Wednesday, April 1, 2026
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डिजिटल विज्ञापन पर खर्च दिसंबर, 2018 तक 13,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान : सर्वे

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नयी दिल्ली : देश में डिजिटल विज्ञापन पर खर्च दिसंबर, 2018 तक बढ़कर 13,000 करोड़ रुपये पर पहुंच जाएगा। एक सर्वे में कहा गया है कि डिजिटल विज्ञापन खर्च में सालाना 35 प्रतिशत की दर से वृद्धि का अनुमान है।

उद्योग मंडल एसोचैम और केपीएमजी के सर्वे में कहा गया है कि स्मार्टफोन और डेटा शुल्क में गिरावट की वजह से डिजिटल विज्ञापन खर्च में वृद्धि होगी।

सर्वे में कहा गया है कि फिलहाल डिजिटल विज्ञापन पर खर्च 9,800 करोड़ रुपये है। 3जी और 4जी सेवाओं के विस्तार तथा इंटरनेट की पहुंच बढ़ने से डिजिटल विज्ञापन पर खर्च में बढ़ोतरी होगी।

वर्ष 2016 के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि 2016 के अंत तक डिजिटल विज्ञापन पर खर्च करीब 7,500 करोड़ रुपये रहा था।

इसमें कहा गया है कि कुल विज्ञापन खर्च में करीब 50 प्रतिशत डिजिटल के जरिये होता है। इसके बाद ई-कामर्स, दूरसंचार, प्रौद्योगिकी और बैंकिंग, वित्तीय सेवाओं और बीमा कंपनियों का नंबर आता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि स्मार्टफोन और टैबलेट की मांग बढ़ने से विज्ञापनदाताओं को अब अधिक लोगों तक पहुंचने में मदद मिली है। डिजिटल विज्ञापनों के साथ खास बात यह है कि ये लचीले होते हैं और किसी भी तरह के उपकरण मसलन टेलीविजन, लैपटॉप, टैबलेट या स्मार्टफोन पर इन्हें देखा जा सकता है।

सर्वे में बताया गया है कि देश में 23.5 करोड़ लोग मोबाइल उपकरणों के जरिये इंटरनेट पर जाते हैं। मोबाइल एप्लिकेशंस की वजह से अब ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में भी पहुंचने में मदद मिल रही है।

 

कांग्रेस नेता प्रियरंजन दासमुंशी का निधन

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नयी दिल्ली : कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रियरंजन दासमुंशी का निधन अस्पताल में हो गया। वह वर्ष 2008 से ही कोमा में थे। वह 72 वर्ष के थे। अपोलो अस्पताल के अधिकारियों ने बताया, ‘ पिछले एक महीने से उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी और उनकी मृत्यु आज दोपहर 12 बजकर 10 मिनट पर हुई। निधन के समय उनकी पत्नी और बेटे अस्पताल में मौजूद थे।’ पूर्व केंद्रीय मंत्री को साल 2008 में आघात आया था और वह तब से अस्पताल में भर्ती थे। बीमार पड़ने से पहले दासमुंशी ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआईएफएफ) चला रहे थे।

 

इरा जोशी दूरदर्शन समाचार की महानिदेशक बनीं

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नयी दिल्ली  : पत्र सूचना ब्यूरो (पीआईबी) की महानिदेशक इरा जोशी को दूरदर्शन समाचार का महानिदेशक नियुक्त किया गया। वह वीना जैन की जगह लेंगी जो सेवानिवृत्त हो चुकी हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने यह जानकारी दी।
पीआईबी के महानिदेशक घनश्याम गोयल को विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार :डीएवीपी: का नया महानिदेशक नियुक्त किया गया है। उन्होंने ईस्थर कार का स्थान लिया है जिन्हें ‘अनिवार्य प्रतीक्षा’ में डाल दिया गया है।
वीना जैन को मई, 2015 में दूरदर्शन समाचार का डीजी नियुक्त किया गया था। वह इस साल अगस्त में सेवानिवृत्त हो गईं। इसके बाद आल इंडिया रेडियो के समाचार सेवा प्रभाग के डीजी सितांशु कार को इस पद का अतिरिक्त प्रभार दिया गया।
आदेश में मंत्रालय ने कहा है कि जोशी को दूरदर्शन समाचार का नया महानिदेशक नियुक्त किया गया है। दूरदर्शन समाचार फिलहाल हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत भाषाओं में समाचार सामग्री तैयार करता है और प्रस्तुत करता है।

