Saturday, April 11, 2026
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आरा : बिहार का वह स्थान जहाँ अज्ञातवास के दौरान रुके थे पाण्डव

आरा भारत के बिहार का एक प्रमुख शहर है। यह भोजपुर जिले का मुख्यालय है। राजधानी पटना से इसकी दूरी महज 55 किलोमीटर है। देश के दूसरे भागों से ये सड़क और रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। यह नगर वाराणसी से 136 मील पूर्व-उत्तर-पूर्व, पटना से 37 मील पश्चिम, गंगा नदी से 14 मील दक्षिण और सोन नदी से आठ मील पश्चिम में स्थित है। यह पूर्वी रेलवे की प्रधान शाखा तथा आरा-सासाराम रेलवे लाइन का जंकशन है। डिहरी से निकलनेवाली सोन की पूर्वी नहर की प्रमुख ‘आरा नहर’ शाखा भी यहाँ से होकर जाती है। आरा को 1865 में नगरपालिका बनाया गया था।
गंगा और सोन की उपजाऊ घाटी में स्थित होने के कारण यह अनाज का प्रमुख व्यापारिक क्षेत्र तथा वितरणकेंद्र है। रेलों और पक्की सड़कों द्वारा यह पटना, वाराणसी, सासाराम आदि से संबद्ध है। बहुधा सोन नदी की बाढ़ों से अधिकांश नगर क्षतिग्रस्त हो जाता है।
अरण्यदेवी मंदिर
आरा, भोजपुर, बिहार मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक आरण्य देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। दूर-दूर से श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए जुटते है। संवत् 2005 में स्थापित आरण्य देवी का मंदिर नगर के शीश महल चौक से उत्तर-पूर्व छोर पर स्थित है। यह नगर की अधिष्ठात्री मानी जाती है। बताया जाता है कि उक्त स्थल पर प्राचीन काल में सिर्फ आदिशक्ति की प्रतिमा थी। इस मंदिर के चारों ओर वन था। पांडव वनवास के क्रम में आरा में ठहरे थे। पांडवों ने आदिशक्ति की पूजा-अर्चना की। मां ने युधिष्ठिर को स्वपन् में संकेत दिया कि वह आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित करे। धर्मराज युधिष्ठिर ने मां आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित की। कहा जाता है कि भगवान राम जी, लक्ष्मण जी और विश्वामित्र जी जब बक्सर से जनकपुर धनुष यज्ञ के लिए जा रहे थे तो आरण्य देवी की पूजा-अर्चना की। तदोपरांत सोनभद्र नदी को पार किये थे। बताया जाता है कि द्वापर युग में इस स्थान पर राजा मयूरध्वज राज करते थे। इनके शासनकाल में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ यहां आये थे। श्रीकृष्ण ने राजा के दान की परीक्षा लेते हुए अपने सिंह के भोजन के लिए राजा से उसके पुत्र के दाहिने अंग का मांस मांगा। जब राजा और रानी मांस के लिए अपने पुत्र को आरा (लकड़ी चीरने का औजार) से चीरने लगे तो देवी प्रकट होकर उनको दर्शन दी थीं।

