Thursday, March 26, 2026
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तिरंगे के सम्मान के लिए एक अकेले की अमेजन से जंग

दुनिया की सबसे बड़ी ई-कॉमर्स शॉपिंग वेबसाइट अमेजन के मालिक जो कि दुनिया के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति भी हैं। उन्होंने कहा था, “सही मायनों में उपभोक्तावाद का मतलब है, सबसे खराब हालत में भी लोगों से वो चीजें खरीदवा लेना जिससे उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं होता।”

ऐसा कहा भी गया है कि आप जैसा सोचते हैं, कहते हैं वैसा ही करते भी हैं। ठीक ऐसा ही कुछ अमेजन के साथ हो रहा है। अमेजन की यूके, कनाडा और जर्मनी की वेबसाइटों पर इंडियन नेशनल फ्लेग के डिजाइन वाले प्रोडक्ट सरे आम बेचे जा रहे हैं। कुत्ते के पट्टे से लेकर तिरंगे के स्टीकर सहित डोरमेट तक बेचे जा रहे हैं। शायद अमेजन को इस बात का इल्म न हो कि भारत में हम तिरंगे का सिर्फ सम्मान ही नही करते बल्कि इससे हमारी भावनाएं भी जुड़ी होती हैं।

जनवरी की बात है। हैदराबाद के अभिषेक जगिनि, जो कि पब्लिक पॉलिसी और गुड गवर्नेंस के वकील हैं। उन्होंने अमेजन इंडिया की वेबसाइट पर बेचे जा रहे इंडियन तिरंगे के निशान वाले डॉग टैग और डोरमेट की ओर पूरे देश का ध्यान खींचा जब उन्होंने इस बाबत सुषमा स्वराज सहित कनाडा के प्रधानम मंत्री जस्टिन ट्रडवे को टैग करते हुए ट्ववीट लिखे। ट्ववीट में अभिषेक जगिनि ने अमेजन पर बेची जा रही इंडियन नेशनल फ्लैग को लेकर आपत्ती जताई थी।

इसके बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कनाडा हाई कमीशन को ट्वीट लिखते हुए, हर जरूरी एक्शन लेने को कहा था। साथ ही साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अमेजन को ये धमकी भी दी थी कि अगर जल्द से जल्द ये प्रोडक्ट साइट से नहीं हटाए गए तो अमेजन के किसी भी एम्पलॉई को इंडियन वीजा नहीं दिया जाएगा।  जिसके बाद अमेजन इंडिया के हेड और वाइस प्रेसिडेंट अमित अग्रवाल ने ट्वीट का जवाब देते हुए ये कहा था कि किसी भी देश के नेशनल फ्लैग का अपमान करने का हमारा कोई इरादा नहीं था और साइट पर बेचे जा रहे इन प्रोडक्ट के लिए थर्ड पार्टी को जिम्मेवार बताया था। लेकिन इसके बाद शायद फिर अमेजन ने इस ओर ध्यान दिया ही नहीं।

इस बारे में बात करते हुए एक मीडिया हाउस से बात करते हुए अभिषेक ने कहा कि, “अमेजन द्वारा दी गई शुरुआती सफाई कुछ और नहीं बल्कि आंखों में धूल झोंकने की कोशिश थी।”

भारतीय कानून के तहत अमेजन है गुनहगारः अपनी विदेशी वेबसाइटों पर इस तरह के प्रोडक्ट बेच कर अमेजन कई कानून तोड़ रहा है लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या भारतीय न्यायालय को इस मामले में सुनवाई करने का अधिकार है?

