Friday, April 10, 2026
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तेंदुलकर ने सीबीएसई से कहा, सभी कक्षाओं के लिए रोजाना हो खेल का पीरियड

नयी दिल्ली : मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ( सीबीएसई ) के द्वारा कक्षा नौ से 12 तब के छात्रों के लिए रोजाना खेल के पीरियड को अनिवार्य करने की नीति की तारीफ करते हुए इसे सभी कक्षाओं में इसे लागू करने की आज मांग की।

बोर्ड ने स्कूलों को खेल को लेकर दिशानिर्देश जारी किया है जिसमें कक्षा नौ से 12 तक रोजाना खेल के पीरियड रखने को कहा गया है ताकि छात्रों को सुस्त जीवनशैली से बचाया जा सके।

तेंदुलकर ने सीबीएसई की अध्यक्ष अनिता करवल को लिखे पत्र में कहा , ‘‘ मोटापे के मामले में विश्व में भारत का तीसरा स्थान है जो गंभीर चिंता की बात है। अस्वस्थ युवा देश के लिए किसी महामारी की तरह है। देश में मजबूत खेल संस्कृति इस मामले से निपटने में मदद कर सकता है। ’’

उन्होंने कहा , ‘‘ स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा के लिए रोजाना एक पीरियड अनिवार्य करना इस दिशा में सही कदम है। इस पहल को हालांकि निश्चित रूप से और भी आगे बढाया जा सकता है। ’’

तेंदुलकर ने कहा , ‘‘ चूंकि इस पहल का समग्र उद्देश्य बच्चों में मोटापा को रोकना है , इसलिए बोर्ड अन्य सभी कक्षाओं में भी स्वास्थ्य और फिटनेस को अनिवार्य बनाने पर विचार करना चाहिए। ’’

बोर्ड ने स्कूलों के लिए नौवीं से 12 वीं कक्षा में इसे लागू करने के लिए 150 पन्नों का खेल दिशानिर्देश जारी किया है जिसमें उसे लागू करने और तौर तरीके के बारे में बताया गया है।

तय कीजिए कि आप समाज को हैवान नहीं इंसान देंगी

ये दौर बहुत अजीब है…हर ओर संशय से घिरे हम…एक दूसरे पर शक कर रहे हैं। कहने को धर्म जोड़ता है मगर अपनी जिद और अहंकार में हमने इसे दीवार में तब्दील कर दिया है और हालत इतनी खराब है कि अब तो अपराध की गम्भीरता को धर्म के हिसाब से आँका जा रहा है और इसकी जद में हम सब आ रहे हैं…तमाम बच्चे…तमाम औरतें…और ये सारी दुनिया…..दो हिस्सों में बँट गयी है और जहर ही जहर फैल रहा है। इससे भी खराब स्थिति है हमारी जो आँख बंद करके कुछ भी बस आगे सरका दे रहे हैं।

औरतों और बच्चियों के साथ होने वाली हैवानियत को हिन्दू या मुस्लिम औरत या बच्चे के हिसाब से आँकना और इस पर हो रही बहस बता देती है कि हमारी सोच किस गटर में जा रहे हैं। पीड़िताओं की वीभत्स तस्वीरें साझा करके आप हमदर्दी नहीं जता रहे बल्कि मरने के बाद भी उसकी तकलीफ का घृणित सौदा कर रहे हैं। ऐसी स्थिति  में स्त्रियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है, उनको बेटियों के साथ अब बेटों की परवरिश और एक स्वस्थ मानसिकता बनाने के लिए आगे  बढ़ना होगा। रिश्तों से ऊपर उठकर गलत को गलत कहने की आदत डालनी होगी और लड़कियों को इंंसान समझने की प्रवृति लड़कों  में डालनी होगी।

समय आ गया है जब इस देश में बचपन से ही काउंसिलिंग पर जोर दिया जाए और एक ऐसा दिमाग विकसित किया जाए जो इन्सानों की तरह सोचे। यह जिम्मेदारी अब हर औरत और हर माँ को उठानी होगी कि वह अपने बच्चों को लड़के या लड़की की तरह नहीं बल्कि एक इन्सान की तरह बड़ा करे। तय कीजिए कि आप समाज को हैवान नहीं बल्कि इंसान देंगी तभी मातृत्व की सही परिभाषा को हर स्त्री रूपायित कर सकेगी..और हर बेटी को एक सुरक्षित दुनिया दे सकेगी।

नकारात्मक लोगों को नजरअंदाज करें

जब भी बात फैशन की होती है तो छरहरी काया दिमाग में होती है। रैम्प पर आपने कम ही मॉडल देखे होंगे जो ओवरसाइज्ड हैं। मोटापा एक समस्या है मगर मोटापे के शिकार लोगों के प्रति भी हमारी धारणा बेहद खराब होता है और कुछ हद तक निर्मम भी। रेनेसां की संचालक अत्री सेन भी इन कड़वे अनुभवों से गुजरीं मगर इस उपेक्षा के बीच में से उन्होंने अपने लिए रास्ता बनाया और वे ओवरसाइज्ड कपड़े ही बनाती हैं। अपराजिता में मुलाकात  इस बार अत्रेयी सेन से…

बचपन से ही फैशन डिजाइनर बनना चाहती थी। स्कूल में हमेशा क्रिएटिव आटर्स में आगे रही। मैंने अकादमी ऑफ फाइन आट्र्स में पेंटिंग सीखी है और मुम्बई में एनआईटी का बेसिक कोर्स इन ग्रूमिंग किया।

परिवार में मम्मी और मौसी से काफी सीखा। घर में फैशन का माहौल था। मैं ओवरसाइज्ड थी मगर मुझमें आत्मविश्वास था। परिवार में इस वजह से मुझे कुछ लोगों के कारण परेशानी उठानी पड़ी मगर मेरी सहेलियों ने मेरा साथ दिया और हौसला बढ़ाया।

आज 90 प्रतिशत लोग मोटापे का शिकार हैं और ओवरसाइज्ड होने के कारण वे अक्सर अपनी पसन्द के कपड़े नहीं पहन पाते। बाजार में उनके लिए कुछ नहीं मिलता। यह एक बड़ा कारण था कि मैंने फैशन का क्षेत्र चुना। मुझे लगता है कि आपकी अंदरूनी खूबसूरती का असर आपके बॉडी लैंग्वेज पर पड़ता है। रेनेसा का मतलब होता है जागृति जो मैंने 2010 में शुरू किया था।

