Saturday, October 3, 2026
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इस महिला पायलट की सूझबूझ से टला बड़ा विमान हादसा

हाल ही में भारत में दो विमानों की टक्कर होते-होते बची। यह हादसा एयर इंडिया की फ्लाइट A-631 और विस्तारा की फ्लाइट UK 997 के बीच होने वाला था। एयर इंडिया की फ्लाइट मुंबई से भोपाल और विस्तारा दिल्ली से पुणे के लिए जा रही थी। इन दोनों में कुल 261 यात्री सवार थे। एयर ट्रैफिक कंट्रोलर के बयान के मुताबिक किसी गलतफहमी के चलते दोनों विमान एक दूसरे के काफी पास आ गए थे, लेकिन एयर इंडिया की पायलट अनुपमा कोहली की सूझ-बूझ से काफी बड़ा हादसा टल गया।

दोनों विमान इतने करीब आ गए थे कि उन दोनों में महज 100 फीट का फासला बचा था। आपस में टकराने में कुछ सेकेंड्स ही काफी थे। रिजॉल्यूशन एडवाइजरी रिपोर्ट में अनुपमा ने बताया कि दोनों विमानों के बीच की दूरी 100 फीट से ज्यादा नहीं थी। लेकिन यह हादसा टल गया क्योंकि ऑटोमेटिक वॉर्निंग की वजह से दोनों विमानों के पायलटों ने अपनी स्थिति बदल ली। दिलचस्प बात यह है कि दोनों विमानों की कमान महिलाओं के हाथों में ही थी। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों विमानों को मैनेज करने वाले एयर ट्रैफिक कंट्रोलर को निलंबित करने के आदेश दे दिए हैं।

 एयर इंडिया की पायलट अनुपमा कोहली के पास विमान उड़ाने का 20 साल से अधिक लंबा अनुभव है। कोहली ने देखा कि उनके विमान की दिशा में विस्तारा का विमान रहा है। कोहली ने अपने अनुभव का पूरा प्रयोग करते हुए स्थिति को संभाल लिया। विस्तारा विमान को अपनी तरफ बढ़ते देख उन्हें रेड सिग्नल मिला। विस्तारा की महिला पायलट ने एटीसी को संपर्क के दौरान कहा कि आपने मुझे इसी लेवल पर उड़ान भरने का निर्देश दिया है। कोहली ने जब विस्तारा के विमान को इस तरफ आते देखा तो उन्होंने दाहिनी तरफ मुड़कर विमान के उड़ान के लिए जगह बना दी और अपने विमान को थोड़ा नीचे कर लिया। इस तरह दोनों विमान के यात्री सुरक्षित बच गए।

पायलट कोहली के त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और कुशलता से स्थिति संभालने के लिए एयर इंडिया ने काफी तारीफ की। विस्तारा एयरलाइंस का कहना है कि पायलट का टॉइलट ब्रेक नियमानुसार ही था और हमारा विमान निर्देश के अनुसार ही उड़ान भर रहा था। फाइनैंशियल एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार एयरक्राफ्ट एक्सिडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) की तरफ से मामले की जांच करने के लिए टीम गठित कर दी गई है। एयर इंडिया ने अनुपमा कोहली के काम को सराहा। AAIB ने उन्हें फिर से उड़ान भरने की मंजूरी दे दी है।

नौवीं कक्षा के छात्र ने रुकवाया अपना बाल विवाह

रुढ़िवादी मानसिकता को छोड़ युवा पढ़ लिखकर खुद के साथ ही देश की तरक्की की बात करने लगे हैं। मामला बाल विवाह सरीखी कुप्रथा का है। वैसे तो श्रवस्ती में नाबालिगों का विवाह आम बात है। लेकिन यह पहली दफा है जब किसी नाबालिग (कक्षा-नौ के छात्र) ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है। पीड़ित ने अपने पिता के ही खिलाफ मल्हीपुर थाने में तहरीर दे दी। मामला मल्हीपुर थाने के ग्राम फत्तेपुर बनगई स्थित गड़रियनपुरवा गांव का है।

यहां रहने वाले बिकाऊ लाल ने अपने नाबालिग पुत्र हनुमान प्रसाद की शादी तय की है। जबकि हनुमान प्रसाद अभी कक्षा नौ की पढ़ाई कर रहा है। शादी की बात सुनकर हनुमान प्रसाद के होश उड़ गए। उसने पिता को कानून का हवाला देकर कहा कि उसकी शादी अभी नहीं की जा सकती। उसने तर्क दिया कि उसे पढ़ लिखकर कुछ बनना है, लिहाजा शादी नहीं करेगा। हालांकि परिजनों ने हनुमान की बात नहीं मानी और उल्टा दबाव बनाने लगे। यह देख हनुमान ने पुलिस से मदद की ठानी। शनिवार को मल्हीपुर थाने में पिता के खिलाफ तहरीर देकर शादी रुकवाने की गुहार की।

पिता के तनाव से बच्चों के दिमाग पर होता है असर

एक नए शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि बहुत ज्यादा तनाव आपके बच्चों के दिमाग के विकास को प्रभावित कर सकता है।  शोधकतार्ओं के मुताबिक, तनाव पिता के शुक्राणुओं को बदल देता है, जिससे बच्चे के दिमाग का विकास बाधित हो सकता है।

