सर्दियों में ठंडी हवाओं की वजह से त्वचा की नमी गायब हो जाती है और त्वचा का रूखापन बढ़ जाता है। ऐसा सिर्फ महिलाओं ही नहीं बल्कि पुरुषों की त्वचा के साथ भी होता है। पुरुषों की त्वचा महिलाओं की स्किन से थोड़ी अलग होती है। इसलिए दोनों की स्किन के लिए ट्रीटमेंट भी अलग-अलग होते हैं। पुरुषों को सर्दियों के दौरान अपनी त्वचा में नमी बरकरार रखने के लिए सही ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना चाहिए जिससे त्वचा में बिना किसी तरह का नुकसान पहुंचे नमी को बरकरार रखा जा सके। तो चलिए जानते हैं कि सर्द हवाओं के बीच पुरुष अपनी त्वचा को नम कैसे रखें।
अगर आपकी त्वचा शुष्क है तो सर्दियों में इसे हाइड्रेट रखना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए आप नेचुरल फेस मॉइश्चराइजर्सर का इस्तेमाल कर सकते हैं। नहाने के बाद और सोने से पहले दिन में दो बार मॉइश्चराइजर लगाने से त्वचा की नमी बरकरार रहती है।
सर्दियों में होंठ रूखे होकर फटने लगते हैं। ऐसे में केमिकलयुक्त लिप बाम के इस्तेमाल की जगह ऑर्गेनिक लिप बाम का इस्तेमाल करना चाहिए। दिन भर में कई बार और सोने से पहले लिप बाम लगाने से होंठ सर्दियों में भी नर्म बने रहते हैं।
सर्दियों में त्वचा की ऊपरी परत कसी हुई होती है। ऐसे में रेजर से शेविंग करने से कटने-पिटने का खतरा बढ़ जाता है। खास तौर पर अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है तो आपको शेविंग में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है। सर्दियों में शेविंग के लिए इलेक्ट्रिक ट्रिमर का इस्तेमाल ज्यादा सही रहता है। इससे कटने-छिलने की आशंका कम होती है।
सन्सक्रीम का इस्तेमाल गर्मियों में सूरज की पराबैगनी किरणों से बचने के लिए किया जाता है। लेकिन सर्दियों में भी अगर आप तीस मिनट या उससे ज्यादा वक्त के लिए बाहर रहते हैं तो आपको अपनी त्वचा पर सन्सक्रीम लगा लेना चाहिए।
अल्ट्रा मॉइश्चराइजिंग हैंड लोशन सर्दियों में आपके फटे हाथों से निजात दिलाने में मदद करता है। इसके लिए एख ऐसे नेचुरल हैंड लोशन का इस्तेमाल करें जो स्किन को हाइड्रेटेड रखे और त्वचा पर कोई तैलीय परत न छोड़े।
भारत में मंदिरों में उद्योगपतियों, अमीरों और सेलिब्रिटी द्वारा कीमती चीजें दान करने की खबरें तो आती रहती हैं, लेकिन जब कोई भिखारी ऐसा करे तो सबका हैरान हो जाना स्वाभाविक है। कर्नाटक के मैसूर में एक भिखारी महिला ने 2.5 लाख रुपये दान कर दिए। आश्चर्य की बात ये थी कि ये महिला उसी मंदिर के सामने भीख मांगा करती हैं। 85 की उम्र में पहुंच चुकीं एम वी सीतालक्ष्मी प्रसन्ना अंजनेय स्वामी मंदिर के सामने भीख मांगती हैं। इसके पहले वे घर-घर जाकर काम किया करती थीं। लेकिन शारीरिक रूप से अक्षम हो जाने के बाद उन्होंने मंदिर के सामने भीख मांगना शुरू कर दिया।
सीतालक्ष्मी ने मंदिर में सुविधाओं को बढ़ाने में अपना योगदान देने के लिए हनुमत जयंती के वक्त श्रद्धालुओं के प्रसाद के लिए ये पैसे दान किए हैं। इस मंदिर में हजारों लोग दान करते रहते हैं। लेकिन जब लोगों को पता चला कि एक भिखारी महिला ने मंदिर में ढाई लाख रुपये दान किए हैं तो लोग अब उसका आशीर्वाद लेने के लिए उमड़ पड़े।
कुछ दिन पहले गणेश उत्सव के दौरान उन्होंने 30,000 रुपये दान किए थे। इस बार वह मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन को अपने साथ बैंक ले गईं और 2 लाख रुपये और निकलवा कर दिए। इस तरह से उन्होंने कुल ढाई लाख रुपये दान किए। सीतालक्ष्मी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘श्रद्धालुओं से मुझे जो भी भीख मिलती है उसे मैं बैंक में जमा कर देती हूं। मेरे लिए भगवान ही सबकुछ हैं। इसलिए मैंने फैसला किया कि मैं मंदिर को पैसा दान कर दूंगी।’ उन्होंने बताया कि मंदिर से ही उनकी देखभाल होती है। मंदिर में काम करने वाली राजेश्वरी हफ्ते में एक दिन उन्हें स्नान करवाती हैं। सीता ने बताया कि इसलिए उन्होंने अपनी सारी सेविंग्स मंदिर को दान करने का फैसला किया।
