Saturday, October 3, 2026
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पीजी मेडिकल पाठ्यक्रमों में दिव्यांगों के प्रवेश के नियमों में संशोधन को मंजूरी

नयी दिल्ली : स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रमों में दिव्यांग अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिहाज से उनके प्रवेश के नियमों में संशोधन की मंजूरी प्रदान कर दी है।

सरकार के एक वक्तव्य के अनुसार विकलांग जन अधिकार कानून, 2016 के अनुरूप दिव्यांग अभ्यर्थियों द्वारा भरी जाने वाली सीटों की संख्या तीन प्रतिशत से बढ़ाकर पांच प्रतिशत कर दी गयी है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए प्रधानमंत्री की‘ सबका साथ, सबका विकास’ की सोच की तर्ज पर दिव्यांग जनों के कल्याण वाला बताया।

 केदारनाथ सिंह को याद करते हुए

 निशांत
 पहली बार
कहाँ देखा था केदारनाथ सिंह को
कोलकाता के ठनठनियों काली मंदिर के पास
एक गोरा-गारा ठिगना आदमी
चला जा रहा था दो-चार लोगों के साथ
“यही केदारनाथ सिंह हैं।
हिंदी के सबसे बड़े कवि।”
मित्र प्रकाश ने कहा था
“नहीं, एशिया के सबसे बड़े कवि।”
पत्रकार कृपाशंकर चौबे ने कहा था
हम
अभिभूत थे
क़िताबों से निकलकर
एक सच्ची-मुच्ची आदमी खड़ा था
हमारे बीच
थोड़ा सा छूकर
देखना चाहते थे उन्हें हम
चाहते थे
हो जाए एक फ़ोटो
उनके साथ
बड़े होने के बाद
एक बार बचपन फिर आ गया था हमारे अंदर
तुम्हारे कारण
धन्यवाद,केदारनाथ सिंह!
धन्यवाद!

 बड़ी बात को साधारण ढंग से कहने वाले कवि थे केदारनाथ सिंह 

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से भारतीय भाषा परिषद में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रो अरुण कुमार ने कहा कि केदारनाथ सिंह अच्छे कवि के साथ एक अच्छे अध्यापक भी थे। विमलेश त्रिपाठी ने कहा कि वे आमजन के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि थे। राज्यवर्द्धन ने कहा कि वे सहजता और आत्मीय के कवि थे। रितेश पांडे ने कहा कि हिंदी कविता के बड़े सेलिब्रिटी थे केदारनाथ जी। गीता दुबे ने कहा कि समकालीन हिंदी साहित्य के अमिताभ बच्चन थे केदारनाथ जी। इसके अलावा सुमिता गुप्ता, आनंद गुप्ता, श्री निवास सिंह यादव, पंकज सिंह, राजेश मिश्र, श्रद्धांजलि सिंह, श्रीरामनिवास द्विवेदी आदि ने अपने विचार व्यक्त किए। संजना जायसवाल, राहुल गौड़ और सुषमा त्रिपाठी ने केदारनाथ सिंह की कविताओं की आवृत्ति की। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. ٰशंभुनाथ कहा कि केदारनाथ सिंह हिंदी के सबसे ज्यादा लोकप्रिय, सहज और पठनीय कवि हैं। आलोचक रविभूषण ने कहा कि उनका देह भले ही दिल्ली में था पर मन ग्रामीण संस्कारों से संपृक्त था। उनका जाना कविता की बड़ी क्षति है। कार्यक्रम का सफल संचालन संजय जायसवाल ने किया।

