Sunday, July 12, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 759

अक्कड़ मक्कड़

0

 भवानीप्रसाद मिश्र

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,

दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं।
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची।

अब वह जीता, अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे
सबके खिले हुए थे चेहरे!

मगर एक कोई था फक्कड़,
मन का राजा कर्रा – कक्कड़;
बढा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर।

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा!

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लड़ने में मत खोओ
चलो भाई चारे को बोओ!

खाली सब मैदान पड़ा है,
आफ़त का शैतान खड़ा है,
ताकत ऐसे ही मत खोओ,
चलो भाई चारे को बोओ।

सुनी मूर्खों ने जब यह वाणी
दोनों जैसे पानी-पानी
लड़ना छोड़ा अलग हट गए
लोग शर्म से गले छट गए।

सबकों नाहक लड़ना अखरा
ताकत भूल गई तब नखरा
गले मिले तब अक्कड़-बक्कड़
खत्म हो गया तब धूल में धक्कड़

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़।

यह वीडियो भी देखें

जब बनाना हो बच्चों के लिए कुछ मनभावन

0

डोसा पिज्‍जा

सामग्री: 2 कप इडली डोसे का घोल, आधा कप कसा चीज़ , एक छोटा कप बारीक कटा प्‍याज, एक छोटा बारीक कटा टमाटर, एक छोटा बारीक कटा शिमला मिर्च, 2 बड़े चम्‍मच स्‍वीट कॉर्न (उबला हुआ), 2 बड़े चम्‍मच बारीक कटी गाजर हुई, 2 बड़े चम्‍मच चिली सॉस, 2 बड़े चम्‍मच टॉमेटो सॉस, 1 छोटी चम्‍मच पिसी काली मिर्च, 2-3 बड़े चम्‍मच तेल

विधि: सारी सब्जियों को काट के मिला ले। एक तवे या पैन को गरम करें एक बड़ा चम्‍मच घोल डाल के मोटा डोसा फैलाएं, बशर्ते इसे पतला नहीं होने दें। डोसा के ऊपर टोमेटो सॉस और चिली सॉस डाल के फैला दें। कटी हुई सब्जियां डाल के पूरा फैला दें, फिर काली मिर्च और हल्‍का सा नमक बुरक दें।  कद्दूकस की हुई चीज डाल के फैला दे, तवे को ढक्‍कन से बंद कर दे।   धीमी आंच पर एक-दो मिनट तक पकाएं या चीज़ गल जाने तक पकाएं। ढक्‍कन खोल के पिज्‍जा को तवे से प्‍लेट में निकाल लें और टुकड़ों में काट के टॉमेटो सॉर्स के साथ सर्व करें। इसी तरह से सारे घोल से पिज्‍जा डोसा बना ले और गरम गरम ही सर्व करें।

 

 

 

क्रीमी मेकरोनी विद ब्रोकली

सामग्री एक कप उबली हुई मैकरोनी , 1 कप हल्‍के उबले हुए ब्रोकली के फूल, 2 टेबल स्‍पून मक्‍खन, 1 टी स्‍पून बारीक कटा हुआ लहसुन, एक टेबल स्‍पून कटा हुआ ताजी तुलसी की पत्तियां, एक कप दूध, एक चौथाई कप ताजी क्रीम, आधा कप कसा हुआ प्रोसेस्‍ड चीज, स्‍वादानुसार नमक और पिसी हुई काली मिर्च

विधि –एक चौड़े नॉन स्टिक पैन में मक्‍खन गरम करें, लहसुन डालकर मध्‍यम आंच पर कुछ सैंकड भून लें। ब्रोकली डालकर मध्‍यम आंच पर 2-3 मिनट तक भून लें। तुलसी, दूध, क्रीम और चीज डालकर अच्‍छी तरह मिला लें और बीच बीच में हिलाते हुए, मध्‍यम आंच पर एक से 2 मिनट तक पका लें। नमक और काली मिर्च डालकर एक मिनट तक पका लें। मैकरोनी डालकर, बीच बीच में हिलाते हुए माध्‍यम आंच पर एक से दो मिनट तक पका लें। तुरंत परोसें।