उदाहरण के लिए, राष्ट्र सम्मान रक्षा कानून,1971 के सेक्शन-2 के तहत  तीन साल के कैद की सजा है। इसमें बताया गया है कि जो कोई भी किसी सार्वजनिक स्थल में या किसी अन्य जगह पर तिरंगे का अपमान करता है उसे 3 साल तक की सजा हो सकती है। इसके अलावे फाइन भी चार्ज किया जा सकता है। इतना ही नहीं फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, 2002 के मुताबिक भारतीय राष्ट्रीय झंडे की स्वीकृत आकार की सूची  भी दी गई है। इसके साथ ही इसके व्यावसायिक इस्तेमाल पर भी रोक की बात की गई है।

अभिषेक ने फिर से कर ली है तैयारीः पेशे से वकील और ‘द सागा ऑफ तेलंगाना’ के लेखक  अभिषेक ने इस बार बड़े स्तर पर अमेजन को घेरने की तैयारी कर ली है। अभिषेक इस मामले को अब नेशनल लेवल पर विदेश मंत्रालय के सामने लाएंगे।
उन्होंने कहा कि, “मैं इस बाबत विदेश मंत्रालय को एक मेमोरेंडम सबमिट करूंगा और उन्हें बताउंगा कैसे अमेजन हमारे राष्ट्रीय झंडे का अपमान कर रहा है।”
सच कहा गया है अगर आपमें कुछ बदलने का जज्बा हो तो आपके अकेले की लड़ाई भी बड़ा बदलाव ला सकती है।

 जब मर्केल ने सऊदी अरब में नहीं रखा सिर पर स्कार्फ

सऊदी अरब में महिलाओं के लिए ड्रेस कोड बना हुआ है। यहां महिलाओं की पोशाक ऐसी होनी चाहिए, जिसमें उनका पूरा शरीर यानी कि सिर से पांव तक ढका हो। यहां तक कि सऊदी अरब में पश्च‍िमी देशों से आने वाली महिलाएं भी इस नियम का पालन करती हैं।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी अमेरिका की फर्स्ट लेडी मिशेल ओबामा को भी सऊदी अरब में सिर पर स्कार्फ बांधे देखा गया। यही नहीं पश्च‍िमी देशों की कद्दावर नेताओं की फेहरिस्त में शामिल हिलेरी क्लिंटन और ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने भी यहां अपने सिर पर स्कार्फ रखा।

अपने देश में बुर्के पर पाबंदी लगाने के दौरान मर्केल ने कहा था कि यह उनके देश में बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है, और जहां भी संभव हो सके, वहां पर इस पर बैन लगना चाहिए। ऐसे में एंजेला का सिर पर स्कार्फ रखना उनके अपने ही फैसले पर सवालिया निशान उठा सकता था।पर मिशेल ओबामा की तरह जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने ऐसा कुछ नहीं किया। वो सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन नयफ अरब से मिलीं पर इस्लामी अदब के विपरीत उन्होंने अपने सिर पर स्कार्फ नहीं रखा था। थोड़ी ही देर में यह बात सऊदी अरब की मीडिया में फैल गई और लोग हैरान होने लगे।
दरअसल, एंजेला मर्केल दुनिया की उन कुछ नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने अपने देश में बुर्का प्रतिबंधित कर दिया है। एंजेला मर्केल के अनुसार बुर्का पहनना या सिर से पांव तक ढके रहने का रिवाज उनके जर्मन संस्कृति में नहीं है, इसलिए वो अपनी संस्कृति के विरुद्ध नहीं जा सकतीं।

एंजेला मर्केल का यह कदम दुनियाभर के उन देशों के लिए सबक है, जो महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर उनके अस्त‍ित्व पर ही सवालिया निशान उठाते हैं। भीड़ से अलग चलने वाली मर्केल नारी सशक्त‍िकरण में पूर्ण यकीन रखती हैं और ये मानती हैं कि महिलाओं को अपनी शर्तों पर जीने का अध‍िकार है।

एंजेला मर्केल उन शर्णार्थ‍ियों के लिए मदद मांगने सऊदी अरब पहुंची थीं, जो हाल ही में सीरिया, इराक, लीबिया, अफगानिस्तान आदि से यूरोप पहुंचे हैं।

 