सीता ने बताया कि उनकी एकमात्र इच्छा है कि हर ‘हनुमत जयंती’ के वक्त सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद मिले। मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन एम बासवराज ने बताया, ‘वह सबसे अलग हैं और कभी किसी श्रद्धालु से पैसे नहीं मांगतीं। श्रद्धालु जो कुछ भी देते हैं वो उसे सहर्ष स्वीकार कर लेती हैं। वे मंदिर को दान देने में भी आगे रहती हैं। मंदिर में एक उत्सव के दौरान उन्हें एमएलए वासु ने सम्मानित भी किया था। मंदिर को दिए उनके दान को देखकर लोगों ने उन्हें और लोगों ने औऱ दान देना शुरू कर दिया। कुछ लोग तो उन्हें 100-100 रुपये देकर चले जाते हैं।’ उन्होंने बताया कि कई लोग तो उन्हें पैसे देने के साथ ही उनका आशीर्वाद लेकर जाते हैं। मंदिर के लोग भी उनका पूरा ख्याल रखते हैं।
कर्नाटक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट में काम करने वाले आर मरियप्पा ने कहा, ‘जब मैंने उनकी दयालुता के बारे में सुना तो दंग रह गया। उन्हें सलाम करने का मन किया।’ सीतालक्ष्मी के भाई कुगेशन ने बताया कि वे उनका अच्छे से ख्याल रखते हैं। उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले सीता एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गई थीं। जिसके बाद उनका अच्छे से इलाज कराया गया तब जाकर ठीक हुईं। हालांकि वे भी घर पर रहना नहीं चाहतीं। वे काफी सुबह मंदिर चली जाती हैं और वहां से देर शाम को ही वापस लौटती हैं।
भारत में भिखारियों की अच्छी खासी तादाद है। हमें हर शहर में भिखारियों की अच्छी खासी भीड़ देखने को मिल जाती है। लेकिन भिखारियों की ऐसी कहानी कम ही सुनने को मिलती है। एक डेटा के मुताबिक भारत में लगभग 4 लाख भिखारी हैं। इस लिस्ट में पश्चिम बंगाल का नाम सबसे ऊपर आता है जहां 81,000 भिखारी हैं। वहीं लैंगिक आधार पर देखें तो पुरुष भिखारियों की संख्या 2.2 लाख है तो वहीं महिला भिखारियों की संख्या 1.91 है। पश्चिम बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश 65,835 और उसके बाद आंध्र प्रदेश 30,218 का नंबर आता है। बिहार में 29,723 तो वहीं मध्य प्रदेश में 28,695 भिखारी हैं।
मेनोपॉज हम महिला के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। 40 या फिर 50 साल की उम्र के आसपास हर महिला के साथ एक ऐसी अवस्था आती है जब उनके अंडाशय में अंडों का निर्माण कम या फिर बंद हो जाता है। यह मासिक चक्र की समाप्ति का संकेत होता है। इसके बाद प्रेग्नेंसी की भी संभावनाएं खत्म हो जाती हैं। ऐसे में आप किस तरह से इस घटना की पहचान करें कि आप मीनोपॉज के दौर से गुजर रही हैं? आज हम आपको मेनोपॉज के कुछ सामान्य लक्षणों के बारे में बताने जा रहे हैं जिससे आपको इसका आसानी से पता चल जाएगा और इन लक्षणों के बारे में आपका जानना भी बहुत जरूरी है।
वेजिनल ड्राइनेस – वेजिनल ड्राइनेस की समस्या यूं तो किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन यह मेनोपॉज का भी एक महत्वपूर्ण लक्षण होता है। मेनोपॉज में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरॉन का प्रोडक्शन काफी कम हो जाता है। ऐसे में वेजिनल वॉल्स पर नमी की पतली सतह पर काफी प्रभाव पड़ता और इस वजह से वेजिनल ड्राइनेस की समस्या उत्पन्न होती है। इसकी वजह से चिड़चिड़ापन और संबंध बनाने के दौरान वेजिनल एरिया में दर्द की समस्या होती है।
नींद संबंधी समस्या – मेनोपॉज स्लीपिंग डिसऑर्डर का भी कारक होता है। इस दौरान या तो नींद नहीं आती है और अगर आ भी जाए तो आप काफी देर तक सोती रहती हैं।