 

बड़ों की महत्वाकांक्षा और संवेदनहीनता के बीच पिस रहा बचपन

0

अपराजिता फीचर्स डेस्क

जब हम बच्चे थे तो बड़ों की हर बात बुरी लगती थी और आज जब हम बड़े हो चुके हैं तो हम बच्चों को समझना नहीं चाहते। हम उनकी हर बात को वैसे ही समझना चाहते हैं, जैसे हम समझना चाहते हैं…हमने बच्चों के लिए ऐसी दुनिया तैयार कर दी है जहाँ हम कभी खुद नहीं रहना चाहेंगी..बच्चे घृणा झेल रहे हैं और हम अपनी नफरतों को उन पर थोप रहे हैं। बच्चों की दुनिया में हम बड़ों ने अपनी नफरत और महत्वाकांक्षा का जहर घोल रखा है। वे बच्चे भी खुश नहीं हैं जो समृद्ध हैं और जो महंगे स्कूलों में जाते हैं। प्रद्युम्न की हत्या के मामले में ग्यारहवीं कक्षा के छात्र का नाम आता है और वजह यह है कि वह परीक्षा को टालना चाहता था इसलिए उसे हत्या ही एकमात्र विकल्प सूझा….अब जरा सोचिए क्या ये इस अभियुक्त छात्र का दोष है….? ये दोष हमारा है…हमारी शिक्षा प्रणाली का है…हमने क्या हाल कर रखा है और परीक्षा कितनी बड़ी दहशत बन गयी है जो एक सामान्य बात है…मगर इसके पीछे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा और बच्चे पर अत्यधिक दबाव डालने वाली प्रवृति है जिसने एक मासूम को अपराधी बनाकर छोड़ दिया है। अच्छा…जरा सोचिए तो हम सिखा क्या रहे हैं…मुफ्त में सामान बटोरना….मेहनत और सच बोलने को बेवकूफी समझना….रिश्वत देना और तलवे चाटना….हर बुरी चीज हमें अच्छी लगने लगी है इसलिए संजय दत्त और सलमान खान जैसे लोग आदर्श बन जाते हैं जो कानून को अपने हाथ में लिए घूमते हैं…आप जब झूठ बोलते हैं, हिंसा करते हैं तो वह सब आपके बच्चे देख रहे हैं होते हैं। आप घर में शराब की पार्टी करेंगे तो आपको आवेश जैसे बच्चों से कैसे बात करेंगे….जो शराब को आम सी चीज समझते हैं…हर मां – बाप चाहता है कि उसका बच्चा एक अच्छा  इंसान बने…उसकी इज्जत करे मगर क्या हर मां – बाप अपनी जिन्दगी में ये सारे सिद्धांत लेकर चलता है….? मॉल कल्चर में आप प्रकृति को खत्म किए जा रहे हैं तो बच्चा पेड़ लगाना कैसे सीखेगा? बच्चा सिर्फ मां – बाप से नहीं सीखता…उसके भाई –बहन, बुआ..मासी..नानी…..चाचा…सब उसकी जिन्दगी का हिस्सा है..बच्चा अगर गालियां देता है…चोरी करता है….तो उसे पीटने से पहले एक बार अपनी जिंदगी पर नजर डालिए। सीरिया और पाकिस्तान जैैसे आतंकपोषित देश में बच्चों की स्थिति कैसी है…यह बताने की जरूरत नहीं है और यह तोहफा हम बड़ों ने ही दिया है।

