Wednesday, July 8, 2026
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जन्माष्टमी पर कान्हा का मुँह करें मीठा

नारियल मलाई लड्डू

सामग्री : 150 ग्राम सूखे खोपरे का बूरा, 200 ग्राम मिल्‍कमेड, 1 कप गाय के दूध की ताजी मलाई, आधा कप गाय का दूध, इलायची पावडर, 5 छोटे चम्मच मिल्‍क पावडर, कुछेक लच्छे केसर, चांदी का
बरक।
भरावन की सामग्री : 250 ग्राम मिश्री बारीक पिसी हुई, पाव कटोरी पिस्ता कतरन, 1 चम्मच मिल्‍कमेड, दूध मसाला 1 चम्मच।
विधि : सबसे पहले नारियल का बूरा, मिल्कमेड, दूध, मिल्क पावडर और पिसी इलायची को अच्छी तरह मिला लें। तत्पश्चात माइक्रोवेव में 5-7 मिनट तक इसे माइक्रो कर लें। अब भरावन सामग्री को अलग से एक कटोरे में मिक्स कर लें। एक छोटी कटोरी में 4-5 केसर के लच्छे कम पानी में गला दें। अब माइक्रोवेव से निकले मिश्रण को 10-15 तक सूखने दें, फिर उसमें भरावन मसाला सामग्री डालकर मिश्रण को अच्छी तरह मिलाएं और उसके छोटे-छोटे लड्डू बना लें। सभी लड्‍डू तैयार हो जाने पर उनके ऊपर केसर का टीका लगाएं, चांदी के बरक से सजाएं और लाजवाब नारियल-मिश्री के लड्‍डू तैयार हैं।

धनिया मेवा पंजीरी

सामग्री : 100 ग्राम साबुत खड़ा धनिया, 100 ग्राम पिसी शकर, छोटी पाव कटोरी कटे हुए मखाने, 25 ग्राम सूखे खोपरे के टुकड़े, काजू और बादाम की कतरन, 2-3 इलायची पिसी हुई, कुछेक किशमिश, 4-5 केसर के लच्छे, घी (अंदाज से)।
विधि :  सबसे पहले एक कड़ाही में छोटा आधा चम्मच घी गर्म करें। अब धनिया डालकर धीमी आंच पर भूनें। जब धनिए से खुशबू आने लगे तब आंच से उतारकर ठंडा कर लें।  अब सभी मेवे भूनकर अलग रखें।  धनिया ठंडा होने पर मिक्सी में बारीक बीस लें। अब इसमें पिसी शकर, तले मेवे और पिसी इलायची डालकर अच्छी तरह मिलाएं।  केसर से सजाएं।   लीजिए तैयार है शाही धनिया-मेवे की पंजीरी।

अमझेरा जहाँ श्रीकृष्ण ने किया था रूक्मिणी हरण

मध्यप्रदेश के धार जिले में बसा कस्बा है अमझेरा। यही वह जगह है जहां से श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी का हरण किया था। मंदिर के पीछे बनी नाली नुमा निशाल द्वारकाधीश भगवान श्री कृष्ण के रथ के पहियों के निशान है। भक्तों का मानना है कि यह मंदिर कामना पूर्ति करता है। यदि प्रेमी-प्रेमिका यहां आकर विवाह बंधन में बंधने की कामना करें तो वह जरूर पूरी होती है।  अमझेरा का इतिहास काफी गौरवपूर्ण रहा है। कुंदनपुर, कुन्डिनपुर और अंबिकापुर के नाम से प्रसिद्ध यह नगर द्वापरकाल में कुंदनपुर के नाम से विख्यात था। यहां राजा भीष्मक का राज्य था। उनके पांच पुत्र थए रुक्मी, कूक्मरत, रुक्मबाहु, रुक्मकेश, रुक्ममाली और एक बेहद खूबसूरत पुत्री थी रुक्मणी।
तस्वीर – साभार अमका झमका मंदिर की फेसबुक वॉल

 

राजा भीष्मक ने रुक्मणि का विवाह चंदेरी के राजा शिशुपाल से तय कर दिया लेकिन रुक्मणि स्वयं को श्रीकृष्ण को अर्पित कर चुकी थी। जब उसे अपनी सखी से पता चला कि उसका विवाह तय कर दिया गया है तब रुक्मणि ने वृद्ध ब्राह्मण के साथ कृष्ण को संदेश भेजा। कृष्ण रुक्मणि का पत्र पाते ही कुंदनपुर की ओर निकल पड़े। रुक्मणि रोज अमझेरा के अंबिका मंदिर में पूजा के लिए आती थी। इसी अम्बिका माता के मंदिर से श्रीकृष्ण ने रुक्मणि का हरण किया।

मंदिर के भीतर प्रतिमाएँ..

