Wednesday, April 1, 2026
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गिरिजा देवी…जिनके बगैर ठुमरी अकेली और संगीत सूना हो गया

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यह सही है कि एक बार गिरिजा देवी से मिलने का मौका मिला है…सौभाग्य रहा उनसे बातें करने और ठुमरी सुनने का…जब बात की थी तो ऐसा लगता था जैसे समुद्र के किनारे खड़े होकर मोती ढूंढना है…और अप्पा तो समुद्र से भी आगे थीं…तो हम मोती चुना…साभार इंटरनेट और वे लेखक जिन्होंने अप्पा की मायानगरी को कलम में उतारकर संगीत और साहित्य दोनों को समृृद्ध किया। गिरिजा देवी को समझने के लिए हमें नहीं लगता कि यतीन्द्र मिश्र की किताब से बेहतर कुछ होगा…आप जो पढ़ रहे हैं…वह उनकी ही रचना है और इसे इंटरनेट से लिया गया  है साभार…

यतींद्र मिश्र

तस्वीर – साभार बीबीसी हिन्दी

गिरिजा देवी के घर में रोजमर्रा के अलाप, तानों से अलग भी एक दुनिया रहती है. कौतूहल एवं आश्चर्य के मिश्रण से बनी दुनिया. पृथ्वी से अलग मंगल पर वायुमंडल का होना परिकल्पना की वस्तु है. गिरिजा देवी के घर में इस दूसरी दुनिया का होना, संशय या परिकल्पना दोनों से अलग, बिल्कुल यथार्थ की चीज़ है.

यह दूसरी दुनिया है क्योंकि मैंने कई बार इसमें अपने को घिरा पाया. यह दूसरी दुनिया है, इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं. यह दूसरी दुनिया न जाने कब तक रहेगी, जिस बात का हिसाब अप्पा के पास भी नहीं. यह अप्पा की मायावी दुनिया है. इस मायानगरी में न जाने कितना जादू भरा है, जितना भी पकड़ो उतना ही सरक जाता हाथ से.

इसको देखते हैं. अलीबाबा की कहानी के सिमसिम की तरह इसको खोलते हैं.

खुल जा सिमसिम-

सिमसिम, रसोई के दरवाजे पर खुलता है.

अप्पा की रसोई में सबकुछ वैसा ही मिला जैसा आम रसोई में होना जाहिए. अलग से काबिलेगौर अगर कुछ है, तो सफाई. उसके साथ अतिरिक्त गौर करने वाली चीज है, गृहस्वामिनी की हिदायतें. वह भी एक-दो नहीं. पूरी विलम्बित हिदायत, एक ताल में निबद्ध. अब शिष्याएं कोई भी राग अलापें, समय तो लगना ही है. सिमसिम की तरह अप्पा के पास एक आतिशी शीशा है, जिसमें से उनको देखने पर वह एक ऐसी औरत में तब्दील नजर आती हैं, जो शिष्याओं को सलीका सिखाने में उतनी ही माहिर हैं, जितनी संगीत ज्ञान कराने में.

चाय बनाओ, गुनगुनाती रहो.
सब्जी काटो, अलंकारो का आकार में अभ्यास चलता रहे.
खाना लगाओ, नयी सिखाई बंदिश के शब्द याद हो जाएं.
नहाओ, तो गाओ.
कपड़े सुखाओ, बिस्तर ठीक करो, गाना बंद न हो, गाती रहें, रियाज चलता रहे.

लब्बोलुबाब यह कि एक-एक जान हजार हिदायतें. हजार हिदायतों का मतलब इतना सीधा कि कलाकार तो बनते-बनते न बनता है इंसान. लेकिन सुगृहिणी और नेक औरत तो बनना पहला ध्येय होना चाहिए हर लड़की का.

आतिशी शीशा, सिमसिम औऱ संगीत सभी मिलजुल कर सुरीले चाक पर जो माया गढ़ते हैं, उससे अप्पा की दूसरी दुनिया का तिलिस्म बढ़ता जाता है. गोया शिष्याएं न हो, मंगल ग्रह की प्राणी हों और अप्पा वह गिरिजा देवी न हों उतनी देर, प्रेमचंद के आदर्शवादी उपन्यासों की सरल भारतीय चरित्र हों.

सिमसिम अब बैठक में खुलता है.

लोग आते हैं, मिलते हैं, जाते हैं.
कुछ रुकते हैं, कुछ को रोका जाता है. बारामासा की तरह बारहों महीनों यही क्रम. शिष्य शिष्याएं सलीके से मेहमानवाज़ी में अभ्यस्त (आखिर रियाज किया है).

करीने से गावतकिया सजता है. आहिस्ते से साज रखा जाता है. अप्पा देखती हैं. टोकती हैं. खुश होती हैं. अपनी बंदिशों पर नाज़ करती हैं और देखते-देखते एक-एक जान में जादू भर देती हैं. ये नये और शालीन कलाकार अपनी-अपनी जादू की छड़ियां लेकर बाहर जाते हैं. बाहर की साधारण दुनिया में अप्पा की दूसरी दुनिया का तिलिस्म मिलाते हैं.

सिमसिम संगीत सभाओं में खुलता है.

तो अप्पा के शिष्य-शिष्याएं अपनी छोटी-छोटी पिटारियों से बड़े दुर्लभ और अनगढ़ रत्न निकालते हैं. साधारण दुनिया को वशीभूत करके अपने मायालोक ले जाते हैं.

सिमसिम बहुत जगह खुला मिलता है.

ऐसी बहुत जगहों पर, रास्तों में, पड़ाव पर आते-जाते सुर बिखरे मिलते हैं. जहां बंद रहता सिमसिम, वहां गिरिजा देवी की दूसरी दुनिया नहीं होगी. ऐसा मेरा नहीं, बहुतों का सोचना है.

अप्पा डांटती हैं
कलाकार बनते हैं.
अप्पा और जोर से डांटती हैं
बेहतर इंसान बनते हैं

सिमसिम की जगह, आतिशी शीशे से अप्पा अपनी मायानगरी को देखती हैं. चुपके से नज़रे उतारती हैं. फिर आश्वस्त होती हैं. शीशा छुपा देती हैं कि सबकी आंखों में न दिख जाए और उसे कोई चुरा न ले.

तिलिस्म बना रहता है.
अप्पा जादूगरनी की तरह हंसती हैं
पता नहीं जादूगरनी की तरह हंसती हैं कि गाती हैं
बिल्कुल किस्से कहानियों वाली जादूगरनी की तरह.

(यतींद्र मिश्र की किताब गिरिजाका एक अंश. किताब वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है.)

 

नाटकों का जश्न मनाता लिटिल थेस्पियन जश्न –ए – रंग….

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लिटिल थेस्पियन का 7 वां राष्ट्रीय नाट्य उत्सव “जश्न-ए-रंग” (रंगमंच का उत्सव) आज से आरम्भ होने जा रहा है। यह नाट्योत्सव 3 से 8 नवम्बर 2017 तक चलेगा। नाट्योत्सव का उद्घाटन लिटिल थेस्पियन के नाटक रूहें के साथ होगा और इस दौरान नाटकों की स्थिति पर एक परिचर्चा भी आयोजित की जा रही है। जश्न –ए – रंग की पूरी कार्यक्रम सूची और तमाम नाटकों की संक्षिप्त जानकारी हम दे रहे हैं…अगर आप नाट्यप्रेमी है तो यह आपके लिए तोहफे की तरह है…जरूर जाइए..

 

3 नवम्बर 2017, शुक्रवार समय: शाम 6:30 बजे

नाटक: रूहें

संगीत: मुरारी रायचौधरी

वेशभूषा: उमा झुनझुनवाला

लेखक व निर्देशक : एस. एम. अज़हर आलम
नाट्यदल : लिटिल थेस्पियन, कलकत्ता

नाटक

रूहें नाटक में कई भिन्न परतें हैं जो संघर्ष के कई रूपों दर्शाती है। अतीत और वर्तमान के बीच संघर्ष, नए और पुराने, सही और ग़लत के बीच का संघर्ष, लोकतंत्र का एकतंत्र के खिलाफ संघर्ष। यह नाटक विभिन्न प्रकार की भावनाओं और मानवीय संघर्षों का एक कैनवास है, मिश्रण है जिसके केंद्र में एक कब्रिस्तान है जहाँ खोए हुए अतीत की कई रूहें भटक रही हैं जो आज कीं नई व्यवस्था को स्वीकार नहीं कर पा रही हैं।  वहीं एक मुजाविर है जो अतीत और वर्तमान को  आमने सामने आने से रोकने के लिये सब कुछ न्योछावर करने को तैयार है ताकि एक अकल्पनीय त्रासदी को रोका जा सके।

 निर्देशक : लिटिल थेस्पियन के कलात्मक निर्देशक, अज़हर आलम कई प्रतिभाओं के धनी हैं, वे एक कुशल अभिनेता, निर्देशक और एक उत्कृष्ट सेट डिजाइनर होने के अलावा, ऊर्दू की सर्वप्रथम थियेटर पत्रिका “रंगरस” के संपादक भी हैं।

उन्होंने 46 से अधिक नाटकों में अभिनय और 21 नाटकों का निर्देशन किया हैं। इनके निर्देशन में धोखा, कबीरा खड़ा बाज़ार में, रेंगती परछाइयाँ, गैंडा, चेहरे, पतझड़, लोहार आदि कई नाटक हैं जिन्होंने लिटिल थेस्पियन को कलात्मक ऊँचाइयों पे पहुँचाया है |  इन्होंने नेपाली लोक कलाकारों के साथ भी दार्जिलिंग में काम किया और नेपाली में दो नाटकों, सृष्टी को रॉक्सी कर्ता (लियो टॉलस्टॉय कि कहानी पर आधारित स्व लिखित नाटक) और हयवदन (नाटक – गिरीश करनाड) का निर्देशन किया।

पश्चिम बंगाल नाट्य अकादमी द्वारा उन्हें 2001 में नमक की गुड़िया (उर्दू) के लिए सर्वश्रेष्ठ नाटककार और 2007 में सवालिया निशान के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक की उपाधि से सम्मानित किया गया।

मंच पर

नवाब ताहिर अली बेग– एस. एम. अज़हर आलम

सिपहसालार – शरत नायर

नायब सिपहसालार- फहीम बट

फरहाद हुसैन – तारिक अली नय्यर

जब्बार हुसैनी- दिलीप भारती 

मुजाविर- अभिषेक मिश्रा

दूत – अविक महतो

दास्तानगोह- रहीम पीरानी 

ख्वाजासिरा- अमर्त्य भट्टाचार्य

रूह 1 – राघव राय

रूह 2 – विप्लब स्वराज  

रूह 3 – ज़ैनुल आबेदीन

रूह 4 – शबरीन

बड़े नवाब की रूह- सागर सेनगुप्ता

नवाब 1 की रूह –  आकाश श्रीवास्तव

नवाब 2 की रूह – उमंग सिंह

बेग़म साहिबा की रूह- अर्पिता बोस

नवाबज़ादी की रूह- लीलाश्री अवला गुरिया

 

