स्त्रियाँ हैं मगर उनके पास संचालन का अधिकार नहीं है
धन से अखबार नहीं निकलता, संकल्प से निकलता है
स्त्री पुरुष के संबंधों को लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है
प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी

सन् 2000 में स्त्री पर पहली पुस्तक लिखी थी। अगर स्त्री साहित्य और संबंधित पुस्तकों पर बात की जाये तो कोलकाता में पुस्तकें उपलब्ध हैं मगर जब पहली पुस्तक लिखी तो कोलकाता में इस तरह पुस्तकें नहीं थीं। रमाशंकर शुक्ल ने सबसे पहले स्त्रीवादी व्याख्यान दृष्टिकोण से पुस्तक लिखी। स्त्री साहित्य को पढ़ने के लिए जिस पुराने साहित्य का होना जरूरी है, वह आधुनिककाल में जाकर मिलता है मगर आलोचक स्त्री लेखिकाओं पर विस्तार से बात नहीं करते। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक के पास 15 -20 से अधिक स्त्री लेखिकाओं के नाम नहीं हैं। यहाँ तक कि बंग महिला से परिचय होने के बावजूद शुक्ल जी उन पर नहीं लिखते और हिन्दी आलोचना में भी यही स्थिति है। जरूरी है कि स्त्री साहित्य और स्त्री लेखिकाओं को खोजा जाए। आज स्त्री लेखिकायें लिख रही हैं और अपनी समस्याओं को लेकर मुखर भी हैं मगर 15 -20 साल पहले यह स्थिति नहीं थी। अगर आचार्य शुक्ल जैसे बड़े लेखक इस तरह का पक्षपात करेंगे तो शिक्षक कैसे बताएगा कि स्त्री लिखती है? स्त्री लिखती भी है, इस बात पर ही किसी को विश्वास नहीं होता। हिन्दी का लेखक मानने को तैयार ही नहीं है कि स्त्री लिखती भी है…आम धारणा तो यही है कि स्त्री ने किसी से लिखवा लिया होगा। लड़कियाँ जिस तरह से लिखती हैं, वह दिखता नहीं है। स्त्री जितनी सरल है, उतनी ही खतरनाक भी है, वह जितनी निर्बल है, उतनी ही सबल भी है।
स्त्री साहित्य को समझने के लिए उसके प्रति समर्पण और विश्वास का होना जरूरी है, यही स्त्री साहित्य को पढ़ने का सबसे अच्छा तरीका भी है। एक शिक्षक के दरवाजे 24 घंटे खुले रहने चाहिए जिससे वह छात्राओं के प्रश्नों और उनकी समस्याओं का समाधान कर सके, उनका मार्गदर्शन कर सके। स्त्री साहित्य का परिवेश किताबों से नहीं जीवन से आता है। स्त्री साहित्य का परिवेश जीवन से जुड़ा है मगर हमने परिवेश को स्त्री के अनुकूल नहीं बनने दिया मगर इस मामले में कोलकाता अलग है क्योंकि यहाँ ऐसा परिेवेश है। यह परिवेश 200 साल पहले बना है, इसके पहले स्त्री की कोई ठोस छवि हमारे सामने नहीं आती। आधुनिक काल के पहले स्त्री का वास्तविक स्वरूप हमारे पास नहीं था। भारतेंदु युग ने स्त्री को सबसे पहले जाना। स्त्री साहित्य को समझने के लिए राधा मोहन गोकुल की दृष्टि होनी चाहिए। स्त्रियों के बारे में उनके निबंध फेमिनिज्म के पहले विचारक निबंध हैं मगर रामविलास शर्मा भी गोकुल के स्त्री संबंधी विचारों पर बात नहीं करते। हिन्दी में स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य में गोकुल के दृष्टिकोण का विशेष महत्व है। महादेवी वर्मा का दृष्टिकोण उनसे मिलता है और इसके बाद ही श्रृंखला की कड़ियाँ प्रकाशित होती है। स्त्री के स्वभाव, लक्षण, साहित्य को विश्लेषित नहीं करते। हिन्दी में परिवार पर निबंधों का अकाल है, दहेज पर निबंध नहीं मिलते। स्त्री के यौनिक प्रश्नों से प्रगतिशील आलोचना दूर भागती है। नामवर सिंह भी 2006 में जाकर स्त्री के प्रश्नों पर बोलते हैं और रामविलास शर्मा ने केवल एक निबंध लिखा और अच्छा कहने के अलावा कुछ नहीं कहा। छायावाद की सबसे अच्छी आलोचना महादेवी वर्मा ने लिखी मगर उन पर भी बहुत कम बात होती है।
स्त्री की सबसे बड़ी समस्या रोजगार है। आज बड़े पैमाने पर औरतें रोटी कमाने के लिए जूझ रही हैं मगर साहित्य में मोहन राकेश से लेकर मन्नू भंडारी के यहाँ भी स्त्रियों की समस्या सिर्फ अवैध संबंध हैं। लड़की की कोई जाति नहीं होती। दहेज और बाल विवाह स्त्रियों की बड़ी समस्या है। आलोचना का काम है कि वह अनुप्लब्ध क्षेत्रों को उपलब्ध कराये। स्त्री के बड़े प्रश्नों पर बड़े लेखक बात नहीं करते।