मणिपुर में जब छात्राओं ने यूं खींच ली कीचड़ में फंसी बस

लड़कियां किसी भी मामले में कम नहीं हैं, इसका उदाहरण सोशल मीडिया पर वायरल हो रही ये एक तस्‍वीर है। दरअसल ये तस्‍वीर मणिुपर के स्‍कूली छात्राओं की है। हुआ ये कि इनकी स्‍कूल बस कीचड़ में फंस गई. जब लाख कोशिशों के बाद बस, टस से मस नहीं हुई तो छात्राओं ने एक अनूठा प्रयास किया। सभी ने बस से नीचे उतरकर लाइन बनाई और बस को इस तरह से खींचकर कीचड़ से बाहर निकाल लिया।

इस तस्‍वीर को पोस्‍ट करने वाली Lawai BemBem ने कहा है, ‘मणिपुर में छात्राएं स्‍टडी के लिए लोकटक लेक जा रही थीं और बस कीचड़ में फंस गई.’ गौरतलब है कि ये मामला 26 अप्रैल का है।इस घटना की एक तस्‍वीर ट्विटर पर पोस्‍ट होते ही ये वायरल होने लगी। ट्विटर पर फिलहाल इस तस्‍वीर को 3600 से अधिक लाइक्‍स मिल गए हैं और दो दिन के भीतर 3 हजार से अधिक बार इसे रिट्वीट किया गया है।

 

चलती ट्रेन में प्रसव करा हीरो बना मेडिकल का यह विद्यार्थी

म मेडिकल पढ़ रहे विपिन खडसे, ट्रेन की जनरल बोगी में एक महिला के प्रसव में मदद कर हीरो बन गए हैं। हालांकि ये बेहद मुश्किल था क्योंकि प्रसव में काफी जटिलताएं थीं। लेकिन एक महीने पहले ही इंटर्नशिप शुरू करने वाले विपिन के पास किस्मत से सर्जिकल ब्लेड और पट्टियां थीं। इसके अलावा वो व्हाट्सऐप पर अपने कॉलेज के रेजिडेंट डॉक्टर्स के सम्पर्क में थे जिन्होंने मुश्किल प्रसव के दौरान उनकी मदद की। 24 साल के विपिन खडसे ने इस घटना के बारे में बीबीसी को विस्तार से बताया।

विपिन की कहानी उन्हीं की जुबानी-

मैं सात अप्रैल को अपने घर अकोला से नागपुर ट्रेन से जा रहा था। वर्धा जंक्शन के बाद चेन खींच कर ट्रेन रोकी गई थी। पता चला कि एक महिला को प्रसव होना था, लेकिन इसमें दिक्कत के चलते महिला की हालत खराब हो गई थी। उसके रिश्तेदार और टिकट चेकर डॉक्टर की तलाश कर रहे थे। मैं इस उम्मीद में चुप रहा कि उन्हें कोई अधिक अनुभवी डॉक्टर मिल जाएगा, मैंने इससे पहले कोई डिलीवरी कराई नहीं थी बस एमबीबीएस कोर्स में प्रैक्टिकल के दौरान देखा था। लेकिन जब पूरी ट्रेन में उन्हें कोई नहीं मिला तो मैंने मदद करने का फैसला किया क्योंकि आम तौर पर डिलीवरी सामान्य ही होती है। हम स्लीपर कोच से सुबह दस बजे जनरल बोगी में गए, जहां बर्थ पर लेटी महिला को भीड़ घेरे हुए थी और गर्मी के मारे उसका बुरा हाल था। वो बार-बार बेहोश हो जा रही थी। असल में शिशु के सिर की बजाय कंधा बाहर आ रहा था। इस स्थिति को चिकित्सा विज्ञान में शोल्डर प्रजेंटेशन कहा जाता है जिसमें बच्चा बाहर नहीं आ पाता है और जच्चा-बच्चा दोनों के लिए खतरा रहता है।

