Wednesday, April 1, 2026
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भारतीय फॉर्म्यूला वन रेसर महावीर रघुनाथन ने जीता यूरोपीय रेसिंग का खिताब

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भारतीय एफवन रेसर महावीर रघुनाथन ने इटली के इमोला में आयोजित हुई यूरोपीय रेसिंग चैंपियनशिप जीत ली है। इसी के साथ वह यह रेस जीतने वाले पहले भारतीय बन गए। उन्होंने यहां प्रतिष्ठित बास ग्रांड प्री चैंपियनशिप (फार्मूला वर्ग) की अंतिम दो रेस जीती। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक दुनिया भर के 20 रेसर के बीच चेन्नई के 19 साल के महावीर ने सात राउंड में 263 अंक के साथ खिताब जीता। इस रेस में ऑस्ट्रिया के योहान लेडेरमेयर 247 अंक के साथ दूसरे जबकि इटली के सल्वाटोर डि प्लानो 243 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहे। कोलोनी मोटरस्पोर्ट की पीएस रेसिंग की ओर से उतरने वाले महावीर ने सभी सातों राउंड में पोडियम पर जगह बनाई।

महावीर का यह सीजन बेहद शानदार रहा है। उन्होंने सातों राउंड में शीर्ष-3 में जगह बनाई है। उन्होंने रविवार को अपनी पहली रेस की मंजिल तय की। दूसरी रेस में भाग्य ने उनका साथ दिया। उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी इटली के सालवाटोरे दे प्लानो (एमएम इंटरनेशनल स्पोर्ट) ने चौथे लेप में अपने आप को रेस से बाहर कर लिया था। दे प्लानो 243 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। दूसरे स्थान पर आस्ट्रिया के जोहान लेडेरेमाइर रहे। उन्होंने रेस में 247 अंक हासिल किए।

इस चैंपियनशिप को जीतने के बाद महावीर रघुनाथन ने कहा, ‘इसमें काफी आनंद आया। मैं पी1 हासिल कर सका और फिर चैम्पियनशिप जीत सका, इस बात से मैं बेहद खुश हूं। यह शानदार है। इससे मेरे आत्मविश्वास में इजाफा होगा। मैं अपनी टीम कोलोनी मोटरस्पोर्ट की पीएस रेसिंग को दिल से शुक्रिया कहना चाहता हूं।’ कार्टिग में रेस की बारीकियां सीखने के बाद महावीर ने 2012 में फॉर्मूला का रुख किया और पहली बार जेके एशिया रेसिंग सीरीज में कदम रखा। उन्होंने 2013 में एमआरएफ फॉर्मूला 1600 में शिरकत की। चानी फॉर्मूला मास्टर्स की तीन रेसों में भी उन्होंने हिस्सा लिया।

महावीर रघुनाथन ने इससे पहले शानदार प्रदर्शन करते हुए नीदरलैंड के जैंडवूर्ट में बोस ग्रां प्री सीरीज के दूसरी रेस में भी पोडियम में जगह बनाई थी। चेन्नई के इस 18 साल के ड्राइवर ने मौजूदा सत्र में लगातार चौथी बार पोडियम पर जगह बनाई थी। महावीर उस रेस में दूसरे स्थान पर रहे। उससे पहले पहली रेस में भी वह दूसरे स्थान पर रहे थे। महावीर इटली की टीम कोलोनी मोटरस्पोर्ट का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी टीम 84 अंक के साथ दूसरे स्थान पर चल रही है।

महावीर ने कार्टिंग से मोटरस्पोर्ट की शुरुआत की थी। 2012 में जेके रेसिंग एशिया सीरीज में भाग लेने के बाद वह फॉर्म्यूला कार के लिए ग्रैजुएट हो गए थे। 2013 में उन्होंने एमआरएफ चैलेंज फॉर्म्यूला 1600 में रेस लगाई थी। उन्होंने चाइनीज फॉर्म्यूला रेस में भी तीन बार प्रतिभाग किया है। 2014 में वे यूरोप चले गए और वहां इटैलियन फॉर्म्यूला-4 जॉइन किया. 2015 में उन्होंने मोटरपार्क अकैडमी के लिए यूरोपियन फॉर्म्यूला-3 चैंपियनशिप में भाग लिया। साल 2016 उनके लिए काफी बेमिसाल साबित हुआ था तब उन्होंने कोलोनी इटैलियन टीम के लिए रेस लगाते हुए दूसरा स्थान हासिल किया था। अभी तक नारायण कार्तिकेयन ने ही 1994 में ब्रिटिश फॉर्म्यूला फोर्ड और 1996 में फॉर्म्यूलाा एशिया सीरीज का खिताब अपने नाम किया है।

 

विदेशी भाषा अब नहीं होगी त्रिभाषा फार्मूला का अंग

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स्कूलों में अगले शैक्षणिक सत्र से त्रिभाषा फार्मूला में जर्मन और फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाएं शामिल नहीं होंगी। माना जा रहा है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से कहा है कि विदेशी भाषा पढ़ने के इच्छुक छात्रों को इसे चौथी या पांचवीं भाषा के विषय के रूप में विकल्प चुनना चाहिए।