स्त्री और उसकी समस्याओं को सामने लाने के पीछे वे अंतरराष्ट्रीय समझौते हैं, जिन पर 1970 -75 में भारत ने हस्ताक्षर किये थे। बीना मजुमदार रिपोर्ट के जमा होने के बाद पता चलता है कि स्त्रियों की समस्याएँ कितनी भयावह हैं, उन तक पंचवर्षीय योजनाओं के लाभ नहीं पहुँच पा रहे थे। इसके बाद जाकर स्त्रियों के पक्ष में कानून बनने शुरू हुए। आज भी 98 प्रतिशत स्त्रियाँ अपनी मर्जी से बगैर पूछे कोई फैसला नहीं कर पाती। वह अपने फैसले पर किसी और की मुहर का इंतजार करती हैं।
स्त्री के प्रश्नों पर गोपनीय तरीके से बात होती है जबकि उन पर खुलकर बात करने की जरूरत है। शिक्षकों को और पुरुष शिक्षकों को भी इन पर बात करने की जरूरत है और पुरुष शिक्षकों को भी इन समस्याओं को संवेदनशील होकर समझने की जरूरत है। स्त्री की समस्याएँ सामाजिक प्रश्न हैं, उन पर बात होनी चाहिए। शिक्षक अपनी छात्राओं को वह साहस दें कि वे अपनी बात शिक्षकों से कह सकें। साहित्य के प्रश्नों के समाधान जीवन में होते हैं। आज दिक्कत यह है कि बड़े पैमाने पर स्त्री की चेतना का रूपांतरण साम्प्रदायिक तरीके से हो रहा है। औरतें अपराधियों की हिमायत में कवच बनकर खड़ी हो रही हैं। स्त्री की मनुष्यता खत्म हो रही है मगर हमें स्त्री भी चाहिए और मनुष्य भी चाहिए। स्त्री को स्त्री बने रहने दें। स्त्री को लिंग के दायरे से बाहर लाया जाये। हमें एक अच्छी मानवीय स्त्री चाहिए। स्त्री की अस्मिता के प्रश्नों को मनुष्यता के दायरे से जोड़ा जाये। इस विषय पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ की स्त्री का पत्र कहानी पढ़ी जानी चाहिए। स्त्री के प्रश्नों को उसकी पहचान के दायरे से आगे लाकर मानवाधिकार के परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। स्त्री को न सिर्फ मनुष्य माना जाये बल्कि उसे आचरण में भी लाया जाये, उसे खर्च दें जिसका इस्तेमाल वह अपने तरीके से कर सके। परिवार का लोकतांत्रिककरण करना आवश्यक है। वर्जीनिया वुल्फ मानती हैं कि परिवार की संरचना में फासीवाद होता है और उसकी जड़ वहीं है। पितृसत्ता को नष्ट करने के लिए फासीवाद का खात्मा जरूरी है। विवाह के समय लड़का – लड़की, दोनों की सहमति ली जाए तो आधी समस्यायें खुद खत्म हो जायेंगी। स्त्री पुरुष के संबंधों को लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है।
भाग दो

हर लड़की की मनोदशा अलग होती है। उसकी समस्या को समझना है तो उसकी आँखों में आँखें डालकर बात कीजिए। हमने महिलाओं के साथ परदे का संबंध रखा है मगर जरूरत बगैर परदे के स्त्री से संवाद करने की है। उसकी खिल्ली उड़ाने की जरूरत नहीं है। स्त्री की भावनाओं का सम्मान करें। हम स्त्री पर अपने विचार थोपते हैं। पुरुष अपने हिसाब से स्त्री को ढालना चाहता है। हमें वही लड़की अच्छी लगती है जो हमारे हिसाब से ढल जाये। अब स्त्री पुरुषों का ही अनुकरण कर रही है। राधा मोहन गोकुल ने लिखा है कि जिस पति – पत्नी के संबंधों में नशे की लत होती है, उनके बच्चे अवसादग्रस्त होते हैं। हमने तो कभी सोचा ही नहीं कि माता – पिता के संबंध बच्चे के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं। अब तो स्थिति सुधरी है, बच्चों को लेकर आज के माता – पिता काफी ध्यान दे रहे हैं और सजग हैं मगर आम धारणा यही रही है कि बच्चे खुद ही बड़े हो जाए, हम उसकी जरूरतें पूरी कर देंगे।
हिन्दीभाषी समाज पर पूँजीपति वर्ग का गहरा असर है और यह वर्ग किताबें नहीं पढ़ता। छूत की समस्या हमारी सबसे बड़ी समस्या है। हमें अपनी मर्जी से कम से कम आधा या एक घंटा भी अपनी इच्छा का कोई काम करना चाहिए। धर्म हमेशा से शोषण का उपकरण रहा है जिसके संचालन की बागडोर हमेशा से पुरुषों के हाथ में रही है। अगर यह बागडोर स्त्रियों को मिली होती तो उनका इतना शोषण नहीं होता। धर्म के संचालन में स्त्रियों की भागीदारी बढ़ा दें, उसे कमान दे दें, आधी समस्याएं ऐसे ही खत्म हो जायेंगी।
यही स्थिति आर्थिक क्षेत्र में भी है। सेबी के निर्देश के बावजूद कम्पनियों ने महिलाओं को निदेशक मंडल में शामिल किया मगर आज भी 400 से अधिक कम्पनियों में महिला निदेशक नहीं है और न ही किसी निर्णायक पद पर हैं। स्त्री जितना संचालन करेगी, उतनी ताकतवर होगी। स्त्री के प्रश्नों को समानता, लोकतंत्र और न्याय, इन तीन आधारों पर देखे जाने की जरूरत है। स्त्री को लोकतंत्र तक जाने ही नहीं दिया जा रहा है। स्त्री के अराजनीतिक होने की सीमा को तोड़ने की जरूरत है।
