Wednesday, April 1, 2026
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पुरुषों के अंडरगारमेंट बेचने वाला पहला ई-कॉमर्स प्लैटफॉर्म है बटटॉक्स

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ऐसे समय में जब हम ऑनलाइन किराने का सामान भी खरीद लेते हैं, बिल भुगतान करते हैं और कमोडिटी खरीदते हैं, इस सुविधा को देखते हुए तीन युवा उद्यमियों ने पुरुषों को बेहतर अंडरवियर की खरीद में मदद करने के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया है। चेन्नई के रहने वाले बृजेश देवारेड्डी, सुरेज सलीम और मनीष किशोर ने ई-कॉमर्स प्लेटफार्म बटटॉक्स का शुभारंभ किया है, जो अपने ग्राहकों को उनके लिए मुफीद अंडरवियर खरीदने की सुविधा प्रदान करता है। बेशक बटटॉक्स, अंडरगारमेंट ऑनलाइन बेचने वाला देश का पहला स्टार्टअप नहीं हैं। हाल के वर्षों में, जिवामे और प्रिटी सीक्रेट्स जैसे कई ऑनलाइन उद्यमों ने भारत में इनरवियर मार्केट को बढ़ाने में मदद की है, इस मार्केट का 2024 तक 68,270 करोड़ (10.2 अरब डॉलर) तक पहुंच जाने का अनुमान है। लेकिन बटकॉक्स निश्चित रूप से पहला उद्यम है जो पुरुषों के इनरवियर पर ध्यान केंद्रित करता है।

रूढ़िवादी भारत में, आम तौर अच्छी फिटिंग वाले इनरवियर मौजूद नहीं होते है। जबकि महिलाएं आमतौर पर बिना अपने शरीर के आकार का ध्यान दिए ऐसे ही लॉन्जरी खरीद लेती हैं वहीं पुरुष शायद ही कभी अपने अंडरग्राम के लिए काफी ध्यान देते हैं। यहां तक कि भारत में ऑनलाइन शॉपिंग एप्स में पुरुषों के अंतर्वस्त्रों की वर्गीकृत श्रेणियां नहीं होती हैं। यही कारण है कि देवारेड्डी, सलीम और किशोर ने बटटॉक्स की शुरुआत की और फिर बिक्री शुरू करने से पहले एक साल में बाजार अनुसंधान पर खर्च किया। किशोर के मुताबिक, भारतीय पुरुष अक्सर नहीं जानते हैं कि जब उनके अंडरवियर को बदलने का समय आ गया है। बेचैनी पैदा करने के अलावा, खराब फिटिंग के अंडरवियर से स्वास्थ्य को खतरे भी हो सकते हैं।

सेक्शुअल मेडिसिन कंसल्टेंट और एक प्रोफेसर राजन भोंसले के अनुसार, सही आकार के अंडरवियर पहनने से व्यक्ति के यौन स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ता है और उचित फिट के कपड़े पहनने से बांझपन से जुड़े मुद्दों को कम करने में मदद मिल सकती है। देवारेड्डी के मुताबिक, यह ऐसा विषय है कि कोई कभी भी इसके बारे में बात नहीं करता है। महिलाओं के स्वास्थ्य के मुद्दों पर बात होनी शुरू हो गयी हैं लेकिन पुरुष इस मुकाबले पिछड़े होते हैं। इन सभी को हाइलाइट करना होगा और तभी हमें लगा कि इस तरह एक प्लेटफार्म बनाया जाना चाहिए। बटटॉक के पास एक सदस्यता मॉडल है, जहां ग्राहकों को सेवा के लिए पंजीकरण के बाद समय-समय पर उनके दरवाजे पर उत्पादों का लाभ मिलता है। कंपनी की तीन अलग-अलग सदस्यता योजनाएं हैं, जो कि 999 से लेकर 4999 रुपए तक हैं और वार्षिक प्लान 2700 से 14000 तक के हैं। कीमतें ब्रांड के आधार पर भिन्न-भिन्न हैं। यूसीबी, एफसीयूके, पार्क एवेन्यू और एम्पोरियो अरमानी जैसे ब्रांड इस प्लैटफॉर्म पर खरीदे जा सकते हैं। प्रत्येक बॉक्स में जाने वाले उत्पाद एक संपूर्ण प्रश्नावली पर आधारित होते हैं जो कि साइन अप करते समय ग्राहकों को भरना होता है। हाल में आई एक रिपोर्ट भारतीय इनरवियर मार्केट: ट्रेन्ड्स एंड ऑपर्च्यूनिटीज़ के मुताबिक, भारत में इनरवियर उद्योग में भारी वृद्धि की क्षमता है, जो पिछले कुछ सालों में भारतीय बाजार में बड़े अंतर्राष्ट्रीय ब्रांडों के प्रवेश से स्पष्ट है। संगठित बाजार के बढ़ते आकार और असंगठित बाजार में गिरावट का हिस्सा, मूल्य संवेदनशीलता से लेकर ब्रांड संवेदनशीलता तक एक विशिष्ट बदलाव दिखाता है। बटटॉक्स के फाउंडर बृजेश और उनकी टीम अब तक अपनी प्रगति से खुश हैं और उनकी कंपनी में लक्ष्य को अपने ऑर्डर वॉल्यूम को बढ़ाया जा रहा है। खोजी क्षमता वाले ग्राहकों की मदद करने के लिए नए मिक्स और मिश्रणों पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

