Wednesday, April 1, 2026
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फसल उगाकर अन्नपूर्णा बन रही हैं ये नेत्रहीन महिलाएँ

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हमें कई बार शरीर से पूरी तरह से स्वस्थ्य लोग बेरोजगारी का रोना रोते दिख जाते हैं। जिनके बारे में देखकर हमें दुख होता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था कितनी बदहाल है कि एक इंसान को इस काबिल नहीं बना सकती कि उसे ढंग की नौकरी या जीवनयापन का कोई साधन ही मिल जाए। फिर जब हम किसी विकलांग को शारीरिक अक्षमता से जूझते हुए काम करते देखते हैं तो हमें न केवल खुशी होती है बल्कि उन पर गर्व भी होता है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि दृष्टिहीनता जैसी अपंगता से मार खाया इंसान अपना जीवन यापन करते वक्त कितनी चुनौतियों से जूझता होगा।

कहने को तो दृष्टिहीनों के लिए तकनीक है जिसके सहारे वे अपनी पढ़ाई कर सकते हैं, लेकिन हमारे देश की हालत इतनी बेहतर तो है नहीं कि दूर दराज इलाकों में रहने वाले दृष्टिहीनों को पर्याप्त शिक्षा मुहैया करवा पाए। शायद यही वजह है कि अभी भी दृष्टिहीनों को छोटे काम के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन मध्यप्रदेश के जबलपुर की ग्रामीण महिलाओं की कहानी सुनकर आप गौरान्वित हो उठेंगे। दरअसल ये महिलाएं बचपन से ही दृष्टिहीन हैं, लेकिन ये अपना सारा काम करने के साथ ही खेती भी कर लेती हैं। ये खेतों में सब्जियां और फसलें उगाकर अपने जीवन का आर्थिक ढांचा दुरुस्त कर रही हैं।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक सिहोरा ब्लॉक के गांव जॉली की तारा बाई। 50 की उम्र पार कर चुकीं तारा बाई बचपन से दृष्टिहीन हैं। छह महीने की उम्र में आंखों की रोशनी चली गई। दृष्टिहीनता के कारण शादी नहीं हुई। जैसे जैसे समय बीता, खुद को परिवार पर बोझ मानने लगीं। मजबूर थीं। क्या करतीं। लेकिन, कुछ करना जरूर चाह रही थीं। खेती के अलावा कुछ और कर भी नहीं सकती थीं। खेती करना मुश्किल था। बागवानी का विचार आया। इसके लिए घर के बगल ही पर्याप्त जमीन भी मुहैया थी। खुद ही सब्जियां उगाने की ठानी, लेकिन दृष्टिहीनता आड़े आई।

सच में इन ग्रामीण दृष्टिहीन महिलाओं की दाद देनी पड़ेगी, जो सब्जियां उगा कर आर्थिक निर्भरता हासिल कर रही हैं। बीज, पौधों, पत्तियों, फल-फूलों को छू कर पहचानने की कला इन्होंने बड़े जतन से विकसित कर ली है। यह सब संभव हुआ एक एनजीओ के कार्यकर्ता की बदौलत जो गांव में पहुंचे। वे दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहे थे। तारा बाई ने उनसे अपने मन की बात बताई। एनजीओ ने इसके लिए जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क किया। बात बन गई। कृषि विश्वविद्यालय तारा बाई को बागवानी-सब्जी उत्पादन की विशेष ट्रेनिंग देने को तैयार हो गया। तारा की ट्रेनिंग शुरू हो गई।