कामेच्छा में कमी – मेनोपॉज की वजह से कई शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं। ऐसे में क्लिटोरियल रिएक्शन काफी समय लेता है। योनि का रूखापन और संबंध बनाने के दौरान तकलीफ की वजह से कामेच्छा में भी कमी आती है।
तनाव और मूड स्विंग की समस्या – मेनोपॉज के दौरान सबसे आम समस्या होती है मूड स्विंग। हार्मोन्स में बदलाव की वजह से महिलाओं में बार-बार मन बदलने की समस्या होती है। इसके अलावा इस दौरान वे तनाव की समस्या से भी गुजरती हैं।
सामग्री : एक बड़ा चम्मच मक्खन, एक कटा हुआ प्याज, एक कटी हुई) ब्रोकोली, तीन बड़ा चम्मच पिसा हुआ बादाम, दो कप वेजिटेबल स्टॉक. आधा कप दूध, नमक स्वादानुसार, एक बड़ी चम्मच काली मिर्च पाउडर, पांच बड़े चम्मच दही, दो बड़ा चम्मच बारीक कटा हुआ बादाम
विधि : सबसे पहले मीडियम आंच में एक पैन में मक्खन गरम करने के लिए रखें। मक्खन के गरम होते ही प्याज को हल्का भून लें। प्याज के हल्का नर्म होते ही ब्रोकोली डालकर भूनें। पिसा हुआ बादाम, वेजिटेबल स्टॉक, नमक और काली मिर्च पाउडर मिलाएं। पहला उबाल आने का इंतजार करें, और पहला उबाल आते ही 10 मिनट तक ढककर पकाएं ताकि ब्रोकोली अच्छे से पक जाए और फिर आंच बंद कर दें। उबली हुई ब्रोकोली को ठंडा कर ब्लेंडर में डालकर अच्छे से पेस्ट बना लें। मध्यम आंच कर दोबारा पैन गरम करें और तैयार पेस्ट को पैन में डालकर दूध के साथ पकाएं और आंच बंद कर दें। दूसरी ओर एक दूसरे पैन में मक्खन गरम करने के लिए रखें। मक्खन के गरम होते ही बारीक कटे बादाम भून लें और आंच बंद कर दें। तैयार है ब्रोकोली बादाम का सूप. कटोरी में डालकर दही और भुने बादाम से गार्निश कर सर्व करें।
गाजर अदरक का सूप
सामग्री : 400 ग्राम कटी हुई गाजर, 1 छोटी कटोरी कटा हुआ अदरक, 2 छोटा चम्मच तेल, 1 छोटा चम्मच जीरा, 1 छोटा चम्मच अजवाइन, चुटकी भर हींग, 1 छोटा चम्मच नमक, 2 छोटा चम्मच चीनी, 2 छोटा चम्मच नींबू का रस, 1/4 छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर
विधि : मध्यम आंत पर कड़ाही में तेल डालकर गरम होने के लिए रखें. जब यह गरम हो जाए तो इसमें जीरा, अजवाइन और हींग डालकर भूनें। फिर इसमें काली मिर्च, कटी हुई गाजर और अदरक डालकर 10 मिनट तक पकाएं। आधा लीटर पानी के साथ भुनी हुई गाजर, अदरक को पीस लीजिये और पतला घोल बना लें।एक बार फिर कड़ाही में गाजर और अदरक मिश्रण डालकर मध्यम आंच पर पकने के लिए रखें. अब इसमें नमक और चीनी डालकर 10 मिनट तक आंच धीमी करके पकाएं। कुछ देर पकाने के बाद नींबू का रस डालकर आंच बंद कर दें। गाजर और अदरक सूप तैयार है। इसे गरमागरम सूप सर्व करें और खुद भी पीयें।
अबकी बार लौटा तो
बृहत्तर लौटूंगा
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें नहीं
कमर में बांधें लोहे की पूँछे नहीं
जगह दूंगा साथ चल रहे लोगों को
तरेर कर न देखूंगा उन्हें
भूखी शेर-आँखों से
अबकी बार लौटा तो
मनुष्यतर लौटूंगा
घर से निकलते
सड़को पर चलते
बसों पर चढ़ते
ट्रेनें पकड़ते
जगह बेजगह कुचला पड़ा
पिद्दी-सा जानवर नहीं
अगर बचा रहा तो
कृतज्ञतर लौटूंगा
अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूंगा
अयोध्या, 1992
हे राम,
जीवन एक कटु यथार्थ है
और तुम एक महाकाव्य !
तुम्हारे बस की नहीं
उस अविवेक पर विजय
जिसके दस बीस नहीं
अब लाखों सर – लाखों हाथ हैं,
और विभीषण भी अब
न जाने किसके साथ है.
इससे बड़ा क्या हो सकता है
हमारा दुर्भाग्य
एक विवादित स्थल में सिमट कर
रह गया तुम्हारा साम्राज्य
अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं
योद्धाओं की लंका है,
‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं
चुनाव का डंका है !
हे राम, कहां यह समय
कहां तुम्हारा त्रेता युग,
कहां तुम मर्यादा पुरुषोत्तम
कहां यह नेता-युग !
सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ
किसी पुरान – किसी धर्मग्रन्थ में
सकुशल सपत्नीक….
अबके जंगल वो जंगल नहीं
जिनमें घूमा करते थे वाल्मीक !