व्हाट्सऐप से डॉक्टरों ने की मदद

मैं बहुत ज्यादा घबरा गया था क्योंकि जिंदगी में पहली बार ऐसी स्थिति का सामना कर रहा था। उस समय मेरे पास सर्जिकल ब्लेड, एक रोल बैंडेज और मेडिकल दस्ताने थे क्योंकि इंटर्नशिप के दौरान स्टूडेंट को इन चीजों को अपने साथ रखना होता है। हालात बहुत मुश्किल थे क्योंकि शोल्डर प्रजेंटेशन वाली डिलीवरी मैंने कभी देखी नहीं थी। ऐसी स्थिति में मैंने गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज नागपुर के स्त्रीरोग विभाग के सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों को फोन किया। उन्होंने मुझे व्हाट्सऐप के जरिए मदद की, उनमें से कुछ ने मुझसे तस्वीरें मंगाईं और फिर मुझे बताया कि इस स्थिति में क्या-क्या करना है।उन्होंने मुझे एक छोटा का कट लगाने को कहा जिसे एपिसियोटॉमी कहा जाता है। इसमें हाथ से शिशु को सीधा किया जाता है और फिर निकाला जाता है। उस समय मैं बहुत घबरा गया था क्योंकि यह बहुत रिस्की था, लेकिन मेरे पास स्टेराइल दस्ताने, कॉटन रोल बैंडेज और ब्लेड था। अगले स्टेशन पर मेडिकल सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन अभी उसे आने में बहुत समय था, इसलिए मैंने जोखिम उठाने का फैसला किया।

सर्जरी में तीन महिला यात्रियों ने की मदद

महिला की स्थिति ठीक नहीं थी और बहुत सारा पानी शरीर से निकल चुका था इसलिए उसे बीच-बीच में पानी पिलाया जा रहा था। इसके अलावा रेजिडेंट डॉक्टर्स फोन पर लगातार मुझसे बात कर रहे थे। एक महिला यात्री को डिलीवरी कराने का कुछ अनुभव था। जब मैं कट लगा रहा था तो दो महिलाएं अपनी उंगलियों से वजाइना को दोनों तरफ चौड़ा करने की कोशिश कर रही थीं और एक महिला शिशु को बाहर निकालने की कोशिश कर रही थी। किसी तरह हम शिशु को बाहर निकालने में सफल हो गए। लेकिन एक तो खासी गर्मी पड़ रही थी, दूसरे जनरल बोगी थी और उमस भी काफी थी।

नवजात की सांस नहीं चल रही थी

ऐसी स्थिति में नवजात बच्चा ठीक से सांस नहीं ले पा रहा था। पैदा होने के बाद वो रोया भी नहीं था। मैंने तुरंत शिशु विशेषज्ञ डॉक्टर को कॉल किया तो उन्होंने बच्चे की पीठ पर थपकी देने और उसके गले में फंसी चीजों को साफ करने की सलाह दी। आखिरकार रुक-रुक कर सांस लेने के बाद उसकी सांस सामान्य चलने लगी। बच्चे को बाहर निकालने के बाद मैं महिला का खून बहने से रोकने की कोशिश कर रहा था। बच्चे के सांस चलने पर मेरा ध्यान नहीं गया था। मैंने स्टेराइल रोल बैंडेज और ट्रेनों में मिलने वाली ठंडी पानी की बोतलों से खून रोकने में कामयाबी हासिल की। जब खून बंद हुआ तब देखा कि बच्चे की सांस बहुत रुक-रुक कर चल रही थी। सबसे ज्यादा राहत तब मिली जब प्रसव हो गया और बच्चा भी सांस लेने लगा। उस समय पूरे कम्पार्टमेंट के लोग एक परिवार की तरह काम कर रहे थे, मुझे किसी चीज की जरूरत होती थी वो मुझे तुरंत मुहैया की जा रही थी। नागपुर स्टेशन पर एम्बुलेंस और डॉक्टर की टीम खड़ी थी और जैसे ही ट्रेन रुकी जच्चा-बच्चा को एम्बुलेंस में ले जाया गया, महिला को तुरंत ड्रिप चढ़ाई गई।खुशी के इस माहौल में नवजात के पिता ने आकर मेरे हाथ पर 101 रुपये रख दिए। जब मैंने अपने कॉलेज के रेजिडेंट डॉक्टर्स को सूचना दी तो उन्होंने जश्न मनाना शुरू कर दिया। मेरे टीचर ने शोल्डर प्रजेंटेशन जैसे जटिल प्रसव को सफल तरीके से कराने के लिए मेरी सराहना की और बधाई दी।