रुक्मिणि ने यहीं अंबिका माता की पूजी की। मंदिर के तीन फेरे लिए और श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने चार घोडों के रथ पर हरण कर लिया। जब श्रीकृष्ण रुक्मणि को लेकर जा रहे थे तब रुक्मणि के भाई रुक्मी ने उनका विरोध किया। श्रीकृष्ण ने रुक्मी को यहां से सवायोजन दूर भोजकट वन में बांध दिया। इस जगह को आज भी लोग भोपावर के नाम से जानते हैं।

कृष्ण कालीन इस मंदिर में प्राणप्रतिष्ठित अंबिका माता की मूर्ति को बेहद चमत्कारिक माना जाता है। पूरे विश्व में यह एकमात्र मूर्ति है जिसमें मां की योनी से सर्प निकलता है और शरीर पर तीन स्तन हैं। इसलिए इसे त्रिस्तनीय माता भी कहा जाता है। मां का मुख पश्चिम मुखी है। मंदिर के पास ही श्मशान है। इसलिए इस मंदिर को लोग तांत्रिक स्थल मानते हैं।

कृष्ण रुक्मणि का हरण करके ले जा रहे थे तब रुक्मणि के भाई रुक्मी ने कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा था। इस समय श्री कृष्ण के रथ में चार घोड़े जुते हुए थे। उन्होंने इतनी तेजी से रथ दौड़ाया कि मंदिर के पिछले हिस्से में रथ के पहियों के निशान आ गए। यह निशान आज भी मौजूद हैं।

(साभार – श्रीराम टूरिज्म)

स्त्रियाँ अगर दूसरी स्त्रियों को सम्मान नहीं देंगी तो उनको सम्मान कैसे मिलेगा

वरिष्ठ लेखिका प्रभा खेतान के विशाल व्यक्तित्व से अलग उनकी बड़ी बहन डॉ.  गीता गुप्ता खेतान ने भी संघर्ष करके अपनी जगह बनायी। जब लड़कियों के लिए घर से निकलना चुनौती हुआ करता था, तब उन्होंने कलकत्ता विश्‍वविद्यालय से एमबीबीएस की पढ़ाई भी की और नौैकरी भी की। इसके बाद वे स्कॉटलैंड के ग्लासगो पढ़ने गयीं। गीता जी लन्दन से एमआरसीओजी और कनाडा के कनाडियन कॉलेज ऑफ फैमिली फिजिशियन कार्यरत रहीं। कई पेपर और कई पुरस्कार व सम्मान उनके नाम पर दर्ज हैं। पिछले 4 साल से वे कोलकाता में हैं और ईस्टर्न डायग्ऩस्टिक सेंटर  को अपनी सेवाएँ दे रही हैं और बेहद अच्छी चित्रकार भी हैं। डॉ. गीता गुप्ता खेतान से हुई बातचीत के कुछ अंश –

प्रभा संवेदनशील थी मगर मैं व्यावहारिक रही

हम 7 भाई – बहन थे। मेरी सबसे बड़ी बहन के बच्चे भी थे। हम एक ही घर में पढ़े। मेरी माँ काफी समृद्ध परिवार से थीं और बच्चों को आया के पास रखा जाता था। माँ ने घरेलू काम नहीं किये पर व बेहद स्वाभिमानी थीं। प्रभा शुरू से ही मेधावी थी। संवेदनशील, सकारात्मक और साहित्योन्मुखी थी। महज 8 साल की उम्र में ही उसने मंच पर प्रस्तुति दी और तभी से उसकी कविता में विद्रोह सामने आने लगा था। मन्नू भण्डारी हमारी शिक्षिका थीं और प्रभा की मेंटर भी थीं। मुझमें भी पढ़ने की आदत प्रभा ने ही डाली मगर मैं बहुत व्यावहारिक रही हूँ और मैंने अपनी मेहनत से परीक्षाएँ पास कीं।