राधा मोहन गोकुल पुरुष को स्त्री के वेश्या बन जाने का बड़ा कारण मानते हैं। जो क्षेत्र क्रांति के लिए जाने जाते हैं, उन क्षेत्रों में वेश्यावृति तेजी से बढ़ रही है। बंगाल और नेपाल ऐसे ही क्षेत्र हैं। विकास का अभाव, माइग्रेशन, बांग्लादेश की उथल – पुथल इसके प्रमुख कारण हैं। विभाजन के बाद दंगों के दौरान और युद्ध में भी वेश्यावृत्ति इतनी नहीं बढ़ी थी। इसे कानूनी जामा नहीं पहनाया जाना चाहिए बल्कि वेश्याओं के उद्धार और उनके पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए। हमारी सरकारों के पास वेश्याओं की समस्याओं के समाधान के लिए कोई ब्लू प्रिंट नहीं है। वेश्याओं की समस्याओं पर खुलकर बात हो, अखबारों में बात हो। उनके लिए कंडोम की व्यवस्था हो और उसके अस्तित्व की रक्षा की जाए, तभी इस समस्या का समाधान हो सकता है। वेश्याओं के बच्चों का स्कूलों में दाखिला होना एक बड़ी समस्या है। स्त्री के सारे प्रश्न उसके शरीर से जुड़े हैं इसलिेए उन पर बहस पर बात किये बगैर नहीं हो सकती। स्त्री को देखना है तो उसके हृदय में देखिए, वह वहीं मिलेगी।
(कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा स्त्री, उसके प्रश्नों और स्त्री साहित्य पर आधारित व्याख्यानमाला में दिये गये व्याख्यान पर आधारित)
क्रांतिकारी, लेखक और पत्रकार राधा मोहन गोकुल
– शिवशरण त्रिपाठी
राधा मोहन गोकुल जी के बारे में नई पीढ़ी के लोग बहुत कम ही जानते हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि नई पीढ़ी के पत्रकारों को भी उनके बारे में या तो कुछ पता ही नहीं है या तो बहुत ही कम पता है। राधा मोहन जी एक क्रांतिकारी, लेखक व पत्रकार के साथ ही सनातनी, आर्य समाजी तो थे ही कांग्रेसी व साम्यवादी होने के साथ समाज सुधारक भी थे।
राधा मोहन गोकुल एक ऐसा नाम है जिसे देश की नई पीढ़ी को जानना चाहिये, पढ़ना चाहिये और समझना चाहिये। वास्तव में वह एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। ईश्वर ने जितना उन्हें कष्ट पहुंचाया उतने ही वह दृढ़ निश्चयी बने, उतने ही फौलादी बने, उतने ही तपकर लोगों के प्रेरणास्रोत व आदर्श बने। एक बारगी ‘राधा मोहन गोकुल’ नाम ही समझ में नहीं आता। देश के कुछ राज्यों खासकर गुजरात, महाराष्ट्र आदि में पुत्र के साथ पिता का नाम जोड़े जाने की परम्परा है पर उनका तो इन राज्यों से कुछ भी सम्बन्ध नहीं था। उनके पूर्वज राजस्थान की वर्तमान राजधानी जयपुर के (तत्कालीन राज्य) के खेतड़ी नामक स्थान से आकर उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद जनपद में आ बसे थे और वहीं उनका जन्म हुआ था। यह समझ से परे है कि उनका नाम राधा मोहन से राधा मोहन गोकुल कैसे हो गया। बहुत सम्भव तो यही प्रतीत होता है कि उन्होंने स्वयं अपने नाम राधा मोहन के साथ अपने पिता जी गोकुल चन्द के नाम से गोकुल शब्द जोड़ लिया था। वह वैश्य बिरादरी से थे और उनके परबाबा लाला परमेश्वरीदास आजीविका की तलाश में कोई ढाई-तीन सौ वर्षों पूर्व इलाहाबाद जनपद के लाल गोपाल गंज में आ बसे थे और निकटवर्ती भदरी (वर्तमान में प्रतापगढ़ जनपद) के राजा साहब के यहां बतौर खजांची काम करने लगे थे।
राधामोहन जी का जन्म १५ दिसम्बर १८६५ को लाल गोपालगंज, इलाहाबाद में हुआ था। वह अपने पिता की चार संतानों में सबसे बड़े थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पास के बौद्ध भिक्षुओं के आवास विहार में हुई थी। वहीं उन्होंने पहले हिन्दी व फिर उर्दू, फारसी की पढ़ाई की थी। आगे की पढ़ाई के लिये उन्हें कानपुर में रहने वाले उनके ताऊ जी के पास भेज दिया गया था। यही उनका कानपुर से पहला सम्पर्क भी था। यहां उन्हें फारसी के साथ-साथ बहीखाते की शिक्षा मिली। इसी बीच तत्कालीन परम्परा के चलते १३ वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह कर दिया गया था। चूंकि वह आगे पढ़ना चाहते थे सो वह कानपुर छोड़कर आगरा अपने चाचा के पास आ गये और सेंट जॉन्स कालिजिएट में दाखिला लेकर अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी।