 कवि केदारनाथ सिंह की याद में हुई शोकसभा

मिदनापुर : विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से हिंदी के लोकप्रिय और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि केदारनाथ सिंह के आकस्मिक निधन पर एक शोकसभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर दो मिनट का मौन रखा गया। विभागाध्यक्ष प्रो दामोदर मिश्र ने कहा कि हिंदी काव्य परम्परा के सबसे ज्यादा समादृत कवि थे केदारनाथ सिंह। उन्होंने हिंदी कविता लोकप्रिय बनाया। डॉ. संजय जायसवाल ने उनके साथ बिताए गए क्षणों को याद करते हुए कहा कि केदारनाथ सिंह हिंदी कविता के मानक हैं। वे बहुत सौम्य और आत्मीयता के भाव से भरे थे। दीपनारायण ने कहा कि हिंदी साहित्य ने एक हीरा खो दिया। पुष्पा मल्ल ने कहा कि वे जन के कवि थे। शोधार्थी मधु सिंह ने कहा कि उनकी कविताओं में जीवन जीने की प्रेरणा है। बहुत सम्प्रेषणीय कवि हैं। उनका जाना एक युग का अवसान है।

अदिति साहा को मिला सुकन्या सम्मान

महिला दिवस पर फोटो पत्रकार अदिति साहा को सुकन्या सम्मान से सम्मानित किया गया। अदिति हर क्षेत्र में अपने कैमरे का हुनर दिखाती रही हैं। कई मीडिया संस्थानों को अपनी सेवायें दे चुकी अदिति की कहानी दिल्ली की पत्रकार सर्वेश की महिला फोटो पत्रकारों पर आधारित किताब में भी पढ़ने को मिलेगी। अपराजिता की ओर से अदिति साहा को हार्दिक बधाई..।

24 साल की एमबीबीएस छात्रा शहनाज बनीं राजस्थान की सबसे युवा सरपंच

भरतपुर : एमबीबीएस सरपंच शहनाज़  राजस्थान के भरतपुर की सबसे युवा महिला सरपंच चुनी गई हैं। 24 साल की शहनाज पेशे से डॉक्टर हैं और उन्होंने इसी साल एमबीबीएस के अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा दी है।

शहनाज़ हमेशा से डॉक्टर ही बनना चाहती थीं और कभी इस ओर आने का ख्याल उनके मन में नहीं था पर नियति को कुछ मंजूर था। शहनाज़ को विरासत में राजनीति मिली है. उनके दादा पिछले पचपन सालों से भरतपुर की कामां पंचायत के सरपंच थे और अब उनकी जगह उनकी पोती ने ले ली है। शहनाज के दादा का फर्जी सर्टिफिकेट इश्यू करने का आरोप था जिस कारण सरपंच चुनाव रद्द कर दिया गया था. फिर शहनाज के दादा के बाद उस सीट को लेकर घर में बात शुरू हो गई थी कि कौन चुनाव लड़ेगा इस बात पर काफी देर बाद फैसला हुआ कि शहनाज ही इस सीट पर सरपंच का चुनाव लड़ेंगी। शहनाज का पूरा परिवार राजनीति में ही है। पिता गांव के प्रधान, मां विधायक, संसदीय सचिव भी रह चुकी हैं। शहनाज अपने इलाके में लड़कियों की शिक्षा पर जोर देना चाहती हैं और साथ ही साथ स्वच्छ भारत के मिशन पर भी काम करना चाहती हैं। वे अगले महीने से अपनी इंटर्नशिप गुड़गांव में करेंगी साथ ही साथ लगातार अपने गांव के संपर्क में भी रहेंगी।

शहनाज़ ने पांचवी तक पढ़ाई गुरुग्राम के श्री राम स्कूल से की और छठवीं से बारहवीं की पढ़ाई मारुति कुंज से की है। उसके बाद शहनाज उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद से MBBS कर रही हैं।

शहनाज़ अपनी तरह और लड़कियों को भी आगे लाना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि ”मैं बेहद गौरवान्वित महसूस कर रही है हूं कि लोगों की सेवा करने का मौका मिला है।” बतौर सरपंच उनकी प्राथमिकता होगी कि गांव में बच्चियों के लिए शिक्षा और स्वच्छता की बेहतर व्यवस्थाएं सुनिश्चित कराई जा सकें। उन्होंने कहा कि मैं यह भी चाहती हूं कि मैं बेटियों के सामने यह उदाहरण दे सकूं कि शिक्षा से समाज में बदलाव हो सकता है।