एक सूत्र ने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को त्रिभाषा फार्मूला के तहत पढ़ाया जाना चाहिए, जबकि विदेशी भाषाओं को चौथी भाषा के तौर पर। सूत्र के मुताबिक, सीबीएसई के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है और अगले सत्र से बदलाव कर दिए जाएंगे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत त्रिभाषा फार्मूला का अर्थ यह है कि हिंदीभाषी राज्यों के छात्रों को हिंदी व अंग्रेजी के अलावा एक आधुनिक भारतीय भाषा सीखनी चाहिए। वर्तमान में 18 हजार मान्यता प्राप्त संस्थान छात्रों को मातृभाषा या हिंदी, अंग्रेजी और जर्मन व मंदारियन जैसी एक विदेशी भाषा आठवीं कक्षा तक पढ़ाते हैं। पिछले साल दिसंबर में सीबीएसई ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को त्रिभाषा फार्मूला का प्रस्ताव भेजा था।

 

जम्मू-कश्मीरः कश्मीरी पंडित करा रहे बेटियों का यज्ञोपवीत संस्कार

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बेटा-बेटी समान समझे जाने को लेेकर वैसे तो कई तरह के जागरूकता कार्यक्रम देश में चल रहे हैं, लेकिन कश्मीरी पंडित समाज में इसको लेकर अलग ही तरह की बयार बह निकली है। हरियाणा में रह रहा कश्मीरी पंडित परिवार अगले माह अपनी दो बेटियों का यज्ञोपवीत संस्कार समारोह आयोजित कर एक बड़ा संदेश देने की इस मुहिम में शामिल होंगे।

पनुन कश्मीर के कन्वीनर, साहित्यकार एवं इस मुहिम का बीड़ा उठाने वाले अग्निशेखर कहते हैं कि इस वर्ष समाज के सात परिवार लड़कियों के जनेऊ संस्कार करा रहे हैं। इसे धार्मिक या कट्टरपंथ न मानकर एक सामाजिक अभियान माना जाए।हिंदू समाज में सदियों से लड़कों को ही जनेऊ धारण कराने की परंपरा चली आ रही है।
हालांकि वेदों में हजारों साल पहले लड़कियों के भी जनेऊ धारण के लिए यज्ञोपवीत संस्कार, उपनयन संस्कार या मेखल का जिक्र है। उपनयन का अर्थ बच्चे को गुरु के समीप ले जाना होता है, जिसके बाद दीक्षा ग्रहण करने वाले बालक को यज्ञ करने का अधिकार भी प्राप्त होता है।
दक्षिण भारत के कुछ इलाकों, बिहार के बक्सर और गोरखपुर में पूर्व सांसद व लेफ्टिनेंट जनरल के अपनी नातियों को जनेऊ धारण कराने के कुछ अपवाद छोड़ दें तो कहीं भी लड़कियों को जनेऊ धारण नहीं कराया जाता। फरीदाबाद के सेक्टर 21 डी में स्थित महाराजा अग्रसेन मंदिर में 23 नवंबर को अरविंद रैना और रचना अपनी बेटियों अनुष्का और आरोही का यज्ञोपवीत संस्कार कराने जा रहे हैं। इन ऐतिहासिक क्षणों का हिस्सा बनने के लिए जम्मू व देश के अन्य शहरों से भी लोग जाएंगे।
दीक्षा दिलाने वाले पंडित भी जम्मू से ही जाएंगे। इन बच्चियों की चाची खंडा बताती हैं कि बच्चियों के जन्म के समय ही उन्हें जनेऊ धारण कराने का सोचा गया था। अब समाज के इस ओर कदम बढ़ाने से हमें हौसला मिला है। इसके अलावा जम्मू सहित देश भर में कुल सात कश्मीरी परिवार की बेटियों के भी जनेऊ धारण कार्यक्रम शुभ मुहूर्तों के दिन आयोजित होंगे। अमेरिका से एक परिवार अमृतसर पहुंचकर बेटी का दीक्षा समारोह आयोजित कराएगा। लड़कियों को भविष्य में जनेऊ धारण कराने के लिए समाज के अन्य लोग भी जम्मू में पंडितों से संपर्क कर रहे हैं।

लड़कियों को कई नियमों से छूट भी

कश्मीरी समाज में लड़कियों के लिए सांकेतिक माने जा रहे जनेऊ संस्कार में कई नियमों में छूट भी रखी गई है। अग्निशेखर के अनुसार जनेऊ धारण करते समय यज्ञ में बैठने के लिए उन्हें मुंडन से छूट दी गई है।

इसी तरह मासिक धर्म की वजह से लड़कियां जनेऊ धारण करने के बाद उसका विसर्जन कर सकतीं हैं। परंपरा के अनुसार शादी के बाद पुरुष के जनेऊ में तीन की जगह छह धागे हो जाते हैं। ये तीन धागे पत्नी के नाम के होते हैं। ऐसे में शादी के बाद भी लड़की जनेऊ पहनना छोड़ सकती है।

(साभार – अमर उजाला)