तारा बताती हैं, पहले हम कहीं भी पौधे लगा देते थे, लेकिन ट्रेनिंग के बाद हमें पता चला कि क्यारी उत्तर-दक्षिण दिशा में बनाना चाहिए। इससे पौधों पर धूप सीधी नहीं पड़ती। इसके साथ ही सब्जी के अच्छे बीज भी हमें दिए गए। जॉली के साथ ही बुधुआ गांव में भी दिव्यांग महिलाएं सब्जियां उगा रही हैं। 65 वर्षीय रज्जो बाई भी नेत्रहीन हैं और अपनी जमीन पर सब्जियां उगा रही हैं। बुधुआ की दृष्टिहीन अनामिका आंगन में सब्जी के साथ ही गेंदे के फूल की भी खेती कर रही हैं। इन महिलाओं की कहानी सुनकर आप भी शायद अब सोचना बंद कर दें कि दृष्टिहीन अपनी जिंदगी कैसे चलाते हैं। देखा जाए तो ये महिलाएं हमारे जीवन के लिए प्रेरणास्रोत होनी चाहिए।

(साभार दैनिक जागरण तथा योर स्टोरी)

पहली नजर में प्यार होने के पीछे है ये सच

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पहली मोहब्बत हर किसी के लिए खास होती है। प्यार चाहे सफल हो या न हो, हर किसी के दिल में उसकी याद हमेशा जिंदा रहती है। प्यार-मोहब्बत को लेकर एक सवाल जो हर किसी के मन में उठता है वो ये है कि क्या पहली नजर में प्यार के पीछे सच्चाई है? मतलब यह कि क्या पहली नजर में प्यार हो सकता है? इस विषय को लेकर एक रिसर्च किया गया है, जिसके परिणाम बड़े दिलचस्प हैं। आइए जानते हैं कि इस रिसर्च के निष्कर्ष में क्या सामने आया है।

नीदरलैंड की एक यूनिवर्सिटी द्वारा कराए गए एक रिसर्च में यह पाया गया है कि पहली नजर में प्यार होने की संभावनाएं 46 प्रतिशत तक हो सकती हैं। सर्वे के मुताबिक उम्र बढ़ने के साथ-साथ पहली नजर में प्यार होने की संभावनाएं भी बढ़ती जाती हैं। सर्वे में 18-25 साल के बीच लोगों में लव ऐट फर्स्ट साइट के सबसे ज्यादा मामले देखे गए। रिसर्च में 18-25 साल के तकरीबन 396 लोगों को शामिल किया गया था जिनमें तकरीबन 60 प्रतिशत महिलाएं थीं। शोध में शामिल प्रतिभागियों को आकर्षक लोगों की तस्वीरें दिखाई गईं जिनमें से ज्यादातर लोगों ने पहली नजर में अपने परफेक्ट मैच  चुन लिया।

 

हर साल बेची जाती हैं नेपाली लड़कियां, आंकड़ा 12 हजार पार

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नेपाल के शहर की चकाचौंध भरी ये गलियां किसी न किसी डांस बार पर जाकर खत्म होती हैं। यहां सूरज ढलते ही महफिल सजती है और सज-धजकर नाच रही लड़कियों के बीच फिल्मी धुनों पर लोग थिरकने लगते हैं। रात परवान चढ़ने लगती है और इस बीच एक अन्य समूह इन डांस बारों पर पहुंचता है। ये लोग खरीदार हैं जो बार में मौजूद लड़कियों की बोली लगाते हैं। सौदा तय हो जाता है और ये महफिल सुबह तक ऐसे ही चलती रहती है। इसके बाद ये लड़कियां बड़े-बड़े शहरों में मौजूद डांस बार में ले जाई जाती हैं।

नेपाल के लिए लड़कियों की तस्करी कोई नई समस्या नहीं है। 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद लड़कियों की तस्करी में अचानक देखी जा रही बढ़ोतरी ने नेपाल सरकार और नेपाल पुलिस की चिंता बढ़ा दी है।

नेपाल पुलिस के प्रवक्ता मनोज नेऊपाने ने कहा, समस्या कितनी बड़ी है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल नवंबर महीने तक नेपाल पुलिस ने 2,700 से भी ज्यादा नेपाली लड़कियों को तस्करों और दलालों के चंगुल से छुड़वाया है। मनोज ऊपाने कहते हैं, “मानव तस्करी का ये जाल बहुत बड़ा है और इसके तार यहाँ से लेकर भारत और विदेशों तक फैले हुए हैं। मानव तस्करी की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए नेपाल पुलिस में हमने एक विशेष प्रकोष्ठ बनाया है, हमें सफलता मिल रही है, मगर उतनी नहीं।