अरण्य देवी मंदिर

इस मंदिर में स्थापित बड़ी प्रतिमा को जहां सरस्वती का रूप माना जाता है, वहीं छोटी प्रतिमा को महालक्ष्मी का रूप माना जाता है। इस मंदिर में वर्ष 1953 में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुधन् व हनुमान जी के अलावे अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गयी थी।
इतिहास – आरा एक अति प्राचीन शहर है। पहले यहां मयूरध्वज नामक राजा का शासन था। महाभारतकालीन अवशेष यहां के बिखरे पड़े हैं। ये ‘आरण्य क्षेत्र’ के नाम से भी जाना जाता था। यहां का आरण्य देवी बहुत प्रसिद्ध है।
आरा अति प्राचीन ऐतिहासिक नगर है। इसकी प्राचीनता का संबंध महाभारतकाल से है। पांडवों ने भी अपना गुप्त वासकाल यहाँ बिताया था। जेनरल कनिंघम के अनुसार युवानच्वांग द्वारा उल्लिखित कहानी का संबंध, जिसमें अशोक ने दानवों के बौद्ध होने के संस्मरणस्वरूप एक बौद्ध स्तूप खड़ा किया था, इसी स्थान से है। आरा के पास मसाढ़ ग्राम में प्राप्त जैन अभिलेखों में उल्लिखित ‘आरामनगर’ नाम भी इसी नगर के लिए आया है। पुराणों में लिखित मयूध्वज की कथा से भी इस नगर का संबंध बताया जाता है। बुकानन ने इस नगर के नामकरण में भौगोलिक कारण बताते हुए कहा कि गंगा के दक्षिण ऊँचे स्थान पर स्थित होने के कारण, अर्थात्‌ आड या अरार में होने के कारण, इसका नाम ‘आरा’ पड़ा। 1859 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रतायुद्ध के प्रमुख सेनानी कुंवर सिंह की कार्यस्थली होने का गौरव भी इस नगर को प्राप्त है। आरा स्थित ‘द लिटल हाउस’ एक ऐसा भवन है, जिसकी रक्षा अंग्रेज़ों ने 1857 के विद्रोह में कुंवर सिंह से लड़ते हुए की थी।
कहते हैं कि अरण्य मंदिर से भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटते, यही वजह है कि अरण्य मंदिर में मां के दर्शन हेतु सिर्फ भोजपुर से ही नहीं, बल्कि प्रदेश के दूर दराज के हिस्सों से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। आरा के शीश महल चौक से उत्तर-पूर्व छोर पर स्थित मां का इस मंदिर की स्थापना 2005 में हुई थी। मंदिर में स्थापित मां नगर की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। इस ऐतिहासिक मंदिर के बारे में कई धारणाएं और मान्यताएं हैं। इसी मंदिर वाले स्थान पर प्राचीन काल में सिर्फ आदिशक्ति की प्रतिमा थी। इस मंदिर के चारों ओर वन था। पांडव वनवास के क्रम में आरा में ठहरे थे। पांडवों ने आदिशक्ति की पूजा-अर्चना की। मां ने युधिष्ठिर को स्वप्न में संकेत दिया कि वह आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित करे। धर्मराज युधिष्ठिर ने मां आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित की।
आरण्य देवी मंदिर में भगवान राम ने की थी पूजा
कहा जाता है कि भगवान राम , लक्ष्मण और विश्वामित्र जब बक्सर से जनकपुर धनुष यज्ञ के लिए जा रहे थे तो आरण्य देवी की पूजा-अर्चना की। इसके बाद ही सोनभद्र नदी को पार किए थे। द्वापर युग में इस स्थान पर राजा मयूरध्वज राज करते थे। इनके शासनकाल में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ यहां आये थे। श्रीकृष्ण ने राजा के दान की परीक्षा लेते हुए अपने सिंह के भोजन के लिए राजा से उसके पुत्र के दाहिने अंग का मांस मांगा। जब राजा और रानी मांस के लिए अपने पुत्र को आरा (लकड़ी चीरने का औजार) से चीरने लगे तो देवी प्रकट होकर उनको दर्शन दी थीं। इस मंदिर में स्थापित बड़ी प्रतिमा को जहां सरस्वती का रूप माना जाता है, वहीं छोटी प्रतिमा को महालक्ष्मी का रूप माना जाता है।


आरण्य देवी की हैं दो बहनें
आरण्य देवी की मूर्तियां काले पत्थर की हैं। एक मूर्ति 4½ फुट ऊंची है और दूसरी 3½ फुट ऊंची है। यह कहा जाता है कि दोनों बहनें हैं। वे पीले रंग की साड़ी में उनके सिर पर फूल माला और मुकुट के साथ सज रही हैं। आरण्य देवी की दाहिने तरफ के मंदिर में राधा और कृष्ण की मूर्तियां हैं । इस मंदिर में वर्ष 1953 में श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुधन् व हनुमान जी के अलावे अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित की गयी थी। ऐतिहासिक आरण्य देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती ही जा रही है। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए जुटते है।

यहाँ है पुरातात्विक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण महाभारत कालीन प्राचीन कुण्डवा शिवमंदिर मगर आज भी उपेक्षित है

हिन्दुओ के धार्मिक आस्था का केंद्र प्रखंड के प्राचीन कुण्डवा शिवमंदिर(कुडवा शिवमंड)।पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोंण से काफी महत्वपूर्ण। अपने अद्भुत शिल्पकला एवं बेहतरीन कारीगरी के कारण मंदिर को किंदवंतियो के अनुसार महाभारतकालीन होने का गौरव प्राप्त है।मंदिर की बनावट ही इसे पुरातन मंदिरों की श्रेणी में खड़ा करती है।

कुण्डवा शिव मंदिर – बगैर ईट के प्रयोग किये बना है यह मंदिर,शिल्पकला का अद्भुत नमूना

प्राचीन शिवमंदिर होने के कारण शिवरात्रि पर्व पर या सोमवार को दर्शनार्थियों की भारी भीड़ होती है। कुण्डवा शिवमंदिर भोजपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी पश्चिम आरा-बक्सर मुख्यमार्ग एनएच 84 से बिल्कुल सटे उतर दिशा में बिलौटी एवं शाहपुर के बीच अवस्थित है।यह प्राचीन शिवमंदिर कब बना इसका कोई लिखित प्रमाण तो नही मिलता,परंतु लोक गाथाओं,किंदवंतियो, बनावट, स्थापत्यकलाकृतियों से यह अनुमान लगाया जाता है कि यह मंदिर महाभारत कालीन राजाओ द्वारा बनवाया गया हो।ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण यह मंदिर समुचित व्यवस्था एवं प्रोत्साहन के आभाव में ऐतिहासिक धरोहर की ओर आजतक पुरातत्ववेत्ताओं का ध्यान आकर्षित नही कर पाया।

इस मंदिर का शिवलिंग चपटा है

वनकुंड की खुदाई में मिला शिवलिंग का आकार गोलाकार न होकर चपटा है जिसे बाणासुर ने स्थापित किया था । वर्तमान में मंदिर का अवशेष एक आयताकार झाड़ीनुमा ऊंचे टीले पर अवस्थित है जिसका क्षेत्रफल लगभग 5 एकड़ में फैला हुआ है। यह भूखंड टीले के बीचोबीच उतर दिशा की तरफ प्राचीन प्रधान शिवमंदिर अवस्थित है। सतह पर मंदिर लगभग 30 फिट लंबी 10 फिट चौड़ी है।करीब 30 फीट ऊंचे गुम्बज वाले इस मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम की तरफ खुलता है जो अमूमन आम शिवमंदिरो से इसे भिन्न करता है।