मुंशी प्रेमचंद की किस्सागोई का तिलिस्म लमही बनेगा ई – विलेज

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कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का गांव लमही महज एक गांव नहीं है, यहां कथा सम्राट की कहानियों का तिलिस्म भी है। ईदगाह के हामिद का चिमटा, गोदान का होरी और नमक का दरोगा का नायक…। सब लमही की उस लाइब्रेरी में अपनी शिद्दत के साथ मौजूद हैं। मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों जैसी ही है उनके गांव की कहानी। लमही को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक बहुत बड़ा तोहफा दिया है जो उस महान लेखक को श्रद्धांजलि स्वरुप है। उत्तर प्रदेश सरकार ने लमही को प्रदेश का पहला “ई-विलेज” घोषित करने का फैसला लिया है। अब यहां की सारी जानकारी एक क्लिक में प्राप्त होगी। साथ ही ग्रामीणों का एक विशिष्ट कोड भी बनाया जाएगा। इस बात से ग्रामीणों में ख़ुशी की लहर है।

इस बारे में ज़िलाधिकारी प्रांजल यादव ने बताया कि “हम सभी जानते हैं कि आज युवा पीढ़ी गांवों से निकलकर शहर की ओर रुख कर रही है क्योंकि गांवों में सुविधाओं का टोटा (अभाव) है। मुंशी प्रेमचंद के गांव का महत्व भारतीय इतिहास में बहुत मायने रखता है। इस गांव के अस्तित्व को बचाने के लिए ज़िला प्रशासन और राज्य सरकार संकल्पित है।”

मुंशी जी के गांव के लोगों को हर तकलीफों से निजात मिल सके और यहां की भावी पीढ़ी इसे विश्व पटल पर स्थान दिलाने के लिए लमही में ही काम करे, इस दिशा में काम करते हुए राज्य सरकार ने इसे “ई-विलेज” घोषित किया है। अब जल्द ही लमही के घर-घर का डेटा ऑनलाइन होगा। सभी का खसरा, खतौनी, आय-जाति और निवास प्रमाण-पत्र ऑनलाइन होगा। इसके अलावा आधार कार्ड, जॉब कार्ड, सभी ऑनलाइन होंगे। साथ ही गांव वालों की एक विशिष्ट आईडी बनायी जायेगी जो सभी जगह मान्य होगी।

मुंशी प्रेमचंद्र ने हर तरफ से निराश हो कर खाली हो चुके ‘पूस की रात’ के हल्कू की जिस संवेदना को समझा था वही आगे चल कर ‘सवासेर गेहूं’ के कर्ज के कम्बल में लिपटी किसान की हताशा के रूप में दिखाई पड़ी। जिसका कर्ज आने वाली पीढ़ी भी अदा नहीं कर पाती है। तो वही ‘कफ़न’ का घीसू और माधव बन जाता है। जिसकी सूख चुकी संवेदना आज भी मुंशी जी के गांव में दिखाई पड़ती है।

वाराणसी जिला मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर दूर वाराणसी-आजमगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग पर पांडेयपुर चौराहे से करीब पांच किलोमीटर का यह रास्ता पूरा होने पर जैसे ही गोदान के होरी-धनिया, पूस की रात के हलकू जैसे किरदारों के जनक मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही का प्रवेश द्वार आता है, उनकी छाप महसूस होने लगती है।

उपन्यास सम्राट की अमर कहानियों के बीच उनके बचपन की झलक दिखाता एक गिल्ली डंडा भी। सच ये है लमही की पहचान प्रेमचंद हैं और उनकी कहानियों का मर्म यहां की आब-ओ-हवा में घुला है। लमही गांव में मुंशी प्रेमचंद स्मारक स्थल पर प्रेमचंद स्मारक न्यास लमही की एक लाइब्रेरी है।
मुंशीजी के उपन्यासों, कहानियों की यह लाइब्रेरी सिर्फ एक पुस्तकालय तक ही सीमित नहीं है। कोशिश है कि न केवल उनकी किताबों को पढ़ा जाए, बल्कि प्रेमचंद को समझा जाना जाए। बचपन में मुंशी प्रेमचंद अक्सर दोस्तों के साथ गिल्ली डंडा खेला करते थे। ये उनका पसंदीदा खेल था।

 


इस लाइब्रेरी में मौजूद गिल्ली डंडा उनके बचपन के इसी पहलू को दिखाता है। इसी तरह यहां रखी पिचकारी भी उनके होली के त्योहार से जुड़े रहने का एहसास कराती है। भला ईदगाह कहानी के हामिद के चिमटे को कौन भूल सकता है। हामिद ने खिलौनों के बजाय इसे अपनी दादी के लिए खरीदा था।

मानवीय संवेदना, पारिवारिक मूल्यों के उसी भाव को दर्शाता है यहां रखा चिमटा। यहां उपलब्ध किताबों की लंबी फेहरिस्त में वो ‘जमाना’ भी है, जिसे अंग्रेजों ने जला दिया और वो समर यात्रा भी इसे अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था। प्रेमचंद स्मारक न्यास लमही के अध्यक्ष सुरेश चंद्र दुबे का कहना है कि इस गांव में अब भी कफन की बुधिया, बूढ़ी काकी और निर्मला जैसे किरदार हैं लेकिन अब उनके दर्द को लिखने वाला कोई नहीं।