लिटिल थेस्पियन का नाटक रूहें

नाटक ‘रूहें’ एक राज्य की अस्थिरता और उसके गौरव की कहानी है। इसमें कई परतें हैं जो संघर्ष के विभिन्न रंगों को दर्शाती हैं – अतीत और वर्तमान के बीच संघर्ष,  सही और गलत का संघर्ष,  अभिजात वर्ग के खिलाफ लोकतंत्र का संघर्ष। यह नाटक विभिन्न भावनाओं और मानवीय संघर्षों का एक ऐसा कोलाज है जिसमें केंद्र में एक शाही कब्रिस्तान है जहां लंबे समय से गुमशुदा अतीत की कई आत्माएं बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही हैं और वहीँ दूसरी ओर वर्तमान मौजूदा हालातों से निपटने की कोशिश में लगातार संघर्षरत है क्योंकि वो जानता है “नफ़रत से कभी भी ख़ुशी हासिल नहीं हो सकती” । नाटक का लेखन और निर्देशन एस.एम अजहर आलम ने किया है।  आपके लिए नाटक की एक झलक…

https://youtu.be/Hp4OzmaZ2iI

लिटिल थेस्पियन के नाटक – #रूहें का सार……

हुकूमत क्या है

एक खेल का नाम है

सियासत इस खेल की चाल

और हाकिम खिलाड़ी है

जो अपने विरोधियों के साथ खेलता है

 

अवाम तमाशाई हैं

इस खेल के

ऐसे तमाशाई

जो कभी खामोश रहते हैं

कभी सहमे हुए

कभी बेचैन

कभी जज़्बाती हो जाते हैं

लेकिन हाकिम जज्बाती नहीं होता

वो दिमाग से खेलता है

 

इस खेल में आते हैं कई पड़ाव

पहले पड़ाव में खेल की बाज़ी

खिलाड़ी के हाथ में होती है

खिलाड़ी अपने विरोधी को

देता है मौका चाल चलने का

उसे दौडाता है

भगाता है

और मारता है

 

दूसरे पडाव में

खेल का रोमांच ज़रा

खतरनाक मोड़ पे होता है

विरोधी के चौक्कने वार पर

खिलाड़ी होशियारी से ठिठकता है

फिर उसे खेलने का मौका देकर

कभी भागता है

कभी मार खाता है

कभी खुद को बचाता है

 

तीसरा पडाव होता है आख़िरी

जहाँ दोनों तरफ के खिलाड़ी

लगा देते हैं अपनी पूरी ताकत

जीत हासिल करने के लिए

जैसे चौगान का खिलाड़ी

घोड़े पे सवार अपनी छड़ी से

आंधी सी रफ़्तार लिए

गेंद को मारता हुआ

भागता है ऐसे सरपट

कि खेल की शक्ल

लगने लगती है खौफ़नाक

जैसे घुड़सवार गेंद छोड़

विरोधी की कटी गर्दन को

छड़ी से ठोकरे मार

भाग रहा हो बेतहाशा

अपनी सरहद की ओर…

 

ठीक उसी तरह

हुकुमत के खिलाड़ी

एक दूसरे की चालों को मात देते

लगा देते हैं अपनी पूरी ताक़त

अपने हिस्से की भीड़

अपने हिस्से का इतिहास

अपने हिस्से की गाथाएँ

अपने हिस्से के किसान

अपने हिस्से के नौजवान

और अपने हिस्से की तमाम रूहें

 

जीत मगर किसी एक की होती है

हवा में लहराते हों

जिसके उद्घोष

बजते हों ढोल जिसके

घडियाली आँसू के

बता सकता हो जो

कागज़ में गुल की खुशबू

बिना किसी आधार के

बना सकता हो जो महल

हवा को मुट्ठी में बंद करने का

कर सकता हो जो दावा

जीत का डंका उसी का बजता है

 

अतीत के गर्भ में

साँसे लेता भविष्य मगर

हार और जीत से परे

बिल्कुल आश्वस्त है

 