प्रख्यात बखोरापुर काली मंदिर

मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग गोलाकार लंबा न होकर चपटा है।किंदवंतियो के अनुसार यह शिवलिंग मंदिर के पास के तालाब(कुंड) से प्राप्त हुआ था। बताया जाता है कि महाभारत कालीन असुरो का राजा वाणासुर यही आकर गंगानदी के मुख्यधारा के किनारे तपस्या करता था।तपस्या करने के उपरांत उसने यज्ञ करने की ठानी तथा यज्ञ के लिए हवन कुंड की खुदाई होने लगी। हवन कुंड के खुदाई के दौरान श्रमिकों का फावड़ा(कुदाल) किसी ठोस आधार से टकराया जिसके बाद इस कटे शिवलिंग जो कुदाल से कटने के बाद चपटे आकार के इस शिवलिंग को वाणासुर द्वारा मंदिर बनवाकर स्थापित किया गया। इस प्राचीन शिवमंदिर के समीप दीवार के सहारे कई प्राचीन टूटी फूटी मुर्तिया टीकाकार रखी गई है।काले पत्थरों से बनी यह मूर्तियाँ कृषकों द्वारा समय-समय पर कृषि कार्य हेतु खुदाई के दौरान प्राप्त हुई है।

वीर कुँवर सिंह सँग्रहालय

मूर्तियों की बनावट से इसकी प्राचीनतम होने का एहसास होता है।इस मंदिर का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि इसे बनाने में ईट का प्रयोग नही हुआ है।यह मंदिर वृहद शिलाखंडों को काटकर बनाया गया है। यद्यपि की यहाँ करीब 100 किमी तक पहाड़ का नामोनिशान नही है तो इतने बड़े शिलाखंडों को यहां तक कैसे लाया गया होगा।मंदिर की शिलाखंडों पर उकेरी गई कलाकृतियों को तत्कालीन कारीगरों की काबलियत को दर्शाता है।

वीरांगना ही नहीं, माहिर कूटनीतिज्ञ भी थीं रानी लक्ष्मीबाई

महारानी लक्ष्मीबाई की वीरांगना छवि को जनमानस में छापने का सबसे बड़ा काम कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी” ने किया। पिछली डेढ़ शताब्दी से वे भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की नायिका और अद्भुत वीरता की मिसाल के तौर पर लोक मानस में अंकित हैं। उनकी बहादुरी के किस्से और ज्यादा मशहूर इसलिए हो जाते हैं, क्योंकि उनकी सबसे ज्यादा तारीफ तो उनसे लड़ने वाले अंग्रेजों ने खुद की थी। आज भी अगर आप झांसी के किले में जाएं और वह स्थान देखें, जहां से रानी ने घोड़े सहित किले से छलांग लगा गई थीं, तो वह दृश्य सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

किले के निचले हिस्से में रखी गुलाम गौस खां की कड़क बिजली तोप बताती है कि कहने को वह लड़ाई एक रियासत को बचाने की थी, लेकिन असल में वह ऐसा इतिहास रच रही थी, जिससे आने वाले समय में राष्ट्रवाद, हिंदू-मुस्लिम एकता और महिला सशक्तीकरण जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा होने वाली थी लेकिन इस संवाद में रानी का वह रूप अक्सर लोक स्मृति में नहीं आ पाता कि वे कूटनीति की भी महारथी थीं। इसका सबसे पहला पहलू तो यह है कि जिन रानी को 1857 की क्रांति की नायिका माना जाता है, वे 1857 में युद्ध में ही नहीं उतरीं।

रानी ने तलवार उठाई फरवरी 1858 में.. तो रानी 10 मई 1857 को क्रांति की शुरुआत से लेकर फरवरी 1858 के बीच आखिर क्या कर रहीं थीं। क्या वे हाथ पर हाथ धरे देश में हो रही इस क्रांति को देख रहीं थीं। लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व को देखते हुए ऐसा मानना कठिन है. असल में इन छह-सात महीने में रानी बराबर इस बात की कोशिश कर रहीं थीं कि उनके राज्य को उसका जायज हक मिल जाए। उनके पति गंगाधर राव के निधन के बाद उनके दत्तक पुत्र को अंग्रेज झांसी का महाराज स्वीकार कर लें। इसके लिए रानी ने कूटनीति या राजनय के हरसंभव विकल्प पर काम किया। रानी के इन प्रयासों को झांसी के गजेटियर में विस्तार से दर्ज किया गया है।