4 नवम्बर 2017, शनिवार समय: शाम 6:30 बजे

क़िस्सा ख्वानी (गुजराती)

कहानी: त्रिपान सिंघ चावडा जिवे छे:

लेखक : रमेश पारेख

प्रस्तुति: दिलीप दवे और दिनेश वदेरा

कहानी : ये एक बेतुकी शैली कहानी है जो एक ऐसे व्यक्ति की भावनाओं को अभिव्यक्त करती है जिसने अपने जीवन को शाही तरीके से जिया और अब अपने अतीत को पीछे नहीं छोड़ पा रहा जबकि वह जीवित भी नहीं हैं।

 दिनेश वदेरा मुद्रा आर्ट्स के संस्थापक हैं और उन्होंने कई नाटकों में अभिनय एवम निर्देशन किया है। उन्होंने कई नाटक लिखे हैं जैसे ‘अनंदधारा’, ‘अथ श्री आदिनाथ कथा’, ‘आचार्य स्थुलिभद्र’, ‘अरण्य रुदन’, थोड़ी सी ख़ुशी आदी। इसके अतिरिक्त उन्होंने माया (एस आर एफ टी आई), शंघाई, एहसास आदि फिल्मों में अभिनय भी किया है।

दिलीप दवे एक फ्रीलान्स अभिनेता हैं जिन्होंने ने आपने अभिनय का सफ़र 1980 में शुरू किया। उन्होंने 63 नाटकों, 8 फीचर फिल्मों, 2 लघु फिल्मों, 10 कॉर्पोरेट फिल्मों और 28 धारावाहिकों में अभिनय किया है।इसके अतिरिक्त उन्होंने 4 नाटकों का निर्देशन किया है और कोलकाता में गुजराती एवम हिंदी भाषा के अग्रणी वॉयसओवर कलाकार भी हैं।

शाम 7 बजे

नाटक: खारु का खरा क़िस्सा

भुवनेश्वर द्वारा लिखित कहानी ‘भेड़िये’ पर आधारित

नाटककार: सुमन कुमार

प्रकाश संरचना: टोनी सिंघ

संगीत: अमर सिंघ, प्रियंका चौहान

निर्देशन: प्रवीण शेखर

नाट्यदल: बैकस्टेज लैब, इलाहबाद

नाटक:

खारु का खरा क़िस्सा भुवनेश्वर द्वारा लिखित कहानी ‘भेड़िये’ पर आधारित है। यह कहानी है गरीबी, तंगी और उससे छुटकारा पाने की जद्दोजहद के बीच भयावह परिस्थितियों के टकराव की। सब कुछ दांव पर लगा कर भी, किसी भी कीमत पर ज़िंदा रहने का संघर्ष। यह कहानी जीवित रहने की तीव्र इच्छा से कुछ ज़्यादा है। खारू के पिता के पास अपने जूते और जीवन को छोड़कर देने के लिये कुछ भी नहीं है। यह कहानी एक भयंकर तर्क को भी दर्शाती है कि एक महिला एक वस्तु से अधिक और कुछ नहीं है। खारू के जीवन के माध्यम से, यह कहानी मानव जीवन की उन दर्दनाक परिस्थितियों को छूती है जो जीवन की कोमलता को मिटा देती है, भगवान और सुंदरता से सच्चाई को काट कर अलग कर देती है। ‘भेड़िये’ वास्तव में केवल भेड़िये नहीं हैं, अपितु वो सभी परिस्थितियाँ हैं जो इफ्तिखार को खरु में परिवर्तित कर देती हैं।

नाट्यदल के बारे में

1999 में स्थापित बैकस्टेज, सभी प्रकार के दृश्य और निष्पादन कलाओं के विकास के लिए समर्पित संगठन है। इसके कलाकार हमारे समाज के रोज़मर्रा की ज़िदगी में सामाजिक कल्याण और उत्थान के मूल्यों के बारे में चिंतित हैं। इसका उद्देश्य एक बेहतर माहौल तैयार करना है जहां एक सामान्य व्यक्ति भी रंगमंच की भाषा को समझ सके। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए यह संगठन युवाओं और बच्चों के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करता है और नाटक भी प्रदर्शित करता है। बैकस्टेज ने एनएसडी के भारत रंग महोत्सव और जशान-ए-बचपन सहित पूरे भारत में कई थियेटर त्योहारों में भाग लिया है। बैकस्टेज ने अब तक 25 नाटक प्रोडक्शन के अलावा, 7 राष्ट्रीय सेमिनार, व्याख्यान, कार्यशालाएं, प्रदर्शनियों और कई अन्य गतिविधियों का आयोजन किया है। इसके संरक्षक हैं थियेटर दीर्घानुभवी श्री रतन थियम, श्री रुद्र प्रसाद सेनगुप्ता, भानु भारती, उर्दू आलोचक और संपादक शमसुर्रहमान फरूकी, गीतकार गोपाल दास “नीरज”, भोजपुरी लोक कलाकार प्रो शारदा सिन्हा, हिंदी आलोचक प्रो सत्य प्रकाश मिश्रा। बैकस्टेज ने इंडिया थियेटर फ़ोरम द्वारा आयोजित SMART (थिएटर कला में सामरिक प्रबंधन) स्नातक कार्यक्रम के पहले बैच को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।

निर्देशक के बारे में

प्रवीण शेखर थिएटर निर्देशक, डिज़ाइनर और लेखक हैं। वे राष्ट्रीय पुरस्कार और राजकीय सम्मानों के साथ वरिष्ठ फेलो (संस्कृति मंत्रालय) क़े प्राप्तकर्ता हैं। उन्होंने 1 9 नाटकों में अभिनय किया है, 28 नाटकों का निर्देशन किया है और उन्होंने रतन थियम, रुद्र प्रसाद सेनगुप्ता, भानु भारती, बी.व्ही. करंथ, बी.एम. शाह, तपस सेन, बादल सरकार, स्वाजील सेनगुप्ता सरीखे दिग्गजों के साथ कार्य किया है। उनके निर्देशित नाटक एनएसडी के भारत रंग महोत्सव और जशन-ए-बचपन में प्रदर्शित किए गए हैं। वे एक कला आलोचक भी हैं जिन्होंने कई प्रकाशनों के लिए काम किया है। मास कम्युनिकेशन और हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर के अलवा उन्होंने फिल्म और टेलीविजन संस्थान, पुणे से “फिल्म लैंग्वेज” और राष्ट्रीय संग्रहालय, इलाहाबाद से कला सौंदर्यशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की है।

मंच पर

खरु- भास्कर शर्मा

खरु के पिता- सतीश तिवारी  

खरु का बेटा- अंजल सिंघ

भेड़िया 1 – सिद्धार्थ पाल

भेड़िया2 – अनुज कुमार  

भेड़िया 3 – अमर सिंघ

नतिनि 1 – कोमल पांडे

नतिनि 2 / मेमना – अनुवर्तिका, सोमवंशी 

नतिनि 3 – सरिता यादव

खरु का पड़ोसी- दिलीप श्रीवास्तव

खरु का रिश्तेदार- इंद्रजीत सिंह

भेड़िये/भेड़- चंकी बच्चन, दिलिप, अंजनी कुमार सोनी, आकाश अग्रवाल, अनुज, अमर, सिद्धार्थ, इंद्रजीत, अनुवर्तिका, कोमल, सरिता।

 

5 नवम्बर 2017, रविवार समय: शाम 6:30 बजे

क़िस्सा ख्वानी क्रिओल और हिंदी भाषा में

कहानी: मॉरीशस

संकल्पना: उमा झुनझुनवाला

प्रस्तुति: मॉरीशस के थियेटर कलाकार लीलाश्री, शवीन और वोमेश

 

कहानी के बारे में

लोक नृत्य और संगीत के माध्यम से मॉरीशस बनने के संघर्षों की कहानी।

 

उमा झुनझुनवाला के बारे में

46 से अधिक नाटकों में अभिनय, 12 नाटकों और 11 एकांकियों के निर्देशन के अलावा, उन्हें कोलकाता में कथा कोलाज के नाम से स्टोरी थिएटर (story theatre) को लाने का श्रेय दिया जाता है।

उन्होंने 2 नाटक रेंगती परछाइयाँ और हज़ारो ख़्वाहिशें का लेखन किया है। 8 बच्चों के नाटकों और 12 नाटकों का अनुवाद भी किया है। झांसी में रानी लक्ष्मीबाई के संग्रहालय के लिए उन्होंने संपूर्ण प्रकाश और संगीत कार्यक्रम की अवधारणा, पटकथा और डिज़ाइन की है। रंगमंच पर उनकी कविताऐं, कहानियां और लेख कई पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित किए गए हैं। रंगमंच में उनके योगदान के लिए कई पुरस्कारों साए सम्मानित किया गया है जिनमे प्रमुख हैं कौमी एकता पुरस्कार 2016, श्रीदेवी माहेश्वरी पुरस्कार, महिला सम्मान पुरस्कार 2006 और 1997 आदि।

 

5 नवम्बर 2017, रविवार समय: शाम 7 बजे

नाटक– द चेयर्स (The Chairs)

नाटककार- यूजीन इओनेस्को

संगीत: इफरा काक और सनम

निर्देशन– मुश्ताक़ काक

नाट्यदल- अमेच्यर थियेटर ग्रूप, जम्मू

 नाटक के बारे में

चारों तरफ़ पानी से घिरे एक गोल इमारत में, सबसे अलग, दो बुज़ुर्ग अपने खाली दिनों को अनिश्चितता में टिमटिमाते अतीत को याद करने में और काल्पनिक लोगों से आबाद वर्तमान को जीने में बिताते हैं। वे कुर्सियाँ सजाते हैं और अपने उन अदृश्य मेहमानों का स्वागत करते हैं जो दुनिया के लिये उस बुज़ुर्ग इंसान का संदेश सुनने आये हैं। उस दम्पति के आत्म्हत्या के बाद अब वो संदेश एक ऐसे वक्ता के हाथ छोड़ दिया गया है जो बहरा और मूक है, जो इसे आगे किसी तक नहीं पहुँचा सकता।