इसलिए किया डॉक्टर बनने का फैसला…

विपिन ने इसे साथी यात्रियों, महिलाओं, डॉक्टरों, रेलवे कर्मचारियों और मदद करने वाले सभी लोगों की कामयाबी बताया। हालांकि उसके बाद उस परिवार से दोबारा सम्पर्क नहीं हो पाया, लेकिन वहां के कुछ जानने वालों ने उन्हें फोन कर बधाई दी। विपिन बताते हैं कि उनके पिता किसान हैं और उनके इलाके में डॉक्टर बहुत कम हैं, इसीलिए इस पेशे में आने का उन्होंने फैसला किया। एक साल की इंटर्नशिप के बाद उन्हें एमबीबीएस की डिग्री मिल जाएगी और वो पेशेवर डॉक्टर हो जाएंगे।

 

के विश्वनाथ को दादा साहेब फाल्के पुरस्कार

नयी दिल्ली : जानेमाने फिल्मकार के विश्वनाथ को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 64वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

विश्वनाथ तेलगु सिनेमा के अलावा तमिल और हिंदी फिल्मों में भी प्रख्यात शख्सियत हैं।

87 वर्षीय विश्वनाथ फाल्के पुरस्कार पाने वाले 48वें व्यक्ति हैं। इस पुरस्कार में स्वर्ण कमल, 10 लाख रूपये की पुरस्कार राशि और एक प्रशस्ति पत्र शामिल है।

भावुक विश्वनाथ के साथ उनकी पत्नी जया लक्ष्मी भी समारोह में मौजूद थी। उन्होंने अपने माता-पिता और प्रशंसकों का धन्यवाद अदा किया।
मुखर्जी ने कहा, ‘‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मिलने पर मैं के विश्वनाथ को बधाई देता हूं और फिल्म उद्योग, राष्ट्रीय एकता, अखंडता और शांति का दृढ़ संदेश देने में उनके योगदान के लिए उनका धन्यवाद अदा करता हूं।’’ सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम वेंकैया नायडु ने कहा कि विश्वनाथ की खासियत यह है कि वह हिंसा, अश्लीलता और लड़ाई झगड़े से रहित मनोरंजक फिल्में बनाते हैं।
विश्वनाथ ने संकरभरनाम, सागर संगमम, स्वाति मुत्याम, सप्तापड़ी, कामचोर, संजोग, जाग उठा इन्सान जैसी पुरस्कार विजेता फिल्मों का निर्देशन किया है। उन्हें वर्ष 1992 में पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका है। इसके अलावा पांच राष्ट्रीय पुरस्कार, 20 नंदी पुरस्कार :आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा : , दस फिल्मफेयर ट्रॉफी मिल चुकी हैं।

 

एसडीएम ने दिया आइडिया और 14 साल की लड़की बनी प्रिंसिपल

झारखंड में एक उच्च प्राथमिक स्कूल में 14 साल की लड़की को प्रिंसिपल बनाया गया। मामला सिंहभूम के दुरकु गांव का है। यहां प्रियंका मुरमू नाम की लड़की को शनिवार को स्कूल का प्रिंसिपल बनाया गया।

बच्ची को प्रिंसिपल बनाने का आइडिया उप जिलाधिकारी संजय कुमार पाण्डेय का था।

इस लड़की को केवल एक दिन के लिए स्कूल का मानद प्रिंसिपल बनाया गया था। सुबह स्कूल पहुंचने के बाद स्कूल के प्रिंसिपल सुनील यादव और गांव के प्रधान लक्ष्मी चरण सिंह प्रियंका को प्रिंसिपल चैंबर तक ले गए। इसके बाद वो प्रिंसिपल की कुर्सी पर बैठी। वो सुबह की प्रार्थना में प्रिंसिपल के तौर पर ही शामिल हुई।