वह शिक्षा पूर्ण कर पाते कि उन पर एक के बाद एक विपदाओं का पहाड़ टूट पड़ा। यहीं से उनकी ऐसी कठिन परीक्षा शुरू हुई कि दूसरा व्यक्ति होता तो शायद जीवन से ही मोह त्याग देता। पर राधा मोहन जी ने हर विपदा का डटकर सामना किया। जहां शादी के ५ वर्षों बाद ही सन् १८८३ में उनकी पत्नी का निधन हो गया वहीं १८८४ में एक व्यापारिक दुर्घटना फलस्वरूप परिवार की आर्थिक स्थिति चरमरा गई। ऐसे में वह पढ़ाई छोड़कर नौकरी की तलाश में पुन: इलाहाबाद आ गये। यहां उन्हें एक सरकारी महकमे के एकाउंटस विभाग में २० रूपये माहवार की नौकरी मिल गई। पर यह नौकरी कुछ ही महीने चल सकी। एक गोरे अधिकारी के अपमानजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने नौकरी छोड़ दी तथा ताजीवन सरकारी नौकरी न करने की शपथ ली।
इलाहाबाद में जीवन यापन होता न देखकर वह रोजी-रोटी की तलाश में रीवा चले गये पर वहां वह बामुश्किल एक डेढ़ वर्ष रह पाये। बीमारी के चलते वह कानपुर आ गये। उस समय कानपुर में पं० प्रताप नारायण मिश्र जी के ब्राह्मण पत्र की बड़ी धूम थी। चूंकि राधा मोहन जी को लिखने पढ़ने का बड़ा शौक था और पहले ही बाल कृष्ण भट् के हिन्दी प्रदीप में उनकी कवितायें व लेख छपने लगे थे अतएव जब वह मिश्र जी से मिले तो वह मिश्र जी को इतना भाये कि उन्होंने अपने पत्र में उनका नाम आनरेरी मैनेजर के रूप में छापना शुरू कर दिया। उनके उत्तेजक लेख भी ब्राह्मण में छपा करते थे।
इसी बीच उन्होंने देश के तत्कालीन हालात पर एक पुस्तक भी लिखी जो कि इतनी उग्र भाषा में थी कि उसे पढ़ने के बाद कानपुर के तत्कालीन सुप्रसिद्ध समाजसेवी व जाने माने वकील पं० पृथी नाथ ने कहा था कि अभी ऐसी रचनाओं का समय नहीं है और उनके कहने पर उन्होंने पुस्तक को जला दिया था। इधर आर्थिक स्थिति निरंतर बिगड़ने से परिवार की परेशानियां बढ़ती ही जा रही थीं। अत: उन्हें पिता जी का हाथ बंटाने की नीयत से न चाहते हुये भी कानपुर छोड़ना पड़ा और वह पिता जी के साथ हसनपुर (गुड़गांव) आ गये। इसी दौरान उनकी पुत्री का भी देहांत हो गया। यह समाचार पाकर उनका मन और व्यथित हो गया। काम-काज से मन उचाट होने से कोसीकलां (मथुरा) चले आये पर दुर्भाग्य ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। सन् १९०१ में १६ वर्ष की आयु में उनकी एक मात्र निशानी बचे इकलौते पुत्र का निधन हो गया। जिससे वह बिल्कुल टूट से गये। मन उचाट हो गया। बेटे पर आई भारी विपदा से दुखी पिता गोकुल चंद्र जी ने दुबारा विवाह करने को कहा। पहले तो वह मना करते रहे पर जब बेहद दबाव में तैयार हुये तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि वह दुबारा विवाह करेंगे तो सिर्फ किसी विधवा से ही करेंगे। इस पर परिवारवाले राजी नहीं हुये थे अतएव उन्होंने विधुर रहने की प्रतिज्ञा कर ली।
परिवार के छिन्न-भिन्न होने व परिवार की आर्थिक स्थिति डावांडोल होने से क्षुब्ध राधा मोहन जी का मन आगरा में लग नहीं रहा था सो अचानक घर छोड़कर बम्बई चले गये। वहां से बीकानेर जयपुर आदि जगहों पर भटकते रहे पर उनका मन इतना बेहाल था कि कहीं भी उन्हें चैन नहीं मिल पा रहा था। अंतत: सन् १९०४ में वह कलकत्ता जा पहुंचे। यहीं से उनके जीवन को एक और नई दिशा मिली। वैश्य समाज में उन्होंने पैठ बना ली और युवाओं को ब्रिटिश साम्राज्य के विरूद्ध क्रांतिकारियों की सहायता करने व क्रांति आंदोलनों में भाग लेने को प्रेरित करने लगे। इसी बीच आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद जी के विचारों से इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने आर्य समाज के सहयोग से ‘सत्य सनातन धर्म’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू कर दिया। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं पाखण्डों पर जोरदार हमला शुरू कर दिया। इससे भले ही वैश्य समाज उनसे नाराज हुआ पर समाज के बीच उनकी प्रतिष्ठा व स्वीकार्यता बढ़ती चली गई। हालांकि तीन वर्षों बाद उनका साप्ताहिक पत्र बंद हो गया पर इस दौरान उनकी प्रतिष्ठा तत्कालीन नामवर साहित्यकारों/पत्रकारों मसलन पुरूषोत्तम दास टंडन, श्याम सुन्दर दास, ईश्वरी प्रसाद शर्मा, गणेश शंकर विद्यार्थी, महादेव प्रसाद सेठ, शिव पूजन सहाय आदि के बीच स्थापित हो चुकी थी। तत्कालीन छायावादी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ तो उन्हें अपना राजनीतिक गुरु ही मानते थे।
