Monday, April 6, 2026
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भारतीय पुरुषों में बढ़ रही है खूबसूरती की चाहत

अब तक सजना-संवरना महिलाओं का काम समझा जाता था. पुरुष तो शादी-ब्याह या कुछ खास समारोहों के मौके पर ही थोड़ा-बहुत इत्र-फुलेल और क्रीम लगा लेते थे. लेकिन भारत में अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। भारतीय पुरुष भी सजने-संवरने और सौंदर्य प्रसाधनों पर खर्च के मामले में महिलाओं से पीछे नहीं हैं। दिलचस्प बात यह है कि आम धारणा के विपरीत भारतीय पुरुष यह सब महिलाओं को आकर्षित करने के लिए नहीं करते। दूसरों से स्मार्ट और बेहतर दिखने की चाहत और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए लोग अब खुल कर ब्यूटी पार्लरों में जाकर अपनी जेबें ढीली कर रहे हैं। इसके साथ ही वे अब कास्मेटिक सर्जरी से भी नहीं हिचक रहे हैं। एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय पुरुष हर साल सजने-संवरने पर 50 अरब रुपये की भारी–भरकम रकम खर्च कर देते हैं और यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है।

स्टडी रिपोर्ट

मार्केट रिसर्च करने वाली कंपनी नीलसन के एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय पुरुष हर साल अपने सजने-संवरने की चाहत में पांच हजार करोड़ रुपये खर्च कर देते हैं। कुछ साल पहले तक इस बारे में कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। रिपोर्ट के मुताबिक पुरुष यह रकम महिलाओं को आकर्षित करने के लिए नहीं बल्कि दफ्तरों या कामकाज की जगह पर दूसरों से बेहतर व स्मार्ट दिखने के लिए करते हैं।

नीलसन की रिपोर्ट में कहा गया है कि अब एक दशक पहले के मुकाबले पुरुष भारी तादाद में फेसवाश और क्रीम खरीद रहे हैं। वर्ष 2009 से 2016 के दौरान चेहरा साफ करने वाली क्रीमों (फेस क्रीम्स) की बिक्री में 60 गुनी वृद्धि हुई है। पुरुषों में सजने-संवरने की तेजी से बढ़ती चाहत की वजह से अब तमाम कंपनियां उनके लिए लगभग हर महीने नए-नए उत्पाद बाजार में उतार रही हैं। कुछ साल पहले तक पुरुषों की सौंदर्य प्रसाधन सामग्री के नाम पर एकाध फेसवाश और बोरोलीन क्रीम ही बाजार में उपलब्ध थी लेकिन अब ऐसे सैकड़ों उत्पाद उपलब्ध हैं। पुरुषों की सौंदर्य प्रसाधन सामग्री बनाने वाली कंपनियों के लिए साल 2017 तो वरदान साबित हुआ है।

तेजी से बढ़ता बाजार

पुरुषों की सौंदर्य सामग्री पर टेकसी के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि 2020 तक इस बाजार के सालाना 20 से 22 फीसदी की दर से बढ़ने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार प्रति व्यक्ति सालाना आय में वृद्धि, शहरी मध्यवर्ग की आबादी बढ़ने और पुरुषों में सुंदर दिखने की बढ़ती चाहत के चलते यह बाजार तेजी से बढ़ रहा है। ऐसा सिर्फ महानगरों में ही नहीं छोटे-छोटे शहरों में भी हो रहा है। पुरुषों में इस बढ़ती चाहत को भुनाने के लिए अब टीवी पर भी पुरुष सौंदर्य प्रसाधनों के विज्ञापनों की भरमार हो गई है। पहले महज गोरे होने की क्रीम के विज्ञापन ही नजर आते थे लेकिन अब प्रचार के मामले में यह महिला सौंदर्य प्रसाधनों से पीछे नहीं है।

व्यापार संगठन एसोचैम की 2016 की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय सौंदर्य उत्पादों का बाजार साढ़े छह अरब अमेरिकी डॉलर का है जिसके वर्ष 2025 तक बीस अरब डॉलर होने की उम्मीद है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारतीय पुरुषों में सौंदर्य के प्रति बढ़ती जागरूकता की वजह से बीते पांच वर्षों में सौंदर्य प्रसाधन का बाजार 42 फीसदी से अधिक बढ़ा है। सौंदर्य प्रसाधनों पर भारतीय किशोरों का औसतन मासिक खर्च बीते एक दशक में तीन से चार गुना बढ़ गया है।

लुक को लेकर जागरुक

सौंदर्य विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की आबादी में से लगभग आधे लोगों के 18 से 30 साल के आयुवर्ग में होने के कारण आने वाले वर्षों में पुरुष सौंदर्य प्रसाधन सामग्री का बाजार तेजी से बढ़ने की संभावना है।एसोचैम ने भी अपनी एक स्टडी में खुलासा किया कि देश में 18 से 25 साल की उम्र वाले पुरुष अपने संजने-संवरने और सौंद्रय प्रसाधनों पर महिलाओं के मुकाबले ज्यादा खर्च करते हैं।

पहले पुरुषों के किट में कंघी, सेविंग के सामान, डियोडोरेंट और बालों में लगाने के जेल के अलावा कुछ और नहीं होता था। अब बाल काटने वाले ज्‍यादातर हेयर कटिंग सैलून अब पुरुषों के ब्यूटी पार्लर के रूप में बदल गए हैं। पुरुष अब अच्छे लुक के प्रति काफी जागरुक हैं। वह अपने शरीर को फिट रखने के साथ ही सजने-संवरने पर भी दिल खोल कर खर्च कर रहे हैं। ऑडिट कंपनी केपीएमजी के मुताबिक 2018 के अंत तक भारत में सौंदर्य प्रसाधन सामग्री का सालाना कारोबार बढ़ कर 800 अरब का आंकड़ा पार कर लेगा।

 

टल सकता है हार्ट अटैक का खतरा

चिकित्सकों का मानना है कि रोजाना 20 हजार से ज्यादा लोगों की मौत अचानक आए हार्ट अटैक से हो जाती है। भारत में ऐसे केस अन्य देशों की तुलना में ज्यादा देखने को मिले हैं। उन्होंने कहा कि हॉर्ट अटैक का खतरा 99% तक टाला जा सकता है, अगर आप नियमित स्वास्थ्य परीक्षण करवाते हैं।

उन्होंने कहा कि 30 की उम्र पार करने के बाद सभी को नियमित रूप से स्वास्थ्य की जांच करानी चाहिए। हॉर्ट अटैक के लक्षण को पहचानना बड़ी बात नहीं। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण से आसानी से पता चल जाता है कि शरीर में कहां क्या खामी है और समय रहते इन खामियों को दूर हार्ट अटैक जैसे खतरे से बचा जा सकता है।

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में हृदयरोग की आशंका अधिक

शोध में पता चला है कि महिलाओं में मानसिक तनाव के कारण हृदयरोग की आशंका पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक होती है। जॉर्जिया स्थित इमोरी यूनीवर्सिटी में हुए शोध में हार्ट अटैक झेल चुकी महिला मरीजों के आंकड़ों पर अध्ययन किया गया।

इस अध्ययन में कहा गया है कि मानसिक तनाव के कारण मायोकॉर्डियल इस्कीमिया की समस्या हो जाती है। इसके कारण हृदय की मांसपेशियों में रक्त का प्रवाह असंतुलित हो जाता है। यह शोध अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन में प्रकाशित हुआ है।

इसमें कहा गया है कि हृदय की बीमारी से जूझ रही महिलाओं को उबरने के लिए पुरुषों की अपेक्षा गहन देखभाल की जरूरत होती है। मानसिक तनाव भी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं के हृदय की सेहत को अधिक प्रभावित करता है। इससे पहले हुए शोध में यह तो साबित हुआ था कि मानसिक तनाव से महिलाओं को हृदय रोग का खतरा अधिक होता है, लेकिन किस हद तक यह स्पष्ट नहीं हुआ था।

प्रमुख शोधकर्ता वोइला वकारिनो का कहना है कि मायोकॉर्डियल इस्कीमिया में हृदय की मांसपेशियों में रक्त का प्रवाह कम हो जाता है। यह हृदय की धमनियों के पूरी तरह अवरुद्ध होने के कारण हो सकता है। इस शोध के लिए हार्ट अटैक के कारण अस्पताल पहुंचने वाली 61 साल की उम्र की डेढ़ सौ महिलाओं और 156 पुरुषों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया।

डॉ. वकारिनो का कहना है कि महिलाएं इस्कीमिया के प्रति अधिक संवेदनशील इसलिए होती हैं क्योंकि उनकी छोटी रक्त धमनियों में प्रवाह बाधित हो जाता है। यह स्थिति अक्सर भावनात्मक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इस कारण महिलाओं में कोई लक्षण न होने के बावजूद इस्कीमिया की आशंका अधिक रहती है।