कुपोषण, अवसाद और आत्हत्या…

एक हालिया सर्व के अनुसार  भारत में हर साल अकेले कुपोषण से 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है. कोई 10 करोड़ बच्चों को अब तक स्कूल जाना नसीब नहीं है। इसके साथ ही सामाजिक और नैतिक समर्थन के अभाव में स्कूली बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। इसके अलावा खासकर बढ़ते एकल परिवारों की वजह से ऐसे बच्चे साइबर बुलिंग का भी शिकार हो रहे हैं। न तो उनको समझने वाले लोग हैं और न उनकी बात सुनने वाले लोग हैं, वो किसी से कुछ नहीं कह पा रहे और नतीजा यह है कि वे अवसाद में जी रहे हैं। सेव द चिल्ड्रेन की ओर से विश्व के ऐसे देशों की एक सूची जारी की गई है जहां बचपन सबसे ज्यादा खतरे में है। भारत इस सूची में पड़ोसी देशों म्यांमार, भूटान, श्रीलंका और मालदीव से भी पीछे 116वें स्थान पर है। यह सूचकांक बाल स्वास्थ्य, शिक्षा, मजदूरी, शादी, जन्म और हिंसा समेत आठ पैमानों पर प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है। ‘चोरी हो गया बचपन’ (‘स्टोलेन चाइल्डहूड’) शीर्षक वाली यह रिपोर्ट देश में बच्चों की स्थिति बताने के लिए काफी है।

चीन से ज्यादा बच्चे

आबादी के मामले में भले ही पड़ोसी चीन भारत से आगे हो, बच्चों के मामले में भारत ने उसे पछाड़ दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक चार साल तक के बच्चों की वैश्विक आबादी का लगभग 20 फीसदी भारत में ही है। वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट में ऐसे बच्चों और उनकी हालत के बारे में कई गंभीर तथ्य सामने आए थे लेकिन बीते पांच वर्षों के दौरान सुधरने की बजाय इस मोर्चे पर हालत में और गिरावट आई है। उन आंकड़ों में कहा गया था कि स्कूल जाने की उम्र वाले हर चार में से एक बच्चा स्कूल नहीं जाता। यह आंकड़ा 10 करोड़ के आसपास है।

बहुत से बच्चों को गरीबी और गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के चलते स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं होता तो कइयों को मजबूरी में स्कूल छोड़ना पड़ता है। देश में फिलहाल एक करोड़ ऐसे बच्चे हैं जो पारिवारिक वजहों से स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम करने पर भी मजबूर हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की खस्ताहाली के चलते छह साल तक के 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं। डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन (डाइस) की वर्ष 2014-15 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि हर सौ में महज 32 बच्चे ही स्कूली शिक्षा पूरी कर पाते हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार देश के महज दो फीसदी स्कूलों में ही पहली से 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की सुविधा है।

बाल मजदूरी

देश में बाल मजदूरी की समस्या भी बेहद गंभीर है. दो साल पहले बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था क्राई ने कहा था कि देश में बाल मजदूरी खत्म होने में कम से कम सौ साल का समय लगेगा. इससे परिस्थिति की गंभीरता का अहसास होता है। वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट में देश में पांच से 14 साल तक के उम्र के बाल मजदूरों की तादाद एक करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया था. अब तक यह तादाद और बढ़ गई होगी। देश के कुछ हिस्सों में तो बच्चों की कुल आबादी का आधा मजदूरी के लिए मजबूर है। मोटे अनुमान के मुताबिक देश में फिलहाल पांच से 18 साल तक की उम्र के 3.30 करोड़ बच्चे मजदूरी करते हैं। कभी बच्चे की देह पर गर्म चाय फेंक दी तो कभी उसे जंजीरों से जकड़ दिया….हम बडों ने उनकी दुनिया को नर्क बना दिया है। बाल श्रम को खत्म करने के लिए सबसे पहले उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना होगा। बीते एक दशक के दौरान बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में पांच गुनी वृद्धि हुई है लेकिन गैर-सरकारी संगठनों का दावा है कि यह आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है। परीक्षा में फेल होना बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की दूसरी सबसे बड़ी वजह के तौर पर सामने आई है. इसके अलावा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं होना भी बच्चों की मौत की एक बड़ी वजह है।