रानी चाहती थीं कि अंग्रेजों से युद्ध न करना पड़े, ताकि झांसी की बेगुनाह जनता को इस लड़ाई की कीमत न चुकानी पड़े। यह कीमत कितनी भारी थी कि इसकी कल्पना हम आज शायद नहीं कर सकते, लेकिन रानी के वीरगति को प्राप्त होने के बाद झांसी को जिस तरह अंग्रेजों ने लूटा, वह अपने आप में अध्ययन का विषय है। इस लूट का वर्णन गदर के समय महाराष्ट्र से तीर्थयात्रा पर निकले वासुदेव गोडसे शास्त्री नाम के ब्राहृमण ने मराठी में लिखी किताब “माझा प्रवास” में किया। बाद में इसका हिंदी अनुवाद अमृत लाल नागर ने “आंखों देखा गदर” नाम से किया। इस पुस्तक में शास्त्री ने लूट की आंखों देखी लिखी है। युद्ध के बाद झांसी को पांच चरण में लूटा गया। लूट का सबसे पहला हक गोरे सैनिकों को मिला और उन्होंने सोना-चांदी और दूसरे कीमती सामान लूटे। उसके बाद भारतीय मूल के सैनकों ने लूटा। इस तरह पांच दिन तक लूट हुई और आखिर में झांसी की एक-एक चीज लूट ली गई।

रानी इसी त्रासदी से बचना चाहती थीं. उन्होंने आखिर तक कूटनीति का सहारा लिया, लेकिन अंत में हुआ यह कि अंग्रेजी सेना से बागी हुए भारतीय सैनिकों और आसपास के सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी। इस लड़ाई में उन्होंने रानी को अपना नेता घोषित किया और महारानी के जयकारों के साथ युद्ध का यलगार कर दिया। तकरीबन यही स्थिति दिल्ली में मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर और लखनऊ में बेगम जीनत महल के साथ हुई थी। इससे अंग्रेजों को यह संकेत गया कि रानी कूटनीतिक बातचीत सिर्फ दिखावे के लिए कर रही हैं और असल में युद्ध ही इसका मकसद है। जब बागी सैनिक झांसी के किले पर लक्ष्मीबाई के जयकारे लगाने लगे तो रानी ने उनका नेतृत्व करना स्वीकार किया और उसके बाद का इतिहास तो सबको मालूम ही है।

निकाह हलाला प्रथा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी सरकार, संविधान पीठ करेगी पड़ताल

नयी दिल्ली : विधि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि केंद्र सरकार निकाह और हलाला प्रथा का सुप्रीम कोर्ट में विरोध करेगी। यह एक ऐसा चलन है, जो मुस्लिम पुरुष को अपनी तलाकशुदा पत्नी से दोबारा निकाह का हक देता है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आने वाले दिनों में निकाह हलाला की कानूनी वैधता की पड़ताल करेगी।
अधिकारी ने बताया कि केंद्र सरकार का यह मानना है कि यह प्रथा लैंगिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है और उसने शीर्ष अदालत में इस मसले पर अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है। तब सुप्रीम कोर्ट ने केवल तीन तलाक पर सुनवाई करने का फैसला किया था। अदालत ने कहा था कि निकाह हलाला और बहुविवाह अलग मसला है।
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था। बाद में सरकार ने एक विधेयक लाकर तीन तलाक को दंडनीय अपराध घोषित किया था। वह बिल लोकसभा में तो पास हो गया था, लेकिन राज्यसभा में अटक गया। इस प्रस्तावित कानून में एक साथ तीन तलाक को गैरकानूनी घोषित करते हुए तलाक देने वाले पति को तीन कैद की सजा का प्रावधान किया गया है।

कबीर की साखी…

कस्तूरी कुँडल बसै, मृग ढ़ुढ़े बब माहिँ.

ऎसे घटि घटि राम हैं, दुनिया देखे नाहिँ..

प्रेम ना बाड़ी उपजे, प्रेम ना हाट बिकाय.

राजा प्रजा जेहि रुचे, सीस देई लै जाय ..

माला फेरत जुग गाया, मिटा ना मन का फेर.

कर का मन का छाड़ि, के मन का मनका फेर..

माया मुई न मन मुआ, मरि मरि गया शरीर.

आशा तृष्णा ना मुई, यों कह गये कबीर ..

झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद.

खलक चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद..

वृक्ष कबहुँ नहि फल भखे, नदी न संचै नीर.

परमारथ के कारण, साधु धरा शरीर..

साधु बड़े परमारथी, धन जो बरसै आय.

तपन बुझावे और की, अपनो पारस लाय..

सोना सज्जन साधु जन, टुटी जुड़ै सौ बार.

दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एके धकै दरार..

जिहिं धरि साध न पूजिए, हरि की सेवा नाहिं.

ते घर मरघट सारखे, भूत बसै तिन माहिं..

मूरख संग ना कीजिए, लोहा जल ना तिराइ.

कदली, सीप, भुजंग-मुख, एक बूंद तिहँ भाइ..

तिनका कबहुँ ना निन्दिए, जो पायन तले होय.

कबहुँ उड़न आखन परै, पीर घनेरी होय..

बोली एक अमोल है, जो कोइ बोलै जानि.

हिये तराजू तौल के, तब मुख बाहर आनि..

ऐसी बानी बोलिए,मन का आपा खोय.

औरन को शीतल करे, आपहुँ शीतल होय..

लघता ते प्रभुता मिले, प्रभुत ते प्रभु दूरी.

चिट्टी लै सक्कर चली, हाथी के सिर धूरी..

निन्दक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय.

बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय..

मानसरोवर सुभर जल, हंसा केलि कराहिं.

मुकताहल मुकता चुगै, अब उड़ि अनत ना जाहिं..