 

आइसीजे के लिए फिर चुने गए भारत के दलवीर भंडारी

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अंतरराष्ट्रीय अदालत की एक सीट के लिए हो रहे चुनाव में भारत के न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी एक बार फिर चुन लिए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में मिले अभूतपूर्व समर्थन और ब्रिटेन की ओर से अपने उम्मीदवार का नाम वापस लिए जाने से उनकी जीत आसान हो गई। इस पद के लिए इससे पहले हुए 11 दौर के मतदान में कोई नतीजा नहीं निकला था। पर्यवेक्षकों का कहना है कि भंडारी की जीत से दुनिया की प्रमुख शक्तियों को बदलाव की नई बयार के बारे में कड़ा संकेत जाएगा। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भंडारी को पिछले 11 दौर के मतदान में अभूतपूर्व समर्थन मिलने के बाद ब्रिटेन को अपने उम्मीदवार का नाम वापस लेने पर बाध्य होना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय अदालत के 71 साल के इतिहास में ऐसा पहली  बार हुआ है, जब उसके 15 सदस्यीय पीठ में एक भी ब्रिटिश नहीं है। देश के लिए बहुपक्षीय मंच पर सबसे बड़ी कूटनीतिक जीतों में से एक इस चुनाव के दौरान संयुक्त राष्ट्र महासभा में भंडारी को 193 में से 183 वोट मिले। वहीं सुरक्षा परिषद में सभी 15 मत भारत के पक्ष में गए। इस चुनाव के लिए न्यूयॉर्क स्थित संगठन के मुख्यालय में अलग से मतदान करवाया गया था।
अंतरराष्ट्रीय अदालत के पांच में से चार न्यायाधीशों के चुनाव के बाद पांचवें न्यायाधीश के तौर पर पुन: निर्वाचन के लिए भारत के भंडारी और ब्रिटेन के क्रिस्टोफर ग्रीनवुड के बीच बेहद कड़ा मुकाबला था। ब्रिटेन ने ग्रीनवुड की उम्मीदवारी आखिरी वक्त में वापस ले ली। इसके साथ ही 70 साल के भंडारी नौ साल के अगले कार्यकाल के लिए आइसीजे में निर्वाचित हो गए।

 

शुभांगी बनीं इंडियन नेवी की पहली महिला पायलट

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भारतीय नौसेना ने पहली बार किसी महिला की नियुक्ति पायलट पद के लिए की है। इस गौरव को हासिल करने वाली ऑफिसर का नाम है शुभांगी स्वरूप। शुभांगी जल्द ही आकाश की अनंत ऊंचाइंयों में एयरक्राफ्ट उड़ाएंगी। शुभांगी स्वरूप मेरीटाइम रिकानकायसन्स विमान उड़ाएंगी। शुभांगी स्वरूप उत्तर प्रदेश की हैं और विमानों को उड़ाने को तमन्ना उन्हें बचपन से ही थी। इसके अलावा नयी दिल्ली की आस्था सेगल, पुड्डूचेरी की रूपा ए और केरल की शक्ति माया एस को नौसेना की नेवल आर्मामेंट इंस्पेक्टोरेट (एनएआई) शाखा में देश की पहली महिला अधिकारी बनने का गौरव हासिल हुआ है। चारों महिलाओं ने एझीमाला नौसेना अकादमी में नेवल ओरियन्टेशन कोर्स पास करने के बाद पासिंग आउट परेड में हिस्सा लिया।

इस समारोह में नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा मौजूद थे। दक्षिणी नेवल प्रवक्ता कमांडर श्रीधर वॉरियर ने बताया कि वैसे तो शुभांगी नौसेना में पहली पायलट हैं लेकिन नौसेना की एविएशन ब्रांच में पहले भी वायु यातायात नियंत्रण अधिकारी और विमान में ‘पर्यवेक्षक’ अधिकारी के तौर पर महिलाएं काम कर चुकी हैं।एनएआई शाखा पर नौसेना के हथियारों और गोला-बारूद के ऑडिट एवं आकलन की जिम्मेदारी होती है। कमांडर वॉरियर ने कहा कि सभी चारों महिला अधिकारियों को ड्यूटी पर तैनात किए जाने से पहले उनकी चुनिंदा शाखाओं में प्रशिक्षण दिया जाएगा। शुभांगी को हैदराबाद में वायु सेना अकादमी में प्रशिक्षण दिया जाएगा, जहां सेना, नौसेना और वायु सेना के पायलटों को प्रशिक्षण दिया जाता है।