इओनेस्को लिखते हैं, ” ये दुनिया मेरी समझ से परे है, मैं इंतज़ार कर रहा हूँ किसी ऐसे का जो इसे समझा सके। द चेयर्स (The Chairs) नाटक इस शैली के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में देखा जाता है, जिसमें मानवता के अकेलेपन और निरर्थकता पर प्रकाश डाला गया।

नाट्यदल के बारे में

1980 में कुछ उत्साही लोगों ने, अनुभवी कलाकार स्व. रतन कलसी के नेतृत्व में, एमेच्योर थिएटर ग्रुप का गठन किया। यह दल, श्री राम सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक मुश्ताक काक द्वारा चलाया जा रहा है।

प्रमुख प्रस्तुतियों में टोबा टेक सिंह, डाक घर, उरुभंगम, मैकबेथ, आषाढ़ आषाढ़ का एक दिन, आधी रात के बाद, एवम इंद्रजीत, अंधा युग आदि शामिल हैं। ग्रुप ने कई राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय रंगमंच उत्सवों में भाग लिया है।

निर्देशक के बारे में

रंगमंच में उनके योगदान के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्तकर्ता मुश्ताक काक का जन्म और परवरिश जम्मू में हुआ। उन्होंने 100 से अधिक नाटकों का निर्देशन किया है। उन्हें अंधा युग, मल्लिका और प्रतिबिंब सहित कई नाटकों के लिए जम्मू एवं कश्मीर एकेडमी ऑफ़ आर्ट, कल्चर एंड लैंग्वेज द्वारा सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के पुरस्कार से सम्मानित गया और रंगमंच में उत्कृष्टता के लिए महिंद्रा ऐंड महिंद्रा अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया है। उनके नाटक “महाब्राह्मण”, “अल्लादद”, “कस्तुरी मृग”, “चेखोव इन माय लाइफ” और “लोकतंत्र इन हेवेन” को 1999, 2000, 2003, 2005 और 2013 के लिए साहित्य कला परिषद , दिल्ली सरकार द्वारा सर्वश्रेष्ठ नाटक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

 

मंच पर

बूढ़ा आदमी सुनील शर्मा

बूढ़ी औरत– सुमना कुमारी

वक्ता संदीप वर्मा

6 नवम्बर 2017, सोमवार समय: शाम 5 बजे से

 रंगमंच के विकास व प्रसार में शैक्षिक संस्थान और अख़बारों की भूमिका पर चर्चा

 वक्ता

विश्वम्भर नेवर (प्रधान संपादक, दैनिक छपते छपते), रवीन्द्र राय (संपादक, राजस्थान पत्रिका), जय कृष्ण वाजपेयी (संपादक, दैनिक जागरण), आफ़रीन हक (संपादक, अखबार-ए-मशरीक), प्रोफेसर आनंदलाल (विभागाध्यक्ष, अंग्रेज़ी विभाग, जादवपुर विश्वविद्यालय), प्रो. सत्या तिवारी (प्रिंसिपल, कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज), प्रो. राजश्री शुक्ला (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय), प्रो. शुभ्रा उपाध्याय (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, खुदीराम बोस कॉलेज), प्रो. दिलीप शाह (डीन, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज), प्रो. प्रीति सिंघी (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, शिक्षायतन कॉलेज), प्रोफेसर इतु सिंह (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, खिदीरपुर कॉलेज), प्रो रिंकु घोष (विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, लेडी ब्रेबर्न कॉलेज), डॉ पूनम पाठक (सेंट लॉरेंस स्कूल), अनुभव दासगुप्ता (द हेरिटेज स्कूल), प्रियदर्शनी दासगुप्ता (अभिनव भारती स्कूल)

 

7 नवम्बर 2017, मंगलवार समय: शाम 6:30 बजे

क़िस्सा ख्वानी : एक औरत की डायरी से

लेखिका : उमा झुनझुनवाला

प्रस्तुति: उमा झुनझुनवाला, अर्पिता, हिना, कुमकुम, चंद्रायी, अनीता, अर्चना, शबरीन और लीलाश्री

एक औरत की डायरी से एक गद्य है जिसे डायरी के रूप में लिखा गया है। यह सदियों पुराने दर्द, घुटन, शक्ति और एक महिला होने के अकेलेपन का जीवंत प्रलेखन है।

 शाम 7 बजे

नाटक: अर्थ

निर्देशक: निलोय रॉय

दल: पीपल्स थियेटर ग्रुप, नई दिल्ली

 

नाटक के बारे में

अर्थ, जिसे सत्व, मानव मूल्यों या वित्तीय, किसी भी नज़रिये से देखा जाये , एक ऐतिहासिक नाटक है जो 320 ईसा पूर्व के समय को दर्शाता है। यह नाटक जीवन और समाज में मूल्यों की जटिलताओं को दर्शाता है, जब स्व्यं मौर्य साम्राज्य भी इंसान के आंतरिक संघर्षों का शिकार हो जाता है। किसी भी विशिष्ट ऐतिहासिक चरित्र को केंद्रित ना करते हुए, ‘अर्थ’ उस आर्थिक प्रभुत्व की छवि प्रस्तुत करता है जो राजनीतिक वंशों द्वारा विकृत और दूषित की गई है। चाणक्य, बिन्दुसरा और उनके जीवन, इतिहास के पन्नों में हुए बदलावों के उत्प्रेरक हैं, लेकिन यह कहानी उस आम आदमी के इर्द गिर्द घूमती है जिसके विचार अब एक नया मोड़ ले रहे हैं, राजनीतिक और धार्मिक परिवर्तनो से प्रेरित, ये आम आदमी  अपनी दुविधाओं से जूझते हुए अपनी एक स्वतंत्र विचारधारा बनाने के लिये संघर्षरत है। तक्षशिला और मौर्य साम्राज्य के बीच राजनीतिक संघर्ष असल में आजीविका और संसाधनों को नियंत्रित करने के लिए प्रभुत्व और वित्तीय अक्ष के हेरफेर की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।

नाट्य दल के बारे में

पीपल्स थियेटर ग्रुप अभिनव प्रकाश, मंच निर्देशन और विश्व थिएटर के ज्ञान के बीच सामंजस्य बनाने में विश्वास रखता है। सादगी के माध्यम से प्रस्तुत की गई हर कहानी मन को कल्पनाओं के साथ उड़ान भरने के लिये पंख प्रदान करती है।

चोतुश्पोद, इति कृष्णा, स्वोप्नेर शोहोर, टाइपराइटर, पदातिक, वो नहीं गांधी, ओ ‘ओथेलो, और अर्थ जैसी प्रस्तुतियों से समूह ने अनछुये विचारों, अवधारणाओं और कहांनियो को दर्शकों के सामने लाया है। उनके प्रयासों को समीक्षकों और दर्शकों दोनों ने बराबर सराहा है।

 

निर्देशक के बारे में

निलोय ने नाटककार, निर्देशक और अभिनेता के रूप में आलोचकों के साथ-साथ सामान्य दर्शकों के बीच भी एक विशिष्ट पहचान बनायी है। वे उन चुनिंदा युवा निर्देशकों में से एक है जिन्हें उनके कार्य के लिए यूरोपीय संघ द्वारा अभिस्वीकृत किया गया है। उनके नाटकों, चोतुश्पोद, इति कृष्णा, स्वोप्नेर शोहोर, एक टुकड़ों ईछे, पदातिक और आबार एकात्तोर को भारत भर में सम्मान और प्रशंसा प्राप्त हुआ है। उनके हिंदी नाटक ‘ वो नहीं गांधी’, ‘अर्थ’, ‘मेडिया’ के हिंदी रूपांतरण और अंग्रेजी में ‘वार इज़ नॉट ओवर येट’ को संवेदनशील और अत्यधिक अनुभवी स्क्रिप्ट के लिए समीक्षकों द्वारा प्रशंसित किया गया है।

 मंच पर

  1. बोधी और दामू: राहुल
  2. वट्टा: सृष्टि
  3. अराहंत: अजय सिंह
  4. सुगातो: अंकित कुमार
  5. बिंदूसार: अनुराग जैन
  6. सुबंधु: मोहित सिंह
  7. विमन्ना: अभिषेक पाल
  8. विमुत्ती: अंकित के मिश्रा
  9. यख्खा: रवि कुमार
  10. पर्ना: पूजा कांजीलाल
  11. सामवेद: करन मिश्रा
  12. सुभद्रांगी: सिमरन
  13. चाणक्य: प्रदीप मणि त्रिपाठी
  14. अगात: तरुण कपूर
  15.  मंत्रन: शर्जेल खान
  16. नागरिक: प्रिंस
  17. नागरिक: यशिका
  18. शारन्य: बबली

 8 नवम्बर 2017, बुधवार समय: शाम 6:30 बजे

नाटक: दो औरतें

संगीत – अबधेश पासवान, कुंदन कुमार

प्रकाश– अभिमन्यु विनय कुमार

नाटक और निर्देशन– अमित रौशन

नाट्यदल: पीपल्स थिएटर ग्रुप, बेगुसराय

नाटक के बारे में

उप-शहरी इलाके के अंतांत की एक गली में सन्नाटा पसरा था । बीबी दलजीत का दिल दहलाने वाला विलाप उस सन्नाटे को तोड़ रहा था और कई प्रश्नों को जन्म दे रहा था । ‘दो औरतें’ नाटक समाज में बढ़ते अत्याचार और अपराधों के खिलाफ एक प्रतिक्रियात्मक राजनीतिक प्रदर्शन है। यह नाटक दो माताओं के मनोवैज्ञानिक आतंक और उनके बेटों के प्रति उनके प्रेम को दर्शाता है… वो बेटे.. वो अपराधी… ज़िंदगी हमेशा एक परी कथा नहीं होती…

नाट्यदल के बारे में

आशिर्वाद रंगमंडल एक राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित रंगमंच समूह है जो बेगूसराय, बिहार में स्थित है, और इसका गठन 30 साल पहले हुआ था। सार्थक थिएटर गतिविधियों में संलग्न होने के अलावा, समूह सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में भी शामिल है। आशिर्वाद रंग महोत्सव नामक राष्ट्रीय रंग्मंच उत्सव 2010 में शुरू हुआ था। 2012 में, आशिर्वाद रंगमंडल ने एक और रंगमंच उत्सव की शुरुआत जिसका नाम टैगोर नाट्य महोत्सव है।