आप कुछ भी पहनिए, आप किस तरह से पहनती हैं, यह बहुत मायने रखता है। अब लोगों की मानसिकता बदल रही है मगर पूरी तरह बदलने में इसे समय लगेगा। हमारे पास हर बजट में कुछ न कुछ है।

बच्चों ने हमेशा मेरा साथ दिया है। अब मैं अपना शो करना चाहती हूँ। भविष्य के लिए योजनाएं नहीं बनाती।

सकारात्मक रहें, मुस्कुराते रहें और नकारात्मक लोगों को नजरअंदाज करें।

शोध में पक्ष और विपक्ष कुछ नहीं होता : कमल किशोर गोयनका

डॉ॰ कमल किशोर गोयनका दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अवकाशप्राप्त प्राध्यापक हैं। उन्होंने वहाँ चालीस वर्ष अध्यापन किया। गोयनकाजी उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द के साहित्य के सर्वोत्तम विद्वान शोधकर्ता माने जाते हैं। मुंशी प्रेमचन्द पर उनकी अनेकों पुस्तकें व लेख प्रकाशित हो चुके हैं। प्रवासी हिन्दी साहित्य को एकत्रित करने, अध्ययन एवं विश्लेषण करने में उनकी अहम भूमिका रही। साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित प्रेमचन्द ग्रंथावली के संकलन एवं सम्पादन में उनका विशेष योगदान है। उन्होंने हिन्दी में हाइकु कवितायें भी लिखी हैं।

मैं जयशंकर प्रसाद पर पीएचडी करना चाहता था मगर मेरे मन का विषय नहीं मिल पाया मेरे गुरू के कहने पर मुझे विषय बदलना पड़ा। आखिर प्रेमचंद पर शोध किया और मुझे 8 साल लगे। मेरा मानना है कि शोध का विषय चुनने की स्वतंत्रता विद्यार्थियों को मिलनी चाहिए। वह जिस बारे में जिज्ञासा महसूस करे…जिसको लेकर उसके मन में सवाल उठें…उसी पर काम करने की स्वतंत्रता उसे मिलनी चाहिए। 9 पुस्तकें पढ़कर 10वीं पुस्तक लिखने में कौन सा नयापन है?
1962 में जब प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय ने प्रेमचंद की 9 पुस्तकें प्रकाशित कीं और इन 9 पुस्तकों को देखकर लोगों ने समझ लिया कि प्रेमचंद पर जितना काम होना था, हो गया और अब उस पर कुछ नहीं हो सकता। पीएचडी करते हुए भी ऐसी प्रवृति हुई कि अब इस विषय पर कुछ नहीं हो सकता।

 

 

1980 में प्रेमचंद विश्व कोश की परिकल्पना की, 100 साल पूरे हुए थे उनकी जयंती के। राष्ट्रीय स्तर पर कमेटी बनी। जैनेन्द्र कुमार अध्यक्ष थे और मैं महामंत्री था। दो खंडों में प्रकाशित प्रेमचंद विश्व कोश में ताराख के अनुसार जीवनी लिखी गयी। उसमें बहुत से तथ्य थे और दस्तावेज के साथ थे….ऐसे तथ्य सामने आये जिससे प्रेमचंद की आदर्श छवि को धक्का पहुँचने वाला था।

पूरे साहित्य जगत में हलचल मच गयी और मैंने वामपंथी लेखकों का विरोध भी झेला। नयी जानकारी के अनुसार मुंशी प्रेमचंद ने अपनी बेटी कमला देवी की शादी में 7 हजार रुपये दहेज में दिये थे और यह बात खुद उनकी बेटी ने बतायी थी। विवाह 1929 में हुआ था। प्रेमचंद और उनके समधी के बीच हुई बातचीत से संबंधित दस्तावेज भी मेरे पास थे इसलिए मैं अपनी बात पर दृढ़ रह सका। शोध में पक्ष और विपक्ष कुछ नहीं होता। जब हम इतिहास खोजते हैं तो कोई नया तथ्य सिर्फ इस वजह से नहीं छिपा सकते कि कि किसी बड़े व्यक्तित्व की आदर्श छवि खंडित होगी।

प्रेमचंद की 300 कहानियाँ हैं, हम उनमें से एक तिहाई भाग को ही जानते हैं। 299 कहानियों का संकलन नया मानसरोवर के नाम से 1988 में भारतीय ज्ञानपीठ ने प्रकाशित किया। किसी व्यक्तित्व अथवा विषय को जानने के लिए जीवन की आहुति देनी पड़ती है।
प्रेमचंद की 300 कहानियों में 3 हजार चरित्र हैं। वे अपने चरित्रों के माध्यम से मनुष्यता का संदेश देते हैं। उनका साहित्य मनुष्यता के भावों की व्याख्या करता है। उनके चरित्र मनुष्यता की रक्षा करते हैं और यह मनुष्यता कफन कहानी में भी दिखायी पड़ती है।
प्रेमचंद साम्यवाद अथवा वामपंथ का समर्थन करने के कारण महान नहीं हैं। 1928 में उन्होंने साम्यवाद को पूँजीवाद से भी ज्यादा भयानक बताया था। उनके पात्र समय का सत्य बताते हैं। प्रेमचंद सिर्फ ग्रामीण चिंतन के लेखक नहीं हैं। गोदान में वे, गाँव और शहर, दोनों को इक्कठा करते हैं। प्रेमचंद को समग्रता से पढ़े जाने की जरूरत है। साहित्य को जीवन बनाइए, जीवन को साहित्य। हिन्दी को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लाकर ही उसका विकास सम्भव है।

(कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला की श्रृंखला के तहत दिये व्याख्यान के कुछ अंश)