कि जानता है वो

अँधेरे और उजाले के बीच

जो इक पतली सी झिल्ली है

इंसानियत की नाल से ही जुडी है

इसलिए खेल में इंसानियत जीतेगी साथी

और यही भरोसा

ज़िन्दगी का इतिहास है

अतीत, वर्तमान और भविष्य है

 

 

 

 

इसमें तुम्हें जंगली पत्तों की खुशबू मिलेगी

विमलेश त्रिपाठी

केदारनाथ सिंह मेरे प्रिय कवि हैं। इसका कारण यह नहीं है कि मेरा शोध-कार्य केदार जी पर ही है। इसका कारण उनकी कविताएं हैं जो जादू की तरह असर करती हैं। केदार की कविताएं मुक्तिबोध की तरह कठिन भी नहीं हैं। सहज होकर गंभीर बातों को कहना और ऐसे कहना कि आपके अंदर एक हलचल और एक बेचैनी पैदा हो जाए, यह इसी एक कवि में मुझे मिलता है। यह कवि आपके साथ बोलते-बतियाते हुए आपको एक ऐसी जगह पर लेकर जाता है, एक ऐसे लोक में जहां से यथार्थ का एक नया चेहरा आपको दिखायी पड़ने लगता है, – नया और भयावह और आपको कई बार तिलमिला देने वाला भी।
केदार जी कि कविताएं एक ताजगी लेकर उपस्थित होती हैं। उनमें बोलने बतियाने का एक गंवई ठाट है। वहां कोई बड़बोलापन नहीं है, और है भी तो इतना सहज की वह अखरता तो कतई नहीं।

वे चाहे मारिशस या सुरिनाम पर कविताएं लिख रहे हों उनके पांव कहीं न कहीं अपनी मिट्टी में इतने गहरे घंसे हुए रहते हैं कि उनकी हर कविता में उसकी सुगंध देखने को मिल जाती है। लेकिन क्या यह इसका प्रमाण है कि केदार की कविताएं गांव और कस्बे के इर्द-गिर्द घुमती हैं। इस तथ्य को उनकी कविताएं ही नकारती भी हैं। इसे एक तथ्य के रूप में समझा जाना चाहिए कि जिस कवि की अपनी कोई जमीन नहीं है, वह ‘कवि’ भले हो जाए लेकिन केदार जी जैसा ‘बड़ा कवि’ तो कहीं से भी नहीं हो सकता।

डॉ. शंभुनाथ एक लेख में जिक्र करते हैं कि एक समय हिन्दी के कवियों को विश्व कविता लिखने का चश्का लग गया था। वे आगे यह भी कहते हैं कि साठ के बाद जो भी महत्वपूर्ण कविताएं हैं उनमें से अधिकांश पर इस विश्वबोध का चश्का काम करता है। शंभुनाथ एक गंभीर आलोचक हैं और जाहिर है कि उनके सामने इस तथ्य को कहते समय बहुत सारे कवि होंगे – जाहिर है कि केदारनाथ सिंह भी। लेकिन जिन कविताओं की मार्फत हम केदार को जानते हैं उनमें तो हमें विश्वबोध की कविताओं का चश्का नहीं दिखता। माझी का पुल कविता में कवि को लालमोहर की याद आती है और वह हल चलाते हुए दिखता है और उसे खैनी की तलब लगी है। पानी में घिरे हुए लोग उस अंचल के लोग ही हैं जो बाढ़ की भयावहता को समय-.समय पर अपने कंधे पर झेल चुके हैं। लेकिन केदार की खास विशेषता यह है कि वे गांव और जवार की बात करते हुए भी एक आधुनिक भावबोध से संवलित आधुनिक कवि हैं जिनकी कविताओं में समय की गूंज साफ-साफ सुनाई और दिखायी पड़ती है। हां, इस बात की ओर भी इशारा करने की जरूरत तो है ही कि उनके यहां लोक और नागर के बीच लोक संस्कृति और आधुनिकता के बीच एक द्वद्व, एक ‘क्लैश’ भी दिखायी पड़ता है और यह उद्देश्यहीन नहीं है।