छात्रों को संबोधित करते हुए प्रियंका ने कहा कि शिक्षक और छात्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास समाज में सुधार लाने में सफल रहे हैं।

इसके अलावा प्रियंका ने सभी कक्षाओं का दौरा किया और साथ ही मिड डे मिल की तैयारी का जायजा लिया और छात्रों को परोसे जाने से पहले खुद भोजन चखा। बता दें कि प्रियंका फिलहाल दसवीं क्लास की छात्रा है।

प्रियंका ने बताया कि एक दिन के लिए स्कूल प्रिंसिपल बनने से वो खुश है। वो कड़ी मेहनत करेगी और एक दिन असली स्कूल प्रिंसिपल बनेगी।

(तस्वीर – प्रतीकात्मक)

आईजी दफ्तर के बाहर पत्नी ने पति को कहा तीन बार तलाक, मांगा बराबरी का हक

मेरठ – तीन तलाक का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है, मेरठ में बुधवार को फिर एक नया मामला सामने आया है। थाना भावनपुर क्षेत्र के नरहाडा गांव निवासी अमरीन और फरीन पुत्री निजामुद्दीन बुधवार को आईजी ऑफिस पहुंची। जहां उन्होंने इंसाफ की गुहार लगाई। उनका कहना है कि वे पिछले कई महीनों से थाने के चक्कर लगा रही हैं, लेकिन कोई अधिकारी सुनने को तैयार नहीं है। अमरीन और फरीन की शादी वर्ष 2012 में लठपुरा गांव में शाबिर व शाकिर से हुई थी। ये दोनों भाई है।

अमरीन ने बुधवार को आईजी दफ्तर के बाहर पति को तीन बार तलाक बोल दिया। हालांकि आज उनके साथ शौहर नहीं थे, उनका कहना है कि वो पहले ही समाज के सामने उन्हें तीन बार तलाक बोल चुकी हैं। जब उनसे ये पूछा गया कि आपके समाज में महिला को तीन तलाक कहने का अधिकार है तो उन्होंने जवाब दिया कि जब पति तीन बार तलाक बोल सकते हैं तो महिला क्यों नहीं बोल सकती हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि वह अपने को छोड़ना चाहती हैं। अमरीन ने बताया कि उसने थाने में देवर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया है, लेकिन पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। इसलिए आईजी से मिलकर इंसाफ की गुहार लगाने आई थी।

फरीन की बड़ी बहन अमरीन ने सिखाया सबक

फरीन का आरोप है कि शादी के बाद से ही उसके सास-ससुर और शौहर परेशान करने लगे थे। फरीन ने बताया कि एक बार तो ससुर ने गर्भवती के दौरान पेट में लात भी मारी थी। फरीन इतने पर ही चुप नहीं हुई उसने आगे बताया कि देवर ने भी दुष्कर्म किया और पति भी गलत तरीके से संबंध बनाने का दबाव बनाता है। शादी के बाद से ही मारपीट करता है। हालांकि यह मामला गांव की पंचायत तक पहुंच गया था। लेकिन उस दौरान पंचायत ने फैसला कर दोनों के परिजनों को समझा दिया था। उसके कुछ दिन से फिर शाकिर का रवैया बिगड़ गया और वह फरीन को तंग करने लगा। इस बार फरीन ने शिकायत थाने में की तो शौहर ने पहले महिला के साथ मारपीट की और बाद में तीन बार तलाक…तालक…तलाक बोल दिया। यह बात सिंतबर 2016 की है। फरीन का कहना है कि मैं तभी से इंसाफ की गुहार लगा रही थीं, लेकिन कोई अधिकारी सुनने को तैयार है। इसके बाद जो हुआ वह चौंकाने वाला है…