वॉल्टन परिवार दुनिया में सबसे अमीर बिजनेस घराना, टॉप-10 में अंबानी परिवार  7वें नंबर पर

नई दिल्ली : ब्लूमबर्ग ने दुनिया के 25 सबसे अमीर बिजनेस घराने की सूची जारी की है। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के मुताबिक, 152 अरब डॉलर (10.33 लाख करोड़ रुपए) के साथ वॉलमार्ट चलाने वाला वॉल्टन परिवार दुनिया के सबसे अमीर बिजनेस घराने की लिस्ट में पहले स्थान पर है। वहीं दुनिया की टॉप 10 बिजनेस घराने की सूची में अंबानी परिवार 43 अरब डॉलर (2.96 लाख करोड़ रुपए) की नेटवर्थ के साथ सातवें नंबर पर हैं। इसमें शामिल 25 परिवार 1.1 लाख करोड़ डॉलर (74.99 लाख करोड़ रुपए) के मालिक है। इन परिवारों की कुल वैल्यू एप्पल या इंडोनेशिया की GDP से भी ज्यादा है।
दुनिया के टॉप- 10 सबसे अमीर बिजनेस घराने-
1. वॉल्टन परिवार
कंपनी- वॉलमार्ट
नेटवर्थ- 10.33 लाख करोड़ रुपए (152 अरब डॉलर)
फैमिली रिटेल मार्केट की सबसे बड़ी कंपनी वॉलमार्ट है। सैम वॉल्टन ने 1945 में वॉलमार्ट की शुरुआत की थी। वॉलमार्ट के दुनियाभर में करीब 12000 स्टोर हैं।

2. कोच ब्रदर्स
कंपनी- कोच इंडस्ट्रीज
नेटवर्थ- 6.73 लाख करोड़ रुपए (99 अरब डॉलर)
फ्रेड कोच ने 1940 में वुड रिवर ऑयल एंड रिफाइनरी कंपनी की स्थापना की थी। सेहत खराब होने की वजह से जून 2018 में डेविड कोच फैमिली बिजनेस के लीडरशिप से हट गए हैं। चार भाई फ्रेडरिक, चार्ल्स, डेविड और विलियम ने मिलकर पिता के तेल रिफाइनरी के बिजनेस को संभाला। कंपनी का सालाना रेवेन्यू करीब 100 अरब डॉलर है।

3. मार्स फैमिली
कंपनी- मार्स
नेटवर्थ- 6.12 लाख करोड़ रुपए (90 अरब डॉलर)
फ्रैंक मार्स ने स्कूल के दिनों में चॉकलेट बनाने की कला सीख ली थी। एमएंडएम, मिल्की वे एंड मार्स बार से कंपनी ने खास पहचान बनाई है। कंपनी का रेवेन्यू 35 अरब डॉलर है। कंपनी का बिजनेस फैमिली संभाल रही है।

4. वैन डेम, डी मेवियस एंड डी स्पोएलबर्च
कंपनी- एनह्यूजर बुश ब्रयूरीज
नेटवर्थ- 3.67 लाख करोड़ रुपए (54 अरब डॉलर)
14वीं शताब्दी में तीन फैमिली वैन डेम, डी मेवियस और डी स्पोएलबर्च ने मिलकर बिजनेस की शुरुआत की थी। कंपनी ब्रेवरेजेज बनाती है। कंपनी की कुल वेल्थ 54 अरब डॉलर है। स्टेला अलटियोज, बडवाइजर और कोरोना इनके सबसे ज्यादा बिकने वाले प्रोडक्ट्स हैं।

5. ड्यूमस फैमिली
कंपनी- हर्मज
नेटवर्थ- 3.33 लाख करोड़ रुपए (49 अरब डॉलर)
साल 1837 में थियेरी हर्मस ने ड्यूमस की शुरूआत की थी। कंपनी नोबेलमेन के लिए राइडिंग गियर बनाती है। जीन और लुइस डुमस ने बिजनेस को लग्जरी फैशन का ग्लोबल लीडर बनाया। पीयेरे-एलिक्स ड्यूमस कंपनी के आर्टिस्टिक्स डायरेक्टर, जबकि एक्सल ड्यूमस कंपनी के चेयरमैन हैं।

6. वरथीमर फैमिली
कंपनी- शॅनल
नेटवर्थ- 3.11 लाख करोड़ रुपए (46 अरब डॉलर)
शॅनल लग्जरी गुड्स सेक्टर की कंपनी है। पियेरे वरथीमर ने 1924 एक परफ्यूम कॉन्ट्रैक्ट कोको शॅनल को फंडिंग किया था। 2017 में कंपनी का रेवेन्यू 9.6 अरब डॉलर था। वरथीमर के पास रेसहॉर्स और वाइनयार्ड्स भी है।


7. अंबानी परिवार
कंपनी- रिलायंस इंडस्ट्रीज
नेटवर्थ- 2.96 लाख करोड़ रुपए (43.4 अरब डॉलर)
मुकेश औऱ अनिल अंबानी के पिता धीरूभाई अंबानी ने 1957 में रिलायंस इंडस्ट्रीज की शुरुआत की थी। 2002 में धीरूभाई की मौत के बाद उनके बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने इसे संभाला। कंपनी पेट्रोलियम, पेट्रोकेमिकल्स, रिटेल और टेलीकॉम सेक्टर में बिजनेस कर रही है। मुकेश मुंबई में दुनिया की सबसे महंगी 27 मंजिला इमारत में रहते हैं।