धर्म के शोर में भक्ति काव्य मानवता का महान संदेश है

कोलकाता : भक्ति साहित्य धार्मिक सुधार की आवाज है और यह उच्च मानवीय मूल्यों की स्थापना करता है। 21वीं सदी में भक्त कवियों सूर, कबीर, तुलसी, जायसी और मीरा को अखंडता में देखना चाहिए, साथ ही हर भक्त कवि की विशिष्टता को भी समझने की जरूरत है। भारतीय भाषा परिषद और श्री शिक्षायतन कॉलेज द्वारा सम्मिलित रूप से भक्ति काव्य पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में विद्वान वक्ताओं ने वर्तमान युग में भक्ति काव्य की महत्ता पर चर्चा की। बीज भाषण देते हुए बनारस हिंदू विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर अवधेश प्रधान ने कहा कि भक्ति काव्य मनुष्य के आत्म जगत का विकास कर विश्‍वात्मा से जोड़ता है और संकीर्णता की हर दीवार तोड़ देता है। भक्त कवियों ने लोक भाषाओं में अपनी रचना लिखी तभी यह जन मानस को छू सकी। प्रेसिडेंसी विश्‍वविद्यालय के विभागाध्यक्ष प्रो. वेद रमण ने कहा कि भक्त कवियों की दृष्टि में प्रेम सबसे ऊपर है। उन्होंने जायसी के पद्मावत के आधार पर बताया कि ईश्‍वर तक पहुंचने उतने रास्ते हो सकते हैं जितने आकाश के नक्षत्र और शरीर के रोएं हैं। जालान गर्ल्स कॉलेज के प्रो.विवेक सिंह ने कहा कि शिक्षण संस्थाओं में भक्ति साहित्य को नए दृष्टिकोण से पढ़ाने की जरूरत है। डॉ.ॠषिकेश राय ने कहा कि हिंदी के भक्त कवियों ने जातीय अखंडता पैदा करने में अहम भूमिका निभाई है। प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि भक्ति और धार्मिक कर्मकांड दो चीजें हैं। भक्ति का संबंध है उच्चतर मूल्यों से है जबकि धार्मिक कर्मकांड कई बार दिखावा होते हैं। सभी भक्त कवियों के तीन मुख्य उद्देश्य थे- घृणा और वैर से मुक्त समाज बनाना, भय मुक्त समाज बनाना और लोभ मुक्त समाज की स्थापना करना।
राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे सत्र में भक्ति साहित्य और वंचित समुदाय पर बोलते हुए बनारस से आए प्रो. आशीष त्रिपाठी ने कहा कि चाहे कृष्ण भक्त कवि हों या निर्गुण कवि हम दोनों की परंपरा में दलित और स्त्री कवियों की पूरी भागीदारी पाते हैं। इन सभी कवियों ने एक ऐसे समाज का स्वप्न देखा था जो पाखंड और सामंती भेदभाव से मुक्त हो। कलकत्ता विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. राजश्री शुक्ला ने कहा कि भक्ति काव्य हर युग में उच्च आदर्शों की प्रेरणा देता रहेगा। कल्याणी विश्‍वविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो.विभा कुमारी ने भक्ति काव्य में स्त्रियों के स्थान पर चर्चा की। दूसरे सत्र का अध्यक्षीय भाषण देते हुए मेघालय से आए प्रो.माधवेंद्र पांडेय ने कहा कि आज की उपभोक्तावादी युग में भक्ति काव्य उच्च मानवता का संदेश है। आरंभ में डॉ.कुसुम खेमानी ने सभी का स्वागत करते हुए यह कहा कि श्री शिक्षायतन और भारतीय भाषा परिषद दोनों संस्थाओं की स्थापना सीताराम सेकसरिया जी ने की थी। ये एक माँ की ही दो संतानें हैं। श्री शिक्षायतन कॉलेज की प्राचार्या डॉ.अदिति दे ने सभी का स्वागत करते हुए ये कहा कि विद्यार्थियों के लिए इस तरह की संगोष्ठी की बहुत अधिक उपयोगिता है। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो.प्रीति सिंघी ने संगोष्ठी की प्रस्तावना प्रस्तुत की। राष्ट्रीय संगोष्ठी का संचालन प्रो.सिंधु मेहता, प्रो.अल्पना नायक और श्री पीयूषकांत राय ने किया और धन्यवाद ज्ञापन प्रो.रचना पांडेय ने किया। इस संगोष्ठी में शिक्षकों और विद्यार्थियों की भारी उपस्थिति थी।
प्रेषक – सुशील कान्ति

बहिष्कार, ब्लेम गेम, धर्म और राजनीति में पीछे धकेल दी गयी औरत…दफन हो गये बच्चे

सुषमा कनुप्रिया

महीने बीत गये…साल गुजर गये….सदियाँ गुजर गयीं…वक्त बदला मगर नहीं बदला तो औरतों को देखने का नजरिया। मैं कल्पना कर रही हूँ कि महाभारत काल में अगर सोशल मीडिया होता तो क्या होता….पक्ष – विपक्ष की राजनीति होती…सब ताल ठोंकते और इसके बाद ये बहिष्कार और वह बहिष्कार का ब्लेम गेम खेला जाता। सब होता मगर वह न होता जो हुआ…द्रोपदी…भाग्यशाली थी….अब लगता है…। कहते हैं कि लेखन प्रतिरोध का सशक्त माध्यम है मगर प्रतिरोध आप कैसे करेंगे….अधिक से अधिक सुविधाजनक तरीका अपनाकर? कुछ दिन के लिए अपनी तस्वीर की जगह काला रंग भर देंगे…उससे क्या होगा…एक दिन की खबर बनेगी…फिर…? यह विडंबना है कि भारतीय समाज में जैसे-जैसे स्वतंत्रता और आधुनिकता का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ा है। प्राचीन समाज ही नहीं आधुनिक समाज की दृष्टि में भी महिलाएं मात्र औरत हैं और उन्हें थोपी व गढ़ी-बुनी गयी तथाकथित नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आना चाहिए। इसी मानसिकता का घातक परिणाम है कि महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, यातनाएं, अनैतिक व्यापार, दहेज मृत्यु तथा यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है. यह स्थिति तब है जब देश में महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण हासिल है। औरतें तो औरतें…अब तो बच्चों को भी नहीं छोड़ा जा रहा। 6 माह से 8 साल….और 8 साल से 70….घिना गये….उससे क्या होगा…भाग सकते हैं क्या हालात से?

गौरतलब है कि भारतीय महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने तथा उनकी आर्थिक तथा सामाजिक दशाओं में सुधार करने हेतु ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं।  इनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रुपण प्रतिषेध अधिनियिम 1986, गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994, सती निषेध अधिनियम 1987, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम 2013 प्रमुख हैं। कितनी औरतों को पता है और जिनको पता नहीं है…उनको बताने के लिए कितनी कोशिश कर रहे हैं आप?

