूनियर रिपोर्टर थे।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शिवराज पाटिल ने लंबे समय तक अपने सहयोगी रहे मुखर्जी को एक ऐसा शख्स बताया जो ‘‘देश की राजनीति और अर्थशास्त्र को श्रेष्ठ संभव तरीके से जानता है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘वह संसद में सबसे वरिष्ठ सदस्यों में से एक रहे और यह बेहद अच्छी तरह जानते थे कि किस तरीके से एक मंत्री को आचरण करना चाहिये। वह जानते थे कि बिना सरकार के लिये परेशानी खड़ी किये संविधान की सुरक्षा कैसे करनी है।’

V

जया को मिला सर्वश्रेष्ठ महिला सांसद का सम्मान, खुश हुए बिग बी

0

मुंबई : मेगास्टार अमिताभ बच्चन ने आज अपनी पत्नी, अभिनेत्री और सांसद जया बच्चन को सर्वश्रेष्ठ महिला सांसद (राज्यसभा) चुने जाने की बधाई दी ।

जया बच्चन को भारत सरकार ने दिल्ली के विज्ञान भवन में सम्मानित किया।

बच्चन ने कई ट्वीट करते हुए कहा, “जया को आज सर्वश्रेष्ठ महिला संसद का अवॉर्ड मिला। यह क्षण हम सभी के लिए गर्व करने लायक है।” ‘पिंक’ अभिनेता ने संसद सदस्य के तौर पर जया की प्रतिबद्धता और सहभागिता की प्रशंसा की।

बच्चन ने लिखा, “अगर काम गहरे विश्वास और ईमानदारी से किया जाए तो अपनी प्रशंसा करने या ब्रांडिंग करने की जरूरत नहीं पड़ती है। काम बोलता है…और जो काम का मूल्य समझते हैं ,वह इसे संज्ञान में लेते हैं।”

 

जनधन खातों में जमाराशि 64,564 करोड़ रुपये तक पहुंची

0

नयी दिल्ली,: सरकारी आंकड़ों के अनुसार जन धन खातों में जमा राशि 64,564 करोड़ रुपये की नयी ऊंचाई पर पहुंच गयी है और इसमें से 300 करोड़ रुपए तो नोटबंदी के पहले सात महीने में ही जमा किए गए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख योजनाओं में एक समझी जाने वाली प्रधानमंत्री जन धन योजना वित्तीय समावेशन की प्रमुख पहल है। इसका उद्देश्य अब तक बैंकिंग सेवाओं से वंचित लोगों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली के दायरे में लाना है।इस योजना के तहत शून्य शेष सुविधा वाले खाते खोले जाते हैं।

पीटीआई भाषा के संवाददाता द्वारा दाखिल आरटीआई आवेदन पर वित्त मंत्रालय ने यह जानकारी दी है। इसके अनुसार 14 जून, 2017 तक 28.9 करोड़ जनधन खाते थे। इनमें से 23.27 करोड़ खाते सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जबकि 4.7 करोड़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों में और 92.7 लाख निजी बैंकों में हैं।

मंत्रालय का कहना है कि इन खातों में कुल 64,564 करोड़ रुपये जमा है। उनमें 50,800 करोड़ रुपये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के जनधन खातों में हैं जबकि 11,683.42 करोड़ रुपये क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और 2,080.62 करोड़ रुपये निजी बैंकों में हैं।

सोलह नवंबर, 2016 तक इस योजना के तहत 25.58 करोड करोड़ खाते खुलवाए गए थे जिनमें 64,252.15 करोड़ रुपये थे। वित्त राज्य मंत्री संतोष गंगवार ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी थी।

यानी सोलह नवंबर, 2016 से लेकर 14 जून, 2017 के बीच करीब 311.93 करोड़ रुपये जमा कराये गये। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल आठ नवंबर को 500 और 1000 रुपये के मौजूदा नोटों का चलन बंद करने की घोषणा की थी।