रिश्तेदार टोकते रहे और हम पढ़ते चले गये

मैं डॉक्टर हूँ। विदेश में उस जमाने में अलग रहकर पढ़ाई की है जहाँ कोई नौकर -चाकर नहीं था। अपना हर काम खुद करती थी। जीवन अपनी शर्तों पर जीया। यह स्थिति होती है जब आप स्थिति के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं। पिता की मृत्यु कम उम्र में हुई तो हमने आर्थिक अभाव भी देखा। उनकी मृत्यु के समय ही मैंने तय किया कि मुझे डॉक्टर बनना है और फोरेंसिक डॉक्टर बनना है। रिश्तेदार टोकते रहे और हम पढ़ते चले गये। ये माँ की शक्ति थी कि हम बड़े हुए। जब शादी के लिए कहा गया तो हमने कह दिया कि हमारी डिग्री ही हमारा हीरा है।

शिक्षा वह है जो स्वाभिमानी बनाये

आज माँ होकर लड़कियाँ भ्रूण हत्या करती हैं। वह माँ होने के बावजूद इस बात के लिए तैयार कैसे हो जाती हैं? अगर ऐसी औरतें अपनी बेटी की इज्जत नहीं कर सकतीं तो कोई उनकी इज्जत क्यों करेगा? सँयुक्त परिवारों में औरतों के लिए बच्चों को समय दे पाना आसान नहीं होता। आज भी परिवारों में दामाद को जो सम्मान मिलता है, वह बहुओं को नहीं मिलता। तो कहने का मतलब यह है कि शिक्षा वह है जो आपको स्वाभिमानी बनाए और आप अपना आत्मसम्मान हर स्थिति में बनाये रखें। वह अपनी पढ़ाई वह है जो आपको सोचने और समझने की शक्ति देता है। अपने हर निर्णय के लिए वे दूसरों पर निर्भर रहती हैं। प्रभा ने दूसरों को आगे बढ़ाया और सोचने की शक्ति दी।

शिक्षा का मतलब समग्र विकास होता है

सिर्फ डिग्री ही शिक्षा नहीं होती। शिक्षा का मतलब समग्र विकास होता है,महँगे स्कूलों में पढ़ने भर से कोई शिक्षित नहीं होता। भारत में बच्चों को बचत करना नहीं सिखाया जाता। कोई ब्रांड आपको बेहतर इन्सान नहीं बना सकता। आप ब्रांड पर निर्भर क्यों रहें, आप खुद में ही एक ब्रांड हैं। विदेशों में रही हूँ तो ये जानती हूँ कि अगर वहाँ ब्रांड है तो बजट भी है। लोग बचत करते हैं मगर यहाँ बच्चों को बचत करना नहीं सिखाया जाता और न ही पैसों की कद्र करना सिखाया जाता है। मैं यहाँ महँगी – महँगी किताबें खरीदती थी और पढ़ने बाहर गयी कि तो देखा कि वहाँ लोग पुस्तकालय में किताबें पढ़ते हैं….ये देखकर लगा कि हम कितनी बर्बादी करते थे। इतनी तैयारी करते देखकर आज हैरत होती है।

 पैसे और परिवार की कद्र करें

मैं पहले ग्लासगो में रही और शादी के बाद कनाडा में मैं मॉन्ट्रियाल में रही थी, वहीं नौकरी की। वहाँ आर्ट थेरेपी होती है और रंगों के माध्यम से मानसिक स्थिति का पता चल जाता है। 90 के दशक में पिकॉसो की प्रदर्शनी देखी..अच्छी लगी तो प्रभा से कहा कि सेवानिवृत्त होने के बाद सीखूँगी तो उसने कहा कि अभी सीखूँ। मैंने पेंटिंग सीखी और मुझे रंगों से प्यार है..यह मेरी पेंटिंग में नजर आता है। आज लड़कियों की स्थिति बहुत बदली है। जीवन स्तर, भाषा, शिक्षा और परवरिश का तरीका बदला है। पैसे और परिवार की कद्र करें तो सब सही होगा।