शोधकतार्ओं ने कहा है कि नया शोध बच्चों के दिमाग के विकास में पिता की भूमिका की बेहतर समझ प्रदान करता है। इससे पहले यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड स्कूल के शोधकतार्ओं ट्रेसी बेल व अन्य ने नर चूहों पर किए गए प्रयोग में पाया कि उसके क्रोनिक तनाव का मुख्य कारण उसके पिता के शुक्राणु में हुआ जेनेटिक मैटेरियल माइक्रोआरएनए में हुआ उत्परिवर्तन है। यह जीन प्रोटीन की कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अब शोधकतार्ओं ने इन माइक्रोआरएनए में हुए बदलाव के संबध में नई जानकारियां हासिल की हैं। पिता के शुक्राणुओं के माइक्रोआरएनए में हुए परिवर्तन का मुख्य कारण तनाव है। इस शोध के परिणाम को ऑस्टिन में हुए एएएएस 2018 सालाना सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। शोधकतार्ओं ने यह भी कहा कि पिता के जोखिम और बच्चों में बीमारी के जोखिम के बीच संबंधों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कर हम इन विकारों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं, जिससे इनका पता लगाने और इन्हें रोकने में कामयाबी मिलेगी।

निर्देश: तीन साल से ज्यादा बैंक की एक शाखा में नहीं रहेंगे अधिकारी

बैंकों द्वारा भेजे गए अधिकारियों के नियमित आवर्तन (रोटेशन) के निर्देश में कहा गया है कि सीवीसी के निर्देशों के मुताबिक हरेक अधिकारी का प्रत्येक तीन वर्ष में रोटेशन होना चाहिए। ऐसे में बैंक स्थानांतरण के नियमों के मुताबिक कोई भी अधिकारी एक पद पर तीन साल से ज्यादा एक शाखा में नहीं रहना चाहिए। यानी हरेक अधिकारी का स्थानांतरण तीन साल में अनिवार्य तौर पर होगा। क्लर्क समेत अन्य स्टाफ की सेवाएं भी पांच वर्ष से अधिक एक ब्रांच में नहीं होनी चाहिए। विभिन्न बैंकों द्वारा यह निर्देश सभी महाप्रबंधकों, उप महाप्रबंधकों, क्षेत्रीय प्रबंधक , उप क्षेत्रीय प्रबंधक और प्रबंधकों को भेजे गए हैं।
‘हिन्दुस्तान’ को मिले बैंक ऑफ इंडिया के निर्देश पत्र में उन अधिकारियों की सूची को भी संलग्न किया गया है, जो अधिकारी एक ही बैंक कार्यालय में तीन साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं।

सीवीसी ने 31 दिसंबर 2017 को दिए थे निर्देश  
सीवीसी ने 31 दिसंबर 2017 में बैंकों के अधिकारियों के रोटेशन के संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए थे। इनमें कहा गया था कि 31 दिसंबर की तारीख से तीन साल पूरा करने वाले सभी अधिकारियों का सार्वजनिक बैंक अन्यत्र कहीं स्थानांतरित करें। अन्य स्टाफ को भी पांच साल पूरा होते ही स्थानांतरित किया जाए। बैंकों को यह दिशा-निर्देश जारी कर सीवीसी ने उसे तत्काल सूचित करने को भी कहा था। हालांकि वित्त मंत्रालय के सूत्रों की माने बैंकों की ओर से अब तक सीवीसी को इस बारे में सूचित नहीं किया गया।

अधिकारी कर रहे हीलाहवाली 
एक अधिकारी के मुताबिक सार्वजनिक बैंकों के शीर्ष अधिकारी इस तरह के निर्देशों पर लचर रवैया अपनाते हैं। इसलिए उनका अनुपालन नहीं हो पाता है। माना जा रहा है कि बैंकों के शीर्ष अधिकारियों से जब सीवीसी के दिशा-निर्देशों के अनुपालन के बारे में मंत्रालय द्वारा पूछा गया तो इक्का-दुक्का को छोड़कर सभी की ओर से निराशाजनक जवाब दिया।

सीवीसी सख्त
अधिकारियों के निराशाजनक जवाब के बाद सीवीसी के दिशा-निर्देशों का अनुपालन सख्ती से किए जाने को कहा गया। इसके बाद ही बैंक प्रबंधनों ने तीन साल में अनिवार्य रोटेशन के संबंध में निर्देश जारी किए।

साखपत्रों पर रिपोर्ट तलब 
मंत्रालय की ओर से एलओयू और एलओसी के संबंधित दस्तावेज भी सार्वजनिक बैंकों से तलब किए गए हैं। दरअसल सरकार यह जानने का प्रयास कर रही है कि पीएनबी की तरह अन्य बैंकों में भी कहीं इस तरह के हजारों करोड़ के घोटाले तो नहीं हुए हैं। हालांकि, अभी तक ऐसा अन्य कोई मामला सामने नहीं आया है।

दिव्यांगों को छोड़ सभी पर सख्ती बरतें : अश्वनी 
नई दिल्ली। नेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ बैंक वर्कर के उपाध्यक्ष अश्वनी राणा ने कहा कि अधिकारियों के तीन साल के अनिवार्य स्थानांतरण के मामले में दिव्यांगजनों का ख्याल रखा जाए। उनके स्थानांतरण में नरमी बरती जाए, ताकि वह सुचारु अपना काम कर सकें। शेष अधिकारियों के लिए सीवीसी के दिशा-निर्देशों का सख्ती से अनुपालन कराया जाए। जबकि स्टाफ का पांच साल में अनिवार्य स्थानांतरण के निर्देश का सख्ती से पालन कराया जाए।

सऊदी अरब में अब व्यवसाय शुरू करने के लिए महिलाओं को पुरुष की इजाजत की जरूरत नहीं

सऊदी अरब में महिलाओं को कुछ और राहत मिल गई है। पहले उन्हें ड्राइविंग करने और फुटबॉल मैच देखने की इजाजत मिली थी। अब उन्हें बिजनेस करने की भी इजाजत मिल गईहै। इसके लिए उन्हें अपने पति या पुरुष रिश्तेदार से अनुमति लेने की भी जरूरत नहीं होगी।

दरअसल सऊदी अरब के शाह प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देना चाहते हैं। यही वजह है कि वे अब महिलाओं को भी इसमें आगे करना चाहते हैं और उन्हें अपनी मर्जी से कारोबार शुरू करने की इजाजत दे दी है।

गुरुवार को सऊदी की सरकार ने नीतियों में इस बदलाव का ऐलान किया। इसी के साथ ही मजबूत गार्जियनशिप की परंपरा भी खत्म हुई।
सऊदी के कॉमर्स एवं इनवेस्टमेंट मिनिस्ट्री ने अपनी वेबसाइट पर कहा है कि महिलाएं अपना बिजनेस लॉन्च कर सकती हैं और सरकार की ई-सर्विसेज की सुविधा ले सकती हैं। इसके लिए उन्हें अपने गार्जियन की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है।

क्या है गार्जियनशिप सिस्टम?