एक अमरीकी संस्थान के शोध के अनुसार हर साल 12,000 नेपाली लड़कियां तस्करी का शिकार हो रही हैं। भारत और नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा पर तस्करी को रोकना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। ऐसा मानना है नेपाल-भारत की सीमा की चौकसी करने वाले सशस्त्र सीमा बल के अधिकारियों का।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से लगे सोनौली बॉर्डर पर तैनात उप समादेष्टा दिलीप कुमार झा कहते हैं, “उन लड़कियों को रोकना मुश्किल है जो वयस्क हैं और अपनी मर्जी से सरहद पार कर रही होती हैं। कई लड़कियां अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ होती हैं।

दिलीप झा बताते हैं, “हमें पता है कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हो सकती हैं। मगर जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि उनके पास दस्तावेज सही होते हैं और वो वयस्क होती हैं। कभी जब शक पुख्ता होता है तो हम ऐसी लड़कियों को नेपाल पुलिस के अधिकारियों या वहां के सामजिक संगठनों के सुपुर्द कर देते हैं। मगर ये समस्या काफी बड़ी है। नेपाल के अधिकारियों और भारत के सीमा प्रहरियों का कहना है कि मानव तस्करी का सबसे बड़ा कारण है गरीबी, नेपाल के दूर-दराज के इलाकों में रोजगार के संसाधन नहीं होने की वजह से बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। सुनीता दानुवर कम उम्र में ही तस्करी का शिकार हो गई थीं।

उन्हें मुंबई ले जाया गया जहां उनका बलात्कार हुआ, फिर उन्हें जबरन जिस्मफरोशी के काम में धकेला गया। मगर एक दिन उस जगह पुलिस का छापा पड़ा जहां सुनीता को रखा गया था। पुलिस ने उन्हें वहां से निकाला और वापस नेपाल भेज दिया। ये सिलसिला सिर्फ भारत के महानगरों तक सीमित नहीं है। सुनीता कहती हैं कि नेपाली लड़कियों को तस्करी के बाद उन्हें चीन, श्रीलंका और अरब देशों में बेचा जाता है जहां उन्हें जिस्मफरोशी के लिए मजबूर किया जाता है।

मगर तस्करी की पीड़ितों की विडंबना है कि वापसी के बाद उन्हें ना उनका परिवार अपनाता है और ना ही समाज, काठमांडू में बने एक पुनर्वास केंद्र में रहने वाली एक पीड़ित नेपाली लड़की का कहना है, मुझे अच्छी नौकरी का झांसा देकर दिल्ली ले जाया गया मगर जब मैं वहां पहुंची तो खुद को एक छोटे से गंदे से कमरे में पाया। वहां पर और भी नेपाली लड़कियां थीं। मैं बेबस थी और मुझे जिस्मफरोशी के काम में जबरदस्ती झोंक दिया गया। कई महीनों के बाद मैं किसी तरह वहां से निकलकर भाग सकी।

नाम नहीं बताने की शर्त पर बात करने को तैयार हुई तस्करी की शिकार एक अन्य नेपाली युवती ने कहा कि वो शादी के झांसे में आ गई और होश संभाला तो खुद को जिस्मफरोशी की मंडी में पाया। वो कहती हैं, मैं जिस लड़के से प्यार करती थी उसने मुझे मुंबई में बेहतर जिन्दगी का भरोसा दिलाया। मैं उसके साथ दिल्ली चली गई, मगर वो मुझे उम्रदराज आदमी के पास छोड़कर भाग गया। उस व्यक्ति ने मेरा बलात्कार किया। फिर मैं जिस्मफरोशी की मंडी में फंस गई।