8. क्वांट फैमिली
कंपनी- बीएमडब्ल्यू
नेटवर्थ- 2.91 लाख करोड़ रुपए (43 अरब डॉलर)
हेरबर्ट क्वांट ने को दुनिया की सबसे लग्जरी व्हीकल बनाने वाली कंपनी बीएमडब्ल्यू को सफल बनाने का श्रेय जाता है। 2015 में मतरिआर्च, जोहाना क्वांट की मौत के बाद उनके बच्चे स्टीफ क्वांट और सुसेन क्लैटन कंपनी को चला रहे हैं। इसके अलावा क्वांट फैमिली जर्मनी की लॉजिस्टिक कंपनी लॉगविन और डच सिक्युरिटी सॉफ्टवेयर कंपनी गेमाल्टो में निवेश किया है।

9. करगिल मैकमिलन फैमिली
कंपनी- करगिल
नेटवर्थ- 2.88 लाख करोड़ रुपए (42.3 अरब डॉलर)
साल 1865 में विलियम डब्ल्यू करगिन ने एक ग्रेन वेयरहाउस से करगिल की शुरुआत की थी। फूड और एग्रीकल्चर के लिए काम करने वाली ये कंपनी अमेरिका की बड़ी कंपनी है। उनके जाने के बाद उनकी फैमिली ने बिजनेस को संभाला।
10. बोहरिंगर वोन बाउमबच फैमिली
कंपनी- बोहरिंगर इंगेलहियम
नेटवर्थ- 2.87 लाख करोड़ रुपए (42.2 अरब डॉलर)
जर्मन ड्रगमेकर बोहरिंगर इंग्लेहेम की स्थापना 1885 में अल्बर्ट बोहरिंगर ने की थी। 130 से अधिक वर्षों बाद बोहरिंगर परिवार समेत वॉन बाम्बाचस इस कंपनी को चला रहा है। 1939 में अल्बर्ट बोहरिंगर का निधन हो गया था। 2010 में कंपनी के 125 साल पूरे हुए थे।
(साभार – दैनिक भास्कर )

यूजीसी की जगह उच्च शिक्षा आयोग ला रही है सरकार

नई दिल्ली : उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को मजबूती देने और फर्जी विश्वविद्यालयों पर लगाम कसने के लिए सरकार ने यूजीसी एक्ट में बड़ा बदलाव करने का फैसला लिया है। इसके तहत यूजीसी नाम की संस्था अब खत्म हो जाएगी। इसकी जगह एचईसीआई (हायर एजुकेशन कमीशन आफ इंडिया) लेगा। लेकिन इसके पास विश्वविद्यालयों और कालेजों को वित्तीय मदद देने का अधिकार अब नहीं होगा। अब यह अधिकार सीधे मंत्रालय के पास होगा।

नए एक्ट के तहत एचईसीआई के पास फर्जी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में फर्जी डिग्री बांट रहे संस्थानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई और मान्यता रद करने तक का अधिकार होगा। साथ ही अनियमितता बरतने वालों के खिलाफ जुर्माना और तीन साल की सजा का भी अधिकार होगा। वहीं नए एक्ट के तहत सभी विवि के लिए एक ही आयोग होगा। इनमें केंद्रीय विवि, राज्य विवि, निजी विवि, डीम्ड विवि आएंगे। जिनके लिए वह नियम और दिशा-निर्देश तय कर सकेंगे।

अभी निजी और डीम्ड जैसे विश्वविद्यालयों के लिए नियम मंत्रालय से तय होते है। इसके साथ ही एचईसीआई के दायरे में ऑनलाइन रेगुलेशन, नैक को मजबूती देने, विवि और कालेजों को स्वायत्ता, स्वयं पोर्टल सहित ओपन लर्निग रेगुलेशन आदि तय करने का भी काम होगा। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ट्वीट कर इस बदलाव पर खुशी जताई और कहा कि इससे उच्च शिक्षा में चल रहे इंस्पेक्टर राज का भी खात्मा होगा।

मौजूदा समय में मंत्रालय के पास विवि और कालेजों को ज्यादा ग्रांट देने और निरीक्षण के नाम पर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले भी सामने आते रहे है। यही वजह है कि नए बदलाव के बाद गठित होने वाले एचईसीआई के पास वित्तीय अधिकार नहीं होगा। उसका फोकस सिर्फ विश्वविद्यालयों के पठन-पाठन और शोध क्षेत्र में किए जा रहे उसके काम-काज को लेकर रहेगा। इसके अलावा मान्यता जैसे विषयों का निराकरण ऑनलाइन किया जाएगा। इसके लिए एचईसीआई के चक्कर लगाने की जरूरत नहीं होगी। नए एक्ट के तहत गठित होने वाले एचईसीआई में चेयरमैन, वाइस चेयरमैन के अलावा अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े 12 सदस्य भी होंगे। इसके साथ ही आयोग का एक सचिव भी होगा, जो सदस्य सचिव के रुप में काम करेगा। इन सभी की नियुक्ति केंद्र सरकार करेगी। चेयरमैन का चयन कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में गठित एक चार सदस्यीय सर्च कमेटी करेगी। इनमें उच्च शिक्षा सचिव भी बतौर सदस्य शामिल होंगे।