गौरतलब है कि आज़ादी के बाद से अब तक हर साल न जाने कितनी घोषणाएं सरकारें करती रही लेकिन कोई भी मुकम्मल तौर पर पूरी नहीं हुई है। यही वज़ह है कि इस योजना को भी लेकर लोगों में संशय है। अब तो वक़्त ही बताएगा कि मुंशी जी का गांव कब तक “ई-विलेज” बनेगा।

 

 

इंजीनियर ने शुरू किया चिट्ठियाँ लिखने का स्टार्टअप

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चिट्ठियों के खत्म होते दौर को फिर से जीवित करते हुए बेंगलुरु के युवा इंजीनियर अंकित अनुभव व उनके दोस्तों ने एक ऐसा स्टार्टअप शुरू किया है, जहाँ कोई भी व्यक्ति उनकी मदद से अपने प्रेमी, प्रेमिका या रिश्तेदारों को चिठ्ठियां लिखवा सकता है।

अनुभव ने अपने स्टार्टअप के माध्यम से गुज़रे ज़माने को वापस लाने की एक खूबसूरत कोशिश की है। अगर आप भी किसी से प्यार करते हैं, लेकिन उसके सामने इज़हार से डरते हैं या फिर आपको मालूम ही नहीं है कि ख़त लिखें कैसे क्योंकि शब्दों का अता-पता नहीं, तो फिर बेझिझक जुड़ जायें अनुभव और उनकी टीम से।

आज वो समय है कि लोग खत लिखते ही नहीं, लेकिन ख़तों के दौर को फिर से जीवित करते हुए बेंगलुरु के युवा इंजीनियर अनुभव व उनके दोस्तों ने एक ऐसी ब्लॉग साईट शुरू किया है, जहाँ आप उनकी मदद से अपनी पसंद की चिठ्ठियां अपने दिलअजीज़ को लिखवा सकते हैं।

अनुभव ने अपने स्टार्टअप के माध्यम से गुज़रे ज़माने को वापस लाने की एक खूबसूरत कोशिश की है। अगर आप भी किसी से प्यार करते हैं, लेकिन उसके सामने इज़हार से डरते हैं या फिर आपको मालूम ही नहीं है कि ख़त लिखें कैसे क्योंकि शब्दों का अता-पता नहीं, तो फिर बेझिझक जुड़ जायें अनुभव और उनकी टीम से। जो आपके दिल के हाल को शब्दों में बयां करने की खूबियों से भरे हुए हैं। आप इन युवा इंजीनियरों से बेझिझक मदद ले सकते हैं। आप जिन लोगों के लिए चिठ्ठी लिखवाना चाह रहे हैं, तो अनुभव और उनकी टीम को उनकी साईट के माध्यम से उन लोगों का नाम, पता और उनके प्रति अपनी भावनाएं बता दें, ये उन्हें बखूबी अपने शब्दों में उतार कर उनके पते पर पंहुचा देंगे।

सोशल मीडिया के जमाने में तो अच्छे भले शब्द भी शॉर्ट कट में लिखे जाने लगे हैं। लोगों का कहना है कि लंबी-लंबी चिठ्ठियों में जो प्रेम और अपनापन नज़र आता था आज सोशल मीडिया के दौर में वो बात नहीं, लेकिन बेंगलुरु के इन युवाओं ने चिठ्ठी लिखने की परंपरा को जिंदा रखने के लिए यह अनोखा तरिका खोज निकला है।

अनुभव ने बताया कि वे और उनके दोस्त टेक्नोलॉजी कंपनी में काम करते थे। छुट्टियों में जब तीनों दोस्त मिला करते तब सोचते थे कि इस रोबोटिक दौर में भी लोगों को कुछ ऐसा दिया जाए जो सीधा उनके दिल तक पहुँच सके। अनुभव ने कहा “मैं बचपन में चिठ्ठियां लिखा करता था, अपने दादा, मामा और सभी सगे-संबंधियों से बात करने के लिए उन्हें चिठ्ठी लिख कर पोस्ट करता था। फिर हमने सोचा कि क्यों न कोई ऐसी ब्लॉग साईट बनाई जाए, जहां आकर लोग हमसे चिठ्ठियां लिखने को कहें। ये शुरुआत हमने शौक के रूप में की थी, जो अब हमारा व्यवसाय बन गई है।”

साल 2015 में इन्होंने अपना ब्लॉग शुरू कि और उसमें लिखा कि अगर किसी को किसी भी प्रकार की चिठ्ठी लिखवानी हो तो हमें बताएं हम आपके बताये पते पर चिठ्ठी लिख कर भेजेंगे। करिब 3 हफ्ते में 140 रिक्वेस्ट आईं, कि आप किस भाषा में ख़त लिखते हैं, कितने दिन में ख़त पहुंचेगा तथा इसकी पेपर क्वालिटी कैसी होगी… आदि… आदि…। जब इन लोगों से जब अनुभव और उनकी टीम की बात हुई तो उनका मनोबल और बढ़ गया, कि आज इस व्हाट्सएप्प और सोशल मीडिया के बदलते दौर में भी लोगों में चिठ्ठी का अच्छा खासा क्रेज़ है। अनुभव कहते हैं, “यह देख कर हमे हिम्मत मिली और हमलोगों ने दिलचस्पी लेकर छह-सात महीने इस पर रिसर्च की।”