निर्देशक के बारे में

अमित रौशन समकालीन भारतीय थिएटर में एक उभरते युवा प्रतिभा है। उन्होंने डॉ बी अनंत काले कृष्णन, प्रोफेसर मोहन महर्षी, प्रो रामगोपाल बजाज और कई अन्य प्रमुख थियेटर व्यक्तित्वो के साथ एक अभिनेता और डिजाइनर के रूप में काम किया। थिएटर के क्षेत्र में बारह प्रमुख कार्यशालाओं जैसे फ़ोरम थिएटर कार्यशाला (लंदन), शिनोग्राफ़ी कार्यशाला (लंदन, भारत), रंगमंच प्रबंधन कार्यशाला (नॉर्वे), रंगमंच डिजाइन कार्यशाला (इंग्लैंड) आदि में भाग लिया।

वे कला एवं संस्कृति विभाग, भारत सरकार द्वारा भिखारी ठाकुर युवा पुरस्कार 2014 के प्राप्तकर्ता हैं।

 मंच पर

रिंटु कुमारी

मक्सूदन कुमार

कुणाल भारती

अरुण कुमार

उमा शंकर

 

 

 

दुनिया को बचाना है तो बच्चों को बचाइए

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बच्चों को लेकर बातें बहुत होती हैं…गाँव से शहर तक..न जाने कितने मुद्दे हैं…न जाने कितने मसले हैं…न जाने कितनी समस्याएं है मगर खुद हम बच्चों को महत्व देना नहीं चाहते और यह मान लेते हैं कि हमारी सोच ही उनकी सोच है। यूनिसेफ जिन बाल अधिकारों की बात करता है, उनमें एक बाल अधिकार यह है कि बच्चों की बात को सुना जाए, समझा जाए और उसे लागू किया जाए मगर इस देश में और हमारे परिवारों की जिन्दगी से बच्चों का जिक्र गायब है क्योंकि वे वोट नहीं दे सकते…वे बड़ों की यौन हिंसा का शिकार होते है….3साल की बच्ची की नन्ही सी देह पर सुई चुभोई जाती है, यौन उत्पीड़न होता है और इन सबमें उसकी माँ का नाम शामिल होता है…अस्पतालों में बच्चों के हिस्से की ऑक्सीजन बड़ों का कमिशन बन जाता है…सैकड़ों बच्चों की जानें चली जाती है और प्रशासन के लिए यह मामूली बात होती है…हमारे पास बच्चों के लिए बजट में भी पर्याप्त अंश नहीं है…उनके खेलने के मैदान शॉपिंग मॉल बन जाते हैं…स्कूलों में एक मैदान नहीं है कि बच्चों को खेलने का सुख मिले। हमारी बसों में बच्चों के लिए सीट नहीं है और न ही उनके लिए सीट जल्दी छोड़ी जाती है..उनको क्या सिखा रहे हैं और क्या दे रहे हैं हम?

बड़े और महँगे स्कूलों में भी बच्चे यौन हिंसा का शिकार हो रहे हैं…शहरों में बच्चों में छोटी उम्र से ही मानसिक अवसाद हो रहा है…आखिर कैसी दुनिया बना रहे हैं हम अपने ननिहालों के लिए….हैरान हूँ कि हम उनकी परवरिश में लड़ना क्यों नहीं सिखाते…जूझना और हारकर उससे उबरना और नयी कोशिश करना हम क्यों नहीं सिखा पा रहे हैं…जैसी कृत्रिम जिन्दगी हम खुद जीते हैं…वही कृत्रिमता बच्चों की जिन्दगी में भर रहे हैं…हाल ही में ब्लू व्हेल के कारण कितने बच्चों की जान गयी…और हम जरा सी अपनी सुविधाओं से समझौता करते तो ऐसा नहीं होता..।

धार्मिक और साम्प्रदायिक उन्माद का शिकार हम बच्चों को बनाते हैं…जिस घर में रोटी नहीं है…वह बच्चों को काम पर भेजने पर मजबूर है और शिक्षित शहरों में माँ – बाप की महत्वाकांक्षा बच्चों को मार रही है…और हम सपने देखते हैं….भविष्य के..शिक्षा का अधिकार है मगर संसाधन नहीं है…फिर भी बच्चे हँसते हैं…खेलते हैं…जिन्दगी को जीते हैं…यह उनकी जीतने की मासूम सी जिद है जो बड़ों के बनाए नर्क को भी ध्वस्त करती है…हमें बच्चों से सीखने की जरूरत है…। इस दुनिया को बचाना है तो बच्चों को बचाइए।

रंगमंच पर दोहरा संघर्ष कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं स्त्रियाँ

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रंगमंच की दुनिया में कुछ लोग होते हैं जो नाटक करते हैं और कुछ होते हैं जो नाटकों को जीते हैं। लिटिल थेस्पियन की सह संस्थापक और निदेशक उमा झुनझुनवाला और अजहर आलम की जोड़ी ऐसी ही जोड़ी है। लिटिल थेस्पियन 23 साल पूरे कर चुकी है…देश भर में प्रशंसित और पुरस्कृत हो चुकी है…और हिन्दी का पहले थियेटर फेस्टिवल करने का श्रेय भी संस्था को जाता है। हाल ही में नीलांबर के लिटरेरिया में लिटिल थेस्पियन को रवि दवे स्मृति सम्मान प्रदान किया गया। नाटकों को उपेक्षित करते आ रहे हिन्दी प्रदेश में नाट्यकर्मी उमा झुनझुनवाला ने नाटकों न सिर्फ प्रतिष्ठित किया बल्कि नयी पीढ़ी और खासकर लड़कियों को इस विधा से जुड़ने का आत्मविश्वास दिया। आगामी 3 नवम्बर से लिटिल थेस्पियन जश्न ए रंग 2017 का वृहद आयोजन करने जा रहा है…। नाटकों का उत्सव जब सजने वाला है तो नाटकों पर बात होनी ही है…तो अपराजिता से लिटिल थेस्पियन की सह संस्थापक व निदेशक उमा झुनझुनवाला ने साझा की ढेर सारी बातें नाटकों, उसके इतिहास और नाटकों में स्त्री पर। पेश हैं कुछ अंश –

 “किसी भी क्षेत्र में स्त्रियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है” – कह देने मात्र से ही बात पूरी नहीं हो जाती हैl अभी चारों तरफ इसी तरह की बातें लिखी और कही जा रही हैं कि २१वी सदी महिलाओं के बहुआयामी प्रतिभाओं की सदी है, जागरूकता और दावेदारी की सदी है। समाज, राजनीति और कला सहित जीवन का कोई भी क्षेत्र महिलाओं की इस दावेदारी से अछूता नहीं है।

व्यक्तिगत तौर पर मैं लिंग-भेद के दृष्टिकोण से किसी भी विषय या चर्चा की पक्षधर नहीं हूँ…लेकिन उसके बावजूद एक स्त्री होने के नाते किसी भी सृजन की प्रसव पीड़ा से ठीक उसी तरह अवगत हूँ जैसे एक माँ होती है। उस पीड़ा को पुरुष समाज अलग अलग धरातल पर काव्यात्मक ढंग से महसूस कर उसे वर्णित तो कर सकता है किन्तु हर औरत के लिए उस पीड़ा की अनुभूति सामान्य तौर एक जैसी ही होती है – उदहारण स्वरुप किसी औरत या लड़की का नाटक करने जाना ही उसके पिता/पति के परिवारवालों के लिए स्वीकार्य नहीं हो पाता है कि मंच पर जाकर लोगो के सामने अभिनय करना, नाचना गाना वगैरह वगैरह अधर्म होता है, किसी तरह जाने की स्वीकृति मिल जाए तो और दूसरे पचासों सवाल सुरसा राक्षसी की तरह मुंह बाये खड़ी रहती हैं – मसलन- डायरेक्टर कौन है, रोल क्या है, समय पर घर आ जाना, आज देर क्यों हो गयी, फलाने एक्टर के साथ किस तरह का दृश्य है, रोज़ रोज़ जाना ज़रूरी है क्या ?

और अगर शादीशुदा है तो – घर की सारी जिम्मेदारियां तय वक़्त पर ही पूरी होनी चाहिए, रात को देर से आओगी तो खाना कैसे बनेगा, बच्चों की पढाई का कौन ध्यान रखेगा, फलाने मर्द के साथ क्यों आई, दृश्य में दूरी बना के रखो, फलाने के साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध है, आदि आदिl उफ्फ्फ… ये सारे सवाल सिर्फ स्त्रियों के लिए ही होते हैं इसलिए इनका संघर्ष दोहरा होता है – इन सारे सवालों की जवाबदेही के साथ साथ रंगमंच पर अपने हस्ताक्षर को दर्ज कराना मामूली बात नहीं हो सकती l ऐसा नहीं है कि ऐसी परिस्थिति का सामना हर स्त्री शब्द को करना पड़ता है; लेकिन अपनी मर्ज़ी के काम में रजामंदी के मोहर की आवश्यकता मुझे लगता है हर किसी को पड़ ही जाती है l खैर समय के साथ ये सवाल उठने लगा था कि वर्तमान परिस्थितियों में परिवर्तन लाये बिना समाज का विकास संभव नहीं और इसके लिए औरतों को भी समाज की संपूर्ण कलात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेने की पूरी स्वाधीनता होनी चाहिए l

अपितु, परिवर्तित सामाजिक ढाँचे की विषमताओं और जटिलताओं के चलते कला की अन्य विधाओं की अपेक्षा रंगमंच में स्वयं को घोषित करना निस्संदेह असाधारण कार्य है परन्तु असंभव कतई नहीं और इसलिए ये सूची भी मामूली नहीं जहाँ महिला रंगकर्मियों की एक लम्बी कतार है –जोहरा सहगल, कुदसिया जैदी, शांता गाँधी,  रशीद जहाँ, शीला भाटिया, दीना पाठक, अंजला महर्षि, अनामिका हक्सर, प्रतिभा अग्रवाल, लक्ष्मी चन्द्रा, कपिला मलिक वात्स्यायन, क्षमा आहूजा, नीलम मानसिंह, रानी बलबीर कौर, बी. जयश्री, अरुंधती राजे, एस. मालती, सौम्य वर्मा, नादिरा बब्बर, जे. शैलजा, अमाल अल्लाना, अनुराधा कपूर, गिरीश रस्तोगी, कीर्ति जैन, तृप्ति मित्रा, उषा गांगुली, त्रिपुरारी शर्मा, मंजू जोशी, कुसुम हैदर, विजया मेहता, माया कृष्ण राव, शबनम हाशमी, अरुंधती नाग, कविता नागपाल, रेखा जैन, सांवली मित्र, अमला राय, उषा बनर्जी, उमा सहाय, नंदिता दास, उत्तरा बावकार, चेतना जालान, रेखा जैन, भागीरथी, विभारानी (और आप लोग चाहें तो मेरा भी नाम दर्ज कर सकते हैं इसमें – उमा झुनझुनवाला)