असंतुलित प्रवाह होता है दुश्मन

मायोकॉर्डियल इस्कीमिया के कारण हृदय की मांसपेशियों में रक्त प्रवाह असंतुलित हो जाता है। यह हृदय की धमनियों के पूरी तरह अवरुद्ध होने के कारण हो सकता है।

दिल के लिए खतरनाक हैं ये लक्षण

माना जाता है कि हार्ट अटैक इंसान को कभी भी आ सकता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हार्ट अटैक आने के संकेत महीने भर पहले से ही मिलने शुरू हो जाते हैं। हार्ट अटैक के पहले कई रोगियों ने हाथ, जबड़े, दांत या सिर में दर्द की शिकायत की है।

सीने में जलन या बदहजमी- अगर आपके सीने में लगातार जलन हो रही है या फिर आप बदजहमी की समस्या से जूझ रहे हैं तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। ठीक ना होने वाली बदहजमी हार्ट अटैक का एक संकेत हैं।

सांस लेने में समस्या- सांस लेने में समस्या हो रही है या फिर पूरी तरह से सांस लेने के बाद भी आपको सांस की कमी महसूस हो रही है तो यह हार्ट अटैक का संकेत हो सकता है।

उल्टी- बार-बार उल्टी और पेट में दर्द भी हार्ट अटैक से पहले दिखने वाले लक्षणों में शामिल है।

कंधों में दर्द- हाथ के अलावा अगर लगातार आपके कंधों में दर्द हो रहा है या फिर अपर बैक में दर्द हो रहा है तो सावधान हो जाएं। हार्ट अटैक के पहले कई रोगियों में यह लक्षण दिखा है।

 

स्कूटी चलाते समय धूप से बचें इस तरह

अब गर्मियों का मौसम आ गया है, आपको अपना और अपनी त्वचा का खास ख्याल रखने की ज़रूरत है। हम में से लड़कियाँ कॉलेज या ऑफिस अपनी स्कूटी से जाती हैं। धूप से बचने की चाहे जितनी भी सलाह दी जाये पर ये तो सच है कि हम चाहे भी तो धूप में घर या किसी एक बंद कमरे में बैठे नहीं रह सकते और न ही हम धूप को तो कम नहीं कर सकते हैं। त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए कुछ ऐसा जरूर किया जा सकता है कि स्कूटी चलाते वक्त कम से कम प्रभाव पड़े।

स्कूटी चलाते हुए हमेशा हेलमेट लगाएं, लेकिन हेलमेट से बाल झड़ने की समस्या होने लगती है। हेलमेट में मोटे अस्तर के चलते ये पसीना ज़्यादा सोखता है, जिससे बैक्टीरिया पैदा होते हैं और ये आपके बालों की जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं। इससे बचने के लिए आप पहले स्कार्फ बांधे और फिर हेलमेट लगाएं। स्कार्फ को सिर्फ सिर पर ही नहीं पूरे चेहरे पर बांधे, ताकि आपकी त्वचा भी धूप से बच सके।

स्कूटी चलाते हुए सनग्लासेज़ आपको ना सिर्फ धूप से बचाएंगे, बल्कि धूल से भी आंखों की रक्षा करेंगे। ड्राइव करते हुए ऐसे सनग्लासेज़ चुनें, जो आपकी आंखों को पूरी तरह से ढ़कें।

गर्मियों में हम स्लीवलेस या हाफ स्लीव्ज़ कपड़े पहनते हैं लेकिन इससे हाथों पर टैनिंग होने लगती है आप कितना भी ग्लव्ज़ पहनें पर थोड़ा हिस्सा रह ही जाता है इसलिए स्कूटी चलाते वक्त समर कोट पहन लें। समर कोट हल्के फैब्रिक के होते हैं, जिससे आपको गर्मी भी नहीं लगेगी. अगर आप समर कोट नहीं खरीदना चाहती हैं तो अपनी किसी फुल स्लीव्ज़ कॉटन शर्ट को भी पहन सकती हैं।

सिर्फ हाथ ही नहीं, हथेलियों को भी धूप से बचाना ज़रूरी है. इसलिेए ग्लव्ज़ पहना करें। ग्लव्ज़ जितने सिंपल हो उतने अच्छा है, अजीब से प्रिंटेड ग्लव्ज़ आपके लुक को बिगाड़ सकते हैं।

गर्मियों में जूते या आगे से बंद फुटवेयर पहनना किसी को नहीं पसंद, लेकिन स्कूटी चलाते वक्त इंजन और सड़क की हीट से पैर की त्वचा खराब होने लगती हैं क्योंकि पैर धूप में रहते हैं। इससे बचने के लिए आप स्नीकर्स पहनें और अगर आप स्नीकर्स नहीं पहनना चाहती हैं तो क्लोज़ टो फुटवेयर ज़रूर पहनें। वैसे आप जुराबें भी पहन सकती हैं, लेकिन कॉलेज पहुंचने पर इसे उतार दें। इन सब चीज़ों के अलावा घर से निकलते हुए सनस्क्रीन लगाना कभी ना भूलें। अपनी त्वचा के हिसाब से सही SPF वाली सनस्क्रीन चुनें।

(साभार – फैशन 101)

दिल्ली की रेड लाइट में जन्मे बच्चों की ‘गुरु’ हैं ये महिला

वीडियो साभार – अमर उजाला टीवी

जिन बच्चों को उनके पिता का नाम नहीं मिला। जिन औलादों की मां अपने पास इस डर से नहीं रखती कि उनके बच्चे उस पेशे के बारे में ना जान पाएं। इन बच्चों का ललिता ना सिर्फ ख्याल रखती हैं बल्कि उन्हें शिक्षित भी करती हैं।

कहानी से संवाद की समीक्षा…डॉ. आशुतोष द्वारा

2018 में प्रकाशित कहानी से संवाद युवा आलोचक डाॅ.मृत्युंजय पांडेय की दूसरी पुस्तक है।इसमें 18 कहानीकारों की 25 कहानियों पर आलोचक ने तफसील से अपनी खुद की बातें रखी हैं।

 

भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी का वर्चस्व संस्कृति विहीन कर देगा

कोलकाता :  भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी का बढ़ता वर्चस्व उनके अस्तित्व पर खतरे की तरह है जिसका सामना हिंदी सहित सभी भाषाओं को मिल कर करना होगा। भारतीय भाषाओं में वे छोटी-छोटी भाषाएँ भी हैं जिनमें देश की विभिन्न जातियों की संस्कृति सुरक्षित हैं। अंग्रेजी सीखना या उससे ज्ञान प्राप्त करना कभी गलत नहीं है पर अपनी भाषा की उपेक्षा और उसमें ज्ञान-विज्ञान का अभाव देश में उपस्थित एक बड़े संकट की तरह देखा जाना चाहिए। केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली और भारतीय भाषा परिषद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन भारतीय भाषाओं पर अंग्रेजी के वर्चस्व पर विद्वानों की चर्चा में उपर्युक्त मुद्दे उठे। प्रियंकर पालीवाल ने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं के लिए एक दुर्ग की तरह है। यदि यह दुर्ग टूट गया तो भी कोई अन्य भारतीय भाषा नहीं बचेगी। इसलिए हिंदी पर जिम्मेदारी ज्यादा है। प्रो वेदरमण ने कहा कि हिंदीतर भाषी यदि तमिल या उड़िया में अपनी बात रखते हैं और यदि एक भी व्यक्ति समझ नहीं पाता तो यह हमारी कमी है। हर हिंदी भाषी को दक्षिण भारत की कम से कम एक भाषा जरूर सीखनी चाहिए। हिंदी के आदिवासी कवि अनुज लुगुन ने कहा कि भाषा और वर्चस्व के संबंध को एक व्यापक आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। डॉ.अवधेश प्रसाद सिंह ने बताया कि अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प, आत्म विश्‍वास और अपनी भाषा को ज्ञान-विज्ञान के भंडार से भरने की जरूरत है। प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि अंग्रेजी का वर्चस्व सांस्कृतिक साम्राज्यवाद ला रहा है जिसका मुकाबला जमीनी स्तर से करना होगा। ओड़िया की प्रसिद्ध कथाकार ममता दाश ने कहा कि अंग्रेजी सभी भारतीय भाषाओं में घुसती जा रही है। इसके लिए युवा पीढ़ी को विशेष रूप से सचेत होना होगा। सभा की अध्यक्षता करते हुए प्रो राजश्री शुक्ला ने कहा कि दयानंद सरस्वती ने गुजराती होते हुए भी केशवचंद्र सेन के कहने पर हिंदी में सामाजिक सुधार का प्रचार किया। यदि समाज में कोई वास्तविक परिवर्तन लाना हो तो वह भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही लाया जा सकता है। संचालन करते हुए प्रो विवेक सिंह ने कहा कि हिंदी को बाजार की भाषा ही नहीं बल्कि इस उदात्त संस्कृति की भाषा समझना चाहिए।