सऊदी में गार्जियनशिप सिस्टम काफी मजबूत है। इसके मायने हैं कि कोई भी महिला बगैर पति, भाई या पिता की इजाजत के बगैर किसी सरकारी पेपर पर साइन नहीं कर सकती है। इतनी ही नहीं, सऊदी अरब में महिलाओं को अकेले ट्रैवल करने या किसी क्लास में एडमिशन लेने के लिए भी किसी पुरुष की इजाजत लेनी पड़ती है।

अभी तक सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था पूरी तरह कच्चे तेल के उत्पादन पर टिकी है। अब वहां की सरकार देश में प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा देना चाहती है। इस योजना में वहां की सरकार महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ाना चाहती है।
इससे पहले क्राउन प्रिंस के पिता किंग सलमान ने महिलाओं की ड्राइविंग पर लगे बैन को हटाया था। यह बैन भी दशकों से लगा हुआ था। क्राउन प्रिंस ने सऊदी अरब के लिए ‘विजन 2030’ तैयार किया है, इसमें वह महिलाओं की हिस्सेदारी को 22 प्रतिशत से एक तिहाई करना चाहते हैं।

विलुप्त होने के कगार पर 42 भारतीय भाषाएं

नयी दिल्ली : विशाल और प्राचीनतम संस्कृति वाले भारत में भाषाओं और उनसे जुड़ी संस्कृतियों का खजाना है। लेकिन हाईटेक युग में आने के बाद भारत में 42 भाषाएं या बोलियां संकट में हैं। ऐसा माना जाता है कि संकटग्रस्त इन भाषाओं को बोलने वाले कुछ हजार लोग ही हैं। गृह मंत्रालय के अधिकारी के अनुसार इन 42 भाषाओं में से कुछ भाषाएं विलुप्त प्राय भी हैं। संयुक्त राष्ट्र ने भी ऐसी 42 भारतीय भाषाओं या बोलियों की सूची तैयार की है। यह सभी खतरे में हैं और धीरे-धीरे विलुप्त होने की ओर बढ़ रही हैं।

संकटग्रस्त भाषाओं में 11 अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की हैं। इन भाषाओं के नाम :- ग्रेट अंडमानीज, जरावा, लामोंगजी, लुरो, मियोत, ओंगे, पु, सनेन्यो, सेंतिलीज, शोम्पेन और तकाहनयिलांग हैं। मणिपुर की सात संकटग्रस्त भाषाएं एमोल, अक्का, कोइरेन, लामगैंग, लैंगरोंग, पुरुम और तराओ हैं। हिमाचल प्रदेश की चार भाषाएं- बघाती, हंदुरी, पंगवाली और सिरमौदी भी खतरे में हैं।

अन्य संकटग्रस्त भाषाओं में ओडिशा की मंडा, परजी और पेंगो हैं। कर्नाटक की कोरागा और कुरुबा जबकि आंध्र प्रदेश की गडाबा और नैकी हैं। तमिलनाडु की कोटा और टोडा विलुप्त प्राय हैं। असम की नोरा और ताई रोंग भी खतरे में हैं। उत्तराखंड की बंगानी, झारखंड की बिरहोर, महाराष्ट्र की निहाली, मेघालय की रुगा और पश्चिम बंगाल की टोटो भी विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रही हैं।

सरकार कर रही बचाने की कोशिश 

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मैसूर स्थित भारतीय भाषाओं के केंद्रीय संस्थान देश की खतरे में पड़ी भाषाओं के संरक्षण और अस्तित्व की रक्षा करने के लिए केंद्रीय योजनाओं के तहत कई उपाय कर रहा है। इन कार्यक्रमों के तहत व्याकरण संबंधी विस्तृत जानकारी जुटाना, एक भाषा और दो भाषाओं में डिक्शनरी तैयार करने के काम किए जा रहे हैं। इसके अलावा, भाषा के मूल नियम, उन भाषाओं की लोककथाओं, इन सभी भाषाओं या बोलियों की खासियत को लिखित में संरक्षित किया जा रहा है। यह सभी वह भाषाएं हैं जिन्हें दस हजार से भी कम लोग बोलते हैं।

22 आधिकारिक भाषाएं

जनगणना निदेशालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 सूचीबद्ध भाषाएं हैं, जो आधिकारिक भाषाएं हैं। संविधान की आठवीं सूची में निहित अनुच्छेद 344(1) और 351 के तहत राजभाषा हिंदी समेत जिन 22 भाषाओं को मान्यता मिली है, वह इस प्रकार हैं :-

असमी, बांग्ला, बोडो, डोगरी, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मैतेई (मणिपुरी), मराठी, नेपाली, ओडिया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू।

इसके अलावा, देश में 100 गैर-सूचीबद्ध भाषाएं भी हैं। इन्हें लोग बड़े पैमाने पर बोलते और लिखते-पढ़ते हैं। समझा जाता है कि इन भाषाओं को कम से कम एक लाख लोग या उससे अधिक लोग बोलते हैं। इनके अतिरिक्त देश में 31 अन्य भाषाएं भी हैं जिन्हें विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों ने आधिकारिक भाषा की मान्यता दी हुई है। जनगणना के आंकड़ों के अतिरिक्त देश में 1635 भाषाएं तार्किक रूप से मातृभाषा हैं। जबकि 234 अन्य मातृभाषाओं की भी पहचान की गई है।