१९वीं सदी के अंतिम दशकों में पारसी थियेटर का बोलबाला अपने चरम पर था l मूनलाइट, मिनर्वा आदि थियटरों में व्यावसायिक दृष्टिकोण से एक के बाद एक सफल नाटकों की प्रस्तुतियाँ होती रहीं l इनका मूल उद्देश्य दर्शकों का सतही तौर पर मनोरंजन करके पैसा कमाना था l १९३०-३४ तक इसका असर बड़ा व्यापक रहा l लेकिन ये काल आन्दोलनों और क्रांतियों का काल था l देश की आज़ादी के साथ साथ समाज में व्याप्त जड़ता के ख़िलाफ़ तथा पारसी थिएटर की फूहड़ प्रस्तुतियों स व्याकुल होकर साहित्यकारों की कलम ने काम करना शुरू किया l फलस्वरूप हर स्तर पर नवजागरण की लहर ने लोगो की विचारधारा में एक सशक्त परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई l नवजागरण काल के लेखकों में एक विशेष लक्षण दृष्टिगोचर होती है – इनका विस्तार एक साथ कई कई विधाओं में था l साहित्य को कला का ही अभिन्न अंग मानते हुए इनलोगों ने ऐसे नाटकों के मंचन पर विशेष बल दिया जिनका साहित्यिक महत्व हो और सुसंस्कृत विचारों की स्थापना में सक्षम हों l प्रभावस्वरूप इन नाटकों ने पारसी नाटकों की अतिरंजना के प्रभाव को धूमिल करना शुरू कर दिया जो लोगो को उनके वास्तविक जीवन से नहीं जोड़ पा रही थी l  इनमे भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालकृष्ण भट्ट, पंडित माधव शुक्ल आदि प्रमुख थे l इनका मानना था साहित्य की समझ के लिए समाज का शिक्षित हों ज़रूरी है क्योंकि शिक्षा मनुष्य को विचारवान बनती है और निम्न कोटि के साहित्य के रसापान से रोकती है l इनलोगों ने अंग्रेजों के ख़िलाफ़ नाटक को एक सशक्त हथियार बनाया और देशप्रेम से ओतप्रोत नाटक खेले l इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु १९०६ में हिंदी नाट्य समिति की स्थापना हुई और मुंशी भृगुनाथ के नेतृत्व में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नीलदेवी और राधेश्याम ने कथावाचक का वीर अभिमन्यु जैसे सामाजिक विषयों पर नाटक खेलना शुरू किया और हिंदी रंगमंच को पारसी बालाओं की जुल्फों और पतली कमर से बाहर निकाल कर दर्शकों को भारतीय संस्कृति और सभ्यता पर आधारित जीवन मूल्यों के प्रति सचेत होने की प्रेरणा दीl सत्य विजय, पांडव विजय, भारत रमणी, सती पद्मनी, सम्राट परीक्षित, स्कूल की लड़की आदि नाटकों के मंचन के माध्यम से सामाजिक जागरूकता को सस्जक्त बनाया l इन नाटकों से तत्कालीन समाज के स्वरुप को भलीभांति समझा जा सकता है l

दूसरे दशक में पंडित माधव शुक्ल और भोलानाथ बर्मन के द्वारा हिंदी नाट्य परिषद् की स्थापना हुई l गाँधीजी के आन्दोलनों का प्रभाव हर तरफ था; साहित्य भी इससे अछूता नहीं था, कला पर भी इन आंदोलनों का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता था l बंगाल क्रांतिकारी गतिविधियों में अग्रणी रहा है l कलकत्ता का साहित्य सृजन, कला सृजन, रंगकर्म आदि गतिविधियाँ राष्ट्रीय नवजागरण में अदभुत सक्रिय भूमिका का निर्वहन कर रहा था l देशभक्ति से ओतप्रोत नाटकों को अंग्रेज़ सरकार प्रतिबंधित करने लगी तो इन रंगकर्मियों ने नाटकों के नाम बदल कर से खेलना शुरू कर दिया l इस कड़ी में महाराणा प्रताप, महाभारत, विश्वप्रेम, चन्द्रगुप्त, नूरजहाँ, शाहजहाँ, महात्मा ईसा आदि नाटक खेले गए l इस तरह रंगमंच पर देशप्रेम की धारा बहने लगी l इस बीच में और भी कई नाट्य संस्थाएँ अस्तित्व में आईं l लेकिन १९४७ में तरुण संघ की स्थापना ने रंगमच में स्त्रियों की भागेदारी को महत्वपूर्ण बनाया l भंवरमल सिंघी, श्यामानंद जालान, विमल लाठ आदि महत्वपूर्ण लोगो के साथ सुशीला भंडारी, सुशीला सिंघी और प्रतिभा अग्रवाल ने रंगमंच की बागडोर संभाली l बाल विवाह, विधवा विवाह, पर्दा-प्रथा, फूहड़ नाचगान, शादी-विवाह पर होने वाली फिजूलखर्ची, दिखावाबाज़ी, आडम्बर आदि पर खुलकर नाटक लिखे गए और मंचित भी हुए l ये प्रस्तुतियां बड़ी सफल और सार्थक साबित हुईं l

१९५५ में अनामिका की स्थापना एक नई ऊर्जा साबित हुई– अनुवादों की श्रृंखला में नाट्य शोध की संस्थापक प्रतिभा अग्रवाल का नाम भी अग्रणी है. १९३० में इनका जन्म हुआ था. मारवाड़ी समाज की किसी महिला का अभिनय में आना ही उस वक़्त के लिहाज से बहुत बड़ी क्रांति थी l प्रतिभा जी ने कलकत्ता के हिंदी रंगमंच को राष्ट्रीय स्तर पर जो पहचान दिलाई वो अतुलनीय है l अनामिका द्वारा साहित्यिक नाटकों की प्रस्तुतियाँ जनमानस की रुचियों का शुद्धिकरण के साथ लोगो में साहित्य के पठन पाठन के चलन को बढ़ाया l प्रतिभा जी के अनुवादों ने भाषाओँ के मध्य सेतु का काम किया और विभिन्न साहित्य के नए नए आस्वादों से दर्शकों को परिचित कराया l प्रतिभा जी के नेतृत्व में हम हिन्दुस्तानी, जनता का शत्रु, आषाढ़ का एक दिन, पाटलिपुत्र के खँडहर में, अंजो दीदी, घर-बाहर, छलावा, छपते छपते, मादा कैक्टस, लहरों के राजहंस, शुतुरमुर्ग, आधे-अधूरे, एवम इन्द्रजीत, पगला घोड़ा, हयवदन आदि पचास से भी अधिक नाटक हैं जो कलकत्ता के हिंदी रंगमंच के इतिहास में विशेष महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय हैं l प्रतिभा अग्रवाल कलकत्ता के हिंदी रंगमंच का एक स्वर्णिम नाम है l

उन्नीसवीं सदी के चौथे दशक में किसानों, लेखकों, छात्रों, मजदूरों के अनेक संगठन बने जिन्होंने जन आंदोलनों को नया मोड़ दिया. 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद और बंगाल कल्चरल स्क्वायड, मुंबई का कल्चरल स्कावड, बैग्लोर की सांस्कृतिक इकाई की सफ़लता के बाद एक राष्ट्रीय मंच की आवश्यक्ता की पुर्ति के लिये इप्टा का 25 मई 1943 को गठन हुआ. ब्रिटिश साम्राज्य, अन्तर्राष्ट्रीय फ़ासीवाद और भारतीय सामंतवाद के खिलाफ़ संघर्ष में आम जनता के वैचारिक पहलुओं को दिशा देने के लिये प्रदर्शनकारी कला के प्रयोजन के महत्त्व को समझा गया. इप्टा ने गीत, संगीत, नृत्यरचना आदि के द्वारा समय के यथार्थ को प्रदर्शनकारी रूपों में व्यक्त करने की जरूरत बताई. लेखक, कलाकार, नर्तक, अभिनेता इसमें शामिल हुए. विभिन्न भारतीय भाषाओं में इसकी शाखाएं बनी. नुक्कड़ नाटकों का दौर शुरू हुआ… बंगाल में हिंदी में नुक्कड़ नाटक को एक आन्दोलन के तौर पर महेश जायसवाल ने लिया और लगातार लिखते और करते रहे l उषा गांगुली ने भी नुक्कड़ नाटको को महत्व दिया था और कई प्रस्तुतियां की l मैंने भी कई नुक्कड़ नाटक लिखे और उनकी हज़ार से ऊपर प्रस्तुतियां की हैं l नवजागरण युग के प्रभाव की तरह इप्टा के जन्म ने नाटकों को एक नई दिशा दी l रंगमंच से जुड़ा हर व्यक्ति किसी न किसी रूप से इप्टा और इप्टा के आंदोलनों से जुड़ने लगा था l फलस्वरूप रंगकर्म को एक नया कैनवास मिला लोगो के बीच में उनका होकर उनकी समस्याओं को लेकर उनके बीच पहुँचने के लिए l

१९४४ में जन्मी उषा गांगुली ने १९७६ में रंगकर्मी की स्थापना कर प्रगतिशील नाटकों के साथ कलकत्ता के हिंदी रंगमंच पर अपनी धूम मचा दी l सत्तर के बाद बंगाल में मार्क्सवाद और समाजवाद ने ज़ोर पकड़ना शुरू किया l चाहे बंगाली समाज या हिंदी समाज, पूरा बंगाल इसके प्रभाव में डूबा हुआ था l

समाजवाद और मार्क्सवाद लोगो के जीवन का एक अहम् हिस्सा हो गया था l सारा साहित्य और रंगमच मार्क्समयी हो गया था l गण-नाट्य का प्रभाव बहुत ही जन व्यापी था l इस तरह बंगाली समाज या यूँ कहूँ कि मार्क्सवाद में डूबा बंगाली समाज पहली बार हिंदी रंगमंच के लिए बहुत बड़ा दर्शक वर्ग बन कर उभरा l

दूसरे आरंभिक दिनों में रंगकर्मी के नाटकों में साहित्यिक नाटकों की भाषा की गूढता और जटिलता भी नहीं थी l इसलिए बंगाली दर्शकों ने इसे बड़े ही सहज रूप से लिया l महाभोज, लोक कथा, होली, रुदाली, शोभा यात्रा, कोर्ट मार्शल, हिम्मत माई, सरहद पार मंटो, काशीनामा, भोर, चंडालिका आदि नाटकों की सफल प्रस्तुतियों से उषा गांगुली एक मजबूत हस्ताक्षर हैं भारतीय हिंदी रंगमंच में l