(साभार – योर स्टोरी)

 

नहीं रहे हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार कुंवर नारायण

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फैजाबाद  : हिंदी के प्रसिद्ध कवि कुंवर नारायणका निधन हो गया। वह 90 वर्ष के थे। मूलरूप से फैजाबाद के रहने वाले कुंवर पिछले 51 साल से साहित्य से जुड़े थे। उन्होंने दिल्ली के सीआर पार्क स्थित अपने घर में अंतिम सांसे लीं। वह सीआर पार्क में अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहते थे।  पिछले कई महीनों से उनकी तबीयत खराब चल रही थी। साहित्य सिनेमा और संगीत में लगभग समान दखल रखने वाले कुंवर नारायण की मूल प्रतिष्ठा कवि की थी। ‘चक्रव्यूह’, ‘परिवेशः हम तुम, ‘इन दिनों’, ‘कोई दूसरा नहीं’, ‘आत्मजयी’, वाजश्रवा के बहाने और कुमारजीव जैसी अविस्मरणीय अनेक कृतियों के साथ उन्होंने हिंदी के साहित्य और समाज को एक बड़ी विरासत सौंपी है।

वह अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ के कवियों में रहे। कुंवर नारायण को अनेक महत्वपूर्ण सम्मान भी मिले। 1995 में उन्हें कविता संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ के लिए साहित्य अकादमी सम्मान मिला। 2005 में ज्ञानपीठ सम्मान मिला।
उन्हें 2009 में पद्मभूषण से विभूषित किया गया। इसके अलावा कुमार आशान सम्मान, प्रेमचंद पुरस्कार और व्यास सम्मान भी मिले। उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी मिले थे। कुंवरनारायण की रचनाशीलता के कई आयाम रहे। एक तरह की उजली मनुष्यता उनकी कविता का मुख्य स्वर बनाती रही।
लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी साहित्य से परास्नातक की पढ़ाई की थी। हालांकि, पढ़ाई के तुरंत बाद उन्होंने पुश्तैनी ऑटोमोबाइल बिजनेस में काम करना शुरू कर दिया था। बाद में आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेंद्र देव और सत्यजीत रे से प्रभावित होकर साहित्य में उनकी गहरी रुचि हो गई।

आधुनिक समय के तनावों-दबावों के बीच यह कविता बड़ी सहजता से प्रेम और सहिष्णुता का एक पाठ बनाती रही। इसके अलावा उन्होंने कई पौराणिक आख्यानों को आधुनिक और समकालीन अर्थों और संदर्भों के साथ पुनर्परिभाषित भी किया। आत्मजयी, वाजश्रवा के बहाने जैसी रचनाएं इस सामर्थ्य का प्रमाण हैं।

 