38 भाषाओं को आठवीं अनुसूची में डालने की मांग

अंगिका, बंजारा, बाजिका, भोजपुरी, भोति, भोतिया, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, धातकी, गढ़वाली, गोंडी, गुज्जरी, हो, कच्चाछी, कामतापुरी, कार्बी, खासी, कोडावा (कोरगी), कोक बराक, कुमांयुनी, कुरक, कुरमाली, लीपछा, लिम्बू, मिजो (लुशाई), मगही, मुंदरी, नागपुरी, निकोबारीज, हिमाचली, पाली, राजस्थानी, संबलपुरी/कोसाली, शौरसेनी (प्रकृत), सिरैकी, तेन्यिदी, तुल्लू।

बाल फिल्मों की उपेक्षा के कारण बड़ों के कंटेंट देखने को मजबूर हैं बच्चे

भारत के पहले सुपरहीरो के तौर पर पहचान बनाने वाले मुकेश खन्ना ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से नाराज़गी जताते हुए भारतीय बाल फिल्म सोसाइटी (सीएफएसआई) के चेयरमेन पद पर रह चुके है ं और उनका  मानना है कि बाल फिल्मों को इस देश में प्रोत्साहन सरकार से नहीं मिल रहा। उनका कहना है कि मंत्रालय बच्चों के लिए फ़िल्म बनाने को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाता। शक्तिमान में ‘शक्तिमान’ और महाभारत में ‘भीष्म पितामह’ जैसे किरदार निभा चुके मुकेश का कहना है कि वो पहले भी कई बार इस बात की शिकायत कर चुके थे, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया गया।

मुकेश कहते हैं कि बच्चों के लिए फ़िल्मों की भरमार है, लेकिन ये फ़िल्में कभी रिलीज़ ही नहीं हुईं। बच्चों को कभी मालूम ही नहीं चल पाता है कि उनके लिए भी फ़िल्में बनती हैं। ”मुझे लगता है कि मुझसे पहले जो भी लोग यहां रहे उन्होंने कभी बच्चों के लिए फ़िल्म बनाने के बारे में इस तरीक़े से सोचा ही नहीं। शायद यही वजह है कि जो फ़िल्में वयस्क देखते हैं, वही छोटे बच्चे भी देखते हैं।’ मुकेश कहते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में आठ फ़िल्में बनाईं और मंत्रालय से कहा कि वो फ़ंड बढ़ाए। उनका दावा है कि उनकी चिट्ठी प्रधानमंत्री तक जा चुकी है, लेकिन कोई भी ऐक्शन नहीं लिया गया।

उनके अनुसार, ”मैं फ़िल्में डिस्ट्रीब्यूट करना चाहता हूं, लेकिन वो कहते हैं इसे टेंडर कर दो लेकिन आप ही सोचिए जिस देश में बच्चों की फ़िल्म को लेकर इतनी उदासीनता हो वहां टेंडर निकालकर क्या मिलेगा।”कई बार चेयरपर्सन होने के बावजूद मुझे फ़ैसले लेने में दिक्क़त आई, लेकिन सबसे बड़ी समस्या पैसों की है। मैं यहां 25 फ़िल्में अप्रूव करके बैठा हूं लेकिन मेरे पास पैसा सिर्फ़ चार फ़िल्मों का है।” मुकेश कहते हैं कि बड़े-बड़े निर्देशक जैसे अनुपम खेर, राजकुमार संतोषी, नीरज पांडेय संयुक्त रूप से बच्चों के लिए फ़िल्म बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें देने के लिए हमारे पास पैसे ही नहीं हैं। ‘ बच्चों के पास अपनी फ़िल्में ही नहीं हैं. ऐसे में वो मजबूरी में सास-बहू वाले सीरियल देख रहे हैं या फिर गंदी-गंदी फिल़्में।”

इतनी देर से प्रतिक्रिया क्यों?

अगर आपको लग रहा था कि मंत्रालय आपका सहयोग नहीं कर रहा तो आपने इतनी देर से इस्तीफ़ा क्यों दिया? इस सवाल के जवाब में मुकेश कहते हैं, ”मेरे पास 12 फिल्में थी. उनका बजट अप्रूव कराना मेरी ज़िम्मेदारी थी। साथ ही ये सारी समस्याएं बीते एक साल में ज़्यादा बढ़ी हैं। ‘मुकेश मानते हैं कि ‘यहां लोगों की सोच है कि फ़िल्में बनाकर गोदाम में डाल दो। वो कहां लगेंगी, लोगों तक कैसे पहुंच पाएंगी इस पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता.’

क्यों नहीं चुना कोई दूसरा रास्ता?

मुकेश कहते हैं कि ‘ऑनलाइन विकल्प हैं, लेकिन इससे सीएफ़एसआई का कोई भला नहीं होगा। डिजिटल माध्यम से बच्चों तक फ़िल्में पहुंच तो जाएंगी, लेकिन इससे किसी को सीएफ़एसआई के बारे में नहीं पता चलेगा। फ़िल्म का हिट होना ज़रूरी है. तभी लोगों को ये समझ आएगा कि बच्चों के लिए भी फ़िल्में बनना ज़रूरी है। ‘ बड़ों का कन्टेंट, बच्चों के लिए कैसे हो सकता है? मुकेश कहते हैं, ‘आज के समय में इससे ख़तरनाक कुछ नहीं. चौथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को अपने से दोगुनी उम्र की वो बातें पता होती हैं जो उसे उस वक्त नहीं पता होनी चाहिए।  ये सारी चीज़ें कहीं न कहीं बच्चे में अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम करती हैं।’

क्या है सीएफएसआई?