 

साहित्य का सिनेमाई कोलाज है पंचलैट

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साहित्य और सिनेमा का रिश्ता गहरा तो है मगर साहित्य से सिनेमा सालों से दूर रहा है। या यूँ कहें कि यह रिश्ता वृत्तचित्रों और धारावाहिकों तक सिमटकर रह गया है तो गलत नहीं होगा। ऐसे में आजादी के बाद 50 के दशक को ध्यान में रखकर लिखी गयी कहानी को आधार मानकर पूरी की पूरी फिल्म और फीचर फिल्म बनाना मॉल संस्कृति में लिपटे तथाकथित आलोचकों को एक बेवकूफाना हरकत लग सकती है। फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियाँ आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाती हैं…उनकी कहानी पर बनी तीसरी कसम भले ही उस समय फ्लॉप रही हो मगर आज वह क्लासिक कही जाती है….एक बार फिर उनकी कहानी पंचलाइट पर बनी फिल्म सिनेमाघरों में आ चुकी है। दरअसल, पंचलैट वह अतीत है जहाँ उनको भारत की ओर मुड़कर देखना अपनी हार लगे या कड़वा सच तो शायद ज्यादा सही है। गाँव अब वृत्तचित्रों में भी अच्छा लगता है और वहाँ से एक ही स्टोरी कई बार निकल सकती है – मरते हुए किसान….इसके अलावा कुछ और देखना शायद लोग चाहते ही नहीं मगर महतो टोला सच इस अंदाज में कहता है कि जब आप हॉल से बाहर निकलते हैं तो वह गाँव और माहौल देर तक आपके अंदर रहते हैं। पंचलैट ऐसी ही क्रांति है।

गत 17 नवम्बर को रिलीज हुई फिल्म को पर्याप्त शो भले न मिले हों मगर इसने उस वर्ग को एक बार फिर सिनेमाघरों की ओर मोड़ा है जो सिनेमा की स्तरहीनता को कोसता हुआ मुँह मोड़कर बैठा है। लोग 100 किमी जाकर सिनेमा के टिकट खरीद रहे हैं और यह जिद एक जरूरी सी है जिसकी जीत के लिए अरसे बाद साहित्यकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने जैसे कमर कस ली है…पंचलैट की उपलब्धि इस एकता को वापस लाना ही है। एक ऐसा नायक जिसके पास सिक्स और एइट पैक्स एब्स नहीं हैं….नायिका ऐसी जिसके पास चमचमाती साड़ी नहीं है और लोकेशन के नाम पर गाँव का घुप्प अँधेरा…। भला ऐसी फिल्में मल्टीप्लेक्स  में चलेंगी?  ऐसी फिल्म जिसके कलाकार फिल्म के प्रचार के लिए खुद सड़क पर निकल पड़े हैं….जिनका प्रोमोशन एक आम फिल्म की तरह हो रहा है…जहां किसी पांच सितारा होटल की जरूरत नहीं है और एक ऐसी फिल्म जिसका प्रोमोशन आम आदमी कर रहा है…यह पंचलैट की सफलता है कि घर के बड़े बच्चों का हाथ पकड़कर सिनेमाघरों में ले जा रहे हैं…पंचलैट ने उल्टी गंगा बहा दी है। मासूमियत, हंसी, सादगी…एक दूसरे का हाथ पकड़ना और दूसरे के आंसू पर रोना उल्टी गंगा ही तो है…गाँव ऐसा जहाँ लोग एक पेट्रोमैक्स जलाना तक नहीं जानते है और जलाने के लिए उसके सामने भी झुकते हैं जिसे जुर्माना न देनने पर निकाल दिया जाता है। वही गोधन मौसी के कहने पर सारे गिले -शिकवे मिटाकर गाँव के लिए पंचलैट जलाने चला भी आता है…ऐसी सरलता उल्टी गंगा बहाना नहीं है तो क्या है?