इसके अलावा राजधानी दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 को हुई नृशंस सामूहिक बलात्कार की घटना के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित आक्रोश की पृष्ठभूमि में ‘दंड विधि (संशोधन) 2013 पारित किया गया और यह कानून 3 अप्रैल, 2013 को देश में लागू हो गया। इस कानून में प्रावधान किया गया है कि तेजाबी हमला करने वालों को 10 वर्ष की सजा और बलात्कार के मामले में अगर पीड़ित महिला की मृत्यु हो जाती है तो बलात्कारी को न्यूनतम 20 वर्ष की सजा होगी। इसके साथ ही महिलाओं के विरुद्ध अपराध की एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिसकर्मियों को दंडित का भी प्रावधान है। इस कानून के मुताबिक महिलाओं का पीछा करने और घूर-घूर कर देखने को भी गैर जमानती अपराध घोषित किया है। साथ ही 15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध बनाने को बलात्कार की श्रेणी में रखा गया है लेकिन त्रासदी है कि इन कानूनों के बावजूद भी महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च ऑन वुमेन’(आईसीआरडब्ल्यु) से उद्घाटित हुआ है कि भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रवृत्ति उनलोगों में ज्यादा है जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 52 फीसद महिलाओं ने स्वीकारा है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है। इसी तरह 38 फीसद महिलाओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने तथा जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकारी है। पति परमेश्वर है…और अपना समझकर पीटा जैसे जुमले जब तक हैं….भूल जाइए कि कुछ होने वाला है। एनसीआरबी द्वारा जारी 2016 के आंकड़ों में महिलाओं और बच्चियों के साथ अपराधों में मेट्रो शहरों में जहां दिल्ली को शीर्ष स्थान दिया गया है, वहीं सामूहिक दुष्कर्म के मामलों में हरियाणा अव्वल रहा।

हरियाणा राज्य में 2011 की जनगणना के मुताबिक, प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 879 थी। सीएडब्ल्यू सेल द्वारा 2017 के अंत में जारी किए गए आंकड़ों ने महिलाओं की स्थिति की जमीनी हकीकत खोल कर रख दी है। सेल द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, 2017 के एक जनवरी से 30 नवंबर के बीच राज्य में 1,238 महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए। यानी राज्य में प्रत्येक दिन कम से कम चार महिलाओं के साथ दुष्कर्म हुए। इसके अलावा समान समयावधि में महिला उत्पीड़न के 2,089 मामले दर्ज हुए। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 के दौरान हरियाणा में सामूहिक दुष्कर्म के 191 मामले दर्ज किए गए, जो देश के सबसे बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश से कहीं ज्यादा हैं। वहीं तमिलनाडु में केवल तीन और केरल में सामूहिक दुष्कर्म के 19 मामले दर्ज किए गए।  वहीं बात की जाए देश के अन्य राज्यों की तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के 2016 के आंकड़ें अलग कहानी बयां करते हैं। 2015 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या 3,29,243 थी जो 2016 में 2.9 फीसदी की वृद्धि के साथ बढ़कर 3,38,954 हो गई। इन मामलों में पति और रिश्तेदारों की क्रूरता के 1,10,378 मामले, महिलाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों की संख्या 84,746, अपहरण के 64,519 और दुष्कर्म के 38,947 मामले दर्ज हुए हैं। वर्ष 2016 के दौरान कुल 3,29,243 दर्ज मामलों में सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 49,262, दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल में 32,513 मामले, तीसरे स्थान पर मध्य प्रदेश 21, 755 मामले , चौथे नंबर पर राजस्थान 13,811 मामले और पांचवे स्थान पर बिहार है जहां 5,496 मामले दर्ज हुए। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में अपराध की राष्ट्रीय औसत 55.2 फीसदी की तुलना में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में उच्चतम अपराध दर 160.4 रही। वहीं बात करें मेट्रो शहरों में महिलाओं के साथ अपराधों की तो दिल्ली इस सूची में शीर्ष पर है। 2016 के दौरान मेट्रो शहरों में महिलाओं के साथ अपराध के कुल 41,761 दर्ज हुए जिसमें 2015 के मुकाबले 1.8 फीसदी की वृद्धि देखी गई। 2015 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या 41,001 थी। 2016 के दौरान पति और रिश्तेदारों की क्रूरता के 12,218 (दिल्ली 3,645 मामले), महिलाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों की संख्या 10,458 (दिल्ली 3,746), अपहरण के 9,256 (दिल्ली 3,364) और दुष्कर्म के 4,935 (दिल्ली 1,996) मामले दर्ज किए गए। मेट्रो शहरों में 77.2 की राष्ट्रीय औसत दर की तुलना में दिल्ली में 182.1 फीसदी की सबसे ज्यादा अपराध दर रही।वहीं 2016 में महाराष्ट्र में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4,037 मामले, बेंगलुरू में 1,494, जयपुर में 1,008 और पुणे में 354 मामले दर्ज हुए।

 समस्या की जड़ तो कहीं और है

विरोध के तौर पर आपने एक समाचार पत्र का बहिष्कार कर दिया मगर हर एक मीडिया तो वही काम कर रहा है…खबरों को सनसनीखेज कौन नहीं बना रहा है…आप फिर भी वही देखते हैं…मॉल कल्चर का विरोध करते हैं और बगैर मॉल के आपका काम नहीं चलता। आप फेसबुक पर बलात्कार के आँकड़े भी दिखा देंगे….(जैसे कि हमने भी पेश किए) रेप और अपराध किसी पत्रकार के लिए अच्छी स्टोरी से ज्यादा कुछ नहीं है…कटु सत्य है। क्या बहिष्कार करने से अपराध रुकेंगे या अपनी बात रखने से रुकेंगे। महाभारत और रामायण की घटनाओं के पीछे रावण या दुर्योधन ही नहीं थे…अच्छे लोगों का मौन भी एक बड़ा कारण था…लालसा और बचपन से ही दुर्योधन के अहंकार को पालकर रखना उससे भी बड़ा पाप था। भारत की गुलामी का बड़ा कारण हमारा चारण काल रहा है जो सच को झूठ और झूठ को सच बनाते रहे…।
यह सही है कि बलात्कार को खत्म करने के लिए सख्त सजा का और फाँसी का होना जरूरी है। 2004 में जब धनंजय को फाँसी हुई थी…लड़कियों से बात की थी मैंने…सबको उम्मीद थी कि अब ऐसी घटनायें नहीं होंगी…मगर 2012 में फिर हुई..निर्भया कांड भी हुआ और पार्क स्ट्रीट कांड भी हुआ। कामदुनी कांड भी हुआ…फिर मोमबत्तियाँ गलायी गयीं…और एक बार फिर असम से लेकर गुजरात और जम्मू तक में एक ही कहानी दोहरायी जा रही है।