भारतीय भाषाओं की अंतर्दृष्टि पर दूसरे सत्र में चर्चा करते हुए हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि अंतर्दृष्टि के निर्माण में लोकजीवन और संस्कृति की एक बड़ी भूमिका होती है। फिल्मों ने हिंदी का काफी प्रसार कर दिया है। फिर भी यदि मातृभाषाओं को बचाना है तो सबसे पहले स्त्रियों को अपने बच्चों को मातृभाषा से प्रेम करना सिखाना होगा। दूसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध बांग्ला कथाकार रामकुमार मुखोपाध्याय ने कहा कि भारतीय भाषा परिषद भारतीय भाषाओं को जोड़ने का एक बड़ा काम कर रही है और सांस्कृतिक संवाद का ऐतिहासिक महत्व है। संगोष्ठी में तमिल लेखक मालन व्ही.नारायणन, हरियाण साहित्य अकादमी की निदेशक कुमद बंसल, ओड़िया लेखक रंजन प्रधान, बर्दवान विश्‍वविद्यालय के शशि कुमार शर्मा और केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, नई दिल्ली के विनोद संदलेश ने भी अपने विचार व्यक्त किए। संचालन पूजा गुप्ता ने किया। तीसरे सत्र का धन्यवाद परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार ने और समापन सत्र का धन्यवाद ज्ञापन परिषद की अध्यक्ष डा.कुसुम खेमानी ने किया।

इसके पहले समारोह के पहले दिन केंद्रीय हिंदी निदेशालय और भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेते हुए हिंदी की प्रसिद्ध कथाकार मैत्रेयी पुष्पा ने कहा कि संस्कृति का मामला बहुत संवेदनशील होता जा रहा है। स्त्रियों की दशा जिस समाज में खराब हो उस समाज की संस्कृति कभी उच्च नहीं हो सकती। सिर्फ दिखावे के लिए नारी दिवस मनाने का कोई अर्थ नहीं है अगर परिवार और समाज में उसका स्थान ऊँचा न हो। अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि भारत की विभिन्न जातियों और संस्कृतियों के बीच दूरियाँ हो सकती हैं पर उनके बीच संवाद भी जरूरी है। यह चिंता का विषय है कि आज मूर्तियों को दूध से नहलाया जा रहा है जबकि इन्सान को खून से। पश्‍चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. केशरीनाथ त्रिपाठी ने अलंकरण समारोह और केंद्रीय हिंदी निदेशालय, नई दिल्ली के साथ मिल कर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए यह कहा। उन्होंने अपनी शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि भारतीय भाषा परिषद द्वारा सम्मानित साहित्यकारों को इन पुरस्कारों के अलंकरण से उनकी कलम में और ताकत पैदा हो और वे समाज को अपनी कृतियों से समृद्ध करें।

भारतीय भाषा परिषद में ममता दाश (ओड़िया), मालन व्ही. नारायणन (तमिल) और मैत्रेयी पुष्पा (हिंदी) को उनके समग्र कृतित्व के लिए सम्मानित किया गया। कवि एकांत श्रीवास्तव को साहित्य सारस्वत सम्मान प्रदान किया गया। इनके अलावा युवा पुरस्कार दिया गया- रंजन प्रधान (ओड़िया), राम मोरी (गुजराती), एम.हरिकृष्णन (तमिल) और अनुज लुगुन (हिंदी) को। कर्तृत्व समग्र सम्मान में प्रत्येक को एक-एक लाख रुपए, अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न प्रदान किए गए। युवा पुरस्कार में प्रत्येक को 21 हजार रुपए दिए गए। कर्तृत्व समग्र सम्मान अरुण सुरेका, रवींद्र चमड़िया और संजीव अग्रवाल के सौजन्य से प्रदान किया गया।

तमिल लेखक मालन व्ही. नारायणन ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय भाषा परिषद का यह पुरस्कार इसलिए विशेष महत्व रखता है कि यह संस्था गैर सरकारी है और भारतीय भाषाओं के बीच यह सच्चे रूप में सेतु बंधन का काम कर रही है। अतिथियों का स्वागत और अभिनंदन पत्र का वाचन परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने किया। संचालन सुशील कान्ति ने और धन्यवाद ज्ञापन परिषद के मंत्री श्री नंदलाल शाह ने किया।

संगोष्ठी में  प्रो.इतु सिंह, पुष्पेंद्र शर्मा, राम मोरी और केंद्रीय हिंदी निदेशालय की सहायक निदेशक मधु संदलेश ने अपना वक्तव्य रखा। संगोष्ठी का संचालन किया पीयूष कांत राय ने और धन्यवाद दिया विनय बिहारी सिंह ने।

 

 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में कवियित्री सम्मेलन

कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद के सभागार में साहित्यिकी संस्था द्वारा महिला दिवस के उपलक्ष्य में कवियित्री सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का प्रारंभ साहित्यिकी के 28वें अंक के लोकार्पण से हुआ।तत्पश्चात बांग्ला की सुप्रसिद्ध कवयित्री नवनीता देवसेन ने पाणिग्रहण, अंतरा,बाटी टा,एबार आमार ग्रहण करो कोलकाता कविताओं का भाव प्रवण पाठ किया।उन्होंने कहा -कविता ही मेरा पहला और आखिरी भरोसा है। हिंदी भाषा की कवयित्री उमा झुनझुनवाला ने कहा-कोलकाता ने मुझे बनाया है और मुझे यहाँ का एक एक व्यक्ति प्रिय है।उन्होंने एक आम आदमी का संलाप,सत्य क्या है और ऐ औरत कविताएँ सुनाईं। निर्मला तोदी ने मेरे शब्द,अशोक के फूल, रश्मि भारती ने संवेदना,कल्पना झा ने पराजित पिता,सरिता कुमारी ने भई यह कलयुग है, प्रभामयी सामंतराय ने औरत आदि कविताएँ पढ़ीं। सदस्याओं में विनोदिनी गोयनका,कुसुम जैन,किरण सिपानी,विद्या भंडारी,सुषमा हंस, वाणी श्री बाजोरिया, मंजुरानी गुप्ता, उषा श्राफ,वसुंधरा मिश्रा, पूनम पाठक,वाणी मुरारका,नुपुर जायसवाल, मीना चतुर्वेदी,संगीता चौधरी ने स्वरचित कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम का कुशल संयोजन एवं संचालन विद्या भंडारी ने किया।उन्होंने कहा-आज की कविता समय से जुड़ी है। स्वागत किरण सिपानी ने किया । व्यवस्था में सहयोग और सभी को धन्यवाद  दिया कुसुम जैन ने। कार्यक्रम में कवि शैलेन्द्र, गीतेश शर्मा, नवल शर्मा,गिरिधर राय,रावल पुष्प, नवरतन भंडारी, नंदलाल शाह जैसे गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही।

मेरी आदत हो तुम 

वसुन्धरा मिश्र

मेरी आदतों में तुम कैद हो
इल्जाम मुझ पर लगाया
प्यार की ये कैसी कशिश है कि
सिर्फ अपने कामों के लिए
मेरी आदतों से बंधे
नया नाम दे मुझे ही बांधने चले।
उठते – बैठते – सोते – जागते
सिर्फ तुम्हारी जरूरतों को पूरा कर
दरकिनार कर मुझे बहलाते रहे
नया नाम देकर खुश करते रहे
जब चाहे घर को भी छिनते रहे
आदत है प्यार से मारने की
धमकी देने की
ऐसी आदतें तो तुम्हारे लिए है
झेलना तो मुझे है
जिसकी आदत भीतर ही भीतर कहीं कचोटती है पर आदत तो आदत है

 

प्रेमचंद के उपन्यास में नारी का आदर्श रूप : ‘गबन’ के संदर्भ में

डॉ. साधना झा

हिन्दी साहित्य में प्रेमचंद का प्रादुर्भाव एक अविस्मरणीय घटना है । उन्होंने कथा साहित्य को तिलस्म एवं चमत्कार के आश्चर्यजनक काल्पनिक दुनिया से बाहर निकलकर ठोस धरातल प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य किया । डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी ने ‘हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास’ में प्रेमचंद के साहित्यिक योगदान के संदर्भ में लिखा है —“प्रेमचंद हिन्दी उपन्यास की वयस्कता की प्रभावशाली उद्घोषणा है । सामाजिक यथार्थ की जिस समस्या को उनके पूर्ववर्ती उपन्यासकारों ने आदर्श एवं यथार्थ के खानों में बांटकर देखा था, उसे प्रेमचंद एक संपृक्त एवं संश्लिष्ट रूप में समझते हैं” ।[i]