इस कवि ने कभी भी यह नहीं माना कि भारतीय आधुनिकता बाहर से आयातित की हुई कोई अवधारणा है, बल्कि उसका कहना है कि भारतीय आधुनिकता का विकास भी अपने तरीके से ठेठ भारतीय संदर्भ में हुआ है। मेरे समय के शब्द में एक जगह वो साफ-साफ लिखते हैं जिससे हमारी उपरोक्त बातों को बल मिलता है। वे लिखते हैं – आधुनिकता के विकास की प्रक्रिया की पहचान और पुनरावलोकन हमें भारतीय संदर्भ में करना चाहिए। उनका तर्क है कि आधुनिकता संबंधी बहस खत्म हो गई है लेकिन आधुनिकता की प्रक्रिया अपने खास ढंग से पूरे भारतीय संदर्भ में आज भी जारी है। यह स्थिति पश्चिम से थोड़ी भिन्न है और इसलिए ठेठ भारतीय भी। यह एक विकासशील देश की अपनी बनावट और उसकी खास जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे सही संदर्भ में रखकर देखा जाना चाहिए । आगे वे अपनी आधुनिकता में लोक मूल्यों की संश्लिष्टता का उद्घाटन करते हुए लिखते हैं कि हमारा देश सामंतवाद के विरूद्ध एक लंबे संघर्ष के बावजूद भी, अपने मूल्यों और आचरण में सामंती अवशेषों से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। उसी अवशेष का एक रूप है जाति व्यवस्था, जो हमारे चारों ओर है। अपने सारे मानववाद के बावजूद, हम एक जाति विशेष के सदस्य माने जाते हैं। यह हमारी सामाजिक संरचना की एक ऐसी सीमा है, जिससे कवि की संवेदना बार-बार टकराती और क्षत-विक्षत होती है। वे स्वीकार करते हैं कि उनकी आधुनिकता में यह खंरोच भी शामिल है।
कहने का आशय सिर्फ इतना है कि उस खंरोच को समझे बिना केदार की कविताओं को समझना और उसका सटिक मूल्यांकन करना लगभग असंभव है। क्योंकि लोक का ठेठपन और पूर्णतः आधुनिक होने के बावजूद उनकी आधुनिकता की एक चिंता यह भी है कि उसमें ‘लालमोहर’ कहां है। लालमोहर को समझे बिना केदार की कविताओं को समझना समंदर के किनारे खड़े होकर लहरें गिनने जैसा है। जाहिर है कि इस दृष्टि से जब हम केदार की कविताएं पढ़ेंगे तो जो हमें मिलेगा वह बकौल केदारनाथ सिंह –

इसमें तुम्हें जंगली पत्तों की खुशबू
और एक जानवर के रोओं की गरमाहट मिलेगी
तुम्हे एक मजबूत पत्थर मिलेगा
जिसपर तुम बैठ सकते हो
पत्थर को छुओ
तुम्हें पानी का संगीत सुनाई पड़ेगा
एक पत्ता उठा लो
और तुम पाओगे तुम उसकी नसों में
खून की तरह बह रहे हो
तुम बाहर निकलोगे
और तुम्हे सूरज मिल जाएगा।