1972 में श्यामानन्द जालान ने अनामिका से अलग हटकर पदातिक की स्थापना की l चेतना जालान (१९४७) ने श्यामानंद के निर्देशन में लहरों के राजहंस में अलका की भूमिका करके एक संवेदनशील कलाकार के रूप में अपनी पहचान बनाई और इसक बाद एवम इन्द्रजीत में मौसी और मानसी के द्वैत भूमिका में अभिनय करके अपनी कुशलता का लौहा मनवा लिया l इतना ही नहीं विजय तेंदुलकर के गीधाड़े और सखाराम बाइंडर में चंपा के अभिनय में उन्होंने अपने साहसिक कलाकार होने का भी परिचय दिया l

1994 में मैंने और अज़हर ने लिटिल थेस्पियन की स्थापना की थी l लेकिन ये दौर किसी आंदोलनों का दौर नहीं था l थोड़ी बहुत राजनीतिक उठापटक के अलावा समाज एक सीधी रेखा पर ही चल रहा था l लेकिन टीवी सीरियलों का कुप्रभाव नज़र आने लगा था l सन 2000 के बाद तो हमने छात्र वर्ग के मध्य से साहित्यिक संगोष्ठियों के चलन का खात्मा भी देखा l हिंदी भाषियों में नाटक और रंगमंच अतीत की गाथा में सीमित हो कर रह गया था l लेकिन लिटिल थेस्पियन की साहित्यिक और सामाजिक सरोकारों से जुड़े नाटकों की लगातार प्रस्तुतियों ने हिंदी दर्शकों को एक बार फिर नया आस्वाद देने में सफलता हासिल की l

रेंगती परछाइयाँ (मेरे द्वारा लिखित), कबीरा खड़ा बाज़ार में, अलका, गैंडा, पतझड़, लोहार, बड़े भाईसाहब, प्रश्नचिह्न, यादों के बुझे हुए सवेरे, हयवदन, शुतुरमुर्ग, कांच के खिलौने आदि 30 से अधिक नाटक और कथा-कोलाज के अंतर्गत ३२ कहानियों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों को ये कहने पर मजबूर किया है कि इन प्रस्तुतियों की बात कुछ अलग है l

इसके अलावा मैंने भारत सरकार के जूनियर फेल्लोशिप के अंतर्गत मैंने कोलकाता में कहानियों के मंचन पर कई स्तरों पे काम किया है l कहानियों में कोई बदलाव किये बगैर उनका मंचन दर्शकों के लिए एक अद्भुत अनुभूति साबित हुयी l चूँकि अनुवाद भी मेरा क्षेत्र है, अंग्रेजी, उर्दू और बांगला से कई नाटकों का अनुवाद किया है मैंने जिनका अलग अलग नाट्य निर्देशकों द्वारा मंचन भी हुआ है l

डॉली बासु मूलतः बंगला नाटकों में और रमनजीत कौर अंग्रेजी नाटकों में एक सशक्त हस्ताक्षर हैं लेकिन इन्होने हिंदी नाटको को भी मंचित कर हिंदी नाटको के विकास में अहम भूमिका निभाई हैं l निर्देशन के अलावा अभिनय के क्षेत्र में भी कलकत्ता का स्त्रीवर्ग अग्रणी रहा है l यामा सराफ, संचिता भट्टाचार्य, उमा जयसवाल, अनुभवा फतेहपुरिया, श्राबोनी राय, सेंजुती मुखोपाध्याय, शुभ्रा खेतान अग्रवाल, हीना परवेज़, अर्पिता बोस, अनीता दास, चंद्रेयी दत्ता मित्रा, आरज़ू सज्जाद, अंजना मंडल कई नाम हैं जिन्होंने कलकत्ता के रंगकर्म को अतुलनीय बनाया है l

रंगमंच में स्त्रियों की भूमिका पर बात हो और बंगाल की उस अदाकारा का नाम ना लिया जाए तो पूरी बात अधूरी रह जायेगी। मेरा इशारा नटी विनोदिनी की तरफ है जिसे एक महत्वपूर्ण चरित्र  के रूप में हर महिला अभिनेत्री ज़रूर खेलती हैं …नटी विनोदिनी सिर्फ बंगाल की ही अभिनेत्री नहीं थी बल्कि संपूर्ण भारतीय रंगमंच की एक महान कलाकार थीं. विनोदिनी ने अपनी आत्म-कथा “आमार कथा” में अपने संघर्ष की कथा को कुछ इस तरह वर्णित किया है – “वारांगनाओं का जीवन कलंकित और घृणित होता है, लेकिन वह घृणित और कलंकित क्यों होता है? माँ के गर्भ से ही तो पतिता नहीं होती, अपने जन्म के लिए वो तो दोषी नहीं होती, सोचना चाहिए की किसने सबसे पहले उसका जीवन घृणा योग्य बनाया?

यह संभव कि कुछ स्त्रियाँ स्वेच्छा से अँधेरे में डूब कर नरक के रास्ते चलती हैं, लेकिन ज़्यादातर पुरुषों के छल कपट का शिकार बन कलंक का बोझ सर पे लादे नरक यंत्रणा सहती हैं….ऐसी स्त्रियाँ ही जानती हैं कि वारांगनाओं का जीवन कितना असहनीय होता है? विनोदिनी की ये पंक्क्तियाँ उनके साथ हुई सारी ज़्यादतियों का खुलासा ही करती हैं l

कलकत्ता में रंगमंच के सफ़र को सौ साल से भी ज़्यादा हो चुके हैं और इस बात में कोई संदेह नहीं कि हिंदी रंगमंच में स्त्रियों की एक सुदृढ़ परंपरा रही है जिन्होंने एक से बढ़ कर एक नए नए प्रयोग  किये हैं l परन्तु महिलाओं का काम संगठित होने की बजाय कुछेक टोलियों में बंट कर रह गया l

वर्तमान समय में हम आदर्शवाद और यथार्थवाद के मध्य के संघर्ष को नए रूप में देख रहें हैं l फलस्वरूप नाटकों के प्रति रूचि उत्पन्न करने के लिए विभिन्न स्तरों पर दर्शकों के लिए सेमिनारों, संगोष्ठियों और वर्कशॉप के आयोजन की आवश्यकता है और ये ज़िम्मेदारी सभी सांस्कृतिक संस्थाओं की भी है ताकि सिर्फ़ स्त्रियों की ही नहीं बल्कि पुरुषों की भी भागीदारी रंगमंच में सशक्त रूप में हो l

मौलिक हिन्दी नाटक कम लिखे जाते हैं। आम तौर पर साहित्यकार साहित्य की अन्य विधाओं पर ही अपना समय देना पसंद करते हैं। नाटक लिखने में बहुत उत्साहजनक रुचि नहीं दिखाई देती। नतीजतन रंगकर्मियों को अक्सर अनूदित नाटकों का सहारा लेना पड़ता है। या फिर स्क्रिप्ट चयन में समझौता करना पड़ता है। ”

अंत में मैं यही कह कर अपनी बात समाप्त करती हूँ कि रंगमंच पर स्त्री का लक्ष्य कला के विभिन्न पहलुओं के लिए, दर्शकों और जनता के लिए और स्वयं उसके लिए एक महान और विशिष्ट स्थान रखता है और इसलिए स्त्रियों ने रंगमंच को मानवता के हित में समृद्ध किया है l जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह रंगमंच में भी ऐसी अनेक स्त्रियाँ मौजूद हैं जिनपर हम गर्व कर सकते हैं l

लिटिल थेस्पियन पर अपराजिता में प्रकाशित आलेख

http://www.aprajita.co.in/%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%9F%E0%A4%BF%E0%A4%B2-%E0%A4%A5%E0%A5%87%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A8-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80/

 

 

 

 

 

 

 

 

 

स्वाद का खजाना बिहार से

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कसार

सामग्री : आधा किलो चावल का आटा, 250 ग्राम घी, 300 ग्राम चूरा किया हुआ गुड़, एक चौथाई कप सौंफ।

विधि : सबसे पहले सभी सामग्रियों को एकसाथ एक बाउल में अच्छे से मिक्स कर लें। हथेलियों को चिकना कर तैयार मिश्रण से छोटे-छोटे बॉल्स बनाएं। बस तैयार है छ्ठ का प्रसाद कसार। इसे आप सर्दियों में कभी भी बनाकर खा सकते हैं।

फुटकर बातें – कसार छठ पर भी बनता है और इसके अतिरिक्त बिहार में शादियों में कसार में सिक्का डालकर बांधा जाता है और यही कसार का लड्डू लड़की वालों के यहाँ से लड़के वालों  को भेजा जाता  है।

 

रिकवच

सामग्री : 4 अरबी के पत्ते, 1 बड़ा कप बेसन,  1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर ,1 छोटी चम्मच हल्दी,  1 छोटी चम्मच राई, चुटकी भर हींग, 1 छोटा चम्मच जीरा पाउडर, 1 छोटा चम्मच गरम मसाला पाउडर, 2 छोटी चम्मच अदरक-मिर्च का पेस्ट, 2 बड़े चम्मच तेल, 2 बड़े चम्मच इमली का रस, नमक स्वादानुसार, अमचूर पानी जरूरत के अनुसार

विधि : सबसे पहले अरबी के पत्तों को साफ कर धो लें और पत्ते के डंठल को चाकू की मदद से काट लें। एक बर्तन में बेसन, धनिया पाउडर, जीरा, गरम मसाला, हींग, अदरक-मिर्च का पेस्ट, नमक, तिल के दाने, तेल और इमली का रस डालकर अच्छे से मिलाएं। अब अरबी के पत्ते लें और इसके उल्टे तरफ पर बेसन के मिश्रण को अच्छी तरह फैला लें। एक पत्ते के ऊपर एक और पत्ता रख के बेसन का मिश्रण लगाएं। इसी तरह बाकी के पत्ते के साथ यही प्रोसेस करें। जब सभी पत्तों पर बेसन का मिश्रण लग जाए तो उसे आराम से हल्के हाथों से रोल कर लें। 
रोल करते वक्त भी बेसन का मिश्रण लगाना ना भूलें। जब पत्ते अच्छे से रोल हो जाएं तो पत्तों के रोल में धागा बांध लें। एक कुकर लें।  कुकर में तेल डालकर चिकना कर लें। पत्तों की मात्रा के अनुसार आवश्यकतानुसार पानी डालें। धीमी आंच में कुकर को 25 से 30 मिनट के लिए स्टीम होने के लिए रखें। तय समय के बाद रोल को निकाल कर ठंडा होने के लिए रख दें।  जब रोल पूरी तरह से ठंडा हो जाए तो गोल-गोल स्लाइस काट लें।  धीमी आंच में एक पैन में तेल गर्म करने के लिए रखें। आप इस विधि को कोफ्तों की तरह भी बना सकती हैं।
 