महिला उद्यमियों के लिए एक ही जगह सारा ज्ञान उपलब्ध कराने वाले sheatwork.com द्वारा भारत में महिला उद्यमियों की स्थिति पर पेश रिपोर्ट के मुताबिक गोवा, जम्मू कश्मीर, कर्नाटक, राजस्थान और पश्चिम बंगाल महिला उद्यमियों के लिए सबसे अधिक केंद्रित योजनाओं की पेशकश करने वाले शीर्ष 5 राज्य बनकर उभरे हैं। महिला उद्यमियों के लिए इन स्कीमों का ज़ोर मुख्य रूप से वित्तीय सहायता पर केंद्रित है जिसके बाद इसमें महिला उद्यमियों के लिए प्रशिक्षण और कौशल निर्माण पर ज़ोर दिया गया है। शिक्षा क्षेत्र में सबसे अधिक महिला उद्यमी दर्ज किए गए जिसके बाद वित्तीय सेवाओं, बीमा, पशुधन, वनोपज और लॉजिंग के क्षेत्र में महिलाओं ने उपक्रम लगाए हैं। इस अनुसंधान की प्रकृति सहायक है और यह इंटरनेट एवं अन्य ऑनलाइन पब्लिक फोरम पर उपलब्ध सूचना पर आधारित है।इस रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि देशभर में करीब 80 प्रतिशत महिला उद्यमी, वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने वाली विभिन्न सरकारी योजनाओं का मामूली उपयोग कर अपने कारोबार का स्वयं वित्त पोषण कर रही हैं। पश्चिम बंगाल के साथ ही दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में सबसे अधिक संख्या में महिला उद्यमी हैं जिनमें ज्यादातर के पास छोटे एवं मझोले आकार के कारोबार हैं। इसका श्रेय अधिक साक्षरता दर के साथ ही उस क्षेत्र में आमतौर पर महिला सशक्तिकरण को दिया जा सकता है। पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश, मेघालय और नगालैंड में महिला उद्यमियों की तादाद अपेक्षाकृत कम है, लेकिन पुरुष-महिला अनुपात के लिहाज़ से महिला उद्यमियों की संख्या काफी मजबूत है।
sheatwork की संस्थापक रूबी सिन्हा का कहना है, संयुक्त राष्ट्र ने अपने सहस्त्राब्द विकास लक्ष्यों में से एक लक्ष्य के तौर पर लिंग समानता और महिला सशक्तिकरण को प्रोत्साहन के तौर पर परिभाषित किया है और महिला उद्यमशीलता को प्रोत्साहन एवं सहयोग का श्रेय काफी हद तक इसे दिया जा सकता है। जहां भारत में वर्षों से केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ ही स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा इस दिशा में काफी प्रयास किए गए हैं, महिला उद्यमशीलता को लेकर जागरूकता और प्रोत्साहन के स्तर में अब भी काफी कमी है। इस रिपोर्ट के पीछे हमारा उद्देश्य यह समझना है कि आज भारत में महिला उद्यमशीलता किस स्थिति में है और मौजूदा व्यवस्था और महिला उद्यमियों के लिए विभिन्न सरकारी योजनाओं का कैसे बेहतर उपयोग किया जा सकता है एवं अधिक से अधिक महिलाएं अपना खुद का उद्यम शुरू करें, इसके लिए इसे कैसे और बढ़ाया जा सकता है।
जहां भारत में महिला उद्यमशीलता के लिए काफी लंबा सफर तय करना है, सही दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। कई ऐसी केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय स्कीमें उपलब्ध हैं जो न केवल वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती हैं, बल्कि अपने विकास केंद्रों के जरिये प्रशिक्षण और व्यवहारिक ज्ञान भी उपलब्ध कराती हैं। महिलाओं के विकास पर सरकार के विशेष ध्यान दिए जाने के साथ सामाजिक, सांस्कृति और आर्थिक माहौल तेज़ी से बदल रहा है जिसमें महिला उद्यमशीलता फल फूल सकता है।
sheatwork क्या है?