सीएफएसआई की स्थापना आज़ादी के कुछ ही समय बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा की गई थी. 1955 से सीएफएसआई ने बतौर स्वायत्त संस्थान काम करना शुरू किया. 1957 में वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में सीएफएसआई की फ़िल्म ‘जलदीप’ को पहला इनाम मिला था।

सीएफएसआई का मक़सद बच्चों के लिए ऐसी फ़िल्मों का निर्माण करना है जो उनके विकास में सहायक हो। सीएफएसआई की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के अनुसार अब तक वह 10 अलग-अलग भाषाओं में 250 फिल्मों का निर्माण कर चुकी है.

…लेकिन इस बीच सवाल वहीं का वहीं रह जाता है कि भारत में बच्चों के लिए मनोरंजन की भारी कमी है और इस कमी को वो बड़ों वाले कन्टेंट देखकर ही पूरा कर रहे हैं।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

जिन्दगी का जहर पीकर मुस्कान से दीवाना बनाने वाली मधुबाला

भारतीय बॉलीवुड के सबसे ख़ूबसूरत चेहरों की जब भी बात होती है तो लोग मधुबाला का नाम सबसे पहले लेते हैं और मधुबाला का नाम लेते ही आपके जेहन में उनकी कई छवियां उभर आती हैं। महल में सस्पेंस जगाने वाली मधुबाला हों या फिर मिस्टेर एंड मिसेज 55 की शहरी बाला या फिर हावड़ा ब्रिज की मादक डांसर हो या फिर मुगले आज़म की कनीज अनारकली जिसका जलवा किसी शहजादी से कम नहीं लगता।

मोहक, ख़ूबसूरत, दिलकश और ताज़गी से भरपूर, जिसके चेहरे से नूर टपकता रहा हो, तो आप मधुबाला के अलावा शायद ही किसी दूसरे चेहरे के बारे में सोच पाएं। मधुबाला की ख़ूबसूरती का अंदाज़ा लगाना हो तो 1990 में एक फ़िल्मी पत्रिका मूवी के बॉलीवुड की आल टाइम ग्रेटेस्ट अभिनेत्रियों की लोकप्रियता वाले सर्वेक्षण को देखिए, उसमें 58 फ़ीसदी लोगों के वोट के साथ मधुबाला नंबर एक पर रहीं थीं, उनके आसपास कोई दूसरा नहीं पहुंच पाया था। इसमें नरगिस 13 फ़ीसदी वोटों के साथ दूसरे पायदान पर रहीं थीं। शोख और अल्हड़ अंदाज़ के साथ अपनी ख़ूबसूरती के लिए मशहूर मधुबाला को गुजरे पांच दशक हो चुके हैं लेकिन आज भी उनके चाहने वाले उन्हें जिस शिद्दत से याद करते हैं, उसकी दूसरी मिसाल नहीं मिलती।

सबसे ख़ूबसूरत मधुबाला

मधुबाला के साथ ही अपना डेब्यू करने वाले राजकपूर ने मधुबाला के बारे में एक बार कहा था लगता है कि ईश्वर ने खुद अपने हाथों से संगमरमर से उन्हें तराशा है। पेंगुइन इंडिया से प्रकाशित और भाईचंद पटेल की संपादित बॉलीवुड टॉप 20- सुपरस्टार्स ऑफ़ इंडिया में राजकपूर का ये बयान दर्ज है। इसी पुस्तक के मुताबिक शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने अपने फ़िल्मी जगत में काम करने के दिनों को याद करते हुए कहा कि जब एक दिन उन्होंने शूटिंग करते हुए मधुबाला को देखा था उन्हें लगा कि उनका दिन बन गया।

शम्मी कपूर ने अपनी ऑटोबोयोग्राफी शम्मी कपूर द गेम चेंजर में एक पूरा चैप्टर मधुबाला को समर्पित किया है। इसका शीर्षक है- फेल मेडली इन लव विद मधुबाला। शम्मी कपूर इसमें कहते हैं- मैं ये जानता था कि मधु किसी और के प्यार में हैं, लेकिन इसके बाद भी मैं ये स्वीकार करना चाहता हूं कि मैं उनसे पागलों की तरह प्यार करने लगा था। इसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता था, क्योंकि मैं ने उनसे ख़ूबसूरत औरत कभी नहीं देखी। शम्मी कपूर ने 2011 में प्रकाशित इस आत्मकथा में कहा कि छह दशक बाद आज भी जब वो कभी मधुबाला के बारे में सोचते हैं तो उनके दिल की धड़कन मानो थम जाती है। मधुबाला की ख़ूबसूरती का ये आलम था कि शम्मी कपूर अपनी डेब्यू फ़िल्म रेल का डब्बा फ़िल्म की शूटिंग के दौरान मधुबाला को देखते ही अपने डॉयलाग भूल जाया करते थे।

महज 36 साल की उम्र, जीवन के आख़िरी नौ साल अपने घर में क़ैद हो कर रहने की मज़बूरी और केवल 66 फ़िल्में. लेकिन मधुबाला ने इन सबसे वो मुकाम हासिल कर लिया जो उन्हें हमेशा हमेशा के लिए अमर कर गया। जन्म से ही मधुबाला के दिल में छेद था और डॉक्टरों के मुताबिक उस बीमारी में उन्हें बहुत ज्यादा आराम की ज़रूरत थी लेकिन मधुबाला के पिता ने उन्हें ऐसी दुनिया में धकेला हुआ था जहां उन्हें लगातार काम करना पड़ा था।

दरअसल मधुबाला अपने माता-पिता ही नहीं 11 भाई बहन वाले परिवार में इकलौती आजीविका कमाने वाली थीं। पिता इंपीरियरल टौबेको कंपनी में काम किया करते थे, लाहौर में, वो नौकरी छूटी तो दिल्ली आए और फिर दिल्ली से बंबई पहुंचे तो यही ध्यान था कि ख़ूबसूरत मधुबाला को फ़िल्मों में काम मिल जाएगा। महज छह साल साल की उम्र से मधुबाला ने मायानगरी में अपने क़दम रख दिए थे।