प्रेमचंद युगीन भारतीय समाज में औरतों को किसी भी प्रकार का अधिकार प्राप्त नहीं था । स्त्रियां सामाजिक तथा राजनीतिक स्तर पर निर्णायक भूमिका में नहीं थी । स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह, अनमेल-विवाह, विधवा-विवाह, स्त्रियों की आर्थिक सुरक्षा इत्यादि का सवाल उस समय के हिन्दी भाषी समाज के लिए चिंतन का विषय था । प्रेमचंद अपने समय के इन ज्वलंत सवालों से टकराते हैं । ये सवाल आज भी हिन्दी भाषी प्रगतिशील लेखकों के लिए चिंतन का विषय बना हुआ है । भारत के स्वाधीनता आंदोलन में हिन्दी प्रदेश की आधी आबादी की कोई हिस्सेदारी नहीं थी । प्रेमचंद इसका कारण पितृ-सत्तात्मक समाज को मानते हैं । उन्होंने अपने साहित्य के माध्यम से इस पुरूष वर्चस्व को तोड़ने का प्रयास किया है । राम विलास शर्मा ने प्रेमचंद को साहित्य के द्वारा सामंती संस्कारों पर चोट करने वाला कहा है —“प्रेमचंद अपने उपन्यासों में नए ढंग के नारी पात्रों को रच रहे थे जो अन्याय और दुःख सहती हैं लेकिन उनका विरोध भी करती हैं । यदि नारी घुट-घुटकर मरा करे और सामाजिक रुकावटों का विरोध न करे तो कुछ लोग इसे बहुत गंभीर मनोविज्ञान समझते हैं । वास्तव में उससे उनके सामंती संस्कारों को संतोष होता है जिनके वश में रहकर वे नारी को दासी ही बनाकर रखना चाहते हैं” ।[ii]

प्रेमचंद के नारी पात्र सामंती संस्कारों से या तो मुक्त थी या उससे मुक्ति के लिए संघर्षरत् थी । इसका सशक्त उदाहरण ‘गबन’ की नायिका जालपा है । जालपा का आचरण इस समाज का हिस्सा होने के कारण उसके अनुकूल तथा अनुरूप था । यही कारण है कि वह गहनों से प्यार करती है । उसका गहनों से प्रेम सामंती संस्कार का पोषक है । परन्तु प्रेमचंद ने जालपा को विभिन्न परिस्थितियों में रखकर उसमें सकारात्मक परिवर्तन दिखाते हुए उसके ‘स्व’ का विस्तार करते हैं । इसके पीछे उनका उद्देश्य यह बताना है कि आधुनिक स्त्रियां मात्र सज-संवरकर ही नहीं रह सकतीं वरन् सामाजिक और राजनीतिक भूमिका भी निभा सकती हैं । उपन्यास का कथा ज्यों-ज्यों विकसित होता है, जालपा का चरित्र त्यों-त्यों सामंती संस्कारों से मुक्त होते चलता है । कथाकार ने मध्य-वर्गीय नारियों की विडंबनापूर्ण स्थिति के संदर्भ में जालपा का एक नया उदाहरण रखा है तथा उसके चरित्र के माध्यम से मध्य-वर्ग की अनंत संभावनाओं को प्रस्तुत किया है । जिस तरह जालपा ने अपने स्वत्व को पहचाना, रमानाथ का मध्य-वर्गीय भटकाव दूर किया तथा राष्ट्रीय आन्दोलन में हिस्सा लिया, वह विडंबनाओं और अंतर्विरोधों से घिरे मध्य-वर्ग के लिए प्रेरणा का स्रोत है । राम विलास शर्मा लिखते हैं —“प्रेमचंद के नारी पात्रों में जालपा एक नए ढंग की स्त्री है । वह परिस्थितियों से टक्कर लेती है लेकिन कभी धैर्य नहीं खोती । भारी-से-भारी मुसीबत पड़ने पर वह विवेक से काम लेती है और कठिनाइयों का सामना करने के लिए नए-नए दांव पेंच निकाल लेती है । वह निर्मला के तरह घुल-घुलकर प्राण देने वाली नहीं है और न सुमन की तरह तैश में आकर जल्दी ही किसी अनजानी राह पर कदम उठाने वाली । उसका चरित्र कठिनाइयों का सामना करते हुए बराबर निखरता रहता है, क्योंकि वह अपनी खामियों को पहचान सकती है । वह एक ईमानदार और साहसी स्त्री है” ।[iii]

डॉ. बच्चन सिंह ने भी स्वीकार किया है कि जालपा प्रेमचंद की नारी पात्रों में सबसे अलग है । उसके चरित्र का उतरोत्तर विकास होता है और वह यथास्थितिवाद की सीमा का अतिक्रमण करने में सफल होती है । उन्होंने ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास’ में लिखा है —“इसके पहले प्रेमचंद की नारियां अपनी-अपनी स्थितियों में कैद हैं किन्तु जालपा इस कैद को लांघ जाती है” ।[iv]

प्रेमचंद ‘गबन’ के नारी पात्रों के माध्यम से कई सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों को हमारे समक्ष रखते हैं । ‘गबन’ उपन्यास में कुल पांच महिला पात्र –- जालपा, रतन, जोहरा, जग्गो तथा जागेश्वरी हैं । जिनमें जागेश्वरी एकमात्र परम्परागत महिला चरित्र है । जिसकी सीमा घर की चारदीवारी है । वह परम्परा से तय भूमिका (मां, पत्नी) को ही निभाती है । सत्ता (परिवार, समाज या राजनीति) में उसकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं रहती है । जालपा भी जब तक घर की चारदीवारी के भीतर रहती है, तब तक वह बहू और पत्नी की ही भूमिका तक सीमित रहती है । वह अपनी जिम्मेदारियों का विस्तार रमानाथ के घर से जाने के पश्चात् ही करती है । यहीं से सत्ता में उसकी हिस्सेदारी भी शुरू होती है और उत्तरोतर उसके व्यक्तित्व में निखार भी आने लगता है । ए. अरविन्दाक्षन के अनुसार —“मध्यवर्गीय मानसिकता को स्त्री संदर्भ में ‘सेवा-सदन’ और ‘निर्मला’ में प्रस्तुत किया गया है तो उसे राष्ट्रवादी और राजनीतिक संदर्भ में देखने-परखने का कार्य प्रेमचंद ने ‘गबन’ में किया है” ।[v]

प्रेमचंद के उपन्यासों में नारी अपनी पूर्ण आदर्श रूप में (देवी रूप में) उपस्थित है । उन्होंने आदर्श भारतीय नारी की परिकल्पना करते हुए उसके चरित्र को सभी प्रकार की दुर्बलताओं से मुक्त रखा है । आलोच्य उपन्यास के नारी पात्रों में भी आदर्श का समावेश हुआ है । भले ही उपन्यास की समस्या नारी से संबंधित है, उनके आभूषण-प्रेम से, परन्तु प्रेमचंद इसकी जिम्मेदारी पुरुष के कंधे पर ही डालते हैं —“स्त्री के लिए काम-काज के दरवाजे बंद होंगे तो वह जरुर गहनों के लोक में घुमती रहेगी” ।[vi]

प्रेमचंद पितृ-सत्तात्मक समाज में बच्चियों के मन में उत्पन्न कुसंस्कारों के लिए परिवार और माता-पिता को जिम्मेदार मानते हैं । उन्होंने जालपा के माध्यम से इस बात को रेखांकित किया है कि माता-पिता की साधारण सी भूल के कारण कोमल मन-मस्तिष्क किस तरह प्रभावित होता हैं । यदि जालपा के पिता (दीनदयाल) ‘उसे बचपन में ही लाड़-प्यार के रूप में आभूषण नहीं देते तथा उसकी माता (मानकी) का अटूट आभूषण-प्रेम उस पर प्रकट नहीं होता और तीन वर्ष की उम्र में ही सोने के चूड़े नहीं बनाये जाते, यदि उससे यह नहीं कहा जाता कि ससुराल से चन्द्रहार आयेंगे’ तो वह कभी भी आभूषण-प्रेमी बनकर भविष्य में अपने पति रमानाथ के संकट तथा उसके पारिविरिक विनाश का कारण नहीं बनती ।

जालपा ‘गबन’ उपन्यास की प्रमुख नारी पात्र है । उसके चरित्र का विकास अत्यंत मनोवैज्ञानिक ढंग से हुआ है । उपन्यास के प्रारम्भ में वह एक सामान्य आभूषण-प्रेमी स्त्री में रूप में सामने आती है । जालपा के आभूषण-प्रेम के सम्बन्ध में प्रेमचंद लिखते हैं —“जालपा को गहनों से जितना प्रेम था, उतना कदाचित संसार की और किसी वस्तु से न थी; और इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात थी? जब वह तीन वर्ष की अबोध बालिका थी, उस वक्त उसके लिए सोने के चूड़े बनवाए गए थे । दादी जब उसे गोद में खिलाने लगती, तो गहनों की चर्चा करती –तेरा दूल्हा तेरे लिए बड़े सुन्दर गहने लाएगा । ठुमुक-ठुमुक कर चलेगी” ।[vii]