महिला उद्यमियों के लिए एक ही जगह सभी ज्ञान उपलब्ध कराने वाले sheatwork.com का लक्ष्य शहरी और ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली महिलाओं के लिए एक मार्गदर्शक और गाइड बनकर उनके उद्यम लगाने के सपने को साकार करना है। यह उद्यमशीलता के सभी संबंधित क्षेत्रों के बारे में सूचना और जागरूकता बढ़ाने का एक स्टोर हाउस है। दुनियाभर से आकांक्षी महिलाएं इस देश में और दुनियाभर में मौजूद विकल्पों का पता लगा सकती हैं जिनसे उन्हें अपना कारोबार शुरू करने में मदद मिल सकती है और साथ ही वे अपना कारोबार बढ़ा सकती हैं। महिला उद्यमियों को शिक्षित करने, प्रशिक्षित करने, सहयोग करने और साथ ही उन्हें प्रेरित करने के लिए यहां कई अनूठे कारोबार विचार, स्टार्टअप फंडिंग के रास्ते, मार्केटिंग, कानूनी सहायता, मार्गदर्शकों से संपर्क, विभिन्न राज्यों की स्कीमोंध् अंतरराष्ट्रीय स्कीमों की जानकारी, पाठ्यक्रम, सम्मेलन, कार्यशाला, सफलता की कहानियां और समाचार एवं वीडियोज़ उपलब्ध हैं।
एक हलफनामा मुक्तिबोध से जुड़ते हुए- “भीड़ में हूँ/ नीड़ में/ भावनाओं के ज्वार की लहरों पर में उछालता-कुदता/ रोमाणी उस्ताद के जुलुस की चकाचौंद से चौंधियाता/ देश देशांतर भागता-भटकता पहुँचता भीड़ में/ नीड़ में ।” यह कविता है ख्यातिलब्ध कवि ध्रुवदेव पाषाण का जिन्होंने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुनाया । उन्होंने आगे कहा ” मरुतृण एक साहित्य पत्रिका है यह न लघु है न बड़ी है बल्कि यह एक साहित्य पत्रिका है ।” मुख्य अतिथि के तौर पर ताजा टीवी के प्रमुख विश्वंभर नेवर जी ने कहा कि लघु पत्रिका का संपादन और प्रकाशन साहित्यकार स्वयं साथ मिलकर कर अपनी निष्ठा से आगे बढ़ा सकते हैं । यह कार्यक्रम मरुतृण और ताजा टीवी के संयुक्त तत्वावधान में ताजा टीवी कार्यालय में संपन्न हुआ । मरुतृण साहित्य-पत्रिका के नये अंक का लोकार्पण भी पाषाण जी और नेवर जी के हाथों हुआ । कार्यक्रम की शुरूआत साहित्यकारों द्वारा समवेत स्वर में सरस्वती वंदना गाकर किया गया । इस मौके पर वरिष्ठ कवि नवल और आलोक शर्मा एवं लहक के संपादक निर्भय देव्याशं ने कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाया।
कार्यक्रम का संचालन मरुतृण के परामर्श संपादक राजेन्द्र साह तथा संपादक सत्य प्रकाश भारतीय ने संयुक्त रूप से किया। धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ तथा प्रसिद्ध साहित्यकार सेराज खान बातीश जी ने किया । इस अवसर पर दिवंगत कवि कुँवर नारायण और चन्द्रकांत देवताले की आत्मा की शांति हेतु दो मिनट का मौन रखा गया ।”पत्रिका प्रकाशन संबंधित दीर्घकालीन आपके अनुभव और हमारे नवीन रास्ते” विषय पर एक परिचर्चा पर परिचर्चा में कुशेश्वर, पार्थ सारथी मौसम तथा श्री रणजीत भारती जी ने अपने विचार रखे । पाषाण जी ने मरुतृण को बेहद भरोसे से मरुतृण को आने वाले समय में साहित्य के नभ पर चमकने की कामना की। कार्यक्रम के आखिरी सत्र में आमन्त्रित कवि और कवयित्रियों का काव्य पाठ हुआ । डॉ. गिरिधर राय, रावेल पुष्प जी, ब्रजमोहन सिंह जी, जय कुमार रुसवा, रणविजय श्रीवास्तव, सेराज खान बातीश जी तथा युवा कवि और कवयित्रियों में शामिल रहे, अनिल उपाध्याय जी, नवीन कुमार सिंह जी, अमित कु अम्बष्ट ” आमिली “, जीवन सिंह जी , रामनाथ यादव बेखबर , ज्ञान प्रकाश पाण्डेय, सरवर दिलकश, भागीरथी कुर्मी, आरती सिंह जी , अनु नेवटिया और अनुराधा कुमारी । आमंत्रित सभी कवि और कवयित्रियों को पाषाण जी के हाथों से मरुतृण स्मृति पत्र दिया गया। श्रोताओं में मुख्य रूप से लक्ष्मी जायसवाल, वीनिता साव, खुशबू साह, रीता प्रकाश, विनीता प्रिया ’मिली’, कविता अरोङा, मिनाश्री सांगनेरिया, सुरेश चौधरी जी , सर्वेश कुमार राय , जतिब हयाल, नथमल रूँगटा, राम नारायण झा , ओम प्रकाश चौबे, संजय बिन्नाणी, राम सागर सिंह, सागर चौधरी और प्रवेश पटियालवी, इशिता और श्रेयांश आदि।
एक पत्रकार बनने की ख्वाहिश ने महिमा को दिल्ली पहुँचाया। दिल्ली में उसने पढ़ाई की और लगा कि उसके लिए जनसम्पर्क क्षेत्र अधिक सही है। पढ़ाई पूरी की और जोर – शोर से काम पर भी लग गयी मगर इस दौरान वह अपना ख्याल रखना भूल गयी और ऐसी बीमारी का शिकार हो गयी जिसने सफर की शुरुआत में ही उसके कदम बाँध दिये। मगर….रुकिए कहानी यहाँ से शुरू होती है…महिमा रुकी नहीं…उसने बीमारी को टक्कर दी और आज एक बार फिर वापस मैदान में कूद चुकी है। महज 25 साल की उम्र में लकवाग्रस्त होने की स्थिति मानसिक तौर पर किसी को तोड़ने के लिए काफी है मगर महिमा टूटी नहीं बल्कि उसने बीमारी को तोड़ दिया। महिमा ने अपनी कहानी अपराजिता के साथ साझा की और उसे हम उसकी जबानी ही आप तक ला रहे हैं…यह हौसलों की कहानी है..गौर से सुनिए..