दूर करें बच्चों में इंटरनेट की लत

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आज कल की लाइफस्टाइल में तकनीक हर उम्र के लोगों के जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन चुकी है। इंटरनेट का प्रभाव हर उम्र के लोगों पर देखा जा सकता है लेकिन इसका सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। तकनीक विज्ञान का वरदान है, वहीं इसका ज्यादा इस्तेमाल बच्चों के शारीरिक विकास के साथ उनके दिमाग पर भी काफी बुरा असर डालता है। इंटरनेट की वजह से बच्चे आउटडोर गेम्स से दूर हो गए हैं। वो मोटापे के साथ कई तरह की बीमारियों के शिकार होते जा रहें हैं। अगर आपका बच्चा भी अपना ज्यादातर समय इंटरनेट पर ही गुजारता है, तो आप इन बातों को अपनाकर अपने बच्चे को इंटरनेट का ज्यादा प्रयोग करने से रोक सकते हैं –

आपका बच्चा इंटरनेट पर क्या देख रहा है, इसकी पूरी जानकारी रखना आपकी जिम्मेदारी है. साथ ही यह ध्यान रखें कि आपका बच्चा किस तरह के वीडियो गेम्स खेलता है, टीवी पर किस तरह की फिल्में या प्रोग्राम देखता है।

अपने बच्चे से इस बात पर जरूर चर्चा करें कि वीडियो गेम्स, फिल्म और टीवी प्रोग्राम में उन्हें क्या पसंद आया और क्या नहीं, और उससे उन्होंने क्या सीखा।

अपने बच्चों को ऐसे काम करने पर जोर दें, जो उनके लिए फायदेमंद हों। उन्हें पेड़ पौधे लगाना सिखाएं उनके लाभों के बारे में बताएं।

जितना हो सके अपने बच्चों को आउटडोर गेम्स में व्यस्त रखें। उनको खेलों से जुड़ी सभी जानकारी दें और खेल-कूद में उनकी ज्यादा से ज्यादा रुचि पैदा करें।

अपने बच्चों को ज्यादा इंटरनेट का इस्तेमाल न करने दें। उनके इंटरनेट इस्तेमाल करने का एक समय निश्चित करें।

अपने बच्चों के बेड रुम में कभी भी टीवी, लैपटॉप, या मोबाइल फोन ना रखें।

अकसर माता-पिता अपने बच्चों के प्यार में इतने खो जाते हैं कि वो उनकी हर मांग को बिना सोचें समझे पूरी करने लगते हैं। आपका यह व्यवहार आपके बच्चे पर बहुत गलत असर डालता है, इसलिए ऐसा करने से बचें।

 

रेणुका शहाणे टीवी पर कर रही हैं वापसी, अब पकाएंगी ‘खिचड़ी’

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फिल्म ‘हम आपके है कौन’ की बड़ी भाभी और टीवी सीरियल ‘सुरभि’ से लोगों के दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री रेणुका शहाणे अब एक बार फिर टीवी पर वापसी कर रही हैं। दरअसल मशहूर कॉमेडी सीरियल ‘खिचड़ी’ का तीसरा सीजन जल्द आने वाला है। जेडी मजीठिया, ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ के बाद अब  ‘खिचड़ी’ का तीसरा पार्ट लाने वाले हैं और खबर है कि इस बार खिचड़ी में अभिनेत्री रेणुका शहाणे नजर आएंगी।

आपको बता दें कि इस सीरियल पहला सीजन साल 2002 में आया था। इसके बाद साल 2005 में दूसरा सीजन इंस्टेंट खिचड़ी के नाम से शुरू हुआ था। अब इसका तीसरा सीजन जल्द शुरू होने के लिए तैयार है। इसमें सभी पुराने कलाकार काम कर रहे हैं। अनंग देसाई, राजीव मेहता, सुप्रिया पाठक और वंदना पाठक भी सीरियल में नजर आएंगी लेकिन इसके साथ ही रेणुका शहाणे भी शो में दिखेंगी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रोड्यूसर आतीश कपाड़िया और जेडी मजीठिया के बच्चे इस शो से डेब्यू कर सकते हैं। अगस्तया कपाड़िया और मिश्री मजीठिया जैकी और चक्की नाम के किरदार निभाएंगे। बलविंदर सिंह सूरी और समीक्षा को भी इस कॉमेडी शो में काम करने के लिए बोला गया है। हालांकि सूत्रों की मानें तो रेणुका शहाणे का रोल छोटा होगा लेकिन काफी इंस्टरेटिंग होगा।