***
केदार की कविता का जादू
——————————

केदार जी की कविताएं पढ़ते समय हमें यह कभी नहीं लगता कि हम कोई लयमुक्त या छंदहीन कविता पढ़ रहे हैं। कहने की बात नहीं कि केदार जी ने लिखने की शुरूआत छंदबद्ध कविताओं से की थी और एक समय उनके गीत सुनने के लिए लोग सभागारों में बैठे इंतजार करते रहते थे। उन गीतों में क्या था कि नवगीत के पुरोधा कवियों के बीच भी केदार को अलग से सुनने का मन करता था। मेरी समझ से केदार जी के गीतों में एक तरह की भाषिक नवीनता तो थी ही, साथ ही उसमें उसमें अपने लोक, अपने अंचल की वाणी भोजपुरी की मिठास भी शामिल थी। अलावा इसके केदार जी के पास सर्वथा नूतन एक आधुनिक दृष्टि थी जो उनकी कविता में एक तरह की नवीनता के साथ जादू जैसा कुछ पैदा करती थी।
केदार जी एक इंटरव्यू में याद करते हैं कि कविता से पहला परिचय उन्हें गांव में औरतों के द्वारा गाए जाने वाले गीतों की मार्फत हुआ। वे कहते हैं कि सुबह-सुबह अधनींदी अवस्था में कई बार कानों में भोजपुरी के लोक गीत सुनने को मिलते थे – उन गीतों का असर आज भी मेरे लेखन में है, इसे मैं कितना भी चाहूं, अस्वीकार नहीं कर सकता। उन गीतों में क्या जादू है, यह तो वही समझ सकता है, जो गांव में रहा हो और उस जिंदा जादू को पत्यछ देखा-सुना हो। केदार की कविताओं में एक तरह की सहजता के साथ जो जादू है, कहीं न कहीं उसका उत्स वे लोक गीत ही हैं, जिन्होंने केदार को कहीं गहरे प्रभावित किया है।
उनकी बोलने-बतियाने और उसी दौरान कोई गूढ़ बात कह देने की शैली भी रेखांकित करने लायक है। कई बार वे पाठकों से बातचीत के लहजे में कविता की शुरूआत करते हैं, कई बार पाठक से सवाल करते हैं कि अब क्या किया जाए, कि अब आप ही बताएं कि अब तो यह तय करना मुश्किल है इत्यादि। तात्पर्य यह कि उनके लिए पाठक कविता के बाहर की कोई वस्तु नहीं है, वे हर कविता के साथ पाठक को शामिल करते चलते हैं, जैसे कोई बच्चा इधर-उधर न जाए इसलिए उसका अभिभावक अपनी उंगली पकड़ा देता है। एक बार बच्चे ने उंगली पकड़ ली तो अभिभावक अपनी रौ में अपनी राह चलता जाता है। केदार की कविता की रचना प्रक्रिया को इसी तरह समझने की जरूरत हमें महसूस होती है।
उपर केदार जी के लोक गीतों से जुड़ाव की बातें कही गई हैं। भोजपुर अंचल में रहने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जो लोक गीतों से अपना जुड़ाव न रखता हो। यह अलग बात है कि अब वे परंपराएं मिट रही हैं और लोक गीतों के नाम पर कुछ फूहड़ और अश्लील गीत ही बाजार में रह गए हैं। लेकिन केदार जी का जो समय रहा है, उस समय भोजपुरी लोकगीतों में एक समृद्ध साहित्यिक एवं काव्यात्मक तत्व दिखायी पड़ता है। भोजपुरी लोक गीतों के महानायक भिखारी ठाकुर के बारे में केदार जी के संस्मरणों को पढ़ने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि केदार जी का लोक और लोक गीतों से कितना गहरा जुड़ाव रहा है। यह गौर तलब है कि अपनी कविता की किताब ‘उत्तर कबीर व अन्य कविताएं’ में केदार जी ने ‘भिखारी ठाकुर’ नाम से एक बहुत ही मार्मिक कविता भी लिखी है।
‘नई कविता के मंच पर भिखारी ठाकुर’ नामक संस्मरणात्मक लेख उपरोक्त बातों की पुष्टि करता है। तो इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि केदार जी की शुरूआती कविताएं लयबद्ध हैं, उनमें गीतात्मकता है। हमारा कहने का मतलब यह है कि यह लयात्मकता और गीतात्मकता की गूंज हमें केदार जी की हर कविता में सुनाई पड़ती है। इसलिए जब हम आज की उनकी कविताएं पढ़ते हैं, तब भी हमें लोकगीतों की लय और गीत की मिठास की गूंज उनकी कविताओं में सुन पाते हैं। यही केदार की कविता का जादू है तो सिर चढ़कर बोलता है और यही कारण है कि एक पूरी पीढ़ी उनकी कविताओं से प्रभावित है और पाठकों के बीच उनकी कविताएं असाधारण रूप से लोकप्रिय हैं।