यूनिसेफ की ओर से हाल में जारी रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन, 2016 में कहा गया है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी के बावजूद देश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर भयावह है। वर्ष 2015 के दौरान देश में पैदा होने वाले ढाई करोड़ में से लगभग 12 लाख बच्चों की मौत ऐसी बीमारियों के चलते हो गई जिनका इलाज संभव है। इस मामले में भारत की स्थिति पड़ोसी बांग्लादेश और नेपाल के मुकाबले बदतर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बच्चों की स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में बहुत कुछ करना बाकी है। बच्चों को भगवान कहे जाने वाले इस देश में बच्चों को ऑक्सीजन नहीं मिलती, वे बड़ों की हवस का शिकार बन रहे हैं। इस साल सैकड़ों बच्चों की जान प्रशासनिक लापरवाही से हुई है। बाल विवाह लड़कियों के साथ लड़कों का बचपन भी छीन रहा है।

एसोचैम की स्वास्थ्य देखभाल समिति के तहत कराये गए सर्वेक्षण में पाया गया कि सात से तेरह वर्ष की आयु वर्ग के 88 प्रतिशत छात्र ऐसे हैं, जो अपनी पीठ पर अपने वजन का लगभग आधा भार ढोते हैं। इस भार में आर्ट किट, स्केट्स, तैराकी से संबंधित सामान, ताइक्वांडो के उपकरण, क्रिकेट एवं अन्य खेलों की किट शामिल होते हैं। इस भारी बोझ से उनकी रीढ़ की हड्डी को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है. इसके अलावा पीठ संबंधी कई अन्य गंभीर समस्याओं का सामना भी इन बच्चों को करना पड़ सकता है। हमने अपनी गलाकाट प्रतियोगिता का बोझ बच्चों पर डाल दिया है…रियेलिटी शो भी एक तरह का बाल श्रम ही है जिस पर बात होनी चाहिए। हाल ही में तेलंगाना में एक बच्ची की जान बैग के भारी वजन ने ले ली और वह भी तब सीबीएसई ने स्कूल बैग को लेकर आवश्यक निर्देश जारी कर दिए हैं। हमारी बसों में बच्चों को सीट नहीं मिलती…दरअसल हम स्वभाव से ही हृदयहीन हो रहे हैं….जरूरी है कि हम बच्चों को अपनी महत्वाकांक्षाओं के बोझ से मुक्त करें।

 

मैरी कॉम का ‘गोल्डन पंच’, जीतीं एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप

0

स्टार महिला मुक्केबाज मैरी कॉम को करियर में एक और बड़ी कामयाबी हासिल हुई है। मैरी कॉम ने 48 किलोग्राम भार वर्ग में एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में बुधवार को गोल्ड मेडल जीता। खिताबी मुकाबले में मैरी कॉम ने उत्तरी कोरिया की किम हयांग-मी को हराया। मैरी कॉम को स्वर्णिम सफलता पर पीएम नरेंद्र मोदी ने बधाई दी। पीएम मोदी ने बधाई देते हुए मैरी कॉम से कहा कि देश तुम्हारी सफलता से गौरवान्वित हुआ है।

पूरे टूर्नामेंट में मैरी कॉम सभी बॉक्सरों पर पड़ी भारी

पांच बार की विश्व चैंपियन और वर्तमान राज्यसभा सांसद बॉक्सर एमसी मैरी कॉम ने एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप टूर्नामेंट में जापानी बॉक्सर को हराकर फाइनल में जगह बनाई थी। मैरी कॉम ने 48 किलो लाइट फ्लाइवेट वर्ग के सेमीफाइनल में जापान की सुबासा कोमुरा को 5-0 से करारी मात दी। पूरे टूर्नामेंट में मैरी कॉम जापानी बॉक्सर कोमुरा पर भारी दिखीं।