प्रेमचंद ने ‘गबन’ के सभी नारी पात्रों में आभूषण के प्रति सहज लगाव का अत्यंत स्वाभाविक चित्रण किया है । परन्तु अपने आदर्श नारी पात्रों को संकटापन्न स्थिति में भी आभूषण के प्रति मोहित दिखाना लेखक का अभीष्ट नहीं रहा है । इसलिए उन्होंने पारिवारिक संकट के समय गबन के सभी नारी पात्रों के द्वारा आभूषण का परित्याग दिखाया है । वे सर्प के केंचुल की भांति आभूषण के प्रति अपने मोह को उतार कर फेंक देती है । जालपा भी  परिस्थितियों के समक्ष विवश नहीं होती, वरन् संघर्ष करती है । वह न केवल गहनों को बेचकर पति को गबन के केस से मुक्त करती है, वरन् अपने साजो-सिंगार के सारे सामान –‘मखमली स्लीपर, रेशमी मोज़े, बेलें, फीते’ इत्यादि को एक झोले में भरकर गंगाजी में प्रवाहित कर आती है । प्रेमचंद रमानाथ के जाने के बाद जालपा का गहनों के मोह से मुक्ति की यात्रा का वर्णन इसप्रकार से करते हैं —“आधी रात तक वह इन चीजों को उठा-उठाकर अलग रखती रही, मानों किसी यात्रा की तैयारी कर रही हो । हां, यह वास्तव में यात्रा ही थी —अंधेरे से उजाले की, मिथ्या से सत्य की” ।[viii] जब इस उपन्यास की समस्याओं पर गहरे से हम दृष्टिपात करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आभूषण-प्रेम से उत्पन्न समस्या का एक मात्र कारण है –– पुरुष का दुराव-छिपाव एवं प्रदर्शनप्रियता । प्रेमचंद ने इस तथ्य को स्पष्टत: अभिव्यक्त किया है कि जालपा कदापि रमानाथ पर दबाब नहीं डालती यदि उसे वास्तविक पारिवारिक परिस्थितियों से अवगत कराया जाता ।

प्रेमचंद आभूषण को नारी की गुलामी की जंजीर मानते थे । उनका विचार था कि आभूषण के प्रति मोह सामंती समाज की नारी की विशेषता है । यह आधुनिक समाज में नारी के विकास को बाधित करती है । आधुनिक नारी अपने स्वत्व और सम्मान की रक्षा के लिए अपना सबकुछ लुटा देने को भी तत्पर रहती है । यही कारण है कि प्रस्तुत उपन्यास के तमाम नारी पात्र गुलामी के इस जंजीर को तोड़कर फेंक देती हैं । प्रेमचंद को इस बात का दुःख था कि —“उन्नत देशों में धन व्यापार में लगता है, जिससे लोगों की परवरिश होती है, और धन बढ़ता है । यहां धन श्रृंगार में खर्च होता है, उसमें उन्नति और उपकार की जो दो महान शक्तियां हैं, उन दोनों ही का अंत हो जाता है” ।[ix] उन्होंने अनुभव किया कि इस देश का आत्मिक, दैहिक, नैतिक, आर्थिक तथा धार्मिक पत्तन का कारण आभूषण-प्रेम ही है, जो बच्चों का पेट काटकर बनता है । परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेमचंद कहीं-न-कहीं स्त्री के आभूषण-प्रेम को जायज भी ठहराते हैं । रतन के संदर्भ में उन्होंने लिखा भी है कि —“स्त्रियों की एक मात्र संपत्ति उनका आभूषण ही है” । उन्होंने फिर लिखा है —“यदि रतन वकील साहब के रुपयों को आभूषण में परिवर्तित कर लेती, तो उनकी मृत्यु के पश्चात् उसे दर-दर की खाक नहीं छाननी पड़ती” ।

‘गबन’ की दूसरी नारी पात्र रतन, जो उच्च वर्ग में होने के बावजूद पितृसत्तामक समाज के वर्चस्व का शिकार है । वह भी मध्यवर्गीय औरतों की तरह असुरक्षित है । वकील साहब की मृत्यु के साथ ही समाज, परिवार, राज्य, न्याय सभी उसके विरूद्ध हो जाते हैं । वह सब कुछ त्याग देती है, जो उसका नहीं होता है । रतन के माध्यम से प्रेमचंद अपने समय की इस अमानवता रूपी विषमता का विरोध जोरदार शब्दों में करते हैं । संयुक्त परिवार में स्त्रियों की त्रासद स्थिति का वर्णन करते हुए प्राचीन भारतीय समाज के पारिवारिक ढांचा की उपादेयता पर प्रश्न उठाते हैं –—“अगर मेरी जबान में इतनी ताकत होती कि सारे देश में उसकी आवाज पहुंचती तो में सब स्त्रियों से कहती -– बहनों! किसी सम्मिलित परिवार में विवाह मत करना और अगर करना तो जब तक अपना घर अलग न कर लो, चैन की नींद मत सोना ।………परिवार तुम्हारे लिए फूलों की सेज नहीं कांटों की शैय्या है; तुम्हारा पार लगनेवाली नौका नहीं, तुम्हें निगल जाने वाला जंतु है” ।[x]

परन्तु प्रस्तुत उपन्यास में भारतीय नारी के ‘आभूषण-प्रेम’ की भयावहता को दिखाना ही केवल लेखक का मंतव्य नहीं रहा है, वरन् जीवन की वास्तविकता को सामने लाकर पाठकों को प्रेरित करना भी उनका लक्ष्य रहा है ।  रामविलास शर्मा ने ‘गबन’ उपन्यास की विशिष्टताओं को रेखांकित करते हुए लिखा है —“एक साधारण लेखक के हाथों में जालपा की कहानी गहनों से प्रेम करने का बुरा नतीजा दिखानेवाली एक मामूली उपदेश-मूलक कहानी बन जाती । प्रेमचंद ने उसे नारी समस्या का व्यापक चित्र बनाने के साथ-साथ इस समस्या को हिन्दी साहित्य में पहली बार देश की स्वाधीनता की समस्या से जोड़ दिया है । जालपा को सच्चा सुख उनकी देखभाल करने में मिलता है जिनके बेटों और पतियों को अंग्रेजी राज फांसी देने की तजवीज करता है । सामाजिक जीवन और कथा साहित्य के लिए यह एक नई दिशा की तरफ संकेत था” ।[xi]

इतना ही नहीं ‘स्त्रियों का संपत्ति पर अधिकार’ की समस्या को सामने लाना भी प्रेमचंद का अभीष्ट रहा है । ‘स्त्रियों का संपत्ति पर अधिकार’ की समस्या आज भी सम्पूर्ण उत्तर भारत तथा पश्चिम भारत में विकराल रूप में उपस्थित है । हिंदू धर्म-शास्त्र तथा हिंदू-विवाह पद्धति ने स्त्रियों को सभी प्रकार की संपत्ति से वंचित कर रखा है । उनका एक मात्र स्वामित्व उनके आभूषणों पर ही होता है और ये आभूषण संकट के समय उनका सहारा भी बनता है । इसी कारण आभूषणों के प्रति उनका अतिशय आकर्षण होता है । जालपा और जग्गो अपने गहने बेचकर परिवार को संकट से मुक्त करने की कोशिश करती हैं । अत: स्वाभाविक है कि उनका सारा अर्थानुराग आभूषणों में ही केन्द्रीभूत हो जाय । प्रेमचंद ने स्त्रियों के साथ हो रहे इस भेद-भाव को आर्थिक नजरिए से पहचानने की कोशिश की है । जब तक स्त्रियां आर्थिक रूप से स्वाधीन नहीं होंगी, तब तक उन पर पुरुष का वर्चस्व कायम रहेगा । इसलिए उन्होंने स्त्रियों की आर्थिक स्वाधीनता के प्रश्न को राजनीतिक एवं सामाजिक प्रश्न बनाया है । स्वाधीन भारत में स्त्रियों की आर्थिक स्थिति क्या होगी ? ‘गबन’ उपन्यास इस प्रश्न से भी जूझता हुआ दिखाई देता है ।

अनमेल विवाह स्वयं में एक बहुत बड़ी समस्या है, जिससे समाज में पापपूर्ण आचरण विकसित होते हैं । रतन का वकील साहब के साथ विवाह एक समझौता था । रतन का बचपन अभावों में गुजरा था । विवाह के पूर्व जिस ऐश्वर्य-वैभव की कल्पना भी नहीं कर सकती थी, वह उसे वकील साहब के कारण प्राप्त हुआ । इसलिए वह अपनी दूसरी इच्छाओं को दबाकर अपने अभावों से समझौता कर लेती है । दरअसल प्रेमचंद ‘निर्मला’ नामक उपन्यास में इस अनमेल–विवाह की वीभत्सता का वर्णन कर चुके थे, इसलिए इसका दोहराव यहां प्रस्तुत करना उनका ध्येय नहीं था । रतन के माध्यम से स्त्री का संपत्ति पर अधिकार के प्रश्न को उठाना उनका प्रमुख उद्देश्य था । भारतीय समाज में आज भी स्त्री को यह अधिकार सहजता से प्राप्त नहीं होता है ।