तो हम भी फिल्म देखकर आए…हॉल में ज्यादा दर्शक नहीं थे मगर जो भी थे…गम्भीर थे…कोई सीटी नहीं…कोई पॉपकॉर्न भी  नहीं…और फिल्म के बाद सीटों पर जमे रहना…बता रहा था कि कुछ तो है जो उनको पीछे मोड़ रहा है…शहरों में रहने वालों के दिलों में गाँव छिपा रहता है……गाँव उनके लिए ऑक्सीजन है…तभी सप्ताह में या महीने भर में एक बार छुट्टी मिली नहीं कि वे गाँव भागते हैं….हरे –भरे खेतों में…चौपाल में और मिट्टी के उन घरों में भी…जहाँ उनका बचपन बीता है…पंचलैट ने उस गाँव को जिन्दा कर दिया। गाँव में घुप्प अंधरा….और अंधेरे का साथी….पेट्रोमैक्स जो एक लक्जरी है…सभी के पास है…बस महतो टोला के पास नहीं है…और इसे लेकर उनका मजाक भी उड़ाया जाता है..पंचायत जब गोधन से जुर्माना माँगती है तो उसके पीछे भी पंचलाइट खरीदने की भावना ही है…पंचलैट नाक का सवाल है…।

जब अाप अमितोष पाल को राज कपूर के गेटअप में देखते हैं….अनायास ही मुस्कुराहट आ जाती है मगर ये वाले राज कपूर थोड़े फास्ट हैं….उनकी डॉयलाग डिलिवरी में भी राज कपूर का अन्दाज है मगर उनके किरदार की मजबूती उस गँवई सादगी में है जो उनकी आँखों में है…बगैर किसी मुलम्मे के…वह सिर्फ गेटअप से नहीं आ सकती…इसके लिए किरदार में घुसने की जरूरत है। अनुराधा मुखर्जी ने भी उनका साथ मुनरी के रूप में बखूबी दिया है…खासकर उस दृश्य में जहाँ गोधन से लम्बे अरसे बाद पहली बार मिलती हैं। इस दृश्य में अनुराधा का अभिनय और उनके हाव – भाव बस देखने लायक हैं। यशपाल शर्मा और रवि झांकल जैसे कलाकारों का अभिनय तो मँजा – मँजाया है…गोधन द्वारा कल्पना झा उर्फ सरपंचाइन के किरदार को भौजी कहने पर यशपाल शर्मा के चेहरे पर जो भाव आते हैं..वह बड़े मजेदार हैं…एक ऐसा व्यक्ति जो त्रिशंकु जैसा ही है…पत्नी से प्यार है मगर पत्नी को सबसे छुपाकर रखना चाहता है और उसकी हर ख्वाहिश को पूरा भी करना चाहता है।

अपने दृश्यों में सब अभिनय करते हैं मगर सरपंचाइन का अभिनय आप उन दृश्यों में भी देखते हैं जहाँ उनके संवाद नहीं हैं…यही थियेटर का अनुशासन है और हर बार की तरह कल्पना ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। संगीत बेहद सुरीला और कर्णप्रिय है जो कानों को राहत देता है….हर गीत में गाँव में मेलजोल की संस्कृति आपको नजर आती है…खासकर गा भइया गा गीत में। भाषा में बिहार की विभिन्न बोलियाँ हैं और रासलीला में तो ब्रज और मथुरा ही उतर आए हैं। रासलीला का यह दृश्य उसकी मौलिकता के साथ दिखाना पंचलैट की सफलता है..। फिल्म किसी सेट पर नहीं बल्कि गाँव में ही फिल्माई गयी है। छायांकन फिल्म के विषय के अनुरूप ही है….जो लोग कभी गाँव नहीं गए और जिनके भीतर गाँव या भारतीय संस्कृति नहीं है…उनके लिए फिल्म को समझना थोड़ा कठिन है…पंचलैट ऐसी फिल्म है जो सही अर्थों में मास की फिल्म ही है और क्लास उसके दायरे में सिमट आता है। तीन पन्नों की कहानी को फैलाना और उसकी मौलिकता को बरकरार रखते हुए फैलाना आसान काम नहीं था मगर राकेश कुमार त्रिपाठी ने यह किया है। निर्देशक प्रेम मोदी ने सभी कलाकारों से उम्दा अभिनय करवा लिया है। ऐसी फिल्में ऑक्सीजन की तरह हैं…और पंचलैट साहित्य का सिनेमाई कोलाज है…जिसे ऑक्सीजन लगातार मिलते रहना चाहिए…उम्मीद मिलती रहनी चाहिए। प्रदूषण से थक गए हों और छुट्टी नहीं मिल रही हो तो पंचलैट देख आइए…ऑक्सीजन मिल जाएगा।