व्यक्ति हो या विचारधारा…समग्रता से देखना जरूरी है

जीवन में दृष्टि का बड़ा महत्व है। यह हमारी दृष्टि ही यानि हमारी सोच या नजरिया ही है जो हमारी विचारधारा बनता है। जब विचारधारा बन जाती है और वह जब अडिग हो जाती है तो वही हमारी सीमा भी बन जाती है। सितम्बर की शुरुआत जब जन्माष्टमी के साथ हुई है तो चलिए हम अपनी बात को कृष्ण के ही माध्यम से ही समझाते हैं। हम सब जानते हैं कि कृष्ण योगीराज और 64 कलाओं के ज्ञाता के अतिरिक्त एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। वंशी उनको प्रिय थी मगर वह उनका एकमात्र परिचय नहीं थी। इसके बावजूद हजारों वर्ष बाद भी धरती पर उनका प्रथम परिचय वंशी से जोड़कर और माखन चोर के रूप में होता है..इसके आगे बढ़कर थोड़ा देखा जाये तो वह गीता के उपदेश या विश्वरूप तक सिमटता है मगर वे एक कुशल योद्धा थे…यह तथ्य चाहकर भी याद नहीं आता। इससे आगे बढ़कर सोचिए तो जिस द्वारिकाधीश की 16 हजार 8 पत्नियाँ हों..एक देवकी और यशोदा जैसी माँ हो. एकानंगा और सुभद्रा जैसी बहन और द्रोपदी जैसी सखी हो….उस व्यक्ति के साथ जब किसी स्त्री को देखते हैं…वह राधा ही होती है…मजे की बात यह है कि खुद श्रीमद्भागवत में भी राधा का उल्लेख सीधे नहीं आता मगर उनका होना एक सत्य है…यही हमारी दृष्टि की सीमा है क्योंकि हमने जो अपने एकांगी दृष्टिकोण से एक विराट व्यक्तित्व को देखा है।

हम उससे परे न तो उनको देखना चाहते हैं और न समझना चाहते हैं…अगर वंशी के साथ सुदर्शन चक्र और प्रतोद आप नहीं जोड़ते तो आपका हर आकलन और आपकी हर दृष्टि अधूरी है। उनकी बाल लीलाओं जितना ही महत्वपूर्ण, उनका गीता ज्ञान, उनका युद्ध और उनका समग्र दर्शन है। देखा जाए तो कृष्ण जिस विराट उद्देश्य के साथ जन्मे थे, उसे पूरा करने में उनका सबसे अधिक साथ द्रोपदी ने दिया था…एक ऐसा सशक्त चरित्र जो आज भी सशक्तीकरण की परिभाषा बना हुआ है। अगर वह न होती तो आर्यावत को धर्म की तरफ ले जाने का कृष्ण का अभियान पूरा ही नहीं हो पाता। रक्मिणी..एक ऐसी नायिका जो श्रीकृष्ण का आधार ही है और उनकी विराट द्वारिका को उनके अतिरिक्त कोई और नहीं सम्भाल सकता था मगर आज भी उनका परिचय सिर्फ श्रीकृष्ण के स्वयम्बर तक ही सीमित है। आज यह जिक्र करने का एक कारण है जो सन्देह और विवाद, दोनों इन दिनों का सत्य है…विचारधारा जब व्यक्ति केन्द्रित हो जाती है तो अपना उद्देश्य खो देती है और आज हमारे देश में विचारधारा का यह स्पष्ट विभाजन हमें दिखायी दे रहा है। राष्ट्रवाद, वामपंथ, पूँजीवाद के घटाघोप में फँसा हमारा बुद्धिजीवी वर्ग कुछ भी अपनी दृष्टि से परे देखना ही नहीं चाहता। पक्ष जब विपक्ष में था, यही करता था और आज का सत्ताधारी दल भी यही कर रहा है।