जब भी बात होती है तो कह दिया जाता है कि मानसिकता बदलनी जरूरी है मगर क्या इसके लिए जमीनी स्तर पर प्रयास करने पर आपका ध्यान दिया गया और सबसे बड़ी बात है कि अपने घरों को बदलने के लिए आपने कितने प्रयास किये…निचली जात के लोग…ऑटो व बस ड्राइवर….रिक्शा वाले…कहना बड़ा आसान है मगर उनका स्तर सुधारने के लिए साहित्यकार, लेखक, पत्रकार क्या कर रहे हैं…।  हम जीवन स्तर सुधारने की बात नहीं कर रहे है मगर वे जो अश्लीलता ढो रहे हैं और बसों में जो बजता है…उसे रोककर स्वस्थ मनोरंजन मुहैया करवाने की जिम्मेदारी आपने कब उठायी? किसी भी बहिष्कार से कभी भी कुछ नहीं सुलझता…आपके किनारा करने से सामने वाले को बहाना मिला…आप अगर 1 या 2 अखबार नहीं खरीदेंगे तो उनका कुछ नहीं बिगड़ने वाला मगर इस कार्यक्रम में जाकर अपना विरोध जताते और प्रबंधन को कठघरे में खड़ा करते तब कुछ जरूर बदलता।  अधिकतर साहित्यकार या तो प्रोफेसर हैं और या किसी बड़े पद पर हैं…निजी स्तर पर अपने आस – पास की दुनिया को सुधारने या फिर लड़कों को जागरुक करने के लिए आपने क्या किया…अधिकतर हिन्दी माध्यम स्कूलों में मैंने शिक्षकों को अरे …तरे वाली जुबान में बात करते देखा है…शिक्षिकाओं को उपेक्षित करते और तंज कसते देखा है और आप चाहते हैं कि दुनिया बदल दें। आप कॉलेज छोड़िए…अपने घरों में लड़कों और लड़कियों को सुधारने के लिए क्या किया…बेटियाँ कभी मंच पर नहीं आतीं और पत्नियाँ आपके आभा मंडल से आच्छादित है…आप घरों में हिंसा करते हैं..नयी लेखिकाओं के चयन में पक्षपात ढूंढते हैं…आप दुनिया बदलेंगे? ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक प्रख्यात पुरस्कार को लेकर किसी दिग्गज लेखक के कटाक्ष का सामना…यहाँ तक कि संबंधों की छींटाकशी का शिकार हिन्दी की एक बड़ी कवियित्री को होना पड़ा था…भगवान के लिए बलात्कार को लेकर भाषण बंद कीजिए..आपने बच्ची को तमाशा बनाकर रख दिया। पत्रकार हूँ…पता है कि एक रिपोर्टर को किस दबाव में काम करना पड़ता है…मीडिया में अधिकतर मेरे मित्र हैं…कुछ जागरण या ऐसे किसी मीडिया संस्थान से हैं….मैं बहिष्कार – बहिष्कार का खेल नहीं खेल सकती क्योंकि रिपोर्टर तो आज मोहरा है…जिसके कंधे पर बंदूक रखकर मीडिया संस्थान अपना हित साधते हैं….अगर रिपोर्टर अड़ा है तो समझ लीजिए कि उसके कंधे पर भी बंदूक है….आदर्श की बातें करना आसान है मगर क्या एक ईमानदार पत्रकार के लिए भी लेखक क्या कभी सड़क पर उतरे हैं….हाल के दिनों में मेरे बहुत से साथियों ने मार खायी…बहुत से पत्रकारों की हत्या हुई..दिल्ली में महिला पत्रकार से बदसलूकी की गयी…मुझे बताइए कि कितने लेखक उतरे हैं उनके लिए…आप लेखकों की उपेक्षा का रोना रो रहे हैं…हम मर जाते हैं तो वो दो लाइनें भी तकदीर से नसीब होती हैं…हर कोई सुरेन्द्र प्रताप सिंह जैसी लोकप्रियता नहीं पाता। कल एक महिला पत्रकार को अलीपुर में घंटों रोककर रखा गया, उससे मारपीट की गयी…सिर्फ इसलिए कि वह विरोधी विचारधारा की थी और अपना काम कर रही थी।

अब बात करते हैं मानसिकता की जो हमारे और आपके आस – पास पल रही है…लड़कियाँ किस तरह के माहौल से जूझ रही हैं….फेसबुक पर कई छात्र और छात्राएँ मेरी मित्र सूची में हैं…यह किस्सा इनमें से ही किसी एक बच्ची के साथ हुआ…लड़कियों के ऑनलाइन रहने से चरित्र की नापतौल होती है…’बच्ची ने फेसबुक पर पूछा कि अगर लड़की देर रात तक ऑनलाइन रहती है तो इसका क्या मतलब है…।’ एक जवाब देखिए….इसका दो मतलब है या तो सिंगल है या तो बहुत लोगो की गधा बना रही है….। दूसरा जवाब भी देखिए….पहला ये की वो अपने लवर के साथ बात कर रही और दूसरा ये की उसकी नीद खुल गयी हो और फिर लग नही रही हो तो वो ऐसे ही चेक कर रही हो। ये लड़के हमारे आस – पास ही रहने वाले हैं….एक ने लिखा कि वह 300 लड़कियों को जानता है और उनमें से कईयों के साथ रिलेशनशिप में रह चुका है…और यही आधार था उसके आकलन का…ये सारे बच्चे पढ़े – लिखे हैं….कॉलेजों में हैं….आप में से किसी न किसी से पढ़ते रहे हैं…बीएचयू में लड़कियों से बदसलूकी करने वाले आसमान से नहीं उतरे थे…और न ही वे विवादास्पद वीसी किसी और दुनिया से आये थे। प्रेसिडेंसी में कुछ साल पहले महिलाओं के अंतर्वस्त्र पहनकर एक छात्र ने विरोध किया तो जेयू में पूरे परिसर में सेनेटरी पैड लगा दिये गये…ये विरोध का कौन सा तरीका है?