एक तरफ राधा मोहन जी ने सत्य सनातन धर्म के माध्यम से जहां लोगों को सामाजिक कुरीतियों से छुटकारा दिलाया वहीं अपने क्रांतिकारी व जोशीले लेखों से क्रांतिकारी आंदोलन में प्राण फूंकने का काम किया। उन्होंने न केवल अपने लेखों से वरन् आर्थिक रूप से क्रांतिकारियों की भरपूर मदद करने में महती भूमिका निभाई। उस समय कलकत्ते में सक्रिय प्रसिद्ध क्रांतिकारी आशुतोष लाहिड़ी उनके पक्के दोस्त बन चुके थे। सन् १९१४ में जब क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ मुखर्जी ने जर्मन की बनी पिस्तौलों से भरे बक्से को गायब कर लिया तो उसे पार करने और छिपाने की जिम्मेदारी राधा मोहन जी ने निभाई थी। उन्हीं के प्रेरणा और प्रयत्नों से कुछ मारवाड़ी युवकों ने इसमें आर्थिक मदद दी थी।
सत्य सनातन धर्म के प्रकाशन के दौरान ही सन् १९०८ में उन्होंने अपनी पहली पुस्तक ‘देश का धन’ लिखी। इसमें उन्होंने धन कमाने से लेकर उसके उपयोग, सुरक्षा के साथ श्रम की भूमिका पर व्यापक प्रकाश डाला था। १९१२ में उन्होंने ‘नीति दर्शन’ नाम से दूसरी पुस्तक लिखी जिसमें उन्होंने समाज के समग्र कल्याण को लेकर नीतियां बनाने पर जोर दिया। नीति दर्शन में नीति से उनका तात्पर्य है- नीति मनुष्य के सहज कर्तव्य पथ का नाम है। स्पष्ट है कि वह सुसंस्कृति शब्द समाज के निर्माण में प्रत्येक नागरिक के सोच और आचरण की नीति तय कर लेना चाहते थे। ऐसी नीति जिसके मूल्य में लोक मंगल हो।
संयोगवश तत्कालीन सुप्रसिद्ध लेखक पं० सुन्दर लाल जी की घनिष्ठा के चलते उनके आग्रह पर वह नागपुर आ गये। जहां उन्होंने पं० जी के जेल जाने पर उनके द्वारा स्थापित असहयोग आश्रम का संचालन बखूबी किया। उन्होंने यहां भी स्वयं तो क्रांतिकारी गतिविधियों में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया ही अनेक युवकों को भी क्रांतिकारी आंदोलन का सहभागी बनाया। नागपुर से उन्होंने एक क्रांतिकारी युवक सतीदास मूंधड़ा द्वारा प्रकाशित ‘प्रणवीर’ का सम्पादन शुरू कर दिया। उनके सम्पादन में ऐसे-ऐसे लेख व विचार छपने लगे कि अंग्रेजों के बीच तहलका मच गया। ‘प्रणवीर’ कार्यालय नागपुर से ही ‘मेजनी’ और ‘गैरीबाल्डी’ के जीवन चरित्र पर उन्होंने अपनी लिखी दो पुस्तकों का भी प्रकाशन किया। इन सबका नतीजा यह निकला कि वह गिरफ्तार कर जेल में डाल दिये गये। इसी बीच प्रणवीर के सम्पादक का कार्य उनके कहने पर उनके सहयोगी सत्यभक्त जी ने संभाला पर विपरीत परिस्थितियों के चलते प्रणवीर का प्रकाशन भी बंद हो गया। जेल से छूटने के बाद उन्होंने देश में घूम-घूमकर क्रांति की अलख जगानी शुरू कर दी और लेखन कार्य भी जारी रखा।
प्रणवीर बंद हो जाने के बाद सत्य भक्त जी कानपुर आ गये और मजदूरों के बीच काम करना शुरू कर दिया। जब २५ दिसम्बर १९२५ को कम्युनिस्ट पार्टी के गठन की पहली बैठक हुई तो उसमें राधा मोहन गोकुल जी शामिल हुये और फिर कानपुर में ही रम गये। उनके यहां आने से गणेश शंकर विद्यार्थी, चन्द्रशेखर आजाद तथा भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को और बल मिला। मजदूर आंदोलनों को धार देने के लिये जब सत्यभक्त जी ने ‘साम्यवादी’ नामक पाक्षिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया तो राधा मोहन जी हर स्तर पर उन्हें सहयोग करते रहे।
साम्यवाद से लोगों को परिचित कराने की दृष्टि से सन् १९२४ में ही उन्होंने ‘कम्युनिज्म क्या है’ नामक पुस्तक भी लिखी पर उसका प्रकाशन फरवरी १९२७ में हो सका। कानपुर में उन्होंने साम्यवाद को नई धार तो दी ही क्रांतिकारियों को नई ऊर्जा भी दी। कानपुर के क्रांतिकारी आंदोलन में उनका योगदान इतना व्यापक है कि जिसे यहां विस्तार से दिया जाना संभव नहीं है। साण्डर्स कांड के बाद पुलिस राधा मोहन जी के पीछे ही पड़ गई और सन् १९३० में वह गिरफ्तार कर लिये गये जिसमें उन्हें दो वर्ष की सजा हुई। १९३२ में जब वह जेल से छूटे तो उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ चुका था कि चलना फिरना मुश्किल हो रहा था। ऐसे में वह पहले ही इलाहाबाद जा चुके अपने सहयोगी सत्य भक्त जी के बुलावे पर इलाहाबाद चले गये। हालांकि पुलिस के बराबर पीछा करते रहने व दबाव के चलते जल्द ही उन्होंने इलाहाबाद छोड़ दिया और पुलिस से बचने को साधु वेश धारण कर हमीरपुर के खोही गांव में आश्रम बनाया। यहीं से उन्होंने अपनी क्रातिकारी गतिविधियां जारी रखीं। यहीं वह कानपुर, बनारस, इलाहाबाद, बंगाल व अन्य जगहों से आने वाले क्रांतिकारियों से मिलते जुलते थे तथा गुप्त मंत्रणायें चलती थीं। वह ब्रिटिश सत्ता के विरोधी जमीनदारों से जो भी हथियार और धन जमा करते उसे वह उन क्रांतिकारियों को सौप देते थे। यह बात ज्यादा दिनों तक छिपी न रह सकी और धीरे-धीरे उस पूरे इलाके में फैल गई। इसी दौरान अंग्रेज परस्त कुछ जमीनदारों की शिकायत पर कलेक्टर ने उन्हें समन जारी कर जिला मुख्यालय तलब कर लिया। किसी को क्या मालूम था उनका यही दौरा उनके लिये जानलेवा सिद्ध होगा।
क्लेक्टर के फरमान पर वह टट्टू पर बैठकर जिला मुख्यालय के लिये रवाना हो गये। पहले से ही बीमार शरीर, लम्बी यात्रा व घटिया खानपान से वह और टूट गये। आखिरकार जब वह खोही वापस लौटे तो बिस्तर पर गिर गये और पेचिश का शिकार हो गये। चूंकि उस क्षेत्र में इलाज की कोई कारगर व्यवस्था न थी सो देहाती जड़ी बूटियों से ही उनका उपचार चलता रहा पर शायद इस क्रांतिकारी शेर को ईश्वर के सिर्फ बुलावे का इंतजार था। करीब सप्ताह भर घोर कष्ट भोगने के बाद अंतत: राष्ट्र के इस महान सपूत का ३ सितम्बर १९३५ को महाप्रयाण हो गया। स्थानीय लोगों ने आश्रम के समीप ही पूरे मान सम्मान के साथ उन्हें समाधि दे दी। ऐसे थे एक महान क्रांतिकारी, लेखक व पत्रकार राधा मोहन गोकुल जी!
(प्रभासाक्षी से साभार)
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अब ट्रांसजेंडर भी ऑनलाइन जमा कर सकेंगे इनकम टैक्स
नयी दिल्ली : आयकर विभाग ने आयकर रिटर्न फॉर्म में अब ट्रांसजेंडर का भी विकल्प दिया है। ट्रांसजेंडर को सामाजिक पहचान देने के लिए पुडुचेरी प्रशासन ने यह पहल शुरू की है। पहले इन्हें फॉर्म में खुद को महिला या पुरुष बताना पड़ता था। लेकिन अब इनके लिए तीसरा ऑप्शन दिया गया है। बता दें कि आधार में थर्ड जेंडर का विकल्प दिया गया है जबकि पैन कार्ड में यह ऑप्शन नहीं है। ऐसे में पैन कार्ड में महिला या पुरुष बताने में परेशानी हो रही थी। इससे आधार और पैन आपस में लिंक भी नहीं हो पा रहे थे।
महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में पुडुचेरी में कंसल्टेंट डॉ समीरा महमूद जहांगीरदार ने अपने जेंडर को थर्ड जेंडर घोषित किया था। लेकिन उन्हें पैन कार्ड में खुद को पुरुष घोषित करना पड़ा था। इस कारण उनका आधार और पैन कार्ड आपस में लिंक नहीं हो पा रहे थे।
इसी को ध्यान में रखते हुए पुडुचेरी में ई-फाइलिंग पोर्टल्स में ट्रांसजेंडर विकल्प की शुरुआत के लिए कई बार ऑनलाइन पिटिशन भी दायर की गई थी। समीरा ने इसके लिए इनकम टैक्स के प्रिंसिपल सेक्रटरी जहनाब अख्तर से मुलाकात की और उनसे मदद मांगी। इसके बाद उन्होंने संबंधित विभाग को निर्देश दिया और ई-पोर्टल्स पर फाइलिंग के दौरान तीसरे जेंडर के विकल्प को भी तैयार करने को कहा। साथ ही समीरा को पैन में तीसरा जेंडर ना आने तक आधार-पैन लिंकिंग से भी छूट दी गई। बता दें कि 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में लगभग 5 लाख लोग थर्ड जेंडर में आते हैं।
बदल गये आयकर के यह नियम, सेस में हो जाएगी बढ़ोतरी
1 अप्रैल से इनकम टैक्स के नियमों में कई तरह के बदलाव हो गये जिनका असर आप पर सीधे-सीधे पड़ने वाला है। हालांकि इन नियमों का लाभ आपको अगले साल 2019 में आईटीआर भरने पर मिलेगा। इन नियमों के लागू हो जाने के बाद आपके वेतन पर भी इसका बड़ा असर पड़ेगा। इसलिए आपको इन बड़े बदलावों के बारे में जानना बेहद जरूरी है।
वरिष्ठ नारिकों के लिए बढ़ेगा हेल्थ इन्श्योरेंस का कवर