इस काम ने उन्हें कितना खपा दिया इसकी झलक 1957 में फ़िल्मफेयर की उस ख़ास सिरीज़ में मिलती है जिसमें पत्रिका ने उस जमाने के सुपरस्टार से अपने बारे में कुछ लिखने को कहा था। नरगिस, मीना कुमारी, नूतन, राजकपूर, दिलीप कुमार, देव आनंद, किशोर कुमार, अशोक कुमार सबने इसमें अपने बारे में लिखा था।

अपने बारे में मधुबाला

इस सिरीज़ में मधुबाला ने अपने बारे में कुछ लिखने से इनकार करते हुए माफ़ी मांगी थी, माफ़ीनामे में मधुबाला ने लिखा था, “मैं खुद को खो चुकी हूं। ऐसे में खुद के बारे में क्या लिखूं. मुझे ऐसा लग रहा है कि आपने मुझे उसके बारे में लिखने को कहा है जिसे मैं नहीं जानती। समय ने मुझे खुद से मिलने का वक्त नहीं दिया। जब मैं पांच साल की थी तो किसी ने मेरे बारे में पूछा नहीं और मैं इस भूल भुलैया में आ गई. फिल्म इंडस्ट्री ने मुझे पहली सीख यही दी थी कि आपको अपने बारे में सबकुछ भूलना होता है, सबकुछ खुद को भी तभी आप एक्ट कर पाते हैं, ऐसे में मैं खुद के बारे में क्या लिखूं।”

मधुबाला के फिल्मी जीवन पर ख़तीजा अक़बर ने आई वांट टू लिव- द स्टोरी ऑफ़ मधुबाला लिखी है। इस पुस्तक से गुजरने के दौरान पता चलता है कि मधुबाला की ख़ूबसूरती ने उनके अभिनय के प्रति अनुशासन और सीखने की लगन को कभी कम नहीं होने दिया। मधुबाला उस दौर में फिल्मी दुनिया की इकलौती कलाकार थीं जो समय से पहले सेट पर मौजूद होती थीं. हालांकि स्वास्थ्य कारणों से वो रात में शूटिंग नहीं किया करती थीं और अपने पूरे करियर में उन्होंने कभी आउटडोर शूटिंग में हिस्सा नहीं लिया। इसके बावजूद मधुबाला अपने समय की टॉप अभिनेत्रियों में शुमार होती रहीं।

काम के प्रति उनके परफैक्शन की मिसाल देखनी हो तो मुगले आज़म फिल्म के वो प्रेम दृश्यों को देखिए जिसमें शहजादा सलीम, अनारकली को मोर के पंखों से छेड़ता है। इस दृश्य को भारतीय सिने संसार के सबसे रोमांटिक दृश्यों में शुमार किया जाता है। ये जानना दिलचस्प है कि इन दृश्यों के अलावा भी मुगले आज़म के तमाम प्रेम दृश्यों के वक्त दिलीप कुमार और मधुबाला की आपसी बातचीत बंद थी।

दिलीप कुमार-मधुबाला की प्रेम कहानी

दोनों को एक समय में भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे रोमांटिक जोड़ी माना जाता था, दोनों एक दूसरे से प्यार भी करते थे। 1955 में पहली बार फ़िल्म इंसानियत के प्रीमियर के दौरान मधुबाला दिलीप कुमार के साथ सार्वजनिक तौर पर नज़र आईं थीं। ये पहला और इकलौता मौका था जब दिलीप कुमार और मधुबाला एक साथ सार्वजनिक तौर पर साथ नजर आए थे। इस मौके को कवर करने वाले पत्रकार के. राजदान ने बाद में लिखा था कि मधुबाला इससे ज़्यादा ख़ुश पहले कभी नज़र नहीं आई थीं। रॉक्सी सिनेमा में हुए इस प्रीमियर में मधुबाला हमेशा दिलीप कुमार की बांह थामे हुए नज़र आती रहीं। शम्मी कपूर ने इस बात का जिक्र भी किया है कि किस तरह से दिलीप कुमार केवल मधुबाला को देखने के लिए मुंबई से पूना तक कार चला कर आया करते थे और दूर खड़े होकर मधुबाला को देखा करते थे।

बहरहाल, एक आम धारणा ये है कि मुधबाला के पिता नहीं चाहते थे कि मधुबाला और दिलीप कुमार की शादी हो। इसको लेकर फ़िल्मी पत्र पत्रिकाओं में काफ़ी कुछ छपता भी रहा है. लेकिन दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा दिलीप कुमार- द सब्सटेंस एंड द शैडो में इससे उलट बात कही है।

मधुबाला-दिलीप ऐसे हुए अलग?

उन्होंने लिखा है, “जैसा कि कहा जाता है, उसके उलट मधु और मेरी शादी के ख़िलाफ़ उनके पिता नहीं थे। उनकी अपनी प्रॉडक्शन कंपनी थी और वे इस बात से बेहद ख़ुश थे कि एक ही घर में दो बड़े स्टार मौजूद होंगे। वे तो चाहते थे कि दिलीप कुमार और मधुबाला एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले अपने करियर के अंत तक उनकी फिल्मों में डूएट गाते नजर आएं।”

फिर ऐसी क्या बात हुई, जिसके चलते बॉलीवुड की सबसे मशहूर प्रेम कहानी शादी तक नहीं पहुंच पाई. दिलीप कुमार ने इसके बारे में भी लिखा है, “जब मुझे मधु से उनके पिता की योजनाओं के बारे में पता चला तो मेरी उनसे कई बार बातचीत हुई जिसमें मैंने उन दोनों से कहा कि मेरे काम करने का अपना तरीका है, मैं अपने हिसाब से प्रोजेक्ट चुनता हूं और उसमें मेरा अपना भी प्रॉडक्शन हाउस हो तो भी ढिलाई नहीं कर सकता।”