बात करते हैं मीडिया की…सुप्रीम कोर्ट के नियमानुसार और यूनिसेफ के चाइल्ड राइट्स चार्टर के अनुसार पीड़िता का नाम सामने नहीं आना चाहिए मगर आसिफा का नाम आया ही नहीं…पूरे फेसबुक पर बच्ची की छीछालेदर होती रही…अगर नाम सामने नहीं आता तो शायद हिन्दू – मुस्लिम का ब्लेम गेम चलता ही नहीं..मगर सबने नाम छापा। कठुआ गैंगरेप केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने 12 मीडिया संस्थानों पर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। दरअसल, इन मीडिया संस्थानों पर बच्ची की पहचान उजागर करने को लेकर केस चल रहा था। कठुआ गैंगरेप पीड़िता का चेहरा और उसका नाम कुछ मीडिया संस्थानों ने उजागर कर दिया था। इनमें इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, एनडीटीवी, द हिंदू जैसे बड़े मीडिया संस्थान शामिल थे। सहानुभूति जताने के बहाने दैनिक भास्कर जैसे अखबार जो विवरण देते हैं, वह बलात्कार से कम नहीं होता…हाल ही में टॉपलेस होने वाली अभिनेत्री की टॉपलेस का विरोध करने वाले इस अखबार ने छापी। अमर उजाला से लेकर जनसत्ता और यहाँ तक कि एन डी टी वी का यही हाल है,…कीजिए बहिष्कार…। बड़े – बड़े बुद्धिजीवी…भी नग्न तस्वीरें छापने वाले टाइम्स और टेलिग्राफ की ही बात करते हैं और शराब या हुक्के का विरोध करने पर उसे मोरल पुलिसिंग कहा जाता है….कितने लेखकों ने विरोध किया और कितनों ने बहिष्कार किया…?

अब बात नेताओं की  

भाजपा के बयानवीर तो रोज नया कांड करते हैं। एक महोदय ने यहाँ तक कह डाला कि महिला पत्रकारों को खबरें हमबिस्तर होने के बाद मिलती हैं।….हमें नाराजगी हुई,…मगर इस बात में 10 फीसदी सच्चाई तो है कि पेज थ्री और कई बार स्टोरीज के लिए नयी लड़कियों को मजबूर तो होना पड़ता है….नौकरी बचाने के लिए…घर चलाने के लिए….अधिकतर लड़कियाँ जो घर से लड़कर अपनी राह बनाती हैं….उनके पास दूसरे विकल्प नहीं होते और जो बहुत ज्यादा महत्वाकाँक्षी होती हैं….उनके लिए शॉर्टकट ही चलता है…जो विद्रोही होती हैं…उनको कोई नहीं पूछता…आप लड़कियों को कहें तो क्या जो शोषण करता है और बच्चियों की मजबूरी का फायदा उठाता है…क्या वह पापी नहीं है….जो नेता ऐसा है…आप उसे तो दलाल नहीं कहते मगर लड़कियों को आपने वेश्या बना दिया….किसी ने मीडिया के भीतर चल रहे शोषण पर कलम चलायी है या कभी सोचा है कि स्ट्रींगर या सेवानिवृत्त पत्रकारों से लेकर कुछ हजार की नौकरी में घर खींच रहे पत्रकारों की जिन्दगी कैसे बीत रही है…खबरों को मरोड़ने का सिलसिला ऊपर से नीचे की ओर आता है…। कानून सिर्फ बलात्कार के लिए नहीं ऐसी विकृत मानसिकता से ग्रस्त बयानवीरों को रोकने के लिए भी होने चाहिए।

मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं

आप कोई भी पत्रिका…या किसी भी पत्रिका की वेबसाइट उठाकर देखिए…एक कोने में हॉट कॉर्नर…मिल ही जाता है। अश्लील व भद्दी तस्वीरें छापकर पाठकों और दर्शकों को लुभाने की परम्परा नयी नहीं है। दरअसल, आप खबर की जगह नायिकाओं की तस्वीरें बेचते हैं और उसके जरिए ही अपने लिए पाठक और दर्शक चाहते हैं। ये पेज अगर लड़कियों के जिम्मे हैं तो कल्पना कीजिए कि स्थिति कैसी होती होगी और अगर लड़कियों के लिए आपने इसे काम के नाम पर सामान्य बना दिया है तो समझ लीजिए कि आपने एक रेप कल्चर विकसित कर लिया है। सिनेमा पेज के लिए तस्वीरें ठीक कर रहे पेज मेकर मैंने बड़े गौर से देखे हैं कि वे किस तरह की तस्वीरें चुनते हैं और कैसी छवि बनाते हैं या बनाना चाहते हैं। न्यूज रूम से लेकर पेज थ्री की पार्टियों में जो वातावरण बनाकर रखा गया है और जो कुछ परोसा जा रहा है, जिस तरह से आप सस्ती लोकप्रियता के लिए दुष्कर्म पीड़िताओं के नाम छापते हैं,,,,वह बताता है कि आप कहाँ खड़े हैं।
अभी हाल ही में एक खबर आई थी कि पुतिन ने अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प को कहा था कि रूस की वेश्यायें सबसे अधिक सुन्दर होती हैं। ट्रम्प किस तरह के महिला विरोधी इन्सान हैं…सब जानते हैं। दो शक्तिशाली देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बातचीत जब ऐसी होगी तो आप क्या उम्मीद कर रहे हैं और किससे कर रहे हैं कि वह महिलाओं के लिए और बच्चों केे लिए बात करेगा –

https://www.jansatta.com/international/james-comey-memos-about-america-president-donlad-trump-russia/636838/

पाकिस्तान में तो बहन को भाई के गुनाह की सजा गैंगरेप की अनुमति देकर इन्साफ पंचायतें करती हैं..https://www.thelallantop.com/news/pakistan-man-rapes-woman-victims-brother-raped-her-sister-in-return-with-the-consent-of-both-the-families/

मी टू या अब जो फेसबुक पर हो रहा है…मेरी नजर में इसने पूरे विरोध को फैशन बनाकर रख दिया है। रवीन्द्र सरणी -लाल बाजार क्रांसिंग पर आसिफा को न्याय दिलाने के लिए हम शर्मिंदा हैं…टाइप होर्डिंग्स लगी हैं और मुझे वो मध्यमग्राम की बच्ची याद आ रही है जिससे साथ न सिर्फ बलात्कार हुआ बल्कि शिकायत लिखवाने पर फिर वह बलात्कार की शिकार बनी और अंत में उसने खुद को आग लगाकर मुक्ति पा ली….उसके टैक्सी ड्राइवर पिता को आखिरकार बंगाल छोड़ना पड़ा….आप करते रहिए ….यत्र नायर्स्ते पूज्येंतु ….जब तक खुद कमान सम्भालकर सुधार नहीं लाने चलेंगे….कुछ नहीं होगा…कीजिए और नहीं हो सकता है तो ढोंग बंद कर दीजिए….।
कुछ समाधान तलाश रही थी…मन हो तो देख सकते हैं….