फाइनल जीतने के बाद लंदन ओलिंपिक ब्रॉन्ज मेडल विजेता मैरी कॉम ने टूर्नामेंट में अपना छठा पदक हासिल कर लिया है। उन्होंने क्वॉर्टरफाइनल में चीनी ताइपे की मेंग चिए पिन को हराकर अंतिम चार में जगह बनाई थी। 35 वर्षीय मैरी कॉम ने इस प्रतियोगिता के पिछले चरणों में चार स्वर्ण और एक रजत पदक जीता है।

एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में यह 5 वां स्वर्ण पदक है

एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में मैरी कॉम का यह 5 वां स्वर्ण पदक है। इससे पहले मैरी कॉम ने इस टूर्नामेंट में चार बार स्वर्ण पदक जीता है। मैरी ने साल 2003, 2005, 2010 और 2012 में स्वर्ण पदक हासिल किया। मगर साल 2008 में उन्हें सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा था। मैरी कॉम यहां पिछले 5 साल से 51 किलो भार वर्ग में भाग लेती रही है, लेकिन इस बार उन्होंने 48 किलो भार वर्ग में भाग लिया।

 

जब डॉक्टर भूले अपना फर्ज तो खुद मरीजों का इलाज करने बैठ गये आईएएस

0

राजस्थान में डॉक्टरों की हड़ताल से हालात इस कदर बिगड़ गए है कि अब कुछ गैर-पेशेवर लोगों को मरीजों का इलाज करना पड़ रहा है। ऐसा ही एक वाकया बांसवाड़ा शहर में देखने को मिला जब शहर के एडीएम और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. भंवरलाल शहर के हाउसिंग बोर्ड चिकित्सालय में रोगियों को इलाज करते देखे गए।

डॉ. भंवरलाल एक सर्टिफाइड एमबीबीएस डिग्रीधारी डॉक्टर रह चुके हैं और फिलहाल बांसवाड़ा शहर के एडीएम पद पर कार्यरत है। अपने शहर में बिगड़ रहे हालातों को डॉ. भंवरलाल देख नहीं पाए जिसके बाद उन्होंने विभिन्न चिकित्सालयों में जाकर सेवा देने का फैसला किया।

हड़ताल पर भारी पड़ा सराहनीय कदम

डॉ. भंवरलाल ने  कमान संभालते हुए कई मरीजों का इलाज किया । उनके इस कदम की जिला कलेक्टर भगवतीप्रसाद ने भी सराहना की है। इसके साथ ही बांसवाड़ा एडीएम की अच्छी पहल को स्थानीय जनता भी सराहना कर रही है। पीड़ित मानवता की सेवा को आगे आए  एसडीएम का यह प्रयास सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल पर भारी पड़ा है।

 

एक हजार बच्चों का पेट भरेंगी ऐश्वर्या 

0

फिल्मों में सक्रिय रहने के साथ ही ऐश्वर्या राय बच्चन अब और बड़ा काम करने जा रही है। वे करीब एक हजार बच्चों का पेट भरेंगी और वो भी एक साल तक।  गरीब बच्चों को भोजन उपलब्‍ध करवाने वाली संस्था अन्नमित्र फाउंडेशन मिड डे मील में ऐश्वर्या राय बच्चन भी अपना सहयोग देने वाली हैं। ऐश्वर्या ने अपने 44वें जन्मदिन पर इसका निर्णय लिया था। अन्नमित्र मिड डे मील स्कीम  इंटरनेशनल सोसाइटी के तहत ऐश्वर्या एक साल तक  एक हजार बच्चों के भोजन का खर्च उठाएंगी।  कृष्‍णा कांनशसेनस (इस्कॉन) ने सोमवार को इसकी अधिकारिक जानकारी दी। इस्कॉन के मुख्य राधानाथ स्वामी महाराज ने बताया कि अन्नमित्र फाउंडेशन मिड डे मील योजना 2004 में एक छोटे से कमरे से शुरू की गई थी। उस समय करीब 900 बच्चों के लिए भोजन बनाया जाता था और अब 7 राज्यों में करीब 10 लाख बच्चों को इसके जरिए भोजन उपलब्‍ध करवाया जाता है।