साल 2016 में इस टीम ने ने ‘द इंडियन हैंडरिटेन लेटर कॉर्पोरेशन’ के नाम से अपनी साईट की शुरुआत की। अनुभव बताते हैं कि “प्रतिदिन 100 रिक्वेस्ट में लगभग 70 रिक्वेस्ट प्रेम-पत्र के लिए ही होती हैं।” कई बार इनके पास ऐसी रिक्वेस्ट भी आती हैं, कि हमारी गर्लफ्रेंड के लिए ख़त लिख दो लेकिन हम उसका पता नहीं बता पाएंगे, ऐसे में उस ख़त को सही जगह पहुँचाने में अनुभव की टीम को खासा परेशानी उठानी पड़ती है।

अनुभव बताते हैं, कि अगर ग्राहक सिर्फ ये बताता है कि लेटर किस विषय पर लिखना है और किसे भेजना है तब वे 2.50 रूपये प्रति शब्दके हिसाब से चार्ज करते हैं, और यदि ग्राहक उन्हें कंटेंट लिखकर देता है, तो वे उसे 1 रूपये प्रति शब्द चार्ज करते हैं। क्योंकि डिजिटली कंटेंट को भी इन्हें मैनुअली ही लिखना पड़ता है। ये निजी खतों के अलावा कंपनियों द्वारा ग्राहकों को भेजने के लिए भी चिठ्ठियां लिखते हैं।

अनुभव का यह मानना है, कि यदि हमारी सोच पक्की और इरादे मजबूत हों तो हम किसी भी दिशा में आगे बढ़ने में सफल हो सकते हैं। सब से पहले हमें खुद पर भरोसा करना होगा और अपने सपनों को पूरा करने के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।

(साभार – योर स्टोरी)

जीएसटी : 2 लाख रुपए तक के गहने खरीदने पर पैन जरूरी नहीं

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जीएसटी पर अमल के तीन महीने बाद केंद्र सरकार ने इससे परेशान छोटे एवं मझोले उद्योगों (एसएमई) को बड़ी राहत देते हुए कंपोजिशन स्कीम में टर्नओवर की सीमा 75 लाख रुपये से बढ़ाकर एक करोड़ रुपये कर दी है। जीएसटी काउंसिल के फैसले ने व्यापारियों के चेहरे खिला दिए हैं। दो लाख तक के जेवर खरीदने पर पैन कार्ड नंबर की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है, जिससे सराफा कारोबार को सबसे बड़ा फायदा मिलेगा।

यही नहीं, डेढ़ करोड़ रुपये के टर्नओवर वाले कारोबारियों को मासिक रिटर्न भरने से छूट देते हुए उन्हें तिमाही रिटर्न दाखिल करने की सुविधा दी गई है। साथ ही, व्यापारियों को परेशान कर रही रिवर्स चार्ज प्रणाली को अगले साल मार्च तक टाल दिया गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में शुक्रवार को जीएसटी काउंसिल की 22वीं बैठक में ये फैसले किए गए।

जेटली ने कहा कि कंपोजिशन स्कीम की सीमा एक करोड़ रुपये किए जाने से ज्यादातर छोटे व्यापारियों को फायदा होगा। अगर वे ट्रेडिंग करते हैं तो एक फीसदी, मैन्युफैक्चरिंग में हैं तो दो फीसदी और रेस्तरां चलाते हैं तो पांच फीसदी का टैक्स देकर चैन से अपना धंधा चला सकते हैं।
साथ ही, डेढ़ करोड़ तक टर्नओवर वालों को तिमाही रिटर्न से छूट देने से उन पर कंप्लायंस का बोझ कम होगा। उन्होंने कहा कि रिवर्स चार्ज से भ्रम फैल रहा था, इसलिए इसे 31 मार्च, 2018 तक स्थगित कर दिया गया है। ई-वे बिल के बारे में कहा कि इस पर अगले साल एक अप्रैल से अमल किया जाएगा।

ये चीजें मिलेंगी सस्ती

काउंसिल की बैठक में 27 आइटमों पर टैक्स की दरें घटाने का फैसला किया गया है। चुनाव वाले राज्य गुजरात के कपड़ा व्यापारियों को साधने के लिए मैनमेड यार्न पर टैक्स 18 से घटाकर 12 फीसदी कर दिया गया है।
इसके अलावा डीजल इंजन और पंप के पुर्जों पर 28 से घटाकर 18 फीसदी, क्लिप और पिन जैसी स्टेशनरी वस्तुओं पर 28 से 18 फीसदी, गैरब्रांडेड आयुर्वेदिक दवाओं पर 12 से पांच फीसदी और ई-वेस्ट पर 28 से घटाकर पांच फीसदी कर दिया गया है।