प्रस्तुत उपन्यास में स्त्री-शिक्षा के संदर्भ में भी प्रेमचंद के विचार उल्लेखनीय है । जहां इक्कीसवीं सदी का भारत स्त्री-शिक्षा के संदर्भ में इतना पिछड़ा हुआ है, वहां बीसवीं सदी के तीसरे दशक में ही प्रेमचंद स्त्री की आजादी और शिक्षा की वकालत करते हैं । यह उनकी प्रगतिशील चिंतन का प्रतीक है । स्त्रियों की शिक्षा की वकालत करने के पीछे प्रेमचंद का उद्देश्य देश की मुख्य धारा से स्त्री को जोड़ना रहा है । प्रेमचंद अपनी बातों को पाठकों तक पहुँचाने के लिए अपने प्रत्येक उपन्यास में किसी-न-किसी पात्र को चुन लेते हैं । ‘गबन’ उपन्यास में, प्रेमचंद ने वकील साहब को अपना प्रतिनिधि चुना है । वे उनके माध्यम से स्त्री-शिक्षा एवं स्त्री-स्वाधीनता के प्रश्नों को उठाते हैं और उसके पक्ष में तमाम दलीलें भी देते हैं । वकील साहब यूरोप को स्वर्ग मानते हैं । इसलिए नहीं कि वहां दौलत और आजादी है बल्कि इसलिए कि वहां स्त्री शिक्षित भी है और स्वतंत्र भी । वहां का समाज स्त्री-शिक्षा के कारण ही इतना स्वच्छंद और हंसमुख है । वकील साहब इसीलिए भारत में भी स्त्री-शिक्षा की जरुरत महसूस करते हैं । जब रमानाथ अपनी जानकारी के आधार पर वकील साहब से तर्क करता है कि वहां स्त्रियों का आचरण बहुत अच्छा नहीं है । तो वकील साहब यह सुनते ही बिफर जाते हैं ––“… जिस देश में स्त्रियों को जितनी अधिक स्वाधीनता है, वह देश उतना ही सभ्य है । स्त्रियों को कैद में; परदे में, या पुरुषों से कोसों दूर रखने का तात्पर्य यही निकलता है कि आपके यहां जनता इतनी आचार भ्रष्ट है कि स्त्रियों का अपमान करने में जरा भी संकोच नहों करती” ।[xii]

मध्य-वर्ग की नारियों की स्थिति सर्वाधिक त्रासद है । प्रेमचंद ‘गबन’ उपन्यास में मध्यवर्गीय नारी की विडंबनापूर्ण स्थिति पर प्रकाश डालते हैं और उसकी तुलना में निम्न मध्य-वर्गीय स्त्रियों की सशक्त सामाजिक-पारिवारिक स्थिति का चित्रण करते हैं । विधवा रतन मणिभूषण के समक्ष बेबस और लाचार है जबकि देवीदीन की पत्नी जग्गो उतनी लाचार नहीं है । प्रेमचंद का मानना है कि आर्थिक स्वतंत्रता और श्रमशीलता के कारण ही निम्न-वर्ग की स्त्रियों की स्थिति अधिक मजबूत है ।

प्रेमचंद का नारी के प्रति दृष्टिकोण आदर्शवादी रहा है । उनका विचार था कि ––‘पुरुष पथ से भटकता है और स्त्री उसे सन्मार्ग पर लाती है । नारी पुरुष के भीतर कर्तव्य और नैतिकता को जाग्रत कर उसे राष्ट्रीय तथा सामाजिक उत्तरदायित्त्व के निर्वाह के लिए प्रेरित करती है’ । प्रेमचंद की नारी-पात्र पुरुषों पर भारी रही है अर्थात उनके नारी-पात्रों का चरित्र पुरुष-पात्रों की चरित्र के अपेक्षा अधिक दृढ़ है -– वह चाहे ‘सेवासदन’ की सुमन हो, ‘निर्मला’ की निर्मला, ‘रंगभूमि’ की सोफिया, ‘गोदान’ की धनिया और मालती या ‘पूस की रात’ की मुन्नी । ‘गबन’ उपन्यास में जालपा का चरित्र जितना ही दृढ़ और महान है, रमानाथ का उतना ही हल्का और ढुलमुल । जालपा को सच कहने और सोचने की शिक्षा मिली है । वह नारी है; इसलिए पीड़ितों की व्यथा को पुरुष से ज्यादा अच्छी तरह से समझती है । जब रमानाथ झूठी गवाही देने की मज़बूरी की बात करता है तो जालपा उसे धिक्कारती है –- “जिस आदमी में हत्या करने की शक्ति हो, उसमें हत्या न करने की शक्ति का न होना अचम्भे की बात है । .. जब हम कोई काम करने की इच्छा करते हैं, तो शक्ति आप ही आप आ जाती है । तुम यह निश्चय कर लो कि तुम्हें बयान बदलना है, और सारी बातें आप ही आप आ जाएंगी” ।[xiii] रमानाथ की आत्मकेंद्रीयता से जालपा का व्यक्तित्व बार-बार टकराता है । अंतत: उसी की प्रेरणा से कमजोर और भावुक रमानाथ के चरित्र में परिवर्तन भी आता है । राम विलास शर्मा जालपा के चरित्र का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं —“जालपा भारत का उगता हुआ नारीत्व है । वह भविष्य की तूफानों की अग्र सूचना है । उसने वर्तमान की राह पर मजबूती से पांव रखा है और भविष्य की तरफ वह निश्शंक दृष्टि से देखती है । वह एक नई आग है, जो झूठी संस्कृति के कागजी फूलों को भस्म कर देती है । वह सदियों की लांछना और अपमान को पहचाननेवाली नई शूरता है जिसके आगे कोई बाधा ठहर नहीं सकती । वह हिंदुस्तान के नए आनेवाले इतिहास की भूमिका है – वह इतिहास, जिसमें लाखों जालपा एक साथ अगर बढ़ेंगी और ऐसे नारीत्व का चित्र आंकेंगी जिसके सामने अतीत के सभी चित्र फीके लगेंगे” ।[xiv]

प्रेमचंद ‘गबन’ उपन्यास में स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध जैसे सामाजिक प्रश्न पर भी विचार करते हुए दिखाई देते हैं । उन्होंने रमानाथ और जालपा के माध्यम से न केवल मध्यवर्ग की सीमाओं का बारीकी के साथ विश्लेषण किया है, वरन् उसमें संभावनाओं का तलाश भी किया है । उनका मानना है कि विलासिनी होकर स्त्री सच्चा प्रेम नहीं पा सकती है, वह सच्चा प्रेम त्यागिनी बनकर ही प्राप्त कर सकती है । साथ ही पुरुष को भी अपने ‘स्व’ का विस्तार करना पड़ेगा । अपने आगे परदा डाल कर वह स्त्री का प्यार नहीं पा सकता । जालपा को सच कहने और सोचने की शिक्षा मिली है । वह नारी है; इसलिए पीड़ितों की व्यथा को पुरुष से ज्यादा अच्छी तरह से समझती है । जब रमा नौकरी के अलावा उपरी आमदनी की बात करता है तो जालपा टोकती है ––“तो तुम घुस लोगे, गरीबों का गला काटोगे” ।[xv]

‘गबन’ उपन्यास की मूल समस्या ‘नारी मुक्ति की समस्या’ ही है, जो आगे चलकर मध्य-मध्यवर्ग की राजनैतिक-आर्थिक मुक्ति की समस्याओं से जुड़ जाती है । जालपा मध्यवर्गीय नारी के रूप में ही अपनी मुक्ति की तलाश करती है । वह सेवा-भाव से युक्त एक गरिमामय आदर्श भारतीय नारी के रूप में प्रतिष्ठित होती है । परन्तु मध्य-वर्गीय नारी की मुक्ति का संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है । इसलिए प्रेमचंद के साहित्य की उपजीव्यता और प्रासंगिकता अभी शेष है ।

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संदर्भ ग्रन्थ सूची

[i] चतुर्वेदी, रामस्वरूप: हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 1993, पृ.-164

[ii] शर्मा, रामविलास: प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2011, पृ.57

[iii] शर्मा, रामविलास: प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2011, पृ.62-63

[iv] सिंह, बच्चन: आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 1997, पृ.199

[v] अरविन्दाक्षन, ए.: भारतीय कथाकार प्रेमचंद, आनंद प्रकाशन, कोलकाता, सं. 2009, पृ. 50

[vi] शर्मा, रामविलास: प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2011, पृ.-63

[vii] प्रेमचंद: गबन, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 1980, पृ.30

[viii] उपरोक्त, पृ.136

[ix] उपरोक्त, पृ. 50

[x] उपरोक्त, पृ.-232

[xi] शर्मा, रामविलास: प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2011, पृ.69

[xii] प्रेमचंद: गबन, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, सं. 1980, पृ.95

[xiii] उपरोक्त, पृ. 223

[xiv] शर्मा, रामविलास: प्रेमचंद और उनका युग, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2011, पृ.66