आईएएस अशोक खेमका का 51वीं बार तबादला

0

हरियाणा के चर्चित आईएएस अधिकारी डॉ. अशोक खेमका को एक बार फिर तबादले की मार झेलनी पड़ी है। सरकार ने इस बार उन्हें सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से हटाकर खेल एवं युवा मामले विभाग का प्रधान सचिव लगाया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग में खेमका की सक्रियता सरकार को रास नहीं आई। खेमका विभाग में लंबे समय से चले आ रहे भ्रष्टाचार की परतें खोलना शुरू कर चुके थे, अगर और कुछ समय विभाग में रहते तो बड़ी मछलियां बेनकाब हो सकती थीं। खेमका के खुलासों की आंच सीधे सरकार पर आने की भी संभावना थी। विभाग की सरकारी गाड़ी का दुरुपयोग होने का मामला खेमका पहले ही सार्वजिनक कर चुके हैं।
खेमका सहित सरकार ने रविवार देर शाम 13 आईएएस अधिकारियों के नियुक्ति एवं तबादला आदेश जारी किए हैं। खेमका अब खेल मंत्री अनिल विज के विभाग का जिम्मा संभालने जा रहे हैं। विज पहले ही खेमका के मुरीद हैं और अनेक बार उनकी ईमानदारी की तारीफ कर चुके हैं। अब दोनों का एक साथ काम करने का अनुभव कैसा रहेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। आईएएस अशोक खेमका ने 51वां तबादला होने के बाद ट्वीट के जरिए मन की टीस उजागर की है। खेमका ने तबादला आदेश जारी होने के बाद आठ बजकर 13 मिनट पर ट्वीट किया। उसमें खेमका ने लिखा कि अनेक काम प्लान किए थे। एक और तबादले की खबर आ गई।
अवतरण एक बार फिर धमाकेदार रहा। निहित स्वार्थ जीत गए। पूर्वानुभव, लेकिन यह अस्थायी है। नए जोश और ऊर्जा के साथ नई शुरूआत करूंगा। सूत्रों के अनुसार खेमका सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के नशा मुक्ति केंद्रों में चल रहे भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले थे, साथ ही बिना पद के हैल्परों की नियुक्तियों का कच्चा चिट्ठा भी उनके हाथ लग गया था। इससे पहले कि वह बड़ा खुलासा करता, उन्हें विभाग से ही चलता कर दिया गया।

 

 

अब दिल खोल कर 280 शब्दों में करें ट्वीट

0

अगर आप भी अभी तक ट्विटर पर 140 कैरेक्टर सीमा होने के कारण अपनी पूरी बात नहीं कह पा रहे थे तो आपके लिए बड़ी खबर है। ट्विटर ने अब ट्वीट के 140 कैरेक्टर की सीमा को खत्म कर दिया है। अब आप दिल खोल कर 280 कैरेक्टर में ट्वीट कर सकते हैं। बता दें कि सितंबर से ही ट्वि्टर इस फीचर की टेस्टिंग कुछ यूजर्स के साथ कर रहा था, लेकिन अब इसे आम यूजर्स के लिए भी जारी कर दिया गया है। इसकी जानकारी देते हुए ट्विटर ने अपने ब्लॉग पोस्ट में कहा, ‘हमने सितंबर महीने में 140 कैरेक्टर वाली सीमा को बढ़ाने की प्लानिंग की, ताकि दुनिया के तमाम यूजर्स ट्वीट के जरिए अपनी पूरी बात अपने दुनिया के सामने रख सकें। करीब 45 दिन तक इस फीचर की टेस्टिंग के बाद हमें खुशी हो रही है कि हमने इस अब आम यूजर्स के लिए लॉन्च कर दिया है। अब आपलोग 280 कैरेक्टर में ट्वीट कर सकते हैं।’
बता दें कि ट्विटर के इस फीचर के आने से ठीक एक दिन पहले जर्मनी के दो युवकों ने 35 जार कैरेक्टरमें ट्वीट किया था जिसके बाद उनके अकाउंट्स को कुछ देर के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। साथ ही ट्विटर ने इस बग को अब फिक्स कर लिया है।