दिलीप कुमार के मुताबिक उनकी यही बात मधुबाला के पिता अयातुल्ला ख़ान को पसंद नहीं आई और उन्होंने दिलीप कुमार को जिद्दी और अड़ियल मानना शुरू कर दिया। दिलीप के मुताबिक मधुबाला का रुझान हमेशा अपने पिता की तरफ़ रहा और वो कहती रहीं कि शादी होने के बाद सबकुछ ठीक हो जाएगा।

ऐसा भी नहीं था कि दिलीप शादी के लिए तैयार नहीं थे, 1956 में ढाके की मलमल फ़िल्म की शूटिंग के दौरान एक दिन उन्होंने मधुबाला से कहा भी काज़ी इंतज़ार कर रहे हैं चलो मेरे घर आज शादी कर लेते हैं लेकिन उनकी बातों पर मुधबाला रोने लगीं. दिलीप कुमार कहते रहे कि अगर आज तुम नहीं चली तो मैं तुम्हारे पास लौटकर नहीं आऊंगा, कभी नहीं आऊंगा।

दिलीप कुमार उसके बाद मधुबाला के पास नहीं लौटे क्योंकि दोनों के बीच 1957 में ऐसा विवाद हो गया जिसकी आंच ने इस मोहब्बत को असमय ख़त्म कर डाला। 1957 में प्रदर्शित नया दौर फ़िल्म के लिए दिलीप कुमार और मुधबाला को निर्देशक बीआर चोपड़ा ने साइन किया. इस फ़िल्म की आउटडोर शूटिंग पूना और भोपाल में होनी थी, लेकिन मधुबाला के पिता ने मधुबाला को भोपाल भेजने से इनकार कर दिया तब तक बीआर चोपड़ा अपनी फ़िल्म की काफ़ी शूटिंग कर चुके थे।

पेशे से वकील रह चुके बीआर चोपड़ा मामले को कोर्ट में ले गए और इस बीच उन्होंने मधुबाला की जगह वैजयंती माला को साइन कर लिया। इसी मामले की सुनवाई के दौरान दिलीप कुमार ने कोर्ट में कहा था कि वे मधुबाला से मोहब्बत करते हैं और उनके मरने तक तक मोहब्बत करते रहेंगे लेकिन उन्होंने अपना बयान बीआर चोपड़ा के पक्ष में दिया था।

दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में इसके बारे में लिखा है कि उन्होंने अपनी ओर से सुलह की बहुत कोशिश की थी लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ था और पूरे मामले में बीआर चोपड़ा का पक्ष सही था।  इसके बाद मधुबाला को यक़ीन हो गया कि दिलीप कुमार उनके पास कभी नहीं लौटेंगे।

किशोर कुमार से शादी

इस अलगाव के चलते ही मधुबाला ने शादी करने का मन बनाया होगा लेकिन वो किशोर कुमार से एक दिन शादी कर लेंगी, इसका भरोसा किसी को नहीं था. लेकिन जिस वक्त मधुबाला और दिलीप कुमार की राहें अलग होने लगी थीं, उसी वक्त किशोर कुमार का अपनी पहली पत्नी रोमा देवी से तलाक़ हुआ था और दोनों एक साथ कई फ़िल्मों में काम कर रहे थे।

इस वजह से दोनों के बीच एक आकर्षण हुआ हो और 1960 में किशोर कुमार और मधुबाला ने शादी कर ली। किशोर कुमार के साथ शादी के फ़ैसले ने मधुबाला को दिलीप कुमार से अलग होने के तुलना में कहीं ज़्यादा अाघात पहुंचाया। किशोर कुमार को मधुबाला की बीमारी के बारे में पता तो था लेकिन उसकी गंभीरता का अंदाजा नहीं था. वे मधुबाला को इलाज़ के लिए लंदन ले गए, जहां डॉक्टरों ने जवाब देते हुए कहा कि अब ज्यादा से ज्यादा मधुबाला एक से दो साल ही जी पाएंगी।

इसके बाद किशोर कुमार जब लौटे तो उन्होंने मधुबाला को उनके पिता और बहनों के पास छोड़ आए और कहा कि वे इतने व्यस्त रहते हैं कि मधुबाला की देखभाल नहीं कर पाऐेंगे। वो मधुबाला से मिलने के लिए आते ज़रूर रहे लेकिन तीन चार महीनों के अंतराल पर यानी जब मधुबाला को किशोर कुमार के साथ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब किशोर कुमार के पास उनके लिए समय ही नहीं था।

ऐसे में दिल की बीमारी बढ़ती गई लेकिन मधुबाला के अंदर जीने की इच्छा काफ़ी भरी हुई थी, लिहाजा वो डॉक्टरों के हाथ खड़े करने के बाद नौ साल तक जीवित रहीं लेकिन जीवन के आख़िरी नौ साल उन्होंने बेहद एकाकी में गुजारे। इस दौरान बेहद गिने चुने लोग ही उनका हाल चाल जानने के लिए उनके घर जाते रहे थे। इसमें दिलीप कुमार का परिवार भी शामिल था।

हालांकि मुगले आज़म के रिलीज़ होने के ठीक बाद मधुबाला गंभीर रूप से बीमार हो गईं, हालांकि अगले चार साल तक उनके काम वाली फिल्में रिलीज़ होती रहीं लेकिन मुधबाला आख़िरी दिनों में देखने में कैसी थीं, इसको लेकर भी कम कयास नहीं लगाए जाते रहे हैं.