जब फरीन की किसी अधिकारी ने नहीं सुनी तो उसकी बड़ी बहन अमरीन ने ठान लिया कि अब अपनी छोटी बहन को इंसाफ दिलाकर ही रहूंगी। अमरीन बुधवार को अपनी छोटी बहन फरीन के साथ आईजी ऑफिस पहुंची और आईजी को पूरा मामला बताया। इतना ही नहीं आईजी से मिलने के बाद, अमरीन ने अपने शौहर शाबिर को तीन बार तलाक बोल दिया। जिससे शाबिर चौंक गया और पूछा ये क्या कह रही हो तुम ? अमरीन ने कहा- मैंने बिल्कुल सही कहा हैं क्योंकि जब तुम्हारा भाई मेरी बहन को तलाक दे सकता है तो मैं तुम्हें क्यों तलाक नहीं दे सकती हूं। उसने आगे कहा कि जब पति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है तो पत्नी अपने पति को तलाक क्यों नहीं दे सकती हैं। बता दें कि अमरीन दिव्यांग है और उसके तीन बच्चे भी हैं जबकि फरीन के भी तीन ही बच्चे हैं।

दोनों ने कहा कि देश में मोदी जी अच्छा काम कर रहे हैं और उन्होंने तीन तलाक पर जो आवाद उठाई है वह बिल्कुल सही है। उन्होंने कहा कि हम मोदी जी के साथ है। साथ ही उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को भी बराबरी का हक मिलना चाहिए। इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी की तारीफ की।

 

लड़की ने लड़के से लिखवाए हिंदी के 3 शब्द, गलत हुए तो तोड़ दिया रिश्ता

आमतौर पर लड़की देखने जब भी लड़के जाते हैं तो दुनिया भर के इम्तहान लेते हैं और इस पर भी बात नहीं बनी तो रिश्ता तोड़ते उनको देर नहीं लगती। समाज की धारणा है कि लड़कियाँ कमतर और खारिज करने के लिए हैं मगर वक्त बदल रहा है। ऐसे लोगों को नहले पर दहला मिल सकता है और हाल ही में मैनपुरी ममें कुछ ऐसा ही वाकया हुआ। पहले लड़का और लड़की ने एक दूसरे को देखा तो पसंद कर लिया। बाद में लड़का, लड़की का टेस्ट लेने लगा, जिसमें वो पास हो गई। लेकिन जब लड़की ने टेस्ट लिया तो लड़का फेल हो गया और उसने शादी करने से इनकार कर दिया। यूपी के मैनपुरी का यह अजीबो-गरीब मामला खूब चर्चाओं में है।

यह मामला मैनपुरी कुरावली के क्षेत्र से जुड़ी लड़की का है। परिजनों ने उसका रिश्ता फर्रुखाबाद में तय किया था। सारी बातें पक्की हो चुकी थी। इसके बाद 12वीं पास लड़के और उसके परिजनों ने 5वीं पास लड़की को देखने की इच्छा जताई। 1 अप्रैल को मैनपुरी के नुमाइश ग्राउंड में दोनों लोग अपने-अपने परिवारों के साथ वहां पहुंचे।
यहां बातचीत का दौर शुरू हुआ। इस बीच लड़के ने अपने बैग से डायरी और पेन निकालकर लड़की को दिया और उससे नाम, पता व फोन नंबर लिखने को कहा। लड़की ने सोचा कि ये सब फोन पर बातचीत के लिए किया जा रहा है,  इसलिए बिना किसी सवाल के लड़की ने सब कुछ लिख दिया। लेकिन लड़के का इरादा कुछ और ही था।
लड़के ने आगे क्या कहा?
लड़के ने आगे कहा, ”अब मैं कुछ और बोलूंगा और तुम्हें वो भी लिखकर दिखाना होगा।” इस पर भी लड़की ने हां कर दी। इसके बाद लड़के ने कुछ हार्ड सेंटेस बोले, जिसे लड़की ने सही से लिख दिया और लड़के ने शादी के लिए हामी भर दी।