 

बच्चों को जरूर सिखाएं ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ का फर्क

0

आप चाहें कितने पढ़े लिखे क्यों न हों लेकिन जैसे ही अपनों के साथ कुछ बुरा होता है हम कमजोर पड़ जाते हैं। अगर बात अपने बच्चों की हो तो मां-बाप समझ ही नहीं पाते की क्या करें और क्या नहीं। आए दिन बच्चों के यौन शोषण की आती खबरों के बीच हर दिन मां बाप नई-नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। आज पैरेंट्स को अपने बच्चों के पोषण से ज्यादा उनके साथ होने वाले शोषण की चिंता लगी रहती है।  घर और बाहर बच्चों के साथ बढ़ते सेक्सुअल एब्यूज यानि यौन उत्पीड़न को देखते हुए  जरूरी हो गया है कि माता -पिता, घर के बड़े और टीचर नौनिहालों को सुरक्षित/अच्छे/ सेफ और असुरक्षित/ बुरे /अनसेफ टच /स्पर्श के बारे में बताएं। जब -जब हम इस तरह की घटनाओं के बारे में सुनते हैं, तो हमारी अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेचैनी बढ़ जाती है,लेकिन इस तरह की परिस्थिति से लड़ने का बस एक ही तरीका रह जाता है कि हम बातों-बातों में या फिर साफतौर पर अपने बच्चे को सेफ और अनसेफ टच के बारे में बताएं।

बैड टच
बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बीच अंतर बताने के लिए हमें उन्हें पहले ये समझाना होगा कि वो टच जिनके होने से आप सहज (comfertable) रहते हैं और दूसरा वो टच जिसके
होते ही आप असहज, परेशान और उदास हो जाते हैं।

बैड टच ऐसा टच जिसके छुए जाने का अहसास बुरा लगे
-हिटिंग, किकिंग, शेकिंग, बाइटिंग, कस कर पकड़ना, वो टच जिसके होने पर अच्छा न लगे। कोई बिना पूछे आपको छूने की कोशिश करे, छूने के लिए जबरदस्ती करे
-शरीर के प्राइवेट पार्ट्स क्या हैं और उन्हें कोई भी बिल्कुल नहीं छू सकता है।
– प्राइवेट पार्ट्स लिप्स, छाती, पेट के नीचे और कमर के नीचे के अंगों को डॉक्टर और मां के अलावा कोई नहीं छू सकता है।
– किसी अनजान व्यक्ति को अपने प्राइवेट पार्ट्स न दिखाएँ और न ही उन्हें छूने, देखने या रगड़ने दें
बच्चों को सिखाएं कि जब उन्हें कोई परेशान करे या वो अनसेफ महसूस करें तो वो क्या क्या करें-वो सीधेतौर पर
-ना कह दें
-चिल्लाएं
-वहां से भाग जाएँ
-इस बारे में घर पर और बड़ों से बात करें
-कोई आपसे बिना पूछे आपको गले लगाने के लिए जबरदस्ती करे, किस करे

सेफ टच
-आप जिसे प्यार करते हैं जो आपको अच्छा लगता है यदि वो आपको आलिंगन करे और किस करे जो आपको अच्छा लगे वो सेफ टच है।
-अगर आपकी मां आपके सो कर उठने के बाद प्यार और हग करें तो वो सेफ टच है।
-जब आप सोने जा रहे हों और आपके पिता आपको गुड नाइट किस करें
-जब आपके दादा दादी-नाना नानी घर आएं और हग करें

– सिर पर कोई प्यार से हाथ फेरे जिसके फेरे जाने से आपको अच्छा लगे
-अगर कोई शाबाशी देने के लिए प्यार से पीठ थपथपाए
-आपसे पूछ कर आपके माथे पर चुंबन करे, हाथ मिलाना