हमारी राजनीति और समाज से सौहार्द और परस्पर सम्मान की दृष्टि से खोती जा रही है। अब विरोध का मतलब वैचारिक नहीं बल्कि कटुक्ति, उपहास, नीचा दिखाना हो गया है क्योंकि हम अपनी सीमाओं के परे जाकर कुछ देखना ही नहीं चाह रहे। यह ऐसा है कि हमारी बात न सुनी तो हम किसी की परवाह नहीं करते, न देश की, न न्यायालय की, न संविधान की और न समाज की…हमें बस विरोध करना है और इसलिए करना है कि जो व्यक्ति हमारे सामने है, हम उसे पसन्द नहीं करते। आप सोचिए कि यह दृष्टि कितनी घातक है और कितनी संकुचित है…आप यह संकुचित दृष्टि आपको आगे नहीं बढ़ने दे रही और वह नहीं देखने दे रही जो आने वाली पीढ़ी हमें दिखाना चाहती है, चाहे वह हमारे बच्चे हों या विद्यार्थी…यही वजह है कि मतभेद….मनभेद बन रहा है। आज गुरु और शिष्य के बीच आ रही दूरी का कारण भी हमारी यही जिद है कि हम जो हैं…सही हैं…हमें न देखने की जरूरत है…न सीखने की जरूरत है…मगर यही दृष्टि आपका अहं कब बन जाती है…कब आपको एकाकी करती है और कब आपको पतन की ओर ले जाती है…खुद आपको भी पता नहीं चलता….। व्यक्ति हो या विचारधारा, किसी को देखना और समझना है तो उसकी समग्रता से देखिए….चीजें आसान हो जायेंगी…। आप सभी को जन्माष्टमी..शिक्षक दिवस और हिन्दी दिवस की स्नेहिल शुभकामनायें…हमारे साथ बने रहिए और सुझाव देते रहिए..सदैव स्वागत है।

दिनकर की ‘उर्वशी’ स्त्री के स्वत्व का उद्घोष है

कोलकाता : दिनकर ने अपने काव्य ‘उर्वशी’ में स्त्री-पुरुष संबंध को एक व्यापक सर्जनात्मक भूमि पर देखा है। वे राष्ट्रीय आक्रोश के साथ मानवीय प्रेम के कवि हैं। उन्होंने एक समय ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ राष्ट्रीय भावना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन वे उर्वशी में प्रेम को भौतिक भूमि पर देखते हुए भी ‘कामाध्यात्म’ के माध्यम से एक उच्च धरातल प्रदान करते हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कृति ‘उर्वशी’ पर चर्चा करते हुए भारतीय भाषा परिषद में ये बातें कही गईं। पटना विश्‍वविद्यालय के प्रो. तरुण कुमार ने अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि काम एक भौतिक वस्तु ही नहीं एक सर्जनात्मक, मानवीय और आध्यात्मिक प्रेरणा भी है। स्त्री और पुरुष दो अलग सत्ता होते हुए भी अद्वैत हैं। दिनकर की ‘उर्वशी’ में पत्नी और प्रेयसी का द्वंद्व आधुनिक यथार्थ को व्यक्त करते हुए वस्तुतः एक प्रतिकात्मक संकेत है। यह वस्तुतः भौतिकता और आध्यात्मिकता में सामंजस्य की चेतना है।

अध्यात्म और मानव प्रकृति परस्पर विरोधी नहीं हैं। आरंभ में जालान गर्ल्स कॉलेज के प्रो. विवेक सिंह ने विषय प्रस्तावना करते हुए कहा कि ‘उर्वशी’ ॠग्वेद से प्रेरणा लेकर लिखी गई एक आधुनिक कृति है जिसमें दिनकर ने आधुनिक जीवन में प्रेम के अर्थ पर विचार किया है। अध्यक्षीय भाषण में डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि कालिदास की कृति से दिनकर की कृति की भिन्नता यह है कि इसमें उर्वशी स्त्री के रूप में एक सुंदर दृश्य भर होने की जगह खुद अपनी आँखों से मर्त्यलोक के जीवन को देखना चाहती है। वह पुरूरवा के साथ रहने का निर्णय अपने हाथ में रखती है। इस तरह उर्वशी वस्तुतः सामंतवाद और उपभोक्तावाद के परिवेश में स्त्री के स्वत्व का उद्घोष है। आज बाजार ने स्त्री को महज एक देखी जाने वाली चीज बना दिया है, जबकि स्त्री को कृतज्ञता और सम्मान के साथ देखे जाने की जरूरत है। आरम्भ में स्वागत भाषण करते हुए भारतीय भाषा परिषद के मंत्री नंदलाल शाह ने कहा कि दिनकर ने हिंदी के राष्ट्रीय साहित्य को समृद्ध किया है। संचालन करते हुए पीयूषकांत राय ने कहा कि दिनकर का साहित्य आज भी विद्यार्थियों को अच्छा और उदार मनुष्य बनने की प्रेरणा देता है। परिषद की मंत्री बिमला पोद्दार ने धन्यवाद दिया।

 