[xv] उपरोक्त, 64

खूबसूरत देह…वक्ष…वजाइना….सर्जरी की चाह के बीच भटका सशक्तीकरण

अपराजिता फीचर्स डेस्क

औरतों को मजबूत बनाने और उनको आगे ले जाने की बात करना सच कहा जाये तो एक फैशन है। मार्च का महीना आते ही यह और भी तेज हो जाता है और अब जब महिला दिवस आ रहा है तो कई कम्पनियों के आकर्षक ऑफर और विज्ञापन उनका गुणगान करते दिखेंगे। सब कुछ होगा और एक बँधे दायरे के बीच जिसके बीच रहने की आदत औरतों को पड़ चुकी है और इस कदर पड़ चुकी हैं कि यही उनकी संजीवनी है और यही उनकी ताकत। एक खास बने – बनाये साँचे में फिट औरतों को उनकी देह के हिसाब से आँका जा रहा है और अब तो पुरुष भी कीर्तिमान तोड़ रहे हैं। सही है कि सजना – सँवरना औरतों को पसंद है और यह उनका आत्मविश्वास भी बढ़ाता है मगर क्या यह उनका जीना – मरना भी तय करे…हमें यह होने देना चाहिए….क्या औरतों को उनकी सुन्दरता के बगैर स्वीकार नहीं किया जा सकता….।

पता है कि यह सवाल विचित्र है मगर इसका सीधा रिश्ता उस सशक्तीकरण से है जिसे आप औरतों तक पहुँचाना चाहते हैं। मैं ये पूछना चाहती हूँ कि किसी महिला को उसके मोटे होंठों और छोटे कद के साथ क्यों नहीं स्वीकार किया जा सकता है? दूसरा सवाल मेरा उससे भी विचित्र है क्योंकि जब शादी को आत्मा का बंधन कहा जाता है तो उसके लिए किसी औरत या किसी पुरुष को वह क्यों बन जाना पड़ता है जो वह है ही नहीं और न होना चाहता है। किसी लड़की को मंडप में जाने के लिए गहनों और कपड़ों का शोरूम बनना पड़े और किसी विमेन इम्पारमेंट की पार्टी में नकली मेकअप और कृत्रिम अँगों या सर्जरी के साथ जाना पड़े तो सशक्तीकरण की परिभाषा वहीं दम तोड़ देती है। औरतें खुद में एक बड़ा बाजार हैं या बाजार की जरूरत…और यह आज से नहीं हमेशा से हैं। आप कोई भी कहानी उठा लीजिए…किसी भी स्त्री की प्रशंसा का पहला वाक्य उसकी सुंदरता की तारीफ से ही शुरू होता है और उसी पर खत्म हो जाता है। अगर हिन्दी साहित्य की बात करें और इतिहास की बात करे तो औरतों की खूबसूरती के नाम पर कत्लेआम के तमाम किस्से मिल जायेंगे और इनमें से एक ने तो बवाल खड़ा कर दिया जब उस पर फिल्म बनी। औरतें कभी भी अपने लिए नहीं सजती दिखतीं थी….उसके पीछे हमेशा एक पुरुष जरूरी होता था और वह न रहे तो या तो स्त्री से जीने का अधिकार छीन लिया जाता था या फिर उसकी जिन्दगी से रंग छीन लिये जाते रहे..वह दौर कुछ और था…आप उसे सामंतवादी युग कह सकते हैं मगर आज जो खूबसूरती की अंधी दौड़ के नाम पर जो सनक चल रही है…उसे क्या कहेंगे।

शादी के बाजार में फिट होने के लिए लड़कियाँ ही नहीं लड़के भी खूब पापड़ बेलते हैं मगर लड़की की सुन्दरता में जरा भी कमी रह गयी तो उसका जीना उसके घरवाले हराम कर देते हैं। इसी बात का फायदा बाजार और सौंदर्य सामग्री बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियाँ उठा रही हैं। यहां तक कि प्लास्टिक सर्जरी कराने की प्रवृत्ति भी तेजी से पनप रही है। खतरनाक तरीके से क्रीम, दवाओं और सर्जरी का सहारा लिया जा रहा है और अब तो वजाइना की भी सर्जरी हो रही है और इन सबके बेतहाशा भागने वाली स्त्रियाँ ही हैं। वही स्त्रियाँ जो बड़ी – बड़ी जगहों पर महिलाओं को सशक्त बनाने की बातें करती हैं, वे दरअसल डरी हुई असुरक्षित स्त्रियाँ हैं। असुरक्षित और डरी हुई स्त्रियाँ कौन सा सशक्तीकरण लाने जा रही हैं…?

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक चेतावनी में चेतावनी में कहा गया है कि क्रीम, लोशन, साबुन और आंख संबंधी सौंदर्य उत्पादों में मिला पारा उपयोगकर्ताओं के लिए हानिकारक है। ऐसे में स्वास्थ्य को लेकर कई परेशानियां पनप रही हैं। इन उत्पादों के इस्तेमाल से त्वचा पर चकत्ते, दाने पड़ना आम बात है। इनका असर आंखों सहित जिस्म के दूसरे कई हिस्सों पर भी पड़ रहा है और त्वचा कैंसर और एलर्जी जैसे दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। ज्यादातर साबुन और क्रीम में मौजूद हानिकारक तत्त्व त्वचा की प्रतिरोधक क्षमता को भी कमजोर करते हैं। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट’ ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चेहरे पर निखार का दावा करने वाली कई बहुराष्ट्रीय और बड़े ब्रांडों की क्रीमों में पारा और लिपिस्टिक में क्रोमियम और निकिल जैसी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक धातुएं होती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आज गोरा करने के नाम पर बेचे जाने वाले ज्यादातर उत्पादों के दावे खोखले हैं। त्वचा पर ज्यादा प्रभाव खान-पान और सकारात्मक सोच से ही पड़ता है। इन उत्पादों में पारा के अलावा स्टेरॉयड, हाइड्रॉक्यूनोन जैसे हानिकारक रसायन मिले होते हैं। इनके प्रभाव से त्वचा कमजोर, ढीली और खुरदुरी हो जाती है।

अगर आप अपनी देह के साथ खुश नहीं हो सकते तो आपको खुद को सशक्त मानना छोड़ देना चाहिए। साँवला होना आपके व्यक्तित्व का मापदंड नहीं हो सकता। मोटा होना सेहत का मामला है मगर इसे सामाजिक, आर्थिक और बाजार का मामला बना दिया गया है। आज स्लिम-ट्रिम बनाने के दावे पेश करती कई दवाएं, लोशन, क्रीम आदि से बाजार पटे पड़े हैं। अगर इनका प्रभाव होता तो आज अमेरिका जैसा विकसित देश मोटापे से न जूझ रहा होता। लोगों की बढ़ती महत्त्वाकांक्षा और खुद को सबसे अलग दिखाने की मानसिकता को भुनाने के लिए कंपनियां कई तरह के उत्पादों को बाजार में उतार रही हैं। यही वजह है कि अब हर्बल उत्पाद के नाम से भी सौंदर्य सामग्रियों का बाजार खड़ा किया जा रहा है। नकली उत्पादों की तो खैर बाढ़ ही आ गई है। उपभोक्ताओं के लिए भी समझना मुश्किल है कि क्या असली है और क्या नकली?

बॉलीवुड की अभिनेत्रियों की बड़ी जमात गोरे रंग, रेशमी बालों के नाम पर क्रीम, साबुन, तेल, शैंपू का विज्ञापन कर लोगों को फुसलाने में सहायक बन रही है। मगर तारीफ की जानी चाहिए अभिनेत्री नंदिता दास की, जिन्होंने इस तरह के उत्पादों और सांवले रंग को हीन दर्शाने वाले विज्ञापनों के खिलाफ एक मुहिम छेड़ रखी है। कुछ शोधों में यह बात भी सामने आई है कि सांवले रंग पर सूरज की किरणों का प्रभाव गोरे रंग के मुकाबले कम ही पड़ता है। इसकी वजह है सांवली त्वचा में पाया जाने वाला तत्व मेलनिन। इस तरह की त्वचा में सनटैन की समस्या कम होती है। वहीं गोरी त्वचा में कैंसर का खतरा बना रहता है। पशुओं के हित में काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘पेटा’ ने कई बार इस ओर ध्यान दिलाया है कि सौंदर्य उत्पादों का परीक्षण खरगोश, बिल्ली,चूहे, चिड़िया और बंदरों पर किया जाता है। लिपस्टिक से लेकर क्रीम, शेंपू, टूथपेस्ट आदि सभी उत्पाद इन्हीं बेजुबानों पर परखे जाते हैं। परीक्षण की प्रक्रिया में कई बार जीव-जंतु अपनी जान गंवा बैठते हैं या फिर उनकी त्वचा इन उत्पादों के प्रभाव से जख्मी हो जाती हैं।