एसी रेस्तरां में सस्ता होगा खाना
जेटली ने बताया कि बैठक में एसी रेस्तराओं पर टैक्स की दरें कम करने का सवाल भी उठाया गया। इसके मद्देनजर, इन पर 18 फीसदी के बजाय 12 फीसदी की जीएसटी दर लागू करने पर सैद्धांतिक सहमति बन गई है। इसे लागू करने के तरीके पर विचार करने के लिए मंत्रियों के समूह (जीओएम) का गठन कर दिया गया है जो 20 दिन में अपनी रिपोर्ट देगा। लेकिन अगर दरें कम की गईं तो उन्हें इनपुट टैक्स क्रेडिट की सुविधा से हाथ धोना पड़ सकता है।

जॉब वर्क वालों को राहत
जॉब वर्क करने वालों को राहत देते हुए सरकार ने जीएसटी की दरें 12 फीसदी से घटाकर पांच फीसदी कर दी है।

निर्यातकों को भी सुविधा, ई-वालेट 1 अप्रैल से

जेटली ने कहा कि निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है, लेकिन जीएसटी प्रणाली में उनका काफी क्रेडिट फंसा हुआ है। इसके मद्देनजर तय किया गया है कि जुलाई और अगस्त के उनके रिफंड का तत्काल भुगतान कर दिया जाएगा।
इसकी प्रोसेसिंग 10 अक्तूबर से शुरू कर दी जाएगी। इसके बाद वे 0.1 फीसदी का टैक्स चुकाकर निर्यात कर सकते हैं। इस दौरान उन्हें आईजीएसटी से छूट मिलेगी। यह व्यवस्था 31 मार्च, 2018 तक लागू रहेगी। इसके बाद 1 अप्रैल से उनके रिफंड की व्यवस्था ई वालेट के जरिए होगी।

जीओएम करेगा विचार
जेटली ने कहा कि बैठक में कई ऐसे सवाल उठाए गए जिन पर मंत्रियों का समूह विचार करेगा। ये सवाल हैं:
– क्या कंपोजिशन के टर्नओवर में बिना टैक्स वाली वस्तुओं की बिक्री शामिल होगी?
– क्या कंपोजिशन स्कीम में एक राज्य से दूसरे राज्य में व्यापार की अनुमति होगी?
– क्या कंपोजिशन में मैन्युफैक्चरिंग पर दो फीसदी टैक्स लगेगा तो उस पर इनपुट टैक्स क्रेडिट भी इसी दर पर मिलेगा?

 

‘जाने भी दो यारों’ के निर्देशक कुंदन शाह का निधन

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बॉलीवुड निर्देशक कुंदन शाह का गत शनिवार की सुबह निधन हो गया> 19 अक्टूबर 1947 को जन्मे कुंदन शाह 69 वर्ष के थे। बताया जा रहा है कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था।

फिल्म और टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया से निर्दशन की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कॉमेडी “जाने भी दो यारों” से 1983 में अपने फ़िल्मी कॅरियर की शुरुआत की। इस फ़िल्म के वो सहायक पटकथा लेखक भी थे।

शाह इसके बाद टेलीविजन की दुनिया की ओर मुड़ गए। वहां उन्होंने “ये जो है ज़िंदगी” से शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने नुक्कड़ (1986), मनोरंजन (1987) और आर के लक्ष्मण के कार्टून आम आदमी पर आधारित वागले की दुनिया (1988) जैसे यादगार सीरियल बनाए।

कई टीवी सीरियल को बनाने के बाद कुंदन शाह ने सिनेमा से सात साल का ब्रेक लिया। इसके बाद 1993 में उन्होंने “कभी हां, कभी ना” से वापसी की. इसकी पटकथा भी उन्होंने लिखी। इस फ़िल्म के लिए उन्होंने फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी जीता।

इसके बाद उनकी 1998 में बनाई गई “क्या कहना” भी हिट रही। लेकिन, इसके बाद की सभी फ़िल्में “हम तो मोहब्बत करेगा”, “दिल है तुम्हारा”, “एक से बढ़कर एक” औऱ 2014 में आखिरी फ़िल्म “पी से पीएम तक” बॉक्स ऑफ़िस पर औंधे मुंह गिरी।

सोशल मीडिया पर आई प्रतिक्रियाएं

कुंदन शाह के निधन की ख़बर शनिवार सुबह मीडिया में आई। इसके बाद सोशल मीडिया में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि देना शुरू कर दिया। फ़िल्म निर्देशक हंसल मेहता ने लिखा, ”जाने भी दो यारों, कुंदन शाह की आत्मा को शांति मिले. दुखी करने वाली ख़बर।”

विक्रम भट्ट ने ट्वीट किया, ”जाने भी दो यारों जैसी अविस्मरणीय फ़िल्म देने वाला आदमी हमें छोड़कर चला गया। वो चला गया लेकिन वो अब भी ज़िंदा है।”

संकेत भोसले नाम के ट्विटर यूज़र ने लिखा, ”आपकी आत्मा को शांति मिले। मेरी पसंदीदा फ़िल्म ‘कभी हां, कभी ना के लिए शुक्रिया।

 