https://sushmakibatkahi.blogspot.in/2018/04/blog-post_13.html

(आँकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो और महिला पत्रकार का किस्सा…बाकी अपनी फेसबुक वॉल से )

विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस : क्योंकि किताबों से बेहतर कुछ नहीं

विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस हर साल 23 अप्रैल को मनाया जाता है। कहते हैं किताबों से अच्छा कोई दोस्त नहीं हैं, ये वो मित्र हैं, जो आपका साथ कभी नहीं छोड़ती हैं, एक बार आपका साया भी आपका साथ अंधेरे में छोड़ सकता है लेकिन किताबें सांसों की तरह आपके साथ रहती हैं।
जो लोग किताबों के जरिए अपने जीवन की पढाई आरंभ करते हैं, वो ही आज बढ़ती उम्र के साथ-साथ कम्प्यूटर और इंटरनेट के प्रति बढ़ती दिलचस्पी की वजह से किताबों से दूर हो रहे हैं मगर देखा जाए तो यह भी पुस्तकों का आधुनिकीकृत रूप ही है। फिर भी किताबों की खुशबू में जो सुकून है, वह कहीं नहीं है। ये अलग बात है कि डिजिटल तरीके से कई दुर्लभ पुस्तकों को संरक्षित करने में सहायता मिली है।
लोगों और किताबों के बीच की दूरी को पाटने के लिए यूनेस्को ने ’23 अप्रैल’ को ‘विश्व पुस्तक दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया। जिससे लोगों का किताबों के प्रति रूझान कम ना हो। कुछ खास बातें विश्व पुस्तक तथा स्वामित्व (कॉपीराइट) दिवस का औपचारिक शुभारंभ 23 अप्रैल 1995 को हुई थी।
आपको बता दें कि 23 अप्रैल का दिन साहित्यिक क्षेत्र में अत्यधिक महत्वपूर्ण है चूंकि यह तिथि साहित्य के क्षेत्र से जुड़ी अनेक विभूतियों का जन्म या निधन का दिन है। इसी कारण यूनेस्को ने ’23 अप्रैल’ को ‘विश्व पुस्तक दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया था।
23 अप्रैल ही क्यो?
उदाहरण के तौर पर 1616 में 23 अप्रैल को सरवेन्टीस, गारसिलआसो डी लाव्हेगा, मारिसे ड्रयन, के. लक्तनेस, ब्लेडीमीर नोबोकोव्ह, जोसेफ प्ला और मैन्युएल सेजीया के जन्म/ निधन के दिन के रूप में जाना जाता है। महान लेखक और नाटककार विलियम शेक्सपीयर के तो जन्म और निधन की तिथि भी 23 अप्रैल है।
विश्व पुस्तक और स्वामित्व (कॉपीराइट) दिवस 23 अप्रैल को विश्व के 100 देशों में मनाया जाता है। इंग्लैंड और आयरलैंड में विश्व पुस्तक और स्वामित्व (कॉपीराइट) दिवस 3 मार्च को होता है।
गीता में कहा गया है- ‘ज्ञानात ऋते न मुक्ति’ अ गीता में कहा गया है- ‘ज्ञानात ऋते न मुक्ति’ अर्थात् ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं है और ज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं-पुस्तकें। जो बात आप किसी से पूछ नहीं सकते हैं उन सारी बातों का उत्तर किताबों के पन्नों में मिलता है, किताबों की जगह सूचना प्रौधोगिकी का कोई भी अंग ले नहीं सकता है।
पुस्तकें एकान्त की सहचारी हैं कहा गया है ना better alone than in a bad company . अर्थात् कुसंगति से एकान्त कहीं ज्यादा उत्तम है। पुस्तकें एकान्त की सहचरी हैं । वे हमारी मित्र हैं जो बदले में हम से कुछ नहीं चाहती । वे इस लोक का जीवन सुधारने और परलोक का जीवन संवारने की शिक्षा देती है और प्रेम से लेकर कटुता तक के सारे सवालों के जवाब वहां विस्तार से मौजूद हैं।
किताबें आपसे लेती कुछ नहीं मगर देती बहुत हैं और यह पाना आपके चयन पर निर्भर करता है इसलिए खूब पढ़ें और जब भी पढ़ें…अच्छा पढ़ें।

(साभार – अमर उजाला)

पोक्सो एक्ट : स्वाति मालीवाल ने 10 दिन की भूख हड़ताल के बाद तोड़ा अनशन

नई दिल्ली : दिल्ली के राजघाट पर दस दिनों से भूख हड़ताल पर बैठीं स्वाति मालीवाल ने अनशन तोड़ दिया है। बता दें कि पॉक्सो एक्ट में बदलाव लाने के लिए उन्होंने ये कदम उठाया था। उनका अनशन तुड़वाने उनकी दादी राजघाट पहुंची थीं। पोक्सो एक्ट में संशोधन को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने अनशन समाप्त करने का फैसला लिया था। एक्ट में संशोधन के लिए अध्यादेश लाने के फैसले पर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया साथ ही जीत के लिए देश की जनता को बधाई दी थी।

इससे पहले स्वाति मालीवाल ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा। पत्र में उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री देश की बेटियों की आवाज सुनेंगे और देश में महिलाओं को बच्चियों की सुरक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाएंगे।

उन्होंने पत्र में गुजारिश की जब तक उन्हें मांगों के पूरे होने का आश्वासन नहीं मिलता तब तक वह अनशन नहीं तोड़ेगी। पोक्सो एक्ट में बदलाव को लेकर लाए गए अध्यादेश को मंजूरी मिलने पर उन्होंने कहा था कि अभी सिर्फ आधी मांग पूरी हुई है, अभी भी 6 माह का प्रावधान नहीं जोड़ा गया है।

हालांकि देर शाम उन्होंने अनशन रविवार को तोड़ने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि बहुत कम आंदोलनों ने इतने कम समय में सफलता पाई है। अध्यादेश में हमारी ज्यादातर मांगों को जगह मिली है।

बच्चों के बलात्कारियों को फांसी, देश में फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना, जल्द मुकदमा खत्म करना, और बलात्कार के मामले की जांच के लिए अतिरिक्त संसाधन देना। यह सभी कदम तीन महीने में उठाए जाएंगे। यदि तीन माह में यह कदम नहीं उठाएं जाएंगे तो फिर आंदोलन शुरू किया जाएगा।