(लेेखक की फेसबुक वॉल से साभार लिया गया लेख)

 इन देशों में भी मनाई जाती है जाती है रामनवमी

श्रीराम सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों में पूजे जाते हैं। कई देशों में राम के मंदिर हैं और श्रद्धालुओं के बीच उनका नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है। सनातन धर्म मानने वाले रामनवमी का उत्‍सव हर साल पूरे उल्‍लास से मनाते हैं। रामनवमी चैत मास में शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाया जाता है। इस दिन अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौसल्या के पुत्र भगवान राम का जन्म हुआ था ।रामनवमी का त्‍योहार भगवान विष्णु के सातवें अवतार भगवान राम के जन्‍मोत्‍सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां दुर्गा के नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्र का समापन भी होता है।  आइए जानते हैं किन-किन देशों में रामनवमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है –

थाइलैंड – थाइलैंड दक्षिण-पूर्वी एशिया का देश है, जिसकी राजधानी है बैंकॉक। यहां भगवान राम और रामायण का काफी महत्व दिया जाता है। थाइलैंड के राजा को भगवान श्रीराम का वंशज माना जाता है। यहां कई जगहों पर रामलीलाएं होती हैं और लोग राम के भजन गाते हैं। खास बात ये है कि ‘रामायण’ थाइलैंड का राष्ट्रीय ग्रंथ है। भगवान राम के अलावा थाइलैंड में शिव जी, भगवान विष्णु, इंद्र देव, सरस्वती देवी, गणेश जी समेत कई देवी देवताओं के सैकड़ों मंदिर है। यहां तक कि थाइलैंड सरकार का अधिकृत प्रतीक चिह्न ‘गरुड़’ है।

नेपाल – नेपाल के लोग भी भगवान राम को काफी महत्व देते हैं। यहां रामनवमी हिंदू त्योहारों के महत्वपूर्ण पर्व में से एक है। पूरे नेपाल में भगवान राम के कई मंदिर है। खासतौर पर रामनवमी वाले दिन मंदिरों को सजाया जाता है और हजारों लोग यहां पूजा के लिए आते हैं। कुछ इलाकों में भगवान राम की शोभायात्रा भी निकाली जाती है।

श्रीलंका – भगवान राम और सीता के जीवन का काफी भाग श्रीलंका से जुड़ा हुआ है। भगवान राम के जीवन का उद्देश्य ही ऋष‍ि-मुनियों के काम में बाधा डालने वाले राक्षसों और लंका के राजा रावण का अंत करना था। आज भी श्रीलंका में कई जगहों पर राम-सीता, हनुमान, रावण से जुड़ी निशानियां मौजूद हैं। श्रीलंका में हिंदू देवी-देवताओं के सैकड़ों मंदिर हैं. भारत की तरह श्रीलंका में भी पूरी श्रद्धा के साथ इन देवताओं की पूजा की जाती है। इन देशों के अलावा सिंगापुर, मॉरिशस, इंडोनेशिया, भूटान, ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, बांग्लादेश जैसे कई देशों में रहने वाले भारतीय हिंदू समुदाय के लोग भगवान राम को मानते हैं. त्‍योहार के मौके पर मंदिरों में उत्सव का आयोजन होता है।

जायज तो नहीं..

गुंजन सैनी की यह कविता वैवाहिक बलात्कार की पीड़ा को बयां करती है

Ek hawas bhare insaan ke bacche ko apni kokh me rakhnaJaayaz To nahi – Gunjan SainiVideo Courtesy- YourQuoteSubscribe Our YouTube channel for More Beautiful Poetrieshttp://bit.do/BolPoetryFor media updates visit http://aprajita.co.in

Posted by Bol Poetry on Tuesday, March 20, 2018

बोल पोएट्री से साभार