बॉलीवुड टॉप 20- सुपरस्टार्स ऑफ़ इंडिया में मधुबाला के अंतिम दिनों की झलक मिलती है। दिलीप कुमार की बहन सईदा ख़ान के मुताबिक मधुबाला की मौत से एक दिन पहले वो उनसे मिली थीं और उस वक्त तक उनकी ख़ूबसूरती में किसी तरह की कोई कमी नहीं आई थी।

हालांकि लंबी बीमारी के चलते वो थकी हारीं ज़रूर हुई थीं लेकिन चेहरे का नूर बना रहा था लेकिन शायद बीमारी ने मधुबाला के आत्मबल को कमज़ोर किया था, तभी अपने अंतिम दिनों में वो मेकअप करने लगीं थीं। सुपरस्टार्श ऑफ़ इंडिया में फिल्म निर्देशक शक्ति सामंता ने बताया कि वो भी मधुबाला की मौत से ठीक एक दिन पहले उनसे मिले थे और वो काफी मेकअप में थीं हालांकि अपने पूरे फ़िल्मी करियर के दौरान वो काफ़ी कम मेकअप करने के लिए मशहूर रही थीं।

उनकी जिस ख़ूबसूरती का बॉलीवुड में कभी डंका बजता था, उस दुनिया ने उन्हें भुला दिया लेकिन वो भारतीय सिने प्रेमियों के दिलों पर राज करती रहीं। भारतीय डाक सेवा ने 18 मार्च, 2008 को मधुबाला की याद में एक डाक टिकट जारी किया था, इस मौके पर फ़िल्म अभिनेता मनोज कुमार ने कहा था, मधुबाला देश का चेहरा थीं। शताब्दी में कोई एक मधुबाला ही हो सकती हैं. जब भी उन्हें मैं देखता था तो मेरे दिल में ग़जल गूंजने लगती थी। वाकई में मधुबाला कोई दूसरी नहीं हो सकती थीं, जिसकी तस्वीर देखने मात्र से दिलों में संवेदनाओं के तार झंकृत होने लगते हों. हमारे भी और आपके भी।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

बिहार की आकाँक्षा ने बनाया बच्चों को पढ़ाने वाला रोबोट

बेंगलुरु से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली आकांक्षा आनंद ने एक ऐसा रोबोट तैयार किया है जो बच्चों की पढ़ाई में उनकी मदद करेगा। उनका बनाया हुआ ये रोबोट बच्चों को खेल-खेल में पढ़ने लिखने की चीजें सिखाएगा। इस रोबोट का नाम निनो रखा गया है।

बता दें, आकांक्षा एजुकेशन सिस्टम को एक नया रूप देना चाहती हैं जिसके बाद उन्होंने इस मॉडल को बनाने की तैयारी की वह बिहार की राजधानी पटना की रहने वाली हैं. बेंगलुरु से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने दो साल तक एक आईटी कंपनी में नौकरी की. फिर वह ‘सिरेना टेक्नॉलजी’ के साथ काम करने लगी। इस कंपनी में वह रोबोटिक्स के क्षेत्र में काम करती हैं।

आकांक्षा ने पढ़ाई के दौरान हांगकांग, चीन और ताइवान घूम चुकी हैं. वहां के बच्चों में उन्होंने देखा कि छोटे-छोटे बच्चों को रोबोट बना रहे हैं और उनके साथ खेल रहे हैं। तब उन्होंने सोचा कि जब दूसरे देश के बच्चे इसे आसानी से समझ सकते हैं तो हमारे देश के बच्चे भी इसे आसानी से समझ सकते हैं जिसके बाद उन्होंने ऐसा रोबोट बनाने की सोची जो बच्चों को नए और अलग तरीके से पढ़ाना, खेलना, डांस जैसी चीजों को सिखाने में मदद करें ताकि बच्चे पढ़ाई में रुचि लें। रोबोट की खासियत है कि ये बात कर लेता है और डांस भी करता है। इसे ऐप या वॉइस कमांड के जरिए संचालित किया जा सकता है।

आकांक्षा के इस प्रोजेक्ट में कर्नाटक सरकार ने भी मदद की है और इस प्रयास के लिए प्रोत्साहित भी किया. वही इस रोबोट से पहले आकांक्षा ने अभी तक कई तरह के रोबोट बनाए हैं, जो अलग-अलग काम करते हैं।  इनमें ह्यूमेनाइड रोबोट, रोबोटिक आर्म, ऑटोमोबाइल किट, पेट रोबोट, क्वार्डबोट रोबोट जैसे कई रोबोट शामिल हैं।

युवाओं को डेटिंग ऐप ज्यादा पसंद

भारतीय युवा वैवाहिक साइटों और विज्ञापनों के बजाय मोबाइल डेटिंग एप और सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से जुड़ना ज्यादा पसंद करते हैं. मंगलवार को जारी एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ है। सर्वेक्षण के हवाले से एसोचैम ने एक बयान में कहा, कुल उत्तरदाताओं में से करीब 55 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्होंने निर्धारित मानदंडों और परंपराओं से हटकर अनौपचारिक डेटिंग और किसी से जुड़ने के लिए डेटिंग ऐप का इस्तेमाल किया।

एसोचैम के सोशल मीडिया शाखा ने चार मेट्रो शहर समेत 10 बड़े शहरों में 20 से 30 साल की आयुसीमा के 1,500 लोगों पर 1 जनवरी से 10 फरवरी के बीच यह सर्वे आयोजित किया था। बयान में कहा गया, उत्तरदाताओं में अधिकतर लोगों ने कहा कि यह सुरक्षित है, क्योंकि इससे उन्हें अपनी पहचान ना बताने की अनुमति मिलती है, भले ही उनके पास उसे दिखाने का विकल्प हो। एसोचैम के प्रधानसचिव डी.एस. रावत ने कहा कि निकट भविष्य में डेटिंग ऐप को और ज्यादा प्रसिद्धि मिलेगी, क्योंकि यह ऑनलाइन लोगों से मिलने और उनके साथ जुड़ने के अवसरों की पेशकश करते हैं। उन्होंने कहा, फिलहाल यह एक नवोदित स्तर पर है और इसका मूल्य 500 करोड़ रुपये का भी नहीं है, लेकिन भारत मे बढ़ती युवाओं की संख्या ऑनलाइन डेटिंग के लिए प्रयास कर रही है और आने वाले दिनों में यह करोड़ों का उद्योग बन जाएगा।