 

 अमरनाथ की गुफा को बनाएं साइलेंट जोन, बाबा बर्फानी पर न चढ़ाएं नारियल : एनजीटी

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नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सलाह दी है कि बढ़ते हिमस्खलन से बचाने के लिए अमरनाथ गुफा को ‘साइलेंट जोन’ घोषित किया जाना चाहिए। एनजीटी ने अमरनाथ श्राइन से ये भी कहा है कि भगवान शंकर को चढ़ाए जाने वाले नारियल पर भी रोक लगाएं।

एनजीटी ने ये भी पूछा है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में उस क्षेत्र को सबसे सुरक्षित क्षेत्र घोषित किया था तो आजतक उस आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ। एनजीटी  ने अमरनाथ श्राइन द्वारा बनाई गई पर्यावरण सुरक्षा कमेटी से यह भी पूछा है कि श्राइन के आस-पास बनी दुकानें और शौचालय अभी तक क्यों नहीं हटाई गये हैं।

इससे पहले एनजीटी ने वैैष्णो देवी दर्शन करने जाने वाले श्रद्धालुओं को लेकर आवश्यक निर्देश जारी किये थे जिसके मुताबिक, मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए एक दिन में अब केवल 50 हजार श्रद्धालु ही कटरा से ऊपर जा सकेंगे।

 

सावित्री गर्ल्स कॉलेज में मधुमेह पर जागरुकता कार्यक्रम

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सावित्री गर्ल्स कॉलेज की मेडिकल सेल ने हाल ही में मधुमेह के प्रति जागरुकता लाने के उद्देश्य से एक परिचर्चा आयोजित की। परिचर्चा का विषय एक्सपियेंसिंग ए स्वीट डीसिज  डायबीटिज था। इस परिचर्चा में बोस इंस्टिट्यूट के डिविजन ऑफ मॉल्यूकुलर मेडिसीन के चेयरमैन प्रो. सुब्रत मजुमदार ने टाइप 1 और टाइप 2 मधुमेह के कारणों और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले उनके प्रभाव की चर्चा की। उन्होंने मधुमेह की रोकथाम के लिए पोषक आहार, योग और तनाव मुक्त जीवन पर जोर दिया। इस व्याख्यान के बाद विद्यार्थियों और शिक्षिकाओं के साथ भी उन्होंने चर्चा की तथा उनके प्रश्नों के उत्तर दिये। सत्र की अध्यक्षता एन्लेटिक्स इंडिया के एक्जिक्यूटिव ऑफिसर तथा आईआईटी खड़गपुर पूर्व चीफ साइंटिफिक ऑफिसर डॉ. संजीव चौधरी ने की। कार्यक्रम की शुरुआत कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. अमृता दत्त के स्वागत भाषण से हुई।

भारतीय लोककथाओं से आज भी जीवन संदेश मिलता है

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कोलकाता : लोककथाएँ सुनने की परंपरा से जुड़ी होती हैं। ये सैकड़ों साल से भारतीय जीवन के इतिहास के बारे में बताती आई हैं। लोक कथाओं को आधुनिक शैली देने की जरूरत है ताकि ये वैश्‍विक स्तर पर वैसे ही लोकप्रिय हो सकें जैसे अंग्रेजी की कथाओं को नई तकनीक के बल पर लोकप्रिय बनाया गया है। भारतीय भाषा परिषद में आयोजित भागीरथ कानोड़िया व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘लोककथा पर विमर्श’ में विद्वानों ने ये बातें कहीं।

प्रसिद्ध भोजपुरी कवि प्रो.प्रकाश उदय ने कहा कि वर्तमान समय में श्रोता बदले हैं इसलिए लोककथाओं की शैली भी बदल रही है और भारतीय संस्कृति के निर्माण में लोककथाओं की एक बहुत बड़ी भूमिका है। लोककथा के मर्मज्ञ  भगवती प्रसाद द्विवेदी ने अपने व्याख्यान में कहा- जब अहं और व्यक्तित्व विगलित हो जाता है तब लोक चेतना का निर्माण होता है। लोककथाओं के जरिए ही भारत में सदियों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता आया है। लोककथाएँ मनुष्यता और उच्चतर नैतिक मूल्यों से जुड़ी हुई हैं।