तारा शाहदेव को रकीबुल से मिला तलाक, फैमिली कोर्ट दायर याचिका पर सुनाया फैसला

रांची : राष्ट्रीय राइफल शूटर तारा शाहदेव के तलाक वाले याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने तलाक दिलवा दिया है। तारा ने पूर्व पति रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल पर जबरन धर्म परिवर्तन, प्रताड़ना सहित कई आरोप लगाए थे। कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई पूरी करते हुए फैसले के लिए आज की तारीख निर्धारित की थी। फैमिली कोर्ट के जज बीके गौतम की कोर्ट में तारा शाहदेव ने तलाक लेने और शादी रद्द करने को लेकर याचिका दाखिल की थी। सात जुलाई 2014 को रांची के एक बड़े होटल में रंजीत सिंह कोहली के साथ उनकी शादी हुई थी। तारा ने हिंदू विवाह एक्ट की दो धाराओं के तहत याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि शादी के बाद से ही आरोपी रंजीत उर्फ रकीबुल उसे प्रताड़ित करने लगा था। उसने मारपीट के साथ ही धमकी भी दी। साथ ही उसने धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया। आवेदन में तारा शाहदेव ने कहा है कि हिंदू मैरेज एक्ट की धारा 2 और 5 के अनुसार यह शादी अवैध है, क्योंकि हिंदू मैरेज एक्ट के तहत शादी में दोनों का हिंदू सदस्य होना जरूरी होता है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसी तरह के एक मामले में वर्ष 2009 में सुनाए गए एक फैसले का भी हवाला दिया था। तलाक की अर्जी हिंदू मैरेज एक्ट की धारा 12 (1) (सी) के तहत अवैध विवाह को शून्य घोषित करने और धारा 13 (1) (1-ए) तलाक (विवाह विच्छेद) का अनुरोध करते हुए दायर की गई थी। अगर राष्ट्रीय शूटर तारा शाहदेव को रमजान के महीने में होने वाली रोजा इफ्तार पार्टी का आमन्त्रण नहीं मिलता तो शायद उसके पति रंजीत के मुसलमान होने का राज इतनी जल्दी नहीं खुलता। दरअसल, झारखंड सरकार के तत्कालीन मंत्री हाजी हुसैन अंसारी के यहां से आए रोजा इफ्तार के इस इनविटेशन कार्ड पर रकीबुल हसन लिखा हुआ था। घर का एड्रेस वही था जहां तारा और रकीबुल रहते थे। तारा की रकीबुल हसन से 7 जुलाई 2014 को शादी हुई थी। बाद में अत्याचार की हदें पार कर उसका धर्म बदलवाया। अदालत में रजिस्ट्रार मुश्ताक अहमद पर तारा रकीबुल हसन से शादी करने का दबाव बनाने का आरोप था। इस मामले की जांच सीबीआई ने 2015 में शुरू की थी। रकीबुल 27 अगस्त 2014 से जेल में है। जबकि उसकी मां जमानत पर हैं। उस दौरान तारा ने कहा था कि ससुराल में एक दिन मंत्री हाजी हुसैन अंसारी के यहां से इफ्तार पार्टी का निमंत्रण मिला, जिसमें जनाब रकीबुल हसन खान के नाम का संबोधन था। यह कार्ड भी तारा ने कोर्ट के हवाले किया था। तारा ने बताया था कि उनके बीच दरार तब पैदा हुई, जब नौ जुलाई को रंजीत 20-25 मौलवी लेकर घर पहुंच गया और जबरन धर्म परिवर्तन के लिए दबाव देने लगा। मना करने पर उसे मारा गया। तारा के अनुसार रकीबुल हसन घर से रातभर गायब रहता था। वह अल सुबह चार बजे आता था। वह क्या काम करता है, आज तक पता नहीं चल पाया। तारा ने राज्य महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष महुआ मांझी और भाजपा नेता अजय नाथ शाहदेव के समक्ष अपनी आपबीती कुछ यूं सुनाई थी… मैडम, रकीबुल हसन ने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दी थीं। करीब डेढ़ महीने अपने कब्जे में रखते हुए उसने न तो खाना-पीना दिया और न ही किसी से मिलने देता था। मैं उसकी पत्नी बनी थी। इसके बाद भी उसके कमरे में जाने के लिए दरवाजा खटखटाना पड़ता था। वह बार-बार कहता था कि तुम्हें इस्लाम धर्म कबूल करना होगा। ऐसा नहीं करने पर तुम्हारा चेहरा सलामत नहीं रहेगा। इस दौरान विरोध करने पर उसके साथ बुरी तरह मारपीट की गई। रकीबुल तो जानवर था, लेकिन उसका पामेलियन कुत्ता जानवर होते हुए भी आदमी से अधिक संवेदनशील था। जब मेरी पिटाई होती थी और मैं बेसुध होकर पड़ी रहती थी तो छोटा-सा कुत्ता मेरी निगरानी करता था कि मैं जिंदा हूं या नहीं। मेरी सांसें चल रही हैं या नहीं। तारा ने बताया कहा कि उसके मोबाइल पर धमकी मिल रही थी। धमकी देनेवाले ने तारा की मौसी के मोबाइल पर फोन कर कहा था कि कब तक लोग तुम्हें बचाएंगे।