राजनीतिक दलों को आरटीआई कानून के दायरे में लाने के लिये याचिका

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नयी दिल्ली : उच्चतम न्यायालय में एक नयी याचिका दायर कर राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के दायरे में लाने की मांग की गयी है। यह याचिका राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाने और चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से दायर की गयी है। दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता और वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में केंद्र को भ्रष्टाचार और सांप्रदायीकरण के खतरे से निपटने के लिये कदम उठाने का निर्देश देने की भी मांग की गयी।

याचिका में कहा गया, ‘‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(एच) के तहत एक ‘लोक प्राधिकार ’ घोषित किया जाये। जिससे उन्हें लोगों के लिये पारदर्शक और जवाबदेह बनाया जा सके और चुनावों में काले धन के इस्तेमाल पर अंकुश लगाया जा सके।’’ जनहित याचिका में निर्वाचन आयोग से आरटीआई अधिनियम और राजनीतिक दलों से जुड़े अन्य कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करवाने के लिये निर्देश देने की मांग की गयी। याचिका में यह भी मांग की गयी है कि अगर वे इनका पालन करने में विफल रहते हैं तो उनका पंजीकरण रद्द कर दिया जाये।

विश्वविद्यालयों में बम खतरे, परिसर में गोलीबारी से बचाव पाठ्यक्रम को शामिल किया जाएगा : यूजीसी

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नयी दिल्ली : यूजीसी ने देश भर के विश्वविद्यालयों से कहा है कि वे आपदा प्रबंधन पाठ्यक्रम की शुरुआत करें जिसमें बम हमले के खतरे, परिसर में गोलीबारी और आतंकवादी हमले जैसे विषय शामिल किए जाएं।विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने कहा कि पाठ्यक्रम को आवश्यक बनाया जाना चाहिए। इसने हाल में विश्वविद्यालयों को लिखे पत्र में कहा कि इस पहल का उद्देश्य विद्यार्थियों को दुर्घटनाओं के साथ ही हमले और खतरे से बचाना है।
पत्र में कहा गया है, ‘‘सभी विश्वविद्यालयों को आपदा प्रबंधन पर आवश्यक रूप से विचार करना चाहिए जिसमें बम हमला, विस्फोट, भूकंप, खतरनाक सामग्री उत्सर्जन, परिसर में गोलीबारी, आतंकवादी हमले, वित्तीय आपातकाल शामिल किए जाने चाहिए।’’ सरकार ने 2015 में ‘‘विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों की सुरक्षा’’ पर दिशा-निर्देश जारी किए थे।

लिटरेरिया 2017 : हिमाकत के चार दिन और आसमान नीला करता नीलांबर

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कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।

बस पत्थर तो उछाला जा चुका है और आसमां में भी एक दिन सुराख कर दिया जाएगा। आसमान की कालिख को जरा सा हल्का कर करके उसे नीला कर दिया जाएगा और ये आसमान है हमारे साहित्य का, संस्कृति का और हमारी उम्मीदों का। आसमान में सुराख करने के लिए ये पत्थर नीलांबर ने उछाला है। दु:स्साहस है यह….बगैर किसी भारी – भरकम अनुदान के, बगैर किसी सरकारी प्रश्रय के कुछ युवाओं और मुट्ठी भर लोगों ने यह दु:स्साहस कर डाला….वो भी बगैर किसी अकादमिक संस्थान की जी –हजूरी किए…बगैर किसी भारी – भरकम संस्था का चक्कर काटे….? मगर परवाह किसे है। साहित्य को नये सिरे से परिभाषित करते उसे तकनीक और आधुनिकता से जोड़ देना और कवियों का परिचय किसी सेलिब्रिटी की तरह देना और हिन्दी के कवियों को सेलिब्रिटी की तरह पेश करना हिमाकत ही तो है मगर नीलांबर ने जड़ता की ताबूत में एक कील ठोक दी है…..मठाधीशों…..जो उखाड़ना है, उखाड़ लो….हम तो बढ़ेंगे।

छोटे – छोटे कार्यक्रम करते हुए कभी कविता की साँझ को लाल किया तो कभी कहानियाँ कह डालीं और कभी कविताओं का कोलाज बना डाला और बीच मैदान में बैठकर कविता पाठ करवा दिया….हद है…बड़े कवि कभी इस तरह कविता पढ़ते हैं….क्या समझ रखा है…उफ…मगर ये क्या? राह चलते लोग खड़े हो गये… अंत तक सुनते रहे….और संशोधन भी करते रहे…ये क्या कर रहे हो भाई…कविता को आम आदमी तक पहुँचा रहे हो…अरे….उसे कैद करने के लिए कितनी मेहनत कर रहे हैं और तुम हो कि फेसबुक पर फैज…को ला दे रहे हो…। नीलांबर! ये हिमाकत है….लो एक और हिमाकत कर डाली….अरे….इसे तो लाइक पर लाइक मिल रहे हैं…कारवां है कि रुकने का नाम नहीं ले रहा है……लो अब तो हम चार दिन की ताजा हिमाकत करेंगे….। तो लीजिए नीलांबर साहित्य और संस्कृति की दुनिया में अंगद के पैर की तरह जमने के लिए तैयार हो गया है…..इस बार नीलांबर कोलकाता, पेश कर रहा है……लिटरेरिया कोलकाता 2017…….।