मुख्य अतिथि कवि मृत्युंजय कुमार सिंह ने कहा कि भाषाएँ भले विलुप्त हो जाएँ पर लोककथाएँ बची होती हैं। उनका क्षरण नहीं होता, शैली भले बदल जाए। इधर संयुक्त परिवार के विघटन के कारण दादी-नानी अकेली पड़ गई हैं जिसका असर लोककथा की परंपरा पर भी पड़ा है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हिंदी की लोककथाओं को हैरी पॉटर की शैली में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। परिषद के निदेशक डॉ.शंभुनाथ ने लोककथाओं पर चर्चा जरूरी मानते हुए यह कहा कि रामायण और महाभारत की मुख्य बुनियाद लोककथाऍं हैं। महाकाव्य और लोककथा के बीच संवाद हजारों साल से चलता आया है, लोककथाएँ इतिहास की चौहद्दी और महाकाव्य की शास्त्रीयता इन दोनों को चुनौती देते हुए रची जाती हैं। अध्यक्षीय भाषण देते हुए रतन शाह ने कहा कि राजस्थान की लोककथाओं में अनगिनत प्रेमकथाएँ हैं और असहमति की आवाजें हैं। हमारे देश का इतिहास राजा-महाराजाओं को इतिहास न होकर आम जनता का इतिहास है जो लोककथाओं में मिलता है। धन्यवाद ज्ञापन परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार ने किया। लोककथा पर विमर्श से पहले कवि कुंवर नारायण के निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने आरंभ में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि कुंवर नारायण के प्रति श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए कहा कि उनका परिषद से पुराना संबंध रहा है और उन्होंने अपने कृतित्व से संपूर्ण हिंदी भाषा को आलोकित किया है। उनके निधन से हम सभी मर्माहत हैं।

 

अक्कड़ मक्कड़

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 भवानीप्रसाद मिश्र

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,

दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे, ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे।

बात-बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं।
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची।

अब वह जीता, अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे
सबके खिले हुए थे चेहरे!

मगर एक कोई था फक्कड़,
मन का राजा कर्रा – कक्कड़;
बढा भीड़ को चीर-चार कर
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर।

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़,
गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा!

उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लड़ने में मत खोओ
चलो भाई चारे को बोओ!

खाली सब मैदान पड़ा है,
आफ़त का शैतान खड़ा है,
ताकत ऐसे ही मत खोओ,
चलो भाई चारे को बोओ।

सुनी मूर्खों ने जब यह वाणी
दोनों जैसे पानी-पानी
लड़ना छोड़ा अलग हट गए
लोग शर्म से गले छट गए।

सबकों नाहक लड़ना अखरा
ताकत भूल गई तब नखरा
गले मिले तब अक्कड़-बक्कड़
खत्म हो गया तब धूल में धक्कड़

अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़
दोनों मूरख, दोनों अक्खड़।

यह वीडियो भी देखें

जब बनाना हो बच्चों के लिए कुछ मनभावन

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डोसा पिज्‍जा

सामग्री: 2 कप इडली डोसे का घोल, आधा कप कसा चीज़ , एक छोटा कप बारीक कटा प्‍याज, एक छोटा बारीक कटा टमाटर, एक छोटा बारीक कटा शिमला मिर्च, 2 बड़े चम्‍मच स्‍वीट कॉर्न (उबला हुआ), 2 बड़े चम्‍मच बारीक कटी गाजर हुई, 2 बड़े चम्‍मच चिली सॉस, 2 बड़े चम्‍मच टॉमेटो सॉस, 1 छोटी चम्‍मच पिसी काली मिर्च, 2-3 बड़े चम्‍मच तेल