1. मैं पटना से महत्वाकांक्षा लिए दिल्ली २०१५ में आयी थी। पत्रकारिता में बचपन से ही रुचि रही है। जैसे-जैसे पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं को समझा – खुद को जन संपर्क के लायक समझा। उच्च शिक्षा के लिए मैं देश के प्रतिष्ठ संस्था ” भारतीय जन संचार संस्था ” से पी जी डिप्लोमा किया। उसके बाद शुरू हुई असली ज़िन्दगी, स्टूडेंट लाइफ का ख़त्म होना और कॉरपोरेट ज़िन्दगी का आगमन।
2. शुरुआती दौर में काम करने के साथ साथ सीखने की भी तलब थी। हालाँकि – काम में सीखने का कभी कोई अंत नहीं होता पर कहते हैं न, नया नया जब बच्चा चलना शुरू करता है तब से ही वो दौड़ने की होड़ में लग जाता है। मेरा भी कुछ ऐसा ही हाल था। उस वक्त मैं सीखने के साथ साथ परफॉर्म करने का प्रेशर भी ले लेती थी और शायद इसी का परिणाम था कि मैं खाने -पीने पर ध्यान नहीं देती थी।
3. थ्रोम्बोसिस का दौर हर मरीज़ की तरह मेरे लिए भी कठिन रहा पर मेरे लिए कठिनाइयों से ज्यादा सिखाने वाला दौर रहा। इस दौर में मैंने सीखा – कैसे नयी शुरुआत की जाती है। बुरे से बुरे शारीरिक कष्ट झेले , आप कल्पना कर सकते हैं – जिसने कभी भी टीकाकरण के अलावा कभी इंजेक्शन नहीं लिया उसे कैसा लगता होगा हफ़्तों इंजेक्शन लेने वक्त। उठ कर बैठना तो दूर ,एक इंच भी बिस्तर से खुद के दम पर हिल नहीं पाती थी। करीब दो महीने तक दूसरों की मदद से नहाना खाना, शौच करना हो रहा था। ज़ाहिर करना काफी मुश्किल होगा कि कैसे पूरा परिवार अस्त व्यस्त हो रखा था मेरे इस बीमारी के कारण।
4. परिवार का और दोस्तों का काफी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कोइ ऐसा दिन नहीं था जब मुझसे पहले मेरे माँ – पापा और चाचा नहीं जगते और मेरे सोने के बाद ही उनकी आँख लगती। मुझे आज भी याद है जब पहली बार दायां हाथ हल्के से उठा था तब मम्मी ने फ़िज़ियोथेरेपिस्ट को लडडू खिलाया था , और जब पहली बार वॉकर के सहारे कड़ी हुई थी, तब पूरे मुहल्ले में मिठाइयां बटी थी।
5. लोगों ने आश्चर्य जताया था – कि जो लड़की कल तक हँस खेल रही थी ,वो आज ऐसी हालत में कैसे आ गयी। जो मेरे करीब थे – उन्होंने साफ़ बोल दिया कि ये सब मेरे शरीर के प्रति गैर ज़िम्मेदराना स्वभाव के कारण हुआ था। वहीँ जिनकी नज़रों में मैं बिगड़ी हुई लड़की थी – उन्होंने तो मेरा चरित्र प्रमाणपत्र भी दे दिया था। लोगों को पता नहीं क्यों ये समझना गवारा नहीं हो रहा था कि – ये सब डिहाइड्रेशन का एक्सट्रीम केस था।
पहली बार दायां हाथ हल्के से उठा था तब मम्मी ने फ़िज़ियोथेरेपिस्ट को लडडू खिलाया था , और जब पहली बार वॉकर के सहारे कड़ी हुई थी, तब पूरे मुहल्ले में मिठाइयां बटी थी।
6. सबसे ज्यादा सपोर्ट परिवार, दोस्तों , डॉक्टर्स , फ़िज़ियोथेरेपिस्ट और आया आंटी से मिला।
7.अभी मैंने नौकरी फिर से ज्वाइन कर ली है और साथ ही रिकवरी फेज़ के ख़त्म होने का इंतज़ार का रही हूँ ताकि मुझे डॉक्टर से फिटनेस सर्टिफिकेट मिल जाए।
8. सन्देश कुछ खास नहीं पर यही कि हलके से सिरदर्द को भी नज़रअंदाज़ न किया जाए और समझें कि आत्मा की सोच को सार्थक होने में शरीर काफी मायने रखता है।
बीमारी के बारे में
सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस – सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस एक असामान्य मस्तिष्क विकार है। वयस्कों में इस स्थिति की शुरूआत की औसत आयु 39 साल है। महिमा के मामले में इतनी कम उम्र में ऐसी भयनाक बीमारी होना बड़ा ही रेयर केस था। सेरेब्रल थ्रॉम्बोसिस तब होता है जब मस्तिष्क के वीनस साइनस में खून का थक्का जम जाता है। यह रक्त को मस्तिष्क से बाहर निकलने से रोकता है। शिराओं और रक्त कोशिकाओं पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे सूजन और शिराओंमें रक्तस्त्राव होने लगता है। लगभग 25 फीसद मामलों में इस रोग का सबसे आम लक्षण है- सिरदर्द। आईएमए के अनुसार, लगभग 80 फीसदी रोगियों को पूरी तरह से ठीक करना संभव है। इस रोग की पुनरावृत्ति की दर लगभग 2-4 फीसद है। आंकड़ों के मुताबिक, यह एक लाख की आबादी में किसी एक व्यक्ति को होता है। इस बीमारी से ग्रसित करीब 5 फीसदी लोग बीमारी बिगड़ने पर मर जाते हैं, जबकि 10 फीसदी मरीज की मौत बाद में होती है। पुरुषों की तुलना में यह रोग महिलाओं में अधिक होता है।
साल की उल्टी गिनती आज से शुरू हो चुकी है और ऐसा लग रहा है जैसे हमारे विकास और प्रगतिशीलता की उल्टी गिनती शुरू हो रही है। परम्परा के नाम पर वर्चस्व की राजनीति करने वाले तमाम लोग एकजुट हो रहे हैं और बहाना है एक फिल्म। बहाना कहें या निशाना ही सही शब्द है और ये चिन्ता तमाम सतही बातों को लेकर ही है या यूँ कहें कि उनके हाथ में एक हथियार मिल गया है…जन भावना…जनभावना…सम्मान और प्रतिष्ठा की धुरी में पिस रहे इस देश और समाज ने क्या खो दिया है…उसे खुद अन्दाजा नहीं है। कभी – कभी समझना मुश्किल हो जाता है कि ये परम्परा…इज्जत और धर्म इतने नाजुक क्यों हैं कि जरा सी चोट से खुद को बचा नहीं पाते। याद रखिए कि धर्म और समाज के ठेकेदारों ने इसी जनभावना का हवाला देकर लम्बे समय तक शोषण चक्र और वर्चस्व को जिन्दा रखा है…और आज हर राजनीतिक पार्टी यही कर रही है…कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो अपने सिद्धांतों पर अडिग हो और सिद्धांत तो वर्तमान समय की सबसे बड़ी विडम्बना बनकर रह गए हैं…आप यह नहीं देख रहे कि आप किस चीज की वकालत कर रहे हैं….सती प्रथा की या जौहर की या उसके नाम पर होने वाली हिंसा की….क्या इतिहास को चाटुकारिता में बदलना चाहिए। आपका इतिहास गौरवशाली रहा होगा मगर आप अपनी हार को भूलते हैं तो आपको जीत की प्रेरणा कभी नहीं मिलेगी। आदिम समय से ही कमजोरों खासकर स्त्रियों को दंडित करने के लिए उनका अंग – भंग करना, दबाना..या बलात्कार कर देना वर्चस्ववादी सत्ता की नीति रही है और आज भी यही चला आ रहा है। सोशल मीडिया पर यह जुबानी गंदगी तो छायी रहती है….आप कल्पना कीजिए कि हमें कहाँ बढ़ना था और हम कहाँ तक गिर रहे हैं….इस राष्ट्र ने कभी भी एक विशेष विचारधारा को कभी प्रश्रय नहीं दिया और अगर दिया होता तो वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा नहीं रही होती। जिस देश में पूरी वसुधा को समेटने की शक्ति है…उसे किसी एक धर्म, सम्प्रदाय और में समेटना ही ही परम्परा का अपमान है और राष्ट्रवाद के नाम पर यही हो रहा है। आप एक परिवार की परिकल्पना कीजिए जिसमें बहुएँ बाहर से ही आती हैं…सम्बन्ध बाहर से ही जुड़ते हैं..क्या आप यह कह सकते हैं कि परिवार के इन सदस्यों को घर में रहने का अधिकार नहीं है क्योंकि ये बाहर से हैं या आप उनको अपने परिवार का हिस्सा नहीं मानते। यही बात इस देश रूपी विशाल परिवार पर भी लागू होती है..हो सकता है कि हिन्दू या द्रविड़ सभ्यता यहाँ रही हो..और अन्य जातियाँ बाहर से हों मगर अब वे इस देश की संस्कृति का हिस्सा हैं…इसलिए यह देश उनका भी है जैसे कि आपका है और वसुधैव कुटुम्बकम की परम्परा का निर्वाह ही आपकी जड़ों को मजबूत करेगा…धर्म जड़ता नहीं है…समय के साथ वह खुद को कट्टर नहीं बल्कि उदार बनाता है। जो लोग लव जेहाद की बातें करते हैं…उनको एक बार इतिहास पर नजर डालनी चाहिए क्योंकि विदेशियों से विवाह तो तभी से चला आ रहा है…। अपनी कमजोरियों से भाग कर हम कभी मजबूत नहीं बन सकते। कला और साहित्य हमें आइना दिखाते हैं तो इसका सम्मान कीजिए और अगर कुछ गलत है तो उसका प्रतिवाद भी सृजनात्मक तरीके से ही होना चाहिए….दबाकर विद्रोह को रोका नहीं जा सकता…और न ही इतिहास चाटुकारिता में बदलेगा मगर आपकी हरकतें आपको एक अँधी और क्रूर याद के रूप में कैद जरूर कर देंगी। इतिहास को हम अपने स्वार्थ के हिसाब से नहीं ढाल सकते क्योंकि उसमें आपकी अच्छाई और बुराई दोनों समाहित है।