सुनीता दानुवर कैमरे के सामने आकर अपनी आपबीती सुनाने में हिचकिचाती नहीं हैं, बल्कि अब उन्होंने एक सामजिक संगठन बनाकर पीड़ित लड़कियों के पुनर्वास के लिए काम करना शुरू किया है। वो कहती हैं कि ये काम भी इतना आसान नहीं है। वो बताती हैं, शुरू में हमने पीड़ितों को प्रशिक्षण देना शुरू किया ताकि वो बाहर जाकर नौकरी कर सकें और अपनी आजीविका चला सकें। ऐसा हुआ भी लेकिन जब लोगों को पता चला कि ये लड़कियां तस्करी का शिकार हुई थीं तो वो फायदा उठाने की कोशिश करने लगे।
अब हम यहीं पर इनके लिए रोजगार के मौके बढ़ाने की कोशिश पर काम कर रहे हैं। मगर नेपाल में संसाधनों की कमी है, इसलिए इन पीड़ितों को और भी ज्यादा संघर्ष करना पड़ रहा है।
हालांकि, कुछ एक सामाजिक संगठन इन पीड़ितों को सामान्य ज़िन्दगी में वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, मगर जिस्मफरोशी की मंडियों में बेची गईं इन नेपाली लड़कियों की आत्मा पर लगे घाव उन्हें हमेशा तकलीफ देते रहेंगे।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

राम लला के कपड़े सिलते हैं 3 मुस्लिम, 24 घंटे रोशनी और सुरक्षा का रखते हैं ध्यान

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शायद ही कोई इस बात से वाकिफ हो कि पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से राम लल्ला के कपड़े सिलने से लेकर रोशनी और सुरक्षा की जिम्मेदारी तीन मुस्लिम निभा रहे हैं।

राम जन्मभूमि से जुड़े विवाद के बारे में सब जानते हैं, लेकिन शायद ही कोई इस बात से वाकिफ हो कि पिछले दो दशकों से भी ज्यादा समय से राम लला का वस्त्र तैयार करने से लेकर रोशनी और सुरक्षा की जिम्मेदारी तीन मुस्लिम निभा रहे हैं। जब कभी आंधी या तेज बारिश की वजह से कंटीले तार टूट जाते हैं तो लोक निर्माण विभाग अब्दुल वाहिद को याद करता है। वहीं, जब राम लला के लिए कपड़े की जरूरत पड़ती है तो सादिक अली उनके लिए कुर्ता, सदरी, पगड़ी और पायजामे तैयार करते हैं। इन दोनों के साथी महबूब आयोध्या के अधिकतर मंदिरों में चौबीसों घंटे बिजली की वयवस्था की जिम्मेदारी निभाते हैं।

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, अब्दुल, सादिक और महबूब वर्षों से राम लला मंदिर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अब्दुल वाहिद को मंदिर की सुरक्षा चाक-चौबंद रखने में सहयोग करने के लिए प्रतिदिन 250 रुपये मिलते हैं। वह बताते हैं कि यह काम करके उन्हें बहुत खुशी मिलती है। सादिक का कहना है कि वह राम जन्मभूमि मंदिर के मुख्य पुरोहित के लिए भी कपड़े तैयार करते हैं, लेकिन उन्हें सबसे ज्यदा संतुष्टि राम लला के लिए वस्त्र तैयार करने में मिलती है। वह बताते हैं कि ईश्वर सबके लिए एक है। बकौल सादिक, उन्होंने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के सभी पक्षकारों के लिए कपड़े तैयार किए हैं। इनमें हनुमानगढ़ी मंदिर के प्रमुख रामचंद्र दास परमहंस भी शामिल रहे हैं। सादिक बताते हैं कि वह और उनका बेटा पिछले 50 वर्षों से कपड़े सिलने का काम कर रहे हैं। सत्तावन वर्ष पुरानी ‘बाबू टेलर्स’ हनुमानगढ़ी मंदिर की जमीन पर ही है, जिसके लिए किराये के तौर पर प्रति माह 70 रुपये का भुगतान करना होता है।

 