फिल्मों में तो हीरोइन होने की पहली शर्त ही सुंदरता है। कहने को तो ये काल्पनिक पात्र हैं मगर इस बात का महिलाओं पर इतना दबाव रहा है कि सुंदर दिखने के लिए वे कोई भी उपाय, उपचार अपनाने को तैयार रहती हैं। यह सिर्फ किसी आम महिला की ही बात नहीं है बल्कि आज कई व्यावसायिक घरानों की महिलाओं सहित नामी अभिनेत्रियों तक ने गोरे रंग और जवां दिखने के लिए व्हाइटनिंग ट्रीटमेंट, बोटोक्स इंजेक्शन से लेकर सर्जरी तक के विकल्प को चुना है। इनमें काजोल, रेखा, श्रीदेवी, दीपिका पादुकोण, प्रियंका चोपड़ा, ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन जैसी अभिनेत्रियां तक शामिल हैं। हालांकि, दर्शकों ने इन्हें इनके वास्तविक रूप में भी काफी पसंद किया है। दरअसल, सर्जरी उन लोगों के लिए वरदान रही है जिनका पैदाइशी या किसी दुर्घटना के तहत कोई अंग नष्ट हो जाता है या जिनका चेहरा खराब हो जाता है। पहले इसी तरह के लोग सर्जरी कराते थे पर आज किसी को किसी अभिनेत्री की तरह दिखना है या और सुंदर होना है। इस कारण सर्जरी कराने वाले ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा बढ़ गई है। इसका मतलब यही है कि आज भी महिलाएं सबसे सुंदर दिखने के दबाव के साथ न सिर्फ जी रही हैं बल्कि इस ओर नए-नए विकल्प भी अपना रही है। सौंदर्य उत्पादों का बाजार किसी दूसरे बाजार से कहीं ज्यादा तरक्की पर है। यह लोगों में अपने रूप सौंदर्य को लेकर बढ़ती समझ है या सनक कि आज कोई भी कंपनी गोरे होने के दावे के साथ कुछ भी बाजार में परोसती है तो लोग उसके पीछे भागने लगते हैं।

पिछले साल एक सर्वेक्षण आया था जिसके मुताबिक सौंदर्य उत्पादों का बाजार करीब छह अरब डॉलर से ज्यादा का था और इसके 2025 तक 20 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। 2005 से 2015 तक के दरमियान किशोर वर्ग ने बड़ी संख्या में इन उत्पादों को अपनाया। ऐसे में इन उत्पादों को ऑनलाइन खरीदने का भी चलन बढ़ा है। करीब 62 फीसद लोग इन उत्पाद की खरीदारी ऑलाइन शॉपिंग साइट से ही करते हैं। इस बाजार के बढ़ने का एक कारण यह भी है कि अब कई कंपनियां हर्बल और स्वदेशी सौंदर्य उत्पाद के नाम पर उपभोक्ताओं को रासायनिक उत्पाद से भरपूर उत्पाद परोस रही हैं।

ब्रेस्ट इम्प्लांट, नाक, होंठ और आँखों के बाद अब तो वजाइना को लेकर भी सनक है। वैजिनोप्लास्टी एक जैनिटल रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी है लेकिन जैनिटल रिकंस्ट्रक्शन में लिंग परिवर्तन भी शामिल है, पर वैजिनोप्लास्टी से योनि में मनचाहा बदलाव पाया जा सकता है। कोलकाता के कौस्मैटिक सर्जन डा. सप्तऋषि भट्टाचार्य का कहना है कि यह एक तरह की रिकंस्ट्रक्टिव प्लास्टिक सर्जरी है। इस का उद्देश्य मनमाफिक वैजाइना को डिजाइन करना या कह लीजिए रिकंस्ट्रक्ट करना यानी योनि का पुनर्निर्माण और वह भी जैसा चाहें वैसा. इस रिकंस्ट्रक्शन थ्यौरी के अंतर्गत भी बहुत तरह की सर्जरी शामिल हैं। हाइमेनोप्लास्टी, लाबियाप्लास्टी वगैरह. वैजिनोप्लास्टी लंबे विवाहित जीवन और बच्चे पैदा करने से ढीली पड़ी योनि की दीवार को टाइट करती है। यह सर्जरी दरअसल कमजोर मांसपेशियों को दुरुस्त भी कर देती है। इस के अलावा रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी के अंतर्गत हिप की मांसपेशियों को टाइट कर बढ़ती उम्र का प्रभाव भी कम किया जाता है। अब जहां तक हाइमेनोप्लास्टी का सवाल है, तो समाज में इन दिनों एक नया बदलाव भी देखा जा रहा है। कहा जाता था कि पुराने जमाने में शादीब्याह के समय लड़कियों के कौमार्य को बहुत महत्त्व दिया जाता था लेकिन बाद में खेलकूद में भाग लेने या साइकिल आदि चलाने जैसे विभिन्न कारणों की वजह से लड़कियों में कौमार्य की शर्त कम हुई लेकिन आजकल फिर से समाज में कौमार्य को महत्त्व दिया जाने लगा है।

लड़कियों ने खुद को अब कैद करना शुरू कर दिया है…अब वो खुद कौमार्य और वजाइना या वक्ष के दायरे में कैद हो रही हैं। लड़कियां शादी से पहले हाइमेनोप्लास्टी के लिए जा रही हैं। एक विशेषज्ञ सर्जन का दावा है कि उन के पास हाइमेनोप्लास्टी के बहुत सारे मामले आ रहे हैं। इस में कौमार्य झिल्ली का फिर से निर्माण किया जाता है. दावा यह है कि इस सर्जरी में ऊपरी तौर पर किसी तरह की सर्जरी का कोई निशान नहीं होता है इसीलिए सैक्स पार्टनर को इस का पता नहीं चल पाता है दावा यह भी है कि झिल्ली निर्माण के बाद संबंध बनाने पर शीलभंग का प्रमाण भी मिलता है। ऐसे मामले के लिए शादी की तारीख से 4 हफ्ते पहले सर्जरी का सुझाव दिया जाता है।  2007 में योनि संबंधित किसी भी तरह की सर्जरी का नाम डिजाइनर वैजाइना दिया गया. उस समय अमेरिकन कालेज ऑफ ऑबस्टेट्रिशियन ऐंड गाइनोकोलौजिस्ट ने इस बढ़ते ट्रैंड के खिलाफ चेतावनी दी थी। रॉयल आस्ट्रेलियन कालेज औफ गाइनोकोलौजिस्ट भी इस ट्रेंड के खिलाफ रहा है। 2009 में ब्रिटिश मैडिकल जर्नल और 2013 में सोसाइटी औफ ऑबस्टेट्रिशियन ऐंड गाइनोकोलौजिस्ट औफ कनाडा ने इसे गैरजरूरी कॉस्मैटिक सर्जरी बताते हुए इस ट्रैंड को रोके जाने पर जोर दिया था. बावजूद इस के 2015 में हुए सर्वे से साफ हो गया कि कोई भी चेतावनी काम न आई।

अब जहां तक जोखिम का सवाल है, तो विशेषज्ञों का मानना है कि इस सर्जरी के बहुत सारे जोखिम भी हैं। सब से पहले तो कुछ साइड इफैक्ट देखने को मिलते हैं। बहुत सारे मामलों में पाया गया कि खून का बहाव रोक पाना डाक्टर के लिए कठिन हो जाता है. वहीं संक्रमण भी एक समस्या है. इस तरह की सर्जरी में 1 से ले कर 3 घंटे तक का समय लग सकता है। यह पूरी तरह से निर्भर करता है योनिद्वार और उस के आसपास की मांसपेशियों पर। सर्जरी के 2 से 5 दिनों के भीतर कामकाज पर लौटा जा सकता है. वैसे 6 सप्ताह का समय लग सकता है।

कभी दर्शकों की नजर में तो कभी दौड़ में बने रहने के लिए लड़कियाँ जान को दाँव पर लगाकर खूबसूरत बन रही हैं। पति दूसरी स्त्री तक न जाए इसलिए तमाम तरह की तकलीफें उठा रही हैं मगर सवाल यह है कि सुन्दरता के आधार पर सशक्त होना क्या स्थायी है? शो बिजनेस में तो स्थिति और भी खतरनाक है और जानलेवा भी। श्रीदेवी की मौत के पीछे जिन कारणों को जिम्मेदार माना जा रहा है, उनमें एक कारण यह भी है। खूबसूरत दिखने और बने रहने का तनाव, उम्र को मात देने का तनाव और सामाजिक मापदंडों के हिसाब से खुद को फिट करने का तनाव जब तक है, तब तक कोई सशक्त नहीं हो सकता, न तो महिला और न पुरुष। आप चाहे जितने भी महिला या पुरुष दिवस मनाइए…जब तक आप बूब्स…वजाइना…सर्जरी के मकड़जाल से नहीं निकलते….आपके सारे ताम – झाम व्यर्थ हैं।

(इनपुट – कई पत्रिकायें तथा वेबसाइट्स)