विधि: सारी सब्जियों को काट के मिला ले। एक तवे या पैन को गरम करें एक बड़ा चम्‍मच घोल डाल के मोटा डोसा फैलाएं, बशर्ते इसे पतला नहीं होने दें। डोसा के ऊपर टोमेटो सॉस और चिली सॉस डाल के फैला दें। कटी हुई सब्जियां डाल के पूरा फैला दें, फिर काली मिर्च और हल्‍का सा नमक बुरक दें।  कद्दूकस की हुई चीज डाल के फैला दे, तवे को ढक्‍कन से बंद कर दे।   धीमी आंच पर एक-दो मिनट तक पकाएं या चीज़ गल जाने तक पकाएं। ढक्‍कन खोल के पिज्‍जा को तवे से प्‍लेट में निकाल लें और टुकड़ों में काट के टॉमेटो सॉर्स के साथ सर्व करें। इसी तरह से सारे घोल से पिज्‍जा डोसा बना ले और गरम गरम ही सर्व करें।

 

 

 

क्रीमी मेकरोनी विद ब्रोकली

सामग्री एक कप उबली हुई मैकरोनी , 1 कप हल्‍के उबले हुए ब्रोकली के फूल, 2 टेबल स्‍पून मक्‍खन, 1 टी स्‍पून बारीक कटा हुआ लहसुन, एक टेबल स्‍पून कटा हुआ ताजी तुलसी की पत्तियां, एक कप दूध, एक चौथाई कप ताजी क्रीम, आधा कप कसा हुआ प्रोसेस्‍ड चीज, स्‍वादानुसार नमक और पिसी हुई काली मिर्च

विधि –एक चौड़े नॉन स्टिक पैन में मक्‍खन गरम करें, लहसुन डालकर मध्‍यम आंच पर कुछ सैंकड भून लें। ब्रोकली डालकर मध्‍यम आंच पर 2-3 मिनट तक भून लें। तुलसी, दूध, क्रीम और चीज डालकर अच्‍छी तरह मिला लें और बीच बीच में हिलाते हुए, मध्‍यम आंच पर एक से 2 मिनट तक पका लें। नमक और काली मिर्च डालकर एक मिनट तक पका लें। मैकरोनी डालकर, बीच बीच में हिलाते हुए माध्‍यम आंच पर एक से दो मिनट तक पका लें। तुरंत परोसें।

 

बड़ों की महत्वाकांक्षा और संवेदनहीनता के बीच पिस रहा बचपन

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अपराजिता फीचर्स डेस्क

जब हम बच्चे थे तो बड़ों की हर बात बुरी लगती थी और आज जब हम बड़े हो चुके हैं तो हम बच्चों को समझना नहीं चाहते। हम उनकी हर बात को वैसे ही समझना चाहते हैं, जैसे हम समझना चाहते हैं…हमने बच्चों के लिए ऐसी दुनिया तैयार कर दी है जहाँ हम कभी खुद नहीं रहना चाहेंगी..बच्चे घृणा झेल रहे हैं और हम अपनी नफरतों को उन पर थोप रहे हैं। बच्चों की दुनिया में हम बड़ों ने अपनी नफरत और महत्वाकांक्षा का जहर घोल रखा है। वे बच्चे भी खुश नहीं हैं जो समृद्ध हैं और जो महंगे स्कूलों में जाते हैं। प्रद्युम्न की हत्या के मामले में ग्यारहवीं कक्षा के छात्र का नाम आता है और वजह यह है कि वह परीक्षा को टालना चाहता था इसलिए उसे हत्या ही एकमात्र विकल्प सूझा….अब जरा सोचिए क्या ये इस अभियुक्त छात्र का दोष है….? ये दोष हमारा है…हमारी शिक्षा प्रणाली का है…हमने क्या हाल कर रखा है और परीक्षा कितनी बड़ी दहशत बन गयी है जो एक सामान्य बात है…मगर इसके पीछे अभिभावकों की महत्वाकांक्षा और बच्चे पर अत्यधिक दबाव डालने वाली प्रवृति है जिसने एक मासूम को अपराधी बनाकर छोड़ दिया है। अच्छा…जरा सोचिए तो हम सिखा क्या रहे हैं…मुफ्त में सामान बटोरना….मेहनत और सच बोलने को बेवकूफी समझना….रिश्वत देना और तलवे चाटना….हर बुरी चीज हमें अच्छी लगने लगी है इसलिए संजय दत्त और सलमान खान जैसे लोग आदर्श बन जाते हैं जो कानून को अपने हाथ में लिए घूमते हैं…आप जब झूठ बोलते हैं, हिंसा करते हैं तो वह सब आपके बच्चे देख रहे हैं होते हैं। आप घर में शराब की पार्टी करेंगे तो आपको आवेश जैसे बच्चों से कैसे बात करेंगे….जो शराब को आम सी चीज समझते हैं…हर मां – बाप चाहता है कि उसका बच्चा एक अच्छा  इंसान बने…उसकी इज्जत करे मगर क्या हर मां – बाप अपनी जिन्दगी में ये सारे सिद्धांत लेकर चलता है….? मॉल कल्चर में आप प्रकृति को खत्म किए जा रहे हैं तो बच्चा पेड़ लगाना कैसे सीखेगा? बच्चा सिर्फ मां – बाप से नहीं सीखता…उसके भाई –बहन, बुआ..मासी..नानी…..चाचा…सब उसकी जिन्दगी का हिस्सा है..बच्चा अगर गालियां देता है…चोरी करता है….तो उसे पीटने से पहले एक बार अपनी जिंदगी पर नजर डालिए। सीरिया और पाकिस्तान जैैसे आतंकपोषित देश में बच्चों की स्थिति कैसी है…यह बताने की जरूरत नहीं है और यह तोहफा हम बड़ों ने ही दिया है।