बिहार की 13 साल की लड़की, जिसे अंग्रेजी न आई और एशियन बिजनेस विमन ऑफ द इयर

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एक लड़की, जिसे अंग्रेजी नहीं आती थी आज वह ब्रिटेन की सबसे मशहूर शिक्षाविदों में शामिल हैं। बिहार के एक छोटे से शहर सीतामढ़ी की आशा खेमका को अपने जीवन के 25 वर्षों तक अंग्रेजी का ज्ञान तक नहीं था, लेकिन आज उन्होंने आज हजारों अंग्रेज छात्रों की जिंदगियों को बदल दिया। वर्तमान में आशा खेमका ब्रिटेन के प्रख्यात कॉलेज वेस्ट नाटिंघमशायर कॉलेज की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और प्रिंसिपल हैं। उन्हें ‘एशियन बिजनेस विमन ऑफ द इयर’ के सम्मान से नवाजा गया है।

आशा खेमका ने यह बात साबित की है कि अगर मन में चाह है तो कोई भी बाधा मनुष्य को रोक नहीं सकती है। वह कहती हैं, ‘शिक्षा को लेकर अपने जुनून को मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती और यह जुनून हर दिन बढ़ता जा रहा है। मैं इस शानदार क्षेत्र का हिस्सा बन कर बहुत गौरवान्वित महसूस करती हूं।’उनका जन्म बिहार के सीतामढ़ी जिले में एक व्यवसायी परिवार में 21 अक्तूबर 1951 को हुआ था।
आपको जान कर हैरानी होगी कि उन्हें महज 13 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी। एक दिन अचानकवालों ने आशा से कहा कि वह साड़ी पहन कर तैयार हो जाएं। उसे शादी के लिए लड़के वाले देखने आ रहे हैं। आशा खूब रोई, लेकिन घर वालों की इच्छा के सामने उनकी एक न चली और 15 साल की उम्र में उनकी सगाई होगी। उनके होने वाले पति शंकर लाल खेमका तब मेडिकल की पढ़ाई कर रहे थे। शादी के करीब 50 वर्ष बाद भी उनका यह प्रेम जस का तस है। डॉ. शंकर लाल खेमका आज ब्रिटेन के प्रसिद्ध ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं।

1978 में आशा खेमका अपने पति और तीन बच्चों- बेटी शालिनी वथा दो बेटों शील और स्नेह के साथ इंग्लैंड आ गई। जब वह इंग्लैंड आईं तो अंग्रेजी का ज्ञान नहीं था। उनकी शिक्षा भी कुछ खास नहीं थी। यहां आकर वह कई सालों तक अपने घर के कामकाज में ही मशगूल रहीं। साथ ही अपने जैसी महिलाओं के साथ अंग्रेजी में बात करके अंग्रेजी को बेहतर बनाती रहीं।

जब बच्चे कुछ बड़े हो गए तो उन्होंने अपनी अधूरी पढ़ाई फिर शुरू की। फिर कार्डिफ यूनिवर्सिटी से बिजनेस डिग्री हासिल की और उसके बाद अध्यापन के क्षेत्र में कदम रखा। 2006 में वह वेस्ट नॉटिंघम कॉलेज की प्रिंसीपल बनीं। यह कॉलेज इंग्लैंड के सबसे बड़े कॉलेजों में से एक है।

आशा खेमका ‘एसोसिएशन ऑफ कॉलेजेज इन इंडिया’ की चेयरपर्सन भी हैं। उनका एक चैरिटेबल ट्रस्ट भी है ‘द इंस्पायर एंड अचीव फाउंडेशन’। इस ट्रस्ट का उद्देश्य है 16 से 24 साल के उन युवाओं को अपना भविष्य संवारने में मदद करना, जो शिक्षा, रोजगार से वंचित हैं और उनके पास किसी प्रकार का प्रशिक्षण नहीं है।
शिक्षा के क्षेत्र में उनके बेहतरीन योगदान के लिए कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा चुका है। 2013 में उन्हें ब्रिटेन के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक ‘डेम कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर’ से सम्मानित किया जा चुका है। इस सम्मान को महिलाओं के लिए ‘नाइटहुड’ उपाधि के समान माना जाता है। महिलाओं के लिए यह सर्वोच्च ब्रिटिश सम्मान है। आशा इस सम्मान को पाने केवल दूसरी महिला हैं। यह सम्मान पाने वाली पहली भारतीय महिला धार की महारानी लक्ष्मी देवी थीं।