 

अंधविश्वास से लड़कर डॉक्टर ने बचाई गर्भवती महिला की जान

0

तमाम अंधविश्वास, पुराने रीति रिवाज और संसाधनों की कमी की समस्या से लड़ते हुए ओडिशा के एक डॉक्टर ने एक गर्भवती महिला की जान बचाई। ओंकार होटा ने महिला को स्ट्रेचर पर 12 किलोमीटर दूर स्थित प्राइमरी हेल्थ सेटर तक पहुंचाया जिससे उनकी जान बच सकी। ओंकार ओडिशा के पाप्पूलुरु के एक सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर में काम करते हैं। अब उनकी सोशल मीडिया की न्यूज़ फीड बधाइयों के मैसेज से भर गई है। घटना को समझने के लिए बीबीसी के प्रवीण कसम ने ओंकार से बात की। उन्होंने कहा, “एक स्थानीय पत्रकार डेबी मैती ने मुझे बताया कि एक गर्भवती महिला की जान खतरे में है और मुझे मदद करने को कहा।”
ओंकार ने बताया , “30 साल की शुभामा मार्सी चित्रकोंडा ब्लॉक के सारीगट्टा गांव में रहती हैं। पब्लिक ट्रांस्पोर्ट से ये गांव पूरी तरह से कटा हुआ है। यहां से पास के गांव में पहुंचने के लिए नदी-नालों और तंग रास्तों से होते हुए 12 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है।”


गांव की मान्यता

डॉक्टर ओंकार कहते हैं, “गांव में कोई मेडिकल सुविधा नहीं होने के कारण डिलीवरी एक झोपड़ी में ही करनी पड़ी। महिला ने एक लड़के को जन्म दिया लेकिन अधिक खून बह जाने के कारण उसकी हालत खराब होने लगी। उसे पास के हेल्थ सेंटर में ले जाना ज़रूरी था” लेकिन इस काम के लिए कोई भी गांव वाला सामने नहीं आया। गांव वालों की मान्यता है कि डिलीवरी के बाद किसी को भी महिला के आसपास नहीं जाना चाहिए। महिला कोंडारेड्डी जाति की है और उस जाति के कई लोग ऐसा ही मानते हैं। उन्होंने बताया, “आखिर में हमें एक आदमी को स्ट्रेचर लेकर साथ चलने के लिए पैसे देने पड़े। महिला का पति, वो पत्रकार जिसने जानकारी दी, और इस हेल्पर ने हेल्थ केयर सेंटर तक चलने में मदद की। मैंने मरीज़ को तुरंत ग्लूको़ज़ की ड्रिप लगाई और अपने सीनियर अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। उसकी हालत में सुधार हुआ है और वो खतरे से बाहर है।”
माओवादियों का गढ़

ओंकार के मुताबिक शुभामा की ये तीसरी डिलीवरी थी। इसके पहले डिलीवरी के समय उसके एक बच्चे की मौत हो गई थी। उन्होंने बताया, “ये माओवादियों का गढ़ है। मदद के लिए यहां ना ऐम्बुलेंस है, ना नर्स। मुझे अक्सर ऐसे हालात से गुज़रना पड़ता है, ये मेरे लिए कोई नई घटना नहीं थी। ऐसे हालात में मैं खुद को पहले इंसान और बाद में एक डॉक्टर की तरह देखता हूं।” पूरे घटनाक्रम को याद करते हुए स्थानीय पत्रकार डेबी मैती ने बीबीसी को बताया कि वो अपनी बाइक पहले डॉक्टर के घर पहुंचे और फिर उन्हें लेकर वहां गए जहां डिलीवरी हो रही थी। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी सोशल मीडिया पर डॉक्टर की तारीफ की। डॉक्टर की तारीफ करते हुए उन्होंने लिखा कि ओंकार पर ओडिशा को गर्व है।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)