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन

इनकी स्कूली शिक्षा सियालकोट में हुई। कानून की डिग्री लाहौर से प्राप्त की। यूएसए से पत्रकारिता की डिग्री ली। उन्होंने दर्शनशास्त्र में पीएचडी भी की थी। कुलदीप नैयर को आपातकाल  (1975-77)  के दौरान गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 1990 में ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया। वह एक मानवीय अधिकार कार्यकर्ता और शांति कार्यकर्ता भी रहे हैं। उन्हें रामनाथ गोयनका ऑवार्ड से भी नवाजा गया था। कुलदीप नैयर ने इंडिया आफ्टर नोहरू किताब लिखी थी जो काफी चर्चा में रही।  कुलदीप नैयर के निधन के बाद पीएम मोदी ने उनकी मृत्यु पर दुख व्यक्त किया। वह 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे। 1990 में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था। अगस्त 1997 में राज्यसभा में नामांकित किया गया था।

घर पर मातृ भाषा बोलने वाले बच्चे होते हैं मेधावी

लंदन : विदेश में रहनेवाले वैसे बच्चे जो अपने घर में परिवारवालों के साथ मातृभाषा में बात करते हैं और बाहर दूसरी भाषा बोलते हैं, वह ज्यादा अक्लमंद होते हैं। एक नए अध्ययन से यह जानकारी मिली है। ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के शोधकर्ताओं ने शोध में यह पाया कि वैसे बच्चे जो स्कूल में अलग भाषा बोलते हैं और परिवारवालों के साथ घर में अलग भाषा का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें बुद्धिमत्ता जांच में उन बच्चों के मुकाबले अच्छे अंक लाए जो सिर्फ गैर-मातृभाषा जानते हैं। इस अध्ययन में ब्रिटेन में रहनेवाले तुर्की के सात से 11 साल के 100 बच्चों को शामिल किया गया। इस आईक्यू जांच में दो भाषा बोलने वाले बच्चों का मुकाबला ऐसे बच्चों के साथ किया गया जो सिर्फ अंग्रेजी बोलते हैं।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के ब्योरे से किसान अनजान : सर्वे

नयी दिल्ली : किसान अभी तक प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के ब्योरे से अनभिज्ञ हैं। जलवायु जोखिम प्रबंधन कंपनी डब्ल्यूआरएमएस के एक सर्वे में यह तथ्य सामने आया है। हालांकि, सरकार और बीमा कंपनियां इसकी पहुंच बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। सर्वे में कहा गया है कि कई राज्यों में इस योजना के तहत नामांकित किसान काफी संतुष्ट हैं। इसकी वजह किसानों को सहायता के लिए उचित तरीके से क्रियान्वयन और बीमा कंपनियों की भागीदारी तथा बीमित किसानों के एक बड़े प्रतिशत को भुगतान मिलना शामिल है।
पीएमएफबीवाई की शुरुआत 2016 में हुई थी। यह आज जलवायु तथा अन्य जोखिमों से कृषि बीमा का एक बड़ा माध्यम है। यह योजना पिछली कृषि बीमा योजनाओं का सुधरा रूप है। योजना के तहत ऋण लेने वाले किसान को न केवल सब्सिडी वाली दरों पर बीमा दिया जाता है, बल्कि जिन किसानों ने ऋण नहीं लिया है वे भी इसका लाभ ले सकते हैं।
वेदर रिस्क मैनेजमेंट सर्विसेज प्राइवेट लि. (डब्ल्यूआरएमएस) ने कहा, ‘‘हाल में आठ राज्यों (उत्तर प्रदेश, गुजरात, ओड़िशा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, नगालैंड, बिहार और महाराष्ट्र में बेसिक्स द्वारा किए गए सर्वे में यह तथ्य सामने आया कि जिन किसानों से जानकारी ली गई उनमें से सिर्फ 28.7 प्रतिशत को ही पीएमएफबीवाई की जानकारी है।’’
सर्वे के अनुसार किसानों की शिकायत थी कि ऋण नहीं लेने वाले किसानों के नामांकन की प्रक्रिया काफी कठिन है। उन्हें स्थानीय राजस्व विभाग से बुवाई का प्रमाणपत्र, जमीन का प्रमाणपत्र लेना पड़ता है जिसमें काफी समय लगता है।
इसके अलावा बैंक शाखाओं तथा ग्राहक सेवा केंद्र भी हमेशा नामांकन के लिए उपलब्ध नहीं होते क्योंकि उनके पास पहले से काफी काम है। ‘किसानों को यह नहीं बताया जाता कि उन्हें क्लेम क्यों मिला है या क्यों नहीं मिला है। उनके दावे की गणना का तरीका क्या है।’सर्वे के अनुसार 40.8 प्रतिशत लोग औपचारिक स्रोतों मसलन कृषि विभाग, बीमा कंपनियां या ग्राहक सेवा केंद्रों से सूचना जुटाते हैं