 

नवाबों के शहर लखनऊ को मिली पहली महिला मेयर

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लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की पहली महिला मेयर बनने का मौका आज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संयुक्ता भाटिया को मिला।

देश की पहली महिला राज्यपाल और पहली महिला मुख्यमंत्री देने का गौरव उत्तर प्रदेश को हासिल है और अब नवाबों के शहर लखनऊ को एक सदी में पहली बार आज महिला मेयर मिली है।
भाजपा की संयुक्ता भाटिया ने आज हुई मतगणना में समाजवादी पार्टी की मीरा वर्धन को एक लाख 31 हजार 356 वोटों से हराकर राजधानी के मेयर पद पर अपना कब्जा जमाया। भाटिया को तीन लाख 77 हजार 166 मत मिलें जबकि मीरा को दो लाख 45 हजार 810 वोट मिले।
पिछले 100 साल में लखनऊ की मेयर कोई महिला नहीं बनी थी लेकिन आज यह रिकार्ड टूट गया और संयुक्ता भाटिया पहली महिला मेयर बन गयी। इस बार लखनऊ मेयर की सीट महिला के लिए आरक्षित थी।
भाटिया का परिवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ा रहा है। इनके पति सतीश भाटिया लखनऊ कैंट से बीजेपी विधायक रह चुके हैं।
गौरतलब है कि सरोजिनी नायडू ‘यूनाइटेड प्राविंस’ (अब उत्तर प्रदेश) की पहली राज्यपाल थीं। वह 15 अगस्त 1947 से दो मार्च 1949 तक राज्यपाल रही।
इसी तरह सुचेता कृपलानी के रूप में उत्तर प्रदेश से देश को पहली महिला मुख्यमंत्री भी मिली थी। वह दो अक्तूबर 1963 से 13 मार्च 1967 के बीच मुख्यमंत्री पद पर रही थी। ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन में बढ-चढकर हिस्सा लेने वाली सुचेता कृपलानी महात्मा गांधी के साथ आजादी की लडाई में भागीदार बनी थी। लोकसभा के लिए तीन बार महिलाएं जीतकर पहुंची हैं। लखनऊ से शीला कौल 1971, 1980 और 1984 में चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंची थीं।

उत्तर प्रदेश म्यूनिसिपैलिटी कानून 1916 में अस्तित्व में आया था। बैरिस्टर सैयद नबीउल्लाह पहले भारतीय थे, ​जो स्थानीय निकाय के मुखिया बने।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 1948 में स्थानीय निकाय का चुनावी स्वरूप बदला और प्रशासक की अवधारणा शुरू की। इस पद पर भैरव दत्त सनवाल नियुक्त हुए।
संविधान में संशोधन के जरिए 31 मई 1994 से लखनऊ के स्थानीय निकाय को नगर निगम का दर्जा प्रदान किया गया। वर्ष 1959 के म्यूनिसिपैलिटी एक्ट में मेयर के निर्वाचन के प्रावधान किये गये।

पृथ्वी शॉ अंडर-19 विश्व कप में करेंगे भारत का नेतृत्व

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नयी दिल्ली : मुंबई के उदीयमान बल्लेबाज पृथ्वी शॉ को अलगे साल होने वाले अंडर-19 विश्व कप के लिये चुनी गयी 16 सदस्यीय भारतीय टीम का कप्तान चुना गया है। बीसीसीआई के कार्यकारी सचिव अमिताभ चौधरी ने आज एक विज्ञप्ति में कहा, ‘‘ जूनियर टीम के चयनकर्ताओ ने आईसीसी अंडर-19 क्रिकेट विश्व कप 2018 के लिये टीम का चयन किया हैं। सोलह देशों के बीच होने वाला यह टूर्नामेंट 13 जनवरी से तीन फरवरी 2018 तक न्यूजीलैंड में खेला जायेगा।’’ पिछले साल की उपविजेता भारतीय टीम ने इस खिताब को 2000, 2008 और 2012 में जीता है। गत वर्ष बांग्लादेश हुए विश्व कप के फाइनल में भारतीय टीम वेस्टइंडीज के हाथों हार गयी थी।