12 अक्टूबर को होगा उद्घाटन और 15 अक्टूबर तक साहित्य और संस्कृति के जगमगाते सितारों से सजेगा .शहर…शारदोत्सव के बाद लिटरेरिया उत्सव 2017।अगर प्रोफेसरों के धरने और शिक्षकों की धमकियों से कान पक गए हों तो भारतीय भाषा परिषद में 12 अक्टूबर को समालोचना पर्व में आ जाना…नन्ही आहना अपना नृत्य प्रस्तुत करेंगी…इसके बाद होगा समालोचना पर्व….जिसकी अध्यक्षता करेंगे डॉ. शम्भुनाथ….हम दावा करते हैं….एक बार सुन लिया इनको तो गुस्सा गुलाब जल बन जाएगा…और अपनी कुर्सियों से हिलोगे नहीं।  इसके बाद पंकज चतुर्वेदी, आशीष त्रिपाठी, वेदरमण, राहुल सिंह भी हैं और संयोजक हैं संजय राय…अरे वही जिनकी मारक कविताएँ तुम सुनते ही रहते हो।

चार दिनों के इस मेधा सारस्वत  उत्सव में देश भर से साहित्यकार आ रहे हैं…कुछ युवा तो कुछ वरिष्ठ और कुछ अपनी कविताओं से तुम्हारी नाक में दम कर जड़ता को चरमरा देने वाली महिलाएँ….भी। एक राष्ट्रीय संगोष्ठी….नाटक और कहानी भी…..एकदम साहित्यिक…..मोबाइल पर प्रोफाइल फोटो अपलोड करते –करते थक गए हो…बसों में कंडक्टर खुदरा नहीं देता और उसका सिर फोड़ने को जी चाहे तो ऐसा मत करना, बस 13 अक्टूबर को सुबह 11 बजे से आ जाना शरत सदन….एकदम टकाटक कविताएँ सुनने को मिलेंगी….इतनी टकाटक कि भूल जाओगे कि मल्टीप्लेक्स में जाकर एक सड़ी हुई फिल्म देखकर पैसे गंवा आए हो….एकदम ताजा जैसे पसीने से गंधाती बस एसी के नीचे आ गयी हो….बस आ जाना…दिल खुश हो जाएगा…।

वन डे खेला है….या देखा है तो…ये कविता का वन डे है और खिलाड़ी इतने हैं कि नाम लिखते – लिखते ही हाथ थक जाए तो इनके नाम इनकी शक्ल के साथ देख लो…तबीयत हरी हो जाएगी। संयोजक अपने ही शहर की निर्मला तोदी और आनंद गुप्ता हैं। अरे, वही आनंद जो दिखते ही सीरियस हैं मगर हैं नहीं…अच्छा लगेगा….पक्का। 13 अक्टूबर को ही कोलाज, माइम, और एक रोज नाटक भी है और ये सब है हावड़ा मैदान के शरत सदन में।

14 अक्टूबर को गोर्की सदन में शाम 4 बजे एक साँझ कहानी की होगी और कहानीकार चंदना राग तथा चंदन पांडेय कहानी पाठ करेंगे। इसके बाद शाम 5.30 बजे भोपाल के विहान ड्रामा वर्क्र्स का नाटक हास्यचूड़ामणि होगा।

15 अक्टूबर रविवार है, छुट्टी रहेगी…आ जाइए शरत सदन में शाम 4 बजे रश्मि बंद्योपाध्याय का नृत्य, सुशांत दास का अ टेल ऑफ फिश नामक माइम देखने।

अमृता प्रीतम की रचना पर बना पिंजर देखा है तो अब उनकी जिन्दगी और आत्मकथा रसीदी टिकट पर आधारित नाटक अमृता देखना न भूलना जिसे भोपाल का विहान ड्रामा वर्क्स पेश करेगा। हाल ही में रंगकर्मी रवि दवे जी का देहांत हो गया। उन्होंने कई नाटकों का निर्देशन किया है,जैसे गोदान, हानूष। नाटकों के लिए उनके समर्पण और इस क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए नीलांबर कोलकाता उनकी स्मृति में ‘रवि दवे स्मृति सम्मान’ की घोषणा करता है।

वर्ष 2017 का यह सम्मान कोलकाता की ‘लिटिल थेस्पियन’ संस्थान को दिया जाएगा। इस संस्था ने कोलकाता में हिन्दी रंगमंच को नई पहचान दी! यह सम्मान समारोह 15 अक्टूबर 2017 को शरत सदन में होगा! 4 दिन तक एकदम कविता, कहानी, माइम, कोलाज और नाटक….और क्या चाहिए…और ये सब कर रहा है नीलाबंर।

तो नीलांबर के लिए एक बड़ा सा शुक्रिया तो बनता ही है….तो अपराजिता की तरफ से नीलांबर की पूरी टीम को ढेर सारी शुभकामनाएँ….हिमाकत करते चलिए…..आसमान नीला करते रहिए…आसमान नीला ही अच्छा लगता है और उसकी कालिख को बस धोना बन्द न करना…..बढ़े चलो साथियों….हम सब साथ हैं….