फेसबुक ने रूस-ईरान से जुड़े 652 अकाउंट हटाये, ट्विटर ने 284 अकाउंट बंद किये

सैन फ्रांसिस्को : सोशल मीडिया वेबसाइट फेसबुक ने भ्रामक राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त सैकड़ों अकाउंट, समूहों और पेजों की पहचान करके उन्हें प्रतिबंधित कर दिया है। ये अकाउंट और पेज ईरान और रूस से जुड़े हैं। फेसबुक ने कहा कि उसने रूस और ईरान से जुड़े 652 पेजों, समूहों और अकाउंट को “अनुचित गतिविधियों” के लिये अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया है। इसमें राजनीतिक सामग्री साझा करना भी शामिल है। उल्लेखनीय है कि फेसबुक 2016 के राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के लिये रूसी एजेंटों द्वारा अपने प्लेटफॉर्म पर अभियान चलाने की बात सामने आने के बाद अपनी नीतियों को मजबूत करने में जुटा है। इसी प्रकार, अन्य सोशल मीडिया नेटवर्क भी भ्रामक राजनीतिक अभियानों के खिलाफ सक्रिय कदम उठा रहे हैं। फेसबुक के बाद माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर ने भी गड़बड़ी में लिप्त रहने पर 284 अकाउंट बंद करने की जानकारी दी है। इनमें से कई अकाउंट ईरान में बनाये गये हैं। सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने कहा कि सामग्री की समीक्षा अभी पूरी नहीं हुयी है और ये भी बताने से मना किया इन अकाउंट से किस तरह का काम किया गया है। हालांकि, उसने इसकी सूचना अमेरिका और ब्रिटेन सरकार को दे दी है। साथ ही ईरान पर प्रतिबंध के मद्देनजर इसकी जानकारी अमेरिका के वित्त और विदेश विभाग को भी दी गयी है। फेसबुक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने कहा, “बहुत कुछ है, जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं। लोगों के साथ-साथ देश भी हर संभव तरीके से सेवाओं का दुरुपयोग करने की कोशिश कर रहे हैं।”

चन्द्रयान-1 से प्राप्त आँकडों से चंद्रमा पर बर्फ की उपस्थिति की पुष्टि

वाशिंगटन : वैज्ञानिकों ने चन्द्रयान-1 अंतरिक्षयान के आँकड़ों के आधार पर चन्द्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों के सबसे अंधेरे और ठंडे स्थानों पर जल के जमे हुए स्वरूप में उपस्थित होने की पुष्टि की है। नासा ने आज यह कहा। भारत ने दस साल पहले इस अंतरिक्षयान का प्रक्षेपण किया था।
सतह पर पर्याप्त मात्रा में बर्फ के मौजूद होने से इस बात के संकेत मिलते हैं कि आगे के अभियानों या यहां तक कि चन्द्रमा पर रहने के लिए भी जल की उपलब्धता की सम्भावना है। ‘पीएनएएस’ जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि बर्फ इधर-उधर बिखरे हुए हैं।
दक्षिणी ध्रुव पर अधिकतर बर्फ लूनार क्रेटर्स के पास जमी हुई हैं। उत्तरी ध्रुव के बर्फ अधिक व्यापक तौर पर फैले हुए हैं लेकिन अधिक बिखरे हुए हैं। वैज्ञानिकों ने नासा के मून मिनरेलॉजी मैपर (एम3) से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल कर यह दिखाया है कि चंद्रमा की सतह पर जल हिम मौजूद हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) द्वारा 2008 में प्रक्षेपित किये गए चंद्रयान-1 अंतरिक्षयान के साथ एम3 को भेजा गया था।। ये जल हिम ऐसे स्थान पर पाये गए हैं, जहां चंद्रमा के घूर्णन अक्ष के थोड़ा झुके होने के कारण सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुंच पाती।