भारत के अलावा ऑस्ट्रेलिया (1988, 2002 & 2010) ने भी इस खिताब को तीन बार अपने नाम किया है। टूर्नामेंट की तैयारियों के लिये बेंगलुरु में अभ्यास शिविर लगाया जायेगा। चौधरी ने कहा, ‘‘ विश्व कप की तैयारियों के लिये आठ से 22 दिसंबर तक बेंगलुरु में अभ्यास शिविर का आयोजन किया जायेगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘ शॉ के अलावा बंगाल के पॉरेल को उनकी टीमों से रणजी मैच खेलने की छूट दी गयी है और वे 12 दिसंबर से शिविर में जुड़ेंगे।’’ भारत अंडर-19 टीम: पृथ्वी शॉ (कप्तान), शुभम गिल (उप-कप्तान), मंजोत कालरा, हिमांशु राणा, अभिषेक शर्मा, ऋयान पराग, आर्यण जुयाल (विकेटकीपर), हार्विक देसाई (विकेटकीपर), शिवम मावी, कमलेश नागरकोटि, इशान पॉरेल, अर्शदीप सिंह, अनूकुल रॉय, शिवा सिंह, पंकज यादव।

स्टैंडबाई खिलाड़ी : ओम भोसले, राहुल चहर, निनाद राथवा, उर्विल पटेल और आदित्य ठाकरे ।

मीराबाई चानू ने विश्व भारोत्तोलन चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचा

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नयी दिल्ली : साईखोम मीराबाई चानू विश्व भारोत्तोलन चैम्पियनशिप में पिछले दो दशक से अधिक समय में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय बन गयी। उन्होंने अमेरिका के अनाहेम में यह कारनामा करके रियो ओलंपिक के खराब प्रदर्शन की टीस मिटायी।

भारतीय रेलवे में कार्यरत चानू ने स्नैच में 85 किलो और क्लीन एंड जर्क में 109 किलो वजन उठाया। उन्होंने 48 किलो वर्ग में कुल 194 किलो वजन उठाकर नया राष्ट्रीय रिकार्ड बनाया।

वर्ष 2014 राष्ट्रमंडल खेलों की रजत पदक विजेता चानू ने कहा, ‘‘आज मैंने जो भी हासिल किया है, वह मेरे कोच विजय शर्मा के मार्गदर्शन के बिना संभव नहीं हो पाता। मैंने और मेरे कोच ने शीर्ष स्तर पर सफलता हासिल करने के लिये कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। ’’ उन्होंने कहा, ‘‘रियो ओलंपिक में मैं पदक नहीं जीत सकी थी, वो निराशाजनक था। मैंने रियो में गलतियां की थी और मैं अब भी इससे दुखी हूं। इस पदक ने वो निराशा खत्म कर दी हे। मैं अपनी कमजोरियों पर काम करूंगी और अगले साल राष्ट्रमंडल व एशियाई खेलों तथा तोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने की कोशिश करूंगी। ’’ पोडियम पर खड़े होकर तिरंगा देखकर खुशी से उनके आंसू निकल गए। उनसे पहले ओलंपिक कांस्य पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी ने 1994 और 1995 में विश्व चैम्पियनशिप में पीला तमगा जीता था।

भारतीय भारोत्तोलन महासंघ के महासचिव सहदेव यादव ने अनाहेम से पीटीआई से कहा, ‘‘हमें 24 साल के बाद भारोत्तोलन में पदक मिला, यह एक शानदार उपलब्धि है। बल्कि यह ओलंपिक से ज्यादा बड़ी उपलब्धि है क्योंकि विश्व चैम्पियनशिप में काफी कठिन, काफी मजबूत खिलाड़ियों का पूल होता है। ’’ उन्होंने कहा, ‘‘मैं मीराबाई और कोच विजय शर्मा दोनों को ही इस बड़ी उपलब्धि के लिये बधाई देना चाहूंगा। कोच ने उन्हें बहुत अच्छी तरह ट्रेनिंग दी और वह उसकी सफलता के लिये श्रेय के हकदार हैं।