जहां छठ के लिए मिट्टी का चूल्हा बनाते हैं मुस्लिम परिवार

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पटना. चार दिन तक चलने वाले छठ महापर्व का पहला अर्घ्य आज है। भले ही यह पर्व हिंदुओं का है, लेकिन मुस्लिम समाज के लोगों को भी इस पर्व का इंतजार रहता है। मुस्लिम समुदाय के लोग भी छठी मइया की महिमा पर विश्वास करते हैं। इसी विश्वास का परिणाम है कि कहीं मुस्लिम समाज के लोग घाटों की सफाई तो करते ही हैं साथ ही इस दौरान वे त्योहार से कुछ दिन पहले नॉनवेज खाना बंद कर देते हैं। वे हर तरह से छठ व्रत करने वालों की सेवा करते हैं।

छठ पर्व में पवित्रता का खास महत्व है। पर्व से जुड़े प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर बनाए जाते हैं। कद्दू भात से लेकर खरना और इस पर्व के सभी प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर बनाने की परंपरा है।

पटना के वीरचंद पटेल रोड में मुस्लिम समुदाय के दर्जन से ज्यादा लोग, सालों से ये चूल्हे बनाते हैं। चूल्हा बनाते-बनाते उनका भी इस महापर्व से जुड़ाव हो गया है।मिट्टी के चूल्हा बनाने की शुरुआत करने से पहले ही ये लोग मांसहार खाना बंद कर देते हैं। चूल्हा बनाने से पहले नहाते हैं और इस दौरान पवित्रता का पूरा खयाल रखते हैं।

इस दौरान साफ-सफाई का खास ध्यान रखा जाता है। इनमें से कई लोग इस दौरान छठ माई से मनोकामना भी मानते हैं और पूरा होने पर चढ़ावा चढ़ाते हैं।  शहदा खातून ने कहा कि हम चूल्हा बनाने से पहले नहाते हैं, क्योंकि हम इस पर्व की महिमा को जानते हैं। साजनी ने बताया हमें ये कला विरासत में मिली है।  बचपन से मैंने अपने अब्बा, अम्मी और दादी को चूल्हा बनाते देखा है। मैं इस काम को 15 सालों से कर रही हूं। छठ पर्व की अहमियत हमारे लिए भी बहुत खास होती है।

वर्षों से कर रहे हैं काम, मन्नत पूरी होने पर चढ़ाते हैं चढ़ावा

संजीदा खातून ने कहा कि हम वर्षों से यह काम कर रहे हैं, इसलिए इस पर्व से हमारा भी जुड़ाव हो गया है। इस पूजा को हम सबसे महान पूजा मानते हैं। हम अपने आपको भाग्यशाली मानते हैं कि हमारे बनाए चूल्हे पर इस महापर्व का प्रसाद बनता है। इससे ज्यादा सुकून की बात क्या होगी?

35 वर्षीय फुलो ने कहा कि मैंने पिछले साल भी अपने बेटे की सलामती के लिए मनोकामना मांगी थी और मेरा बेटा स्वस्थ है। हम हिंदू परिवार में जाकर पैसे दे देते हैं और हमारे नाम का चढ़ावा चढ़ जाता है। हमें भी हर साल इस पर्व का इंतजार रहता है।  कुरेशा खातून ने कहा कि हम चूल्हे बनाने के दौरान सफाई का विशेष ध्यान रखते हैं। मोहम्मद कैसर ने बताया कि हिंदू हो या मुस्लिम सब का खून तो लाल ही होता है। हमें इस पर्व में भाग लेने का मौका मिलता है, हम खुद को किस्मत वाले मानते हैं।

छठ में इसलिए बनाते हैं चूल्हे पर प्रसाद

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छठ पूजा में छठ का प्रसाद चूल्हे पर बनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. व्रती खरना का प्रासद जैसे गुड़ की खीर , ठेकुआ और रोटी नए चूल्हे पर ही बनाते हैं। इसके पीछे ये मुख्य कारण और मान्यताएं हैं…
इसके अलावा अर्घ्य वाले दिन भी छठी मैय्या के लिए ठेकुआ, पूरी आदि प्रसाद नए चूल्हे पर ही बनाया जाते हैं।
कथित तौर पर इस दिन चूल्हे पर खाना बनाने की कई मान्यताएं जुड़ी है. मान्यता है कि जिस चूल्हे पर छठ का प्रसाद बनता है उसपर इससे पहले खाना नहीं बना होना चाहिए. यानी चूल्हा नया होना चाहिए और प्रसाद बनाने के लिए आम की लकड़ी ही जलाई जाती है।
आमतौर पर हम घर में जिस चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं उसमें प्याज-लहसुन या मांसाहार वाली चीजें बनी होती हैं. तो इसलिए इसपर छठ का प्रसाद नहीं बनाया जाता।
छठ में ऐसे चूल्हे या बर्तन का प्रयोग करना चाहिए जिसमें पहले कभी नमक वाली चीजें न बनी हों.
इसके अलावा छठ का प्रसाद हमेशा घर के बाहर छत पर या आंगन में खुले जगह पर बनाना चाहिए।
जहां प्रसाद बनाएं उस जगह को पानी से अच्छे से साफ कर लेना चाहिए. अगर मिट्टी की जगह पर चूल्हा बना रहे हैं तो इस जगह को गाय के गोबर से लीप लें।
अगर आपने छठ पर मिट्टी का चूल्हा नही बनाया तो बाजार से टीन का परंपरागत चूल्हा भी खरीद कर इस पर प्रसाद बना सकते हैं।
इसके अलावा तीन ईट को चूल्हे आकार में रख कर भी प्रसाद बनाया जा सकता है।

(साभार – पकवान गली)

देश – दुनिया को छठ से जोड़ बिहार की खुशबू फैलाते प्रवासी बिहारी

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सुषमा त्रिपाठी

छठ पूजा अब ग्लोबल हो रही है….दूर विदेशों तक जा रही है। गंगा मइया के घाट न सही….ताल – पोखर न सही….मगर जो जहाँ है…वहीं से छठी मइया को पुकार रहा है। छठ पूजा हर एक बिहारी का मान है…जो बिहार में हैं….उनके लिए तो बंगाल की दुर्गापूजा वाला उल् लास ही है मगर जो वहाँ नहीं हैं….उनके लिए छठ पूजा कसक है और इस कसक को वे उत्सव बना रहे हैं….बिहारी के दिल से आप बिहार को नहीं निकाल सकते…फ्लैट और अपार्टमेंट की बंद संस्कृति में छठ पूजा ताजा हवा के झोंके की तरह है जो सांस लेने का मौका देती है…प्रकृति के पास ले जाती है…अपने अंह के आसमान से उतर कर थोड़ी देर के लिए हम वो बनते हैं….जो हम वाकई है। छठ पूजा जमीन से जुड़ने का एहसास है जो हमें मजबूत और आस्थावान बनाता है…प्रदूषण के बोझ से हाँफते शहर में सूर्य की आराधना…उसकी उर्जा से खुद को भरना एक ऑक्सीजन की तरह है। छठ की छुट्टी पाने के लिए महीनों से तैयारी, बॉस को समझाना, ओवरटाइम करना और ठसाठस भरी ट्रेन में जाना….ये बताता हैै कि छठ बिहारियों के लिए क्या महत्व रखता है। ऐसा ही एक वीडियो इस बार वायरल हुआ है जिसमें छठ की छुट्टी न मिलने पर एक युवक बॉस को छठ पूजा के महत्व के बारे में बताता है और अंत में छुट्टी मंजूर हो जाती है।

दरअसल, छठ स्त्रियाँ मुख्य रूप से करती हैं मगर पुरुष भी शामिल होते हैं और वे छठ पूजा करते भी हैं…बिहारियों का ऐसा त्योहार जो पूरे परिवार को बाँधता है…परदेस में बैठे बेटों को वापस कुछ दिन के लिए घर लाता है….माओं के चेहरे की मुस्कान देता है…छठ पूजा सिर्फ बेटों के लिए नहीं होती…बेटियों के लिए भी होती है। देखने में अजीब लग सकता है मगर भुईपरी छठ की बाध्यता नहीं है बल्कि इसे लोग अपनी इच्छा से करते हैं और यह मन्नत पूरी होने पर की जाती है  मगर जैसा कि कवियित्री रश्मि भारद्वाज ने फेसबुक पर अपनी पोस्ट में लिखा कि समय के साथ कुछ बदलाव होने चाहिए जिससे इस पर्व में भी समानता का सूर्य उगे…तो वह बात सही है…छठ पूजा अब किसी एक राज्य का उत्सव नहीं है…बल्कि वह राष्ट्रीय और वैश्विक रूप धारण कर रही है और यह प्रवासी बिहारियों के कारण हुआ है जिन्होंने अपनी कर्मस्थली को ही बिहारमय बना दिया है। इसी तरह का एक वीडियो पिछले साल छठ पूजा पर आया था। उस गाने में मेट्रो में नौकरी करता एक लड़का छठ पर बहन का मैसेज देख, न जाते-जाते घर निकल जाता है। घाट पर बेटे को अचानक पाकर माँ की खुशी अनायास ही आपको भावुक कर जाती है।

हम शारदा सिन्हा के बारे में जानते हैं…उनके बगैर तो बिहार की लोकगीत परम्परा का इतिहास ही लिखना असम्भव है..भोजपुरी को बिहार से बाहर ले जाने और समसामायिक बनाने का प्रयास शारदा सिन्हा का ही है। जिस तरह होली और दिवाली किसी एक राज्य के नहीं हैं, उसी प्रकार छठ भी अब सिर्फ बिहार का नहीं रहा…वह पूरे देश का त्योहार बनता जा रहा है। मल्टीनेशनल कम्पनियों में काम कर रहे बिहारी बिहार और छठ की खुशबू हर जगह फैला रहे हैं और सोशल मीडिया के प्रसार ने इस अभियान को और तेज किया है।  कुछ सालों से क्रांति प्रकाश झा के प्रयास से यह मुहिम और तेज हो रही है…छठ पर उनके वीडियो एक नयी परम्परा रच रहे हैं और पूरे देश से इसको जोड़ रहे हैं। पिछले साल उनका एक वीडियो आया था जिसमें शारदा सिन्हा ने आवाज दी थी। इस वीडियो में विदेश में रह रहे एक शिक्षित और नौकरी करने वाले दम्पति को छठ करते हुए दिखाया गया है। वीडियो में पत्नी किसी और राज्य की है और पति बिहार का है।

https://youtu.be/Ba7hfsXDweM

माँ के फोन में छठ न कर पाने की कसक, पति का यादों को ताजा कर खुश होना और फिर उदासी…उस पर पत्नी का उधेड़बुन में पड़ना और दृढ़ निश्चय से परम्परा को थाम लेना..यह परम्परा को आधुनिकता से जोड़ देता है। वीडियो बेहद लोकप्रिय हुआ था। ये वीडियो उन लोगों के लिए भी एक सन्देश है जो ये सोचते हैं, ‘अरे छठ तो बिहार का उत्सव है। छठ सामूहिकता का उत्सव है और प्रकृति से जुड़ने का उत्सव है…कृतज्ञता ज्ञापित करने का उत्सव है…जुड़ना और जोड़ना ही जीवन की धारा को गति देता है।