भूतों का डर भगाने के लिए श्मशान में चादर तानकर सोए विधायक, डिनर भी वहीं किया

पालाकोल : आंध्रप्रदेश की पालाकोल विधानसभा सीट से टीडीपी विधायक निम्माला रामानायडु ने गत शुक्रवार को न केवल पूरी रात श्मशान घाट में गुजारी, बल्कि डिनर भी वहीं किया। सुबह उठने के बाद श्मशान घाट पर ही नहाए और चाय भी वहीं पी। उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि लोगों के दिमाग से भूत-प्रेत का डर निकाल सकें। भूत-प्रेत के डर से यहां कोई भी ठेकेदार और मजदूर निर्माण कार्य करने को तैयार नहीं हो रहे थे। दरअसल पालाकोल शहर का श्मशान घाट काफी सालों से बुरी हालत में है। अंतिम क्रिया-कर्म के लिए यहां कोई भी सुविधा नहीं है। खासकर बरसात के दिनों में ये जगह एक दलदल में तब्दील हो जाती है। इस जगह पर निर्माण कार्य और मूलभूत सुविधाएं देने के लिए सरकार की ओर से कई बार धनराशि मंजूर की गई, लेकिन भूत-प्रेत के डर कह वजह से यहां कभी भी काम शुरू नहीं हो सका। रामानायडु ने बताया कि श्मशान घाट में विकास कार्य के लिए दो बार टेंडर जारी किए गए, लेकिन यहां काम शुरू नहीं हो सका। किसी तरह एक ठेकेदार को काम के लिए तैयार किया, लेकिन उसके काम करने वाले मजदूरों ने यहां कुछ अनहोनी सी बातें देखकर भूत प्रेत के डर से काम करना बंद कर दिया। इस डर को उनके मन से निकालने के लिए मैंने ये सब किया। रामानायडु के इस उपाय का असर भी हो गया। सुबह मजदूर काम पर लौट आए और कंस्ट्रक्शन का काम शुरू हो गया। विधायक ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि बाकी के लोग भी यहां आकर जल्द काम शुरू कर देंगे।

एसबीआई बंद करेगा 9 विदेशी ब्रांच, 6 पहले ही हो चुकी हैं बंद

नई दिल्‍ली : भारतीय स्‍टेट बैंक (एसबीआई) विदेशों में स्थित अपनी 9 ब्रांच बंद करने की योजना पर काम कर रहा है। इससे पहले भी बैंक अपनी 6 विदेशी शाखाएं बंद कर चुका है। बैंक के प्रबंध निदेशक प्रवीण के गुप्‍ता ने बताया कि विदेशी कारोबार के पुनर्गठन की योजना के तहत काम किया जा रहा है। बैंक इस वक्‍त इस 36 देशों में कारोबार कर रहा है, जहां उसकी कुल मिलाकर 190 शाखाएं हैं। उन्‍होंने बताया कि बैंकों के पास पूँजी की दिक्‍कत है, ऐसे में इसका उसी जगह पर इस्‍तेमाल अच्‍छा है जहां सबसे अच्‍छा इस्‍तेमाल किया जा सके। इसी रणनीति के तहत बैंक पिछले दो साल में अपनी 6 विदेशी शाखाएं बंद कर चुका है। इसके अलावा 9 और विदेशी शाखाओं को बंद करने की योजना पर काम चल रहा है। उन्‍होंने बताया कि विदेशों में सभी जगहों पर कार्यालय नहीं है, जैसे बंगलादेश और दक्षिण अफ्रीका में काफी छोटी शाखाएं हैं। ऐसी ही शाखाएं कई जगहों पर हैं, जिनका पुनर्गठन करने की जरूरत है। उन्‍होंने बताया कि वित्त विभाग का एक आदेश भी है कि विदेशों में जो शाखाएं व्‍यवहारिक न हों उनको बंद किया जाए। उनके अनुसार एसबीआई ने सरकार के इस आदेश के पहले ही इस योजना पर काम शुरू कर दिया था।

राजकुमार पद्मनाभ ने अन्तरराष्ट्रीय ब्रांड के लिए की रैंप वॉक

जयपुर : ऐसा माना जाता है कि शाही परिवार फैशनेबल होते हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पिंक सिटी के राजकुमार और राजकुमारी दिया कुमारी और नरेंद्र सिंह के बेटे पद्मनाभ सिंह ने इटली के मिलान में डॉल्चे एंड गब्बाना के लिए रैंप वाक की है। वह पहले ऐसे प्रिंस है जिन्होंने 19 साल की उम्र में अन्तरराष्ट्रीय रनवे पर मॉडलिंग की है। 19 साल के जयपुर के प्रिंस पद्मनाभ सिंह ने मिलान के इंटरनेशनल रनवे पर मॉडलिंग की है। पद्मनाभ पोलो प्लेयर हैं और वह 13 साल की उम्र से पोलो खेल रहे हैं। वह भारतीय पोलो टीम के कप्तान रह चुके हैं। इंग्लैंड के प्रिंस विलियम और हैरी के साथ पोलो खेल चुके हैं।