ट्रेलर हम दिखा दे रहे हैं…

https://youtu.be/AiRgMLfma-E

लंदन में रवींद्रनाथ टैगोर का घर खरीदना चाहती हैं ममता

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पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर का घर खरीदना चाहती हैं। ममता चाहती हैं कि विश्व प्रसिद्ध कवि व लेखक जहां रहे थे, उस जगह को संग्रहालय सह स्मारक  में बदल दिया जाए।

टैगोर साल 1912 में अपने काव्य संग्रह ‘गीतांजली’ के अनुवाद के दौरान उत्तरी लंदन के हैंपस्टीड हीथ स्थित हीथ विला नंबर 3 में कुछ महीने रहे थे। यूके में कार्यकारी भारतीय उच्चायुक्त दिनेश पटनायक के साथ मुलाकात में ममता ने इस निजी स्वामित्व वाले इस घर को खरीदने की सरकार की इच्छा से अवगत कराया।

कुछ साल पहले इस संपत्ति की कीमत करीब 23 करोड़ रुपये थी। सीएम बनर्जी एक सप्ताह के लंदन दौरे पर यहां पहुंची थीं। इस चर्चा से जुड़े एक करीबी व्यक्ति ने बताया कि इस घर का महान ऐतिहासिक महत्व है और सीएम इस घर को टैगोर के स्मारक रूप में बदलना चाहती हैं। ममता के साल 2015 के दौरे में भी इस पर चर्चा हुई थी।

 

राजस्थान का बूंदी राजघराना आया भंसाली और ‘पद्मावती’ के समर्थन में

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विवादों से चौतरफा घिरी फिल्म ‘पद्मावती’ पर जहां राजपूत समाज समेत राजस्थान के पूर्व राजघराने फिल्म के खिलाफ एक साथ खड़े हैं वहीं एक राजघराना फिल्म के समर्थन में आगे आया है। हालांकि फिल्म की रिलीज टल गयी है मगर इस बीच राजस्थान के बूंदी राजघराने ने फिल्म को अपना पूरा समर्थन दिया है और कहा है कि बिना फिल्म देखे समाज को इतना बवाल नहीं करना चाहिए।

बूंदी राजघराने के सदस्य बलभद्रसिंह और वंशवर्द्धन सिंह ने फिल्म का समर्थन करते हुए कहा कि फिल्म देखे बिना विरोध,तोड़फोड़ जैसी हिंसात्मक जैसी घटना कायराना है राजपूत समाज द्वारा ऐसा करना से पूरे समाज की बदनामी हो रही है।

गौरतलब है कि पूरे राजस्थान में लगभग सभी समाज के लोग, राजनैतिक पार्टियों के नेता एक आवाज में इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं जिससे अब फिल्म निर्माता पर फिल्म को रिलीज नहीं करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

​विवादों से चौतरफा घिरी फिल्म ‘पद्मावती’ पर जहां राजपूत समाज समेत राजस्थान के पूर्व राजघराने फिल्म के खिलाफ एक साथ खड़े हैं वहीं एक राजघराना फिल्म के समर्थन में आगे आया है। राजस्थान के बूंदी राजघराने ने फिल्म को अपना पूरा समर्थन दिया है और कहा है कि बिना फिल्म देखे समाज को इतना बवाल नहीं करना चाहिए।

बूंदी राजघराने के सदस्य बलभद्रसिंह और वंशवर्द्धन सिंह ने फिल्म का समर्थन करते हुए कहा कि फिल्म देखे बिना विरोध,तोड़फोड़ जैसी हिंसात्मक जैसी घटना कायराना है राजपूत समाज द्वारा ऐसा करना से पूरे समाज की बदनामी हो रही है।

गौरतलब है कि पूरे राजस्थान में लगभग सभी समाज के लोग, राजनैतिक पार्टियों के नेता एक आवाज में इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं जिससे अब फिल्म निर्माता पर फिल्म को रिलीज नहीं करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