क्रांति प्रकाश झा का इस साल भी नया वीडियो आया है जिसमें बिहार की युवती को दिखाया गया है। उसका विवाह पंजाबी परिवार में हुआ है। वह माँ बनने वाली है और उसके लिए पूरा परिवार छठ करता है जिसमें पति, सास और श्वसुर सब शामिल हैं…ऐसे में यह वीडियो सामूहिकता के साथ एकता का संदेश देता है। इसमें सबसे अच्छा दृश्य तब का है जब पति पत्नी को कहता है कि घर के परम्परा खत्म न होई और व्रत भी वही करता है पूरे परिवार के साथ। एक  दूसरे की संस्कृति को अपनाना और उसका सम्मान करना ही तो हमें जोड़ेगा। कल्पना पटवारी मूल रूप से असम की गायिका हैं जिनका विवाह एक मुस्लिम परिवार में हुआ है। उनकी आवाज की मिठास आपको एक दूसरी ही दुनिया में ले जाती है। वह भिखारी ठाकुर पर भी काम कर रही हैं। उनके ताजा वीडियो में एक मुस्लिम परिवार को पूरी श्रद्धा के साथ यह पर्व करते दिखाया गया है। यह पर्व अब राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी बनता जा रहा है।

दरअसल, अश्लील गीतों ने भोजपुर की संस्कृति को ऐसी चोट पहुँचाई है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती है मगर भोजपुरी में ऐसे तमाम गीत हैं जो रूढ़ियों को तोड़ने और परम्परा की बात करते हैं…सस्ती लोकप्रियता पाने वालों ने इस पर ध्यान नहीं दिया मगर इसका तोड़ हम बिहारियों को निकालना होगा जो इन गीतों के कारण बिहार और भोजपुरी के नाम पर तड़प उठते हैं। क्रांति प्रकाश ने इसे एक ग्लैमर दिया है..बॉलीवुड को जोड़ा है..ऐसी कोशिश हम भी कर सकते हैं। भोजपुरी की रचनात्मकता को खोजिए…ऐसे गीत लिखिए जो भोजपुरी समाज में जागरुकता की हवा को आग दें…यह कोई और नहीं करेगा…हमको और आपको करना होगा।

लिटरेरिया 2017 : सृजनात्मक का भरोसा दे गये हिमाकत के चार दिन

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नीलांबर द्वारा आयोजित चार दिवसीय साहित्योत्सव लिटरेरिया एक नयी उम्मीद और विश्वास की जमीन देता गया। साहित्योत्सव की शुरुआत राष्ट्रीय परिसंवाद से हुई। इस परिसंवाद में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, इतिहास बोध तथा वर्चस्व की राजनीति विषय पर सारगर्भित चर्चा हुई। संगोष्ठी को संबोधित करते हुए आलोचक तथा प्रोफेसर पंकज चर्तुवेदी ने फासीवाद के बढ़ते खतरों से अवगत करवाया। उन्होंने कहा  कि  हमें प्रतिक्रियावादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से बचाना होगा। प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तथा आलोचक वेद रमण पांडेय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की व्याख्या करते उसे यूरोप की देन बताया और प्रख्यात आलोचक रामविलास शर्मा के उद्धरण के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि रामविलास शर्मा ने भारत में राष्ट्रवाद की मुक्कमल तस्वीर रखी।

विश्व में एक छवि बनाने के लिए भारत को एक पहचान की जरूरत है और परम्परा को समझने के लिए संस्कृत सीखनी चाहिए। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में सबकी सम्मिलित भागीदारी जरूरी है और वह किसी एक राजनीतिक पार्टी की देन नहीं है। युवा आलोचक राहुल सिंह ने कहा कि आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भूमिका वर्चस्ववादी राजनीति तय कर रही है। परिसंवाद की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक तथा वरिष्ठ आलोचक डॉ. शम्भुनाथ ने कहा कि भारत एक बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है, यहां की सर्वसमावेशी संस्कृति ही हमारी एकता की आत्मा है।

समारोह का उद्घाटन अहाना ठाकुरता के नृत्य से हुआ। स्वागत भाषण नीलांबर के अध्यक्ष डॉ. विमलेश त्रिपाठी ने दिया। परिसंवाद का संचालन खिदिरपुर कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ. इतू सिंह ने एवं धन्यवाद ज्ञापन संजय जायसवाल ने दिया।

13 अक्टूबर लिटरेरिया के दूसरे दिन कविता कोलाज, माइम, ‘एक रोज’ नाटक का मंचन और काव्य पाठ का आयोजन किया गया। इस कविता कुम्भ में वरिष्ठ कवि मंद्राकांता सेन, मदन कश्यप, कुमार अम्बुज, पंकज चतुर्वेदी, शहंशआह आलम, पूनम विश्वकर्मा, विनय सौरभ, विरू सोनकर, पंखुरी सिन्हा, प्रशांत विप्लवी, हेमन्त देवलेकर, नीलकमल, रश्मि भारद्वाज, मनीषा झा,राज्यवर्द्धन, कल्पना झा, निशांत, समेत कई वरिष्ठ कवियों ने कविता पाठ किया। दूसरी तरफ विहाग वैभव, गौरव पांडेय, मुकेश कुमार, अंकिता रासुरी अन्य युवा कवियों ने भी प्रभावित किया। इस अवसर पर कवि हेमन्त देवलेकर के काव्य संग्रह गुल मकई का लोकार्पण भारतीय भाषा परिषद के निदेशक तथा वरिष्ठ आलोचक शम्भुनाथ ने किया। हेमन्त देवलेकर की इस कविता संग्रह की कुछ कविताओं पर एक नीलांबर द्वारा  कविता कोलाज प्रस्तुत किया गया। इसके अतिरिक्त माइम और नाटक “एक रोज” का मंचन भी किया गया। ममता पांडेय द्वारा निर्देशित नाटक एक रोज में – नीलू पांडेय ने एकल अभिनय किया तथा माइम में सुशांत दास, पंकज सिंह, प्रियंका सिंह, निधि पांडेय, मधु सिंह, स्नेहा सिंह, और उर्मि ने अभिनय किया ।

लिटरेरिया के तीसरे दिन एक सांझ कहानी के अंतरगत वंदना राग और चंदन पांडेय की कहानियों पर आधारित फिल्मों की प्रदर्शनी हुई । जिसमें ऋतेश पांडेय, विमलेश त्रिपाठी, कल्पना झा, आशा पांडेय, विशाल पांडेय ने अभिनय किया । इसके साथ ही विहान ड्रामा वर्क्स द्वारा नाटक हास्यचूड़ामणि का मंचन हुआ । कार्यक्रम का सफल संचालन आनंद गुप्ता, निर्मला तोदी, संजय जायसवाल एवं ममता पांडेय ने किया। धन्यवाद ज्ञापन मनोज झा ने दिया।

लिटरेरिया कोलकाता के चौथे दिन शरत सदन सभागार में अ टेल आफ फिश माइम की प्रस्तुति हुई। सुशांत दास ने इसमें एकल अभिनय किया। नीलाम्बर के सदस्यों की ओर से अष्टभुजा शुक्ल की कविता पर आधारित कविता कोलाज प्रस्तुत किया गया। इस अवसर पर युवा लेखक विमलेश त्रिपाठी की किताब केदारनाथ सिंह, लोक संस्कृति और आधुनिकता का द्वंद्व का विमोचन कवि कुमार अम्बुज ने किया।

रश्मि बंद्योपाध्याय के निर्देशन में एक अभिनव भाव नृत्य की प्रस्तुति हुई। नीलाम्बर संस्था की ओर से प्रख्यात नाट्यकर्मी रवि दवे की स्मृति में रवि दवे स्मृति सम्मान – 2017 कोलकाता की नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन को रंगमंच में विशिष्ट योगदान के लिए दिया गया।

इस अवसर पर भोपाल की नाट्य संस्था विहान ड्रामा ने अमृता प्रीतम के जीवन पर आधारित नाटक अमृता का मंचन किया गया। इस आयोजन में देश के अलग अलग हिस्से से आए साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने उत्साह के साथ हिस्सा लिया।

कार्यक्रम का संचालन कल्पना झा और धन्यवाद ज्ञापन रितेश पांडे ने दिया। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में ममता पांडे, भरत साव, अवधेश, दीपक ठाकुर, राहुल शर्मा, विशाल पांडे, पूनम सिंह, सुजीत राय, पंकज सिंह, प्रिया पांडे, निधि पांडे, मधु सिंह, प्रियंका सिंह आदि ने भरपूर सहयोग दिया।

किदांबी श्रीकांत ने जीता डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज खिताब, कोरियाई खिलाड़ी को दी मात

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 ओंडेसे : भारत के नंबर एक पुरुष बैडमिंटन खिलाड़ी किदांबी श्रीकांत ने रविवार को डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज खिताब अपने नाम कर लिया। फाइनल मुकाबले में श्रीकांत ने दक्षिण कोरियाई खिलाड़ी ली ह्यून इल  को सीधे सेटों में 21-10, 21-5 से मात दी।

एक तरफा रहे फाइनल मुकाबले में श्रीकांत ने कोरियाई खिलाड़ी को कोई मौका नहीं दिया। शानदार फॉर्म में चल रहे किदांबी ने आसानी से ली ह्यून इल को रौंदकर इस साल तीसरे सुपर सीरीज खिताब पर कब्जा किया।

श्रीकांत ने शुरुआत से ही अपने विरोधी खिलाड़ी पर दबाव बनाए रखा। पहले गेम में भले ही ली ह्यून 4-4 की बराबरी पर थे लेकिन श्रीकांत ने शानदार खेल दिखाते हुए पहला गेम 21-10 से अपने नाम कर लिया और 1-0 की बढ़त बना ली। दूसरे गेम में भी किदांबी ने अपनी रिदम को बरकरार रखा और 21-05 से जीत दर्ज कर खिताब अपने नाम कर लिया।