धारा 80डी के अंतर्गत स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम या चिकित्सा व्यय हेतु कटौती सीमा को 30 हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपए कर दिया गया है। अब सभी वरिष्ठ नागरिक किसी स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम या किसी चिकित्सा के संदर्भ में 50 हजार रुपये प्रतिवर्ष तक कटौती के लाभ का दावा कर सकेंगे।
गंभीर बीमारी के लिए 1 लाख रुपये का कवर
80डीडीबी के अंतर्गत गंभीर बीमारी से संदर्भ में चिकित्सा खर्च के लिए कटौती सीमा को वरिष्ठ नागरिकों के मामले में 60 हजार रुपये से और अति वरिष्ठ नागरिकों के मामले में 80 हजार रुपये से बढ़ाकर सभी वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक लाख रुपए का प्रस्ताव किया। इन रियायतों से वरिष्ठ नागरिकों को 4 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त कर लाभ प्राप्त होगा।
स्टैंडर्ड डिडक्शन में मिलेगी 40 हजार की छूट
प्रत्येक करदाता को रिटर्न फाइल करते वक्त 40 हजार रुपये की छूट मिलेगी। हालांकि इसका सबसे ज्यादा फायदा कम टैक्स देने वालों को मिलेगा। इससे प्रत्येक व्यक्ति की टैक्सेबल इनकम में कम से कम 5800 रुपये की बचत होगी।
सेस का लगेगा झटका
व्यक्तिगत एवं कॉरपोरेट टैक्स पर शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेस को 3 से बढ़ाकर चार फीसदी कर दिया गया है। जबकि 50 लाख रुपये से ज्यादा की आय पर 10 फीसदी और एक करोड़ रुपये से ज्यादा की आय पर 15 फीसदी का सरचार्ज जारी रहेगा।
15 लाख का निवेश कर सकेंगे सीनियर सिटीजंस
प्रधानमंत्री वय वंदना योजना को मार्च 2020 तक बढ़ाया गया है। इस योजना के तहत भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा 8 प्रतिशत निश्चित प्रतिलाभ प्रदान किया जाता है। इस योजना के तहत प्रति वरिष्ठ नागरिक 7.5 लाख रुपए की मौजूदा निवेश सीमा को बढ़ाकर 15 लाख रुपए किया जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा- रजामंदी से हुई बालिगों की शादी में दखलअंदाजी गैरकानूनी
नयी दिल्ली : अगर दो बालिग अपनी मर्जी से शादी करते हैं तो इसमें किसी को दखलअंदाजी करने का कोई हक नहीं है। खाप पंचायत की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि शादी को लेकर खाप पंचायतों का कोई भी फरमान गैरकानूनी है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि जब तक केंद्र सरकार इस मसले पर कानून नहीं लाती, तब तक कोर्ट का आदेश प्रभावी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट में गैर सरकारी संस्था शक्ति वाहिनी ने खाप पंचायतों के खिलाफ याचिका दायर की थी।
शक्ति वाहिनी ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मांग की थी कि केंद्र और राज्य सरकारों को ऑनर किलिंग रोकने के मामलों पर रोक लगाने के लिए निर्देश जारी करे। खाप पंचायत मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यों वाली बेंच कर रही है और इस बेंच की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यों वाली बेंच की अध्यक्षता खुद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा कर रहे थे। इस बेंच में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी थे। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 7 मार्च को भी कहा था कि जब दो बालिग लड़का-लड़की अपनी मर्जी से शादी करते हैं तो रिश्तेदार या तीसरा पक्ष इसमें दखल नहीं दे सकता और न ही उनके खिलाफ हिंसा कर सकता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लड़का या लड़की की पृष्ठभूमि क्या है या वे किसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। चीफ जस्टिस ने यह भी कहा था कि मैं किसी जाति या ग्राम पंचायत को खाप कहना पसंद नहीं करूंगा बल्कि लोगों का समूह कहना उचित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मथुरा-वृंदावन के मंदिरों को दिये निर्देश- चढ़ावे के फूलों को ‘विधवाओं’ को दें
नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने विधवा और निराश्रित महिलाओं के लिए मथुरा और वृंदावन के मंदिरों को निर्देश दिये हैं। SC ने कहा कि मथुरा और वृंदावन के मंदिरों में जो फूल आते हैं उन्हें यूपी सरकार द्वारा चलाये जा रहे आश्रय घरों में दे दिया जाये।
सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश इसलिए दिये हैं जिससे विधवा और निराश्रित महिलाएं फूलों से इत्र और धूप बना सकें और उनका जीवन आसानी से चल सके। आपको बता दें कि मथुरा और वृंदावन में सैकड़ों मंदिर हैं जिनमें भारी मात्रा फूल आते हैं जोकि प्रयोग के बाद बर्बाद हो जाते हैं। इन फूलों का प्रयोग इत्र और धूप बनाने में किया जा सकता है इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश मथुरा और वृदांवन के मंदिरों को दिये हैं।
6 जून को भारतीय छात्र कर सकेंगे अमेरिकी वीजा के लिए आवेदन
नयी दिल्ली : अमेरिका जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए छह जून की तिथि अहम है। भारत में अमेरिकी दूतावास के काउंसल जनरल एच हॉगमैन ने बृहस्पतिवार को वीजा दिवस की घोषणा कर दी। इस दौरान उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे वीजा इंटरव्यू के दौरान पूछे गए सवालों को ध्यान से सुनें और सही उत्तर के साथ जवाब दें।
वीजा दिवस यानी छह जून को दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास और इसके चार वाणिज्य दूतावास – चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और मुंबई भारतीय छात्रों के लिए आवेदन के लिए खुले रहेंगे। इंटरव्यू प्रक्रिया करीब 30 मिनट की होगी। इस दौरान छात्रों से पूछा जा सकता है कि वह अमेरिका जाकर उच्च शिक्षा हासिल क्यों करना चाहते हैं। साथ ही छात्रों से कोर्स के लिए वित्तीय योजना के बारे में भी पूछा जा सकता है।
हॉगमैन ने कहा कि अमेरिका में छह अंतरराष्ट्रीय छात्रों में से एक भारतीय हैं। उन्होंने पिछले साल की एक रिपोर्ट का हवाला दिया कि वर्तमान में 1.86 लाख भारतीय छात्र अमेरिका में हैं।
वह बोले, छात्रों के लिए वीजा हासिल करने का रहस्य यह है कि ऐसा कोई रहस्य नहीं है। आप हमारे अधिकारियों के पूछे प्रश्नों को ध्यान से सुनें और उनका ईमानदारी से जवाब दें। हॉगमैन ने आगे कहा, हम जानते हैं छात्र घबराए हैं। लेकिन बता दें कि घबराए हुए छात्रों को भी हमने वीजा दिया है
सिंगापुर के लिए भारतीय क्रूज पर्यटकों में 25 प्रतिशत वृद्धि : रिपोर्ट
सिंगापुर : लग्जरी क्रूज के जरिये सिंगापुर आने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या पिछले साल1,27,000 रही है जो2016 के मुकाबले25 प्रतिशत अधिक है। सिंगापुर स्थित क्रूज कंपनियों ने इसकी रिपोर्ट दी है। स्ट्रेट्स टाइम्स में छपी एक खबर के मुताबिक, भारत से आने वाले फ्लाई- क्रूज पर्यटकों की संख्या में भी वृद्धि हुई है। फ्लाई- क्रूज पर्यटक वैसे पर्यटक होते हैं जो क्रूज पर सवार होने की जगह तक सीधे उड़ान से पहुंचते हैं। नॉर्वेजियन क्रूज लाइन होल्डिंग्स के एक प्रवक्ता ने कहा, कंपनी का मानना है कि भारतीय बाजार में दहाई अंकों से वृद्धि की क्षमता है।
उसने कहा, ‘‘ हम सिंगापुर के लिए फ्लाई- क्रूज की बुकिंग कराने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में वृद्धि देख रहे हैं। सिंगापुर से वे कई अन्य देशों की भी सैर कर सकते हैं और यह उनके द्वारा चुने गये क्रूज पैकेज पर निर्भर करता है।’’ रॉयल कैरेबियन के एक प्रवक्ता ने कहा कि उसकी कंपनी से बुकिंग कराने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में सालाना10 से20 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है।
प्रवक्ता ने कहा कि भारतीय पर्यटक एक ही ट्रिप का पैकेज लेना पसंद करते हैं लेकिन वे एक ही बार में कई देशों की सैर करने में भी सक्षम हैं। रीजेंट सिंगापुर होटल के प्रवक्ता ने कहा कि उनके यहां ठहरने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या में सालाना एक से दो प्रतिशत की वृद्धि हो रही है। उसने कहा, ‘‘ हम समझते हैं कि उनमें से कुछ लोगों के खान- पान की आदतें काफी कठिन हैं और हम उसी हिसाब से मेन्यू रखते हैं।’’
सिंगापुर टूरिज्म बोर्ड के अनुसार, भारत एवं चीन के10 में से करीब सात पर्यटक छुट्टियां मनाने आते हैं और सामान्यत: सिंगापुर के शानदार जगहों से आकर्षित होते हैं। बोर्ड के अनुसार, जनवरी2017 से जून2017 के बीच भारतीय पर्यटकों की संख्या15 प्रतिशत बढ़कर करीब6.60 लाख रही है।