 

प्रदूषण को मात दे रहे हैं कई देश

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दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण के बढ़ते स्तर से खतरनाक स्थिति बन गई थी। दिवाली के बाद फैले धुएं के बाद अब पराली जलाने से हुई धुंध से प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ गया । केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार एक्यूआई (एयर क्वालिटी इंडेक्स) का स्तर 100 तक सामान्य है, हालांकि दिल्ली का एक्यूआई आमतौर पर 300 से 400 के बीच रहता है। लेकिन यह स्तर 440 तक पहुंच गया था। दिल्ली-एनसीआर, यूपी और आसपास के विभिन्न इलाकों में जहरीली धुंध छाने से गैस चैंबर जैसी स्थिति बन गई थी।  भारत के अलावा कई अन्य देश भी प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। इन देशों में प्रदूषण से निपटने के कई तरीके अपनाए गए हैं जिनसे उन्हें कुछ सफलता भी हासिल हुई है।

चीन – साल 2014 में चीन के कई शहरों में धुंध छा गई थी और प्रदूषण का स्तर पॉल्यूशन कैपिटल कहलाने वाले बीजिंग में भी बहुत ऊंचा पाया गया था। इसके बाद चीन ने प्रदूषण से निपटने के लिए युद्धस्तर पर प्रयास शुरू कर दिए। यहां मल्टी-फंक्शन डस्ट सेप्रेशन ट्रक का इस्तेमाल किया गया। इसके ऊपर एक विशाल वॉटर कैनन लगा होता है जिससे 200 फीट ऊपर से पानी का छिड़काव होता है।पानी का छिड़काव इसलिए किया गया ताकि धूल नीचे बैठ जाए। इसके अलावा, चीन ने वेंटिलेटर कॉरिडोर बनाने से लेकर एंटी स्मॉग पुलिस तक बनाने का फैसला किया। ये पुलिस जगह-जगह जाकर प्रदूषण फैलाने वाले कारणों जैसे सड़क पर कचरा फेंकने और जलाने पर नजर रखती है।  चीन में कोयले की खपत को भी कम करने के प्रयास किए गए हैं जो वहां प्रदूषण बढ़ने के मुख्य कारणों में से एक था।

फ्रांस –    फ्रांस की राजधानी पेरिस में हफ्ते के अंत में कार चलाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। वहां भी ऑड-ईवन तरीका अपनाया गया। साथ ही ऐसे दिनों में जब प्रदूषण बढ़ने की संभावना हो तो सार्वजनिक वाहनों को मुफ्त किया गया और वाहन साझा करने के लिए कार्यक्रम चलाए गए। वाहनों को सिर्फ 20 किमी. प्रति घंटे की गति से चलाने का आदेश दिया गया. इस पर नज़र रखने के लिए 750 पुलिसकर्मी लगाए गए।

जर्मनी  – जर्मनी के फ्रीबर्ग में प्रदूषण कम करने के लिए सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया। यहां ट्राम नेटवर्क को बढ़ाया गया। यह नेटवर्क इस तरह बढ़ाया गया कि यह बस रूट को भी जोड़ सके और ज्यादा आबादी उस रूट के तहत आ जाए। साथ ही यहां सस्ती और कुशल परिवहन व्यवस्था पर जोर दिया गया। बिना कार के रहने पर लोगों को सस्ते घर, मुफ्त सार्वजनिक वाहन और साइकिलों के लिए जगह दी गई।

ब्राजील-    ब्राजील एक शहर क्यूबाटाउ को ‘मौत की घाटी’ कहा जाता था। यहां प्रदूषण इतना ज्यादा था कि अम्लीय बारिश से लोगों का बदन तक जल जाता था। लेकिन, उद्योगों पर चिमनी फिल्टर्स लगाने के लिए दबाव डालने के बाद शहर में 90 प्रतिशत तक प्रदूषण में कमी आ गई। यहां हवा की गुणवत्ता पर निगरानी के बेहतर तरीके अपनाए गए।

स्विट्जरलैंड –  स्विट्जरलैंड के शहर ज्यूरिख में प्रदूषण से निपटने के लिए पार्किंग की जगहें कम की गईं ताकि पार्किंग न मिलने के कारण लोग कम से कम कार का इस्तेमाल करें। इस कारण प्रदूषण और ट्रैफिक जाम से निजात पाने में कुछ हद तक सफलता मिली थी।