युवती ने जो पूछा वो नहीं बता सका लड़का
लड़की को लड़के का तरीका पसंद नहीं आया और अब उसने वही डायरी और पेन युवक को थमा दी। लड़की ने कहा, ”अब जो मैं बोलूं, वो आप डायरी पर लिखकर दिखाइए।”
ये सुनकर लड़का असहज हो गया। हालांकि, उसने डायरी अपने पास रख ली। इसके बाद लड़की ने भी लड़के से नाम और पता लिखने को कहा। इसे लड़के ने लिख दिया। इसके बाद लड़की ने कहा कि अभी टेस्ट खत्म नहीं हुआ है। अब ‘परिश्रम’, ‘दृष्ट‍िकोण’ और ‘सांप्रदायिक’ शब्द लिखिए।
लड़का न तो पता ही सही से लिख सका और न ही लड़की के बताए शब्द। इसके बाद लड़की ने रिजल्ट सुनाते हुए कहा, ‘आप फेल हो गए हैं। मैं आपसे शादी नहीं कर सकती।’ जब काफी मनाने के बाद भी लड़की नहीं मानी तो लड़का पक्ष बैरंग लौट गया।

 

जेईई मेन 2017 में भारतीय सेना के ‘सुपर-40’ से कश्मीर के 28 बच्चों का चयन

भारतीय सेना  द्वारा चलाए जा रहे ‘सुपर-40’ प्रोग्राम के तहत जम्मू कश्मीर क्षेत्र के  28 बच्चों ने जेईई मेन-2017 परीक्षा पास कर ली है। पिछले कुछ वर्षों के रिजल्ट के मुकाबले ये परिणाम सबसे अच्छा माना जा रहा है।

हर साल भारतीय सेना द्वारा कुछ बच्चों का चयन इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी के लिए किया जाता है। इसकी शुरुआत साल 2013 में की गई थी। इसे इंडियन आर्मी के ट्रेनिंग पार्टनर सेंटर फॉर सोशल रेस्पॉन्सिबिलीटी एंड लर्निंग (CSRL) एंड पेट्रोनेट (LNG) के साथ मिलकर चलाया जाता है।
भारतीय सेना के प्रवक्ता ने बताया कि ये पहला बैच था जिसमें कश्मीर घाटी से 5 लड़कियों को ट्रेनिंग के लिए चुना गया था जिनमें से 2 ने जेईई मेन परीक्षा पास कर ली।
‘2016 जुलाई में सुरक्षाबलों के साथ एन्काउंटर में मारे गए हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद जारी हिंसा के बावजूद इंडियन आर्मी ने ये तय किया कि सब कुछ समय से चलता रहे’,
उन्होंने बताया कि भारतीय सेना द्वारा इस प्रोग्राम के लिए उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के आधार पर किया जाता है। परीक्षा का आयोजन अलग-अलग केंद्रों पर मुख्यतः अप्रैल और मई के महीने में किया जाता है।
इस साल जेईई मेन परीक्षा 02 अप्रैल (ऑफलाइन), 08 और 09 अप्रैल (ऑनलाइन) की गई थी जिसमें तकरीबन 11.8 लाख बच्चों ने हिस्सा लिया था और 2.2 लाख बच्चों ने सेकेंड और फाइनल राउंड के लिए क्वालिफाई किया जो अब जेईई एडवांस परीक्षा में बैठेंगे।

 

बच्चे काम पर जा रहे हैं

 राजेश जोशी

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्‍चे काम पर जा रहे हैं

सुबह सुबह

बच्‍चे काम पर जा रहे हैं

हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह

भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना

लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?
क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें

क्‍या दीमकों ने खा लिया हैं

सारी रंग बिरंगी किताबों को

क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने

क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं

सारे मदरसों की इमारतें

क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन

खत्‍म हो गए हैं एकाएक

तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में?

कितना भयानक होता अगर ऐसा होता

भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह

कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजते हुए

बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे

काम पर जा रहे हैं।