कुपोषण, अवसाद और आत्हत्या…

एक हालिया सर्व के अनुसार  भारत में हर साल अकेले कुपोषण से 10 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाती है. कोई 10 करोड़ बच्चों को अब तक स्कूल जाना नसीब नहीं है। इसके साथ ही सामाजिक और नैतिक समर्थन के अभाव में स्कूली बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। इसके अलावा खासकर बढ़ते एकल परिवारों की वजह से ऐसे बच्चे साइबर बुलिंग का भी शिकार हो रहे हैं। न तो उनको समझने वाले लोग हैं और न उनकी बात सुनने वाले लोग हैं, वो किसी से कुछ नहीं कह पा रहे और नतीजा यह है कि वे अवसाद में जी रहे हैं। सेव द चिल्ड्रेन की ओर से विश्व के ऐसे देशों की एक सूची जारी की गई है जहां बचपन सबसे ज्यादा खतरे में है। भारत इस सूची में पड़ोसी देशों म्यांमार, भूटान, श्रीलंका और मालदीव से भी पीछे 116वें स्थान पर है। यह सूचकांक बाल स्वास्थ्य, शिक्षा, मजदूरी, शादी, जन्म और हिंसा समेत आठ पैमानों पर प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है। ‘चोरी हो गया बचपन’ (‘स्टोलेन चाइल्डहूड’) शीर्षक वाली यह रिपोर्ट देश में बच्चों की स्थिति बताने के लिए काफी है।

चीन से ज्यादा बच्चे

आबादी के मामले में भले ही पड़ोसी चीन भारत से आगे हो, बच्चों के मामले में भारत ने उसे पछाड़ दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक चार साल तक के बच्चों की वैश्विक आबादी का लगभग 20 फीसदी भारत में ही है। वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट में ऐसे बच्चों और उनकी हालत के बारे में कई गंभीर तथ्य सामने आए थे लेकिन बीते पांच वर्षों के दौरान सुधरने की बजाय इस मोर्चे पर हालत में और गिरावट आई है। उन आंकड़ों में कहा गया था कि स्कूल जाने की उम्र वाले हर चार में से एक बच्चा स्कूल नहीं जाता। यह आंकड़ा 10 करोड़ के आसपास है।

बहुत से बच्चों को गरीबी और गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के चलते स्कूल का मुंह देखना नसीब नहीं होता तो कइयों को मजबूरी में स्कूल छोड़ना पड़ता है। देश में फिलहाल एक करोड़ ऐसे बच्चे हैं जो पारिवारिक वजहों से स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम करने पर भी मजबूर हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की खस्ताहाली के चलते छह साल तक के 2.3 करोड़ बच्चे कुपोषण और कम वजन के शिकार हैं। डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन (डाइस) की वर्ष 2014-15 में आई एक रिपोर्ट में कहा गया था कि हर सौ में महज 32 बच्चे ही स्कूली शिक्षा पूरी कर पाते हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार देश के महज दो फीसदी स्कूलों में ही पहली से 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की सुविधा है।