 

 

117 सुंदरियों को पीछे छोड़ मानुषी छिल्लर बनीं मिस वर्ल्ड 2017

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बीजिंग, प्रेट्र/आइएएनएस :  17 साल बाद भारतीय सुंदरता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम लहराया है। चीन के सान्या शहर में शनिवार रात रंगारंग कार्यक्रम में मिस इंडिया मानुषी छिल्लर को इस साल का मिस व‌र्ल्ड घोषित किया गया। इस प्रतियोगिता में दुनिया  भर की 118 सुंदरियों ने हिस्सा लिया था।

मानुषी ने सभी प्रतिस्प‌िर्द्धयों को पीछे छोड़ते हुए मिस व‌र्ल्ड का खिताब अपने नाम किया। वह हरियाणा के सोनीपत शहर की रहने वाली हैं। इससे पहले आखिरी बार 2000 में प्रियंका चोपड़ा को मिस व‌र्ल्ड चुना गया था। इस प्रतियोगिता में दूसरे नंबर पर मिस मेक्सिको और तीसरे नंबर पर मिस इंग्लैंड रहीं। मानुषी 67वीं मिस व‌र्ल्ड हैं।

बहादुरगढ़ के बामडौली गांव की बेटी है मानुषी

मानुषी हरियाणा राज्य के बहादुरगढ़  की बेटी है, उन्होंने मिस वर्ल्ड 2017 का खिताब जीत कर हरियाणा का नाम रोशन किया है। मानुषी छिल्लर का परिवार मूल रूप से बहादुरगढ़ के बामडौली गांव का रहने वाला है। मानुषी के पिता मित्रबसु पेशे से डॉक्टर हैं जो फिलहाल दिल्ली के इनमास इंस्टीट्यूट में असिस्टेंट डायरेक्टर हैं और माता नीलम इब्मास कालेज में बायोकेमिस्ट्री की प्रोफेसर। अब से तकरीबन 15-20 सालों पहले वो गांव छोड़कर दिल्ली आ कर बस गए थे, लेकिन गांव की बेटी की इस उपलब्धि से गांव वाले बहुत खुश हैं।

 

20 साल की मानुषी छिल्लर सोनीपत के भगत फूल सिंह मेडिकल कॉलेज की छात्रा हैं और कार्डिएक सर्जन बनना चाहती हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में हुई है। मानुषी को पैराग्लाइडिंग, बंजी जंपिंग और स्कूबा डाइविंग रोमांचक जैसे खेल पसंद हैं। इसके अलावा उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य में प्रशिक्षण लिया है। वह स्केचिंग और पेंटिंग भी बनाती हैं।

बचपन का सपना

मिस व‌र्ल्ड बनना मानुषी के बचपन का सपना था। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि बचपन में मैं हमेशा से इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहती थी। हालांकि, मुझे यह कभी नहीं पता था कि मैं यहां तक पहुंच जाऊंगी। मानुषी समाजसेवा के कार्यो से भी जुड़ी रही हैं। उन्होंने महिलाओं की माहवारी के दौरान हाइजीन से संबंधित एक कैंपेन में करीब 5000 महिलाओं को जागरूक किया है।

इस जवाब ने बनाया विजेता

मानुषी छिल्लर से फाइनल राउंड में जूरी ने सवाल पूछा था कि किस व्यवसाय में सबसे ज्यादा सैलरी मिलनी चाहिए और क्यों? इसके जवाब में मानुषी ने कहा कि मां को सबसे ज्यादा सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए उन्हें कैश में सैलरी नहीं बल्कि सम्मान और प्यार मिलना चाहिए।

मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर का पुश्तैनी घर

बहादुरगढ़ के बामडौली गांववालों का कहना है कि उनकी बेटी ने पूरे देश में गांव का नाम रोशन किया है। उन्होनें मानुषी को उनकी इस उपलब्धि के लिए शुभकामनायें दी हैं। उन्हें अपनी बेटी पर पूरा भरोसा है कि मानुषी भविष्य में समाजिक कार्यों से जुड़ कर देश के उत्थान में अपनी अपनी अहम भमिका निभायेगी।