फूल और अन्य कचरे से बनेगी हवन सामग्री

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नयी दिल्ली : दिल्ली में विभिन्न समारोहों, धार्मिक स्थलों, होटलों और शमशान घाटों से निकलने वाले फूल और अन्य पूजा सामग्री के कचरे से हवन सामग्री बनाने का अभियान निगमबोध घाट से शुरू किया गया है।

केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डा. हर्षवर्धन ने आज निगमबोध घाट पर हरित कचरा पुनर्चक्रण मशीन का उद्घाटन करते हुये कहा कि धार्मिक स्थलों से फूल और अन्य पूजा सामग्री को नदी में प्रवाहित करने से रोकते हुये हवन सामग्री बनाने से पर्यावरण को लाभ होगा। निगमबोध घाट पर फूल और पूजा सामग्री का सबसे ज्यादा हरित कचरा निकलता है।

यहां प्रतिदिन निकलने वाले हरित कचरे का इस मशीन से निस्तारण कर खाद बनायी जायेगी। स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ी संस्था क्लीन इंडिया वेंचर्स द्वारा विकसित की गयी यह मशीन सांसद निधि से लगायी गयी है। मशीन से बनी हवन सामग्री को निशुल्क वितरित किया जायेगा। उन्होंने कहा कि इससे नगर निगमों को भी ट्रकों में भरकर पूजा सामग्री लैंडफिल साइट तक भेजने की जिम्मेदारी से मुक्ति मिलेगी। उन्होंने इस मशीन को धार्मिक स्थलों के अलावा मंडियों और होटलों सहित उन सभी स्थानों पर लगाने की जरूरत पर बल दिया जहां से नियमित तौर पर हरित कचरा निकलता है।

वैज्ञानिकों ने रोबोट को बना दिया नेता, 2020 में लड़ेगा चुनाव

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मेलबर्न : वैज्ञानिकों ने दुनिया का पहला कृत्रिम बुद्धि वाला राजनीतिज्ञ विकसित किया है जो आवास, शिक्षा, आव्रजन संबंधी नीतियों जैसे स्थानीय मुद्दों पर पूछे गए सवालों के जवाब दे सकता है। इतना ही नहीं, उसे 2020 में न्यूजीलैंड में होने वाले आम चुनाव में उम्मीदवार बनाने की तैयारियां भी जोरों पर हैं । इस आभासी राजनीतिज्ञ का नाम ‘सैम’ (एसएएम) रखा गया है और इसके रचनाकार न्यूजीलैंड के 49 वर्षीय उद्यमी निक गेरिट्सन हैं। उन्होंने कहा ‘‘ऐसा लगता है कि फिलहाल राजनीति में कई पूर्वाग्रह हैं … प्रतीत होता है कि दुनिया के देश जलवायु परिवर्तन एवं समानता जैसे जटिल मुद्दों का हल नहीं निकाल पा रहे हैं।’’ कृत्रिम बुद्धि वाला राजनीतिज्ञ फेसबुक मेसेन्जर के जरिए लोगों को प्रतिक्रिया देना लगातार सीख रहा है। गेरिट्सन मानते हैं कि एल्गोरिदम में मानवीय पूर्वाग्रह असर डाल सकते हैं। लेकिन उनके विचार से पूर्वाग्रह प्रौद्योगिकी संबंधी समाधानों में चुनौती नहीं हैं।

‘टेक इन एशिया’ की खबर में कहा गया है कि प्रणाली भले ही पूरी तरह ‘‘सटीक’’ न हो, लेकिन यह कई देशों में बढ़ते राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अंतर को भरने में मददगार हो सकती है।

न्यूजीलैंड में साल 2020 के आखिर में आम चुनाव होंगे। गेरिट्सन का मानना है कि तब तक सैम एक प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरने के लिए तैयार हो जाएगा।