बलात्कार के मामलों में सख्त सजा वाले अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी

नयी दिल्ली : राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के मामलों में दोषी व्यक्तियों को मृत्युदंड तक की सजा देने संबंधी अध्यादेश को आज अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी।

केंद्रीय कैबिनेट ने उस अध्यादेश को अपनी स्वीकृति दी थी जिसके तहत 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार करने के दोषी ठहराये गये व्यक्ति के लिये मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने की अदालत को इजाजत दी गई है। गजट अधिसूचना में कहा गया है , ‘‘ संसद का सत्र अभी नहीं चल रहा है और राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हैं कि जो परिस्थितियां हैं उनमें यह आवश्यक था कि वह तत्काल कदम उठाएं। ’’

इसके अनुसार संविधान के अनुच्छेद 123 के उपखंड (1) में दी गई शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति ने इस अध्यादेश को मंजूरी दी है।

आपराधिक कानून ( संशोधन ) अध्यादेश 2018 के अनुसार ऐसे मामलों से निपटने के लिये नयी त्वरित अदालतें गठित की जायेंगी और सभी पुलिस थानों एवं अस्पतालों को बलात्कार मामलों की जांच के लिए विशेष फॉरेंसिक किट उपलब्ध करायी जायेगी।

अध्यादेश का हवाला देते हुए अधिकारियों ने बताया कि इसमें विशेषकर 16 एवं 12 साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार के मामलों में दोषियों के लिये सख्त सजा की अनुमति है। 12 साल से कम उम्र की बच्चियों से बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा देने की बात इस अध्यादेश में कही गई है।

अध्यादेश के मुताबिक महिलाओं से बलात्कार मामले में न्यूनतम सजा सात साल से बढ़ा कर 10 साल सश्रम कारावास की गई । इ से अपराध की प्रवृत्ति को देखते हुए उम्रकैद तक भी बढ़ाया जा सकता है।

16 साल से कम उम्र की लड़कियों से सामूहिक बलात्कार के दोषी के लिये उम्रकैद की सजा का प्रावधान बरकरार रहेगा।

इस अध्यादेश के मुताबिक 16 साल से कम उम्र की लड़कियों के बलात्कार के मामले में न्यूनतम सजा 10 साल से बढ़ाकर 20 साल की गई और अपराध की प्रवृत्ति के आधार पर इसे बढ़ाकर जीवनपर्यंत कारावास की सजा भी किया जा सकता है। यानी दोषी को मृत्यु होने तक जेल की सजा काटनी होगी।

अधिकारी ने बताया कि भारतीय दंड संहिता ( आईपीसी ), साक्ष्य अधिनियम , आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता ( सीआरपीसी ) और यौन अपराधों से बाल सुरक्षा ( पोक्सो ) अधिनियम को अब संशोधित माना जायेगा।

अध्यादेश में मामले की त्वरित जांच एवं सुनवाई की भी व्यवस्था है।

अधिकारियों ने बताया कि बलात्कार के सभी मामलों में सुनवाई पूरी करने की समय सीमा दो माह होगी।

साथ ही , 16 साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के आरोपी व्यक्ति को अंतरिम जमानत नहीं मिल सकेगी।

इसमें यह भी प्रावधान किया गया है कि 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ बलात्कार के मामलों में जमानत आवेदनों पर फैसला करने से पहले अदालत को सरकारी वकील और पीड़िता के प्रतिनिधि को 15 दिनों का नोटिस देना होगा।

एक अधिकारी के मुताबिक, बलात्कार के मामलों में सख्त सजा सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका की शक्तियां बढ़ाने के साथ ही कैबिनेट ने कई दूसरे कदमों को भी मंजूरी दी है। इनमें राज्यों और संबंधित उच्च न्यायालय के साथ विचार – विमर्श करके त्वरित अदालतों की स्थापना शामिल हैं।

दलित सुहागिनों द्वारा पूजे जाने वाले इस मंदिर में पहली बार पुरुषों को मिलेगा प्रवेश

केंद्रपाड़ा : ओडिशा के सतभया मंदिर का मा पंछूबाराही मंदिर देश के दूसरे मंदिरों की तरह है लेकिन इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां स्थापित की गईं पांच मूर्तियों को पुरुषों का छूना वर्जित है। यहां केवल दलित समुदाय कि खासतौर से स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदाय की महिलाएं ही पूजा करती हैं। इन्हीं दलित महिलाओं के पास मंदिर में पूजा-अर्चना करने का विशेषाधिकार है। यह परंपरा पिछले 400 सालों से अनवरत जारी है। मगर जलवायु परिवर्तन की वजह से मंदिर के आस-पास समुद्र का पानी बढ़ रहा है जिसकी वजह से मंदिर के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है।
इसी वजह से पुरुषों को पहली बार मंदिर में रखी मूर्तियों को छूने का अवसर मिलेगा क्योंकि मंदिर को 12 किलोमीटर दूर शिफ्ट किया जा रहा है। इसी कारण मंदिर की पुजारिनों के पास पुरुषों को गर्भगृह में आने कि इजाजत देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है। मंदिर की सेवा पांच पुजारिनें बारी-बारी से करती हैं। एक पुजारिन सबिता दलेई का कहना है कि महिलाओं के लिए इन भारी मूर्तियों को उठाकर ले जाना संभव नहीं है। हमें मूर्तियों को ले जाने के लिए पुरुषों और मूर्तिकारों की जरूरत है। शुक्रवार को पुरुष अपनी पीठ पर लादकर इन मूर्तियों को बागापटिया लेकर जाएंगे। बागापटिया पहुंचने के बाद पुजारिनें इन्हें पूजा-अर्चना के बाद शुद्ध कर देंगी। कॉलेज की पूर्व प्रिंसिपल धरानिधार राउत ने कहा- ऐसे समय में जब देश के बहुत से मंदिर दलितों की पहुंच से दूर हैं और कई मंदिरों में महिलाओं को आने की अनुमति नहीं है जैसे कि केरला का सबरीमाला मंदिर, उस समय मा पंछूबाराही महिलाओं के लिए आशा की एक किरण है। उन्होंने बताया कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर के कारण सतभया के लोग पिछले काफी समय से परेशान हैं। इसने बहुत से घरों और खेती की जमीन को निगल लिया है।