रुखमाबाई का जन्म 22 नवंबर 1864 में हुआ। अपने जीवन में उन्होंने कड़े संघर्ष के बाद सफलता हासिल की थी। मुंबई के बढ़ई जाति से संबंध रखने वाले जनार्धन पांडूरंग और जयंतीबाई के यहां उनका जन्म हुआ।
रुखमाबाई ने मेडिकल की पढ़ाई तब की जब भारत पर ब्रिटिश राज था और महिलाओं को उनके मूल अधिकारों तक के लिए वंचित रखा जाता था। इंग्लैंड से पढ़ाई करने के बाद वो भारत की पहली महिला डॉक्टर बनीं। इसके साथ ही उन्होनें महिलाओं के मूल अधिकारों के लिए कार्य किए, अनेकों अखबारों से उन्होनें लोगों के दिल में अपने लिए जगह बनाई और लोगों के द्वारा दिए गए फंड से ही लंडन स्कूल ऑफ मेडिसिन से पढ़ाई पूरी की थी। रुखमाबाई ने कई समाज कार्यों में अपनी भूमिका निभाई और बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ बेबाक बोल लिखे। रुखमाबाई एक डॉक्टर के साथ एक समाजसेवक भी थीं। रुखमाबाई ने शिक्षा और अपनी निडरता से अपने साथ आगे आने वाली महिलाओं की पीढ़ी के लिए शिक्षा के रास्ते तो खोले और उन्हें बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरितियों से मुक्त करवाया।
रुखमाबाई का विवाह 11 साल की उम्र में 19 साल के दादाजी भिकाजी से उनकी बिना मर्जी के विवाह करवा दिया गया था लेकिन वो 12 साल की उम्र में अपने पति का घर छोड़ आई थीं। उनकी विधवा माता ने उनका साथ दिया और रुखमाबाई ने उनके साथ रहना शुरु कर दिया। माता जयंतीबाई ने असिस्टेंट सर्जन सखाराम अर्जुन के साथ विवाह किया, जिन्होनें रुखमाबाई की पढ़ाई को जारी रखा और हर मुद्दे पर उनका साथ दिया। रुखमाबाई के पति दादाजी भिकाजी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में पत्नी पर हक के लिए केस कर दिया। जिसमें कोर्ट ने रुखमाबाई को पति के साथ रहने का फैसला सुनाया और कहा कि दादाजी भिकाजी के साथ रहना होगा अन्यथा सजा के तौर पर जेल जाना पड़ेगा। जिसपर रुखमाबाई ने कहा कि वो इस तरह के रिश्ते में रहने से बेहतर जेल जाना पसंद करेंगी। ये केस ने इंग्लैंड में भी चर्चित हो गया और उसके बाद महारानी विक्टोरिया और ब्रिटिश सरकार ने शारीरिक संबंध बनाने के लिए रजामंदी की उम्र से जुड़ा कानून 1891 में पारित किया।
रुखमाबाई अपने पेन नेम ‘ए हिंदू लेडी’ से कई जगह लेख लिखे जिसमें उनके नारीवादी विचार झलकते थे। इसी तरह के एक लेख में उन्होनें अपने डॉक्टर बनने की इच्छा जाहिर की और उनके शुभचिंतकों ने फंड इकठ्ठे करके उन्हें पढ़ाई के लिए 1889 में इंग्लैंड भेजा। वहां से 1894 में एक प्रोफेशनल फिजिशियन बनकर लौंटने के बाद उन्होनें सूरत में एक अस्पताल में सेवाएं देनी शुरु कर दी थी। 1904 में दादाजी भिकाजी की मृत्यु के बाद हिंदू धर्म के अनुसार विधवा रुप में रहने लगी और 1918 में उन्होनें राजकोट के एक महिला अस्पताल में काम करना शुरु किया। वहां करीब 35 साल काम करने के बाद वो बंबई 1930 के आस-पास लौटीं और महिलाओं के लिए बनी पर्दा प्रथा और अनेकों कुरीतियों के लिए काम करना शुरु किया और अपने बेबाक शब्दों से उन्होनें लोगों को जागरुक करने का प्रयास किया और एक लंबी लड़ाई के बाद 1955 में हिंदू मैरिज एक्ट आया जिसमें पति-पत्नी के रिश्ते के लिए दोनों पक्षों की मंजूरी होना आवश्यक किया गया। रुखमाबाई ने शिक्षा और अपनी निडरता से अपने साथ आगे आने वाली महिलाओं की पीढ़ी के लिए शिक्षा के रास्ते तो खोले और उन्हें बाल विवाह और पर्दा प्रथा जैसी कुरितियों से मुक्त करवाया।