बाल मजदूरी

देश में बाल मजदूरी की समस्या भी बेहद गंभीर है. दो साल पहले बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था क्राई ने कहा था कि देश में बाल मजदूरी खत्म होने में कम से कम सौ साल का समय लगेगा. इससे परिस्थिति की गंभीरता का अहसास होता है। वर्ष 2011 की जनगणना रिपोर्ट में देश में पांच से 14 साल तक के उम्र के बाल मजदूरों की तादाद एक करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया था. अब तक यह तादाद और बढ़ गई होगी। देश के कुछ हिस्सों में तो बच्चों की कुल आबादी का आधा मजदूरी के लिए मजबूर है। मोटे अनुमान के मुताबिक देश में फिलहाल पांच से 18 साल तक की उम्र के 3.30 करोड़ बच्चे मजदूरी करते हैं। कभी बच्चे की देह पर गर्म चाय फेंक दी तो कभी उसे जंजीरों से जकड़ दिया….हम बडों ने उनकी दुनिया को नर्क बना दिया है। बाल श्रम को खत्म करने के लिए सबसे पहले उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना होगा। बीते एक दशक के दौरान बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में पांच गुनी वृद्धि हुई है लेकिन गैर-सरकारी संगठनों का दावा है कि यह आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है। परीक्षा में फेल होना बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की दूसरी सबसे बड़ी वजह के तौर पर सामने आई है. इसके अलावा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं होना भी बच्चों की मौत की एक बड़ी वजह है।

यूनिसेफ की ओर से हाल में जारी रिपोर्ट द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन, 2016 में कहा गया है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी के बावजूद देश में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर भयावह है। वर्ष 2015 के दौरान देश में पैदा होने वाले ढाई करोड़ में से लगभग 12 लाख बच्चों की मौत ऐसी बीमारियों के चलते हो गई जिनका इलाज संभव है। इस मामले में भारत की स्थिति पड़ोसी बांग्लादेश और नेपाल के मुकाबले बदतर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में बच्चों की स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में बहुत कुछ करना बाकी है। बच्चों को भगवान कहे जाने वाले इस देश में बच्चों को ऑक्सीजन नहीं मिलती, वे बड़ों की हवस का शिकार बन रहे हैं। इस साल सैकड़ों बच्चों की जान प्रशासनिक लापरवाही से हुई है। बाल विवाह लड़कियों के साथ लड़कों का बचपन भी छीन रहा है।

एसोचैम की स्वास्थ्य देखभाल समिति के तहत कराये गए सर्वेक्षण में पाया गया कि सात से तेरह वर्ष की आयु वर्ग के 88 प्रतिशत छात्र ऐसे हैं, जो अपनी पीठ पर अपने वजन का लगभग आधा भार ढोते हैं। इस भार में आर्ट किट, स्केट्स, तैराकी से संबंधित सामान, ताइक्वांडो के उपकरण, क्रिकेट एवं अन्य खेलों की किट शामिल होते हैं। इस भारी बोझ से उनकी रीढ़ की हड्डी को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है. इसके अलावा पीठ संबंधी कई अन्य गंभीर समस्याओं का सामना भी इन बच्चों को करना पड़ सकता है। हमने अपनी गलाकाट प्रतियोगिता का बोझ बच्चों पर डाल दिया है…रियेलिटी शो भी एक तरह का बाल श्रम ही है जिस पर बात होनी चाहिए। हाल ही में तेलंगाना में एक बच्ची की जान बैग के भारी वजन ने ले ली और वह भी तब सीबीएसई ने स्कूल बैग को लेकर आवश्यक निर्देश जारी कर दिए हैं। हमारी बसों में बच्चों को सीट नहीं मिलती…दरअसल हम स्वभाव से ही हृदयहीन हो रहे हैं….जरूरी है कि हम बच्चों को अपनी महत्वाकांक्षाओं के बोझ से मुक्त करें।